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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Map of Udaipur District‎

Eklingji (एकलिंगजी) is a Shiva temple complex in Girwa tahsil of Udaipur District of Rajasthan in western India. Eklingji is believed to be the Ruling deity of Mewar Princely State and the Ruler Maharana rules as his Dewan.



It is about fourteen miles north of Udaipur city.[1]

Eklingaji Temple

Begun in 971, the temple complex was built by the Guhil dynasty of Mewar, in honor of their presiding deity Eklingji, a form of Lord Shiva. The beautifully sculpted temple complex includes 108 temples within its high walls. The main temple, which dates to the 15th century, was rebuilt from the ruins of an earlier destroyed temple. The walled complex is made of marble and granite and has an enormous double-storied, elaborately pillared hall or "mandap" under a vast pyramidal roof, with a four-faced image of Lord Shiva in black marble.

Another temple in the complex is the Lakulish Temple; built in 971, it is the only temple of the Lakulish sect in the whole of India.

Eklingaji Nath temple Inscription of 971 AD

One of the most valuable parts of The Annals by James Tod[2] is the chapter

[p.xxxvi]: describing the popular religion of Mewar, the festival and rites in honour of Gauri, the Mother goddess. There are also many incidental notices of cults and superstitions scattered through the work. A race of warriors like the Rajputs naturally favours the worship of Siva who, as the successor of Rudra, the Vedic storm-god, was originally a terror-inspiring deity, a side of his character only imperfectly veiled by his euphemistic title of Siva, ' the blessed or auspicious One.' In his phallic manifestation his chief shrine is at Eklingji, ' the single or notable phallus,' about fourteen miles north of Udaipur city. The Ranas hold the office of priest-kings, Diwans or prime-ministers of the god. Their association with this deity has been explained by an inscription recently found in the temple of Natha, ' the Lord,' now used as a storeroom of the Eklingji temple.1 The inscription, dated A.D. 971, is in form of a dedication to Lakulisa, a form of Siva represented as bearing a club, and refers to the Saiva sect known as Lakulisa-Pasapatas. It records the name of a king named Sri-Bappaka, ' the moon among the princes of the Guhila dynasty,' who reigned at a place called Nagahvada, identified with Nagda, an ancient town several times mentioned in The Annals, the ruins of which exist at the foot of the hill on which the temple of Eklingji stands. Sri-Bappaka is certainly Bapa or Bappa, the traditional founder of the Mewar dynasty, which had at that time its capital at Nagda. From this inscription it is clear that the Eklingji temple was in existence before A.D. 971, and, as Mr. Bhandarkar remarks, " it shows that the old tradition about Nagendra and Bappa Rawal's infancy given by Tod had some historical foundation, and it is intelligible how the Ranas of Udaipur could have come to have such an intimate connexion with the temple as that of high priests, in which capacity they still officiate." This office vested in them is a good example of one of those dynasties of priest-kings of which Sir James Frazer has given an elaborate account.2

The milder side of the Rajput character is represented in the cult of Krishna at Nathdwara. The Mahant or Abbot of the temple, situated at the old village of Siarh, twenty-two miles

1. D. R. Bhandarkar, Journal Bombay Branch Royal Asiatic Society,

1916, Art. xii.

2. The. Golden Bauqh, 3rd ed. ; The Magic Art, i. 44 ff. ; Adonis, Attis, Osiris, i. 42 f., 143 £f.

[p.xxxvii]: from the city of Udaipur, enjoys semi-royal state. In anticipation of the raid by Aurangzeb on Mathura, A.D. 1669-70, the ancient image of Kesavadeva, a form of Krishna, ' He of the flowing locks,' was removed out of reach of danger by Rana Raj Singh of Mewar. When the cart bearing the image arrived at Siarh, the god, by stopping the cart, is said to have expressed his intention of remaining there. This was the origin of the famous temple, still visited by crowds of pilgrims, and one of the leading seats of the Vallabhacharya sect, ' the Epicureans of the East,' whose practices, as disclosed in the famous Maharaja libel case, tried at Bombay in 1861, gave rise to grievous scandal.1 The ill-feeling against this sect, aroused by these revelations, was so intense that the Maharaja of Jaipur ordered that the two famous images of Krishna worshipped in his State, which originally came from Gokul, near Mathura, should be removed from his territories into those of the Bharatpur State.

