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Shivi (शिवी)[1] Shibi (शिबि)[2] Sibi (सिबी) Sibia (सिबिया) [3][4]Shibia (शिबिया)[5] is a gotra of Jats. Sibia is found in Punjab and Shivi in Uttar Pradesh. [6] Dilip Singh Ahlawat has mentioned it as one of the ruling Jat clans in Central Asia. [7]


Ancestry of Shivi as per Bhagavata Purana

The descendants of Shiva ere called Shivi. Samrat Ushinara's son was Shivi. [8]Shivi was the name of a King and a Gana in ancient India, ruled by democratic system of administration known as ganatantra. Kshudrakas had formed a sangha with Malavas. Sibia were the people descendants of Sibi. Shivis formed a sangha with a big federation or sangha known as Jat, which is clear from Panini's shloka in grammar of Aṣṭādhyāyī. The famous Sanskrit scholar Panini of 500 BCE has mentioned in his Sanskrit grammar known as Aṣṭādhyāyī in the form of shloka as जट झट संघाते or Jata Jhata Sanghāte. This means that the terms 'Jat' and 'democratic federation' are synonymous. [9]


The Shivi republic is very ancient and finds mention in Vedas. The Puranas write then as descendants of Ushinara. The Buddhist literature has also mentioned about this gana and mention that Tathagata once took birth in this gana.[9]

At the time of invasion of India by Alexander the great, in 326 BCE, they were found inhabiting area in the vicinity of Malava tribes. The Greek writers have mentioned them wearing clothes similar to wild people even during the war. After some time of Alexander's war, they probably moved to Rajasthan along with Malavas. Thus they are found moveing from Punjab to Malwa and from their to Rajasthan. Their are ruins of an ancient town called 'Tamva-vati nagari' 11 miles north of Chittor. Ancient coins of Shivi people are found near this town bearng 'Majhamikaya Shivajanapadas', which means coins of 'Shiva janapada of Madhyamika'. The 'Tamvavati nagari' was called as 'Madhyamika nagari'. These coins are of the period first to second century BCE. [9]

The Shokeen or Shivakhande clan

According to Hukum Singh Panwar (Pauria), it may, however, be interesting to note that a Jat tribe, living in about 25 contiguous villages in Jind district of Haryana and about 5 villages in Nangloi block of Delhi , goes by its gotra name as Shivakhande or Sheokhand. of late this gotra has been Arabicised as Shokeen in Delhi villages. Yet the elders of Sheokhand Khap area take pride in the fact that they originally hail from the Dharans, whose kingdom was rather misnomered as "Gupta Empire" in Indian history. Be that as it may, one thing is plausible about the Jats of Sheokhande clan. They must be the Sivas who fought against the Bharatas on the Jamuna River in one of the ten Rigvedic wars i.e. Battle of the Ten Kings. They are identified by scholars with the Shivis[10] or the Sibis of the Usinara country in the north of Haridwar near the source of Ganges.[11] The Sivas or Sibis became known as Shivakhande or Sheokhande from and after the Shivaliks, the abode of Lord Shiva, the highest deity of the Jats. Their descent from the Shivalik hills has provided good grounds to the author of Devasamhita to expound this theory. [12]

Shivi Kings

The Jatakas mention about rulers of Shivi tribe. One of them was a religious and kind king named Sanjaya, who donated every thing and moved himself with his wife Madri, son Jali Kumar and daughter Krishnajina Kumari to 'Bankagiri'. The Buddhist literature 'Avadan Kalplata' writes Sanjay a Vishwamitra. These people were democratic rulers of Ganasangha type. All works were done in these ganas with the consent of clan people. [9]

King Shivi (शिवि) was another great King of this tribe, powerful and generous king. Indra and Agni once tested his generosity by becoming birds when the king gave flesh from his body to fulfil his duty.

