Kuntal

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Kuntal (कुंतल/कुन्तल) Khutail(खुटैल) Khuntel (खुंटेल) Khuntal (खुंतल) Tomar (तोमर/तँवर) Kunthal (कुंथल/कुन्थल)[1] gotra of Jats found in Uttar Pradesh, Rajasthan and Madhya Pradesh. Dilip Singh Ahlawat has mentioned it as one of the ruling Jat clans in Central Asia. [2] They are Chandravanshi Kshatriyas.

Origin

They are said to be descendants of Kunti and Pandu. Kuntibhoja was the tribe in which Kunti was born. [3] Tomar and Kuntal are same gotra . Kuntal is a sub gotra of Tomar Jat. So Kuntal and Tomar gotra people do not have inter marriages. In ancient time they were called Arjunayana.

Ancestry of Kunti or Kuntya

History

Ram Swarup Joon[4] writes that Khontal (Kantal) gotra came into existence during the Vedic period. Kontal was a Royal dynasty. A majority of this gotra is found in the district of Agra. It is also one of the four main gotras of Bharatpur state.


Kuntala (कुन्तल) - In Mahabharata there were two Kuntala countries, one in the north and another in the south. The southern Kuntalas fought with the Kauravas (VI.47.12). [5] The Mahabharata Tribe - Kuntala (कुन्तल) may be identified with Jat Gotra - Kuntal (कुंतल).[6]

B S Dahiya[7] writes: They are mentioned in the Markendeya Purana. Mahabharata also refers to them as in the West. Upendra Thakur quotes authority which mentions the Khuntals alongwith Hunas. [8] D.C. Sarkar mentions in the Puranas as Kuntalas are the present Khuntel Jats. This is amply proved by their association with the Hunas as well as by Muir’s quotations. They are mentioned in the Mahabharata and Sanskrit English Dictionary ( M. Williams) as Kunthaka.

There is mention of Kuntibhoja and Kaunteya people in Mahabharata. Kuntibhoja people are those to whom Kunti was adopted. Kaunteya are the descendants of Pandu and Kunti. The Kaunteya people later became Kuntal and Khuntail over a period of time. Mathura memoirs mention that Kunthal Jats defeated the Kirars ruling over many districts of Mathura. [9]

Kuntala is mentioned in Harsha Charita as a chief officer of cavalry and a great noble high in Rajyavardhana's favour.[10] We, for sure, know from the Harshacharita that "after Rajyavardhana's speech, Harsha takes courage and recollects his ancestors by saying, "have Virkodara and others been forgotten ? - claiming a birth from a heroic line" and after Kuntala chief officer of cavalry and a great noble high in Rajyavardhana's favour, broke the news of the treacherous murder of the latter, to his brother; Harsha; Harsha takes a vow, like Virkodara, athirst for his enemy's blood; to avenge the death of his brother"[11].

Pushkar Singh alias Pakharia has been a great martyr in Khuntail gotra Jats. Pakharia played an important role in breaking the invincible gate of the fort at the time of attack on Delhi by Maharaja Jawahar Singh of Bharatpur. [12]

Sitaram Kunthal constructed a fortress place called Petha near Goverdhan in Mathura area. There is one fortress of Kuntals in Saunor as well. Mathura memoirs have mentioned that Hathi Singh, a Khuntail Jat, occupied Saunkh and reconstructed the fort of Saunkh. This was at the time of Maharaja Suraj Mal. [13]

Faujdar was a title awarded by Muslim rulers to people who had responsibility of protecting some territory. Sogarwar, Chahar, Sinsinwar, Kuntal etc Jat gotra people use this title.