Tod bears witness to the humanizing effect on the Rajputs of the worship of this god, whom he calls " the Apollo of Braj," the holy land of Krishna near Mathura. He also asserts that the Emperor Akbar favoured the worship of Krishna, a feeling shared by his successors Jahangir and Shah Jahan. Akbar, in his search for a new faith to supersede Islam, of which he was parcus cultor et infrequens, dallied with Hindu Pandits, Parsi priests, and Christian missionaries, and he was doubtless well informed about the sensuous ritual of the temple of Nathdwara.2

1. Karsandas Mulji, History of the Sect of the Maharajas or Vallabhdcharyas, London, 1865 ; Report of the Maharaj Libel Case, Bombay, 1862 ; F. S. Growse, Mathura, 3rd ed. 283 f.
2 V. A. Smith, Akbar, The Great Mogul, 162 ff.

एकलिंगजी उदयपुर

विजयेन्द्र कुमार माथुर[3] ने लेख किया है ...एकलिंगजी राजस्थान (AS, p.109): उदयपुर से 12 मील पर स्थित मंदिर परिसर है। मेवाड़ के राणाओं के आराध्यदेव एकलिंग महादेव का मेवाड़ के इतिहास में बहुत महत्व है। मेवाड़ के संस्थापक बप्पा रावल ने 8वीं शताब्‍दी में इस मंदिर का निर्माण करवाया और एकलिंग की मूर्ति की प्रतिष्ठापना की थी। कहा जाता है कि डूंगरपुरराज्य की ओर से मूल बाणलिंग के इंद्रसागर में प्रवाहित किए जाने पर वर्तमान चतुर्मुखी लिंग की स्थापना की गई थी। एकलिंग भगवान को

[p.110]: साक्षी मानकर मेवाड़ के राणाओं ने अनेक बार ऐतिहासिक महत्व के प्रण किए थे। जब विपत्तियों के थपेड़ों से महाराणा प्रताप का धैर्य टूटने जा रहा था तब उन्होंने अकबर के दरबार में रहकर भी राजपूती गौरव की रक्षा करने वाले बीकानेर के राजा पृथ्वीराज को, उनके उद्बोधन और वीरोचित प्रेरणा से भरे हुए पत्र के उत्तर में जो शब्द लिखे थे वे आज भी अमर हैं- 'तुरुक कहासी मुखपतौ, इणतण सूं इकलिंग, ऊगै जांही ऊगसी प्राची बीच पतंग' (=प्रताप के शरीर रहते एकलिंग की सौगंध है, बादशाह अकबर मेरे मुख से तुर्क ही कह लाएगा। आप निश्चित रहें, सूर्य पूर्व में ही उगेगा')

मंदिर: एकलिंगजी राजस्थान का प्रसिद्ध शैव तीर्थस्थान है। इसके पास में इन्द्रसागर नामक सरोवर भी है। मेवाड़ के संस्थापक बप्पा रावल ने 8वीं शताब्‍दी में इस मंदिर का निर्माण करवाया और एकलिंग की मूर्ति की प्रतिष्ठापना की थी। बाद में यह मंदिर टूटा और पुन:बना था। वर्तमान मंदिर का निर्माण महाराणा रायमल ने 15वीं शताब्‍दी में करवाया था। इस परिसर में कुल 108 मंदिर हैं। मुख्‍य मंदिर में एकलिंगजी की चार सिरों वाली मूर्ति स्‍थापित है। उदयपुर से यहाँ जाने के लिए बसें मिलती हैं। एकलिंगजी की मूर्ति में चारों ओर मुख हैं। अर्थात् यह चतुर्मुख लिंग है। आस-पास में गणेश, लक्ष्मी, डुटेश्वर, धारेश्वर आदि कई देवताओं के मन्दिर हैं। पास में ही वनवासिनी देवी का मन्दिर भी है।

एकलिंग जी का प्रसिद्ध मंदिर

उदयपुर से १३ मील उत्तर में एकलिंग जी का प्रसिद्ध मंदिर है जो पहाड़ियों के बीच में बना हुआ है। इस गाँव का नाम कैलाशपुरी है। लोग इसे एकलिंगेश्वर की पुरी के रुप में भी जानते हैं। एकलिंग जी की मूर्ति चौमुखी है जिसकी प्रतिष्ठा महाराणा रायमल ने की थी। एकलिंग जी महाराणा के इष्टदेव माने जाते रहे हैं। लोग मेवाड़ राज्य के मालिक के रुप में उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते थे और महाराणा उनके दीवान कहलाते थे, इसी वजह से महाराणा को राजपूताने में दीवाणजी के रुप में भी पुकारा जाता था।

