Ram Dan Dookiya

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लेखक:लक्ष्मण बुरड़क, IFS (R)
चौधरी रामदान डऊकिया

Chaudhary Ramdan Dookiya (चौधरी रामदान डऊकिया) (15.3.1884 - 24.10.1963) was a great social reformer, an educationist, friend and well wisher of farmers. He was an instrument of change in the farmers of Marwar region in Rajasthan. He was from village Kharin (खड़ीन), 30 km west of Barmer in Barmer district. He was born on 15 March 1884 in farmer family of Malani. [1] He died on 24 October 1963.

रामदानजी का जीवन परिचय

वर्तमान बाड़मेर जिले के पश्चिमी भाग को मालानी परगना के नाम से जाना जाता है. यह आजादी पूर्व जोधपुर रियासत का सीमान्त परगना था. इस क्षेत्र के पश्चिम में पाकिस्तान के सिंध प्रान्त की सीमा लगती थी. आजादी पूर्व मालानी का फैलाव जसोल से सिंध तक 100 मील लम्बा और 75 मील चौड़ा था. इस परगना में 503 गाँव थे. [2]

सन 1836 में जाटों का एक काफिला मालानी क्षेत्र में आकर रुका. इनमें एक परिवार तेजाजी डऊकिया का भी था. ये सन 1830 में बाड़मेर से 30 की.मी. दक्षिण-पूर्व में स्थित सरली गाँव में बस गए. तेजाजी के पूर्वज नागौर के 'पिरोजपुरा' गाँव के मूल निवासी थे. परन्तु कालांतर में झंवर और आगोलाई में बस गए थे और आगोलाई से ही प्रस्थान कर तेजाजी ने 'सरली' को अपनी कर्म स्थली बनाया. [3]

चौधरी रामदानजी का जन्म चैत बदी 3 संवत 1940 तदनुसार 15 मार्च 1884 को सरली नामक गाँव में चौधरी तेजारामजी के यहाँ हुआ था. [4] [5]आपका गोत्र डऊकिया तथा नख तंवर था. आपकी माताजी का नाम श्रीमती दौली देवी था. आप भाई बहीनों में सबसे छोटे थे. जब आप सात वर्ष के थे तब आपका परिवार 1811में सरली से खड़ीन आ गया. आप जब 13 वर्ष के थे तब आपके पिताजी का देहांत हो गया था. इसके दो वर्ष बाद 1899 में (विक्रम संवत 1956) में मारवाड़ में भयंकर छपनिया अकाल पड़ा तो आपको परिवार के सिंध की और पलायन करना पड़ा.[6] [7]रामदान जी को रेल लाइन बिछाने में काम मिल गया. उसी समय आपके बड़े भाई रूपाजी का देहांत हो गया इसलिए नौकरी छोड़ खड़ीन वापस आना पड़ा. 1900 से 1905 तक आप गाँव में रहकर खेती करते रहे. इस दौरान 1904 में आपकी शादी श्रीमती कस्तूरी देवी भाकर के साथ हो गयी. 15 मार्च 1905 में पुनः आपको रेलवे में ट्रोली-मैन के पद पर रख लिया. 1907 में आपको जमादार के पद पर पदोन्नत किया. 1907 से 1920 तक रेलवे में जमादार के पद पर रहे. इस दौरान आपने स्वतः के प्रयास से पढ़ना लिखना सीख लिया. 1920 में आपको रेल-पथ निरिक्षक के पद पर पदोन्नत कर समदड़ी में लगा दिया. 1923 में आपको जोधपुर में भेजा गया. जोधपुर प्रवास के दौरान आपका परिचय कई प्रबुद्ध जाटों से हुआ. [8]

अक्टूबर 1925 में कार्तिक पूर्णिमा को अखिल भारतीय जाट महासभा का एक अधिवेसन पुष्कर में हुआ था उसमें मारवाड़ के जाटों में जाने वालों में चौधरी गुल्लाराम, चौधरी मूलचंद जी सियाग, मास्टर धारासिंह, चौधरी रामदान जी, भींया राम सिहाग आदि पधारे थे. इस जलसे की अध्यक्षता भरतपुर के तत्कालीन महाराजा श्री किशनसिंह जी ने की. इस समारोह में उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली के अलावा राजस्थान के हर कोने से जाट सम्मिलित हुए थे. इन सभी ने पुष्कर में अन्य जाटों को देखा तो अपनी दशा सुधारने का हौसला लेकर वापिस लौटे. [9]उनका विचार बना कि मारवाड़ में जाटों के पिछड़ने का कारण केवल शिक्षा का आभाव है.[10][11]

