Pushkar

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Location of Pushkar in Ajmer district

Pushkar (पुष्कर) (also Pushkara) is an ancient religious town in the district Ajmer of Rajasthan in India. Pushkara (पुष्कर) is a place name mentioned by Panini in Ashtadhyayi (4.2.95). [1] Pushkara) (पुष्कर) is name of a pilgrim and a Nagavanshi king mentioned in Mahabharata.

Variants

  • Pushkara पुष्कर, 1. जिला अजमेर, राज., (AS, p.568) 2. Burma बर्मा, का प्राचीन भारतीय नाम (AS, p.570)
  • Pushkaravati पुष्करवती = Rangoon रंगून, बर्मा, का प्राचीन भारतीय नाम, (AS, p.571)

Origin

Pushkara (पुष्कर) means born due to a flower.

Jat Gotras

Mention by Panini

Pushkara (पुष्कर) is a place name mentioned by Panini in Ashtadhyayi under Katrryadi (कत्र्य्रादि) (4.2.95) group. [2]


Pushkara (पुष्कर), padma (पद्म), utpala (उत्पल), bisa (बिस), mrinala (मृणाल), is mentioned by Panini in Ashtadhyayi. [3]


Pushkaravati (पुष्करावती) is name of a River mentioned by Panini in Ashtadhyayi. [4]

In Mythology

Pushkar Lake

According to Hindu Mythology it is said that the gods released a swan with a lotus in its beak and let it fall on earth where Brahma would perform a grand yagna. The place where the lotus fell was called Pushkar. It is situated 14 Km from Ajmer city and is one of the five sacred dhams (pilgrimage sites for devout Hindus.) It is often called "Tirth Raj" - the King of Pilgrimage Sites - and has also in recent years become a popular destination for foreign tourists as well.

Pushkar lies on the shore of Pushkar Lake. It has five principal temples, many smaller temples and 52 ghats where pilgrims descend to the lake to bathe in the sacred waters. One of the primary temples is the 14th century temple dedicated to Brahma, the Hindu god of Creation. A few temples dedicated to Lord Brahma exist in the world. The other temples of Brahma include those at Besakih in Bali, Bithoor in Uttar Pradesh, India, village Asotra near Balotra city of Barmer district in Rajasthan, India and Prambanan in Indonesia. One more temple is located in Kathmandu Nepal.

Pushkar is also famous for its Annual Pushkar Camel Fair.

In Mahabharata

Pushkara (पुष्कर) is mentioned in Mahabharata in following verses:

Pushkara (पुष्कर) (Naga) (I.31.13), (I.35),

Pushkara (पुष्कर) (Tirtha)/(Pond) (III.13.11), (III.81.173), (III.87.13), (XIII.26.9),

Pushkararanyavasin (पुष्करारण्यवासिन) (II.29.7),

Pushkarini (पुष्करिणी) (Lady) (I.89.21), (1.94),


Adi Parva, Mahabharata/Book I Chapter 31 mentions the names of Chief Nagas. Pushkara (पुष्कर) is mentioned in verse (I.31.13).[5].... Aparajita, Jyotika, Shrivaha, Kauravya, Dhritarashtra, Pushkara, Shalyaka,....


Vana Parva, Mahabharata/Book III Chapter 13 mentions Pushkara (पुष्कर) (Tirtha)/(Pond) (III.13.11)....Arjuna said, 'In days of old, thou, O Krishna, hadst wandered on the Gandhamadana mountains for ten thousand years as a Muni having his home where evening fell! Living upon water alone, thou hadst, in days of old, O Krishna, also dwelt for full eleven thousand years by the lake of Pushkara...'


Vana Parva, Mahabharata/Book III Chapter 81 mentions names of Tirthas (Pilgrims). Pushkara (पुष्कर) is mentioned in verse (III.81.173). [6]....The tirtha called Naimisha (नैमिष) (III.81.173) is productive of good on earth. Pushkara (पुष्कर) (3.81.173) is productive of good in the regions of the firmament;....


Vana Parva, Mahabharata/Book III Chapter 87 mentions the Sacred spots in the west. Pushkara (पुष्कर) pond is mentioned in verse (III.87.13) [7]....There also is the celebrated tank of the Grandsire, called Pushkara (पुष्कर) (III.87.13), the favourite abode of the Vaikanasas, and Siddhas and Rishis. Moved by the desire of obtaining its protection, the Creator sang this verse at Pushkara, O chief of the Kurus and foremost of virtuous men! If a person of pure soul purposes a pilgrimage to the Pushkaras in imagination even, he becometh purged from all his sins and rejoiceth in heaven!'"


Sabha Parva, Mahabharata/Book II Chapter 29 mentions the Countries subjugated by Nakula in the West. Pushkararanyavasin (पुष्करारण्यवासिन) is mentioned in verse (II.29.7). [8]


Adi Parva, Mahabharata/Book I Chapter 89 describes History of Puru and Pandavas (Aila dynasty). Pushkarini (पुष्करिणी) (Lady) is mentioned in verse (I.89.21). [9]....Bhumanyu begat upon his wife, Pushkarini six sons named Suhotra, Suhotri, Suhavih, Sujeya, Vitatha and Richika.


Anusasana Parva/Book XIII Chapter 26 mentions the sacred waters on the earth. Pushkara (पुष्कर) is mentioned in Mahabharata (XIII.26.9).[10].....By bathing in Pushkara, and Prabhasa, and Naimisha, and the ocean, and Devika, and Indramarga, and Swarnabindu, one is sure to ascend to heaven being seated on a celestial car, and filled with transports of joy at the adorations of Apsara.

पुष्कर

विजयेन्द्र कुमार माथुर[11] ने लेख किया है .....1. पुष्कर (AS, p.568) = पुष्कर जिला अजमेर, राज., : अजमेर 7 मील दूर प्राचीन तीर्थ पुष्कर स्थित है.

वाल्मिकी रामायण बालकाण्ड में पुष्कर में विश्वामित्र के तप करने का उल्लेख है--'पश्चिमायां विशालायां पुष्करेषु महात्मन: सुखं तपश्चरिष्याम: परं तद्धि तपोवनम्, एवमुक्त्वा महातेजाः पुष्करेषु महामुनिः, तप उग्रं दुराधर्षं तेपे मूलफलाशनः' बाल कांड 61,3-4. उत्तरकाण्ड 53,8 में राजा नृग के पुष्कर में दिये हाये दान का उल्लेख है--'नृदेवो भूमिदेवेभ्य: पुष्करेषु ददौ: नृप:'

महाभारत में पुष्कर को महान तीर्थ माना है--'पितामहसर: पुण्यं पुष्करं नाम नामत:, बैखानसानांसिद्धाना मृषीणामाश्रम: प्रिय:। अप्यत्र संश्रयार्थाय प्रजापतिरथो जगौ, पुष्करेषु कुरुश्रेष्ठ [p.569]: गाथांसुकृतिनांवर। मनसाप्यभिकामस्य पुष्कराणि मनस्विन: विप्रणश्यन्ति पापानि नाकपृष्ठे च मोदते'--वनपर्व 89,16-17-18. वन पर्व 12,12 में पुष्कर को तपस्थली बताया गया है--'दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च, पुष्करेष्ववस: कृष्ण त्वमपो भक्षयन् पुरा'.

