Hariram Singh Kurmali

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Chaudhary Hari Singh Kurmali from village Kurmali (Muzaffarnagar) was one of the founder members the All India Jat Mahasabha.

Shekhawati farmers movement

The Jat Prajapati Maha-Yagya was organized at Sikar from 20 - 29 January 1934. The program was scheduled for one whole week. The main aim of this event was to present to , the Jats and other farmers of Shekhawati, the picture of advanced level of the cultural and education development, and the progressiveness of the Jat society in U.P. and elsewhere, so that the Jats of Shekhawati could be inspired to have a desire for education and upliftment.

Many prominent persons were present:

People were enamored with their inspiring speeches.

राजस्थान की जाट जागृति में योगदान

ठाकुर देशराज[1] ने लिखा है ....उत्तर और मध्य भारत की रियासतों में जो भी जागृति दिखाई देती है और जाट कौम पर से जितने भी संकट के बादल हट गए हैं, इसका श्रेय समूहिक रूप से अखिल भारतीय जाट महासभा और व्यक्तिगत रूप से मास्टर भजन लाल अजमेर, ठाकुर देशराज और कुँवर रत्न सिंह भरतपुर को जाता है।


[पृ.4]: अगस्त का महिना था। झूंझुनू में एक मीटिंग जलसे की तारीख तय करने के लिए बुलाई थी। रात के 11 बजे मीटिंग चल रही थी तब पुलिसवाले आ गए। और मीटिंग भंग करना चाहा। देखते ही देखते लोग इधर-उधर हो गए। कुछ ने बहाना बनाया – ईंधन लेकर आए थे, रात को यहीं रुक गए। ठाकुर देशराज को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। उन्होने कहा – जनाब यह मीटिंग है। हम 2-4 महीने में जाट महासभा का जलसा करने वाले हैं। उसके लिए विचार-विमर्श हेतु यह बैठक बुलाई गई है। आपको हमारी कार्यवाही लिखनी हो तो लिखलो, हमें पकड़ना है तो पकड़लो, मीटिंग नहीं होने देना चाहते तो ऐसा लिख कर देदो। पुलिसवाले चले गए और मीटिंग हो गई।

इसके दो महीने बाद बगड़ में मीटिंग बुलाई गई। बगड़ में कुछ जाटों ने पुलिस के बहकावे में आकार कुछ गड़बड़ करने की कोशिश की। किन्तु ठाकुर देशराज ने बड़ी बुद्धिमानी और हिम्मत से इसे पूरा किया। इसी मीटिंग में जलसे के लिए धनसंग्रह करने वाली कमिटियाँ बनाई।

जलसे के लिए एक अच्छी जागृति उस डेपुटेशन के दौरे से हुई जो शेखावाटी के विभिन्न भागों में घूमा। इस डेपुटेशन में राय साहब चौधरी हरीराम सिंह रईस कुरमाली जिला मुजफ्फरनगर, ठाकुर झुममन सिंह मंत्री महासभा अलीगढ़, ठाकुर देशराज, हुक्म सिंह जी थे। देवरोड़ से आरंभ करके यह डेपुटेशन नरहड़, ककड़ेऊ, बख्तावरपुरा, झुंझुनू, हनुमानपुरा, सांगासी, कूदन, गोठड़ा


[पृ.5]: आदि पचासों गांवों में प्रचार करता गया। इससे लोगों में बड़ा जीवन पैदा हुआ। धनसंग्रह करने वाली कमिटियों ने तत्परता से कार्य किया और 11,12, 13 फरवरी 1932 को झुंझुनू में जाट महासभा का इतना शानदार जलसा हुआ जैसा सिवाय पुष्कर के कहीं भी नहीं हुआ। इस जलसे में लगभग 60000 जाटों ने हिस्सा लिया। इसे सफल बनाने के लिए ठाकुर देशराज ने 15 दिन पहले ही झुंझुनू में डेरा डाल दिया था। भारत के हर हिस्से के लोग इस जलसे में शामिल हुये। दिल्ली पहाड़ी धीरज के स्वनामधन्य रावसाहिब चौधरी रिशाल सिंह रईस आजम इसके प्रधान हुये। जिंका स्टेशन से ही ऊंटों की लंबी कतार के साथ हाथी पर जुलूस निकाला गया।

कहना नहीं होगा कि यह जलसा जयपुर दरबार की स्वीकृति लेकर किया गया था और जो डेपुटेशन स्वीकृति लेने गया था उससे उस समय के आईजी एफ़.एस. यंग ने यह वादा करा लिया था कि ठाकुर देशराज की स्पीच पर पाबंदी रहेगी। वे कुछ भी नहीं बोल सकेंगे।

यह जलसा शेखावाटी की जागृति का प्रथम सुनहरा प्रभात था। इस जलसे ने ठिकानेदारों की आँखों के सामने चकाचौंध पैदा कर दिया और उन ब्राह्मण बनियों के अंदर कशिश पैदा करदी जो अबतक जाटों को अवहेलना की दृष्टि से देखा करते थे। शेखावाटी में सबसे अधिक परिश्रम और ज़िम्मेदारी का बौझ कुँवर पन्ने सिंह ने उठाया। इस दिन से शेखावाटी के लोगों ने मन ही मन अपना नेता मान लिया। हरलाल सिंह अबतक उनके लेफ्टिनेंट समझे जाते थे। चौधरी घासी राम, कुँवर नेतराम भी


[पृ.6]: उस समय तक इतने प्रसिद्ध नहीं थे। जनता की निगाह उनकी तरफ थी। इस जलसे की समाप्ती पर सीकर के जाटों का एक डेपुटेशन कुँवर पृथ्वी सिंह के नेतृत्व में ठाकुर देशराज से मिला और उनसे ऐसा ही चमत्कार सीकर में करने की प्रार्थना की।