कुछ समय बाद चौधरी गुल्लारामजी के रातानाड़ा स्थित मकान पर चौधरी मूलचंद सिहाग नागौर, चौधरी भिंयारामजी सिहाग परबतसर, चौधरी गंगारामजी खिलेरी नागौर, बाबू दूधारामजी और मास्टर धारा सिंह की एक मीटिंग हुई. यह तय किया गया कि किसानों से विद्या प्रसार के लिए अनुरोध किया जाए. तदनुसार 2 मार्च 1927 को 70 जाट सज्जनों की एक बैठक श्री राधाकिसन जी मिर्धा की अध्यक्षता में हुई. इस बैठक में चौधरी गुल्लारामजी ने जाटों की उन्नति का मूलमंत्र दिया कि - "पढो और पढाओ" . साथ ही एक जाट संस्था खोलने के लिए धन की अपील की गयी. यह तय किया गया कि बच्चों को निजी स्कूल खोल कर उनमें भेजने के बजाय सरकारी स्कूलों में भेजा जाय पर उनके लिए ज्यादा से ज्यादा होस्टल खोले जावें. चौधरी गुल्लारामजी ने इस मीटिंग में अपना रातानाडा स्थित मकान एक वर्ष के लिए छात्रावास हेतु देने और बिजली, पानी, रसोइए का एक वर्ष का खर्च उठाने का वायदा किया. इस तरह 4 अप्रेल 1927 को चौधरी गुल्लारामजी के मकान में "जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर" की स्थापना की । [12] [13] इसमें चौधरी रामदानजी का भी पूरा योगदान रहा. आपने न केवल मासिक चन्दा देकर बल्कि रेलवे के अन्य लोगों से भी काफी सहायता दिलवाई. आप लंबे समय तक तन-मन-धन से इस संस्था की सहायता करते रहे. [14]

1930 तक जब जोधपुर के छात्रावास का काम ठीक ढंग से जम गया और जोधपुर सरकार से अनुदान मिलने लग गया तब चौधरी मूलचंद जी, बल्देवराम जी मिर्धा, भींया राम सियाग, गंगाराम जी खिलेरी, धारासिंह एवं अन्य स्थानिय लोगों के सहयोग से बकता सागर तालाब पर 21 अगस्त 1930 को नए छात्रावास की नींव नागौर में डाली । बाद में चौधरी रामदानजी के सहयोग से बाडमेर में व 1935 में चौधरी पूसरामजी पूलोता, डांगावास के महाराजजी कमेडिया, प्रभुजी घतेला, तथा बिर्धरामजी मेहरिया के सहयोग से मेड़ता में छात्रावास स्थापित किया गया. [15] [16] [17] [18]

आपने जाट नेताओं के सहयोग से अनेक छात्रावास खुलवाए । बाडमेर में 1934 में चौधरी रामदानजी डऊकिया की मदद से छात्रावास की आधरसिला राखी । 1935 में मेड़ता छात्रवास खोला । आपने जाट नेताओं के सहयोग से जो छात्रावास खोले उनमें प्रमुख हैं:- सूबेदार पन्नारामजी ढ़ीन्गसरा व किसनाराम जी रोज छोटी खाटू के सहयोग से डीडवाना में, इश्वर रामजी महाराजपुरा के सहयोग से मारोठ में, भींयाराम जी सीहाग के सहयोग से परबतसर में, हेतरामजी के सहयोग से खींवसर में छात्रावास खुलवाए । इन छात्रावासों के अलावा पीपाड़, कुचेरा, लाडनुं, रोल, जायल, अलाय, बीलाडा, रतकुडि़या, आदि स्थानों पर भी छात्रावासों की एक श्रंखला खड़ी कर दी । इस प्रकार मारवाड़ के जाट नेताओं जिसमें चौधरी बल्देवराम मिर्धा, चौधरी गुल्लारामजी, चौधरी मूलचंदजी, चौधरी भींयारामजी, चौधरी रामदानजी बाडमेर आदि प्रमुख थे, ने मारवाड़ में छात्रावासों की एक श्रंखला स्थापित करदी तथा इनके सुचारू संचालन हेतु एक शीर्ष संस्था "किसान शिक्षण संस्थान जोधपुर" स्थापित कर जोधपुर सरकार से मान्यता ले ली, जिसे सरकार से छात्रावासों के संचालन हेतु आर्थिक सहायता प्राप्त होने लगी. [19] [20]इस शिक्षा प्रचार में मारवाड़ के जाटों ने अपने पैरों पर खड़ा होने में राजस्थान के तमाम जाटों को पीछे छोड़ दिया ।[21]

जाट बोर्डिंग हाऊस बाडमेर के संस्थापक

चौधरी रामदानजी का 1929 में जोधपुर से बायतू तथा 1930 में बाड़मेर स्थानान्तरण हो गया. अब आपने बाड़मेर के किसानों पर ध्यान देना शुरू किया. आपने बाडमेर में एक जाटावास बस्ती बसाई और वहीं अपना मकान बनाया. बाड़मेर को अपनी कर्म स्थली बनाते हुए इस एरिया के किसानों से सम्पर्क किया. कुछ बच्चों को लाकर अपने निवास स्थान पर लाकर रखा और पढाना शुरू किया. उस समय बाडमेर में एक मिडिल स्कूल और एक प्राथमिक स्कूल था. बच्चे वहां पढ़ने जाते और रामदानजी के मकान में रहते. यहाँ आपकी पत्नी सबके भोजन की व्यवस्था करती थी. जब बच्चों की संख्या बढ़ने लगी तब अपने पड़ौस के मकान में श्री भीकमचंदजी का मकान किराये पर लिया और वहां 30 जून 1934 को जाट बोर्डिंग हाऊस बाड़मेर की स्थापना की. चौधरी मूलचंदजी नागौर के कर कमलों से इसका उदघाटन हुआ. उस समय 19 छात्रों ने इसमें प्रवेश लिया था.[22][23] [24]

