Kshudrak

From Jatland Wiki
Jump to: navigation, search

Kshudrak (क्षुद्रक)(Kshudraka) is a gotra of Jats.[1] Kshudrakas were ancient tribe who formed samghas with the Malavas. They are same as Shudrakas.

Origin

History

Thakur Deshraj has explained that there was a clan of Jats named Shivi who had a republic ruled by democratic system of administration known as ganatantra. Kshudrakas had formed a sangha with Malavas. Shivis formed a sangha with a big federation or sangha known as Jat, which is clear from Paninis shloka in grammar of Aṣṭādhyāyī.- jata jhata sanghate[2]

Kshudraka (क्षुद्रक) / (Malava) (मालव) - Both tribes (II.48.14) supported the Kauravas (VI.83.7). [3]

Panini distinguishes between the Malavas or Kshudrakas and the Malavyas and Kshudrakyas respectively. The former denoted the Kshatriya and brahmana aristocracy while the latter the common folk.[4]

According to Tej Ram Sharma[5] Malava and Malavaka are also to be differentiated, the former is Personal and geographical names in the Gupta inscriptions Malava proper while the latter is lesser Malava with the diminutive suffix 'ka'. Malava is the same as Malloi of the Greeks. Panini does not mention them by name, but his sutra, V. 3. 117 speaks of 'ayudhajivi samghas', or tribes living by the profession of arms, and the Kasika says that amongst these samghas were the Malavas and Kshudrakas.

सिकन्दर की वापसी में जाट राजाओं से सामना

दलीप सिंह अहलावत[6] के अनुसार व्यास नदी के तट पर पहुंचने पर सिकन्दर के सैनिकों ने आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया। इसका कारण यह था कि व्यास से आगे शक्तिशाली यौधेय गोत्र के जाटों के गणराज्य थे। ये लोग एक विशाल प्रदेश के स्वामी थे। पूर्व में सहारनपुर से लेकर पश्चिम में बहावलपुर तक और उत्तर-पश्चिम में लुधियाना से लेकर दक्षिण-पूर्व में दिल्ली, मथुरा, आगरा तक इनका राज्य फैला हुआ था। इनका प्रजातन्त्र गणराज्य था जिस पर कोई सम्राट् नहीं होता था। समय के अनुकूल ये लोग अपना सेनापति योग्यता के आधार पर नियुक्त करते थे। ये लोग अत्यन्त वीर और युद्धप्रिय थे। ये लोग अजेय थे तथा रणक्षेत्र से पीछे हटने वाले नहीं थे। इनकी महान् वीरता तथा शक्ति के विषय में सुनकर यूनानियों का साहस टूट गया और उन्होंने आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया। इनके राज्य के पूर्व में नन्द वंश[7] (नांदल जाटवंश) के सम्राट् महापद्म नन्द का मगध पर शासन था जिसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी। यह बड़ा शक्तिशाली सम्राट् था। यूनानी लेखकों के अनुसार इसकी सेना में 20,000 घोड़े, 4000 हाथी, 2000 रथ और 2,00,000 पैदल सैनिक थे। सिकन्दर को ऐसी परिस्थिति में व्यास नदी से ही वापिस लौटना पड़ा। [8]

सिकन्दर की सेना जेहलम नदी तक उसी रास्ते से वापिस गई जिससे वह आयी थी। फिर जेहलम नदी से सिन्ध प्रान्त और बलोचिस्तान के रास्ते से उसके सैनिक गये। परन्तु वापिसी का मार्ग सरल नहीं था। सिकन्दर की सेना से पग-पग पर जाटों ने डटकर युद्ध किए। उस समय दक्षिणी पंजाब में मालव (मल्लोई), शिवि, मद्र और क्षुद्रक गोत्र के जाटों ने सिकन्दर की सेनाओं से सख्त युद्ध किया तथा सिकन्दर को घायल कर दिया। कई स्थानों पर तो जाटों ने अपने बच्चों को आग में फेंककर यूनानियों से पूरी शक्ति लगाकर भयंकर युद्ध किया।

मालव-मल्ल जाटों के साथ युद्ध में सिकन्दर को पता चला कि भारतवर्ष को जीतना कोई सरल खेल नहीं है। मालव जाटों के विषय में यूनानी लेखकों ने लिखा है कि “वे असंख्यक थे और अन्य सब भारतीय जातियों से अधिक शूरवीर थे[9]।”

