Gothra Bhukaran

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Author:Laxman Burdak IFS (R)

Note - Please click → Gothra for details of similarly named villages at other places.


Location of Gothra Bhukaran in north of Kudan in Sikar district

Gothra Bhukaran (गोठड़ा भूकरान) (Gothra Bhookran, Gothara Bhukaran) is a village in Dhod tehsil in Sikar district in Rajasthan. Pincode - 332031.

Before creation of Dhod tahsil, this village used to fall within Sikar tahsil.

As of 2001 census, the population of the village is 5224, out of which 913 are SC people. It is in north of Kudan.

Founders

Bhukar Jats.

Jat Gotras

Population

As per Census-2011 statistics, Gothra Bhookran village has the total population of 3428 (of which 1742 are males while 1686 are females).[1]

The village has a total families dwelling in the village about 700 out of which 600 families belong to Bhukar gotra Jats. The other Jat gotras in the village are mainly limited who came from meternal side to reside here.

History

It was the capital of republic of Bhukar Jats. Bhukar is a Sanskrit word comprising of 'Bhu' (land) and 'Kar' (tax), which means land-tax. Bhukars were initially settled at Sambhar in Rajasthan. They were the rulers in this area and their ruling method was that of 'Bhomia-chor'. Later on they started collecting tax on land. [2]

A group of Chahuman descendents came to Sambhar in 9th century. The newly formed Chauhans forced them to move away from this area. Earlier Bhukars and Chauhans were same prior to their consecration of new Hindu religion at Mount Abu. Bhukar people came to Sambhar under the leadership of two brothers Khem Singh and Som Singh. Khem Singh founded the town named 'Hiras' and started increasing his influence in the area. Som Singh went to Jangladesh and founded town named 'Bhukhredi'. After many generations some of these people moved towards Panipat in Haryana. [3]

Bhukars left Bhukaredi and came to Gothra Bhukaran

Relation between Bhukhar's and Sihag's are " Mama & Bhanja ". One day some womens gathered on well for taking water. Some dispute arose between Sihag & Bhukhar women about taking water from the well first in turn. Bhukhar women told this fact to their husbands which led to a dispute and then Bhukhars decided to leave this village and said they would never drink water of this village. After that they moved to village Gothra Bhukaran in Sikar district in Rajasthan.

Gothra Bhukaran as capital of Bhukars

After the fall of Chauhans at Ajmer and Delhi one of Bhukar warriors named Uday Singh was appointed as 'Bakshi'. Uday Singh was expert in land-tax collection. Uday Singh's son Kaula Singh was appointed Tehsildar of Ajmer. [4]

During those days Kalu Nag was the chief of Sikar republic state. His capital was at village 'Gothra (Bhukaran)'. Prior to this the Bhukars had founded village Bhukaredi in present Churu district of Rajasthan. He was a renowned 'Malik' of his state from Delhi Badshah. He used to go to Delhi to pay land-tax regularly. He was son less. He married his daughter to Kaula Singh. Kaula Singh's son Kander Singh became the successor of Gothara. Kander Singh's son was Dalu Singh who was chieftain of 25 villages. Dalu Singh's stone statue is still present at village Gothara. The successors of Dalu Singh were Sayar Singh, Kaula Singh II, and Narbad Singh. Narbad Singh had initially gone to village Roru to his maternal grandfather but came back to Gothra (Bhukaran) after the death of his father. The bard records tell us that Narbad was 11 generations back or about 300 years back. Chaudhari Rambaksh belongs to this genealogy and was on 10 th generation of Narbad.[5]

Fall of Bhukars

When the Shekhawats attacked this state the small republic of Bhukars was finished. With a view to keep the discontent under control, Shekhawats maintained their status as 'Tax collectors'. Later on this status was reduced to 'Chaudhary'. The Chaudharys used to get their share as 'Pachotra'. They were also authorized free grazing lands.

राजस्थान की जाट जागृति में योगदान

ठाकुर देशराज[6] ने लिखा है ....उत्तर और मध्य भारत की रियासतों में जो भी जागृति दिखाई देती है और जाट कौम पर से जितने भी संकट के बादल हट गए हैं, इसका श्रेय समूहिक रूप से अखिल भारतीय जाट महासभा और व्यक्तिगत रूप से मास्टर भजन लाल अजमेर, ठाकुर देशराज और कुँवर रत्न सिंह भरतपुर को जाता है।


[पृ.4]: अगस्त का महिना था। झूंझुनू में एक मीटिंग जलसे की तारीख तय करने के लिए बुलाई थी। रात के 11 बजे मीटिंग चल रही थी तब पुलिसवाले आ गए। और मीटिंग भंग करना चाहा। देखते ही देखते लोग इधर-उधर हो गए। कुछ ने बहाना बनाया – ईंधन लेकर आए थे, रात को यहीं रुक गए। ठाकुर देशराज को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। उन्होने कहा – जनाब यह मीटिंग है। हम 2-4 महीने में जाट महासभा का जलसा करने वाले हैं। उसके लिए विचार-विमर्श हेतु यह बैठक बुलाई गई है। आपको हमारी कार्यवाही लिखनी हो तो लिखलो, हमें पकड़ना है तो पकड़लो, मीटिंग नहीं होने देना चाहते तो ऐसा लिख कर देदो। पुलिसवाले चले गए और मीटिंग हो गई।

