Dandakaranya

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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Dandakaranya (दंडकारण्य) is a spiritually significant region in India. It is roughly equivalent to the Bastar division in the Chhattisgarh state in the central-east part of India.

Variants

Location

This region has an average height of metres and lies mostly in the Indian State of Chhattisgarh.[1] It covers about 92,200 square kms of land, which includes the Abujhmar Hills in the west and the Eastern Ghats in the east, including regions of Telangana, Andhra Pradesh, Chhattisgarh and Odisha states. It spans about 300 kms from north to south and about 500 kms from east to west.[2] The Balaghat district of Madhya Pradesh and Bhandara, Gondia and Gadchiroli districts of Maharashtra are part of the ancient region Dandakaranya.

Origin

Dandakaranya roughly translates from Sanskrit to "The Jungle (aranya) of Punishment (dandakas").[3] Dandaka-aranya, means the Dandak Forest, the abode of the demon Dandaka.[4] Dandaka (Sanskrit: दंडक, IAST: Daṃḍaka) is the name of a forest mentioned in the ancient Indian text Ramayana.

Jat clans

History

Dandakaranya was the location of the Danda Kingdom, a stronghold of the Rakshasa tribes. It was state of Lanka under the reign of Ravana. Ravana's governor Khara ruled this province. Dandakaranya is considered sacred in Hinduism, as many accounts of the region describe ancient Hindu peoples and Hindu deities living together in refuge there. The Dandakaranya zone was the location of the turning point in the Ramayana, a famous Sanskrit epic. The plot for the divine objectives of the Hindu Trinity to uproot the rakshasa from the land was formulated here. According to the Ramayana, it was home to many deadly creatures and demons. Exiled persons resided here and sages had to cross it in order to reach the Vindhya Mountains. Rama, his wife Sita and his brother Lakshmana spent fourteen years as exiles traveling around the region. Surpanakha met Lord Rama's brother Laxmana in this region, where she became infatuated with him. When he turned her down and Laxman cut her nose, Surpanakha had her brothers Khara and Dushan attack Rama, who killed them in the subsequent battle.

दंडक = दंडकवन = दंडकारण्य

विजयेन्द्र कुमार माथुर[5] ने लेख किया है ... दंडक = दंडकवन = दंडकारण्य (AS, p.421): रामायण काल में यह वन विंध्याचल से कृष्णा नदी के कांठे तक विस्तृत था. इसकी पश्चिमी सीमा पर विदर्भ और पूर्वी सीमा पर कलिंग की स्थिति थी. वाल्मीकि रामायण अरण्यकांड 1,1 में श्री राम का दंडकारण्य में प्रवेश करने का उल्लेख है-- 'प्रविश्य तु महारण्यं दंडकारण्यमात्मवान् रामो ददर्श दुर्धर्षस्तापसाश्रममंडलम्'.

लक्ष्मण और सीता के साथ रामचंद्रजी चित्रकूट और अत्रि का आश्रम छोड़ने के पश्चात यहां पहुंचे थे. रामायण में, दंडकारण्य में अनेक तपस्वियों के आश्रमों का वर्णन है. महाभारत में सहदेव की दिग्विजय यात्रा के प्रसंग में दंडक पर उनकी विजय का उल्लेख है--'ततः शूर्पारकं चैव तालकटमथापिच, वशेचक्रे महातेजा दण्डकांश च महाबलः' महा. सभा पर्व 31,36

सरभंगजातक के अनुसार दंडकी या दंडक जनपद की राजधानी कुंभवती थी. वाल्मीकि रामायण उत्तरकांड 92,18 के अनुसार दंडक की राजधानी मधुमंत में थी. महावस्तु (सेनार्ट का संस्करण पृ. 363) में यह राजधानी गोवर्धन या नासिक में बताई है. वाल्मीकि अयोध्या कांड 9,12 में दंडकारण्य के वैजयंत नगर का उल्लेख है. पौराणिक कथाओं तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दंडक के राजा दांडक्य की कथा है जिनका एक ब्राह्मण कन्या पर कुदृष्टि डालने से सर्वनाश हो गया था. अन्य कथाओं में कहा गया है भार्गव-कन्या दंडका के नाम पर ही इस वन का नाम दंडक हुआ था.

कालिदास ने रघुवंश में 12,9 में दंडकारण्य का उल्लेख किया है-- 'स सीतालक्ष्मणसख: सतयाद्गुरुमलोपयन्, विवेश-दंडकारण्यं प्रत्येकं च सतांमन:'. कालिदास ने इसके आगे 12,15 में श्रीराम के दंडकारण्य-प्रवेश के पश्चात उनकी भरत से चित्रकूट पर होने वाली भेंट का वर्णन है जिससे कालिदास के अनुसार चित्रकूट की स्थिति भी दंडकारण्य के ही अंतर्गत माननी होगी. रघुवंश 14,25 में वर्णन है कि अयोध्या-निवर्तन के पश्चात राम और सीता को दंडकारण्य के कष्टों की स्मृतियाँ भी बहुत मधुर जान पड़ती थी-- 'तयोर्यथाप्रार्थितमिंद्रियार्थानासेदुषो: सद्मसु चित्रवत्सु, प्राप्तानि दुखान्यपि दंडकेषु संचित्यमानानि सुखान्यभूवन'.

रघुवंश 13 में जनस्थान को राक्षसों के मारे जाने पर 'अपोढ़विघ्न' कहा गया है. जनस्थान को दंडकारण्य का ही एक भाग माना जा सकता है. उत्तररामचरित में भवभूति ने दंडकारण्य का सुंदर वर्णन किया है. भवभूति के अनुसार दंडकारण्य जनस्थान के पश्चिम में था (उत्तररामचरित, अंक-1).

