Dharampal Singh Bhalothia

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Author:Vikas Bhalothia

Mahashay Dharampal Singh Bhalothia' (27.1.1926-7.10.2009) (महाशय धर्मपाल सिंह भालोठिया), from Village Dhani Bhalothia, district Mahendragarh, Haryana, was a poet, freedom fighter and reformer. He is author of many books. His books available online are:

1. Aitihasik Kathayen - 1 to 12 --------- M.9460389546

2. Mera Anubhaw (Sanshodhit) Bhajan 1 to 112

संक्षिप्त जीवन परिचय

उत्तरी भारत के प्रसिद्ध भजनोपदेशक, समाज सुधारक एवं स्वतंत्रता सेनानी स्व0 श्री धर्मपाल सिंह भालोठिया का जन्म 27 जनवरी, 1926 को पूर्व रियासत पटियाला जिला महेन्द्रगढ़ (हरियाणा) के ढ़ाणी भालोठिया गाँव में एक साधारण किसान श्री धन्नाराम जांगू के घर में हुआ। ढ़ाणी भालोठिया सतनाली से चरखी-दादरी रूट पर सतनाली से 7 किलोमीटर की दुरी पर है । आपके पूर्वज ढ़ाणी भालोठ (झुंझुनूं) से ईण्डाली (झुंझुनूं) जाकर बसे एवं ईण्डाली से लच्छूराम एवं डालूराम ने आकर फिर ढ़ाणी भालोठिया बसाया। आठ साल की उम्र में ही पिता का देहान्त हो गया था। वर्ष 1946 में लुहारू राज्य में छोटी चहड़ के श्री भोपाल सिंह आर्य की सुपुत्री सुमित्रा देवी से पाँच बाराती एवं बिना दान दहेज के शादी हुई।

आपने प्राथमिक शिक्षा पड़ौस के गाँव कादमा में पं ठाकुर दास जी की पाठशाला में प्राप्त की। बचपन से ही लोक संगीत में रूचि होने के कारण आर्य समाज के प्रसिद्ध भजनोपदेशक गाँव जुड़ोला जिला गुड़गावां निवासी पं. बोहतराम के शिष्य बने। सन् 1940 से 1942 तीन वर्ष तक उनके साथ रहकर आपने संगीत की शिक्षा प्राप्त की। सन् 1943 में आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब(लाहौर) के द्वारा संचालित हरियाणा वेद प्रचार मंडल रोहतक के माध्यम से स्वामी कर्मानन्द जी एवं श्री भरत कुमार शास्त्री के साथ गाँव गाँव घूमकर आर्य समाज का प्रचार किया जिसमें आर्य समाज की ओर से लुहारू क्षेत्र में 20 गाँवों में पाठशालाएं खुलवाई एवं लुहारू में आर्य समाज का मंदिर बनवाया।

इसी दौरान स्वामी कर्मानन्द जी के साथ बीकानेर रियासत के संगरिया मण्डी(हनुमानगढ़) में स्वामी केशवानन्द जी से सम्पर्क हुआ। तत्पश्चात स्वामी केशवानन्द जी के साथ रहकर ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया की स्थापना हेतु चन्दा एकत्र करवाया। उस समय संस्था की ओर से बीकानेर, चुरू, श्री गंगानगर एवं हनुमानगढ़ के 150 गाँवों में पाठशालाएं खुलवाई। उसके बाद स्वामी जी के आदेशानुसार श्री हँसराज जी आर्य के साथ रहकर कस्तूरबा ग्रामोत्थान महिला विद्यापीठ महाजन (बीकानेर) की स्थापना में सक्रिय भूमिका निभाई। आपके बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा भी महाजन एवं संगरिया में हुई।

स्वतंत्रता आन्दोलन

जब आजादी के आन्दोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया था तब श्री भालोठिया जी 17 वर्ष की आयु में ही अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद पड़े थे। तत्कालीन पेप्सू राज्य में प्रजामण्डल के माध्यम से पटियाला रियासत के महेन्द्रगढ़ एवं नारनौल में पं. अयोध्याप्रसाद जी एवं राव माधोसिंह, नाभा रियासत के कनीना एवं अटेली में श्री बंशीधर गुप्ता एवं बाबा खेतानाथ, जींद रियासत के दादरी में श्री निहालसिंह तक्षक(भागवी), महाशय मनसाराम त्यागी (पंचगांव), नम्बरदार मंगलाराम पटेल (डालावास), राजा महताबसिंह (पंचगांव), नोबत सिंह (पांडवाण), भिवानी में श्री बनारसीदास गुप्त (मानहेरू), श्री रामकिशन गुप्ता (दादरी), एवं श्री हरिसिंह चिरानिया आदि के साथ निरंकुश शासकों के विरूद्ध स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन में भाग लिया।