Sivi or Sibi Jats

Historian Bhim Singh Dahiya has provided proofs of Sivis being Jats. The first proof is of course the name itself. Sibi or Sivi, is the original name of their ancestor and Sibiya/Sibia is derivative meaning the descendants of Sibi. This clan name is only found in the Jats and in no other population group of India. These Sibia Jats are still existing. Shri Gurbax Singh Sibia, ex-minister in Punjab Cabinet was a scion of this ancient clan. The second proof is in the name of their city - Jattararur (Chittor) - which is based on the word Jatta-city of Jats. Incidentally, this is another proof of the fact that Mewar was under the Jats for very long time. Hence the names of its cities like Jaisalmer, Sikar, Sirohi, etc. The last two are names of the Jat clan also. [13]

The Buddhist Sibi Jataka (No. 499) contains their history and legends, and Vesantara Jataka, is named after a son of Sibia King of Jattaraur (Chittor). Their capital in Punjab was Sibipura (Modern Shorkot) [14] Rig Veda mentions the Sibi people and Baudhayana Srauta Sutra mentions, their king, Usinara , whom Indra saved from foreign aggression. They are the Sibai of Arrian and Siboi, of Deodorus. [15] [16]

Dr Pema Ram writes that after the invasion of Alexander in 326 BC, the Jats of Sindh and Punjab migrated to Rajasthan. They built tanks, wells and Bawadis near their habitations. The tribes migrated were: Shivis, Yaudheyas, Malavas, Madras etc. The Shivi tribe which came from Ravi and Beas Rivers founded towns like Sheo, Sojat, Siwana, Shergarh, Shivganj etc. This area was adjoining to Sindh and mainly inhabited by Jats. The descendants of Shivi in Rajasthan are: Seu, Shivran, Shivral, Sihot, Sinwar, Chhaba etc. [17]

उद्यान, कैस्पियन सागर में शिवि

शिवि - इन लोगों का राज्य पेशावर के उत्तर में उद्यान नामक प्रदेश पर था।[18]

शिवि वंश - आरम्भकाल में इन लोगों का राज्य उद्यान प्रदेश पर था। यह आजकल मस्सागेटाई नाम से प्रसिद्ध है जो कि कैस्पियन सागर के पश्चिमी किनारों पर वह प्रदेश है जिसको अरेकिसज एवं उसकी सहायक नदी कुर सींचती है। यह सीथिया देश का ही एक प्रान्त था। यहां पर जाटों की बड़ी शक्ति रहती आई है। शिवि लोगों का एक दल यूरोप की ओर बढ़ गया और स्केण्डेनेविया में पहुंच गया। दूसरा दल भारत से ईरान पहुंचा जहां इनका शासन शाकद्वीप (जो ईरान के उत्तर में है) पर था। इन लोगों ने एक शिवस्थान नामक नगर बसाया जो आज सीस्तान कहलाता है। सीस्तान ईरान के पूर्व प्रदेश में तथा अफगानिस्तान के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। जाट इतिहास अंग्रेजी अनुवाद पृ० 36, 101 लेखक रामसरूप जून ने लिखा है कि 2000 ई० पू० शिवि गोत्र के जाटों ने ईरान में सीस्तान प्रान्त पर राज्य स्थापित किया। चीनी यात्री फाह्यान व ह्यूनत्सांग ने भी ईरान को शिवि देश कहा है।[19]

शिवि गोत्र के तोमऋषि नामक राजा अमू दरिया के दक्षिणी क्षेत्र पर राज्य करते थे। इनकी राजधानी उद्यान थी। छठी शताब्दी ई० पू० में इनका युद्ध फारस के प्रसिद्ध सम्राट साईरस से, खुरासान के पूर्वी क्षेत्र पर हुआ था जिसमें साईरस को मुंह की खानी पड़ी और वह वापिस लौट गया। (जाट इतिहास उत्पत्ति और गौरव खण्ड), (पृ० 162-163, ले० ठा० देशराज)। (देखो तृतीय अध्याय, शिवि वंश प्रकरण)।[20]

शिवि का इतिहास

दलीप सिंह अहलावत[21] लिखते हैं:

