Akbar

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Jalal ud-din Muhammad Akbar (जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर), known popularly as Akbar (literally "the great") (14 October 1542 – 27 October 1605), also known as Akbar the Great was Mughal Emperor from 1556 until his death. He was the third and one of the greatest rulers of the Mughal Dynasty in India. Akbar succeeded his father, Humayun, under a regent, Bairam Khan, who helped the young emperor expand and consolidate Mughal domains in India. A strong personality and a successful general, Akbar gradually enlarged the Mughal Empire to include nearly all of the Indian Subcontinent north of the Godavari River. His power and influence, however, extended over the entire country because of Mughal military, political, cultural, and economic dominance. To unify the vast Mughal state, Akbar established a centralised system of administration throughout his empire and adopted a policy of conciliating conquered rulers through marriage and diplomacy. In order to preserve peace and order in a religiously and culturally diverse empire, he adopted policies that won him the support of his non-Muslim subjects. Eschewing tribal bonds and Islamic state identity, Akbar strived to unite far-flung lands of his realm through loyalty, expressed through a Persianised culture, to himself as an emperor who had near-divine status.

Mughal India developed a strong and stable economy, leading to commercial expansion and greater patronage of culture. Akbar himself was a patron of art and culture. He was fond of literature, and created a library of over 24,000 volumes written in Sanskrit, Hindustani, Persian, Greek, Latin, Arabic and Kashmiri, staffed by many scholars, translators, artists, calligraphers, scribes, bookbinders and readers.

Akbar's courts at Delhi, Agra, and Fatehpur Sikri became centers of the arts, letters, and learning. Perso-Islamic culture began to merge and blend with indigenous Indian elements, and a distinct Indo-Persian culture emerged characterised by Mughal style arts, painting, and architecture. Disillusioned with orthodox Islam and perhaps hoping to bring about religious unity within his empire, Akbar promulgated Din-i-Ilahi, a syncretic creed derived from Islam, Hinduism, Zoroastrianism, and Christianity. A simple, monotheistic cult, tolerant in outlook, it centered on Akbar as a prophet, for which he drew the ire of the ulema and orthodox Muslims.

By abolishing the sectarian tax on non-Muslims and appointing them to high civil and military posts, he was the first Mughal ruler to win the trust and loyalty of the native subjects. He had Sanskrit literature translated, participated in native festivals, realizing that a stable empire depended on the co-operation and goodwill of his subjects. Thus, the foundations for a multicultural empire under Mughal rule was laid during his reign.

On 3 October 1605, Akbar fell ill with an attack of dysentery, from which he never recovered. He is believed to have died on or about 27 October 1605, after which his body was buried at a mausoleum in Sikandra, Agra.

Seventy-six years later, in 1691, in the times of Mughal ruler Aurangzeb, a group of Jat chieftains, who had raised a rebellion against the Mughal Empire, robbed the gold, silver and fine carpets within the tomb and desecrated Akbar's mausoleum.

After his death, Akbar was succeeded as emperor by his son, Jahangir.

The burning of Akbar's bones

Reputed historian Kalika Ranjan Qanungo writes -

On 28th March 1688, Mir Ahmad, the custodian of the tomb of Akbar, reported to the Emperor (Aurangzeb) that at night a party of Rajaram's men had fallen upon the tomb and carried off its carpets, vessels, lamps and other decorations. Another report was to the effect that Rajaram had sacked eight villages assigned for the support of Shah Jahan's tomb near Agra.
The extant newsletters do not mention the burning of Akbar's bones by the Jat rebels, for which the only authority hitherto known is Manucci. But Aurangzeb's inexorable wrath towards the Jats and his repeated orders for the general massacre of the Jat people, which these letters mention again and again, lend support to the belief that the current rumour about the burning of Akbar's bones was probably based on truth.
Several letters' to Bishan Singh (Raja of Jaipur) from his Court agent Kesho Rai tell us of the Emperor's (i.e. Aurangzeb's) constant anxiety at the growing menace of the Jat rising and his impatience at the delay of Bishan Singh in taking the field against them. The Raja was repeatedly told that he would be most highly rewarded if he could subdue the Jats and capture Sinsini before the arrival of Prince Bidar Bakht for the same purpose. But he delayed. At last he joined his forces with those of the prince and laid siege to Sinsini. Bidar Bakht having been soon afterwards recalled, Bishan Singh was left in supreme command of the Jat expedition. The Jaipur general Hari Singh conducted the siege of Sinsini and carried on punitive operations. In one encounter with the rebels, Hari Singh was severely wounded, and a rumour even spread that he had been killed. The Jats, probably under pressure of scarcity within the walls, secretly evacuated Sinsini and the Jaipur troops occupied it after a show of assault! This was the version of the affair that reached Aurangzeb, and naturally he refused to give any reward to Bishan Smgh. The Jaipur agent at the imperial Court tried hard to contradict this news as a malicious fabrication of his master's enemies, and at the same time wrote to Bishan Singh to placate the local waqianavis with rich bribes and induce him to magnify the heroic services of the Jaipur troops![1]

