Madhumant

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Madhumant (मधुमन्त) was an ancient republic tribe known to Panini and mentioned in Mahabharata (VI.10.51)

Variants of name

Jat clans

Mention by Panini

Madhumant (मधुमन्त्) is mentioned by Panini in Ashtadhyayi. [1]

History

V. S. Agrawala[2] writes that Ashtadhyayi of Panini mentions janapada Madhumat, under Kachchhadi (कच्छादि) (IV.2.133) (शैषिक अण्। काच्छ:)[3] and Sindhvadi (सिन्ध्वादि) (IV.3.93) (सोअस्याभिजन:,अण्। सैन्धव:)[4].


V S Agarwal [5] writes names of some important tribes in the Ganapatha, which deserve to be mentioned as being of considerable importance. We are indebted to the Greek historians of Alexander for the information that most of these were republics. These tribes include - MadhumantPanini mentions Madhumat as the name of a country in the region of Gandhara (Kachchhadi, IV.2.133; Sindhvadi, IV.3.99). The name occurs in Sutra IV.2.86 also as a deśa nāma. The Mahabharata mentions Madhumantaḥ as a people of the north-west (Bhishmaparva,IX.53). The Madhumants are clearly the Mohmands, who occupy the territory to the north of Kabul River, their homeland Dīr-Bajaur covering an area of 1200 squire miles (Afghanistan Gaz,.p.225). On the map one can notice at once the relative position of these two powerful tribes who who were close neighbours. What appears to be the ancient names of Dīr and Tīrāh are preserved in Patanjali, who refers to Dvīrāvatīko desah, Trīrāvatīko desah as pair names (Bhashya, I.4.1, I.301, II.1.20;I.382). The former is Dīr (land of the two rivers) so called from the Mohmand homeland between the Kunar and Panjkora rivers. Similarly the extensive Afridi-Tirah was Trira-vatika, from the three rivers Kabul, Bara and Indus (Kubha-Varā-Sindhu) which enclose it.

दंडक = दंडकवन = दंडकारण्य

विजयेन्द्र कुमार माथुर[6] ने लेख किया है ... दंडक = दंडकवन = दंडकारण्य (AS, p.421): रामायण काल में यह वन विंध्याचल से कृष्णा नदी के कांठे तक विस्तृत था. इसकी पश्चिमी सीमा पर विदर्भ और पूर्वी सीमा पर कलिंग की स्थिति थी. वाल्मीकि रामायण अरण्यकांड 1,1 में श्री राम का दंडकारण्य में प्रवेश करने का उल्लेख है-- 'प्रविश्य तु महारण्यं दंडकारण्यमात्मवान् रामो ददर्श दुर्धर्षस्तापसाश्रममंडलम्'.

लक्ष्मण और सीता के साथ रामचंद्रजी चित्रकूट और अत्रि का आश्रम छोड़ने के पश्चात यहां पहुंचे थे. रामायण में, दंडकारण्य में अनेक तपस्वियों के आश्रमों का वर्णन है. महाभारत में सहदेव की दिग्विजय यात्रा के प्रसंग में दंडक पर उनकी विजय का उल्लेख है--'ततः शूर्पारकं चैव तालकटमथापिच, वशेचक्रे महातेजा दण्डकांश च महाबलः' महा. सभा पर्व 31,36

सरभंगजातक के अनुसार दंडकी या दंडक जनपद की राजधानी कुंभवती थी. वाल्मीकि रामायण उत्तरकांड 92,18 के अनुसार दंडक की राजधानी मधुमंत में थी. महावस्तु (सेनार्ट का संस्करण पृ. 363) में यह राजधानी गोवर्धन या नासिक में बताई है. वाल्मीकि अयोध्या कांड 9,12 में दंडकारण्य के वैजयंत नगर का उल्लेख है. पौराणिक कथाओं तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दंडक के राजा दांडक्य की कथा है जिनका एक ब्राह्मण कन्या पर कुदृष्टि डालने से सर्वनाश हो गया था. अन्य कथाओं में कहा गया है भार्गव-कन्या दंडका के नाम पर ही इस वन का नाम दंडक हुआ था.

कालिदास ने रघुवंश में 12,9 में दंडकारण्य का उल्लेख किया है-- 'स सीतालक्ष्मणसख: सतयाद्गुरुमलोपयन्, विवेश-दंडकारण्यं प्रत्येकं च सतांमन:'. कालिदास ने इसके आगे 12,15 में श्रीराम के दंडकारण्य-प्रवेश के पश्चात उनकी भरत से चित्रकूट पर होने वाली भेंट का वर्णन है जिससे कालिदास के अनुसार चित्रकूट की स्थिति भी दंडकारण्य के ही अंतर्गत माननी होगी. रघुवंश 14,25 में वर्णन है कि अयोध्या-निवर्तन के पश्चात राम और सीता को दंडकारण्य के कष्टों की स्मृतियाँ भी बहुत मधुर जान पड़ती थी-- 'तयोर्यथाप्रार्थितमिंद्रियार्थानासेदुषो: सद्मसु चित्रवत्सु, प्राप्तानि दुखान्यपि दंडकेषु संचित्यमानानि सुखान्यभूवन'.

रघुवंश 13 में जनस्थान को राक्षसों के मारे जाने पर 'अपोढ़विघ्न' कहा गया है. जनस्थान को दंडकारण्य का ही एक भाग माना जा सकता है. उत्तररामचरित में भवभूति ने दंडकारण्य का सुंदर वर्णन किया है. भवभूति के अनुसार दंडकारण्य जनस्थान के पश्चिम में था (उत्तररामचरित, अंक-1).

In Mahabharata

Bhisma Parva, Mahabharata/Book VI Chapter 10 describes geography and provinces of Bharatavarsha. Madhumant is mentioned in the list of provinces in verse (VI.10.51) along with Tilakas and Parsikas. [7]

References

  1. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.453
  2. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.50
  3. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.497
  4. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.498
  5. V S Agarwal, India as Known to Panini,p.453
  6. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.421
  7. तीरग्राहास्तर तॊया राजिका रम्यका गणाः, तिलकाः पारसीकाश च मधुमन्तः परकुत्सकाः (VI.10.51)

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