सिन्ध प्रान्त में उस समय जाट राजा मूसकसेन का शासन था जिसकी राजधानी अलोर थी। जब सिकन्दर इसके राज्य में से गुजरने लगा तो इसने यूनानी सेना से जमकर युद्ध किया। इससे आगे एक और जाटराज्य था। वहां के जाटों ने भी यूनानियों से लोहा लिया[10]

सिकन्दर की सेना जब सिंध प्रान्त से सिंधु नदी पर पहुंची थी तो इसी राजा मूसकसेन (मुशिकन) ने अपने समुद्री जहाजों द्वारा उसे नदी पार कराई थी[11]

जब सिकन्दर अपनी सेना सहित बलोचिस्तान पहुंचा तो वहां के जाट राजा चित्रवर्मा ने जिसकी राजधानी कलात (कुलूत) थी, सिकन्दर से युद्ध किया[12]


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-363


अलग-अलग स्थानों पर हुए युद्ध में जाटों ने सिकन्दर को कई बार घायल किया। वह बलोचिस्तान से अपने देश को जा रहा था परन्तु घावों के कारण रास्ते में ही बैबीलोन (इराक़ में दजला नदी पर है) के स्थान पर 323 ई० पू० में उसका देहान्त हो गया[13]। उस समय उसकी आयु 33 वर्ष की थी।

भारत से लौटते समय सिकन्दर ने अपने जीते हुए राज्य पोरस और आम्भी में बांट दिये थे और सिन्ध प्रान्त का राज्यपाल फिलिप्स को बनाया। परन्तु 6 वर्ष में ही, ई० पू० 317 में भारत से यूनानियों के राज्य को समाप्त कर दिया गया और मौर्य-मौर जाटों का शासन शुरु हुआ। इसका वर्णन अध्याय पांच में किया गया है।

In Mahabharata

List of Mahabharata people and places mentions Kshudraka (क्षुद्रक) in (II.48.14),(VI.47.16), (VI.83.7), (VIII.4.46),

In Bhagavata Purana

Kusha Ancestry in Bhagavata Purana
Ancestry of Langala in Bhagavata Purana

They are descendant of a Suryavanshi King Prasenajit in the Ancestry of Kusha, son of Rama, in Bhagavata Purana.

KushaAtithiNishadhaNabhaPundarikaKshema DhanvanDevanikaAnihaPariyatraBalasthalaVajra Nabha (Incarnation of Surya) → SaganaVidhritiHiranya NabhaPushpaDhruva SandhiSudarshanaAgni VarnaMaruPrasusrutaSandhiAmarshanaMahasvatVisvabahuPrasenajitTakshakaBrihadbala (killed at the battle of Kurukshetra by Abhimanyu)

(Time of Parikshit)

Brihat-ranaVatsa-vriddhaPrativyomaBhanuDivakaSahadevaBrihadasvaBhanumatPratikasvaSupratikaMarudevaSunakshatraPushkaraAntarikshaSutapasAmitrajitBrihadraiBarhiKritanjayaRananjayaSanjayaShakyaSuddhodaLangalaPrasenajitKshudrakaSumitra

Sumitra shall be shall be the last of Ikshvaku dynasty in this Kaliyuga.

Population

Distribution

Notable persons

See also

References

  1. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. श-5
  2. Jat History Thakur Deshraj,pp. 87-88.
  3. अम्बष्ठाः कौकुरास तार्क्ष्या वस्त्रपाः पह्लवैः सह । वसातयः समौलेयाः सह क्षुद्रकमालवैः (II.48.14)
  4. Personal and geographical names in the Gupta inscriptions/Prologue II,p.124
  5. Personal and geographical names in the Gupta inscriptions/Tribes,p.149
  6. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.363-364
  7. जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज, लेखक बी० एस० दहिया ने पृ० 256 पर लिखा है कि यह कहना उचित है कि नन्द जाट आज नांदल/नांदेर कहे जाते हैं।
  8. भारत का इतिहास, पृ० 47, हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी; हिन्दुस्तान की तारीख उर्दू पृ० 161-162)
  9. हिन्दुस्तान की तारीख उर्दू पृ० 162 भारत का इतिहास पृ० 47 हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड, भिवानी।
  10. जाट इतिहास क्रमशः पृ० 695, 192, 695 लेखक ठा० देशराज।
  11. जाट इतिहास क्रमशः पृ० 695, 192, 695 लेखक ठा० देशराज।
  12. जाट इतिहास क्रमशः पृ० 695, 192, 695 लेखक ठा० देशराज।
  13. भारत का इतिहास पृ० 47, हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी; हिन्दुस्तान की तारीख उर्दू पृ० 162।

Back to Jat gotras