इस संस्था की स्थापना करने के बाद रामदान जी तन-मन-धन से इसकी उन्नति में लग गए. बाड़मेर के आसपास के गाँवों का भ्रमण कर आपने कई और बच्चों को बोर्डिंग में भर्ती करवाया. धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी तो इस छात्रावास का आर्थिक भार भी बढ़ने लगा, तब आपने ग्रामीण एरिया और रेलवे कर्मचारियों से चन्दा एकत्रित कर छात्रावास का खर्चा चलाया. इस कार्य में चौधरी आईदानजी भादू बाड़मेर ने आपका पूरा सहयोग किया. जून 1936 तक इस संस्था में 35 विद्यार्थी हो गए और बाड़मेर में यह संस्था अपने आप में एक अनूठी संस्था बन गयी. 1937 में इस छात्रावास को जोधपुर सरकार से 30 रूपया मासिक अनुदान मिलने लग गया. अब चौधरी रामदानजी इस बोर्डिंग के लिए स्थाई निर्माण करवाने में लग गए. गाँवों में घूम कर तथा रेलवे कर्मचारियों से चंदा एकत्रित कर 1941 तक वर्तमान छात्रावास के आधे भाग का निर्माण पूरा कर लिया. अब किराए के भवन से बोर्डिंग नए भवन में स्थानांतरण करवा दिया. इस हेतु 1942 तथा 1944 में बाड़मेर में किसान सम्मेलन आयोजित किए. इनमें चौधरी बलादेवरामजी मिर्धा, हाकिम गोवर्धनसिंह्जी, चौधरी मूलचंदजी नागौर, चौधरी रामदानजी ने छात्रावास को पूरा करने हेतु चंदे की अपील की. तिलवाड़ा पशु मेले से भी चन्दा एकत्रित किया. इन प्रयासों से छात्रावास का निर्माण 1946 तक पूरा हो गया. [25]

बाडमेर जिला किसान सभा की स्थापना

चौधरी रामदानजी 14 मार्च 1946 को बाड़मेर से रेलवे के प्रथम-रेलपथ-निरीक्षक पद से सेवानिवृत हो गए. इसके बाद आपने पूरा ध्यान समाज सेवा में लगा दिया. अब आपने जाट बोर्डिंग हाऊस बाड़मेर के साथ मारवाड़ किसान सभा का भी काम देखना शुरू कर दिया. किसानों की प्रगती को देखकर मारवाड़ के जागीरदार बोखला गए । उन्होंने किसानों का शोषण बढ़ा दिया और उनके हमले भी तेज हो गए । जाट नेता अब यह सोचने को मजबूर हुए कि उनका एक राजनैतिक संगठन होना चाहिए । सब किसान नेता 22 जून 1941 को जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर में इकट्ठे हुए जिसमें तय किया गया कि 27 जून 1941 को सुमेर स्कूल जोधपुर में मारवाड़ के किसानों की एक सभा बुलाई जाए और उसमें एक संगठन बनाया जाए । तदानुसार उस दिनांक को मारवाड़ किसान सभा की स्थापना की घोषणा की गयी और मंगल सिंह कच्छवाहा को अध्यक्ष तथा बालकिशन को मंत्री नियुक्त किया गया. [26] 1946 में बलदेव रामजी मिर्धा ने मारवाड़ किसान सभा की कार्यकारिणी का पुनर्गठन किया जिसमें श्री नरसिंहजी कच्छवाहा को अध्यक्ष व श्री नाथूरामजी मिर्धा को मंत्री बनाया तथा चौधरी रामदानजी को कार्यकारिणी का सदस्य नियुक्त किया. [27]साथ ही बाड़मेर परगने में भी किसान सभा की एक इकाई का गठन कर श्री रामदानजी को वहां का अध्यक्ष नियुक्त किया. ३ मार्च 1948 को श्री जयनारायणजी व्यास के नेतृत्व में जोधपुर में नयी सरकार बनी जिसमें मारवाड़ किसान सभा की और से श्री नाथूरामजी मिर्धा कृषि मंत्री बने. [28]इस सरकार ने किसानों के हित में 1949 के शुरू में मारवाड़ लैंड रेवेन्यू एक्ट व मारवाड़ टेनेन्सी एक्ट 1949 पारित कर दिए जिसमें लागबाग आदि समाप्त करते हुए किसान को अपनी जमीन का मालिक बना दिया. इन कानूनों के बनते ही श्री रामदान जी मालानी के गाँव-गाँव ढाणी-ढाणी जाकर किसानों को इन कानूनों की जानकारी दी और लागबाग [29] बंद करवाई.[30]

लगबाग बंद होने से जागीरदार तिलमिला गए और अत्याछार बढ़ा दिए. किसान नेताओं पर कातिलाना हमला कर हत्याएं करना शुरू कर दिया. इन घटनाओं में मालानी में 27 लोगों ने प्राण गँवाए. [31]इसे समय में रामदांजी पहाड़ बन कर किसानों के रक्षार्थ सामने आए और किसानों की हर प्रकार से मदद की. आप द्वारा बाड़मेर किसान सभा के अध्यक्ष तथा बाद में विधायक की हैसियत से जो सेवाएं आपने किसानों की करी आज तक भी बाड़मेर के किसान उनको याद कर आपके प्रति श्रद्धानत होते हैं. [32][33] मारवाड़ किसान सभा तथा14 अगस्त 1949 को जयपुर में गठित राजस्थान किसान सभा के अध्यक्ष श्री बलदेव राम जी मिर्धा व अन्य नेताओं के प्रयासों का परिणाम यह हुआ की 1952 के प्रारम्भ में राजस्थान की सरकार ने जागीरदारी प्रथा समाप्त करने का अधिनियम पारित कर दिया. इससे राजस्थान का किसान सदा के लिए जागीरदारी प्रथा से मुक्त हो गया. 1955 में राजस्थान टेनेन्सी एक्ट बन जाने के बाद तो किसान स्वयम अपने जमीन का मालिक बन गया. इस कार्य में श्री बलदेव राम मिर्धा और अन्य जाट नेताओं के साथ श्री रामदान जी का भी महत्वपूर्ण योगदान था. [34] [35]

