Koh-i-Noor

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Author: Dayanand Deswal दयानन्द देसवाल
Koh-i-Noor diamond

The Koh-i-Noor (Persian for Mountain of Light; also spelled Kohinoor and Koh-i-nur) is a large, colourless diamond that was found near Guntur in Andhra Pradesh, India, possibly in the 13th century. It weighed 793 carats (158.6 g) uncut and was first owned by the Kakatiya dynasty. The stone changed hands several times between various feuding factions in South Asia over the next few hundred years, before ending up in the possession of Queen Victoria after the British conquest of the Punjab in 1849.

Brief history

It is widely believed that Kohinoor came from the Kollur Mine in the Guntur District of present-day Andhra Pradesh state, during the reign of Kakatiya dynasty in the 13th century in the Bhadrakali Temple. It is however impossible to know where it was found. In the early 14th century, Alauddin Khilji, second ruler of the Khalji dynasty of the Delhi Sultanate, and his army began looting the kingdoms of southern India. Malik Kafur, Khilji's general, made a successful raid on Warangal in 1310, when he possibly acquired the diamond.

After that, it kept on routing from one ruling dynasty to another, till the times of Muhammad Shah Rangeela, when in 1739, Delhi was raided by Iranian invader, Nadershaw who snatched it from Muhammad Shah.

After the assassination of Nader Shah in 1747 and the collapse of his empire, the stone came into the hands of one of his generals, Ahmad Shah Durrani, who later became the Emir of Afghanistan. One of Ahmed's descendants, Shah Shujah Durrani, wore a bracelet containing the Koh-i-Noor on the occasion of Mountstuart Elphinstone's visit to Peshawar in 1808.

Ultimately, Kohinoor was in the possession of Maharaja Ranjit Singh. After the death of Maharaja Ranjit Singh in 1839, and the annexation of Punjab by Britishers, the Koh-i-Noor diamond came into their possession[1] and today, it lies in a secure museum at London.

Ownership dispute

The Government of India, believing the gem was rightfully theirs, first demanded the return of the Koh-i-Noor as soon as independence was granted in 1947. A second request followed in 1953, the year of the coronation of Queen Elizabeth II. Each time, the British government rejected the claims, saying that ownership was non-negotiable.

Even Pakistan and Afghanistan have claimed that Kohinoor was their property!

In July 2010, while visiting India, David Cameron, the Prime Minister of the United Kingdom, said of returning the diamond, "If you say yes to one, you suddenly find the British Museum would be empty. I am afraid to say, it is going to have to stay put". On a subsequent visit in February 2013, he said, "They're not having that back".

कोहिनूर का इतिहास

हीरे, जवाहरात, मोती, विभिन्न नग आदि में कोहिनूर हीरे का इतिहास बहुत ही पुराना है. इसका इतिहास लगभग 5000 वर्ष पुराना है. कोहिनूर कई देश का सफर करते हुए कई राजा महाराजाओं के हाथों से होते हुए अंततः वर्तमान में लंदन के टावर में सुरक्षित रखा गया है.

