Dahae

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Caspian Sea Map

Dahae (Persian: داها‎; Latin: Dahae; Greek: Δάοι (Daoi), Δάαι, Δᾶαι (Daai), Δάσαι (Dasai)[1]), or Dahaeans were a confederacy of three Ancient Iranian tribes.

Location

Dahae people lived in the region to the immediate east of the Caspian Sea. They spoke an Eastern Iranian language. It was known as Dihistan and Dahistan during the Sassanid period.

History

The first dateable mention of this nomad confederacy appears in the list of nations of Xerxes the great Daeva inscription. In this list of the peoples and provinces of the Achaemenid Empire, the Dahae are identified in Old Persian as Dāha and are immediately followed by a "Saka" group, who are listed as being neighbors of the Dāha.

In the 1st century BCE, Strabo (Geographika 11.8.1) refers to the Dahae explicitly as the "Scythian Dahae". The historiographer further places the Dahae in the approximate vicinity of present-day Turkmenistan.

The Dahae, together with the Saka tribes, are known to have fought in the Achaemenid armies at the Battle of Gaugamela. Following the fall of the Achaemenid Empire, they joined Alexander of Macedon in his quest to India. Saka coins from the Seleucid era are sometimes specifically attributed to the Dahae.

In the third century, a branch of Dahae called the Parni would rise to prominence under their chief Arsaces. They invaded Parthia, which had just previously declared independence from the Seleucids, deposed the reigning monarch, and Arsaces crowned himself king. His successors, who all named themselves Arsaces and are thus referred to as the Arsacids, would eventually assert military control over the entire Iranian plateau. By then, they would be indistinguishable from the Parthians, and would also be called by that name.

While 'Dahae' was preserved in the toponym 'Dahestan'/'Dihistan' - a district "on the eastern shore of the Caspian Sea" - "an urban center of the ancient Dahae is quite unknown."[2]

कैस्पियन सागर के दहिया

दलीप सिंह अहलावत[3] लिखते हैं:

दहिया - चीनी इतिहासकारों के अनुसार 2600 ई० पू० में दहिया जाटों का शासन कैस्पियन सागर के क्षेत्र पर था। ये लोग वहां से अमू दरिया तथा ईरान के उत्तरी भाग तक फैल गये। इन लोगों का 331 ई० पू० में सिकन्दर से युद्ध अरबेला (अमू दरिया के उत्तर में) के स्थान पर हुआ। इन लोगों के नाम पर इनका देश दहिस्तान कहलाया। अट्रेक नदी के उत्तर में अखल की उपजाऊ भूमि में इनके नाम से एक ‘दहिस्तान’ जिला भी है (फारस का इतिहास, जिल्द 1, पृ० 307)। जब दहिया लोगों की शक्ति कैस्पियन सागर क्षेत्र पर हुई तब वह इनके नाम पर ‘दधि या दहाय सागर’ कहलाया (वायु पुराण 49-75)।

500 ई० पू० का एक नक्शा जो कि डी० पी० सिंहल ने अपनी लिखित पुस्तक ‘इण्डिया एण्ड वर्ल्ड सिविलाईज़ेशन’ के पृ० 417 पर दिया है। इसके अनुसार शक लोगों को सिकन्दरिया (बल्ख के उत्तर में) के ऊपर तथा सौग्डियाना के उत्तर में और अरल सागर एवं मस्सागेटाई के पूर्व में दिखलाया है। अरल सागर तथा कैस्पियन सागर के मध्य में दहिया लोगों को और सीथियन जाटों को काला सागर के पश्चिम में डेन्यूब नदी पर और उत्तर में डॉन नदी पर दिखलाया गया।

जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज पुस्तक में लेखक बी० एस० दहिया ने 800 ई० पू० मध्य


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-344


एशिया में जातियों व नगरों का एक नक्शा प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार शक लोग अरब सागर के उत्तर में, कांग अमू दरिया के पश्चिम में, दहिया अमू दरिया व कैस्पियन सागर के मध्य में, विर्क दहिया से दक्षिण तथा अमू दरिया से पूर्व में और कैस्पियन सागर के उत्तर में, मान कैस्पियन सागर के दक्षिण में और वेन लोगों को कैस्पियन सागर के पश्चिम तथा कुर नदी के दक्षिण व वेन झील (तुर्की में) के उत्तर व पूर्व क्षेत्र में दिखलाया है। बैंस लोग वेन के पूर्व में तथा नारा जाट वेन के दक्षिण में शासक थे।

सम्राट् साईरस ने 529 ई० पू० मस्सागेटाई राज्य की महाराणी तोमिरिस पर आक्रमण किया, उस युद्ध में महाराणी की सेना में दहिया वीर सैनिक भी थे। अन्त में साईरस मारा गया, उस समय वह दहिया जाटों से लड़ रहा था (P. Sykes, OP. cit, P. 153)।

कर्नल जेम्स टॉड ने लिखा है कि ईसा से हजारों वर्ष पहले दहिया महाजाति दल सिर दरिया के पूर्व में आबाद था। इनके निकट क्षेत्र में हेर, भुल्लर और सिहाग जाटवंश बसे हुए थे। इन लोगों का राज्य ईरान तथा अरमानिया में भी रहा (अधिक जानकारी के लिए देखो, तृतीय अध्याय दहिया प्रकरण)। ईरान में दहिया लोगों का शासन 256 ई० पू० से सन् 224 A.D. तक 480 वर्ष रहा।

दहिस्तान में चहल जाटवंश

चहल - इस जाटवंश का राज्य दहिस्तान देश (कैस्पियन सागर) के क्षेत्र पर था। इनको सन् 440 ई० में यज़देगिर्द तृतीय (Yazdegird III) ने युद्ध करके इसी क्षेत्र में हराया। जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज, पृ० 36, लेखक बी० एस० दहिया)। चहल गोत्र के जाटों की आबादी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और हरयाणा के कई जिलों में है। पंजाब में ये लोग सिक्खधर्मी हैं। विदेशों में भी मुसलमान व ईसाई तथा अन्य धर्मी चहल जाट पाए जाते हैं। [4]

External links

References

  1. Francisco Rodríguez Adrados (1994). basileutos - daimōn, Vol 4,
  2. Bivar, A.D.H. (1993), "The Political History of Iran under the Arsacids", in Fischer, W.B.; Gershevitch, Ilya, Cambridge History of Iran 3.1, London: Cambridge UP, pp. 21–99
  3. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.344-345
  4. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter IV,p.352