सामाजिक सेवा

चौधरी रामदानजी मारवाड़ के अन्य जाट नेताओं की तरह किसानों में प्रचलित सामाजिक कुरीतियाँ हटाने के हामी थे. [36][37] आप बाल विवाह, म्रत्यु-भोज, मुकदमेबाजी, अफीम, तम्बाकू, दीन-प्रथा[38] आदि कुरीतियों के विरोधी थे और जीवनभर इनके खिलाफ संघर्ष करते रहे. श्री रामदानजी म्रत्यु-भोज को किसानों का दुश्मन मानते थे. अतः उन्होंने ब्याह-शादियों, किसान-सम्मेलनों. तिलवाडा चैत्री पशु मेला, राजनैतिक-सम्मेलनों आदि सभी अवसरों पर म्रत्यु-भोज को बंद करने का आव्हान करते थे. जब इसमें आपको आशातीत सफलता नहीं मिली तब इसे कानूनन बंद कराने का प्रयास किया. 1957 में जब आप विधायक बने तब आपने मुख्यमंत्री श्री मोहन लाल सुखाडिया जी से आग्रह कर "राजस्थान म्रत्यु-भोज निवारण अधिनियम 1960" विधान सभा में पारित करवाया. इसके परिणाम स्वरूप बाड़मेर में म्रत्यु-भोज में बहुत कमी आई. दीन-प्रथा समाप्त करने के लिए आपने सर्वप्रथम अपने परिवार की लड़कियों का धर्म-विवाह करके किसानों के सामने इस प्रथा के खिलाफ एक उदाहरण प्रस्तुत किया और इस प्रथा को समाप्त करने में सफल रहे. [39] [40]

आप लड़कों की शिक्षा के साथ लड़कियों की शिक्षा के भी हिमायती थे. बाड़मेर इलाके में स्त्री-शिक्षा का प्रचार आपके प्रयत्नों से ही हुआ. आपके प्रयासों का ही परिणाम था की 1953 तक 318 लड़कियाँ मिडिल तक पढ़ने में सफल हुई. आपने किसानों के बच्चों की पढाई के साथ साथ द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बड़ी संख्या में जाट युवकों को सेना में भर्ती करवाया. 1951 से 1955 के बीच राजस्थान में पुलिस प्रशासन का विस्तार हुआ तो बड़ी संख्या में किसानों के बच्चो को पुलिस में नौकरी दिलवाकर किसानों का बड़ा भला किया. [41]

परिवार का उत्थान

जहाँ आपने किसानों के बच्चों की शिक्षा व उनको नौकरियों में लगाने पर ध्यान दिया, उसी तरह अपने परिवार के बच्चों की शिक्षा पर भी विशेष ध्यान रखा. आपके पाँच पुत्र और चार पुत्रियाँ थी और उनको सबको उच्च शिक्षा दिलवाई. उस समय आपका परिवार मारवाड़ में काफी बड़ा और प्रगतिशील था.[42]

  • आपके सबसे बड़े पुत्र श्री केसरीमलजी को ऊंची शिक्षा दिलाने के बाद व्यापार के साथ ही जाट बोर्डिंग हाऊस जोधपुर को संभालने का जिम्मा सौंपा.
  • दूसरे पुत्र लालसिंह को ऍम ऐ, एल एल बी करवाने के बाद जोधपुर में हाकिम के पद पर नियुक्त कराया. जिन्होंने राजस्थान में विभिन्न पदों पर रहकर महत्त्व पूर्ण दायित्व निभाया.
  • तीसरे पुत्र गंगाराम चौधरी को एल एल बी की शिक्षा दिलाकर वकालत में लगाया और समाज सेवा का अवसर दिया. बाद में गंगाराम चौधरी ने राजनीती में आकर राजस्थान के विभिन्न विभागों में मंत्री रहकर जनता की सेवा की.
  • चोथे पुत्र खंगारमलजी तथा
  • पांचवें पुत्र फतहसिंहजी को भी उच्च शिक्षा दिलवाई.