मुगल सम्राट् जलालुद्दीन अकबर और जाट

(सन् 1545 से 1605 ई०)

सन् 1545 ई० में शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गई। इसके बाद अफ़गान सरदारों में आपसी झगड़े होने लगे। बंगाल, मालवा तथा पंजाब में विद्रोह खड़े हो गये। पंजाब में सिकन्दरशाह स्वतन्त्र हो गया। ऐसी परिस्थिति में हुमायूं को भारत लौटने का अवसर मिला। उसने बैरमखां की सहायता से सरहिन्द तथा माछीवाड़ा के युद्धों में अफ़गानों को परास्त करके सन् 1555 ई० में पुनः दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया। सन् 1556 ई० में हुमायूं की मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र अकबर सन् 1556 ई० में राजसिंहासन पर बैठा।

अकबर के साथ जाटों की कुछ घटनाओं का संक्षिप्त ब्यौरा निम्न प्रकार से है -

(1) काक या काकराणा जाटों की किला साहनपुर नामक रियासत जिला बिजनौर में थी। इस रियासत के काकराणा जाटों ने सम्राट् अकबर की सेना में भरती होकर युद्धों में बड़ी वीरता दिखाई और अपनी ‘राणा’ की उपाधि का यथार्थ प्रमाण देकर मुगल सेना को चकित कर


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-583


दिया। इसका वर्णन आइने अकबरी में है। (देखो, जाटवीरों का इतिहास, तृतीय अध्याय, काकुस्थ या काकवंश प्रकरण)।

मुगल सम्राटों के समय राजपूतों को बढ़ोती दी जाती थी। इसलिए जाट, गुर्जर, अहीर इत्यादि वीर कुलों के जवानों को मुग़ल सेना में भर्ती होने के लिए अपने को राजपूत लिखवाना पड़ता था। अकबर की सेना में इन सब वीर जातियों के सैनिक थे किन्तु उनको राजपूत लिखा जाता था। (इतिहास सर्वखाप पंचायत (बालायान खाप) पहला भाग, पृ० 110, लेखक चौ० कबूलसिंह मन्त्री सर्वखाप पंचायत)।

(2) जाटवीरों द्वारा महान् सम्राट् अकबर के आदेश को ठुकरा देने का अद्वितीय उदाहरण -

फिरोजपुर जिले के एक दोलाकाँगड़ा नामक गांव में धारीवाल गोत्र का चौधरी मीरमत्ता रहता था। उसकी पुत्री धर्मकौर बड़ी बलवान् एवं सुन्दर थी। एक बार सम्राट् अकबर दौरे पर उस मीरमत्ता के गाँव के समीप से जा रहा था। उसने देखा कि मीरमत्ता की उस सुन्दर पुत्री ने पानी का घड़ा सिर पर रक्खे हुए, अपने भागते हुए शक्तिशाली बछड़े को उसके रस्से पर पैर रख कर उस समय तक रोके रक्खा जब तक कि उसके पिता मीरमत्ता ने आकर उस रस्से को न पकड़ लिया। अकबर यह दृश्य देखकर चकित रह गया और उस लड़की के बल एवं सुन्दरता को देखकर मोहित हो गया। अकबर ने मीरमत्ता को उसकी इस पुत्री का अपने साथ विवाह करने का आदेश दे दिया। मीरमत्ता ने जाट बिरादरी से सलाह लेने का समय माँगा। इस पर विचार करने के लिए 35 जाटवंशीय खापों की पंचायत एकत्रित की गई जिसके अध्यक्ष सिन्धु जाट गोत्र के चंगा चौधरी थे। पंचायत ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास किया कि “अकबर को लड़की नहीं दी जायेगी। यदि वह अपना सैनिक बल लगाकर लड़की को ले जाने का यत्न करेगा तो उसके साथ युद्ध करके अपने धर्म की रक्षा हेतु मर मिटेंगे।” यह प्रस्ताव लेकर चँगा और मीरमत्ता अकबर के दरबार में पहुंचे। सिन्धु जाट चँगा ने निडरता एवं साहस से पंचायत का निर्णय अकबर को सुनाया। अकबर ने चँगा जाट को चौधरी की उपाधि देकर आपसी मेलजोल स्थापित कर लिया। देखो जाटवीरों का इतिहास, तृतीय अध्याय, सिन्धु गोत्र प्रकरण)।

