Mawanda

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Location of Mavanda in Sikar District

Mawanda (मावण्डा) (Maonda, Mavanda, Maunda) is a medium-size village in Neem Ka Thana tehsil of Sikar district in Rajasthan.

It may be a group of two villages:

Jat Gotras

History

The Battle of Maonda 1767

The famous battle of Maonda took place on 14 December 1767 between the armies of Maharaja Jawahar Singh of Bharatpur and the Raja of Jaipur. [1]

मांवडा-मंढोली युद्ध

भांडारेज राजावतों के अधिकार में: कुम्भाणीयों के बाद भांडारेज राजावतों के अधिकार में आ गया तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के के बाद विलीनीकरण तक यह धूला संस्थान का क़स्बा था मांवडा - मंढोली को विषयवस्तु बनाकर लिखे गए धूला इतिहास 'कूर्म-विजय' में उल्लेख है कि बूंदी अभियान के सिलसिले में दलेलसिंह राजावत की सेवाओं से प्रसन्न होकर सवाई जयसिंह ने उन्हें दो परगने - भांडारेज और खेड़ा बख्शे.[2]

दलेलसिंह राजावत का मांवडा-मंढोली युद्ध में प्राणोत्सर्ग:सवाई ईश्वरी सिंह के शासनकाल में राव दलेलसिंह ने राजमहल की लड़ाई सहित अनेक युद्धों में भाग लिया. तत्पश्चात सवाई माधव सिंह प्रथम के शासनकाल में जयपुर रियासत और भरतपुर महाराजा जवाहरसिंह के बीच 14 दिसंबर 1767 में नीम का थाना के पास मांवडा-मंढोली नामक स्थान पर भीषण युद्ध लड़ा गया, जिसमें जयपुर की सेना का नेतृतव वयोवृद्ध राव दलेलसिंह ने किया। इस युद्ध में दलेल सिंह ने अपने कुंवर लक्षमण सिंह और मात्र 11 पौत्र भंवर राजसिंह सहित लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की. इस प्रकार मांवडा-मंढोली के रणक्षेत्र में धूला (भांडारेज) की एकसाथ पीढ़ियां काम आईं. [3]


रणमल सिंह ने लिखा है कि हमारे गाँव कटराथल के दो राजपूत जयपुर-भरतपुर के बीच हुये युद्ध (मावण्डा) में मारे गए थे। उनकी छतरियाँ आज भी गाँव मैं मौजूद हैं। [4]



Pachewar was a Tajimi thikana of Khangarot Kachhwahas. Shyam Singh Khangarot was a noted Jagirdar of Pachewar during the reign of Sawai Jaisingh. Shyam Singh's great grandson Jeet Singh (Ajeet Singh) died in fighting with Jats in Maonda- Mandoli war in 1767.[5]

मांवडा-मंढोली युद्ध:ठाकुर देशराज के इतिहास में

ठाकुर देशराज[6] लिखते हैं कि भारतेन्दु जवाहरसिंह ने पुष्कर स्नान के उद्देश्य से सेनासहित यात्रा शुरू की। प्रतापसिंह भी महाराज के साथ था। जाट-सैनिकों के हाथ में बसन्ती झण्डे फहरा रहे थे। जयपुर नरेश के इन जाटवीरों की यात्रा का समाचार सुन कान खड़े हो गए। वह घबड़ा-सा गया। हालांकि जवाहरसिंह इस समय किसी ऐसे इरादे में नहीं गए थे, पर यात्रा की शाही ढंग से। जयपुर नरेश या किसी अन्य ने उनके साथ कोई छेड़-छाड़ नही की और वह गाजे-बाजे के साथ निश्चित स्थान पर पहुंच गए।


स्नान-ध्यान करने के पश्चात् भी महाराज कुछ दिन वहां रहे। राजा विजयसिंह से उनकी मित्रता हुई। इधर महाराज के जाते ही राजपूत सामंतो में तूफान-सा मच गया। उधर के शासित जाट और इस शासक जाट राजा को वे एक दृष्टि से देखने


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-656


लगे। इस क्षुद्र विचार के उत्पन्न होते ही सामंतों का संतुलन बिगड़ गया और वे झुण्ड जयपुर नरेश के पास पहुंचकर उन्हें उकसाने लगे। परन्तु जाट सैनिकों से जिन्हें कि उन्होंने जाते देख लिया था, उनकी वीरता और अधिक तादात को देखकर, आमने-सामने का युद्ध करने की इनकी हिम्मत न पड़ती थी।