इसके दो महीने बाद बगड़ में मीटिंग बुलाई गई। बगड़ में कुछ जाटों ने पुलिस के बहकावे में आकार कुछ गड़बड़ करने की कोशिश की। किन्तु ठाकुर देशराज ने बड़ी बुद्धिमानी और हिम्मत से इसे पूरा किया। इसी मीटिंग में जलसे के लिए धनसंग्रह करने वाली कमिटियाँ बनाई।

जलसे के लिए एक अच्छी जागृति उस डेपुटेशन के दौरे से हुई जो शेखावाटी के विभिन्न भागों में घूमा। इस डेपुटेशन में राय साहब चौधरी हरीराम सिंह रईस कुरमाली जिला मुजफ्फरनगर, ठाकुर झुममन सिंह मंत्री महासभा अलीगढ़, ठाकुर देशराज, हुक्म सिंह जी थे। देवरोड़ से आरंभ करके यह डेपुटेशन नरहड़, ककड़ेऊ, बख्तावरपुरा, झुंझुनू, हनुमानपुरा, सांगासी, कूदन, गोठड़ा


[पृ.5]: आदि पचासों गांवों में प्रचार करता गया। इससे लोगों में बड़ा जीवन पैदा हुआ। धनसंग्रह करने वाली कमिटियों ने तत्परता से कार्य किया और 11,12, 13 फरवरी 1932 को झुंझुनू में जाट महासभा का इतना शानदार जलसा हुआ जैसा सिवाय पुष्कर के कहीं भी नहीं हुआ। इस जलसे में लगभग 60000 जाटों ने हिस्सा लिया। इसे सफल बनाने के लिए ठाकुर देशराज ने 15 दिन पहले ही झुंझुनू में डेरा डाल दिया था। भारत के हर हिस्से के लोग इस जलसे में शामिल हुये। दिल्ली पहाड़ी धीरज के स्वनामधन्य रावसाहिब चौधरी रिशाल सिंह रईस आजम इसके प्रधान हुये। जिंका स्टेशन से ही ऊंटों की लंबी कतार के साथ हाथी पर जुलूस निकाला गया।

कहना नहीं होगा कि यह जलसा जयपुर दरबार की स्वीकृति लेकर किया गया था और जो डेपुटेशन स्वीकृति लेने गया था उससे उस समय के आईजी एफ़.एस. यंग ने यह वादा करा लिया था कि ठाकुर देशराज की स्पीच पर पाबंदी रहेगी। वे कुछ भी नहीं बोल सकेंगे।

यह जलसा शेखावाटी की जागृति का प्रथम सुनहरा प्रभात था। इस जलसे ने ठिकानेदारों की आँखों के सामने चकाचौंध पैदा कर दिया और उन ब्राह्मण बनियों के अंदर कशिश पैदा करदी जो अबतक जाटों को अवहेलना की दृष्टि से देखा करते थे। शेखावाटी में सबसे अधिक परिश्रम और ज़िम्मेदारी का बौझ कुँवर पन्ने सिंह ने उठाया। इस दिन से शेखावाटी के लोगों ने मन ही मन अपना नेता मान लिया। हरलाल सिंह अबतक उनके लेफ्टिनेंट समझे जाते थे। चौधरी घासी राम, कुँवर नेतराम भी


[पृ.6]: उस समय तक इतने प्रसिद्ध नहीं थे। जनता की निगाह उनकी तरफ थी। इस जलसे की समाप्ती पर सीकर के जाटों का एक डेपुटेशन कुँवर पृथ्वी सिंह के नेतृत्व में ठाकुर देशराज से मिला और उनसे ऐसा ही चमत्कार सीकर में करने की प्रार्थना की।

शेखावाटी किसान आन्दोलन पर रणमल सिंह

शेखावाटी किसान आन्दोलन पर रणमल सिंह[7] लिखते हैं कि [पृष्ठ-113]: सन् 1934 के प्रजापत महायज्ञ के एक वर्ष पश्चात सन् 1935 (संवत 1991) में खुड़ी छोटी में फगेडिया परिवार की सात वर्ष की मुन्नी देवी का विवाह ग्राम जसरासर के ढाका परिवार के 8 वर्षीय जीवनराम के साथ धुलण्डी संवत 1991 का तय हुआ, ढाका परिवार घोड़े पर तोरण मारना चाहता था, परंतु राजपूतों ने मना कर दिया। इस पर जाट-राजपूत आपस में तन गए। दोनों जातियों के लोग एकत्र होने लगे। विवाह आगे सरक गया। कैप्टन वेब जो सीकर ठिकाने के सीनियर अफसर थे , ने हमारे गाँव के चौधरी गोरूसिंह गढ़वाल जो उस समय जाट पंचायत के मंत्री थे, को बुलाकर कहा कि जाटों को समझा दो कि वे जिद न करें। चौधरी गोरूसिंह की बात जाटों ने नहीं मानी, पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया। इस संघर्ष में दो जाने शहीद हो गए – चौधरी रत्नाराम बाजिया ग्राम फकीरपुरा एवं चौधरी शिम्भूराम भूकर ग्राम गोठड़ा भूकरान । हमारे गाँव के चौधरी मूनाराम का एक हाथ टूट गया और हमारे परिवार के मेरे ताऊजी चौधरी किसनारम डोरवाल के पीठ व पैरों पर बत्तीस लठियों की चोट के निशान थे। चौधरी गोरूसिंह गढ़वाल के भी पैरों में खूब चोटें आई, पर वे बच गए।

