Kampila

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Author:Laxman Burdak, IFS (Retd.)

Kampila (कम्पिल) is a place name mentioned by Panini under Sankashadi (संकाशादि) (4.2.80.10) group. [1] During Mahabharata period the Southern Panchal was ruled by King ‘Drupada’ and Kampila was capital of Southern Panchala Kingdom. Kampilya (कांपिल्य) was the capital of King Drupada.[2]

Variants of name

Mention by Panini

Kampilya (कांपिल्य) is mentioned by Panini in Ashtadhyayi. [3]

History

Koil (कोईल) or Kol (कोल) was ancient name of Aligarh. In the ancient times the people of Kampilya were later known as Koil. The Koīl people came from Kampilya and founded the city known as Kampilgarh, situated south east of Ganges. The town of Kampilgarh later became popular as Koil which is now Aligarh.[4]

According to James Todd[5] There is yet an unexplored region in Panchala ; Kampilanagara its capital, and those cities established west of the Indus by the sons of Bajaswa.


James Todd[6] writes Hastin sent forth three grand branches, Ajamidha, Dvimidha, and Purumidha. Of the two last we lose sight altogether ; but Ajamidha's progeny spread over all the northern parts of India, in the Panjab and across the Indus. The period, probably one thousand six hundred years before Christ.


[p.50]: From Ajamidha1 in the fourth generation, was Bajaswa, who obtained possessions towards the Indus, and whose five sons gave their name, Panchala, to the Panjab, or space watered by the five rivers. The capital founded by the younger brother, Kampila, was named Kampilnagara.

The descendants of Ajamidha by his second "wife, Kesini, founded another kingdom and dynasty, celebrated in the heroic history of Northern India. This is the Kausika dynasty.


Ahichchhatra is one of the ancient cities of India. This city was the capital of ‘Panchal Janapada’. This Panchal Janapada is one of the 52 Janapadas established by Bhagwan Adinath. During next period there was partition of Panchal Janapada into Northern Panchal and Southern Panchal. The ‘Kampila’ remained capital of Southern Panchal and Ahichchhatra remained capital of Northern Panchal. During ‘Mahabharata’ period the Northern Panchal was ruled by King ‘Drona’ and Southern Panchal was ruled by King ‘Drupada’.

कांपिल्य

विजयेन्द्र कुमार माथुर[7] ने लेख किया है ...काम्पिल्य (AS, p.158) की गणना भारत के प्राचीनतम नगरों में है. काम्पिल्य के नाम का सर्वप्रथम [p.159]: उल्लेख यजुर्वेद की तैत्तरीय संहिता 7,4,19,1 में 'काम्पील' रूप में मिलता है। बहुत संभव है कि पुराणों में वर्णित पंचाल नरेश भृम्यश्व के पुत्र कपिल या कांपिल्य के नाम पर ही इस नगरी का नामकरण हुआ हो। महाभारत काल से पहले पंचाल जनपद गंगा के दोनों ओर विस्तृत था। उत्तर पंचाल की राजधानी अहिच्छत्र (जिला बरेली, उत्तर प्रदेश)) और दक्षिण पंचाल की कांपिल्य थी। दक्षिण पंचाल के सर्वप्रथम राजा अजमीढ़ का पुराणों में उल्लेख है। इसी वंश में प्रसिद्ध राजा नीप और ब्रह्मदत्त हुए थे।

महाभारत के समय द्रोणाचार्य ने पंचाल नरेश द्रुपद को पराजित कर उससे उत्तर पंचाल का प्रदेश छीन लिया था। इस प्रसंग के वर्णन में महाभारत आदिपर्व 137,73-74 में कांपिल्य को दक्षिण पंचाल की राजधानी बताया गया है-- 'माकंदीमथ गंगायास्तीरे जनपदायुताम्, सो अध्यावसद् दीनमना: कांपिल्यं च पुरोत्तमम्। दक्षिणान्श्चापि पंचालन् तावच्चर्मणवती नदी, द्रोणेन चैव द्रुपद: परिभूयाथ पालित:'। उस समय दक्षिण पंचाल का विस्तार गंगा के दक्षिण तट से चम्बल नदी तक था। ब्रह्मदत्त जातक में भी दक्षिण पंचाल का नाम कंपिलरट्ठ या कांपिल्य राष्ट्र है।

बौद्ध साहित्य में कांपिल्य का वर्णन बुद्ध के जीवन चरित्र के संबंध में है. किंवदंती के अनुसार इसी स्थान पर उन्होंने कुछ आश्चर्यजनक चमत्कार दिखाए थे जैसे स्वर्ग में जाकर अपनी माता को उपदेश देना. जैनसूत्रप्रज्ञापणा में कंपिला या कांपिल्य का उल्लेख अन्य कई नगरों के साथ किया गया है. विविधतीर्थकल्प (जैनसूत्रग्रंथ) के लेखक ने कांपिल्य को गंगा तट पर स्थित बताया है और उसे 13वें तीर्थंकर विमलनाथ के जीवन की 5 घटनाओं से संबंध माना है. इसी कारण इस नगरी को पंचकल्याणक नाम से भी अभिहित किया गया है. कांपिल्य को जैन साहित्य में कौण्डिन्य और गर्दवालि के शिष्य आर्षमित्र से भी संबंधित माना गया है.

