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Brahmans are a priestly community in India.

Common clans with Jats

Mention by Panini

Brahmana (ब्राह्मण), Brahmana Sena (ब्राह्मण सेना), is mentioned by Panini in Ashtadhyayi. [1]


Ram Sarup Joon[2] writes that... Bhardwaj, Kaushik, Mudgil and Kirayan Brahmins are descendants of Yayati. Jat Kings who took to penance and became Rishis.

Bhim Singh Dahiya[3] writes that....In a recent article, "The Antiquity of Magas in Ancient India", V.C. Srivastava shows that the Maga priests, who were foreigners, came to India in sixth/eighth centuries B.C., and were ultimately accepted as Brahmans in India. They were the priests of the sun god, par excellence! 10 In fact, the local Indian priests were deemed to be unsuitable for sun worship methodology. Mythology takes the sun worship to Samba, son of Lord Krishna, who was cured of a serious disease by the Magians in the West and who was the first to establish a sun temple in western India. The Bhavishya and Agni Puranas give further details of these people, and for a full discussion on these people-and their offshoot the Achaemenians reference may be made to S. Chattopadhya's excellent book, The Achaemends in India and to Elements of Hindu Iconography by Gopinath Rao.

Bhim Singh Dahiya[4] writes....The whole concept of sun-worship in India is connected with these Magian priests of the Central Asian Jats. They are called the Brahmans of Sakadvipa. The Bhavishya Purana is full of their customs. It is significant that for a considerable period of time, the Indians considered only the first three among the Vedas and the fourth Veda was not considered a Veda at all. It was only when these Magian priests were accepted as Brahmans, that the Atharva Veda was accepted as a full-fledged Veda thus making the quarter.[5] There is evidence to indicate that Chanakya himself was a Magi brahman. That is why, he gives more importance to Anvikshiki than to the Vedas. That is why again that Chanakya makes the Atharvana minister as a supreme guide to the king. Even the full name of this Veda is Atharvangirasa. We know that Angirasas are definitely sunworshippers alongwith the Bhrigus. This fourth Veda in fact is more Persian than Indian, in the traditional sense. According to Vishnu Purana, Samba, son of Krishna brought 18 families of Maga priests from Sakadvipa to India to officiate as priests in the sun temple. Here we must note that these priests were brought not fromPersia proper but from sakadvipa, the land of the Scythians. It is another matter that in subsequent period of history, this land also came under the Persian empire. But that does not make it Persian or Zoroastrian in religion. It was Magian, pure and simple.

Chapter xvi. Campaign against Oxycanus and Sambus.

Arrian[6] writes....THEN he (Alexander the Great) took the archers, Agrianians, and cavalry sailing with him, and marched against the governor of that country, whose name was Oxycanus, because he neither came himself nor did envoys come from him, to offer the surrender of himself and his land. At the very first assault he took by storm the two largest cities under the rule of Oxycanus; in the second of which that prince himself was captured. The booty he gave to his army, but the elephants he led with himself. The other cities in the same land surrendered to him as he advanced, nor did any one turn to resist him; so cowed in spirit~ had all the Indians now become at the thought of Alexander and his fortune. He then marched back against Sambus, whom he had appointed viceroy of the mountaineer Indians and who was reported to have fled, because he learned that Musicanus had been pardoned by Alexander and was ruling over his own land. For he was at war with Musicanus, But when Alexander approached the city which the country of Samb held as its metropolis, the name of which was Sindimana, the gates were thrown open to him at his approach, and the relations of Sambus reckoned up his money and went out to meet him, taking with them the elephants also. They assured him that Sambus had fled, not from any hostile feeling towards Alexander, but fearing on account of the pardon of Musicanus. He also captured another city which had revolted at this time, and slew as many of the Brahmans as had been instigators of this revolt. These men are the philosophers of the Indians, of whose philosophy, if such it may be called, I shall give an account in my book descriptive of India.

जाट-ब्राह्मण संघर्ष

ठाकुर देशराज[7] ने लिखा है.... उधर ब्राह्मण लोग जाटों से उनकी सामाजिक उदारता के कारण असंतुष्ट थे ही। जैन और ब्राह्मणों का जिस समय संघर्ष चल रहा था उस समय तो ब्राह्मणों ने स्पष्ट कह दिया था कि कलयुग में कोई क्षत्रिय नहीं है। क्योंकि जैन लोग आरंभ में केवल तीन ही वर्ण मानते थे: क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। बौद्ध लोग भी ब्राह्मण की अपेक्षा क्षत्रिय को ऊंचा समझते थे। यही कारण था कि ब्राह्मणों को क्रोध में वह फतवा देना पड़ा कि कलयुग में क्षत्रिय वर्ण ही नहीं है। किंतु राज शक्ति के बिना धर्म का प्रचार होने में बड़ी कठिनाई थी। अतः पहले तो उन्होंने कई राज्यों को षड्यंत्र द्वारा अपने हाथ में किया। शुंग, चच और कण्व इसके उदाहरण हैं* किंतु कुछ काल बाद अनेकों बौद्ध जैन राजाओं को अपने धर्म में दीक्षित कर लिया। दीक्षा संबंधी सबसे बड़ा उत्सव आबू का यज्ञ है जिसमें उत्तरी भारत के अनेक वंश आकर दीक्षित हुए थे। चाहू, परिहार, सोलंकी और परमार इन में मुख्य हैं। यहीं से एक तीसरे अग्निकुल की स्थापना हुई। पीछे से ब्राह्मण और अग्निकुल एक हो गए। हो ही जाने चाहिए थे उनकी स्थापना का उद्देश्य ही एक था। इस आंदोलन