चैत्र सुदी प्रथमा को संवत बदल गया और विक्रम संवत 1992 प्रारम्भ हो गया। सीकर ठिकाने के जाटों ने लगान बंदी की घोषणा करदी, जबरदस्ती लगान वसूली शुरू की। पहले भैरुपुरा गए। मर्द गाँव खाली कर गए और चौधरी ईश्वरसिंह भामू की धर्मपत्नी जो चौधरी धन्नाराम बुरड़क, पलथना की बहिन थी, ने ग्राम की महिलाओं को इकट्ठा करके सामना किया तो कैप्टेन वेब ने लगान वसूली रोकदी। चौधरी बक्साराम महरिया ने ठिकाने को समाचार भिजवा दिया कि हम कूदन में लगान वसूली करवा लेंगे।

कूदन ग्राम के पुरुष तो गाँव खाली कर गए। लगान वसूली कर्मचारी ग्राम कूदन की धर्मशाला में आकर ठहर गए। महिलाओं की नेता धापू देवी बनी जिसका पीहर ग्राम रसीदपुरा में फांडन गोत्र था। उसके दाँत टूट गए थे, इसलिए उसे बोखली बड़िया (ताई) कहते थे। महिलाओं ने काँटेदार झाड़ियाँ लेकर लगान वसूली करने वाले सीकर ठिकाने के कर्मचारियों पर आक्रमण कर दिया, अत: वे धर्मशाला के पिछवाड़े से कूदकर गाँव के बाहर ग्राम अजीतपुरा खेड़ा में भाग गए। कर्मचारियों की रक्षा के लिए पुलिस फोर्स भी आ गई। ग्राम गोठड़ा भूकरान के भूकर एवं अजीतपुरा के पिलानिया जाटों ने पुलिस का सामना किया। गोठड़ा गोली कांड हुआ और चार जने वहीं शहीद हो गए। इस गोली कांड के बाद पुलिस ने गाँव में प्रवेश किया और चौधरी कालुराम सुंडा उर्फ कालु बाबा की हवेली , तमाम मिट्टी के बर्तन, चूल्हा-चक्की सब तोड़ दिये। पूरे गाँव में पुरुष नाम की चिड़िया भी नहीं रही सिवाय राजपूत, ब्राह्मण, नाई व महाजन परिवार के। नाथाराम महरिया के अलावा तमाम जाटों ने ग्राम छोड़ कर भागे और जान बचाई।


[पृष्ठ-114]: कूदन के बाद ग्राम गोठड़ा भूकरान में लगान वसूली के लिए सीकर ठिकाने के कर्मचारी पुलिस के साथ गए और श्री पृथ्वीसिंह भूकर गोठड़ा के पिताजी श्री रामबक्स भूकर को पकड़ कर ले आए। उनके दोनों पैरों में रस्से बांधकर उन्हें (जिस जोहड़ में आज माध्यमिक विद्यालय है) जोहड़े में घसीटा, पीठ लहूलुहान हो गई। चौधरी रामबक्स जी ने कहा कि मरना मंजूर है परंतु हाथ से लगान नहीं दूंगा। उनकी हवेली लूट ली गई , हवेली से पाँच सौ मन ग्वार लूटकर ठिकाने वाले ले गए।

कूदन के बाद जाट एजीटेशन के पंचों – चौधरी हरीसिंह बुरड़क, पलथना, चौधरी ईश्वरसिंह भामु, भैरूंपुरा; पृथ्वी सिंह भूकर, गोठड़ा भूकरान; चौधरी पन्ने सिंह बाटड़, बाटड़ानाऊ; एवं चौधरी गोरूसिंह गढ़वाल (मंत्री) कटराथल – को गिरफ्तार करके देवगढ़ किले मैं कैद कर दिया। इस कांड के बाद कई गांवों के चुनिन्दा लोगों को देश निकाला (ठिकाना बदर) कर दिया। मेरे पिताजी चौधरी गनपत सिंह को ठिकाना बदर कर दिया गया। वे हटूँड़ी (अजमेर) में हरिभाऊ उपाध्याय के निवास पर रहे। मई 1935 में उन्हें ठिकाने से निकाला गया और 29 फरवरी, 1936 को रिहा किया गया।

जब सभी पाँच पंचों को नजरबंद कर दिया गया तो पाँच नए पंच और चुने गए – चौधरी गणेशराम महरिया, कूदन; चौधरी धन्नाराम बुरड़क, पलथाना; चौधरी जवाहर सिंह मावलिया, चन्दपुरा; चौधरी पन्नेसिंह जाखड़; कोलिडा तथा चौधरी लेखराम डोटासरा, कसवाली। खजांची चौधरी हरदेवसिंह भूकर, गोठड़ा भूकरान; थे एवं कार्यकारी मंत्री चौधरी देवीसिंह बोचलिया, कंवरपुरा (फुलेरा तहसील) थे। उक्त पांचों को भी पकड़कर देवगढ़ किले में ही नजरबंद कर दिया गया। इसके बाद पाँच पंच फिर चुने गए – चौधरी कालु राम सुंडा, कूदन; चौधरी मनसा राम थालोड़, नारसरा; चौधरी हरजीराम गढ़वाल, माधोपुरा (लक्ष्मणगढ़); मास्टर कन्हैयालाल महला, स्वरुपसर एवं चौधरी चूनाराम ढाका , फतेहपुरा