चन्द्रवंशी सम्राट् उशीनर के पुत्र शिवि थे। प्रसिद्ध दानी महाराज शिवि की कथाओं से सारी हिन्दू जाति परिचित है। इसी सम्राट् से शिविवंश प्रचलित हुआ जोकि जाटवंश (गोत्र) है1। पेशावर के उत्तर उद्यान नामक स्थान में इनका राज्य था। शेरकोट झंग में इनके द्वारा बसाया शिविनगर आज भी विद्यमान है। इस शिविवंश का वर्णन रामायण में है। महाभारतकाल में युधिष्ठिर ने स्वयंवर रीति से शिवि नरेश गोवासन की कन्या देवकी से विवाह किया था, जिससे एक पुत्र जिसका नाम यौधेय था, उत्पन्न किया (महाभारत आदिपर्व 95वां अध्याय)। यही राजा गोवासन पूर्व प्रतिज्ञाबद्ध होने से दुर्योधन की ओर से महाभारत युद्ध में शामिल हुआ था। द्रोणपर्व अध्याय 95, श्लोक 38 में लिखा है कि इस राजा गोवासन के अतिरिक्त पांचों पांडवों के साथ द्रोपदी को काम्यक वन में जयद्रथ और शिविवंशी राजा कोटिकाश्य ने भी देखा था। वनपर्व (267-5) में इस कोटिकाश्य को शैव्य सुरथ का पुत्र लिखा है। द्रोणपर्व (22-12) में युद्धलिप्त शैव्य चित्ररथ का वर्णन है। यह शैव्यवंश या शिविवंश एक ही है। एक शिविवंश राजा को द्रोण ने मारा और एक पर श्रीकृष्ण जी ने विजय प्राप्त की थी। वनपर्व (12-31) से यह भी विदित होता है कि ये शिविराजे सिंधुओं के करद थे।

आरम्भकाल (वैदिककाल) में भारतवर्ष में शिवि लोगों को दक्ष राजा से भी भयंकर युद्ध करना पड़ा था। वीरभद्र इनका सेनापति था जो दक्ष को मारकर तथा दक्षनगर (कनखल) को विध्वंस करने के कारण ही प्रसिद्ध हुआ था। ईसा से सन् 326 वर्ष पूर्व जब विश्वविजेता सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय शिवि लोग मालव (मल्लों) के पड़ौस में बसे हुए थे। उस समय के इनके वैभव के सम्बन्ध में सिकन्दर के साथियों ने लिखा है - कि इनके पास चालीस हजार तो पैदल सेना थी। इन शिवि2 जाटों ने सिकन्दर की सेना का बड़ी वीरता से मुकाबला किया। कुछ लोगों ने पंजाब के वर्तमान शेरकोट (जि० झंग) जो पाकिस्तान में है, को इनकी राजधानी बताया है। महर्षि पतञ्जलि ने भी इस वंश का वर्णन किया है। बौद्ध-काल में इनकी अच्छी स्थिति थी। बौद्ध लोगों का कहना है कि भगवान् बुद्ध ने पहले एक बार शिवि लोगों में भी जन्म लिया था। शिवि जातक और सुंगयन के यात्रा वर्णन से शिवि जनतन्त्र की स्थिति पेशावर से सात दिन की यात्रा

1. देखो वंशावली, अनु का वंश।
2. शिवि को यूनानियों ने शिबोई कहा है। महाभारत में शैवल, पतञ्जलि ने शैव्य तथा बौद्धग्रन्थों में शिवि लिखा है।

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-195

करने पर सिंधुपार निश्चित होती है जहां सम्राट् अशोक के द्वारा महाराजा शिवि की स्मृति में एक स्तूप और विहार के निर्माण कराए जाने का भी परिचय मिलता है।