उत्सवसंकेत गण का निवास पुष्कर के निकट ही था-- देखें सभा 27,32. विष्णु पुराण 1,22,89 में भी पुष्कर का उल्लेख है--'कार्तिकं पुष्करस्नाने द्वादशाब्देन यत् फलम्' जिससे पुष्कर का तीर्थ रूप में जो वर्तमान महत्व माना जाता है उसका पूर्वाभास मिलता है तथा पुष्कर के द्वादश-वर्षीय कुंभ का जो आज भी प्रचलित है, प्रारंभ भी अति प्राचीन काल (संभवत: गुप्तकाल) में सिद्ध होता है. विष्णु 6,8,29 में पुष्कर को प्रयाग और कुरुक्षेत्र के समान माना है-- 'प्रयागे पुष्करे चैव कुरुक्षेत्रे तथार्णवे, कृतोपवास: प्राप्नोति तदस्य श्रवणान्नर:'. जनश्रुति में कहा जाता है कि पांडवों ने पुष्कर के चतुर्दिक स्थित पहाड़ियों में अपने वनवास काल का कुछ समय व्यतीत किया था. इनमें से नाग पहाड़ पर प्राचीन ऋषियों की तपोभूमि मानी जाती है. अगस्त्य और भर्तृहरि की गुफाएं भी इन्हीं पहाड़ियों में आज भी स्थित हैं. चतुर्थ शती ई. पूर्व की आहत (Punch marked) मुद्राएं तथा बैक्ट्रियन और ग्रीक नरेशों के सिक्के जो प्रथम सदी ईसा पूर्व से लेकर ई.सन् की पहली शतियों तक के हैं, यहां से प्राप्त हुए हैं.

ब्रह्मा का मंदिर: पौराणिक कथाओं के अनुसार प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि रचना के समय इस स्थान पर यज्ञ किया था इसलिए इस स्थान को ब्रह्म पुष्कर भी कहते हैं. (देखें ऊपर उद्धृत महाभारत वन पर्व है 89, 16-17} संभवत: भारतभर में केवल इसी स्थान पर ब्रह्मा का मंदिर है. वर्तमान मंदिर, जो झील के तट पर है, अधिक प्राचीन नहीं जान पड़ता किंतु इस स्थान पर प्राचीन काल में भी ब्रह्मा का मंदिर रहा होगा. ब्रह्मा की पत्नी सावित्री का मंदिर निकटवर्ती पहाड़ी पर है. ब्रह्मा के मंदिर के द्वार पर उनके वाहन हंस की मूर्ति उत्कीर्ण है. वाराणसी, गया तथा मथुरा की भांति पुष्कर भी कुछ समय तक बौद्ध धर्म का केंद्र रहा किंतु इस धर्म की अवनति के साथ कालांतर में हिंदू धर्म की यहां पुन: स्थापना हुई.

जनश्रुति है कि 9 वीं सदी ईस्वी में एक बार राजा नरहरिराव यहाँ शिकार खेलता हुआ पहुंचा. उसने प्यास बुझाने के लिए सरोवर का पानी पिया तो उसका श्वेत कुष्ठ दूर हो गया. उसने झील के जल के चमत्कारी प्रभाव को देखकर यहां पक्के घाट बनवा दिए. पुष्कर में 925 ई. का एक शिलालेख प्राप्त हुआ है जो यहां से प्राप्त अभिलेखों में प्राचीनतम है. मुगल सम्राट जहांगीर की बनवाई दो छतरियां झील के घाटों पर स्थित हैं. पुष्कर ताल पर लगभग 40 पक्के घाट हैं जिनमें से [p.570]: कुछ के नाम हैं गौघाट, वराहघाट, ब्रह्मघाट, ग्वालियर घाट, चंद्र घाट, इंद्र घाट, जोधपुर घाट और छोटा घाट आदि.

सावित्री मंदिर : एक प्राचीन दंतकथा के अनुसार जिस समय ब्रह्मा ने यज्ञ प्रारंभ करना चाहा तो अपनी पत्नी सावित्री की अनुपस्थिति में वे ऐसा न कर सके. तब उन्होंने सावित्री पर रुष्ट होकर गायत्री नामक अन्य स्त्री से विवाह करके यज्ञ संपन्न किया. सावित्री जब लौटकर आई तो वह गायत्री को अपने स्थान पर देख कर बहुत क्रुद्ध हुई और ब्रह्मा को छोड़कर पास की पहाड़ियों में चली गई जहां उसके नाम का एक मंदिर आज भी है.

कण्व का आश्रम: स्थानीय किंवदंती में यह भी प्रचलित है कि कालिदास के अभिज्ञान शकुंतल की नायिका शकुंतला के पिता कण्व का आश्रम पुष्कर के पास स्थित एक पहाड़ी पर था किंतु इस किंवदंती में कुछ भी तथ्य नहीं जानता पड़ता (कणव के आश्रम के लिए देखें मंडावर).

सरस्वती नदी: पौराणिक किवदंती में पुष्कर को सरस्वती नदी का तीर्थ माना गया है कहते हैं कि अति प्राचीन काल में सरस्वती नदी इसी स्थान के निकट बहती थी और पुष्कर पर्वत की उपत्यका में उसका छोड़ा हुआ सरोवर है. यह नदी अब भी कई स्थानों पर बहती हुई दिखलाई पड़ती है और अंततः है कच्छ की खाड़ी में गिर जाती है. कई स्थानों पर राजस्थान की भूमि में यह विलुप्त भी हो जाती है. संभवत: यही वैदिक कालीन सरस्वती थी जो पहले शायद सतलज में गिरती थी और कालांतर में मुड़कर राजस्थान की ओर बहने लगी. सरस्वती को ब्रह्मा की पत्नी माना गया है इसी कारण पुष्कर का ब्रह्मा से संबंध परंपरागत चला रहा है. सरस्वती की एक धारा सुप्रभा आज भी पुष्कर के निकट बहती है. महाभारत में विनशन नामक स्थान पर सरस्वती को विलुप्त होते हुए बताया गया है.

2. पुष्कर (AS, p.570) = ब्रह्मदेश (बर्मा) का प्राचीन भारतीय नाम (AS, p.570) - बर्मा या ब्रह्म-देश का एक प्राचीन भारतीय नगर, संभवतः रंगून, जिसका नाम भारत के प्रसिद्ध तीर्थ पुष्कर के नाम पर रखा गया प्रतीत होता है. ब्रह्मदेश में अति प्राचीन काल से मध्ययुग तक भारतीय औपनिवेशिकों ने अनेक नगरों को बसाया था तथा इस देश के अधिकांश भाग में उनके राजवंशों का राज्य रहा था.[12]

प्राची सरस्वती नदी

विजयेन्द्र कुमार माथुर[13] ने लेख किया है ..... प्राची सरस्वती नदी (AS, p.591) पुष्कर, राजस्थान के निकट बहने वाली नदी है। पुष्कर से बारह मील दूर प्राची सरस्वती और नंदा का संगम है।

विशालिका नदी

विशालिका नदी (AS, p.864): राजस्थान में पुष्कर के निकट बहने वाली नदी है। कहा जाता है कि विशालिका पुष्कर क्षेत्र की मुख्य नदी सरस्वती, जो महाभारत काल में ही लुप्त हो गई थी, का अवशिष्ट अंग है। (दे. पुष्कर) [14]