इसी दौरान भालोठिया बीकानेर रियासत में गये जहां तत्कालीन राजनैतिक आन्दोलनों के संचालक श्री कुम्भाराम आर्य एवं प्रजा परिषद के अध्यक्ष स्वामी कर्मानन्द जी के द्वारा आजादी के लिए चलाए गए आन्दोलनों में श्री भालोठिया जी प्रमुख वक्ता होते थे। आपकी मधुरवाणी, जोशीले प्रेरक गीत एवं गायन शैली जन मानस के हृदय को छू जाती थी।

पुस्तक 'बागड़ मेल'
4 अक्टूबर, 1947 को प्रकाशित बीकानेर राजपत्र

6 जून 1947 को चुरू जिले के हमीरवास में एक बड़े किसान आन्दोलन के जलसे में रात भर आपने जोशीले गाने गाये एवं आपकी बीकानेर रियासत के विरूद्ध लिखी हुई भजनों की पुस्तक बागड़ मेल जनता में वितरित की गई।

इस पुस्तक की रचनाओं ने आन्दोलनों में जोश एवं चिनगारी का काम किया। हमीरवास जलसे की सम्पूर्ण पुलिस खुफिया रिपोर्ट बीकानेर पहुँचने पर तत्कालीन बीकानेर रियासत के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री एवं इन्सपैक्टर जनरल आफ पुलिस ने मीटिंग कर 17 जून 1947 को भालोठिया जी के धारा 108 (सी. आर. पी. सी.) के तहत गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए गए । 25 सितम्बर, 1947 को भालोठिया की पुस्तक बागड़ मेल को बगावती, सरकार विरोधी एवं गैर कानूनी ठहराते हुए बीकानेर पब्लिक सेफ्टी एक्ट की धारा 16 के तहत बीकानेर रियासत ने इसे प्रतिबंधित करने का नोटिफिकेशन जारी किया एवं 4 अक्टूबर, 1947 को प्रकाशित बीकानेर राजपत्र में इस नोटिफिकेशन को छपवाया गया।

इस पुस्तक की लोकप्रियता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह पुस्तक किसी के पास मिलने पर उसे 6 महिने की जेल की सजा एवं जुर्माने की घोषणा भी उक्त एक्ट की धारा 18 के तहत बीकानेर राजपत्र में रियासत ने करवाई थी। गिरफ्तारी वारंट, बागड़ मेल को प्रतिबंधित करन के आदेश, 4 अक्टूबर 1947 को प्रकाशित बीकानेर राजपत्र एवं रियासत में तीन वर्षों के दौरान विभिन्न जगहों पर मीटिगों में प्रमुख वक्ता के रूप में भाग लेने की इन्सपैक्टर जनरल आफ पुलिस की साप्ताहिक खुफिया रिपोर्टों का विवरण व बागड़ मेल की जब्त मूल प्रति आज भी बीकानेर सरकारी अभिलेखागार में उपलब्ध हैं। आपकी पुस्तक आजादी की गूँज एवं जनता मेल की क्रान्तिकारी रचनाओं ने भी अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था।

तत्कालीन आन्दोलन के संचालक चौ. कुम्भाराम आर्य के निर्देशानुसार गिरफ्तारी वारंट के बावजूद डेढ़ वर्ष तक भूमिगत रहते हुए बीकानेर रियासत के अलावा शेखावाटी क्षेत्र के गाँव गाँव से सेनानियों के जत्थे के जत्थे तैयार कर जेलों में भिजवाते रहे। कुम्भाराम जी ने बीकानेर जेल से संदेश भिजवाया था कि भालोठिया जी आप अपनी गिरफ्तारी से बचते हुए गाँवों से जत्थे जेलों में भिजवाना जारी रखना क्योंकि जेल भरने पर ही आन्दोलनकारी छूट सकते हैं। अतः आन्दोलन के दौरान सिर पर हारमोनियम उठाये रातों रात मीलों पैदल सफर कर गाँवों में सभाएं की। कई जगह सभाओं में आपके हारमोनियम को लाठियों से तोड़ा गया। कई बार भूखे प्यासे जंगलों में छिपकर रहना पडा़। आपने प्रजापरिषद के सभी आन्दोलनों में भाग लिया जिनमें दुधवाखारा, रायसिंह नगर (जिसमें बीरबल सिंह शहीद हुआ), हमीरवास एवं काँगड़ आन्दोलन प्रमुख थे।