शिवि लोगों के फैलने का वर्णन हमको तीन स्थानों पर मिलता है -

  1. आरम्भ में ये लोग हरद्वार से शिवालिक की पहाड़ियों और मानसरोवर के निचले हिस्से में आबाद थे। फिर यह उत्तर-पूर्व पंजाब में फैल गये। यही पंजाब के शिवि लोग राजपूताना में चित्तौड़ तक पहुंच गये जहां इनकी राजधानी मध्यमिका नगरी थी। यहां से इनके सिक्के भी प्राप्त हुये हैं जिन पर लिखा हुआ है - मज्झिम निकाय शिव जनपदस
  2. दूसरा समुदाय इनका तिब्बत को पार कर गया जो वहां की भाषा में श्यूची कहलाने लगा। कई इतिहासकारों का मत है कि कुषाण लोग इन्हीं श्यूची (शिवि) लोगों की एक शाखा थे। महाराजा कनिष्क कुषाणवंश के जाट नरेश थे।
  3. शिवियों का एक समूह उद्यान से ईरान की ओर बढ़ गया था। वहां उन्होंने एक शिवस्थान नामक नगर अपने नाम से बसाया जो अब सीस्तान कहलाता है। ईरान से इनका एक दल, जाटों के अन्य दलों के साथ यूरोप में बढ़ गया। [Scandinavia|स्कण्डनेविया]] और जटलैंड दोनों में ही इनका जिक्र आता है। टसीटस, टालेमी और पिंकर्टन तीनों का ही कहना है कि - “जटलैंड में जट (जाट) लोगों की छः जातियां (वंश) थीं जिनमें सुरावी, किम्ब्री हेमेन्द्री और कट्टी भी शामिल थीं, जो एल्व और वेजर नदियों के मुहाने तक फैल गईं थीं। वहां पर इन्होंने युद्ध के देवता के नाम पर इमनश्यूल नाम का स्तूप खड़ा किया था।” ये सुरावी ही शिवि जाट और किम्ब्री ही कृमि जाटवंश हैं। इन लोगों में हर गौरी और पृथ्वी की पूजा प्रचलित थी। उत्सवों पर वे हरिकुलेश1 (विष्णु) और बुद्ध2 की प्रशंसा के गीत गाते थे (हर गौरी - शिव पार्वती)। ये लोग संघ (गण) अधिपति को गणपति व गणेश कहते थे। इनकी जितनी भी छोटी-छोटी शाखायें थीं वे ‘जाति राष्ट्र’ (प्रजातन्त्र संघ) में सम्मिलित हो गईं थीं।

अफ़गानिस्तान में शिवि और कुर्रम दो जिले हैं, जो शिवि और कृमि जाटों के नाम पर प्रसिद्ध हुये थे। हाला जाटों के नाम पर हाला पहाड़ भी है जिसे सोमगिरि के नाम से भी पुकारते हैं। जाटों में शिवि गोत्रियों की बहुत बड़ी जनसंख्या रही है, यहां तक कि इनकी अधिकता को देखकर “ट्राइब्स एण्ड कास्ट्स आफ दी नार्थ प्राविन्सेज एण्ड अवध” के लेखक मि० कुर्क साहब ने लिखा है कि “दक्षिण-पूर्व के जाट अपने को दो भागों में बांटते हैं। शिवि-गोत्री या शिव के वंशज और कश्यप गोत्री।” इसी तरह की बात कर्नल टॉड भी प्रसिद्ध इतिहासकार टसीटस के हवाले से लिखते हैं - “स्कन्धनाभ देश में जट नामक एक महापराक्रमी जाति निवास करती थी, इस जाति के वंश की

1. Herodotus|हेरोडोटस]] मिश्र देश की परम्परा के आधार पर लिखता है - हरकुलीस दूसरी श्रेणी के देवों में से एक है। ये बारह हैं (दक्ष की अदिति कन्या से 12 देव कहलाये जिन में विष्णु सबसे छोटा और गुणवान् था। इनसे पहले 8 देव हुए जो पहली श्रेणी में गिने जाते हैं और विष्णु आदि 12 देव दूसरी श्रेणी में)। यह विष्णु का नाम ही हरकुलीस बन गया (भारत का वृहद इतिहास पृ० 220 लेखक पं० भगवद्दत्त बी० ए०)
2. जिस चन्द्र से चन्द्रवंश चला, का पुत्र बुध था।