चीनी यात्री युवाच्वांग ने इस नगरी को अपने पर्यटन के दौरान देखा था. वर्तमान कंपिला में एक अति प्राचीन टीला आज भी 'द्रुपद का कोट' कहलाता है. बूढ़ीगंगा के तट पर द्रौपदी-कुंड है जिसे महाभारत की कथा के अनुसार द्रोपदी और धृष्टद्युम्न का जन्म हुआ था. कुंड से बड़े परिणाम की, संभवतः मौर्यकालीन, ईंटें निकली हैं. कंपिला के मंदिरों से अनेक मूर्तियां प्राप्त हुई है.

कंपिला बौद्धधर्म के समान ही जैन धर्म का भी बड़ा केंद्र था जैसा कि उपर्युक्त उद्धरणों से तथा यहां से प्राप्त अवशेषों से प्रमाणित होता है. कांपिल्य को कंपिल्लनगर और कंपिला भी कहा जाता था. साहित्य में इसका अपभ्रंश रूप कांपील भी मिलता है. कांपिल्यनगरी प्राचीन काल में काशी, उज्जयिनी आदि की भांति बहुत प्रसिद्ध थी और प्राचीन साहित्य में इसे

[p.160]: अनेक कथा कहानियों की घटनास्थली माना गया है, जैसे महाभारत शांति पर्व 139,5 में राजा ब्रह्मदत्त और पूजनी चिड़िया की कथा को कांपिल्य में ही घटित माना गया है, 'कांपिल्ये ब्रह्मदत्तस्य त्वन्त:पुरवासिनी, पूजनी नाम शकुनि दीर्घ-कालं सहोषिता'। लोकश्रुति के अनुसार ज्योतिष आचार्य वराह-मिहिर का जन्म कांपिल्य में ही हुआ था.

भारतकोश में कांपिल्य

दक्षिण पांचाल की राजधानी थी। यह फ़र्रुख़ाबाद ज़िले का एक कस्बा है, जहां द्रौपदी का जन्म हुआ था। उत्तर पांचाल पांडवों की सहायता से गुरु द्रोणाचार्य ने राजा द्रुपद से छीन लिया था और उसकी राजधानी रामनगर (रूहेलखंड) थी।

महाभारत काल में पंचाल राज्य उत्तरी तथा दक्षिणी पंचाल के नाम से दो भागों में विभाजित हो गया। गंगा नदी इन दोनों को अलग-अलग करती थी।

दक्षिण पंचाल की राजधानी कांम्पिल्य (वर्तमान फ़र्रुख़ाबाद ज़िला) थी तथा उत्तरी पंचाल की राजधानी अहिच्छत्र थी। इस नगर के ध्वंसावशेष बरेली जनपद की आँवला तहसील के ग्राम रामनगर के निकट अब तक मौजूद है।

छठी शताब्दी ई.पू. में पांचाल की गणना सोलह महाजनपदों में की जाती थी। यही पांचाल जनपद मध्य काल से रूहेलखण्ड नाम से जाना जाता है। वर्तमान समय में रूहेलखण्ड क्षेत्र के अन्तर्गत उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, बदायूँ , पीलीभीत तथा शाहजहाँपुर जनपद आते हैं, जो बरेली व मुरादाबाद दो कमिश्नरी (मण्डल)में बँटे हैं।

महाभारत में वर्णित विवरणों के अनुसार शांतनु के समय पंचाल का राजा द्वीभठ था जिसके पौत्र राजा द्रुपद ने पंचाल राज्य पर राज्य किया तथा अहिच्छत्रा को अपना राजधानी बनाया, किन्तु द्रोणाचार्य से शत्रुता हो जाने पर द्रोण ने राजा द्रुपद को पराजित कर उत्तरी पंचाल को अपने अधीन कर लिया तथा दक्षिण पंचाल द्रुपद को दे दिया । द्रुपद की पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर कांम्पिल्य में हुआ जो दक्षिण पंचाल की राजधानी थी। महाभारत युद्ध में उत्तरी पंचाल ने पाण्डवों का साथ दिया तथा युद्ध के उपरांत भीम ने अपना विजय यात्रा पंचाल प्रदेश से ही प्रारम्भ की तथा कौशल, अयोध्या,काशी, अंग, चेदि और मत्स्य राज्यों को अपने अधीन किया था। ( महाभारत सभा पर्व ,अ0-14) महाभारत युद्ध के पश्चात् पंचाल पर पाण्डवों के वंशज तथा बाद में नाग राजाओं का अधिकार रहा ।