राजनीती के माध्यम से समाज सेवा

1952 के प्रथम आम चुनाव से पहले 1951 के आख़िर में मारवाड़ किसान सभाराजस्थान किसान सभा का कांग्रेस में विलय हो जाने पर चौधरी रामदानजी भी कांग्रेस में सम्मिलित हो गए. [43]1953 में नया पंचायती राज अधिनियम लागू हुआ. आपके प्रयासों से अनेक किसान सरपंच चुने गए. इसके बाद तहसील पंचायत के चुनाव हुए जिसमें 1954 में आप बाड़मेर तहसील पंचायत के सरपंच चुने गए. बाड़मेर में 1953 से 1955 तक हुए भूमि-बंदोबस्त में भी किसानों का आपने व आपके पुत्र श्री गंगारामजी ने बराबर मार्गदर्शन किया. भूमि के वाजिब लगान निर्धारित करवाए. 1957 में द्वितीय आम चुनाव में गुडामालानी विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्यासी के रूप में चुनाव लड़ा और विजयी रहे. 1957 से 1962 तक विधायक रहते बहुत समाज सेवा की. इस दौरान बाड़मेर में डाकू उन्मुलक करवाया तथा जागीर जब्ती क़ानून में जागीरों का अधिग्रहण करवाया. 1959 में गुडामलानी पंचायत समिती के प्रधान पद पर पुत्र गंगारामजी को निर्वाचित करवाया. 1960 में म्रत्यु-भोज निवारण अधिनियम पास करवाकर बाड़मेर के किसानों को बर्बादी से बचाया. 1962 में श्री रामदानजी ने राजनीती से सन्यास ले लिया और अपने उत्तराधिकारी के रूप में श्री गंगारामजी चौधरी को 1962 के तृतीय आम चुनाव में कांग्रेस से गुडामलानी से विधायक जितवाया. बाड़मेर एरिया में आपके द्वारा की गयी सेवा के कारण श्री गंगारामजी बराबर बाड़मेर से चुनाव जीतते रहे तथा राजस्थान सरकार में कई विभागों के मंत्री रहे. [44][45]

रामदानजी के मिशन में सहयोगी

चौधरी रामदानजी के मिशन में सहयोगियों के रूपमें काम करने वालों में प्रमुख थे[46] -

जाट जन सेवक

रियासती भारत के जाट जन सेवक (1949) पुस्तक में ठाकुर देशराज द्वारा चौधरी मूलचंद सिहाग का विवरण पृष्ठ 190-191 पर प्रकाशित किया गया है । ठाकुर देशराज[47] ने लिखा है ....चौधरी रामदीन जी पीडबल्यूआई - [p.190]: आपका डऊकिया और गांव खड़ीन के रहने वाले हैं। हाल में आप बाड़मेर में आबाद हैं और कारोबार करते हैं। आप अभी 55 साल की अवस्था मैं नौकरी से रिटायर हो चुके हैं। आप मालानी परगने में एक जातीय सरदार हैं और कुटुंब के धनी हैं। आपके अंदर जातीय सेवाभाव कूट कूट कर भरा हुआ है। शुरू में जोधपुर बोर्डिंग की संस्था कायम करने में आपका खूब हाथ रहा है।


[p.191]: इस संस्था को कायम करने में चौधरी मूलचंद जी साहब के साथ आपने वह चौधरी भीया राम जी साहब और बलदेव राम जी मिर्धा के साथ तन मन धन से जुट गए। इसके बाद में आपने बाड़मेर बोर्डिंग की नीव डाली जिसमें आपके बड़े पुत्र कुंवर केसरी मल जी बड़ी लग्न से मंत्री पद का कार्य कर रहे हैं। जोधपुर असेंबली के भी आप मेंबर हैं। आप व्यापार का कार्य करते हैं, बड़े सीधे और सच्चे आदमी हैं। दूसरे कुंवर लाली सिंह जी MA. LLB हाकिम है तथा तीसरे कुंवर गंगाराम जी कानून पढ़ रहे हैं। छोटा परिवार पुत्र-पुत्रियों पढ़ाई कर रहे हैं। बाड़मेर बोर्डिंग के आप जन्मदाता हैं. आपका काफी परिवार रेलवे में मुलाजिमान है जिसमें p w i वह जमादारों की काफी संख्या है। आप का खानदान विद्या में बहुत अग्रसर है और कुरीति हटाने के हामी हैं।


देहांत

इस महान शिक्षा प्रेमी, किसानों के हितैषी व समाज सुधारक श्री रामदानजी का 24 अक्टूबर 1963 को देहावसान हो गया. आपका सच्चा स्मारक बाड़मेर का 'किसान छात्रावास' आपकी सारी यादें समेटे हुए आज भी समाज सेवा के लिए खड़ा है. यहाँ आपकी मूर्ती स्थापित है और छात्रावास के मुख्य द्वार से प्रवेश करने वाला हर आदमी मालानी के इस महापुरुष के दर्शन कर अपने को धन्य समझता है.[48]

चौधरी रामदानजी के सही मूल्यांकन के लिए 25 जनवरी 1949 के लोकसुधार जोधपुर के किसान अंक में छपी निम्न पंक्तियाँ उद्धृत करने योग्य हैं [49] [50]-