Villages founded by Kuntal clan

कुंतल गोत्र का इतिहास

वंशावली वाले इन्हें भी तोमरों से हुआ मानते हैं ।महाराजा अनंगपाल तोमर के 7 पुत्र के वंशज है कुंतल जाट। इसलिए तोमर और कुंतल एक ही गोत्र है । उनमे आपस में विवाह वर्जित है । इतिहासकारों ने तोमरो को चन्द्रवंशी पांडु पुत्र अर्जुन के वंशज माना है । कुंतल जाट (कुंती पुत्र) मथुरा और भरतपुर में पाये जाते हैं वे कुंती और पांडु के वंशज हैं, तो उन्हें कुंतल बुलाया । तोमर जाटो को आज भी कुंती पुत्र, पार्थ (पृथा पुत्र), कोंतये, पांडव भी कहते है, जो तोमर जाटो के पांडुवंशी होने पर मोहर लगाते हैं ।


तोमर (तंवर) जाट पांडवो के वंशज है । महावीर धनुर्धर अर्जुन कुंती पुत्र होने के कारण ही अर्जुन को कोन्तेय कहते है । इसलिए ही तोमर जाट को मथुरा कोन्तेय कहा जाता था । कोन्तेय शब्द बाद में कुंतल बन गया । तोमर जाट का दिल्ली में राज्य था तो वो लोग मथुरा क्षेत्र में बस गये थे । मथुरा कुंती के वास्तविक पिता शुरसेन थे । कुन्ति-भोज तो वे लोग थे जिनके कुन्ति गोद थी । इसलिए वो पृथा से कुंती कहलाने लगी थी । तोमर जाटो ने अपनी कुल देवी योगमाया (कृष्ण की बहिन) का मंदिर गोपालपुर जाजम पट्टी में बनवाया था । जो मनोकामना पूर्ण करने के कारण ही मनसा देवी कहलाती है । जो आज भी तोमरवंशी कुंतल जाटो की कुल देवी है । यह मंदिर दिल्ली महाराजा गोपाल देव तोमर के समय में बनाया गया था, इसलिए इस जगह का नाम गोपालपुर है । सलकपाल तोमर दिल्ली महाराजा गोपाल देव के पुत्र थे जो 976 ई. में दिल्ली के राजा बने । जिनका दिल्ली पर 25 साल तक राज रहा । बाद में उन्होंने अपने भाई को प्यार वश अपना राज दे दिया, तब जयपाल राजा बना । सलकपाल तोमर ने बागपत जिले में बड़ौत क्षेत्र में तोमर जाटो कि चौरासी की चौधराठ शुरू की । उनके वंशज तोमरो के आज इस क्षेत्र में 300 से ज्यादा गाँव है । उनके वंशजो को आज सालकलान तोमर भी कहा जाता है ।

कुन्तलो के मथुरा में बसने का इतिहास हमें बताता है कि अनंगपाल-तृतीय (अर्कपाल) का दिल्ली से राज्य खत्म हो गया तो अनंगपाल तोमर के सगे परिवार के लोगो ने पृथला (कुंती / पृथा के नाम पर) गाँव पलवल जिले में बसाया जो आज भी है । राजा अनंगपाल के सगे परिवार के लोग फिर मथुरा क्षेत्र में चले गए । कुछ परिवार के लोगो ने कुंतल पट्टी बसाकर, सौख क्षेत्र की खुटेल (कुंतल) पट्टी में महाराजा अनंगपाल की बड़ी मूर्ति स्थापित करवाई जो आज भी देखी जा सकती है । मथुरा में तोमरो के वंशजो को कुंतल (कुंतीपुत्र) कहते है । उसी समय इनके कुछ लोगों ने पलवल के पूर्व दक्षिण में (12 किलोमीटर) दीघोट गांव बसाया । आज इस गांव की आबादी 12000 के लगभग है ।