प्रजापरिषद के आन्दोलनों में श्री कुम्भाराम आर्य एवं स्वामी कर्मानन्द के अलावा भादरा में श्री हँसराज आर्य, श्री धन्नाराम आर्य, सूबेदार बीरबल सिंह, हनुमानगढ़ में स्वामी केशवानन्द एवं रामचन्द्र कड़वासरा, राजगढ़ में मा. दीपचन्द, शीशराम पूनियां, चुरू में हनुमानसिंह बुडानिया, मोहरसिंह भजनोपदेशक, मनीराम देवगढ़, गंगानगर में प्रो. केदार एवं मोतीराम सहारण, लूणकरणसर व महाजन में भीमसेन एडवोकेट व चन्द्रनाथ योगी, बीकानेर में रामरतन कोचर, सरदारशहर, सुजानगढ़ व रतनगढ़ में गोरीशंकर आचार्य, वैद्य मंघाराम, दौलतराम सहारण, नोहर में पं. कन्हैयालाल, शिवराम आर्य, बालूराम मीलरामचन्द्र आर्य, सूरतगढ़ में मनफूल सिंह भादू, झुन्झुनूं में बुटीराम किशोरपुरा, सरदार हरलाल सिंह, चौ. घासीराम, पं. नरोत्तम जोशी, ख्यालीराम भाँमरवासी, नेतराम गोरीर एवं पन्नेसिंह देवरोड़ आदि के साथ रहकर आन्दोलन में संघर्षरत रहे।

आजादी के बाद भी यहाँ 562 राजा और नवाब रह गये उनके विरूद्ध चले संघर्ष और सत्याग्रह आन्दोलन के प्रमुख आन्दोनकारियों के साथ रहकर अपनी रचनाओं के माध्यम से देशी रियासतों को भारत में विलीनीकरण हेतु प्रेरक भूमिका निभाई। दादरी (हरियाणा) में सत्याग्रह के बाद 13 दिन जनता शासन रहा। दिल्ली से पट्टाभि सीतारमैया आये, उनके आश्वासन पर आन्दोलन उठाया। बीकानेर स्टेट में मार्च, 1949 तक बीकानेर के राज्य में विलय तक आन्दोलनों से लगातार जुड़े रहे।

श्री गंगानगर के लक्खी गोगामेड़ी मेले के तत्कालीन आयोजनकर्ता श्री हँसराज आर्य (भादरा) एवं श्री शिवराम आर्य रामगढ़़ (नोहर) के विशेष बुलावे पर श्री भालोठिया लगातार 32 वर्षों तक गोगामेड़ी मेले में भाग लेते रहे। इस मेले में केन्द्र व प्रान्त के मंत्री, एम. पी. व एम. एल.ए. आते थे। आम जनता का आपसे लगाव, आपके भजनों के प्रति रूचि एवं दीवानगी का आलम ये था कि आपके संगीत कार्यक्रम के नाम से मेला एक रात अतिरिक्त भरता था। बड़े जलसों एवं सभाओं में जब जनता में सुस्ती आने लगती या प्रमुख नेताओं के आने में कोई देर होने पर जनता जाने लगत़ी तो भालोठिया जी तुरन्त जोशीला, प्रेरक, सम सामयिक गाना बना कर गाते एवं जनता वापिस आकर बैठ जाती। श्री गंगानगर क्षेत्र में श्री हँसराज आर्य के साथ रहकर सामाजिक कुरीतियों एवं नशाबन्दी के विरूद्ध प्रचार किया। श्री गंगानगर क्षेत्र में कार्य के दौरान रामगढ़़ (नोहर) में निवास करते थे।

