Virasena

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For Nagavanshi King see Virasena Naga

Virasena (वीरसेन) (Kot) was a minister for peace and war under Chandragupta I (320 - 335 AD). Virasena (वीरसेन) was a King mentioned in Mahabharata (XIII.115.69).

Variants of name

Jat clans

History

Tej Ram Sharma[1] writes that....3. Virasena (वीरसेन) (Inscription No. 6, L.4) : Hailing from Pataliputra he was Chandragupta I's (320 - 335 AD) minister for peace and war by hereditary right[2] and accompanied the king on his far-reaching military expeditions. The first part is Vira which means 'brave' and the second is 'sena' the whole literally meaning 'one with a brave array'. Panini refers ta Senānta names in his Astadhyayi.[3] We find many such names as Varisena, Ratisena, Bhimasena and Ugrasena.[4] U.N. Roy conjectures the possibility of the composition of the 'Prasasti' inscribed on the Meharauli Iron Pillar Inscription by Śāba alias Virasena who was an accomplished poet and a favourite minister of Chandragupta II (380- 414 AD), Vikramaditya. [5] It is possible that he outlived his patron and when during a Dharmayatra he revisited the spot where the lofty banner had been raised as a mark of homage to Lord Visnu after the victory over the Vahlikas, was moved to compose and inscribe this Prasasti on the Meharauli Pillar.[6]

Udayagiri Cave Inscription of Chandragupta II (=A.D. 375-414) mentions Virasena, the child of Kotsa, the minister for peace and war under Chandragupta II, who knew the meanings of the words, and logic, and (the ways of) mankind, who was a poet and who belonged to (the city of) Pataliputra.[7]

L. 4 of Udayagiri Cave Inscription of Chandragupta II (380- 414 AD)

He who, belonging to the Kautsa (gôtra) is well-known under the name of Shâba, (but is called) Vîrasêna by (his) family-appellation;-who knows the meanings of words, and logic, and (the ways of) mankind;-who is a poet;-and who belongs to (the city of ) Pâtaliputra,-

चन्द्रगुप्त द्वितीय का यौधेयों से युद्ध

दलीप सिंह अहलावत[8] ने लिखा है....इन्द्रप्रस्थ के पास गुप्त सेना ने यौधेयों को सब से करारी हार दी। उनकी सबसे बड़ी क्षति हुई, उनका महासेनापति मारा गया। विक्रम का आदेश था कि किसी भी तरह जय महासेनापति को पकड़ लाओ। ‘जय’ युद्ध में बुरी तरह घायल होकर रणभूमि में गिर गया। यौधेयों ने फिर-फिर हमला करके घायल सेनापति को रणभूमि से ले जाना चाहा, मगर गुप्त सेना ने ऐसा न करने दिया। ‘जय’ के पास आकर जब वीरसेन ने प्रणाम किया तो वह केवल इतना ही कह सका कि “यौधेय-भूमि से मेरे शव को ही ले जा सकते हो।” वीरसेन ने अपने बड़े-बड़े चिकित्सकों को बुलाया। परन्तु ‘जय’ थोड़ी देर बाद चल बसा। यौधेय पुरुष तथा स्त्रियां भी लड़े। विस्तृत यौधेय भूमि युद्ध क्षेत्र बन गई थी।

विक्रमदित्य ने अग्रोदका (अग्रोहा), रोहितक (रोहतक), पृथूदका (पेहवा) आदि नगरों पर अधिकार कर लिया। अनेक पुरुषों को तलवार के घाट उतार दिया। दस वर्ष में तो गुप्त सेना केवल नगरों और उनके आस-पास की थोड़ी सी ही भूमि पर अधिकार कर सकी। विक्रमादित्य को सारी यौधेय-भूमि पर जगह-जगह सैनिक छावनियां बनानी पड़ीं। लाखों यौधेय-कुणिन्द-आर्जुनायन नर नारियों ने अपनी स्वतन्त्रता के लिए अपने जीवन का बलिदान किया। यौधेयों की सुन्दर भूमि श्मशान हो गई। बड़े-बड़े अनेक नगर उजाड़ दिए गये। विक्रमादित्य ने यौधेयों पर विजय प्राप्त करते ही अवन्ति (उज्जैन मालवा) पर आक्रमण कर दिये। विक्रमादित्य ने यौधेयों पर विजय प्राप्त करते ही अवन्ति (उज्जैन मालवा) पर आक्रमण कर दिया। कुछ ही दिनों में अवंति, लाट (गुजरात) सौराष्ट्र को जीत लिया। क्षत्रप वंश (शक जाट वंश) सदा के लिए लुप्त हो गया। विजयोत्साह में विक्रमादित्य ने अपने कितने ही चांदी के सिक्के चलाये। उन पर उसने लिखवाया - “श्रीगुप्त कुलस्य महाराजाधिराज श्रीचन्द्रगुप्त विक्रमादित्यस्य[9]।”

In Mahabharata

Mahabharata Anusasana Parva/Book XIII Chapter 115 mentions .... List of Kings who had abstained from flesh in Karttika month...includes Virasena in verse 69

सिलेन पृथुना चैव वीरसेनेन चैव ह
इक्ष्वाकुणा शम्भुनाशवेतेन सगरेण च (Mbt. XIII.115.69)

External links

References

  1. Tej Ram Sharma: Personal and geographical names in the Gupta inscriptions/Names of Feudatory Kings and High Officers,p. p.48,S.No.3
  2. अन्वय-प्राप्त-साचिव्य....।
  3. IV.1.152; Also see VIII. 3.99.
  4. V.S. Agrawala, India as Known to Panini. p. 186.
  5. U.N. Roy, Studies in Ancient Indian History and Culture, p. 27.
  6. Ibid., pp.25-26.
  7. कौत्सश्शाब इति ख्यातो वीरसेन: कुलाख्यया । शब्दार्थ-न्याय-लोकज्ञ कवि पाटलिपुत्रक ॥
  8. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter V,p.503
  9. जय यौधेय. पृ० 210-212, लेखक राहुल सांकृत्यायन

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