ठाकुर देशराज लिखते हैं

ठाकुर देशराज लिखते हैं कि महाभारत में कुन्ति-भोज और कौन्तेय लोगों का वर्णन आता है। कुन्ति-भोज तो वे लोग थे जिनके कुन्ति गोद थी। कौन्तेय वे लोग थे, जो पांडु के यहां महारानी कुन्ती के पैदा हुए थे। महाराज पांडु के दो रानी थीं - कुन्ती और माद्री। कुन्ती के पुत्र कौन्तेय और माद्री के माद्रेय नाम से कभी-कभी पुकारे जाते थे। ये कौन्तेय ही कुन्तल और आगे चलकर खूटेल कहलाने लग गए। जिस भांति अपढ़ लोग युधिष्ठिर को जुधिस्ठल पुकारते हैं उसी भांति कुन्तल भी खूटेल पुकारा जाने लगा। बीच में उर्दू भाषा ने कुन्तल को खूटेल बनाने में और भी सुविधा पैदा कर दी। खूटेल अब तक बड़े अभिमान के साथ कहते हैं -

“हम महारानी कौन्ता (कुन्ती) की औलाद के पांडव वंशी क्षत्रिय हैं।”

भाट अथवा वंशावली वाले खूटेला नाम पड़ने का एक विचित्र कारण बताते हैं - “इनका कोई पूर्वज लुटेरे लोगों का संरक्षक व हिस्सेदार था, ऐसे आदमी के लिये खूटेल (केन्द्रीय) कहते हैं।” किन्तु बात गलत है। खूटेल जाट बड़े ही ईमानदार और शान्ति-प्रिय होते हैं।


7. ट्राइब्स एण्ड कास्टस् आफ दी नार्दन प्राविंसेस एण्ड अवध, लेखक डब्ल्यू. क्रुक।
8. सरस्वती। भाग 33, संख्या 3 ।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-559


वंशावली वाले इन्हें भी तोमरों में से मानते हैं ‘मथुरा सेमायर्स’ पढ़ने से पता चलता है कि हाथीसिंह नामक जाट (खूटेल) ने सोंख पर अपना अधिपत्य जमाया था और फिर से सोंख के दुर्ग का निर्माण कराया था। हाथीसिंह महाराजा सूरजमल जी का समकालीन था। सोंख का किला बहुत पुराना है। राजा अनंगपाल के समय में इसे बसाया गया था। गुसाई लोग शंखासुर का बसाया हुआ मानते हैं। मि. ग्राउस लिखते हैं -

"जाट शासन-काल में (सोंख) स्थानीय विभाग का सर्वप्रधान नगर था।1 राजा हाथीसिंह के वंश में कई पीढ़ी पीछे प्रह्लाद नाम का व्यक्ति हुआ। उसके समय तक इन लोगों के हाथ से बहुत-सा प्रान्त निकल गया था। उसके पांच पुत्र थे - (1) आसा, (2) आजल, (3) पूरन, (4) तसिया, (5) सहजना। इन्होंने अपनी भूमि को जो दस-बारह मील के क्षेत्रफल से अधिक न रह गई थी आपस में बांट लिया और अपने-अपने नाम से अलग-अलग गांव बसाये। सहजना गांव में कई छतरियां बनी हुई हैं। तीन दीवालें अब तक खड़ी हैं ।

मि. ग्राउस आगे लिखते हैं -

"इससे सिद्ध होता है कि जाट पूर्ण वैभवशाली और धनसम्पन्न थे। जाट-शासन-काल में मथुरा पांच भागों में बटा हुआ था - अडींग, सोसा, सांख, फरह और गोवर्धन2

‘मथुरा मेमायर्स’ के पढ़ने से यह भी पता चलता है कि मथुरा जिले के अनेक स्थानों पर किरारों का अधिकार था। उनसे जाटों ने युद्ध द्वारा उन स्थानों को अधिकार में किया। खूंटेला जाटों में पुष्करसिंह अथवा पाखरिया नाम का एक बड़ा प्रसिद्ध शहीद हुआ है। कहते हैं, जिस समय महाराज जवाहरसिंह देहली पर चढ़कर गये थे अष्टधाती दरवाजे की पैनी सलाखों से वह इसलिये चिपट गया था कि हाथी धक्का देने से कांपते थे। पाखरिया का बलिदान और महाराज जवाहरसिंह की विजय का घनिष्ट सम्बन्ध है।