जवाहरसिंह को अपनी बहादुर कौम के साथ लगाव था, उसकी यात्रा का एकमात्र उद्देश्य पुष्कर-स्नान ही नहीं था, वरन् वहां की जाट-जनता की हालत को देखना भी था। उनको मालूम हुआ कि तौरावाटी (जयपुर का एक प्रान्त) में अधिक संख्या जाट निवास करते हैं तो उधर वापस लौटने का निश्चय किया। राजपूतों ने लौटते समय उन पर आक्रमण करने की पूरी तैयारी कर ली थी। यहां तक कि जो निराश्रित प्रतापसिंह भागकर भरतपुर राज की शरण में गया था और उन्होंने आश्रय ही नहीं, कई वर्ष तक अपने यहां सकुशल और सुरक्षित रखा था, षड्यन्त्र में शामिल हो गया। उसने महाराज की ताकत का सारा भेद दे दिया। राजपूत तंग रास्ते, नाले वगैरह में महाराज जवाहरसिंह के पहुंचने की प्रतीक्षा करते रहे। वे ऐसा अवसर देख रहे थे कि जाट वीर एक-दूसरे से अलग होकर दो-तीन भागों में दिखलाई पड़ें तभी उन पर आक्रमण कर दिया जाए।


तारीख 14 दिसम्बर 1767 को महाराज जवाहरसिंह एक तंग रास्ते और नाले में से निकले। स्वभावतः ही ऐसे स्थान पर एक साथ बहुत कम सैनिक चल सकते हैं। ऐसी हालत में वैसे ही जाट एक लम्बी कतार में जा रहे थे। सामान वगैरह दो-तीन मील आगे निकल चुका था। आमने-सामने के डर से युद्ध न करने वाले राजपूतों ने इसी समय धावा बोल दिया। विश्वास-घातक प्रतापसिंह पहले ही महाराज जवाहरसिंह का साथ छोड़कर चल दिया था। घमासान युद्ध हुआ। जाट वीरों ने प्राणों का मोह छोड़ दिया और युद्ध-भूमि में शत्रुओं पर टूट पड़े। जयपुर नरेश ने भी अपमान से क्रोध में भरकर राजपूत सरदारों को एकत्रित किया। जयपुर के जागीरदार राजपूतों के 10 वर्ष के बालक को छोड़कर सभी इस युद्ध में शामिल हुए थे। सब सरदार छिन्न-भिन्न रास्ते जाते हुए जाट-सैनिकों पर पिल पड़े। जाट सैनिकों ने भी घिर कर युद्ध के इस आह्नान को स्वीकार किया और घमासान युद्ध छेड़ दिया। आक्रमणकारियों की पैदल सेना और तोपखाना बहुत कम रफ्तार से चलते थे। जाट-सैनिकों ने इसका फायदा उठाया और घाटी में घुसे। करीब मध्यान्ह के दोनों सेनाएं अच्छी तरह भिड़ीं। इस समय महाराज जवाहरसिंह जी की ओर से मैडिक और समरू की सेनाओं ने बड़ी वीरता और चतुराई से युद्ध किया। जाट-सैनिकों ने जयपुर के राजा को परास्त किया। परन्तु जाटों की ओर से सेना संगठित और संचालित होकर युद्ध-क्षेत्र में उपस्थित न होने के कारण इस लड़ाई मे महाराज जवाहरसिंह को सफलता नहीं मिली। लेकिन वह स्वयं सदा की भांति असाधारण वीरता और जोश के साथ अंधेरा होने तक युद्ध करते रहे।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-657


जयपुर सेना का प्रधान सेनापति दलेलसिंह, अपनी तीन पीढ़ियों के साथ मारा गया। यद्यपि इस युद्ध में महाराज को विजय न मिली और हानि भी बहुत उठानी पड़ी, परन्तु साथ ही शत्रु का भी कम नुकसान नहीं हुआ। कहते हैं युद्ध में आए हुए करीब करीब समस्त जागीरदार काम आये और उनके पीछे जो 8-10 साल के बालक बच रहे थे, वे वंश चलाने के लिए शेष रहे थे।

Population

As per Census-2011 statistics, Mawanda Kalan village has the total population of 2810 (of which 1460 are males while 1350 are females).[7]

Notable persons

External Links

References

  1. History of the Jats:Dr Kanungo,p.120
  2. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p. 11
  3. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p. 12
  4. रणमल सिंह के जीवन पर प्रकाशित पुस्तक - 'शताब्दी पुरुष - रणबंका रणमल सिंह' द्वितीय संस्करण 2015, ISBN 978-81-89681-74-0, पृष्ठ 111
  5. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p. 70
  6. Jat History Thakur Deshraj/Chapter IX,pp.656-658
  7. http://www.census2011.co.in/data/village/82244-mawanda-kalan-rajasthan.html

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