ठिकाने ने जांच कमीशन नियुक्त कर दिया

ठाकुर देशराज[8] ने लिखा है ....जयपुर 29 मई 1934 : जाट पंचायत सीकर वाटी के महामंत्री देवा सिंह बोचल्या की प्रमुखता में लगभग 200 जाटों का एक डेपुटेशन सीकर के नए सीनियर अफसर एडबल्यू वेब से मिला और अपनी शिकायतें सुनाई। मिस्टर वेब ने उनकी बातों को सहानुभूति पूर्वक सुनकर बतलाया कि राव राजा सीकर ने आप लोगों की शिकायतों की जांच करने के लिए 8 व्यक्तियों का एक मिशन नियत करने की इजाजत दे दी है। उसका प्रधान मैं स्वयं और मेंबर मेजर मलिक मुहम्मद सेन खां पुलिस तथा


[पृ.254]: जेलों के अफसर-इंचार्ज कैप्टन लाल सिंह, मिलिट्री मेंबर ठाकुर शिवबक्स सिंह, होम मेंबर और चार जाट प्रतिनिधि होंगे। चार जाटों में से दो नामजद किए जाएंगे और दो चुने जाएंगे।

आप ने यह भी कहा कि मुझे जाटों की शिकायतें कुछ अत्युक्तिपूर्ण मालूम पड़ती हैं तथापि यदि जांच के समय आंदोलन बंद रहा और शांति रही तो मैं जांच जल्दी समाप्त कर दूंगा और जाटों को कोई शिकायत नहीं रहेगी।

जाट जांच कमीशन की रचना से संतुष्ट नहीं हैं। न वे चारों जाट मेंबरों को चुनना ही चाहते हैं। वे झुंझुनू में एक सभा बुलाने वाले हैं। बोसना में भी एक पंचायत होगी इन दोनों सभाओं में मिस्टर वेब के ऐलान पर विचार होगा। (यूनाइटेड प्रेस)

इसके बाद राव राजा साहब और सीनियर साहब दोनों ही क्रमश: 2 जून और 6 जून सन 1934 को आबू चले गए।

आबू जाने से 1 दिन पहले सीनियर ऑफिसर साहब मिस्टर वेब ने सीकर वाटी जाट पंचायत को एक पत्र दिया जो पुलिस की मारफ़त उसे मिला। उसमें लिखा था, “हम चाहते हैं कि कार्यवाही कमीशन मुतल्लिका तहकीकात जाटान सीकर फौरन शुरू कर दी जावे। हम 15 जून को आबू से वापस आएंगे और नुमायदगान से जरूर सोमवार 18 जून सन 1934 को मिलेंगे। लिहाजा मुक्तिला हो कि जाट लीडरान जगह मुकर्रर पर हमसे जरूर मिलें।

सीनियर ऑफिसर के आबू जाने के बाद सीकर के जाट हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठे। बराबर गांवों में मीटिंगें करते रहे। उन्होंने इन मीटिंगों में इस बात के प्रस्ताव पास किया, “जयपुर दरबार के सामने पेश की हुई हमारी मांगे


[पृ.255]: सर्वसम्मत हैं और हमारे ऐसी कोई भी पार्टी नहीं जो इन मांगों के विरुद्ध हो, सीकर के कर्मचारियों ने मिस्टर वेब को यह समझाया कि यहां के जाटों में दो पार्टियां हैं कतई झूट है” (नवयुग 12 जून 1934)

मि. वेब आबू से एक दो दिन की देर से वापस हुए। इसके बाद में शायद किसी जरूरी काम से जयपुर गए। इसलिए जाट पंचायत के प्रतिनिधियों से बजाय 18 जून 1934 के 22 जून 1934 को मुलाकात हुई। उन्होने पहली जुलाई तक कमीशन के लिए जाटों के नाम की लिस्ट देने को जाट पंचान से कहा और यह भी बताया कि राव राजा साहब ने ठिकाने में से सभी बेगार को उठा दिया है।

29 जून 1934 को राव राजा साहब भी आबू से वापस आ गए। कुछ किसानों ने रींगस स्टेशन पर उनसे मुलाकात करनी चाहिए किंतु नौकरों ने उन्हें धक्के देकर हटा दिया।

इससे पहले ही तारीख 24 जून 1934 को कूदन में सीकर वाटी के प्रमुख जाटों की एक मीटिंग कमीशन के लिए मेंबर चुनने के लिए हो चुकी थी। भरतपुर से ठाकुर देशराज और कुंवर रतन सिंह जी भी इस मीटिंग में शामिल हुए थे। तारीख 25 जून 1934 को एक खुली मीटिंग गोठड़ा में हुई जिसमें रायबहादुर चौधरी छोटूराम और कुंवर रतन सिंह बाहर से तथा कुंवर पृथ्वी सिंह और चौधरी ईश्वर सिंह सीकर से जांच कमीशन के लिए चुने गए।

25 अप्रेल 1935 को कूदन में क्रूरता का तांडव

नोट - यह सेक्शन राजेन्द्र कसवा की पुस्तक मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), प्रकाशक: कल्पना पब्लिकेशन, जयपुर, फोन: 0141 -2317611, संस्करण: 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, P. 134-144 से साभार लिया गया है.