पुष्कर परिचय

पुष्कर ब्रह्मा के मंदिर और ऊँटों के व्यापार मेले के लिए प्रसिद्ध है। पुष्कर का शाब्दिक अर्थ है तालाब। अजमेर से मात्र 11 किलोमीटर दूर तीर्थराज पुष्कर विश्वविख्यात है और पुराणों में वर्णित तीर्थों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। राजस्थान के शहर अजमेर में कई पर्यटन स्थल है जिनमें से ये एक है। अनेक पौराणिक कथाएं इसका प्रमाण हैं। यहाँ से प्रागैतिहासिक कालीन पाषाण निर्मित अस्त्र-शस्त्र मिले हैं, जो उस युग में यहाँ पर मानव के क्रिया-कलापों की ओर संकेत करते हैं।

ऐतिहासिक उल्लेख: बताया जाता है कि कभी इस स्थान पर मेड़ (मेर) जाति के आदिवासी निवास करते थे। उनके नाम पर इस पूरे प्रदेश का नाम मेरवाड़ा कहा जाता था। ईस्वी शताब्दी के प्रारंभ में यह क्षेत्र तक्षकों के अधिकार में रहा। इन तक्षकों को नाग भी कहा जाता था। इनका बौद्धों से वैमनस्य था। बौद्धों व हूणों के बार-बार आक्रमण के कारण ये पहाडिय़ां बदल-बदल कर आखिर वहाँ पहुंचे, जहां पुष्कर तीर्थ था। उन्होंने यहाँ से मेड़ों को मार भगाया। नाग पर्वत उनकी स्मृति का प्रतीक है। इतिहास की करवट के साथ यह आदिवासी क्षेत्र राजपूतकाल में परमार शासकों के अधीन आ गया। उस समय इस क्षेत्र को पद्मावती कहा जाने लगा। नागपरमार दोनों ही जैन धर्मानुयायी जातियां रहीं। ब्राह्मणों से उनके संघर्ष के अनेक उदाहरण पुराणों में उपलब्ध हैं। जोधपुर के निकट मंडोर के परिहार राजाओं व मेरवाड़ा के गुर्जर राजाओं व जागीरदारों की मदद से ब्राह्मणों ने इन परमारों को सत्ताच्युत कर दिया। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के कुछ शिलालेख मिले हैं, जिनमें वर्णित प्रसंगों के आधार पर कहा जाता है कि हिंदुओं के समान ही बौद्धों के लिए भी पुष्कर पवित्र स्थान रहा है।

भगवान बुद्ध ने यहां ब्राह्मणों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी। फलस्वरूप बौद्धों की एक नई शाखा पौष्करायिणी स्थापित हुई। शंकराचार्य, जिन सूरी और जिन वल्लभ सूरी, हिमगिरि, पुष्पक, ईशिदत्त आदि विद्वानों के नाम पुष्कर से जुड़े हुए हैं। चौहान राजा अरणोराज के काल में विशाल शास्त्रार्थ हुआ था। इसमें अजमेर के जैन विद्वान् जिन सूरी और जिन वल्लभ सूरी ने भाग लिया था। पांच सौ साल पहले निम्बार्काचार्य परशुराम देवाचार्य निकटवर्ती निम्बार्क तीर्थ से रोज यहां स्नानार्थ आते थे। वल्लभाचार्य महाप्रभु ने यहां श्रीमद्भागवत कथा की। गुरुनानक देव ने यहाँ ग्रंथ साहब का पाठ किया और सन् 1662 में गुरु गोविंद सिंह ने भी गऊघाट पर संगत की। ईसा पश्चात् 1809 में मराठा सरदारों ने इसका पुनर्निर्माण करवाया। यही वह स्थान है, जहां गुरु गोविंदसिंह ने संवत 1762 (ईसा पश्चात् 1705) में गुरुग्रंथ साहब का पाठ किया।

सन् 1911 ईस्वी बाद अंग्रेज़ी शासनकाल में महारानी मेरी ने यहां महिलाओं के लिए अलग से घाट बनवाया। इसी स्थान पर महात्मा गांधी की अस्थियां प्रवाहित की गईं, तब से इसे गांधी घाट भी कहा जाता है। मारवाड़ मंडोर के प्रतिहार नरेश नाहड़राव ने पुष्कर के जल से कुष्ठ रोग से मुक्ति पर पुष्कर सरोवर की खुदाई की, घाट व धर्मशाला बनवाई। हर्षनाथ मंदिर (सीकर) में मिले सन् 1037 के एक शिलालेख के अनुसार चौहान राजा सिंहराज ने हर्षनाथ मंदिर बनवाया। राणा मोकल ने वराह मंदिर में अपने को स्वर्ण से तुलवा कर ब्राह्मणों को दान में दिया। जोधपुर, जयपुर, कोटा, भरतपुर आदि रियासतों के राजाओं ने घाट बनवाए।

पुष्कर जैनों को भी पवित्र तीर्थ रहा है। जैनों की पट्टावलियों व वंशावलियों में यह क्षेत्र पद्मावती के नाम से विख्यात था। जिनपति सूरी ने ईसा पश्चात् 1168, 1188 व 1192 में इस स्थान की यात्रा की और अनेक लोगों को दीक्षा दी। वराह मंदिर के पास हुआ घमासान पुष्कर में पौराणिक महत्व का वराह मंदिर एक घमासान युद्ध का गवाह रहा है। यहाँ औरंगजेब और जोधपुर के महाराज अजीत सिंह के बीच हुए युद्ध में दोनों ओर के सात हज़ार सैनिक शहीद हुए थे। अजमेर के सूबेदार तहव्वुर खान को विजय मिली और उत्सव मनाने के लिए उसने एक हज़ार गायें काटने का ऐलान किया। इस पर राजपूतों ने फिर युद्ध कर तहव्वुर को भगा दिया। जीत की खुशी में गाय की प्रतिमा स्थापित की। यही प्रतिमा आज गऊ घाट पर विद्यमान है। गऊ घाट के पास शाही मस्जिद तहव्वुर ने बनवाई थी।


पौराणिक दृष्टि से पुष्कर के निर्माण की गाथाएं रहस्य और रोमांच से परिपूर्ण हैं। इनका उल्लेख पद्मपुराण में मिलता है। पद्मपुराण के सृष्टि खंड में लिखा है कि किसी समय वज्रनाभ नामक एक राक्षस इस स्थान में रह कर ब्रह्माजी के पुत्रों का वध किया करता था। ब्रह्माजी ने क्रोधित हो कर कमल का प्रहार कर इस राक्षस को मार डाला। उस समय कमल की जो तीन पंखुडियाँ ज़मीन पर गिरीं, उन स्थानों पर जल धारा प्रवाहित होने लगी। कालांतर में ये ही तीनों स्थल ज्येष्ठ पुष्कर, मध्यम पुष्कर व कनिष्ठ पुष्कर के नाम से विख्यात हुए। ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्मा, मध्य के विष्णु व कनिष्ठ के देवता शिव हैं। मुख्य पुष्कर ज्येष्ठ पुष्कर है और कनिष्ठ पुष्कर बूढ़ा पुष्कर के नाम से विख्यात हैं, जिसका हाल ही जीर्णोद्धार कराया गया है। इसे बुद्ध पुष्कर भी कहा जाता है। पुष्कर के नामकरण के बारे में कहा जाता है कि ब्रह्माजी के हाथों (कर) से पुष्प गिरने के कारण यह स्थान पुष्कर कहलाया। राक्षस का वध करने के बाद ब्रह्माजी ने इस स्थान को पवित्र करने के उद्देश्य से कार्तिक नक्षत्र के उदय के समय कार्तिक एकादशी से यहाँ यज्ञ किया, जिसमें सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया। उसकी पूर्णाहुति पूर्णिमा के दिन हुई। उसी की स्मृति में यहाँ कार्तिक माह एकादशी से पूर्णिमा तक मेला लगने लगा।