नोट
जाटों ने अपनी किसी भी लड़की का डोला मुगल बादशाहों, मुसलमानों तथा किसी अन्य जाति के पुरुष को नहीं दिया। यह जाटों की गौरवशाली विशेषता है जिससे संसार में इनका मस्तक सदा उँचा रहता आया है। इनके ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरे पड़े हैं। यदि किसी ईर्ष्यालु लेखक ने यह बात लिखी भी है कि जाटों ने अपनी लड़कियों के डोले किसी अन्य धर्मी या अन्य जाति के लोगों को दिये, तो यह बात बेबुनियाद, मनगढंत, प्रमाणशून्य और अमाननीय है। (लेखक)

(3) वीरांगना रानाबाई - सम्राट् अकबर के शासनकाल में वीरांगना रानाबाई थी, जिसका जन्म संवत् 1600 (सन् 1543 ई०) में जोधपुर राज्यान्तर्गत परबतसर परगने में हरनामा (हरनावा) गांव के चौ० जालमसिंह धाना गोत्र के जाट के घर हुआ था। वह हरिभक्त थी। ईश्वर-सेवा और गौ-सेवा ही उसके लिए आनन्ददायक थी। उसने अपनी भीष्म प्रतिज्ञा आजीवन ब्रह्मचारिणी रहने की कर ली थी, इसलिए उसका विवाह नहीं हुआ। हरनामा गांव के उत्तर में 2 कोस की दूरी पर गाछोलाव नामक विशाल तालाब के पास दिल्ली के सम्राट् अकबर का एक मुसलमान हाकिम 500


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-584


घुड़सवारों के साथ रहता था। वह हाकिम बड़ा अन्यायी तथा व्यभिचारी, दुष्ट प्रकृति का था। उसने रानाबाई के यौवन, रंग-रूप की प्रशंसा सुनकर रानाबाई से अपना विवाह करने की ठान ली। उसने चौ० जालमसिंह को अपने पास बुलाकर कहा कि “तुम अपनी बेटी रानाबाई को मुझे दे दो। मैं तुम्हें मुंहमांगा इनाम दूंगा।” चौ० जालमसिंह ने उस हाकिम को फ़टकारकर कहा कि - “मेरी लड़की किसी हिन्दू से ही विवाह नहीं करती तो मुसलमान के साथ विवाह करने का तो सवाल ही नहीं उठता।” हाकिम ने जालमसिंह को कैद कर लिया और स्वयं सेना लेकर रानाबाई को जबरदस्ती से लाने के लिए हरनामा गांव में पहुंचा और जालमसिंह का घर घेर लिया। जब वह रानाबाई को पकड़ने के लिए उसके निकट गया तो वीरांगना रानाबाई अपनी तलवार लेकर उस म्लेच्छ पर सिंहनी की तरह झपटी और एक ही झटके से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। बाल ब्रह्मचारिणी रानाबाई सिंहनी की तरह गर्जना करती हुई मुग़ल सेना में घुस गई और अपनी तलवार से गाजर,मूली की तरह म्लेच्छों के सिर काट दिये। इस अकेली ने 500 मुगलों से युद्ध करके अधिकतर को मौत के घाट उतार दिया। थोड़े से ही भागकर अपने प्राण बचा सके। जाटों ने उनका पीछा किया और चौधरी जालमसिंह को कैद से छुड़ा लिया गया। वीरांगना रानाबाई की इस अद्वितीय वीरता की कीर्ति सारे देश में फैल गई। वीरांगना रानाबाई के स्वर्गवास होने पर उसकी यादगार के लिए उसके भक्तों ने उसका एक स्मारक बना दिया।

(4) महाराणा प्रताप को हल्दीघाटी के युद्ध में जाटों की सहायता -

सन् 1572 ई० में महाराणा प्रताप मेवाड़ के सिंहासन पर बैठा और जीवनभर मुगलों से लड़ता रहा। यह षष्ठ अध्याय में राजस्थान में मौर्य-मौर जाटराज्य प्रकरण में लिख दिया गया है कि बाप्पा रावल गुहिल गोत्र के जाट थे जो चित्तौड़ के शासक बने। राणा प्रताप उसी के वंशज थे। राणा प्रताप एक सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति था जो अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिये अकबर जैसे शक्तिशाली सम्राट् के विरुद्ध वीरतापूर्वक संघर्ष करता रहा।

उसने अन्य राजपूत राजाओं की भांति अपनी बहन-बेटी का डोला अकबर को नहीं दिया एवं उसके आगे अपना सिर नहीं झुकाया। राणा प्रताप में देशभक्ति, प्रचण्ड साहस और दृढ़ संकल्प कूट-कूट कर भरा था। राजा मानसिंह के कहने पर अकबर ने राजा मानसिंह, आसफ़ खां और सलीम (जहांगीर) के नेतृत्व में एक विशाल सेना राणा प्रताप को पराजित करने के लिए मेवाड़ में भेजी। शत्रु का सामना करने के लिये राणा प्रताप ने गोगण्डा नगर के निकट हल्दीघाटी में अपनी सेना का मोर्चा लगाया। उस समय राणा प्रताप की सेना में जो जाटवीर योद्धा शामिल थे, उनका ब्यौरा निम्नलिखित है:-