यह वास्तविकता है कि कूदन पूरी सीकर वाटी का चेतना केंद्र बन गया था. कूदन में ही कालूराम सुंडा तथा गणेशराम महरिया जैसे किसान नेता थे. पृथ्वी सिंह गोठड़ा का कूदन में ससुराल था. (राजेन्द्र कसवा, p.134)

कैप्टन वेब 25 अप्रेल 1935 को कूदन पहुंचा तो वहां आस-पास के गाँवों से बड़ी संख्या में जाट एकत्रित हो गए थे और राजस्व अधिकारियों को लगान वसूल नहीं करने दिया और विरोध को तैयार हो गए. (राजेन्द्र कसवा, p.136)

25 अप्रेल 1935 को कूदन में ग्रामीणों ने देखा कि सैंकड़ों घुड़सवारों ने गाँव को चारों और से घेर लिया है. अन्य गाँवों के बहुत से किसान उपस्थित थे. आन्दोलन का नेतृत्व कूदन ही कर रहा था. भीड़ ने आम सभा का रूप ले लिया. कुछ देर पश्चात रियासती पुलिस के दो सिपाही बखाल में पानी भरने के लिए गाँव के कुए पर आये. गाँव वालों ने उनको पानी भरने से रोक दिया. उसी समय तहसीलदार वगैरह भी आ गए. कुए के निकट ही धर्मशाला है. उसमें बैठकर तहसीलदार ने गाँव के प्रमुख व्यक्तियों को बुलाया. लगान के मुद्दे पर देर तक बात चली और यह सहमती बनी कि लगान चुका देंगे.(राजेन्द्र कसवा, p.137)

धापी दादी का विद्रोह - जिस वक्त धर्मशाला में गाँव के प्रमुख व्यक्तियों के साथ बातचीत चल रही थी, उसी समय गाँव की एक दबंग महिला धापी दादी अपनी भैंस को पानी पिलाने कुए पर आई थी. उसने सुना कि लगान सम्बन्धी चर्चा चल रही है, तो वह कुछ देर खड़ी रही. तभी बातचीत करके गाँव के चौधरी धर्मशाला से बहार निकले. किसी के पूछने पर चौधरियों ने जवाब दिया, 'हाँ हम लगान चुकाने की हामी भर आये हैं'. यह वाक्य धापी ने सुना तो उसके तन-मन में जैसे आग लग गयी. उसके हाथ में भैंस हांकने वाली कटीली छड़ी थी. धापी ने क्रोध में आकर एक छड़ी चौधरी पेमाराम के सर पर मारी और आवेश में आकर उसे अपशब्द कहे. पेमाराम का साफा कटीली छड़ी के साथ ही धापी के हाथ में आ गया. पेमा राम इस आकस्मिक वार से हक्का-बक्का रह गया और जान बचाने के लिए धर्मशाला की और दौड़ा. पेमा राम को भागकर धर्मशाला में घुसते लोगों ने देखा. धापी दादी छड़ी में उलझे पेमाराम के साफे को लहरा-लहरा कर पूछ रही थी, 'इन दो चार लोगों को किसने अधिकार दिया कि वे बढ़ा हुआ लगान चुकाने की हामी भरें?' सभी ने धापी दादी के प्रश्न को जायज ठहराया.(राजेन्द्र कसवा, p.138)

वास्तव में धापी दादी की बात सही थी. लगान चुकाने का फैसला किसान पंचायत ही कर सकती थी. चौधरियों को तो यों ही लगान में हिस्सा मिलता था. उपस्थित जन समुदाय क्रोधित हो गया. धापी दादी ने आदेश दिया, 'मेरा मूंह क्या देख रहे हो इन चौधरियों को पकड़कर धर्मशाला से बाहर ले जाओ.' बाहर शोर बढ़ रहा था. धर्मशाला में बैठे तहसीलदार, पटवारी, अन्य कर्मचारी और गाँव के चौधरी भय से थर-थर कांपने लगे. उन्हें लगा कि यह भीड़ अब उनकी पिटाई करेगी. चौधरियों ने तहसीलदार सहित कर्मचारियों को बगल के पंडित जीवनराम शर्मा के घर में छुपा दिया. इस भागदौड़ में ग्रामीणों ने एक सिपाही को पकड़कर पीट दिया जो ग्रामीणों को अपमानित कर रहा था.(राजेन्द्र कसवा, p.138)

किसान और रियासती पुलिस आमने सामने -कूदन गाँव के दक्षिण में सुखाणी नाम की जोहड़ी है. जोहड़ी क्या, विशाल सार्वजनिक मैदान जैसा भूखंड था, उसमें किसानों का विशाल जनसमूह खड़ा था. कुछ ही दूरी पर रियासत और रावराजा की पुलिस खड़ी थी. दृश्य कुछ वैसा ही था, जैसे युद्ध के मैदान में सेनाएं आमने-सामने खड़ी हों. अधिकांश किसान निहत्थे थे. सामने घुड़सवार पुलिस थी. जाहिर था यदि हिंसा हुई तो किसान मरे जायेंगे. यही सोच कर पृथ्वीसिंह गोठडा जनसमूह के बीच गए और समझाया, 'हम हिंसा से नहीं लड़ेंगे. हम शांतिपूर्ण विरोध करेंगे.'(राजेन्द्र कसवा, p.139)