रामायण में उल्लेख: वाल्मिकी रामायण में भी पुष्कर का उल्लेख है। अयोध्या के राजा त्रिशंकु को सदेह स्वर्ग में भेजने के लिए अपना सारा तप दांव लगा देने के लिए विश्वामित्र ने यहाँ तप किया था। यह उल्लेख भी मिलता है कि अप्सरा मेनका भी पुष्कर के पवित्र जल में स्नान करने आयी थी। उसको देख कर ही विश्वामित्र काम के वशीभूत हो गए थे। वे दस साल तक मेनका के संसर्ग में रहे, जिससे शकुन्तला नामक पुत्र का जन्म हुआ। भगवान राम ने अपने पिताश्री दशरथ का श्राद्ध मध्य पुष्कर के निकट गया कुंड में ही किया था।

महाभारत में उल्लेख: महाभारत में महाराजा युधिष्ठिर के यात्रा वृतांत के वर्णन में यह उल्लेख मिलता है कि महाराजा को जंगलों में होते हुए छोटी-छोटी नदियों को पार करते हुए पुष्कर के जल में स्नान करना चाहिए। महाभारत काल की पुष्टि करते कुछ सिक्के भी खुदाई में मिले हैं। कहा जाता है कि पांडवों ने अपने वनवास काल के कुछ दिन पुष्कर में ही बिताए थे। उन्हीं के नाम पर यहाँ पंचकुंड बना हुआ है। सुभद्रा हरण के बाद अर्जुन ने पुष्कर में कुछ समय विश्राम किया था। अगस्त्य, वामदेव, जमदग्नि, भृतहरि ऋषियों की तपस्या स्थली के रूप में उनकी गुफाएं आज भी नाग पहाड़ में हैं। बताया जाता है कि पाराशर ऋषि भी इसी स्थान पर उत्पन्न हुए थे। उन्हीं के वशंज पाराशर ब्राह्मण कहलाते हैं। महाभारत के वन पर्व के अनुसार श्रीकृष्ण ने पुष्कर में दीर्घकाल तक तपस्या की।

लुप्त सरस्वती नदी: ऐसी मान्यता है कि वेदों में वर्णित सरस्वती नदी पुष्कर तीर्थ और इसके आसपास बहती है। पुष्कर के समीपर्ती गनाहेड़ा, बांसेली, चावंडिया, नांदभगवानपुरा की रेतीली भूमि में ही सरस्वती का विस्तार था। पद्म पुराण के अनुसार देवताओं ने बड़वानल को पश्चिमी समुद्र में ले जाने के लिए जगतपिता ब्रह्मा की निष्पाप कुमारी कन्या सरस्वती से अनुरोध किया तो वह सबसे पहले ब्रह्माजी के पास यहीं पुष्कर में आशीर्वाद लेने पहुंची। वह ब्रह्माजी के सृष्टि रचना यज्ञ स्थली की अग्रि को अपने साथ लेकर आगे बढ़ीं। महाभारत के शल्य पर्व (गदा युद्ध पर्व) में एक श्लोक है-पितामहेन मजता आहूता पुष्करेज वा सुप्रभा नाम राजेन्द्र नाम्नातम सरस्वती। अर्थात् पितामह ब्रह्माजी ने सरस्वती को पुष्कर में आहूत किया। बताते हैं कि नांद, पिचौलिया व भगवानपुरा जिस नदी से सरसब्ज रहे, वह नंदा सरस्वती ही मौलिक रूप से सरस्वती नदी है।

पुष्कर झील: पुष्कर झील राजस्थान के अजमेर नगर से ग्यारह किलोमीटर उत्तर में स्थित है। मान्यता के अनुसार इसका निर्माण भगवान ब्रह्मा ने करवाया था, तथा इसमें बावन स्नान घाट हैं। इन घाटों में वराह, ब्रह्म व गऊ घाट महत्त्वपूर्ण हैं। वराह घाट पर भगवान विष्णु ने वराह अवतार (जंगली सूअर) लिया था। पौराणिक सरस्वती नदी कुरुक्षेत्र के समीप लुप्त हो जाने के बाद यहाँ पुनः प्रवाहित होती है। ऐसी मान्यता है कि श्रीराम ने यहाँ पर स्नान किया था। लघु पुष्कर के गव कुंड स्थान पर लोग अपने दिवंगत पुरखों के लिए अनुष्ठान करते हैं। भगवान ब्रह्मा का समर्पित पुष्कर में पाँच मन्दिर हैं— ब्रह्मा मन्दिर, सावित्री मन्दिर, बद्रीनारायण मन्दिर, वराह मन्दिर व शिवआत्मेश्वरी मन्दिर।

देश का इकलौता ब्रह्मा मन्दिर: पुष्कर को तीर्थों का मुख माना जाता है। जिस प्रकार प्रयाग को "तीर्थराज" कहा जाता है, उसी प्रकार से इस तीर्थ को "पुष्करराज" कहा जाता है। पुष्कर की गणना पंचतीर्थों व पंच सरोवरों में की जाती है। पुष्कर सरोवर तीन हैं - 1. ज्येष्ठ (प्रधान) पुष्कर, 2. मध्य (बूढ़ा) पुष्कर, 3. कनिष्क पुष्कर।

ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्माजी, मध्य पुष्कर के देवता भगवान विष्णु और कनिष्क पुष्कर के देवता रुद्र हैं। पुष्कर का मुख्य मन्दिर ब्रह्माजी का मन्दिर है। जो कि पुष्कर सरोवर से थोड़ी ही दूरी पर स्थित है। मन्दिर में चतुर्मुख ब्रह्मा जी की दाहिनी ओर सावित्री एवं बायीं ओर गायत्री का मन्दिर है। पास में ही एक और सनकादि की मूर्तियाँ हैं, तो एक छोटे से मन्दिर में नारद जी की मूर्ति। एक मन्दिर में हाथी पर बैठे कुबेर तथा नारद की मूर्तियाँ हैं।


पूरे भारत में केवल एक यही ब्रह्मा का मन्दिर है। इस मन्दिर का निर्माण ग्वालियर के महाजन गोकुल प्राक् ने अजमेर में करवाया था। ब्रह्मा मन्दिर की लाट लाल रंग की है तथा इसमें ब्रह्मा के वाहन हंस की आकृतियाँ हैं। चतुर्मुखी ब्रह्मा देवी गायत्री तथा सावित्री यहाँ मूर्तिरूप में विद्यमान हैं। हिन्दुओं के लिए पुष्कर एक पवित्र तीर्थ व महान् पवित्र स्थल है।

वर्तमान समय में इसकी देख–रेख की व्यवस्था सरकार ने सम्भाल रखी है। अतः तीर्थस्थल की स्वच्छता बनाए रखने में भी काफ़ी मदद मिली है। यात्रियों की आवास व्यवस्था का विशेष ध्यान रखा जाता है। हर तीर्थयात्री, जो यहाँ आता है, यहाँ की पवित्रता और सौंदर्य की मन में एक याद संजोए जाता है।