एकलिंग जी का सुविशाल मंदिर एक ऊँचे कोट से घिरा हुआ है। इसके निर्माण कार्य के बारे में तो ऐसा कोई लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है लेकिन एक जनश्रुति के अनुसार सर्वप्रथम इसे राजा बापा (बापा रावल) ने बनवाया था। फिर मुसलमानों के आक्रमण से टूट जाने के कारण महाराणा मोकल ने उसका जीर्णोद्धार किया तथा एक कोट का निर्माण करवाया। तदनन्तर महाराणा रायमल ने नये सिरे से वर्तमान मंदिर का निर्माण किया। मंदिर के दक्षिणी द्वार के सामने एक तारव में महाराणा रायमल की १०० श्लोकों वाली एक प्रशस्ति लगी हुई है जो मेवाड़ के इतिहास तथा मंदिर के सम्बन्ध में संक्षिप्त वृत्तांत प्रस्तुत करती है। इस मंदिर में पूजन प्रक्रिया एक विशेष रुप से तैयार पद्धति के अनुसार होती है। उक्त पद्धति के अनुसार उत्तर के मुख को विष्णु का सूचक मानकर विष्णु के भाव से उसका पूजन किया जाता है।

इस मंदिर के अहाते में कई और भी छोटे बड़े मंदिर बने हुए हैं, जिनमें से एक महाराणा कुम्भा (कुभकर्ण) का बनवाया हुआ विष्णु का मंदिर है। लोग इसे मीराबाई का मंदिर के रुप में भी जानते हैं। एकलिंग जी के मंदिर से दक्षिण में कुछ ऊँचाई पर यहाँ के मठाधिपति ने सन् ९७१ (विक्रम संवत् १०२८) में लकुलीश का मंदिर बनवाया था। इस मंदिर के कुछ नीचे विंघ्यवासिनी देवी का मंदिर है।

बापा का गुरुनाथ हारीतराशि पहले एकलिंग जी मंदिर के महंत थे और पूजा का कार्य शिष्य-परंपरा के अन्तर्गत चलता रहा। इन नाथों का पुराना मठ अभी भी एकलिंग जी के मंदिर के पश्चिम की तरफ देखा जा सकता है। बाद में नाथों का आचरण गिड़ता गया। वे स्रियाँ भी रखने लगे। तभी से उन्हें अलग कर मठाधिपति के रुप में एक सन्यासी को नियत किया गया तभी से यहाँ के मठाधीश सन्यासी ही होते रहे हैं। ये सन्यासी गुसाईंजी (गोस्वामी जी) कहलाते थे। गुसांईजी की अध्यक्षता में तीन-चार ब्रम्हचारी रहते थे जो वहाँ का पूजन कार्य सम्पादित करते थे। पूजन की सामग्री आदि पहुचाने वाले परिचायके टहलुए कहे जाते हैं।

मेवाड़ के राजाओं की पुरानी राजधानी नागदा

एकलिंग जी के मंदिर से थोड़े ही अन्तर पर मेवाड़ के राजाओं की पुरानी राजधानी नागदा नगर है जिसको संस्कृत शिलालेखों में नागऋद के नाम से उल्लेख किया गया था। पहले यह बहुत बड़ा और समृद्धशाली नगर था परन्तु अब उजाड़ पड़ा हुआ है।

प्राचीन काल में यहाँ अनेक शिव, विष्णु तथा जैन मंदिर बने हुए थे जिसमें कई अभी भी विद्यमान हैं। जब दिल्ली के सुल्तान शमसुद्दीन अल्तुतमिश ने अपनी मेवाड़ की चढ़ाई में इस नगर को नष्ट कर दिया, तभी से इसकी अवनति होती गई। महाराणा मोकल ने इसके निकट अपने भाई बाघसिंह के नाम से बाघेला तालाब बनवाया जिससे इस नगर का भी कुछ अंश जल में डूब गया।

इस समय, जो मंदिर यहाँ विद्यमान है, उसमें से दो संगमरमर के बने हुए हैं। इन्हें सास बहु का मंदिर कहा जाता है। सास का मंदिर जिसका निर्माण लगभग विक्रम संवत् ११ वीं शताब्दी में हुआ था, में बहुत ही सुंदर नक्काशी का कार्य होने का प्रमाण है। एक विशाल जैन-मंदिर भी टूटी-फेटी दशा में है, जिसको खुंमाण रावल का देवरा कहते हैं। इसमें भी नक्काशी का अच्छा काम है। दूसरा जैन-मंदिर अदबद जी का मंदिर कहलाता है। इसके भीतर ९ फुट ऊँची शान्तिनाथ जी की बैठी हुई अवस्था में मूर्ति है। इस मूर्ति के लेख से ज्ञात होता है कि महाराणा कुंभकर्ण (कुंभा) के शासनकाल, सन् १४३७ (विक्रम संवत् १४९४) के दौरान ओसवाल सारंग ने यह मूर्ति बनवाई थी। इस अद्भुत मूर्ति के कारण ही इस मंदिर का नामकरण अदबदजी (अद्भुत जी) के रुप में हुआ।