1). सन् 1375 ई० में एक तंवर वंशी जाट वीरसिंह ने दिल्ली के सुलतान फिरोजशाह तुग़लक की सेवा में रहते हुये भिण्ड (ग्वालियर) पर अपना अधिकार कर लिया। उसी के वंशज विक्रमादित्य तंवर ने अपने पुत्र शालवाहन, भवानी, प्रताप के नेतृत्व में अपनी सेना को महाराणा प्रताप के पक्ष में वीरभूमि हल्दीघाटी के घोर युद्ध में लड़ने के लिए सम्मिलित किया। (जाटों का उत्कर्ष, पृ० 298, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री)।

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2). हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के पक्ष में 20,000 जाट शामिल थे। (सर्वखाप पंचायत रिकार्ड)

18 जून 1576 ई० को दोनों ओर की सेनाओं का घमासान युद्ध हल्दीघाटी की वीरभूमि पर हुआ। मुगल सेना जिसमें मुग़ल एवं राजपूत सैनिक थे, राणा प्रताप की सेना से कई गुणा अधिक थी जिसके पास आधुनिक शस्त्र थे। फिर भी राणा प्रताप की सेना ने शत्रु सेना का बड़ी वीरता एवं साहस से मुकाबिला किया और शत्रु के असंख्य सैनिकों को मौत के घाट उतारा। राणा प्रताप के भी अधिकतर सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए।

राणा प्रताप को विवश होकर युद्धक्षेत्र छोड़ना पड़ा। उसके पीछे दो मुग़ल सेनापति दौड़े। कुछ दूरी पर जाकर प्रताप का घायल चेतक नामक घोड़ा मर गया। राणा प्रताप का भाई शक्तिसिंह जो कि अकबर की सेना के साथ राणा प्रताप के विरुद्ध इस युद्ध में लड़ रहा था, वह भी उन दोनों मुगलों के पीछे दौड़ रहा था। शक्तिसिंह को भाई का प्रेम याद आया तथा उसने दोनों मुगलों का सिर काट दिया और एक घोड़ा प्रताप को दे दिया, इस तरह उसने भाई को बचा लिया। अब दोनों भाइयों ने मिलकर मुग़ल सत्ता के विरुद्ध संघर्ष आरम्भ कर दिये। राणा प्रताप की सन् 1597 ई० में मृत्यु होने तक उसने अपनी मातृभूमि मेवाड़ के अधिकांश भाग पर फिर से अपना अधिकार स्थापित कर लिया था।

(5) सम्राट् अकबर और हरयाणा सर्वखाप पंचायत - संवत् 1631 (सन् 1574 ई०) में सिसौली गांव के राव गंडेराय की अध्यक्षता में सर्वखाप पंचायत की बैठक शोरम जि० मुजफ्फरनगर में हुई जिसमें 90,000 लोग उपस्थित थे। इनमें मुगल शासन के आगमन से देश में राजनीतिक स्थिति बदल जाने पर विचार किया गया। उस सम्मेलन में सर्वसम्मति से ये प्रस्ताव पारित किये गये:-

  1. प्रत्येक खाप अपना संगठन बनाये और अपना कारोबार स्वयं चलाए।
  2. दूसरी जातियां भी अपने खाप के क्षेत्र में अपना संगठन बनायें तथा अपनी जाति के कार्य स्वयं सम्भालें।
  3. सब खापों के सामान्य लाभ की बातों के लिये सर्वखाप पंचायत से विचार विमर्श किया जाए।
  4. प्रत्येक खाप अपनी स्वीकृति के लिए शाही दरबार को पूछे।
  5. खाप के प्रधान या नेता अपनी खाप के गांव से स्वयं राजस्व इकट्ठा करें।
  6. खाप पंचायतें स्वयं कृषि कर लगाएं और वे उपज के अनुसार इस कर को कम या अधिक करने में स्वतन्त्र हैं।
  7. खाप के क्षेत्र में उसी खाप के लोग प्रबन्धकर्त्ता नियुक्त किये जायें।
  8. खाप सभा अपने जातीय कार्य को स्वयं सुलझाने में स्वतन्त्र होनी चाहिए।

इस प्रस्ताव की अधिकतर बातें शाही दरबार ने मान लीं।


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अकबर बादशाह ने यह घोषणा कर दी कि सभी धर्म और संप्रदाय समान समझे जायेंगे और खाप पंचायत स्वतंत्र होगी। (दस्तावेज-48, सर्वखाप पंचायत रिकार्ड)।[2]

External Links

References