पुष्कर मेला: पुष्कर मेले का एक रोचक अंग ऊँटों का क्रय–विक्रय है। निस्संदेह अन्य पशुओं का भी व्यापार किया जाता है, परन्तु ऊँटों का व्यापार ही यहाँ का मुख्य आकर्षण होता है। मीलों दूर से ऊँट व्यापारी अपने पशुओं के साथ में पुष्कर आते हैं। पच्चीस हज़ार से भी अधिक ऊँटों का व्यापार यहाँ पर होता है। यह सम्भवतः ऊँटों का संसार भर में सबसे बड़ा मेला होता है। इस दौरान लोग ऊँटों की सवारी कर ख़रीददारों का अपनी ओर लुभाते हैं। पुष्कर में सरस्वती नदी के स्नान का सर्वाधिक महत्त्व है। यहाँ सरस्वती नाम की एक प्राचीन पवित्र नदी है। यहाँ पर वह पाँच नामों से बहती है। पुष्कर स्नान कार्तिक पूर्णिमा को सर्वाधिक पुण्यप्रद माना जाता है। यहाँ प्रतिवर्ष दो विशाल मेलों का आयोजन किया जाता हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक यहाँ पर एक विशाल मेला लगता है। दूसरा मेला वैशाख शुक्ला एकादशी से पूर्णिमा तक रहता है।

संदर्भ: भारतकोश-पुष्क

चौहान सम्राट

संत श्री कान्हाराम[15] ने लिखा है कि.... [पृष्ठ-76]: ईसा की दसवीं सदी में प्रतिहारों के कमजोर पड़ने पर प्राचीन क्षत्रिय नागवंश की चौहान शाखा शक्तिशाली बनकर उभरी। अहिच्छत्रपुर (नागौर) तथा शाकंभरी (सांभर) चौहनों के मुख्य स्थान थे। चौहनों ने 200 वर्ष तक अरबों, तुर्कों, गौरी, गजनवी को भारत में नहीं घुसने दिया।

चौहनों की ददरेवा (चुरू) शाखा के शासक जीवराज चौहान के पुत्र गोगा ने नवीं सदी के अंत में महमूद गजनवी की फौजों के छक्के छुड़ा दिये थे। गोगा का युद्ध कौशल देखकर महमूद गजनवी के मुंह से सहसा निकल पड़ा कि यह तो जाहरपीर (अचानक गायब और प्रकट होने वाला) है। महमूद गजनवी की फौजें समाप्त हुई और उसको उल्टे पैर लौटना पड़ा। दुर्भाग्यवश गोगा का बलिदान हो गया। गोगाजी के बलिदान दिवस भाद्रपद कृष्ण पक्ष की गोगा नवमी को भारत के घर-घर में लोकदेवता गोगाजी की पूजा की जाती है और गाँव-गाँव में मेले भरते हैं।


[पृष्ठ-77]: चौथी पाँचवीं शताब्दी के आस-पास अनंत गौचर (उत्तर पश्चिम राजस्थान, पंजाब, कश्मीर तक) में प्राचीन नागवंशी क्षत्रिय अनंतनाग का शासन था। इसी नागवंशी के वंशज चौहान कहलाए। अहिछत्रपुर (नागौर) इनकी राजधानी थी। आज जहां नागौर का किला है वहाँ इन्हीं नागों द्वारा सर्वप्रथम चौथी सदी में धूलकोट के रूप में दुर्ग का निर्माण किया गया था। इसका नाम रखा नागदुर्ग। नागदुर्ग ही बाद में अपभ्रंश होकर नागौर कहलाया।

551 ई. के आस-पास वासुदेव नाग यहाँ का शासक था। इस वंश का उदीयमान शासक सातवीं शताब्दी में नरदेव हुआ। यह नागवंशी शासक मूलतः शिव भक्त थे। आठवीं शताब्दी में ये चौहान कहलाए। नरदेव के बाद विग्रहराज द्वितीय ने 997 ई. में मुस्लिम आक्रमणकारी सुबुक्तगीन को को धूल चटाई। बाद में दुर्लभराज तृतीय उसके बाद विग्रहराज तृतीय तथा बाद में पृथ्वीराज प्रथम हुये। इन्हीं शासकों को चौहान जत्थे का नेतृत्व मिला। इस समय ये प्रतिहरों के सहायक थे। 738 ई. में इनहोने प्रतिहरों के साथ मिलकर राजस्थान की लड़ाई लड़ी थी।

नागदुर्ग के पुनः नव-निर्माण का श्री गणेश गोविन्दराज या गोविन्ददेव तृतीय के समय (1053 ई. ) अक्षय तृतीय को किया गया। गोविंद देव तृतीय के समय अरबों–तुर्कों द्वारा दखल देने के कारण चौहनों ने अपनी राजधानी अहिछत्रपुर से हटकर शाकंभरी (सांभर) को बनाया। बाद में और भी अधिक सुरक्षित स्थान अजमेर को अजमेर (अजयपाल) ने 1123 ई. में अपनी राजधानी बनाया। यह नगर नाग पहाड़ की पहाड़ियों के बीच बसाया था। एक काफी ऊंची पहाड़ी पर “अजमेर दुर्ग” का निर्माण करवाया था। अब यह दुर्ग “तारागढ़” के नाम से प्रसिद्ध है।

अजमेर से डिवेर के के बीच के पहाड़ी क्षेत्र में प्राचीन मेर जाति का मूल स्थान रहा है। यह मेरवाड़ा कहलाता था। अब यह अजमेर – मेरवाड़ा कहलाता है। अजयपाल ने अपने नाम अजय शब्द के साथ मेर जाति से मेर लेकर अजय+मेर = अजमेर रखा। अजमेर का नाम अजयमेरु से बना होने की बात मनगढ़ंत है। अजयपाल ने मुसलमानों से नागौर पुनः छीन लिया था। बाद में अपने पुत्र अर्नोराज (1133-1153 ई.) को शासन सौंप कर सन्यासी बन गए। अजयपाल बाबा के नाम से आज भी मूर्ति पुष्कर घाटी में स्थापित है। अरनौराज ने पुष्कर को लूटने वाले मुस्लिम आक्रमणकारियों को हराने के उपलक्ष में आना-सागर झील का निर्माण करवाया।


[पृष्ठ-78]: विग्रहराज चतुर्थ (बिसलदेव) (1153-1164 ई) इस वंश का अत्यंत पराक्रमी शासक हुआ। दिल्ली के लौह स्तम्भ पर लेख है कि उन्होने म्लेच्छों को भगाकर भारत भूमि को पुनः आर्यभूमि बनाया था। बीसलदेव ने बीसलपुर झील और सरस्वती कथंभरण संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया जिसे बाद में मुस्लिम शासकों ने तोड़कर ढाई दिन का झौंपड़ा बना दिया। इनके स्तंभों पर आज भी संस्कृत श्लोक उत्कीर्ण हैं। जगदेव, पृथ्वीराज द्वितीय, सोमेश्वर चौहानों के अगले शासक हुये। सोमेश्वर का पुत्र पृथ्वीराज तृतीय (1176-1192 ई) ही पृथ्वीराज चौहान के नाम से विख्यात हुआ। यह अजमेर के साथ दिल्ली का भी शासक बना।

राजस्थान की जाट जागृति में योगदान

ठाकुर देशराज[16] ने लिखा है ....उत्तर और मध्य भारत की रियासतों में जो भी जागृति दिखाई देती है और जाट कौम पर से जितने भी संकट के बादल हट गए हैं, इसका श्रेय समूहिक रूप से अखिल भारतीय जाट महासभा और व्यक्तिगत रूप से मास्टर भजन लाल अजमेर, ठाकुर देशराज और कुँवर रत्न सिंह भरतपुर को जाता है।

यद्यपि मास्टर भजन लाल का कार्यक्षेत्र अजमेर मेरवाड़ा तक ही सीमित रहा तथापि सन् 1925 में पुष्कर में जाट महासभा का शानदार जलसा कराकर ऐसा कार्य किया था जिसका राजस्थान की तमाम रियासतों पर आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ा और सभी रियासतों में जीवन शिखाएँ जल उठी।