* देखो विश्वेश्वरनाथ रेऊ कृत भारत के प्राचीन राजवंशी द्वितीय भाग में शुंग और कण्व वंश का वर्णन।

[पृ.30]:आंदोलन (movement) के मुख्य दो केंद्र थे। आबु और नैमिषारण्य। यह अग्निकुली और ब्रह्मकुली लोग ही आगे चलकर राजपूत के नाम से प्रसिद्ध हो गए और अब क्षत्रिय शब्द का स्थान राजपूत शब्द ने ले लिया। हालांकि राजपूत क्षत्रिय वंशवृक्ष की एक शाखा मात्र थे। बढ़ते बढ़ते एक समय राजपूतों के संगठन में 36 कुल शामिल हो गये थे। इनकी कई बार गणना हुई है। पहले के बाद में जितनी बार भी गणना हुई संख्या बढ़ती ही गई। किंतु नाम 36 ही रहा है। चंद्रबरदाई के बाद कर्नल टोड ने ही शायद इस गिनती को दोहराया था।* यदि आज गिनती की जाए तो यह संख्या अब 200 के करीब पहुंचाएगी क्योंकि तब से कई राज खानदान इस राजपूत संगठन में शामिल हो गए हैं। कपूरथला के अहलूवालिया और पडरौना के कुर्मी तो अभी पिछले 15-20 वर्षों में ही दीक्षित हुए हैं। बस इस संगठन में जो भी क्षत्रिय खानदान शामिल नहीं हुए उन्हें ही क्षत्रीयेतर वृषल और शूद्र तक कहने की धृष्टता की गई। हालांकि खत्री, लुहाना, धाकड़, गुर्जर, रवा और जाट पुरातन क्षत्रियों में से हैं। जाटों ने अनेक प्रकार के कष्ट सहकर भी उन रिवाजों को आज तक नहीं छोड़ा है जो वैदिक काल के उनके पूर्वजों द्वारा निर्धारित की गई थी।

* कर्नल टॉड ने इस 36 कुलों की संख्या में जाटों का भी नाम दर्ज किया है।

[पृ.31]: धार्मिक विद्वेष से बौद्ध काल के बाद के ब्राह्मणों और उनके अनुयायियों ने जाटों को गिराने के लिए ही यह कहना आरंभ किया था कि वे क्षत्रिय नहीं हैं। वरना क्या कारण है कि एक राजपूत प्रमार तो क्षत्रिय है और दूसरा जाट प्रमार क्षत्रीय नहीं है। जबकि वे दोनों इस बात को स्वीकार करते हैं कि हमारे दोनों के बाप-दादा एक ही थे। जाटों में वे सारे गोत्र मौजूद हैं जो राजपूतों की 36 कुलों में गिने जाते हैं। जाट और राजपूतों में जिनके गोत्र मिलते हैं रक्त का तो कोई अंतर है नहीं। हां रिवाजों का थोड़ा अंतर अवश्य है।

ठाकुर देशराज[8] ने लिखा है....विचार स्वातंत्र्य एक अच्छी बात है किंतु जब यह आजाद ख्याली सांप्रदायिकता का रूप पकड़ लेती है तो विष का काम देने लगती है। इसी सांप्रदायिकता ने ही ईरानी आर्यों को भारतीय आर्यों से असुर कहलवाया। उन्होंने भी इन्हें सुर (ईरानी भाषा में शराबी) कहा। * कहाँ तक कहें अनेकों सूर्यवंशी और चंद्रवंशी खानदानों को वृषल की पदवी से बदनाम किया था:-

शनकैस्तु कियालोपादिमा क्षत्रियजातयः। वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥

[पृ.32]: पौंड्रकाश्चौडद्रिवडाः कम्बोजा: यवनाः शकाः । पारदा पल्हवाश्चीन: किराता दरदाः खशाः ॥

अर्थात् - पौन्ड्र, ओड, द्रविड़, कम्बोज, शक, पारद, पल्हव, चीन, किरात, दरद, खश ये क्षत्रिय जातियां हैं किन्तु ब्राह्मणों के दर्शन न करने और क्रियालोप होने से वृषल हो गईं।

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