नोटः लकुलीश या लकुटीश शिव के १८ अवतारों में से एक माना जाता है। प्राचीन काल के विभिन्न पाशुपत (शैव) सम्प्रदायों में यह सम्प्रदाय बहुत ही प्रसिद्ध था। उन्हें ऊघ्र्वरता (जिसका वीर्य कभी स्खलित न हुआ हो) माना जाता है जिसका चिन्ह ऊघ्र्वलिंग के रुप में है।


हारीत-आश्रम (AS, p.1019): विजयेन्द्र कुमार माथुर[4] ने लेख किया है ...हारीत राजस्थान के उदयपुर से 6 मील की दूरी पर स्थित 'एकलिंग' नामक स्थान। इस स्थान के बारे में कहा जाता है कि यहाँ 'हारीत संहिता' के प्रणेता महर्षि हारीत का आश्रम था।

Eklingaji Nath Inscription of 971 AD

नाथ प्रशस्ति- एकलिंगजी 971 ई.

यह एकलिंगजी के मन्दिर से कुछ ऊंचे स्थान पर लकुलिश के मन्दिर में लगा हुआ शिलालेख[5] वि.सं. 1028 (971 ई.) का है जिसे नाथ प्रशस्ति भी कहते हैं. भाषा संस्कृत पद्यों में देवनागरी लिपि है. यह मेवाड़ के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास के लिये बड़े काम की है. तीसरे और चोथे श्लोक में नागदा नगर का वर्णन है. पांचवें से आठवें श्लोकोम में यहां के राजाओं का वर्णन है जो बापा, गुहिल तथा नरवाहन हैं. आगे चलकर स्त्री के आभूषणों का वर्णन है. 13वें से 17वें श्लोक में ऐसे योगियों का वर्णन है जो भस्म लगाते हैं, बल्कल वस्त्र तथा जटाजूट धारण करते हैं. पाशुपत योग साधना करने वाले कुशिक योगियों तथा सम्प्रदाय के अन्य साधुओं का भी हमें परिचय मिलता है जो एकलिंगजी की पूजा करने वाले तथा उक्त मन्दिर के निर्माता कहे गये हैं. 17वें श्लोक में स्याद्वाद (जैन) तथा सौगत (बौद्ध) विचारकों को वादविवाद में परास्त करने वाले वेदांग मुनि की चर्चा है. इस प्रशस्ति का रचयिता भी इन्हीं वेदांग मुनि के शिष्य आम्र कवि थे. इसमें अन्य व्यक्तियों के नाम भी हैं जो मन्दिर के निर्माणक थे या उससे सम्बन्धित थे. यथा श्रीमार्तण्ड, लैलुक, श्री सधोराशि, श्री विनिश्चित राशि आदि.

Eklingaji Temple Inscription of 1488 AD

एकलिंगजी के मन्दिर की दक्षिणद्वार प्रशस्ति १४८८ ई.

यह प्रशस्ति एकलिंगजी के मन्दिर की दक्षिणद्वार के ताक में उस समय लगाई गई थी, जबकि महाराणा रायमल ने उस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया था. उक्त प्रशस्ति[6] क समय वि.सं. १५४५ चैत्र शुक्ला १० गुरुवार है. (तदानुसार २३ मार्च १४८८ ई.) भाषा संस्कत तथा लिपि नागरी है. इसमें कुल १०१ श्लोक हैं. प्ररम्भ में गणेश, शिव, रुद्र, पशुपति, हर तथा पार्वती की स्तुति की है. बाद में मेदपाट और चित्रकूट की विशेषताओं का वर्णन दिया है. आगे चलकर नागदे के वर्णन के साथ लेखक बापा को द्विज कहकर उसका हारीत द्वारा राज्य अधिकार प्राप्ति की ओर संकेत है. तत्पश्चात बापा का सन्यास लेने का वर्णन है. फ़िर हमीर के द्वारा सिंहलिपुर का, क्षेत्रसिंह द्वारा पन्वडपुर का, लक्ष्मनसिंह द्वारा चीरुवर (चीरवा) का, मोकल द्वारा बंधनवाल (बांधनवाड़ा) तथा रामागांव और कुम्भा द्वारा नगह्रद, कठडावन, मलकखेट, और भीमाण का, और रायमल द्वारा नौवांपुर का श्री एकलिन्गजी के पूजार्थ समर्पण करने का वर्णन है.