जाट महासभा का पुष्कर में जलसा सन् 1925

सर्वप्रथम सन् 1925 में अखिल भारतीय जाट महासभा ने राजस्थान में दस्तक दी और अजमेर के निकट पुष्कर में अखिल भारतीय जाट महासभा का जलसा हुआ. इसकी अध्यक्षता भरतपुर महाराजा कृष्णसिंह ने की. इस अवसर पर जाट रियासतों के मंत्री, पंडित मदन मोहन मालवीय, पंजाब के सर छोटूरामसेठ छज्जू राम भी पुष्कर आये. इस क्षेत्र के जाटों पर इस जलसे का चमत्कारिक प्रभाव पड़ा और उन्होंने अनुभव किया कि वे दीन हीन नहीं हैं. बल्कि एक बहादुर कौम हैं, जिसने ज़माने को कई बार बदला है. भरतपुर की जाट महासभा को देखकर उनमें नई चेतना व जागृति का संचार हुआ और कुछ कर गुजरने की भावना तेज हो गयी. यह जलसा अजमेर - मेरवाडा के मास्टर भजनलाल बिजारनिया की प्रेरणा से हुआ था. शेखावाटी के हर कौने से जाट इस जलसे में भाग लेने हेतु केसरिया बाना पहनकर पहुंचे, जिनमें चिमनाराम सांगसी, भूदाराम सांगसी, सरदार हरलाल सिंह, चौधरी घासीराम, पृथ्वीसिंह गोठडा, पन्नेसिंह बाटड़, हरीसिंह पलथाना, गोरुसिंह, ईश्वरसिंह, चौधरी गोविन्दराम, पन्ने सिंह देवरोड़, रामसिंह बख्तावरपुरा, चेतराम भामरवासीभूदाराम सांगसी, मोती राम कोटड़ी आदि प्रमुख थे. ये लोग एक दिव्य सन्देश, एक नया जोश, और एक नई प्रेरणा लेकर लौटे. जाट राजा भरतपुर के भाषण से उन्हें भान हुआ कि उनके स्वजातीय बंधू, राजा, महाराजा, सरदार, योद्धा, उच्चपदस्थ अधिकारी और सम्मानीय लोग हैं. पुष्कर से शेखावाटी के किसान दो व्रत लेकर लौटे. प्रथम- समाज सुधार, जिसके तहत कुरीतियों को मिटाना एवं शिक्षा-प्रसार करना. दूसरा व्रत - करो या मरो का था जिसके तहत किसानों की ठिकानों के विरुद्ध मुकदमेबाजी या संघर्ष में मदद करना और उनमें हकों के लिए जागृति करना था.[17]

पुष्कर ले लौटने के बाद बगड़ में जाट पंचायत की स्थापना की गयी. प्रचार के लिए भजनोपदेशकों की टोलियाँ तैयार की गयी. अनपढ़ समाज पर भजनोपदेशकों के गीतों का चमत्कारिक प्रभाव पड़ा. भजनोपदेशक अन्य राज्यों से भी आये थे और स्थानीय स्तर पर भी तैयार हुए. पंडित दत्तुराम, भोलासिंह, चौधरी घासीराम, पृथ्वी सिंह बेधड़क, हुकमीचंद, मनसाराम आदि कलाकारों ने गाँव-गाँव को गीतों से गूंजा दिया. स्थानीय स्तर पर मोहरसिंह, सूरजमल साथी, हनुमानदास, बस्तीराम, देवकरण पालोता, तेज सिंह भादौन्दा, गनपतराम महाशय आदि भजनोपदेशक तैयार हो गए. शेखावाटी के ग्रामीण अंचलों को जगाने का श्रेय इन्ही भजनोपदेशक को जाता है. 1925 में झुंझुनू जिले के हनुमानपुरा और कुहाडवास में जन सहयोग से स्कूल खोली गयी. उत्तर प्रदेश के शिक्षक हेमराज सिंह कुहाडवास में और चंद्रभान सिंह हनुमानपुरा में पढ़ाने लगे. इसी क्रम में आगे चलकर कूदन, पलथाना, कटराथल, मांडासी आदि गाँवों में स्कूल खोली गयी. खंडेलावाटी में चौधरी लादूराम रानीगंज ने आर्थिक भार वहन कर शिक्षा की जोत जगाई. शेखावाटी में जनसहयोग से करीब 30 स्कूल खोली गयी. [18]

पुष्कर सम्मलेन के पश्चात् शेखावाटी में दूसरी पंक्ति के जो नेता उभर कर आये, उनमें प्रमुख नाम निम्न हैं - ताराचंद झारोड़, बूंटीराम किशोरपुरा, भैरूसिंह तोगडा , डूंगरसिंह कुमावास, हरलालसिंह-बेगराज मांडासी, रेखसिंह हनुमानपुरा, छत्तू सिंह टाईं (राजपूत), हरदेव सिंह पातुसरी , रंगलाल गाड़िया, दुर्गादत्त कांइयां झुंझुनू, रामेश्वर रामगढ़िया मंडावा, कुरड़ाराम झारोड़ा, इन्द्राज सिंह, हंसराज घरडाना, चेतराम-ख्याली राम भामरवासी, स्वामी मिस्रानंद बिगोदना, चत्तर सिंह बख्तावरपुरा, देवकरण पालोता, आशा राम भारू का बास, देवासिंह बोचाल्या, चन्द्र सिंह , खमाण सिंह पलथाना, देवी सिंह दिनारपुरा, गोपाल सिंह रशीद्पुरा, हरिराम फरटिया , गणेश राम, कल्लूराम, स्वामी पदमदास कूदन, किसन सिंह बाटड़ानाऊ, बालूराम कंवरपुरा (खंडेला वाटी) पेमाराम पलसाना, हरबक्श गढ़वाल खंडेला वाटी , गणेश राम भारनी आदि... इतिहास में आम जन की भागीदारी का यह अनुपम उदहारण है. [19]

Geography

Pushkar is located at 26.5° N 74.55° E. It has an average elevation of 510 metres (1673 feet).

History

Pushkar is one of the oldest cities of India. The date of its actual founding is not known, but legend associates Lord Brahma with its creation.

The Ramayan mentions Pushkar and says that Vishvamitra performed tapa here. It further says that the Apsara Menaka came to Pushkara to bathe in its sacred waters.

The Mahabharata says that while laying down a programme for Maharaja Yudhishthira’s travel, “Maharaja after entering the Jungles of Sind and crossing the small rivers on the way should bathe in Pushkara". And, per Vaman Purana, Prahlada on his pilgrimage to holy places visited Pushkarayana.

A Pratihara ruler of Mandore, Nahadarava, restored this tirtha in the seventh century. He got the place cleared and the lake restored by making an embankment on the side of the river Luni. He rebuilt old palaces and built twelve dhrnashalas (resting places) and ghats on three sides of the lake.

The sage Parasara is said to have been born here. His descendants, called Parasara Brahamanas, are found in Pushkar and the surrounding area. The famous temple of Jeenmata has been cared for by Parasara Brahmans for the last 1000 years. Pushkarana Brahamanas may also have originated here.