बाड़मेर के धोरों में, दुनिया की नजर से दूर अती ।

कृषकों को उन्नत करने में, तुम रहते हो वहां चूर जती ।।

जब उनके मन मोर तरसे ।

तुम बादल बन बरसे ।।

सन्दर्भ

  1. Dr Mahendra Singh Arya etc,: Ādhunik Jat Itihas, Agra 1998, p.308
  2. जाट समाज, आगरा, मार्च 2010, पृ. 15
  3. जाट समाज, आगरा, मार्च 2010, पृ.15
  4. ठाकुर देशराज: मारवाड़ का जाट इतिहास, 1954. पेज 185-186
  5. चौधरी गुल्लारामजी स्मृति ग्रन्थ, 1968, पेज 83
  6. महेश कुमार चौधरी:किसान कर्मवीर चौधरी रामदानजी , पेज 38-39
  7. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 118
  8. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 119
  9. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 119
  10. डॉ पेमाराम, मारवाड़ में किसान जागृति के कर्णधार जाट, राष्ट्रीय सेमिनार, "लाइफ एंड हिस्ट्री आफ जाट्स" , दिल्ली 1998
  11. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 105
  12. रिपोर्ट श्री जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर शुरू से 30 जून 1936 तक, पेज 2
  13. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 106
  14. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 119
  15. श्री बल्देवराम मिर्धा, पृ 30
  16. आचार्य गोपालप्रसाद कौशिक, चौधरी मूलचंद जी अभिनन्दन ग्रन्थ, 1976, पेज 149
  17. रिपोर्ट श्री जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर शुरू से 30 जून 1936 तक, पेज 3
  18. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 107
  19. रिपोर्ट श्री जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर शुरू से 30 जून 1936 तक, पेज 38
  20. जोधपुर एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट, 1939, पेज 45
  21. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 107
  22. चौधरी गुल्लारामजी स्मृति ग्रन्थ, 1968, पेज 83
  23. महेश कुमार चौधरी:किसान कर्मवीर चौधरी रामदानजी , पेज 70-72
  24. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 120
  25. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 121
  26. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 109
  27. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 121
  28. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 122
  29. लागबाग के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के कर सम्मिलित हैं. किसान की पैदावार का आधा भाग लगान के रूप में लिया जाता था. लगान के अलावा किसान पर अन्य लागें भी लगा रखी थी जैसे मलबा लाग, धुआं लाग, आंगा लाग, कांसा लाग, नाता लाग, हल लाग आदि
  30. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 122
  31. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 122
  32. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 120
  33. चौधरी गुल्लारामजी स्मृति ग्रन्थ, 1968, पेज 83
  34. Dr Pema Ram: Agrarian Movement in Rajasthan, p. 238
  35. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 122
  36. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 122
  37. ठाकुर देशराज:रियासती भारत के जाट जन सेवक, 1949, पेज 191
  38. विवाह के अवसर पर लड़की के पिता द्वारा लड़के वालों से धन लेना
  39. महेश कुमार चौधरी:किसान कर्मवीर चौधरी रामदानजी , पेज 205-210
  40. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 123
  41. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 124
  42. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 124
  43. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 125
  44. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 126
  45. महेश कुमार चौधरी:किसान कर्मवीर चौधरी रामदानजी , पेज 212-237
  46. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 127
  47. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.190-191
  48. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 126
  49. लोकसुधार जोधपुर, 25 जनवरी 1949
  50. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 127

Translation in English by Dayanand Deswal

Chaudhary Ramdan Dookiya


Ch. Ramdan was born on 15 March 1884 in village ‘Sarli’. He was the youngest child of Ch. Tejaram (father) and Mrs. Dauli Devi (mother). His gotra was ‘Dookiya’ and ‘Nakh’, ‘Tanwar’. When he was 7, his family shifted from village Sarli to Khadeen. When Ramdan was just 13 years old, his father passed away. Two years later (in 1899) there was acute famine in Marwar and his family had to move towards Sindh province, where he got a job for laying of railway tracks. Soon thereafter, his elder brother, Roopaji, died and he had to leave the job and came back to Khadeen where he engaged himself in agriculture in the village. During this time, he was married to Ms. Kasturi Devi Bhakar. On 15 March 1905, he was again appointed to the post of trolley-man in the Railways and in 1907, was promoted to the post of “Jamadar’ where he continued till 1920. During these years, with his own efforts, he became literate. In 1923, he was transferred to Jodhpur where he got opportunity to interact with many intellectual Jat leaders.


In October 1925 (on the last day of ‘Kartik’ month of Indian calendar) a convention of All India Jat Mahasabha was held in Pushkar, where prominent Jat figures of Marwar region, like Ch. Gullaram, Ch. Moolchand Siyag, Master Dhara Singh, Ch. Ramdan and Bhinya Ram Siyag etc, participated. This convention was presided by the then maharaja of Bharatpur, Kishan Singh. There, Jats from the nook and corner of Rajasthan participated, as also from Uttar Pradesh, Delhi, Punjab, and Rajasthan. They realised that the sole cause of backwardness of Jats in Marwar region was the lack of education facilities and they decided to try to ameliorate the situation.


After some time, there was a meeting at the residence of Ch. Gullaram in Ratanada, attended by Ch. Moolchand Siyag and Ch. Gangaram Khileri from Nagaur, Ch. Bhinyaram Siyag from Parbatsar, Babu Doodharam ji and Master Dhara Singh, wherein it was decided to spread awareness among farmers on the importance of education. Afterwards, on 2 March 1927, seventy prominent Jat personalities had a meeting under the chairmanship of Shri Radhakishan Mirdha, where Ch. Gullaram gave a keynote mantra to Jats “Learn to read and write and send your children to Schools”. An appeal was made to donate for establishing a Jat institution. It was decided that rather than opening private schools, children should be sent to government schools and new hostels should be opened. During this meeting, Ch. Gullaram declared donating his house at Ratanada for one year for the purpose of a student hostel and also to bear expenses for electricity, food and the salary of a cook. This way, on 4 April 1927, “Jat Boarding House Jodhpur” was established in the house of Ch. Gullaram. For this noble cause, Ch. Ramdan Dookiya contributed his best by donating monthly alms from his own side and other railway employees. He served this institution for a long time.