संदर्भ: भारतकोश-कांपिल्य

कम्पिल

कम्पिल उत्तर प्रदेश राज्य में फ़र्रुख़ाबाद ज़िले का एक प्रसिद्ध नगर है। यह नगर फ़र्रुख़ाबाद से 45 कि.मी., कायमगंज तहसील से 10 कि.मी. तथा आगरा से 150 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। इसकी गणना भारत के प्रचीनतम नगरों में है। इसका प्राचीन नाम 'काम्पिल्य' था। कम्पिल हिन्दू तथा जैन धर्म से सम्बंधित प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। इस स्थान का उल्लेख पौराणिक महाकाव्य महाभारत में भी हुआ है। महाभारत के अनुसार यह राजा द्रुपद की राजधानी थी। प्राचीन काल में आज के फ़र्रुख़ाबाद तथा कन्नौज जनपदों को कम्पिल राज्य के नाम से जाना जाता था, जिस पर राजा द्रुपद, हरिषेण, ब्रह्मदत्त तथा आरूणी का आधिपत्य रहा।

इतिहास: उत्तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद जनपद में स्थित कम्पिल नगरी गंगा नदी के किनारे बसी हुई है। कम्पिल या काम्पिल्यपुरी भारत के अति प्राचीन वंदनीय और दर्शनीय स्थानों में से एक है। जैन शास्त्रों में तो इसका इतिहास आता ही है, वेदों में भी काम्पिल्यपुरी के नाम से इसकी प्रसिद्धि है। कहीं-कहीं इसका नाम 'भोगवती' और 'माकन्दी' भी आया है। यह महाभारत कालीन नगर है। महाभारत की प्रमुख पात्र द्रौपदी इसी नगर की थी। कम्पिल का एक प्राचीन नाम 'द्रुपदगढ़' भी मिलता है। सम्भवत: यह नाम द्रौपदी के पिता राजा द्रुपद के नाम पर पड़ा था। प्राचीन काल में यह पांचाल प्रदेश की राजधानी थी और राजा द्रुपद यहाँ शासन करते थे।

काम्पिल्य के नाम का सर्वप्रथम उल्लेख यजुर्वेद की तैत्तरीय संहिता में 'कंपिला' रूप में मिलता है। बहुत संभव है कि पुराणों में वर्णित पंचाल नरेश भृम्यश्व के पुत्र कपिल या कांपिल्य के नाम पर ही इस नगरी का नामकरण हुआ हो। महाभारत काल से पहले पंचाल जनपद गंगा के दोनों ओर विस्तृत था। उत्तर पंचाल की राजधानी अहिच्छत्र और दक्षिण पंचाल की कांपिल्य थी। दक्षिण पंचाल के सर्वप्रथम राजा अजमीढ़ का पुराणों में उल्लेख है। इसी वंश में प्रसिद्ध राजा नीप और ब्रह्मदत्त हुए थे। महाभारत के समय द्रोणाचार्य ने पंचाल नरेश द्रुपद को पराजित कर उससे उत्तर पंचाल का प्रदेश छीन लिया था। इस प्रसंग के वर्णन में महाभारत में कांपिल्य को दक्षिण पंचाल की राजधानी बताया गया है। उस समय दक्षिण पंचाल का विस्तार गंगा के दक्षिण तट से चम्बल नदी तक था। ब्रह्मदत्त जातक में भी दक्षिण पंचाल का नाम कंपिलरट्ठ या कांपिल्य राष्ट्र है।

जैन तीर्थ स्थल: जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों में से 13वें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ की जन्मभूमि के साथ-साथ यहाँ उनके चार कल्याणक हुए हैं। पिता महाराज कृतवर्मा के राजमहल एवं माता जयश्यामा के आंगन में वहाँ 15 माह तक कुबेर ने रत्नाव्रष्टि की तथा सौधर्म इन्द्र ने कम्पिल नगरी में माघ शुक्ल पक्ष चतुर्थी को आकर तीर्थंकर के जन्मकल्याणक का महामहोत्सव मनाया था। पुन: युवावस्था में विमलनाथ तीर्थंकर का विवाह हुआ और दीर्घ काल तक राज्य संचालन कर उन्होंने माघ शुक्ल चतुर्थी को ही अपराह्न काल में सहेतुक वन में जैनेश्वरी दीक्षा लेकर मोक्ष मार्ग का प्रवर्तन किया। उसके बाद उसी कम्पिल के उद्यान में ही माघ शुक्ल षष्ठी को कैवल्य ज्ञान उत्पन्न होने पर समवसरण की रचना हुई थी। तब उन्होंने दिव्यध्वनि के द्वारा संसार को सम्बोधन प्रदान किया था।