हरियाणा में स्वामी ओमानन्द महाराज के सानिध्य में जलसों में जाते और आर्य समाज का प्रचार.प्रसार करते रहे। आपके प्रोत्साहन से ही श्री मनसाराम ने अपनी 70 बीघा भूमि कन्या गुरूकुल पचगामां (भिवानी) की स्थापना हेतु दान करदी। गुरूकुल में पूर्व राज्यपाल बहन चन्द्रावती ने समय समय पर अनुदान दिलवाया। इसमे अतरसिंह मांढ़ी वाले एवं मंगलाराम पटेल के अलावा सुमेरसिंह डालावास ने संस्था को जीवनदान दिया। महिला शिक्षा के प्रसार हेतु आपने कन्या गुरूकुल के विकास में अहम् भूमिका निभाते हुए संस्था के आजीवन सदस्य रहे। गाँव ढ़ाणी भालोठिया में प्राथमिक पाठशाला का निर्माण एवं गाँवों को मुख्य सड़कों से जोड़ने जैसे अनेकों जनहित के कार्य करवाये। अपने मित्र चौ. पृथ्वीसिंह बेधड़क के बुलावे पर आपको गुरूकुल किरठल, जिला मेरठ (यू.पी.) के गाँवों में भी शिक्षा एवं समाज सुधार हेतु प्रचार प्रसार का मौका मिला। आपके अन्तरंग मित्र पं. रामनिवास शर्मा सतनाली (हरियाणा) जीवनपर्यन्त आपके सहयोगी बने रहे।

आप पूर्व उप प्रधानमंत्री चौ. देवीलाल जी एवं पूर्व मंत्री स्व. नाथूराम मिर्धा (बाबा) के निकट सहयोगी रहे। चौधरी देवीलाल जी से गोगामेड़ी मेले में मुलाकात के बाद वर्ष 1959 के सिरसा उपचुनाव में एवं इसके बाद उनके हर चुनाव में साथ रहे। राजस्थान एवं हरियाणा के साथी प्रमुख नेताओं के साथ भी काम किया। अलग हरियाणा की स्थापना की मांग में आप चौ. देवीलाल और प्रो. शेरसिंह जी के साथ आन्दोलन में संघर्षरत रहे, फलस्वरूप अलग हरियाणा राज्य बना। 1986 में राजीव लोंगोवाल समझौते के विरूद्ध चलाए गये न्याय युद्ध में भी चौ. देवीलाल एवं अन्य आन्दोलनकारियों के साथ काम किया परिणामस्वरूप हरियाणा के हितों के विरूद्ध किया गया समझौता रोक दिया गया। आप वर्ष 1988 एवं 2001 में मार्केट कमेटी महेन्द्रगढ़ (हरियाणा) के दो बार तीन तीन वर्ष के लिए चेयरमैन रहे। इस पद पर रहते हुए अपने छः वर्ष के कार्यकाल में ईमानदारी एवं कर्तव्यनिष्ठा से अनेक जनकल्याणकारी कार्य करवाए।

आप आजीवन महर्षि दयानन्द सरस्वती के सिद्धान्तों पर चलते हुए आर्य समाज के प्रचार.प्रसार और सामाजिक सुधारों में बढ़ चढ़कर भाग लेते रहे। आप मूर्ति पूजा, अन्धविश्वास, शराब, तम्बाकू और मांस सेवन के घोर विरोधी थे। छुआछूत, पर्दा प्रथा, दान दहेज, नुक्ता प्रथा और बाल विवाह का भी आपने हमेशा विरोध किया एवं समाज में व्याप्त ऐसी बुराइयों व कुरीतियों को दूर करने के लिए आप अपनी रचनाओं के माध्यम से जनता को जागृत करते रहे।

आप जीवन भर अभावों से जूझते रहे इसके बावजूद आपने समाज में ईमानदारी, सच्चाई, सादगी, कर्मठता एवं कर्तव्य निष्ठा की मिसाल पेश की तथा अपने सिद्धान्तों के विरूद्ध कभी समझौता नहीं किया। आपका जीवन पर्यन्त मुख्य उद्देश्य सामाजिक कुरीतियों का सुधार, जनता में राजनैतिक चेतना, दलित उद्धार, नारी जागरण, व नारी शिक्षा का प्रसार रहा। आपका प्रमुख कार्यक्षेत्र राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली एवं पश्चिमी उत्तरप्रदेश रहा।

बागड़ मेल को प्रतिबंधित करने का नोटिफिकेशन

1. copy of arrest warrant of Bhalothia, issued by Bikaner state

(Secret)

Government of Bikaner

Notes and orders

No-R.R No-229c/Dt.17-06-1947 – 1594/1845 SB d./ 17.06.1947


1. I submit a copy of the “Bagar Mail” written by Ch. Dharam Pal Singh of Dhani Bhalotion–ki, P.O Satnali, Tehsil- Mahendragarh, Patiala State, and published by vaishya book depot, Nai sarak, Delhi.

