Jhinjhar

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Jhinjhar (झिंझर) Jhinjar (झिन्जर) Jhinger (झिंगेर) Jhanjar (झंजार) Jhanjhar (झांझर)[1] [2] Jhajhar (झाझर)[3][4] Gotra Jats found in Maharashtra, Punjab, Rajasthan, Haryana and UP. [5] Janji/Jinjhar clan is found in Afghanistan. [6]

Origin

They have originated from place called Jhansal. [7] It is an ancient village in Bhadra tehsil of Hanumangarh district in Rajasthan. Jhanjharpur is a village in Madhubani district in Bihar.

Villages founded by Jhanjhar clan

History

Jhinjar is a Rare Jat Hindu and Sikh Sub Caste of Punjab, Rajasthan and U.P. Most of Jhinjars lived In Sangrur & Patiala Distt. They are not found in other casts,most of jhinjars arr "Hindu". They always says, main "maan jattan da douta" The meaning of Jhinjar is "A shallow lake or morass"

Jhanjhars have been associated with jat folk-deity Tejaji. Paner (पनेर) village in Ajmer district in Rajasthan, was his sasural. Tejaji was married to Pemal, daughter of Raimal of Jhanjhar (झांझर) gotra. Raimal was the chieftain of this village and popularly known as Mehtaji or Muthaji. The historical Paner village is now abandoned and the present Paner village is situated 1 km south of it.

There is a temple of Tejaji at Paner in which three statues are placed. People believe that a statue of Tejaji came out from the ground on its own at site of Raimal's house. The magical powers of Tejaji had spread all around. Maharaja Abhay Singh of Jodhpur wanted to shift this statue to to his state Jodhpur. He got it dug out the statue for many days but could not take out this. It is believed that Maharaja Jodhpur at last saw Tejaji in dream who guided him that statue can not be taken out from here but it can be installed at boarder of Nagaur district. Later Jodhpur Maharaja got constructed a temple of Tejaji at Parbatsar and installed a statue of Tejaji here. The temple of Paner bears inscription of samvat 1885 and name of Pithaji. The pooja of this temple is done by a kumhar and not by brahman. This temple is situated near famous Sambhar lake. There is a big pond here built by Jhanjhar gotra Jats known as Jinjardab or Jhanjhardab.

It is believed that when Tejaji died in fighting with enemies, Pemal decided to commit sati and cursed the village Paner that

"Paner could not protect my suhag, Paner would be abandoned and Jhanjhar clan would not survive in Paner. Dholi could not beat the drum, Mali did not offer flower to Tejaji and Gurjars did not cooperate with Tejaji, all these clans would not survive in Paner."

All the four clans Jhanjhar, Mali, Dholi and Gurjars are not found in the village even today. It is said that they tried to settle many times but could not prosper here. Jhanjhar gotra Jats presently live in Bhilwara and visit this place occasionally.

तेजाजी का इतिहास

संत श्री कान्हाराम[9] ने लिखा है कि.... [पृष्ठ-84]: तेजाजी के जन्म के समय (1074 ई.) यहाँ मरुधरा में छोटे-छोटे गणराज्य आबाद थे। तेजाजी के पिता ताहड़ देव (थिरराज) खरनाल गणराज्य के गणपति थे। इसमें 24 गांवों का समूह था। तेजाजी का ससुराल पनेर भी एक गणराज्य था जिस पर झाँझर गोत्र के जाट राव रायमल मुहता का शासन था। मेहता या मुहता उनकी पदवी थी। उस समय पनेर काफी बड़ा नगर था, जो शहर पनेर नाम से विख्यात था। छोटे छोटे गणराज्यों के संघ ही प्रतिहारचौहान के दल थे जो उस समय के पराक्रमी राजा के नेतृत्व में ये दल बने थे।


[पृष्ठ-85]: पनैर, जाजोतारूपनगर गांवों के बीच की भूमि में दबे शहर पनेर के अवशेष आज भी खुदाई में मिलते हैं। आस पास ही कहीं महाभारत कालीन बहबलपुर भी था। पनेर से डेढ़ किमी दूर दक्षिण पूर्व दिशा में रंगबाड़ी में लाछा गुजरी अपने पति परिवार के साथ रहती थी। लाछा के पास बड़ी संख्या में गौ धन था। समाज में लाछा की बड़ी मान्यता थी। लाछा का पति नंदू गुजर एक सीधा साधा इंसान था।

शहर पनेर

संत श्री कान्हाराम[10] ने लिखा है कि.... [पृष्ठ-235]: शहर पनेर तेजाजी का ससुराल है। यह गाँव वर्तमान में राजस्थान के अजमेर जिले की किशनगढ़ तहसील में स्थित है। यह किशनगढ़ से 30-32 किमी उत्तर दिशा में है। तेजाजी के वीरगति स्थल सुरसुरा से 15-16 किमी उत्तर-पश्चिम दिशा में है। जिला मुख्यालय अजमेर से उत्तर पूर्व दिशा में 60 किमी दूर है। नागौर जिले के परबतसर से सिर्फ 4 किमी दक्षिण पूर्व में है।