अडींग के किले पर महाराज सूरजमल से कुछ ही पहले फौंदासिंह नाम का कुन्तल सरदार राज करता था। उसने सिनसिनवारों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। कहा जाता है कि खेमकरन सोगर नरेश को फौंदासिंह ने ही जहर दिया था।


1. मथुरा मेमायर्स, पृ. 379 । आजकल सोंख पांच पट्टियों में बंटा हुआ है - लोरिया, नेनूं, सींगा, एमल और सोंख। यह विभाजन गुलाबसिंह ने किया था।
2. मथुरा मेमायर्स, पृ. 376 ।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-560


पेंठा नामक स्थान में जो कि गोवर्धन के पास है, सीताराम (कुन्तल) ने गढ़ निर्माण कराया था। कुन्तलों का एक किला सोनोट में भी था।

कुन्तल (खूंटेल) सिनसिनवारसोगरवारों की भांति डूंग कहलाते हैं। लोग डूंक शब्द से बड़े भ्रम पड़ते हैं। स्वयं डूंग कहलाने वाले भी नहीं बता सकते कि हम डूंग क्यों कहलाते हैं? वास्तव में बात यह है कि डूंग का अर्थ पहाड़ होता है। पंजाब में ‘जदू का डूंग’ है। यह वही पहाड़ है जिसमें यादव लोग, कुछ पाण्डव लोगों के साथ, यादव-विध्वंश के बाद जाकर बसे थे। बादशाहों की ओर से खूंटेल सरदारों को भी फौजदार (हाकिम-परगना) का खिताब मिला था।

फौजदार उपाधि

फौजदार - यह उपाधि मुगल शासनकाल में उन शाही उच्च अधिकारियों को दी जाती थी जो कई परगनों या प्रान्त की शासन व्यवस्था करते थे। जाटों को यह उपाधि भरतपुर नरेश महाराजा सूरजमल ने देनी आरम्भ की थी। प्राचीन राजवंशज जाट जो महाराजा की सेना में बड़ी संख्या में भरती थे, उनको महाराजा सूरजमल ने यह फौजदार की उपाधि प्रदान की थी। भरतपुर के सभी सिनसिनवार गोत्र के जाट, अलीगढ, मथुरा के खूंटेल (कुन्तल), डागुर, चाहर, गंड और भगौर गोत्रों के जाट फौजदार कहलाते हैं।[14]

कुन्तल-खूंटेल: दलीप सिंह अहलावत

दलीप सिंह अहलावत[15] के अनुसार महाभारतकाल में इस कुन्तल जाटवंश के दो जनपद थे। (भीष्मपर्व, अध्याय 9)। एक कुन्तल जनपद मध्य देश में और दूसरा दक्षिण देश में था। तुंगभद्रा नदी के उत्तर में वर्तमान दक्षिणी महाराष्ट्र1 और वर्तमान वृज का मथुरा जिला कुन्तल जनपद भूमि कही जाती थी।


1. दक्षिण भारत में कुन्तल जाटों का राज्य तुंगभद्रा नदी के क्षेत्र पर था। जनबार गोत्र के जाट राजा कुलोत्तुंग ने कुन्तल राजा को हराकर और पांड्य (जाट गोत्र) नरेश का वध करके तुंगभद्रा नदी के साथ-साथ विशाल भूमि पर अपना राज्य स्थापित किया जो कि सन् 1118 ई० तक विद्यमान रहा (जाटों का उत्कर्ष पृ० 330, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-297