  • हीरे का इतिहास बहुत पुराना है. लगभग 5000 वर्ष पहले संस्कृत भाषा में सबसे पहले हीरे का उल्लेख किया गया. इसे स्यामंतक के नाम से जाना गया. यहाँ गौर करने बात यह है कि स्यामंतक को कोहिनूर से अलग माना जाता था. सबसे पहले 13वीं शताब्दी में सन् 1304 में यह मालवा के राजा की निगरानी में सबसे प्राचीनतम हीरा था.
  • फिर 1339 में इस हीरे को समरकन्द के नगर में लगभग 300 वर्ष तक रखा गया. इस समय कुछ वर्षों तक हिन्दी साहित्य में हीरे को लेकर एक बहुत ही रोचक और अंधविश्वास से भरा हुआ कथन प्रचलित था. इसके अनुसार जो भी पुरुष इस हीरे को पहनेगा उसे श्राप लगेगा एवं वह कई दोषों से घिर जाएगा. इस श्राप के अनुसार हीरे को पहनने वाले व्यक्ति को सभी प्रकार की बदकिस्मती के लिए जाना जाएगा. इसे केवल कोई औरत या भगवान ही पहन सकते हैं, जो इसके सभी दोषों से दूर रह सकेंगे.
  • कोहिनूर कई मुग़ल शासकों के अधीन रहा. 14वीं शताब्दी में दिल्ली के शासक, अलाउद्दीन खिलजी की पहुँच में यह हीरा रहा.
  • इसके बाद 1526 में मुग़ल शासक बाबर ने अपने लेख बाबरनामा में हीरे का उल्लेख करते हुए बताया, कि उन्हें यह हीरा सुल्तान इब्राहीम लोधी ने भेंट किया. उन्होने इसे “बाबर का हीरा” बताया.
  • बाबर के वंशज, औरंगजेब तथा हुमायूँ ने राज्य के इस अमूल्य हीरे की सौगात की सुरक्षा करते हुए इसे अपने वंशज महमद (औरंगजेब का पोता) को सौंपा. औरंगजेब इसे लाहौर की बादशाही मस्जिद में ले आया. सुल्तान महमद बहुत ही निडर एवं कुशल शासक था. उसने कई राज्यों को अपने अधीन कर लिए थे.
  • इसके बाद 1739 में फारस के राजा नादिर शाह भारत आए. वे सुल्तान महमद के राज्य पर शासन करना चाहते थे. आखिरकार उन्होने सुल्तान महमद को हरा दिया और सुल्तान तथा उनके राज्य की धरोहरों को उनके अधीन कर लिया. तब नादिर शाह ने ही राज्य के बेशकीमती हीरे को “कोहिनूर” का नाम दिया. इस हीरे को उन्होने कई सालों तक परसिया में अपनी कैद में रखा.
  • कोहिनूर को देखने के लिए नादिर शाह लंबे समय तक जीवित नहीं रह सके. 1747 में राजनीतिक लड़ाई के चलते नादिर शाह की हत्या कर दी गयी और इस बेशकीमती कोहिनूर को जनरल अहमद शाह दुर्रानी ने अपने कब्जे में ले लिया.
  • फिर अहमद शाह दुर्रानी के वंशज शाह शुजा दुर्रानी कोहिनूर को 1813 में वापस भारत ले कर आए. इसे उन्होने अपने हाथ के कड़े में जड़वा कर कई दिनों तक पहना रखा. फिर आखिर में शुजा दुर्रानी ने कोहिनूर को सिक्ख समुदाय के संस्थापक राजा रंजीत सिंह को सौंप दिया. इस बेशकीमती तोहफे के बदले में राजा रंजीत सिंह ने शाह शुजा दुर्रानी को अफ़ग़ानिस्तान से लड़ने एवं राजगद्दी वापस लाने में मदद की.
  • महाराज रंजीत सिंह के एक प्रिय घोड़े का नाम भी कोहिनूर था. राजा रंजीत सिंह ने अपनी वसीयत में कोहिनूर हीरे को उनकी मृत्यु के बाद जगन्नाथपूरी (उड़ीसा) के मंदिर में देने की बात कही, परंतु ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनकी वसीयत नहीं मानी.
  • महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु 1839 में हो गई। उनके बाद, 29 मार्च 1849 को द्वितीय एंग्लो-सिक्ख युद्ध की समाप्ति पर ब्रिटिश सेना ने महाराजा रणजीत सिंह के उत्तराधिकारियों को हरा दिया था और राजा रणजीत सिंह की सभी संपत्ति तथा राज्य पर कब्जा कर लिया. ब्रिटिश सरकार ने लाहौर की संधि लागू करते हुए कोहिनूर को ब्रिटिश (इंग्लैंड) की महारानी विक्टोरिया को सौंपने की बात कही.

कोहिनूर हीरा कहाँ है?

कोहिनूर कई देशों का सफर करते हुए कई राजा महाराजाओं के हाथों से होते हुए अंततः वर्तमान में लंदन के टावर में सुरक्षित रखा गया है.

कोहिनूर हीरे की कीमत

बाबर ने ही हीरे का मूल्य बताते हुए कहा कि यह सबसे बेशकीमती एवं महंगा रत्न है, जिसकी कीमत पूरी दुनिया की एक दिन की आय के आधे मूल्य के लगभग है.