कैप्टन वेब द्वारा फायरिंग का हुक्म - कैप्टन वेब ने जनसमूह को तितर-बितर होने का आदेश दिया और साथ ही बढ़े हुए लगान को चुकाने का हुक्म दिया. वेब की चेतावनी का किसानों पर कोई असर नहीं हुआ. वे अपनी जगह से हिले नहीं. मि. वेब ने निहत्थे किसानों पर गोली चलाने का हुक्म दे दिया. जनसमूह में कोहराम मच गया. लोग इधर-उधर भागने लगे. चीख-पुकार मच गयी. जब तूफ़ान रुका तो पता लगा कि पुलिस की गोली से निकटवर्ती गाँव गोठड़ा के चेतराम, टीकूराम, तुलछाराम एवं अजीतपुरा गाँव के आशाराम पिलानिया शहीद हो गए. सचमुच गाँव का चारागाह मैदान युद्ध स्थल बन गया. (राजेन्द्र कसवा, p.139)

इसी बीच जयपुर रियासत की सशत्र पलिस आ धमकी. दिन के 12 बजे कैप्टन वेब एवं एक अन्य अधिकारी बापना सहित 500 पुलिस के सिपाही कूदन गाँव के उस चौक में आये, जहाँ छाछ-राबड़ी की कड़ाही अब भी रखी थी और बड़ी परात में रोटियां थीं. लेकिन उपस्थित जनसमूह नहीं था. गोलीकांड के बाद काफी किसान एक चौधरी कालूराम सुंडा के घर पर एकत्रित हो गए थे. यह बात गाँव कूदन के ही राजपूत सिपाही मंगेजसिंह को पता थी. चौधरी कालूराम सुंडा के घर के दरवाजे पर कैप्टन वेब खड़ा हो गया. चौधरी कालूराम अपनी हवेली के प्रथम मंजिल के कमरे में थे, अंग्रेज अफसर ने कड़क आवाज में हुक्म दिया, 'कालू राम नीचे आओ.'(राजेन्द्र कसवा, p.139)

चौधरी कालूराम नीचे नहीं आये. जब पुलिस हवेली पर चढ़ने लगी तो छत से भोलाराम गोठड़ा ने राख की हांड़ी कैप्टन वेब की और फैंकी वेब ने गुस्से में आकर तुरंत गोली चला दी गोली का निशाना तो चूक गया लेकिन भोलाराम गोठड़ा के चेहरे पर गोली के कुछ छर्रे लगे. इसके पश्चात् वेब खुद छत पर गया. वेब ने ऊपर से किसी हमले की आशंका के परिपेक्ष्य में सर पर एक छोटी खात रखी और छत पर चढ़ गया. ऊपर चढ़े सभी किसानों को गिरफ्तार कर लिया. गाँव कूदन के ही राजपूत सिपाही मंगेजसिंह ने चौधरी कालू राम को गिरफ्तार कर बेब को सौंपा. वेब के हुक्म के अनुसार कालू राम को दोनों हाथ बांध कर पूरे कूदन में घुमाया. कालू राम के घर काम करने वाले चूड़ाराम बलाई को भी गिरफ्तार कर लिया. (राजेन्द्र कसवा, p.140)

राख फैंकने की घटना से अपमानित कैप्टन वेब ने चीख कर हुक्म दिया, 'घर-घर की तलासी लो !' 'कूदन गाँव को जलादो !!' (राजेन्द्र कसवा, p.140)

पुलिस के सिपाही घर-घर में घुसने लगे. घरों की तलासी ली जाने लगी. जो भी पुरुष दिखाई दिया, उसे गिरफ्तार कर लिया. कूदन का ठाकुर सिपाही मंगेजसिंह तलासी लेने और महिलाओं को धमकाने में सबसे आगे था. उनके अमूल्य सामान को नष्ट करने में मजा आ रहा था. किसानों के घरों में घी की भरी हुई हांड़ी रखी थी. मंगेज सिंह जिस भी घर में घुसता, सबसे पहले वह घी की मटकी उठाता और फर्श पर जोर से मारता. किसान के लिए अमृत बना घी फर्श पर बहने लगा. सामान घरों से निकला गया, बर्तन-भांडे तोड़े गए एवं लुटे गए. घरों में फैलाये गए दूध और घी की सड़ांध से पूरा गाँव महक गया. (राजेन्द्र कसवा, p.140)

एक किसान का घर बंध था. पुलिस ने भूराराम खाती को बुलाया और कहा, 'इस किवाड़ को तोड़ दो.' भूरा राम ने आदेश मानने से इनकार कर दिया. उसे गिरफ्तार कर लिया. (राजेन्द्र कसवा, p.140)

25 अप्रेल 1935 को कुल 106 किसानों को गिरफ्तार किया गया. अधिकांश को देवगढ़ जेल में 81 दिन तक बंद रखा गया. कुल 106 में से 57 किसान कूदन गाँव के थे. गिरफ्तार लोगों में 13 वर्ष से 70 वर्ष तक के लोग थे. सीकर उपकारागार के रिकोर्ड के अनुसार दो को छोड़ सभी जाट थे. कालूराम के घर काम करने वाला चूड़ाराम बलाई एक मात्र दलित था. दूसरा भूराराम खाती था. (राजेन्द्र कसवा, p.141-142)

इस संघर्ष में कूदन के जिन किसानों ने आगे बढ़कर भाग लिया और अंत तक गिरफ्तार नहीं हुए, उनमें प्रमुख थे - गोविन्द राम, मुकन्दा राम, गोरु राम, सुखदेवा राम एवं रामू राम.(राजेन्द्र कसवा, p.144)