महाभारत युद्ध में कुन्तल नरेश एवं उनके वीर सैनिक दुर्योधन की ओर होकर लड़े थे (भीष्मपर्व)। भाषा भेद से कुन्तल को खूंटेल भी कहते हैं। मथुरा में इन कुन्तल-खूंटेल जाटों के 282 गांव बसे हुए हैं। इस भूभाग पर इनकी स्वतन्त्र प्रजातन्त्री सत्ता थी। मि० ग्राऊस साहब ने ‘मथुरा मेमायर्स’ के पृ० 379 पर लिखा है कि “सौंख कुन्तलों के शासन का प्रधान केन्द्र था और हाथीसिंह कुन्तल यहां का शासक था।” आगे ये लेखक लिखते हैं कि “जाट पूर्ण वैभवशाली और धनसम्पन्न थे। मथुरा जिले के अनेक स्थानों पर किरारों का अधिकार था। उनसे जाटों ने युद्ध करके उन स्थानों को अपने अधिकार में किया।” मथुरा मेमायर्स, पृ० 376 पर लिखा है कि “जाट शासनकाल में मथुरा पांच भागों में बंटा हुआ था – अडींग, सोंसा, सौंख, फरह और गोवर्धन।”

सौंख का किला बहुत पुराना है जिसका निर्माण राजा अनंगपाल ने कराया था। कुछ विद्वानों के मतानुसार यह दुर्ग शंख ऋषि ने और कुछ के मतानुसार शंखासुर ने बनवाया था। राजा हाथीसिंह ने इस दुर्ग को सुदृढ़ बनाया। हाथीसिंह महाराजा सूरजमल के समकालीन थे। अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणकाल में इस किले पर हाथीसिंह का ही अधिकार था। हाथीसिंह के वंश में कई पीढ़ी बाद प्रह्लाद नाम का व्यक्ति हुआ। उसके पांच पुत्र थे - 1. आसा 2. आजल 3. पूरन 4. तसिरा 5. सहजना। ये केवल 12 वर्गमील के शासक रह गये। जिन्होंने आपस में बंटवारा करके अपने-अपने नाम से अलग-अलग गांव बसाए।

खूंटेल जाटों में पुष्करसिंह अथवा पाखरिया नाम का एक बड़ा प्रसिद्ध शहीद हुआ है। यह वीर योद्धा महाराजा जवाहरसिंह की दिल्ली विजय में साथ था। यह लालकिले के द्वार की लोहे की सलाखें पकड़कर इसलिए झूल गया था क्योंकी सलाखों की नोकों पर टकराने से हाथी चिंघाड़ मार कर दूर भागते थे। उस वीर मे इस अनुपम बलिदान से ही अन्दर की अर्गला टूट गई और अष्टधाती कपाट खुल गये। देहली विजय में भारी श्रेय इसी वीर को दिया गया है। इस पर भारतवर्ष के खूंटेल तथा जाट जाति आज भी गर्व करते हैं। अडीग के किले पर महाराजा सूरजमल के शासनकाल से कुछ ही पहले कुन्तलवंशज जाट फौदासिंह का शासन था। उसने सिनसिनवारों (जाटवंश) की अधीनता स्वीकार कर ली थी। कहा जाता है कि इस फौदासिंह ने ही प्रचण्ड वीर खेमकरन सौगढ़िया नरेश को जहर खिलाकर मरवा दिया था। इस तरह से फौदासिंह भरतपुर नरेश महाराजा सूरजमल का शासन स्थिर करने में अन्यतम सहायक रहा। मुगल शासन की ओर से इस कुन्तल (खूंटेल) वंश के प्रत्येक व्यक्ति के लिए उनमें व्यापक सैनिकवृत्ति के कारण ‘फौजदार’ (हाकिम-परगना) की उपाधि प्रदान की गई थी जो आज भी पारस्परिक व्यवहार में आती है। (जाट इतिहास पृ० 556-557, लेखक ठा० देशराज; पृ० 312-313, लेखक कविराज योगेन्द्रपाल शास्त्री)।