दंडकारण्य परिचय

दंडकारण्य विंध्याचल पर्वत से गोदावरी तक फैला हुआ प्रसिद्ध वन है। यहाँ वनवास के समय श्रीरामचंद्र बहुत दिनों तक रहे थे। दंडकारण्य पूर्वी मध्य भारत का भौतिक क्षेत्र है। क़रीब 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस इलाक़े के पश्चिम में अबूझमाड़ पहाड़ियाँ तथा पूर्व में इसकी सीमा पर पूर्वी घाट शामिल हैं। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्र प्रदेश राज्यों के हिस्से शामिल हैं। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक क़रीब 320 कि.मी. तथा पूर्व से पश्चिम तक लगभग 480 किलोमीटर है।

भौगोलिक परिवेश: राक्षस दंडक के आवास पर इस क्षेत्र का नाम पड़ा दंडक वन पड़ा, जिसका उल्लेख रामायण महाकाव्य में है। प्राचीन समय में नल, वाकाटक एवं चालुक्य वंशों ने इस पर सफलतापूर्वक शासन किया। यहाँ गोंड आदिवासी रहते हैं। क्षेत्र का अधिकतर भाग रेतीला समतलीय है, जिसकी ढलान क्रमश: उत्तर से दक्षिण-पश्चिम की तरफ़ है। दंडकारण्य में व्यापक वनाच्छादित पठार एवं पहाड़ियाँ हैं, जो पूर्व दिशा से अचानक उभरती हैं तथा पश्चिम की ओर धीरे-धीरे इनकी ऊँचाई कम होती चली जाती है। यहाँ कई अपेक्षाकृत विस्तृत मैदान भी हैं। इस क्षेत्र की जल निकासी महानदी (जिसकी सहायक नदियों में तेल जोंक, उदंति, हट्टी, एवं सांदुल शामिल हैं) तथा गोदावरी (जिसकी सहायक नदियों में इंद्रावती और साबरी शामिल हैं) द्वारा होती है। पठार एवं पर्वतीय इलाक़ों में दोमट मिट्टी की पतली परत है। मैदानी इलाक़ों एव घाटियों में उपजाऊ, जलोढ़ मिट्टी है। इस क्षेत्र में आर्थिक रूप से कीमती साल के नम वन हैं, जो कुल क्षेत्र के लगभग आधे हिस्से में फैले हैं।

अर्थव्यवस्था: दंडकारण्य की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है; फ़सलों में चावल, दालें एवं तिलहन शामिल हैं। उद्योगों में धान एवं दलहन (अरहर) की मिलें, आरा घर, अस्थि-चूर्ण निर्माण, मधुमक्खीपालन और फ़र्नीचर निर्माण उद्योग शामिल हैं। दंडकारण्य में बॉक्साइट, लौह अयस्क एवं मैंगनीज के भंडार हैं। केंद्र सरकार ने 1958 में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की मदद के लिए दंडकारण्य विकास प्राधिकरण का गठन किया। इसने भास्केल बांध एवं पाखनजोर जलाशय; जगदलपुर, बोरेगांव एवं उमरकोट में काष्ठशिल्प केंद्र तथा शरणार्थी पुनर्वास क्षेत्रों में बलांगीर-कोजिलम रेलवे परियोजना सहित सड़को और रेलमार्गों का निर्माण किया। मुख्य रुप से विमानों के इंजन फ़ैक्ट्री सुनाबेड़ा में स्थित है। राष्ट्रीय खनिज विकास निगम बेलाडीला में लौह अयस्क का उत्पादन करता है। दंडकारण्य के महत्त्वपूर्ण नगर हैं- जगदलपुर, भवानीपाटणा और कोरापुर।

संदर्भ: भारतकोश-दंडकारण्य

In Mahabharata

Dandaka (दण्डक) in Mahabharata (II.28.43)

Dandakaranya (दण्डकारण्य) (Forest)/(Tirtha) in Mahabharata (III.83.38),


Sabha Parva, Mahabharata/Book II Chapter 28 mentions Sahadeva's march towards south: kings and tribes defeated. Dandaka (दण्डक) is mentioned in Mahabharata (II.28.43). [6]...And the master of battle (Sahdeva) then, having exacted jewels and wealth from king Rukmin, marched further to the south. And, endued with great energy and great strength, the hero then, reduced to subjection, Surparaka and Talakata, and the Dandakas also....


Vana Parva, Mahabharata/Book III Chapter 83 mentions names of Pilgrims. Dandakaranya (दण्डकारण्य) (Forest)/(Tirtha) is mentioned in Mahabharata (III.83.38).[7]....Proceeding next to the highly sacred tank called Payoshni (पयॊष्णी) (III.83.37), that best of waters, he that offers oblations of water to the gods and the Pitris acquires the merit of the gift of a thousand kine. Arriving next at the sacred forest of Dandakaranya (दण्डकारण्य) (III.83.38), a person should bathe (in the waters) there. By this, O king, one at once obtains, O Bharata, the merit of giving away a thousand kine.....

External links

References

  1. Aranya Kand". Tulsi Ramayana.
  2. "Dandakaranya". Encyclopædia Britannica Online.
  3. In the footsteps of Rama - The Pioneer
  4. "Dandakaranya". Encyclopædia Britannica Online.
  5. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.421
  6. ततः शूर्पारकं चैव गणं चॊपकृताह्वयम, वशे चक्रे महातेजा दण्डकांश च महाबलः (II.28.43)
  7. दण्डकारण्यम आसाद्य महाराज उपस्पृशेत, गॊसहस्रफलं तत्र सनातमात्रस्य भारत (III.83.38)