By 1930, when this hostel started functioning well and some aid came from Jodhpur government, another student hostel was founded on the banks of Baktasagar pond in Nagaur on 21 August 1930 with the cooperation of Ch. Moolchand, Baldevram Mirdha, Bhinya Ram Siyag, Gangaram Khileri, Dhara Singh and other local people. After some time, with the cooperation of Ch. Ramdan Dookiya, another hostel was established in Barmer and yet one more in Merta in 1935, where the cooperation of Ch. Poosaram Pulota, Maharaj Kamedia of Dangawas, Prabhu Ghatela and Birdharam Mehriya was praiseworthy.


The students’ hotels established by Ch. Ramdan Dookiya with the active cooperation of other Jat leaders are mainly the following (i) in Didwana (with the cooperation of Subedar Pannaram Dhingsara, Kisnaram Roz of Choti Khatu; (ii) in Maroth (with the cooperation of Ishwar Ram of Maharajpura, (iii) in Parbatsar (with the cooperation of Bhinyaram Siyag) and (iv) in Khinwasar (with the cooperation of Hetram ji). Apart from these, a battery of hostels was erected in places like Peepad, Kuchera, Ladnu, Rol, Jayal, Alai, Bilada, Ratkudiya etc. So, these Jat leaders (Ch. Baldev Ram Mirdha, Ch. Gullaram, Ch. Moolchand, Ch. Bhinyaram, Ch. Ramdan Dookiya) established a chain of student hostels in Marwar region. For their smooth running, they established an apex institution called “Kisan Education Society, Jodhpur”, which was recognised by Jodhpur government and started providing annual aid for the smooth running of these hostels. In the spread of education, the Marwar Jats gained a lead and self-sufficiency in the state of Rajasthan.

The founder of Jat Boarding House, Barmer

In 1929, Ch. Ramdan ji was transferred from Jodhpur to Baytu and from there, in 1930, to Barmer where he started concentrating on the living conditions of farmers. He established a Jat colony there and made a house for himself. Using the Barmer city as his base, he started interacting with farmers of the area. He selected some children and himself started schooling them at his own home. In those days, Barmer used to have just one middle school and a primary school. Those children used to go to those schools, while residing in the house of Ramdan ji. Here, his wife used to make arrangements for their daily meals. When the number of children kept on rise, he hired his neighbour Bhikamchand’s house and there, on 30 June 1934, established “Jat Boarding House, Barmer” which was inaugurated by Chaudhari Moolchand Sihag, Nagaur. The first batch comprised just 19 students.


After establishing this institution, Ramdan ji devoted his entire engergies for its progress. He made extensive tour of villages around Barmer and several intelligent students were got admitted into this boarding house. Slowly, the number kept on rising and economic burden rose automatically. Then, he arranged some funds through charity from railway employees and this students’ hostel went off well. Chaudhary Aidan Bhadu of Barmer was the one who gave him full cooperation. By June 1936, with just 35 students, this institution was known as a premier one in the area. In 1937, this students hostel started getting a monthly grant of 30 Rupees from jodhpur government. Then, Ch. Ramdan Dookiya started a project for raising a permanent building for this hostel and collected charity donations from railway employees and villagers. After completion of this project, the students were shifted from the rented house to the new building premises. For this project, farmers’ meetings were organised in Barmer where Ch. Baldev Ram Mirdha, Hakim Govardhan Singh, Ch. Mool Chand Sihag Nagaur and Ch. Ramdan Dookiya made appeals for cash donations. Some donations were also collected from Tilwara cattle fair. With these concerted efforts, the hostel building was completed in 1946.

Establisher of Barmer District Farmers’ Society

On 14 March 1946, Ch. Rama Dookiya retired from the post of First Rail-track Inspector and after that, he devoted his entire life for social service. Apart from Jat Boarding House, Barmer, he devoted time for Marwar Farmers’ Society also. Watching the progress of Marwar’s farmers, the Jagirdars of the area got infuriated. The the level of exploitation was intensified and their attacks against farmers became severe. This led the Jat leaders to think of a strong political organisation of their own. On 22 June 1941, farmers’ leaders assembled at Jat Boarding House in Jodhpur where it was decided to call a meeting of farmers on 27 June at Sumer School, Jodhpur, where a strong political organisation was to be founded. On that day (27 June 1941), the Marwar Farmers Society came into being and Mangal Singh Kachhwaha was appointed its President and Balkishan, its Secretary. Later, in 1946, Baldev Ram Mirdha re-organised the Executive committee of Marwar Kisan Sabha and Narsingh Kachhwaha was declared its President, Nathuram Mirdha as secretary and Ch. Ramdan Dookiya as Executive member. Similarly, in Barmer sub-division also, a farmers’ union was set up, the Presidentship of which went to Ramdan Dookiya ji. On 3rd March 1948, a new government came into existence under the leadership of Shri Jai Narain Vyas, where Nathuram Mirdha was appointed as Minister of Agriculture. This government passed Marwar Land Revenue Act, 1949 and Marwar Tenency Act, 1949. Due to these Acts, the farmers were declared the owners of their lands and the system of ‘Lagbag (taxes)’ was eradicated. Ch. Ramdan Dookiya toured extensively in small villages and made the local farmers aware of these Acts - and they got rid of ‘Lag Bag’ evil.