2. It contains nine poems. No. 2,3,4,5 and 7 relate to Bikaner and are worth notice.Important portions are marked with red.

3. In these poems the government of the state has been described as a gang of dacoits and His Highness the Leader of the gang.

4. It is a seditious publication and should be banned atonce.

5. I have written to Patiala for the antecedent of the author and ordered the arrest of Dharam pal U/S 108 CrPC.

17.06.1947
s/d
(Chunni Lal Kapur)
Inspector General of Police


Note-The book ‘‘Bagar Mail’’ was banned by Prime Minister on the recommandations of IGP and Home Minister of Bikaner State.


2. Copy of notification of Ban on Bagar Mail

HOME DEPARTMENT

Notification

Lallgarh, dated the 25th September 1947

No 4 – Whereas the Government of Bikaner consider that the Hindi booklet ‘‘Bagar Mail’’written by Ch. Dharam Pal Singh of Dhani Bhalotion-ki, P. O. Satnali, Tehsil Mahendragarh, Patiala State, and published by Vaish Book Depot, Nai Sarak, Delhi, contains matter which offends against the provisions of Section16 of the Bikaner Public Safety Act (1 of 1932), they hereby prohibit the entry of that booklet into the Bikaner State.

2. Any person found responsible for the importation of that booklet into the State shall be liable to punishment under Section 18 of the above mentioned Act, which provides a penalty of six months’ imprisonment as well as of fine.

25-9-47

By order

Sd/

For Secretary

No. 1569 H D/- 25-9-47

Forwarded to the Suprintendent, Government Press, Bikaner, for favour of publishing the same togather with its hindi translation (attached herewith) in the next issue of Bikaner Rajpatra.


3. बीकानेर राजपत्र जिसमें पुस्तक बागड़ मेल को प्रतिबंधित करने का

नोटिफिकेशन हिन्दी एवं अंग्रेजी में छपवाया गया उसकी प्रति

बीकानेर राज पत्र

हुक्म से छापा गया

बीकानेर, शनिवार, तारीख 4 अक्टूबर सन् 1947 ई०

होम डिपार्टमेंट

नोटिफिकेशन

श्री लालगढ, तारीख 25 सितम्बर सन् 1947 ई०

नं. 4. चूंकि हिन्दी की पुस्तक "बागड़ मेल" जो के चौ० धर्मपाल सिंह साकिन ढाणी भालोठियान, पोस्ट ऑफिस सतनाली, तहसील महेन्द्रगढ, पटियाला स्टेट की लिखी गई है और जो वैश्य बुक डिपो नई सड़क देहली द्वारा प्रकाशित की गयी है, उसका विषय जनता की रक्षा का एक्ट (1 सन.1932 ई०) की धारा 16 के विरूद्ध है अतएव बीकानेर गवर्नमैंट ने जरिये नोटिफिकेशन हाजा इस पुस्तक को रियासत में आना मना करा दिया है ।

कोई व्यक्ति जो इस पुस्तक को स्टेट में मंगाता या लाता पाया जायेगा वह उपरोक्त एक्ट की धारा 18 के तहत सजावार होगा जिसमें 6 माह की कैद व जुर्माना भी रखा गया है ।

बाइ ऑर्डर,

सुरेन्द्र सिंह,

फॉर सेक्रेटरी, होम डिपार्टमेंट

प्रमुख रचनाऐं

आपकी प्रमुख रचनाऐं निम्न हैं -

1. सुनहरी गीतांजली - 1946, इसमें सामाजिक बुराइयों व कुरीतियों एवं लुहारू नवाब के जुल्मों के विरूद्ध गाने हैं।

2. बागड़ मेल - 1946, इसमें बीकानेर रियासत के जुल्मों के विरूद्ध गाने हैं।

3. आजादी की गूँज - 1946, अनुपलब्ध - अंग्रेजों के विरूद्ध।

4. जनता मेल - 1947, अनुपलब्ध - अंग्रेजों के विरूद्ध ।

5. स्पेशल - 1950, काश्मीर के हालात एवं राजनैतिक चेतना के भजन हैं ।

6. मेरा अनुभव - 1956, इसमें शिक्षा एवं समाज सुधार के गाने हैं।

7. ऐतिहासिक कथाऐं

8. ताऊ चालीसा- चौधरी देवीलाल के गाने

9. मेरा अनुभव (संशोधित) - 2017, इसमें शिक्षा एवं समाज सुधार के गाने हैं।

ताऊ चालीसा- चौधरी देवीलाल के गाने

पुस्तक की कुछ पंक्तियां

बागड़ मेल पुस्तक की कुछ पंक्तियां निम्न प्रकार हैं.