आज राजस्व रिकॉर्ड में सिर्फ पनेर है परंतु तेजाजी के इतिहास में यह शहर पनेर नाम से सुप्रसिद्ध था। यह गाँव तेजाजी के जन्म से बहुत पहले ही बसा हुआ था। प्राचीन समय में वर्तमान पनेर से पश्चिम दिशा में बसा हुआ था। तेजाजी के समय में यह वर्तमान पनेर से 1 किमी उत्तर में पहाड़ियों की तलहटी में बसा हुआ था। यहाँ के राख़-ठीकरे आदि इसके प्रमाण हैं।


[पृष्ठ-236]: शहर पनेर गणतन्त्र के शासक रायमल जी मुहता, झाँझर गोत्र के जाट थे, जिनके पिता का नाम राव महेशजी था। रायमल जी मुहता तेजाजी के श्वसुर थे। तेजाजी की सास का नाम बोदल दे था, जो काला गोत्र के जाट की पुत्री थी। तेजाजी की पत्नी का नाम पेमल था। पेमल बड़ी सती सतवंती थी। बचपन में शादी हो जाने के बावजूद 29 वर्ष तक तेजाजी का इंतजार करती रही। पेमल के भाई और भाभी के नाम मालूम नहीं हैं।

शहर पनेर से करीब 2 किमी पूर्व की ओर रंगबाड़ी के बास में पेमल की सहेली प्रसिद्ध लाछा गुजरी रहती थी।


[पृष्ठ-237]:लाछा के पति का नाम नंदू गुर्जर था। लाछा चौहान गोत्र की गुर्जर थी। लाछा के पति नंदू तंवर गोत्र के गुर्जर थे। लाछा के पास बहुतसी गायें थी।

तेजाजी के ससुराल पक्ष वाले झाँझर गोत्र के जाट अब इस गाँव में नहीं रहते हैं। सती पेमल के श्राप के कारण झाँझर कुनबा इस गाँव से उजड़ गया। अब रायमल जी मुहता के वंशज झांजर गोत्र के जाट भीलवाडा के आस-पास कहीं रहते हैं। झाँझर के भाट से भी मुलाकात नहीं हो सकी। झाँझर यहाँ से चले गए परंतु उनके द्वारा खुदाया गया तालाब उन्हीं की गोत्र पर झांझोलाव नाम से प्रसिद्ध है। यह तालाब आज भी मौजूद है। झांझरों के किसी पूर्वज शासक का नाम झांझो राव जी था। उन्हीं के नाम पर इस तालाब का नाम झांझोलाव प्रसिद्ध हुआ। लाव शब्द का राव अपभ्रंश है।

वर्तमान गाँव के पश्चिम में रायमलजी की पुत्री पेमल का बाग व बावड़ी बताया जाता है। यह अब काल के गाल में समा गया है। तेजाजी का मंदिर पुराने गाँव के स्थान पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि तेजाजी की ये मूर्तियाँ उनके श्वसुर के परिण्डे में स्थापित थी। तेजाजी के इस मंदिर के पुजारी पहले रामकरण और रामदेव कुम्हार थे, परंतु अब मेहराम जाजड़ा गोत्र के जाट इसके पुजारी हैं।


[पृष्ठ-238]: उस जमाने में तेजाजी के श्वसुर रायमल जी मुहता यहाँ के गणपति थे। शहर पनेर उनके गणराज्य की राजधानी थी। यहाँ के निकटवृति गाँव थल, सीणगारा, रघुनाथपुरा, बाल्यास का टीबा रूपनगढ, जूणदा गांवों के शिलालेख के आधार पर स्पषट है कि यहाँ की केंद्रीय सत्ता चौहान शासक गोविन्दराज या गोविंद देव तृतीय के हाथों में थी। उस समय चौहनों की राजधानी अहिछत्रपुर (नागौर) से शाकंभरी (सांभर) स्थानांतरित हो गई थी। ग्राम थल के उत्तर-पश्चिम में स्थित शिलालेख पर विक्रम संवत 1086 (1029 ई.) व गोविन्दराज स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। पनेर के दक्षिण पूर्व में स्थित रूपनगढ कस्बा उस समय बाबेरा नाम से प्रसिद्ध था। बाद में यह पनेर गाँव लंगाओं के अधिकार में आ गया था।

वर्तमान पनेर शहर के पश्चिम में गुसाईंजी का बागड़ा है एवं गांवाई नाड़ी पर एक प्राचीन छतरी विद्यमान है। जिसके पत्थरों पर लिखे अक्षरों सहित पत्थर घिस गए हैं। यह वही छतरी है जिसके विषय में तेजाजी के लोकगीत में आता है कि बड़कों की छतरी में बांधी पगड़ी अर्थात जब तेजाजी ने नदी पार किया तो उनका श्रंगार पगड़ी आदि अस्त-व्यस्त हो गए थे। तेजाजी ने पुनः अपना बनाव किया था तथा इसी छत्री में अपना पैचा (पगड़ी) संवारा था।