ब्रिटिश इंडिया कंपनी द्वारा कोहिनूर को रखना

  • कोहिनूर हीरा भारत में राजा रंजीत सिंह की निगरानी में कई दिनों तक सुरक्षित रहा. परंतु 1849 में ब्रिटिश फोर्स द्वारा पंजाब जीतने पर सिक्ख शासक रंजीत सिंह की सारी संपत्ति को ब्रिटिश सरकार ने अपने कब्जे में कर लिया. इसके बाद बेशकीमती कोहिनूर को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनके खजाने में रख लिया तथा बाकी सिक्ख शासक की संपत्ति को लड़ाई के मुआवजे के तौर पर रख लिया गया.
  • फिर इस कोहिनूर को जहाजी यात्रा से ब्रिटेन लाया गया. ऐसा माना जाता है कि कोहिनूर को ले जाते वक़्त इसकी देख रेख एवं सुरक्षा करने वाले के हाथों यह बेशकीमती हीरा घूम गया, परंतु कुछ ही दिनों बाद उसके नौकर द्वारा कोहिनूर लौटाए जाने का वाक्या प्रचलित है. अंततः जुलाई 1850 में इस बेशकीमती, जगमगाते हुए हीरे को इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के अधीन सौंप दिया गया.

कोहिनूर को कटवाना

  • महारानी विक्टोरिया के अधीन इस कोहिनूर को क्रिस्टल पैलेस (Crystal Palace) में प्रदर्शिनी के लिए रखा गया. इस समय इसका वजन 186 केरेट था. लेकिन यह प्रकाश का पर्वत उस समय उतना प्रभावी तथा जगमगाता हुआ नहीं दिखा. लोगों को यह देख कर

काफी निराशा हुई. खासकर महारानी विक्टोरिया के पति प्रिंस अल्बर्ट (Prince Albert) हीरे की चमक देख कर अधिक निराश हुए. इसलिए महारानी ने इसे फिर से नया स्वरूप देने का निश्चय किया.

  • 1852 में इसे डच के जौहरी मिस्टर केंटर (Mr. Cantor) को दिया गया, जिसने इसे काट कर 105.6 केरेट का कर दिया. इसे काट कर ओवल शेप में 3.6cm x 3.2cm x 1.3cm की साइज़ का बनाया गया. इसके पहले इसे कभी नहीं काटा गया.

महारानी विक्टोरिया की वसीयत

  • महारानी विक्टोरिया इसे किसी सुअवसर पर या किसी खास मौके पर ही पहनती थी. उन्होंने अपनी वसीयत में कोहिनूर के उत्तराधिकारी के बारे में लिखा है, कि “कोहिनूर को केवल महारानियों द्वारा ही पहना जाना चाहिए”. “अगर किसी समय कोई पुरुष राज्य का शासक बनता है तो, उसकी पत्नी को कोहिनूर पहनने का अधिकार होगा”.
  • महारानी विक्टोरिया की मृत्यु के बाद कोहिनूर को महारानी के ताज में जड़ दिया गया. यह ताज के ब्रिटेन की महारानियों द्वारा पहना जाता है. इसका वजन लगभग 106 केरेट है. कोहिनूर इंग्लैंड के राजसी परिवार में महारानी के ताज में लगभग 2000 हीरों के साथ जड़ा गया है.
  • इस ताज को लंदन के टावर में रखा गया है. इसे देखने कई लोग दूर-दूर से आते हैं. यह राजसी परिवार की अमूल्य धरोहर है.
  • इसे महारानी विक्टोरिया के बाद महारानी एलेक्सजेंडर (एडवर्ड VII की पत्नी), उसके बाद महारानी मेरी तथा एलीज़ाबेथ द्वारा पहना गया.

कोहिनूर पर बवाल

कोहिनूर पर कई देश अपना हक बताते हैं. भारत कहता है कि कोहिनूर भारत की सम्पदा है, जिसे अंग्रेजों ने गलत तरीके से लूट लिया, वहीं ब्रिटिश सरकार कहती है कि कोहिनूर को रंजीत सिंह ने लाहौर शांति संधि के दौरान अंग्रेजों को तोहफे में दिया. कोहिनूर पर कई बार कई सवाल उठे.