1. हो जावो खड़े, क्यों सुस्त पडे़, मेरे बीकानेरी शेर।
मैदान में आजाइयो, वीरो जयहिन्द बोल के,
लालगढ मे बड़ जाइयो़, छाती को खोल के।
2. जुल्मों की हद होली, भगवान बीकानेर में।
3. हे ईश्वर इस देश की प्रार्थना स्वीकार कर।
डूबता बेड़ा वतन का पार कर।

आपका परिवार

आपके संस्कारों की झलक आपके बच्चों में भी देखने को मिलती है।

1. आपके पदचिन्हों पर चलते हुए आपकी पुत्री श्रीमती शकुन्तला सिंह सेवानिवृत व्याख्याता शिक्षा विभाग (राजस्थान सरकार), ने अपने सेवाकाल में उत्कृष्ट कार्य हेतु अनेक जिला स्तरीय पुरस्कार एवं वर्ष 2000 में राज्य स्तरीय पुरस्कार प्राप्त किया।

2. आपके बड़े पुत्र कर्नल वीरेन्द्र सिंह ने आपरेशन विजय (कारगिल युद्ध), आपरेशन पवन (श्री लंका), आपरेशन मेघदूत (सियाचीन ग्लेशियर), संक्युतराष्ट्र संघ आपरेशन (सोमालिया), आपरेशन रक्षक (काश्मीर घाटी), में दुश्मनों के छक्के छुडा़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इनके वीरतापूर्ण कार्यों के लिए राष्ट्रपति द्वारा शूरवीरता पुरस्कार 1. सेना मेडल (वीरता) एवं 2. विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया।

3. दूसरा लड़का सुरेन्द्र सिंह बैंक में वरिष्ठ प्रबन्धक पद से सेवानिवृत हुआ है. आप जयपुर में निवास करते हैं। (Mob:917073454251)

4. तीसरा लड़का नरेन्द्र सिंह निजी व्यवसाय में कार्यरत है।

5. आपकी पुत्रवधू डा. स्नेहलता सिंह- एसोसियेट प्रोफेसर (English), भी स्वतंत्रता सेनानी स्व0 श्री गिरधर सिंह (भरतपुर) की पुत्री हैं।

6. आपके दामाद श्री रामसिंह जी महाविद्यालय से सेवानिवृत हो चुके हैं।

7.दोहिता - डा. राहुल राज चौधरी- एसोसियेट प्रोफेसर, इन्जीनियरिंग कालेज बीकानेर में कार्यरत

64 वर्ष बाद मिला स्वतंत्रता सेनानी सम्मान

बीकानेरी शेरों को जगाने वाले, आजादी के दीवाने स्व. श्री धर्मपालसिंह भालोठिया को अन्तत: 64 वर्ष बाद मरणोंपरान्त मिला स्वतंत्रता सेनानी का सम्मान। देश की आजादी में वर्षों भूमिगत रह कर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले सेनानी ने अपने जीवनकाल में वर्ष 1972 में दस साथी स्वतंत्रता सेनानियों के द्वारा दिए गए प्रमाण-पत्रों के आधार पर आवेदन किया गया किन्तु लाख प्रयास करने के बावजूद सरकारी दस्तावेजों (ऑफिसियल रेकार्ड) के अभाव में स्वतंत्रता सेनानी का सम्मान नहीं मिल पाया। सन् 2009 में आपके दोहिते बीकानेर इन्जीनियरिंग कालेज में कार्यरत एसोसियेट प्रोफेसर डा. राहुल राज चौधरी द्वारा बीकानेर सरकारी अभिलेखागार विभाग में खोजे गये सम्पूर्ण सरकारी रेकार्ड के आधार पर पुनः आवेदन करने पर अंग्रेजों के सामने घुटने न टेकने वाला यह निर्भिक सेनानी देश में प्रजा का शासन आने के बाद भी प्रशासन की घोर लालफीताशाही के शिकार हुए एवं अपनी अन्तिम इच्छा को मन में लेकर दुनिया से विदा हो गये।