With abolition of ‘Lag Bag’ the Jagirdars simply got furious and they again started suppressing poor farmers, they even managed attacks on farmer leaders and in this process, 27 persons were killed in Malani area alone. In this duress, Ramdan Dookiya came forward and gave every possible assistance to farmers. The services rendered by him both in his capacity as President of Kisan Society and later as MLA, are still being remembered by the farmers of the region. The efforts of Marwar Farmers’ Society and its President Baldev Ram Mirdha bore fruit – in the beginning of 1952 Rajasthan Government passed the “Jagirdari Abolition Act”, paving the way for the poor farmers for progress. In 1955, Rajasthan Tenency Act came into being and farmers automatically got ownership of their lands. In this stupendous task, Baldev Ram Mirdha and Ramdan Dookiya ji had a key role, apart from other Jat leaders.

Social Service

Like other Jat leaders of Marwar, Ch. Ramdan Dookiya was in favour of abolition of social evils prevalent among farming community and struggled against child marriage, Mrityubhoj (feast after an elder person’s death), "Deen-Pratha (दीन-प्रथा)" (The system of taking money by the bride side from groom side)litigations, addiction to tobacco, opium etc. In fact, he treated the tradition of ‘Mrityubhoj’ as the enemy of farmers. At social gatherings, marriages, farmer meetings, cattle fairs and political platforms, he used to urge upon farmers to get themselves away from this social evil. He also tried to get it removed through the enactment of a law. When he became MLA in 1957, he requested Chief Minister of Rajasthan Mr. Mohanlal Sukhadia to enact a law, which was ultimately passed by Rajasthan Vidhan Sabha, named “Rajasthan Mrityubhoj Abolition Act, 1960” which resulted in lowering this evil in Barmer district. To set an example for abolition of "Deen-Pratha (दीन-प्रथा)" he got the girls in his own family married according to religious ceremony, hence he was successful in eradicating it from amongst the farmers. He was also in favour of girls’ education. Due to his efforts, education for girls got a momentum in Marwar and by 1953, about 318 girls were able to pass Middle standard. Apart from spreading education, Ch. Ramdan Dookiya got the Jat youth admitted in armed forces during the Second World War. From 1951 to 1955, the strength of Rajasthan Police was considerably expanded and he did a great service to farmers by getting the village youth recruited in the police force.

Upliftment of Family

Ch. Ramdan Dookiya had shown great interest in educating the rural children and helping them getting good jobs. He also took special interest in educating his own children. He had five sons and four daughters and all of them got higher education. When his eldest son, Kesarimal completed his higher education, he was entrusted with the job of managing Jat Boarding House, Jodhpur along with business. The second son, Lal Singh, got the post of ‘Hakim’ of Jodhpur, after doing his MA-LLB. Later, Lal Singh rendered greater responsibilities on several posts in Rajasthan. The third son, Gangaram Chaudhary, adopted a lawer’s profession after doing his LLB. Later, Gangaram Chaudhary entered politics and served the public through Ministership in various departments. The fourth son, Khangarmal and the fifth son, Fateh Singh, also got higher education. In those days, the family of Ch. Ramdan Dookiya was considered of great reputation and a progressive one.

Social Service Through Politics

Before the first general elections in 1952, the Marwar Farmers Society and Rajasthan Farmers Society merged with Congress at the end of 1951 and Ch. Ramdan Dookiya also joined Congress. In 1953, the new Panchayati Raj Ordinance came into being. Due to his efforts, many farmers were elected as Heads of village panchayats. After that, when Tehsil-Panchayat elections were held in 1954, he was elected as Head of Barmer Tehsil Panchayat. During 1953-1955, Ramdan Dookiya and his son Gangaram gave valuable guidance to farmers during the land reforms process. Reasonable land revenues were decided and made applicable. In the second General Election of 1957, Ch. Ramdan Dookiya fought election from Gudamalani assembly constitutency and was got elected. During his tenure as MLA from 1957 to 1962, he rendered valuable social service. Barmer area got rid of regional dacoit gangs and through a Property Acquisition Act, many unclaimed properties were acquired by State government. In 1959, his son Gangaram was got elected for the post of President of Gudamalani Panchayat Samiti. In 1960, he was the key figure behind enactment of “Rajasthan Mrityubhoj abolition Act” which proved to be a boon for the farmers of Barmer. In 1962, Ch. Ramdan Dookiya got retirement from active politics and as his heir, his son Gangaram Choudhary, won the election of MLA during the Third General Elections in the same year (1962). Due to the personal influence of Ch. Ramdan Dookiya, Gangaram Choudhary was got elected several times from Barmer area and served as Minister in several departments of Rajasthan Government.

The Associates of Ramdanji in his Pious Mission

In Ch. Ramdan Dookiya’s mission, the following persons worked as his close associates:

• Kesarimal (son)

Gangaram Chaudhary (son)

Shri Aayidan BhaduBarmer

• Ch. BhikamchandBarmer

• Ch. Likharam – Barmer

• Ch. Bheraram – Bayetu

• Amara Ram Saran – resident of Sevau

• Ch. Banna Ram Jakhar

• Abdul Hadi

• Mangaram

The last days

The great lover of education, well-wisher of farmers and a great social reformer Ch. Ramdan Dookiya breathed his last on 24 October 1963. As a symbol of his living memory, Barmer’s “Kisan Student Hostel” is still erected in Barmer city, rendering service to the society. Here stands his statue and every visitor entering from the main gate pays his gratitude to this great soul.

Foot notes

  • "Deen-Pratha (दीन-प्रथा)" is the system of taking money by the bride side from groom side. This was prevalent in many parts of Rajasthan probably due to lesser population of females.

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