Dasharatha Sharma[20] writes....[p.123]: Hammira was the last and most famous of the Chauhans of Ranthambhor. Hammira had ascended the throne in V.1339. Not very long after this, he started, according to the Hammiramahakavya, on a digvijaya or conquest of all the quarters. He first defeated Ajuna, the ruler of Bhamarasa, and then exacted tribute from the fort of Mandalakrita (मण्डलकृत) or Mandalgarh. Striking southwards from here, he reached Ujjayini and Dhara and defeated the Paramara ruler Bhoja. From here he turned northwards, and reached home passing through Chittor, Abu, Vardhanapura (वर्धनपुर) (Badnore), Changa (चंगा) (fortress of the mers still retains old name), Pushkar, Maharashtra (Marot), Sakambhari, Khandilla (खंडिल्ल) (Khandela), Champa (चम्पा) (Chaksu), and Karkarala (कर्कराला) (Karkaralagiri of the Balvan Inscription == Karauli), at the last of which places he received the homage of the ruler of Tribhuvanagiri (Tahangarh).


[p.124]: after came a Koti-yajna which was very much like the asvamedha of Samudragupta. It was under the direction of his purohita Vishvarupa. This digvijaya, or rather a number of raids from time to time magnified into one systematic digvijaya (Balvan Inscription, EI, XIX, pp.49 ff) by Nayachandra, took place before V. 1345 (c. 1288 A.D.). The Balvan inscription of the year mentions the performance of not only one but two Kotiyagna by Hammira and describes the capture of the elephant force of Arjuna, the ruler of Malwa, a kingdom the condition of which was indeed bad enough to invite interference from all sides.

Mention in Pujaripali Stone Inscription of Gopaladeva

Pujaripali Stone Inscription of Gopaladeva[21] is one of a king named Gopāladeva (गोपालदेव). The object of it apparently is to record the charitable deeds of Gôpâladêva, especially the construction of the temple where it was put up. Pujaripali (पुजारीपली) is village in Sarangarh tahsil in Raigarh district in Chhattisgarh.

(Verse: 38-40) - On the earth the Kirti of the brave Gôpâla shines like the autumnal moon at the famous Kedara (केदार) (L.20), Prayaga (प्रयाग) (L.20), Pushkara (पुष्कर) (L.20), Purushottama (पुरुषोत्तम) (L.20), Bhimeshvara (भीमेश्वर) (L.20), on the Narmada (नर्मदा), at the famous Gopalapura (गोपालपुर) (L.20), (वाराणसी) (L.20), Prabhasa (प्रभास) (L.21), at the junction of the Gangâ and the sea, Varalī (वरली), the famous Vairagyamatha (वैराज्ञमठ) (L.21), the Ashtadvara (अष्टद्वार) (L.21), Shauripura (शौरिपुर) (L.21), [and) the village Peḍara (पेडरा) (L.21).

As for the geographical names mentioned in the present inscription,

  • Prabhâsa is identified by R B Hiralal with Pabhosi near Allahabad, but in the period to which the present inscription belongs, the latter does not seem to have been so famous. Prabhasa is more likely to be the tirtha of that name in Saurashtra.
  • Gôpâlapura, as per R B Hiralal's conjecture, was founded by Gopaladeva himself is plausible, but his identification of it with the village Gopalpur near Tewar cannot be upheld, for Gôpâladëva's sway could not have extended so far in the north. It must have been situated not very far from Pujaripali. I would identify it with the Gôpâlpur which has on the right bank of the Mānd river (मांड नदी), about 10 miles north-west of Pujaripali.
  • Pedarāgrāma (पेडरा ग्राम) is likely to be Pendri, 8 miles north by east of Sarangarh.
  • The other places cannot be identified.

Indian Origin Places in Burma

Dineschandra Sircar[22] writes.... Some important old Indian names found in Burma are Aparanta, Avanti, Varanasi, Champanagara, Dvaravati, Gandhara, Kamboja, Kailasha, Kusumapura, Mithila, Pushkara, Pushkaravati, Rajagriha, etc. and the names Sankashya (Tagaung on the Upper Irawadi), Utkala (from Rangoon to Pegu) and Vaishali (modern Vethali in the Akyub district also fall in the same category.[23] The name of the well-known river Irawadi reminds us of Iravati (modern Ravi River), one of the famous tributaries of the Indus.

Tejaji and Pushkar

Tejājī was married to Pemal in early childhood at Pushkar with the daughter of Rai Mal Jat of Jhanjhar gotra, chieftain of village Paner . After marriage there was a dispute between two families in which māmā of Pemal and father of Tejaji were killed.

Dudi Jats and Pushakar

Dudi Jats had ruled in Rajasthan. The Dudis are considered to be originated from Pushkar in Ajmer and ruled Didwana, Sambhar Lake, Nagaur area for 30 generations before the rule of Muslims and Rajputs.

Pushkar bathe by Maharani Kishori

An incident that is very popular about Jawahar Singh and Maharani Kishori that relates to the Pushkar Snan(Bath).

Maharani Kishori, wife of Maharaja Suraj Mal, who had adopted Jawahar Singh, was adept at political intrigues. She was pained to see that Maharaja Jawahar Singh was not adopting a favourable policy towards the members of the family and the nobles. She knew that only keeping him engaged in warfare could control him. She also knew that the Rajput]]s could never tolerate this abrupt rise of Jat rule and would always resist the latter's efforts to gain power. The solution for both the problems lay in war.

Maharani Kishori expressed her desire to her proud son that she wanted to go for a sacred bath at Pushkar. Jawahar Singh pointed out that Pushkar was situated in the territory of his eternal and deadly foe, Raja Madho Singh, who would not tolerate her arrival at Pushkar with a large retinue, and advised her that if at all she were keen to go for Pushkar bath, she would go with only a few followers and Rupa Ram the Purohit.

The Rani retorted by saying that she was the mother of Maharaja Jawahar Singh, and the Rani of Maharaja Suraj Mal and taking a bath like Marwari women would hurt her pride, and that she would like to take her bath along with the Rajput Ranis there.

She would also like to give away alms surpassing the Rajput Ranis. She said, she did not understand why the Jats should be afraid of the Rajputs any longer. Jawahar Singh knew well that this would lead to warfare and bloodshed.

Jawahar Singh marched to Pushkar with 60,000 Cavalry, 1 lakh Infantry and 200 guns. With fluttering banners and beating drums they entered Jaipur territory and set up a impressive camp in the Sandy plains of Pushkar.

Maharani Kishori was weighed in gold, which was given in charity. The other Ranis who had come on this occasion felt humiliated because they were not in a position to match the charity of Maharani Kishori. The Rajput vanity was hurt.

Jawahar Singh travelled to Pushkar, along with his troupes, in Samvat 1828 on Kartika Sudi Purnima. On reaching the site Jawahar Singh saw the beautifully constructed bathing enclosures which were meant soleful for the Rajput kings. He was asked to bathe in the kachha (mud) bank on the other side of the lake, known as gawar ghat. But Jawahar Singh and his mother Maharani Kishori not only decided to bathe in the pukka ghat but also constructed a new one, now popular as the Bharatpur ghat.

Incensed by this act of defiance, the Raja of Jaipur attacked Jawahar Singh in December 1767 but was humbled at the battle of Maonda. Thus a triumphant Jawahar Singh returned to Bharatpur.