अन्ततोगत्वा राजस्थान सरकार द्वारा मरणोपरान्त 9 अगस्त 2011 को आजादी के दीवाने को स्वतंत्रता सेनानी का सम्मान दिया गया।

पंचतत्व में विलीन

7 अक्टूबर, 2009 को अपनी 84 वर्ष की यात्रा पूर्ण कर आप पंचतत्व में विलीन हो गये। आज आप हमारे बीच उपस्थित नहीं हैं लेकिन एक सुमधुर गायक, कवि, लेखक, भजनोपदेशक, समाज सुधारक एवं प्रेरक के रूप मे सदैव हमारे बीच उपस्थित रहेंगे।

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले । वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा ।।

कवि के भजनों की कुछ पंक्तियाँ --

1. दुनिया में आ, शुभ कर्म कमा, है दो दि़न का मेहमान रे,

ये दुनिया हो हो जानी है ।।
एक रोज दुनिया से नाता, तोड़ के जाना होगा ।
धर्मपाल सिंह तेरी जगह, किसी और का गाना होगा ।
तज दे छल बल, हो आज या कल, तेरा चलने का ऐलान रे,
ये दुनिया हो हो जानी है ।।

2. जोबन जवानी, बन्दे हो हो जानी,

मत कर गर्व गुमान रे, भगवान के घर जाना ।।
भालोठिया अब पड़ेगा जाना, तू भी दे घर छोड़ पुराना।
मिलेगा नया मकान रे, भगवान के घर जाना ।।

3 बन जा बन्दे नेक एक दिन, घड़ी अन्त की आवेगी ।

सही कहावत बकरे की माँ, कब तक खैर मनावेगी ।।
चाहे कितनी मोर्चाबन्दी करले, एक दिन ये मौत हरावेगी ।
सही कहावत बकरे की माँ, कब तक खैर मनावेगी ।।

इस पुस्तक में लिखित गाने कवि ने अपने जीवन काल में लिखे थे जिनमें से कुछ रचनाऐं पूर्व में प्रकाशित सुनहरी गीतांजली - 1946, व मेरा अनुभव - 1956, से ली गई हैं किन्तु पुस्तक प्रकाशित होने से पहले ही उनका देहान्त हो गया। गानों की तर्ज लेखक ने नहीं लिखी थी ये बाद में उनके शिष्यों राजेन्द्र अलीपुर एवं सुभाष भालोठिया गाँव काली पहाड़ी (झुन्झुनूँ) से जानकारी कर लिखी गई हैं ।

जाना तो एक दिन सभी को है, देखना यह है कि जिन्दगी के किसी कोने में अपनी छाप छोड़ी है या नहीं, अगर छाप छोड़ी है तो जाने के बाद भी आप जिन्दगी से जुड़े रहेंगे।

उपर्युक्त जीवनी के अंश उनकी आत्मकथा एवं बीकानेर अभिलेखागार विभाग से प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर लिखे गये हैं।

वियोगी होगा पहला कवि, आह से निकला होगा गान ।
उमड़कर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान ।।