Jat clans linked with Kushan

डॉ धर्मचंद विद्यालंकार [16] लिखते हैं कि कुषाणों का साम्राज्य मध्य-एशिया स्थित काश्गर-खोतान, चीनी, तुर्किस्तान (सिकियांग प्रान्त) से लेकर रूस में ताशकंद और समरकंद-बुखारा से लेकर भारत के कपिशा और काम्बोज से लेकर बैक्ट्रिया से पेशावर औए मद्र (स्यालकोट) से मथुरा और बनारस तक फैला हुआ था. उस समय मथुरा का कुषाण क्षत्रप हगमाश था. जिसके वंशज हगा या अग्रे जाट लोग, जो कि कभी चीन की हूगाँ नदी तट से चलकर इधर आये थे, आज तक मथुरा और हाथरस जिलों में आबाद हैं. आज भी हाथरस या महामाया नगर की सादाबाद तहसील में इनके 80 गाँव आबाद हैं. (पृ.19 )

कुषाणों अथवा युचियों से रक्त सम्बन्ध रखने वाले ब्रज के जाटों में आज तक हगा (अग्रे), चाहर, सिनसिनवार, कुंतल, गांधरे (गांधार) और सिकरवार जैसे गोत्र मौजूद हैं. मथुरा मेमोयर्स के लेखक कुक साहब ने लिखा है कि मथुरा जिले के कुछ जाटों ने अपना निकास गढ़-गजनी या रावलपिंडी से बताया है. कुषाण साम्राज्य के अधिकांश क्षेत्र में जाटों की सघन जन संख्या उनको कुषाण वंसज होना सिद्ध करती है.(पृ.20)

Distribution in Rajasthan

Kuntal Khap has 38 villages in Bharatpur district. [17]"

Villages in Bharatpur district

Abhaurra, Ajan, Bharatpur, Burawai, Gunsara , Jatoli Rathman, Jharkai, Nagla Chaudhary, Nagla Khoontela, Rupbas, Takha,

Villages in Sawai Madhopur district

Banjaria,

Villages in Karauli district

Kurgaon

Villages in Alwar district

Kheri, Mundawar,

Distribution in Uttar Pradesh

Kuntal Khap has 110 villages in Mathura district. [18]

Villages in Mathura district

Bachgaon, Bandpura, Beroo, Borpa, Dhana Teja, Farah, Govardhan, Gulal, Jatauli, Magora, Nagla Bhuria, Nagla Shishram (Mathura) Pentha, Sabla, Sera, Son, Sonkh, Sonot,

Villages in Hathras district

Khaunda,

Villages in Muzaffarnagar district

Muzaffarnagar,

Villages in Agra district

Tikari (1),

Notable persons from this gotra

See also

References

  1. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. क-48
  2. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter IV, p.342
  3. Mahendra Singh Arya et al.: Adhunik Jat Itihas, Agra 1998, p. 228
  4. Ram Swarup Joon: History of the Jats/Chapter V,p. 90
  5. पौण्ड्रकॊ वासुथेवश च वङ्गः कालिङ्गकस तदा ।आकर्षः कुन्तलश चैव वानवास्यान्ध्रकास तदा (II.31.11)
  6. Mahendra Singh Arya et al.: Adhunik Jat Itihas, Agra 1998, p. 228
  7. Jats the Ancient Rulers (A clan study)/Jat Clan in India,p. 283
  8. The Hunas in India , p. 55 note 2
  9. Thakur Deshraj Jat Itihas, 1934, p. 559
  10. The Harsha Charita of Bana/Chapter VI
  11. The Jats:Their Origin, Antiquity and Migrations/An Historico-Somatometrical study bearing on the origin of the Jats,p.135
  12. Kishori Lal Faujdar: Uttar Pradesh ke Madhyakalin Jatvans avam Rajya, Jat Samaj, Agra, April 1999.
  13. Kishori Lal Faujdar: Uttar Pradesh ke Madhyakalin Jatvans avam Rajya, Jat Samaj, Agra, April 1999.
  14. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter II, p-85
  15. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.297-298
  16. Jat Samaj:11/2013,pp 19-20
  17. Jat Bandhu, Agra, April 1991
  18. Jat Bandhu, Agra, April 1991

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