The Pushkar episode & Battle of Mawanda

Ram Sarup Joon[24] writes that ... Maharani Kishori, wife of Maharaja Suraj Mal, who had adopted Jawahar Singh, was adept at political intrigues. She was pained to see that Jawahar Singh was not adopting a favourable policy towards the members of the family and the nobles. She knew that he could be controlled only by keeping him engaged in warfare. She also knew that the Rajputs could never tolerate this abrupt rise of Jat rule and would always resist the latter's efforts to gain power. The solution for both the problems lay in war. Kishori


History of the Jats, End of Page-168


expressed her desire to her proud son that she wanted to go for a sacred bath at Pushkar. Jawahar Singh pointed out that Pushkar was situated in the territory of his eternal and deadly foe, Raja Madho Singh, who would not tolerate her arrival at Pushkar with a large retinue, and advised her that if at all she was keen to go for Pushkar bath, she would go with only a few followers and Rupa Ram the Purohit. The Rani retorted by saying that she was the mother of Jawahar Singh, and the Rani of Suraj Mal and taking a bath like Marwari women would hurt her pride, and that she would like to take her bath along with the Rajput Ranis there. She would also like to give away alms surpassing the Rajput Ranis. She said, she did not understand why the Jats should be afraid of the Rajputs any longer. Jawahar Singh knew well that this would lead to warfare and bloodshed.

Jawahar Singh made the big mistake of leaving Pratap Singh the rebel of Jaipur, for the defence of Bharatpur. He considered Partap Singh to be a reliable man, but in this he was deceived.

Jawahar Singh marched to Pushkar with 60,000 Cavalry, 1 lakh Infantry and 200 guns. With fluttering banners and beating drums they entered Jaipur territory and set up a impressive camp in the sandy plains of Pushkar.

Rani Kishori was weighed in gold which was given in charity. The other Ranis who had come on this occasion felt humiliated because they were not in a position to match the charity of Rani Kishori. The Rajput vanity was hurt. Pratap Singh, who was left as the guardian of Bharatpur in the absence of Jawahar Singh, also came to know of this. He left Bharatpur undefended, and joined the camp of Madho Singh. Pratap Singh instigated Madho Singh against Jawahar Singh. All the Rajput rulers assembled at Pushkar and held a conference in which no Jat rulers were invited. Raja Madho Singh said in this conference that the Jat ruler had injured the vanity of all the Rajputs.


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It was here that a witty Marwari, Raja Vijay Singh pointed out that after all the Jats were also Hindus and if they donated liberally on this auspicious occasion according to their financial position, it must not be taken as humiliation by Rajputs. Madho Singh, however, rejected this advice and appealed for war. The decision of this conference soon reached Jawahar Singh. He was expecting it. Madho Singh laid on ambush in a valley to intercept Jawahar Singh on his return. Jawahar Singh had anticipated this and took the alternative route via Turna Wati, which was a bottle-neck surrounded by hills. The column of troops with cavalry and artillery was marching under the leadership of Captain Samru. The palanquins of the Ranis were escorted by Jawahar Singh in the rear of the column. All of a sudden they were attacked by Rajputs from three sides. It was a fierce battle, in which the Rajputs suffered great losses. In the battle, it was found that only 11 tender aged members were left in the family of Raja Madho Singh. The rest lost their lives. It is said that 25,000 casualties occurred in this battle. Jawahar Singh reached Bharatpur. Both of Jats and Rajputs claimed themselves victorious in this battle, but apparently the loss did not have not much of a repercussion on the strength of Jats, whereas Madho Singh had to suffer such a severe blow that his power never recovered. Later Jawahar Singh was killed by some unknown person while he was out on hunting.

Pushkar Adhiveshan of Jats, November 1925

The Pushkar Adhiveshan in November 1925 organized by All India Jat Mahasabha was presided over by Maharaja Kishan Singh of Bharatpur. Sir Chhotu Ram, Madan Mohan Malviya, Chhajju Ram and many other farmer leaders also attended it. This function was organized with the initiative of Master Bhajan Lal Bijarnia of Ajmer - Merwara. The farmers from all parts of Shekhawati had come to attend it. To name a few of them, Chaudhary Govind Ram, Kunwar Panne Singh Deorod, Ram Singh Bakhtawarpura, Chetram Bhadarwasi, Bhuda Ram Sangasi, and Moti Ram Kotri and Har Lal Singh attended it. The Shekhawati farmers took two oaths in Pushkar namely,

  1. They would work for the development of the society through elimination of social evils and spreading of education.
  2. ‘Do or Die’ in the matters of exploitation of farmers by the Feudal lords (Jagirdars).

and finaly,

  1. A Resolution was passed to work for ending the British rule from India.

Jat Temples

Notable persons

  1. चौधरी नथाराम जी मास्टर पुष्कर - अजमेर मेरवाड़ा के जाट सेवक[26]

Gallery

Nathu Ram Mirdha Statue Installed

Statue of Nathu Ram Mirdhawas installed by Shri Jat Mandir Samiti, Pushkar during its 89th Akhil Bharatiy Jat Mahasabha Sammelan at Jat Vishram sthali Pushkar, Ajmer on 20 October 2009. The function was Chaired by Jyoti Mirdha, Member Lok Sabha from Nagaur constituency and the Chief Guest on the occasion was Harji Ram Burdak, Agricultural and Animal Husbandry Minister, Rajasthan.[27]

References

  1. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.508
  2. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.508
  3. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.215
  4. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.42
  5. अपराजितॊ ज्यॊतिकश च पन्नगः श्रीवहस तथा, कौरव्यॊ धृतराष्ट्रश च पुष्करः शल्यकस तथा (I.31.13)
  6. पृथिव्यां नैमिषं पुण्यम अन्तरिक्षे च पुष्करम, तरयाणाम अपि लॊकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते (III.81.173)
  7. खयातं च सैन्धवारण्यं पुण्यं दविजनिषेवितम, पिता मह सरः पुण्यं पुष्करं नाम भारत, वैखानसानां सिद्धानाम ऋषीणाम आश्रमः परियः (III.87.13)
  8. तथा मध्यमिकायांश च वाटधानान द्विजान अद, पुनश च परिवृत्याद पुष्करारण्यवासिनः (II.29.7)
  9. सुहॊत्रश च सुहॊता च सुहविः सुयजुस तथा, पुष्करिण्याम ऋचीकस्य भुमन्यॊर अभवन सुताः (I.89.21)
  10. पुष्करं च प्रभासं च नैमिषं सागरॊदकम, देविकाम इन्द्र मार्गं च स्वर्णबिन्दुं विगाह्य च, विबॊध्यते विमानस्थः सॊ ऽपसरॊभिर अभिष्टुतः (XIII.26.9)
  11. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.568
  12. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.570
  13. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.591
  14. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.864
  15. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.76-78
  16. ठाकुर देशराज:Jat Jan Sewak, p.1
  17. डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: राजस्थान स्वर्ण जयंती प्रकाशन समिति जयपुर के लिए राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी जयपुर द्वारा प्रकाशित 'राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम के अमर पुरोधा - सरदार हरलाल सिंह' , 2001 , पृ. 20-21
  18. राजेन्द्र कसवा: मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), जयपुर, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, P. 100
  19. राजेन्द्र कसवा: मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), जयपुर, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, P. 100
  20. Dasharatha Sharma, Early Chauhan Dynasties", Ch. XI, pp. 123-124.
  21. Corpus Inscriptionium Indicarium Vol IV Part 2 Inscriptions of the Kalachuri-Chedi Era, Vasudev Vishnu Mirashi, 1905. pp. 588-594
  22. Studies in the Geography of Ancient and Medieval India, By Dineschandra Sircar, p.319
  23. R.C. Majumdar, Hindu Colonies in the Far East,1944,p.216
  24. History of the Jats/Chapter X,p. 168-170
  25. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.102
  26. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.96
  27. Jat Samaj, November 2009, p. 31

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