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-196

बहुत-सी शाखायें थीं। उन शाखाओं में शैव और शिवि लोगों की विशेष प्रतिष्ठा थी।” हिन्दुओं के प्राचीन ग्रन्थकारों ने शिवि लोगों को शैवल और शैव्य करके भी लिखा है।

पंजाब के सिक्ख जाटों मे शिवहोते दल के क्षत्रिय भी शिविवंश के ही हैं। जालन्धर जिले में चक्रदेशराज, बड़ा पिण्ड, छोटी रुडका, चकसाह, पिसौड़ी इसी वंश के बड़े गांव हैं।

शिवि वंश के शाखा गोत्र - 1. शिवहोते 2. तेवतिया 3. भटौनिया[22]

सिकन्दर की वापसी में जाट राजाओं से सामना

दलीप सिंह अहलावत[23] के अनुसार व्यास नदी के तट पर पहुंचने पर सिकन्दर के सैनिकों ने आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया। इसका कारण यह था कि व्यास से आगे शक्तिशाली यौधेय गोत्र के जाटों के गणराज्य थे। ये लोग एक विशाल प्रदेश के स्वामी थे। पूर्व में सहारनपुर से लेकर पश्चिम में बहावलपुर तक और उत्तर-पश्चिम में लुधियाना से लेकर दक्षिण-पूर्व में दिल्ली, मथुरा, आगरा तक इनका राज्य फैला हुआ था। इनका प्रजातन्त्र गणराज्य था जिस पर कोई सम्राट् नहीं होता था। समय के अनुकूल ये लोग अपना सेनापति योग्यता के आधार पर नियुक्त करते थे। ये लोग अत्यन्त वीर और युद्धप्रिय थे। ये लोग अजेय थे तथा रणक्षेत्र से पीछे हटने वाले नहीं थे। इनकी महान् वीरता तथा शक्ति के विषय में सुनकर यूनानियों का साहस टूट गया और उन्होंने आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया। इनके राज्य के पूर्व में नन्द वंश[24] (नांदल जाटवंश) के सम्राट् महापद्म नन्द का मगध पर शासन था जिसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी। यह बड़ा शक्तिशाली सम्राट् था। यूनानी लेखकों के अनुसार इसकी सेना में 20,000 घोड़े, 4000 हाथी, 2000 रथ और 2,00,000 पैदल सैनिक थे। सिकन्दर को ऐसी परिस्थिति में व्यास नदी से ही वापिस लौटना पड़ा। [25]

सिकन्दर की सेना जेहलम नदी तक उसी रास्ते से वापिस गई जिससे वह आयी थी। फिर जेहलम नदी से सिन्ध प्रान्त और बलोचिस्तान के रास्ते से उसके सैनिक गये। परन्तु वापिसी का मार्ग सरल नहीं था। सिकन्दर की सेना से पग-पग पर जाटों ने डटकर युद्ध किए। उस समय दक्षिणी पंजाब में मालव (मल्लोई), शिवि, मद्र और क्षुद्रक गोत्र के जाटों ने सिकन्दर की सेनाओं से सख्त युद्ध किया तथा सिकन्दर को घायल कर दिया। कई स्थानों पर तो जाटों ने अपने बच्चों को आग में फेंककर यूनानियों से पूरी शक्ति लगाकर भयंकर युद्ध किया।

मालव-मल्ल जाटों के साथ युद्ध में सिकन्दर को पता चला कि भारतवर्ष को जीतना कोई सरल खेल नहीं है। मालव जाटों के विषय में यूनानी लेखकों ने लिखा है कि “वे असंख्यक थे और अन्य सब भारतीय जातियों से अधिक शूरवीर थे[26]।”

सिन्ध प्रान्त में उस समय जाट राजा मूसकसेन का शासन था जिसकी राजधानी अलोर थी। जब सिकन्दर इसके राज्य में से गुजरने लगा तो इसने यूनानी सेना से जमकर युद्ध किया। इससे आगे एक और जाटराज्य था। वहां के जाटों ने भी यूनानियों से लोहा लिया[27]