गोठडा (सीकर) का जलसा सन 1938

जयपुर सीकर प्रकरण में शेखावाटी जाट किसान पंचायत ने जयपुर का साथ दिया था. विजयोत्सव के रूप में शेखावाटी जाट किसान पंचायत का वार्षिक जलसा गोठडा गाँव में 11 व 12 सितम्बर 1938 को शिवदानसिंह अलीगढ की अध्यक्षता में हुआ जिसमें 10-11 हजार किसान, जिनमें 500 स्त्रियाँ थी, शामिल हुए. सम्मलेन में उपस्थ्तित प्रमुख नेता थे -

इस पंचायत में निम्न प्रस्ताव पारित किये गए-

  • 1.जाट बोर्डिंग हाऊस सीकर के लिए 1934 में जमीन देने का वायदा किया गया था, जो अभी तक नहीं दी गयी है. अतः जाट बोर्डिंग के लिए तत्काल भूमि दी जाय.
  • 2. जाट विद्यार्थियों के पढने के लिए राज्य की छात्रवृत्तियां स्वीकृत की जांय
  • 3. पढ़े-लिखे जाटों को उनकी संख्या के अनुपात में ऊँची नौकरियों में नियुक्तियां दी जांय
  • 4.पिलानी के बिड़ला कालेज को डिग्री कालेज कर दिया जाय
  • 5.गाँवों में स्कूल और अस्पताल खोले जांय
  • 6.सीकर और जयपुर की अदालतों में बाहर के वकीलों को उपस्थित होने की इजाजत दी जाय
  • 7.सीकर के वर्तमान प्रशासन में किसी प्रकार का परिवर्तन न किया जाय क्योंकि कैप्टन वेब (A.W.T.Webb) के प्रशासन के दौरान किसानों को पर्याप्त राहत मिली है. अतः वेब को तब तक रखा जाय जब तक की सीकर में भूमि बंदोबस्त पूरा न हो जाय.
  • 8. जाटों को राजनैतिक व सामाजिक मामलों में अन्य जातियों के बराबर अधिकार दिए जांय.
  • 9. जब तक सेटलमेंट न हो जाय तब तक वर्तमान में लगान की दर को आधी कर दी जाय.
  • 10. वर्तमान सीकर विद्रोह के समय जिस किसी ने भी जाटों के साथ दुर्व्यवहार किया उसे सजा दी जाय.
  • 11.जाटों को उनकी भूमि पर पुश्तैनी अधिकार दिए जांय
  • 12. विशेषकर सीकर जागीर इलाकों में सभी प्रकार की लागबाग समाप्त की जाय.
  • 13. अकाल के कारण इस वर्ष जिन किसानों की फसलें समाप्त हो गयी हैं, उनसे लगान न लिया जाय.
  • 14. प्रशासन की और से पशुओं के लिए चारे का प्रबंध किया जाय. (डॉ पेमाराम, p. 162-63)

इस बैठक में मि. यंग (F.S.Young) ने भी भाषण दिया. उन्होंने कहा कि किसानों को जयपुर सरकार से जो कुछ मिले, उसे लेना चाहिय और ठिकानेदारों के पास जाकर भी न्याय की भीख मांगनी चाहिय. शेखावाटी जाट किसान पंचायत के प्रतिनिधियों ने इस भाषण का विरोध किया और कहा कि ठिकानेदारों से निराश होकर ही हम जयपुर की शरण में जाते हैं अतः ठिकानेदारों से भीख मांगने का कहना सहनीय नहीं है. (डॉ पेमाराम, p. 163)

शेखावाटी जाट किसान पंचायत के प्रतिनिधियों से नाराज होने के कारण मि. यंग के कहने पर शेखावाटी पंचायत के प्रधान सरदार हरलाल सिंह को तथा ताड़केश्वर शर्मा पचेरी को 22 सितम्बर 1938 को एकाएक झुंझुनू में गिरफ्तार कर लिया तथा 26 सितम्बर 1938 को पंचायत के सहकारी मंत्री लादू राम किसारी को गिरफ्तार कर लिया गया. इन गिरफ्तारियों से इलाके में जोरों की हलचल मच गयी. झुण्ड के झुण्ड लोग इकट्ठे होकर इन गिरफ्तारियों का विरोध करने लगे और गिरफ़्तारी देने लगे. इन हलचलों से अधिकारी वर्ग घबरा गया और इन नेताओं को 28 सितम्बर 1938 को छोड़ दिया. (डॉ पेमाराम, p. 164)

इस जलसे में पृथ्वीसिंह गोठडा की भूमिका की चर्चा करना आवश्यक है. सामंती काल में, किसी गाँव में होने वाला यह पहला सम्मलेन था. इसमें भरतपुर, आगरा, अलीगढ, मेरठ और दिल्ली से किसान नेताओं और भजनोपदेशकों ने भाग लिया था. शेखावाटी के सभी भागों से किसान नेता, कार्यकर्ता और भजनोपदेशक सम्मिलित हुए. यह सम्मलेन पृथ्वी सिंह की पहल पर ही आयोजित किया गया था. पृथ्वी सिंह दुर्भाग्य से निरंतर बीमार रहने लगे थे. दिन-रात का संघर्ष, जेल जीवन, परिवार को मिलने वाली प्रताड़ना और लूट ने पृथ्वी सिंह को निश्चय ही परेशान किया. लेकिन वे झुके नहीं, न रुके, न टूटे. (राजेन्द्र कसवा: P. 163)

References

  1. ठाकुर देशराज:Jat Jan Sewak, p.1, 4-6

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