श्रद्धान्जलि

कवि नौरंगलाल सांगठिया द्वारा गुरू को श्रद्धान्जलि।

राष्ट्रोत्थान सार-नोहर, नवम्बर 2009

राजस्थान और पंजाब व वर्तमान हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वतंत्रता के जोश भरे लोकगीत व भजन गाने वाले प्रसिद्ध भजनोपदेशक श्री धर्मपाल सिंह भालोठिया अपने जीवन के 84 वर्षों की यात्रा पूर्ण कर 7 अक्टूबर, 2009 को स्वर्गारोहण कर गये। मुझे याद है सन् 1954 में जब मैं तीसरी या चौथी कक्षा में पढ़ता था तब नव जागृति का एक बहुत बड़ा रात्रि जागरण हमारे गाँव छानी बड़ी में लगा था। 1000 घरों के गाँव में 10 हजार व्यक्ति बाहर से आये और हम बालकों की टोलियों नें घरों से 10-10 रोटियाँ इकट्ठी करने हेतु भाग-भाग कर व्यवस्था की थी। पूरी रात चले कार्यक्रम में भजनोपदेशक स्व. सूरजमल साथी के उपरान्त छरहरे शरीर के 25 वर्षीय नौजवान धर्मपाल सिंह भालोठिया ने सुबह के पाँच बजे तक लगातार 6 घंटे देशप्रेम के जोश भरे गीत गाये थे। क्षेत्र का लक्खी मेला गोगामेड़ी 30 वर्षों तक धर्मपाल भालोठिया के नाम से एक रात अतिरिक्त भरता था। ऐसे देश धर्म के प्रहरी को राजस्थान सरकार ने तो स्वतंत्रता सेनानी भी घोषित नहीं किया था। अब वे चले गये हैं तो समय निकलने के पश्चात ही सही सरकार द्वारा उनको सम्मानित किया जाना चाहिए। राष्ट्रोत्थान सार परिवार उनको श्रद्धान्जलि अर्पित करता है व उनके शिष्य रहे क्षेत्रीय लोक कवि श्री नौरंगलाल सांगठिया द्वारा रचित काव्य श्रद्धान्जलि प्रस्तुत है।

श्रद्धान्जलि
समय-समय पर याद करूँ, स्वतंत्रता सेनानी मैं।
जैसे उनको याद करूँ, ज्यों नैन भरे मेरे पानी में।।
ईश्वर से मान्यता लेकर, मानव जग में आते हैं।
वह इस दुनियाँ में शुभ कर्मों की, छाप छोड़कर जाते हैं।
धर्मपाल सिंह भालोठिया की, लिख रहा सुनो कहानी मैं। 1 ।
कर्मठता की कृति, कड़ी मेहनत ने उसे उभारा था।
जांगू गोत, जाट कौम , सब जन जाति से प्यारा था।
वो हरियाणा का हीरो जन्मा, भालोठियों की ढ़ाणी में । 2 ।
उन्नीस सौ बावन में आया, राजस्थान की धरती पर।
गोगामेड़ी मेला देखा, भरा हुआ फुल भरती पर।
जनता जुट रही जलसे ऊपर, आई जब निगरानी में । 3 ।
साजिन्दो के साथ शायर, जब स्टेज ऊपर खड़ा हुआ।
तारों बीच दिखा ज्यों, चाँद शिखर में चढ़ा हुआ।
दुबला पतला तन में था, पर जादू भरा था वाणी में । 4 ।
जब छेड़ी तान सुरीली, एकदम चसा चिराग अंधेरे में।
फिर जनता हो गई मुग्ध, ज्यों नागिन ध्यान सपेरे में।
बैठ गया श्रोता दल जमके, रूक गये आना जानी । 5 ।
निर्वाचन अभियान चला था, तीन महीने गाँवों में।
ग्रामीण गुण गरिमा से भरे, प्रेम भजन के भावों में।
एक लगा था जागरण जोरदार, तहसील भादरा छानी में। 6 ।
गंगानगर क्या सीकर चुरू, जिला बीकानेर सुनो।
सरस्वती सरगम सुरों की, याद सब टेर सुनो।
क्या राजस्थान हरियाणा दिल्ली, भारत की राजधानी में। 7 ।
छिड़ी लड़ाई राजस्थान में, जालिम जागीरदारों से।
कायर मुर्दे जाग उठे, सुन जोश भरे प्रचारों से।
प्रकृति ने भी ठूँस-ठूँस कर, खूब भरे गुण ज्ञानी में । 8 ।
छिड़ी लड़ाई पंजाब में, जब कैरो और घनश्याम की।
वेदोकत प्रचार किया, जब जीती सेना राम की।
हिन्दी रक्षा आन्दोलन की, मिली सफलता जवानी में । 9 ।
जब आया बुढ़ापा बैठ गया घर, ले के शरण विधाता की।
जीत गया जंग जीवन का, कर कूख सपूती माता की।
यह लिख सकता पर नहीं देखना चाहता शोक निशानी मैं। 10 ।
सात अक्टूबर दो हजार नौ, कर अपना अंतकाल गया।
हरा भरा परिवार छोड़कर, पाके चौरासी साल गया।
नौरंगलाल सांगठिया आपको, ना भूले जिन्दगानी में । 11 ।

हम हैं शोकाकुल-लेखक नोरंगलाल सांगठिया, अमरसिंह पूनिया - फेफाना, बनवारी लाल - अरड़की, लादूराम जेवलिया, जसवंत आर्य - नोहर

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सन्दर्भ


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