1947 में भारत की आजादी के बाद से ही भारत ने कोहिनूर को वापस लाने की कवायद शुरू कर दी. इसके बाद 1953 में महारानी एलीज़ाबेथ द्वितीय के राजतिलक दौरान भी भारत द्वारा कोहिनूर की मांग की गयी, परंतु हर बार ब्रिटिश सरकार कोहिनूर पर ब्रिटिश हक़ बताकर भारत की सभी दलील ख़ारिज करती जाती है.

कोहिनूर पर हक़ के लिए भारत के साथ साथ पाकिस्तान भी सूची में शामिल है. 1976 में पाकिस्तान ने कोहिनूर पर अपना हक़ बताते हुए ब्रिटिश सरकार से कोहिनूर, पाकिस्तान को लौटाने की बात कही. इसके जवाब में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री जेम्स केलेघन ने तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ज़ुल्फिकार अली भुट्टो को खत लिखा की “कोहिनूर को 1849 में लाहौर की शांति संधि के तहत महाराजा रंजीत सिंह ने ब्रिटिश सरकार को दिया है. और इसलिए ब्रिटिश महारानी कोहिनूर को पाकिस्तान को नहीं सौंप सकती”.

इसके बाद सन 2000 में भी कई बार भारतीय सदन ने कोहिनूर पर भारतीय दावा करते हुए ब्रिटिश सरकार पर आरोप लगाया, कि कोहिनूर को ब्रिटिश सरकार ने अनैतिक रूप से प्राप्त किया है.

भारत के साथ साथ तालिबान के विदेशी मुद्दे के प्रवक्ता, फैज अहमद फैज ने कहा कि कोहिनूर अफ़ग़ानिस्तान की संपत्ति है,और इसे जल्द से जल्द अफ़ग़ानिस्तान को सौंपा जाना चाहिए. उन्होने कहा कि इतिहास बताता है कि कोहिनूर अफ़ग़ानिस्तान से भारत गया और फिर भारत से ब्रिटेन. इसलिए अफ़ग़ानिस्तान कोहिनूर का प्रबल दावेदार है.

कोहिनूर को लौटाने के जवाब में जुलाई 2010 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड केमरून ने कहा कि “अगर ब्रिटिश सरकार प्रत्येक देश के दावे को सही मानते हुए अमूल्य रत्न एवं वस्तुएँ लौटाती है, तो कुछ ही समय में ब्रिटिश संग्रहालय अमूल्य धरोहर से खाली हो जाएगा.” फरवरी 2013 में भारतीय दौरे पर उन्होने कोहिनूर को लौटाने से साफ इंकार कर दिया.

हाल ही में अप्रैल 2016 में भारत की ओर से ब्रिटेन पर कोहिनूर लौटने की याचिका दायर की गई. इस पर भारतीय संस्कृति मंत्री श्री महेश शर्मा ने कहा है कि “कोहिनूर के मुद्दे को जल्द से जल्द हल किया जाएगा”. कोहिनूर को लेकर भारत के कुछ लोगों का मानना है कि कोहिनूर को भारत सरकार ने ही ब्रिटिश राज्य (United Kingdom) को तोहफे स्वरूप भेंट किया गया. सुप्रीम कोर्ट में कोहिनूर पर याचिका के दौरान भारतीय वकील ने कहा कि ब्रिटिश सरकार ने रंजीत सिंह से जबरदस्ती कोहिनूर नहीं छिना है, बल्कि रंजीत सिंह ने स्वेच्छा से युद्ध के मुआवज़े के तौर पर ब्रिटिश सरकार को कोहिनूर भेंट किया था.

कोहिनूर मुद्दा अभी भी काफी चर्चे में है. एक और जहाँ भारत उसे वापिस लाने की कवायद कर रहा है, वहीं ब्रिटिश सरकार भी इसे नहीं लौटाने की जिद पर अड़ी है. दोनों ही देश की सरकारें सही फैसले के लिए हल ढूंढ रही हैं।

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References