इस प्रशस्ति से मालूम होता है की महाराणा लाखा के पास धन-संचय बहुत हो गया था, जिससे इसने एक लाख सुवर्ण मुद्राएँ दान में दी, सुवर्णादी की तुलायें कीं, सूर्यग्रहण में झोटिंग भट्ट को पिप्पली (पीपली) गाँव और धनेश्वर भट्ट को पञ्च-देवला गाँव दिया. रायमल ने भी इसी प्रकार कई ब्राह्मणों और विद्वानों को दान से संतुष्ट किया और विधिक धार्मिक संस्थाओं को अनुदान देकर अपनी धार्मिक सहिष्णुता का परिचय दिया.

इस प्रशस्ति द्वारा हमें मेवाड़ के कुछ शासकों द्वारा सैनिक उपलब्धियों का भी पता लगता है. क्षेत्रसिंह ने मांडलगढ के प्राचीर को तोड़कर उसके भीतर से लड़ने वाले योद्धाओं को मारा, तथा युद्ध में हाड़ों के मंडल को नष्ट कर उनकी भुमि को अपने अधीन किया.

क्षेत्रसिंह ने अमीसारूपी बड़े सांप के गर्वरूपी विष को निर्मूल किया. इससे स्पष्ट होता है कि क्षेत्रसिंह ने मालवा के स्वामी अमीशाह को चित्तौड़ के पास हराया. यह भी वर्णित है कि क्षेत्रसिंह ने ऐल (ईडर) के गढ को जीतकर राजा रणमल्ल को कैद किया, उसका सारा खजाना छीन लिया और उसका राज्य उसके पुत्र को दिया. इसी तरह युवराज की हैसियत से लाखा ने रणक्षेत्र में जोगा दुर्गाधिप को परस्त कर उसके हाथी तथा घोड़े छीन लिये. इसी तरह उसने बहुत-सी सुवर्ण मुद्रायें देकर गया को यवन-कर से मुक्त किया. इस लेख में मोकल को बलवान पक्षवाले शत्रु और लाखॊं को नष्ट करने वाला, बड़े संग्रामों में विजय पाने वाला और दूतों के द्वारा दूर-दूर की खबरें जानने वाला तथा जहाजपुर के युद्ध में हाड़ों को परस्त करने की वाला बतलाया है. महाराणा कुंभा (1433–1468) के सम्बन्ध में बताया गया है कि उसने मालवा के शासक को कुचल दिया और सारंगपुर को नष्ट कर दिया. इस अवसर पर उसने कई स्त्रियों को अपने अंत:पुर में स्थान दिया. रायमल ने भी गयासुद्दीन को चित्तौड़ में परास्त किया और खेराबाद को नष्ट कर वहां से दण्ड इकट्ठा किया. उसने दाडिमपुर के युद्ध में क्षेम को पराजित किया. रायमल (1473–1509) ने रत्नखेट गांव महेश कवि को देकर उसका सम्मन किया तथा गुरु गोपाल भट्ट को प्रहाण और थूर के गांव भेंट किये. नरहरि, झोटिंग, अत्री, महेश्वर आदिका भी वर्णन किया है. वे उस समय के प्रसिद्ध विद्वान थे. थूर गांव के वर्णन में उपज का विवरण दिया है जिसके अनुसार उस समय चावल, दाल और गन्ना प्रमुख हैं.इस प्रशस्ति के सूत्रधार अर्जुन थे जिन्होने यह प्रशस्ति उत्कीर्ण की और एकलिंगजी के जीर्णोद्धर की देखरेख की थी.


  1. James Todd Annals/Introduction, Vol. II. p.xxxvi
  2. James Todd Annals/Introduction, Vol.I, pp. xxxvi-
  3. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.109-110
  4. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.1019
  5. डॉ गोपीनाथ शर्मा: 'राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत', 1983, पृ.65. बंब.ए.सो.ज. जि. 22, पृ.166-67
  6. डॉ गोपीनाथ शर्मा: 'राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत', 1983, पृ.154-56

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