नूतन रूप में यहाँ एक श्वेताम्बर मंदिर और उनकी धर्मशाला भी है। हिन्दुओं तथा जैनियों के ऐतिहासिक धार्मिक स्थानों से प्रभावित होकर भारत सरकार ने कम्पिल को पर्यटन केन्द्र घोषित कर दिया है तथा उसके विकास हेतु सरकारी स्तर पर कई योजनाएँ चल रही हैं। यहाँ भगवान विमलनाथ की विशाल खड्गासन प्रतिमा विराजमान है। वर्तमान समय में कम्पिल तीर्थ क्षेत्र पर जैन आबादी न होने से यह क्षेत्र जैनत्व स्तर पर विकास की ओर उन्मुख नहीं हो सका है, किन्तु वहाँ की कार्यकारिणी ने कुछ नूतन योजनाएँ प्रारंभ की हैं ताकि तीर्थ क्षेत्र का विकास और विस्तार होकर अनूठा एवं अनुपम ध्यान, आराधना का स्थल बन सके।

कम्पिल में 1400 वर्ष से भी प्राचीन देवों द्वारा निर्मित एक दिगम्बर जैन मंदिर है, जिसमें गंगा नदी के गर्भ से प्राप्त चतुर्थ कालीन श्याम वर्णी भगवान विमलनाथ की प्रतिमा विराजमान है, जो दिगम्बर जैन शिल्पकला की प्राचीनता का दिग्दर्शन करा रही है। यहाँ यात्रियों के ठहरने हेतु तीन दिगम्बर जैन अतिथि गृह उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त पर्यटन विभाग की ओर से भी पर्यटकों के लिए एक आधुनिक धर्मशाला बनाई गई है।

संदर्भ: भारतकोश-कम्पिल

इतिहास

ठाकुर देशराज[8] ने लिखा है .... पांचाल: [पृ.98]: बौद्ध काल में इनके दो दल हो गए थे। उत्तर पांचाल और दक्षिण पांचाल। दक्षिणी लोगों की राजधानी कन्नोज थी। उत्तरी लोगों की कांपिल्य। लोगों का अनुमान है कि बदायूं के आसपास उनका राज्य होगा। लेकिन हमारा अनुमान है कि कासगंज और अलीगढ़ के बीच में इनकी कम्पिलानगरी थी। पीछे के समय में फूल सिंह पांचाली जिसे साधारण बोलचाल में लोग पंजाबी कहते हैं।* यहां का राजा था। निषद देश के राजा नल के बाप से इसी फूलसिंह ने इस बात पर युद्ध किया था कि जबकि गंगा मेरे राज्य में होकर बहती है तुमने हमारे घाट पर हमसे पहले स्नान कैसे कर लिया। राजा रानी


* यूपी के जाटों में पंजाबी एक गोत्र भी है जो कि पांचाली का ही अपभ्रंश और समान अर्थी है।

Jat History

Kachmunia (कचमुनियाँ) is a gotra of Jats.[9][10] These people were inhabitants of republic Kampilya (काम्पिल्य), which gave name to this clan.[11]


कोइल: प्राचीन समय में ये लोग कांपिल्य कहलाते थे। इसी नाम से इनका देश प्रसिद्ध था। कांपिल्य से उठकर इन्होंने कंपिलगढ़ बसाया। जो कि गंगा के दक्षिण-पूर्व में था। यह कंपिलगढ़ ही भविष्य में कोइल नाम से मशहूर हुआ जो कि अब अलीगढ़ कहलाता है। ‘बंगला विश्व कोष’ में नगेन्द्रनाथ बसु लिखते हैं - सन् 1757 ई. में जाट लोगों ने रामगड़ पर अधिकार कर लिया और उसका नाम कोइल रखा।1 इनके हाथ से कोइल मराठों ने ले लिया और पीरन नाम के फ्रांसीसी को वहां का हाकिम नियुक्त किया था। हमें काइल का इससे भी पहले का वर्णन एक प्रचलित राग ढोला में मिलता है। यहां अर्थात् कंपिलगढ़ में फूलसिंह पंजाबी (जाट) राज करता था। उसने कछवाहे राजा प्रथम की स्त्री को छीन लिया था और उसे अपनी रिवाज के अनुसार स्त्री बनाना चाहा था। कुछ समय तक महाराजा सूरजमल जी भरतपुर का भी कोइल पर अधिकार रहा था।[12]

Jat clans

In Mahabharata

References


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