पनेर की दक्षिण पश्चिमी पहाड़ियाँ व उत्तर पश्चिम की पहाड़ियाँ की पश्चिमी ढलान से तथा परबतसर के पश्चिम में स्थित मांडणमालास गाँव के पहाड़ों से निकलकर नदी खेतों में फैलकर बहती है जो परबतसर के खारिया तालाब के व बंधा के पास दक्षिण से होकर चादर से निकल कर पनेर के दक्षिण से होकर पूर्व की ओर निकल जाती है। ये वही नदी घाटियां हैं जिसने तेजाजी का रास्ता रोका था। लीलण ने तिरछी दिशा में आड़ की तरह तैरते हुये नदी पार किया था तथा तेजा ने जलकुंड मांछला की तरह। यह नदी आज भी अपनी पूर्व स्थिति में मौजूद है।

इस गाँव के इतिहास पुरुष भैरूजी देवन्दा एक प्रसिद्ध नाम है जिसे बादके शासकों द्वारा ताम्रपत्र प्रदान कर गायों को चराने के लिए गौचर भूमि प्रदान की थी।


[पृष्ठ-239]:उस जमाने में भैरू जी देवन्दा ऐसी शख्सियत थी कि परबतसर के मेलों में जाने वाले यात्रियों को भोजन पानी की व्यवस्था तथा बैल-बछड़ों के लिए चारे की व्यवस्था स्वयं के खर्च से करते थे। भैरूजी देवन्दा के पिताजी पिथा जी ने तेजाजी के मंदिर में देवली स्थापित की थी। इसी गाँव के छीतरमल ढेल संस्कृत शिक्षा के विशेषज्ञ हैं तथा इनका शिक्षा जगत में बड़ा नाम है।

वर्तमान पनेर गाँव में लगभग 650 घर आबाद हैं जिनमे जाट, देशवाली (पडियार, सोलंकी) कायमखनी (चौहान) लंगा, साईं , फकीर, लुहार, राजपूत, रेगर, बलाई, बावरी, कुम्हार, ब्राह्मण, वैष्णव, गाड़ोलिया लुहार, बनिया, नाई, खाती, दर्जी, हरिजन, आदि जातियाँ निवास करती हैं।

सती पेमल के शाप के कारण ढोली, माली, गुर्जर व झाँझर गोत्र के जाट इस गाँव में नहीं फलते-फूलते हैं।

तत्समय पनेर के निवासियों ने तेजाजी का साथ नहीं दिया था परंतु आज के सभी पनेर निवासी तेजाजी में बड़ी आस्था रखते हैं।

Distribution in Haryana

Villages in Rohtak district

Mokhara,

Distribution in Punjab

65 villages in Punjab,Biggest pind Jhinjars Are "Khanal(vadi te Choti),They are belong to Rajasthan,comes from 'Baggar " 65 km away from Sirsa .All jhinjars Are jatts.most of jhinjars are "Hindu".

Villages in Sangrur district

Khanal Kalan,Khanal Khurd Harkishanpura,Nainewala,

Villages in Rupnagar district

Kansalaa, Jhingrah,

Villages in Fatehgarh Sahib district

Kharaura, Kharauri,

Villages in Hoshiarpur district

Jhingar Kalan,Jhingar Khurd,

Distribution in Rajasthan

Villages in Bharatpur district

Nadbai,

Villages in Bhilwara district

Bhilwara,

Villages in Hanumangarh district

Nagrana,

Villages in Udaipur district

Jhanjhar Ki Pal, Jhanjhar(t.Kotra),

Distribution in Madhya Pradesh

Villages in Nimach district

Fatehnagar (12) Pipalyavyas (2),

Villages in Ratlam district

Villages in Ratlam district with population of Jhajhad (झाझड़) gotra are:

Dantodiya 1,

Villages in Ratlam district with population of Jhajhada (झाझड़ा) gotra are:

Dantodiya 1, Ratlam 8, Barbodana 3, Dheekwa 2, Kalmoda 37, Mundari 4, Namli 2, Panched 11, Surana 1,


Notable Persons

See also

References

  1. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. झ-25
  2. Dr Pema Ram:‎Rajasthan Ke Jaton Ka Itihas, p.301
  3. Dr Pema Ram:‎Rajasthan Ke Jaton Ka Itihas, p.301
  4. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I,s.n. 25.
  5. Ashok Dingar & A.B. Sumrao, “Maharashtra mein Jaton ki Biradari” – Jat Veer Smarika 1987-88, Jat Samaj Kalyan Parishad Gwalior. pp. 65,66,67
  6. An Inquiry Into the Ethnography of Afghanistan, H. W. Bellew, p.114
  7. Mahendra Singh Arya et al: Adhunik Jat Itihas, p.248
  8. Mahendra Singh Arya et al: Adhunik Jat Itihas, p.248
  9. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.84-85
  10. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.235-239

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