क्रूरता का तांडव

सन्दर्भ - डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.115-120

गोठड़ा गाँव में कैप्टन वेब - कैप्टन वेब को कूदन के अत्याचार से शांति नहीं मिली. वह कूदन काण्ड के दूसरे दिन सात लारियों में पुलिस लेकर दमन के लिए निकले और गोठड़ा गाँव पहुंचे. गोठड़ा में चौधरी भोलासिंह बड़े हिम्मत वाले आदमी थे. उन्होंने कहा जब तक हमारी मांगें पूरी नहीं होंगी और जाट पंचायत इजाजत नहीं देगी, तब तक लगान नहीं देंगे. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा वहां के प्रमुख चौधरी रामबक्ष (पृथ्वी सिंह के पिता) से मनचाहा लगान वसूल करना चाह. उनके मना कर देने पर उन्हें तथा स्त्रियों व लड़कों को धूप में खड़ा कर तंग किया . कैप्टन वेब पुलिस को लेकर उनके मकान में घुस गए और उनके घर का तमाम अनाज, कपडे और रूपया-पैसा निकाल लिया. खेती के औजार, रोटी बनाने के बर्तन तक नहीं छोड़े और इस प्रकार उनके घर की पूर्ण लूट की. उसी दौरान जितना नुकशान पृथ्वी सिंह- रामबक्ष का हुआ, सीकरवाटी में किसी और का नहीं हुआ. किन्तु यह परिवार झुका नहीं. बाद में गाँव के दूसरे चौधरी हरदेवसिंह से 600 रुपये उनके सब पड़ौसी किसानों के लगान के वसूल किये.

पाशविकता की पराकाष्ठा

ठाकुर देशराज[9] ने लिखा है .... कुदन के पश्चात गोठड़ा में: पुलिस और कप्तान वेब गोठड़ा गांव में भी पहुंचे। वहां पर गांव के प्रमुख चौधरी राम बक्स से मनचाहा लगान वसूल करना चाहा। वेब साहब पुलिस को लेकर मकान में घुस गए और उसके घर का समान अनाज कपड़े रुपया पैसा निकाल लिया। खेती करने के औजार, रोटी बनाने के बर्तन तक नहीं छोड़े। घर को नष्ट भृष्ट कर गाव के दूसरे चौधरी हरदेव सिंह से ₹600 उनके सब पड़ोसी किसानों के लगान भी वसूल किए। चौधरी राम बक्स और कुछ स्त्रियों को धूप में बिठाकर तंग किया।

जाट मास्टर की दुर्दशा: इस गांव से चलकर पलथाना गांव में दो जाटों से तमाम गांव का रुपया वसूल किया और जुर्माना लिया। गांव


[पृ.282]: के जाट मास्टर को गिरफ्तार कर लिया। पीछे इस मास्टर को फतेहपुर और लक्ष्मणगढ़ के कस्बों में घुमा कर जूते लगाए गए। इसके साथ एक मोटाराम जाट का भी यही हाल किया गया।

गोठडा (सीकर) का जलसा सन 1938

जयपुर सीकर प्रकरण में शेखावाटी जाट किसान पंचायत ने जयपुर का साथ दिया था. विजयोत्सव के रूप में शेखावाटी जाट किसान पंचायत का वार्षिक जलसा गोठडा गाँव में 11 व 12 सितम्बर 1938 को शिवदानसिंह अलीगढ (पिसावा जाट रियासत) की अध्यक्षता में हुआ जिसमें 10-11 हजार किसान, जिनमें 500 स्त्रियाँ थी, शामिल हुए. सम्मलेन में उपस्थ्तित प्रमुख नेता थे -

इस पंचायत में निम्न प्रस्ताव पारित किये गए-

  • 1.जाट बोर्डिंग हाऊस सीकर के लिए 1934 में जमीन देने का वायदा किया गया था, जो अभी तक नहीं दी गयी है. अतः जाट बोर्डिंग के लिए तत्काल भूमि दी जाय.
  • 2. जाट विद्यार्थियों के पढने के लिए राज्य की छात्रवृत्तियां स्वीकृत की जांय
  • 3. पढ़े-लिखे जाटों को उनकी संख्या के अनुपात में ऊँची नौकरियों में नियुक्तियां दी जांय
  • 4.पिलानी के बिड़ला कालेज को डिग्री कालेज कर दिया जाय
  • 5.गाँवों में स्कूल और अस्पताल खोले जांय
  • 6.सीकर और जयपुर की अदालतों में बाहर के वकीलों को उपस्थित होने की इजाजत दी जाय
  • 7.सीकर के वर्तमान प्रशासन में किसी प्रकार का परिवर्तन न किया जाय क्योंकि कैप्टन वेब (A.W.T.Webb) के प्रशासन के दौरान किसानों को पर्याप्त राहत मिली है. अतः वेब को तब तक रखा जाय जब तक की सीकर में भूमि बंदोबस्त पूरा न हो जाय.
  • 8. जाटों को राजनैतिक व सामाजिक मामलों में अन्य जातियों के बराबर अधिकार दिए जांय.
  • 9. जब तक सेटलमेंट न हो जाय तब तक वर्तमान में लगान की दर को आधी कर दी जाय.
  • 10. वर्तमान सीकर विद्रोह के समय जिस किसी ने भी जाटों के साथ दुर्व्यवहार किया उसे सजा दी जाय.
  • 11.जाटों को उनकी भूमि पर पुश्तैनी अधिकार दिए जांय
  • 12. विशेषकर सीकर जागीर इलाकों में सभी प्रकार की लागबाग समाप्त की जाय.
  • 13. अकाल के कारण इस वर्ष जिन किसानों की फसलें समाप्त हो गयी हैं, उनसे लगान न लिया जाय.
  • 14. प्रशासन की और से पशुओं के लिए चारे का प्रबंध किया जाय. (डॉ पेमाराम, p. 162-63)