सिकन्दर की सेना जब सिंध प्रान्त से सिंधु नदी पर पहुंची थी तो इसी राजा मूसकसेन (मुशिकन) ने अपने समुद्री जहाजों द्वारा उसे नदी पार कराई थी[28]

जब सिकन्दर अपनी सेना सहित बलोचिस्तान पहुंचा तो वहां के जाट राजा चित्रवर्मा ने जिसकी राजधानी कलात ([[Kuluta|कुलूत) थी, सिकन्दर से युद्ध किया[29]

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-363

अलग-अलग स्थानों पर हुए युद्ध में जाटों ने सिकन्दर को कई बार घायल किया। वह बलोचिस्तान से अपने देश को जा रहा था परन्तु घावों के कारण रास्ते में ही बैबीलोन (इराक़ में दजला नदी पर है) के स्थान पर 323 ई० पू० में उसका देहान्त हो गया[30]। उस समय उसकी आयु 33 वर्ष की थी।

भारत से लौटते समय सिकन्दर ने अपने जीते हुए राज्य पोरस और आम्भी में बांट दिये थे और सिन्ध प्रान्त का राज्यपाल फिलिप्स को बनाया। परन्तु 6 वर्ष में ही, ई० पू० 317 में भारत से यूनानियों के राज्य को समाप्त कर दिया गया और मौर्य-मौर जाटों का शासन शुरु हुआ। इसका वर्णन अध्याय पांच में किया गया है।

Distribution in Punjab

Villages in Ludhiana district

Notable persons

  • Shri Gurbax Singh Sibia, ex-minister in Punjab Cabinet was a scion of this ancient clan.


  1. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. श-3
  2. O.S.Tugania:Jat Samuday ke Pramukh Adhar Bindu,p.60,s.n. 2315
  3. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. स-179
  4. O.S.Tugania:Jat Samuday ke Pramukh Adhar Bindu,p.62,s.n. 2463
  5. B S Dahiya:Jats the Ancient Rulers (A clan study), p.243, s.n.219
  6. Jat History Thakur Deshraj/Chapter VIII,s.n. 350,p-586
  7. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter IV, p.341
  8. Mahendra Singh Arya et al: Adhunik Jat Itihas, p. 280
  9. 9.0 9.1 9.2 9.3 Thakur Deshraj, Jat Itihas, pp. 87-88.
  10. Kathasaritsagar, vol.1 p. 11
  11. ABORI, vol. XXIX, p. 117, fn. 9
  12. Hukum Singh Panwar (Pauria):The Jats - Their Origin, Antiquity & Migrations, p. 38
  13. Bhim Singh Dahiya: Jats the Ancient Rulers (A clan study), p.79
  14. Epigraphica Indica, 1921, p. 16; also Panini, IV/ 2/109
  15. Indica, 5, 12
  16. Bhim Singh Dahiya, Jats the Ancient Rulers ( A clan study), p. 289
  17. Dr Pema Ram:Rajasthan Ke Jaton Ka Itihas, ,p.14
  18. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter IV, p. 341
  19. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter IV, p.351
  20. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter IV, p.351
  21. [[जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.195-197
  22. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter III,p.197
  23. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.363-364
  24. जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज, लेखक बी० एस० दहिया ने पृ० 256 पर लिखा है कि यह कहना उचित है कि नन्द जाट आज नांदल/नांदेर कहे जाते हैं।
  25. भारत का इतिहास, पृ० 47, हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी; हिन्दुस्तान की तारीख उर्दू पृ० 161-162)
  26. हिन्दुस्तान की तारीख उर्दू पृ० 162 भारत का इतिहास पृ० 47 हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड, भिवानी।
  27. जाट इतिहास क्रमशः पृ० 695, 192, 695 लेखक ठा० देशराज।
  28. जाट इतिहास क्रमशः पृ० 695, 192, 695 लेखक ठा० देशराज।
  29. जाट इतिहास क्रमशः पृ० 695, 192, 695 लेखक ठा० देशराज।
  30. भारत का इतिहास पृ० 47, हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी; हिन्दुस्तान की तारीख उर्दू पृ० 162।

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