इस बैठक में मि. यंग (F.S.Young) ने भी भाषण दिया. उन्होंने कहा कि किसानों को जयपुर सरकार से जो कुछ मिले, उसे लेना चाहिय और ठिकानेदारों के पास जाकर भी न्याय की भीख मांगनी चाहिय. शेखावाटी जाट किसान पंचायत के प्रतिनिधियों ने इस भाषण का विरोध किया और कहा कि ठिकानेदारों से निराश होकर ही हम जयपुर की शरण में जाते हैं अतः ठिकानेदारों से भीख मांगने का कहना सहनीय नहीं है. (डॉ पेमाराम, p. 163)

शेखावाटी जाट किसान पंचायत के प्रतिनिधियों से नाराज होने के कारण मि. यंग के कहने पर शेखावाटी पंचायत के प्रधान सरदार हरलाल सिंह को तथा ताड़केश्वर शर्मा पचेरी को 22 सितम्बर 1938 को एकाएक झुंझुनू में गिरफ्तार कर लिया तथा 26 सितम्बर 1938 को पंचायत के सहकारी मंत्री लादू राम किसारी को गिरफ्तार कर लिया गया. इन गिरफ्तारियों से इलाके में जोरों की हलचल मच गयी. झुण्ड के झुण्ड लोग इकट्ठे होकर इन गिरफ्तारियों का विरोध करने लगे और गिरफ़्तारी देने लगे. इन हलचलों से अधिकारी वर्ग घबरा गया और इन नेताओं को 28 सितम्बर 1938 को छोड़ दिया. (डॉ पेमाराम, p. 164)

इस जलसे में पृथ्वीसिंह गोठडा की भूमिका की चर्चा करना आवश्यक है. सामंती काल में, किसी गाँव में होने वाला यह पहला सम्मलेन था. इसमें भरतपुर, आगरा, अलीगढ, मेरठ और दिल्ली से किसान नेताओं और भजनोपदेशकों ने भाग लिया था. शेखावाटी के सभी भागों से किसान नेता, कार्यकर्ता और भजनोपदेशक सम्मिलित हुए. यह सम्मलेन पृथ्वी सिंह की पहल पर ही आयोजित किया गया था. पृथ्वी सिंह दुर्भाग्य से निरंतर बीमार रहने लगे थे. दिन-रात का संघर्ष, जेल जीवन, परिवार को मिलने वाली प्रताड़ना और लूट ने पृथ्वी सिंह को निश्चय ही परेशान किया. लेकिन वे झुके नहीं, न रुके, न टूटे. (राजेन्द्र कसवा: P. 163)

Genealogy of Bhukars of Gothra Bhukaran

  • Dalu Singh (1420) (statue at village Gothara Bhukran)
  • 10 generations (1540-1870)
  • Sukha + Natha ( → Ratan Singh Mob:09413463311)
  • Hari Ram Singh
  • Shri Chand Bhukar

Jat Monuments

Notable persons from this village

  • Dr. Ashok Kumar Choudhary (Bijarnia) - Child Specialist, Date of Birth : 1-February-1965, Village - Gothada Bhukran, Sikar, Present Address : Jat Colony Piprali Road Siakr, Resident Phone Number : 01572-270641, Mob: 9460238641
  • Dr. Tansukh Singh Choudhary (Bhukar) - SMO, Date of Birth : 1-April-1950, D-16, Basant Vihar Colony, Sikar, Phone Number : 01572-253303, Mob: 9289295303
  • Harlal Singh Choudhary (Bhukar) - A.En. Mining Department, Date of Birth:1-January-1951, VPO - Gothra Bhukran Dist - Sikar (Raj.), Present Address : Jat Colony, Choudhary Charan Singh Gate ke pass, Nawalgarh Road, Sikar (Raj), Phone: 01572-258620, Mob: 9414039620
  • Ratan Singh Bhukar - Mob:09413463311 (Source of verbal information)

Gallery

External link


References

  1. http://www.census2011.co.in/data/village/81514-gothra-bhookran-rajasthan.html
  2. Thakur Deshraj: Jat History (Hindi), Delhi, 1934, p.597
  3. Thakur Deshraj: Jat History (Hindi), Delhi, 1934, p.598
  4. Thakur Deshraj: Jat History (Hindi), Delhi, 1934, p.598
  5. Thakur Deshraj: Jat History (Hindi), Delhi, 1934, p.598
  6. ठाकुर देशराज:Jat Jan Sewak, p.1, 4-6
  7. रणमल सिंह के जीवन पर प्रकाशित पुस्तक - 'शताब्दी पुरुष - रणबंका रणमल सिंह' द्वितीय संस्करण 2015, ISBN 978-81-89681-74-0 पृष्ठ 113-114
  8. Thakur Deshraj: Jat Jan Sewak, 1949, p.253-255
  9. Thakur Deshraj: Jat Jan Sewak, 1949, p.281-82
  10. Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihasa (The modern history of Jats), Agra 1998, Section 9 pp. 21
  11. Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihasa (The modern history of Jats), Agra 1998, Section 9 pp. 21
  12. Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihasa (The modern history of Jats), Agra 1998, Section 9 pp. 21
  13. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.322a

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