Ajmer Merwara

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Ajmer-Merwara (अजमेर मेरवाड़ा), also known as Ajmer Province[1] and as Ajmer-Merwara-Kekri, is a former province of British India in the historical Ajmer region.

The province consisted of the districts of Ajmer and Merwar, which were physically separated from the rest of British India forming an enclave amidst the many princely states of Rajasthan. Unlike these states, which were ruled by local nobles who acknowledged British suzerainty, Ajmer-Merwara was administered directly by the British.

In 1842 the two districts were under a single commissioner, then they were separated in 1856 and were administered by the East India Company.

History

In ancient times, the Mair Gurjars were the dominant inhabitants. They were defeated by the Chauhan Kings Rao Anoop and Rao Anhal, whose descendents the Rawats Cheeta-Kathat were the dominant group here. These castes continue to have influence on the politics of the region.


Before the arrival of the British, Jats, Rajputs, the Kathats, Cheetas and Rawats were land-holders, as well as cultivators.


According to Sant Kanha Ram[2] The area between Ajmer and Diver was earlier known as Ajmer Merwara and it was inhabited by Mer people. Ajayapala Chauhan founded Ajmer by combining his name Ajay with Mer and made it Ajmer. Its stated origin from Ajayameru is baseless. --- The territory was ceded to the British by Daulat Rao Sindhia by a treaty on 25 June 1818. It was under the Bengal Presidency until 1936 when it became part of the North-Western Provinces comissionat el 1842.[3] Finally on 1 April 1871 it became a separate province as Ajmer-Merwara-Kekri. It became a part of independent India on 15 August 1947 when the British left India.[4]

इतिहास

ठाकुर देशराज[5] ने लिखा है ....[पृ.94]: अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत 2 जिलों अजमेर और मेरवाड़ा से मिलकर बना है। अजयमेरु (न जीता जाने वाला पहाड़) से अजमेर शब्द बना है। अजमेर के पास पहाड़ पर तारागढ़ है जहां किसी समय चौहानों की पताका फहराती थी। इससे भी पहले बौद्ध धर्म के विरुद्ध यहां अशोक काल में एक महान सरोवर के पास ब्राह्मण धर्म का प्रचार करने के लिए ट्रेनिंग कैंप खोला था। यह क्षेत्र पुष्कर के नाम से प्रसिद्ध है। पुष्कर के चारों ओर जाट, गुर्जर आदि की आबादी है। मेर लोगों के नाम पर मेरवाड़ा पड़ा है। इस प्रकार इस प्रांत में जाट, गुर्जर और मेर लोग बहुत पुराने वाशिंदे हैं। यहां के प्राय सभी जाट नागवंशी हैं। जिनमें शेषमा नस्ल का पुराणों में भी वर्णन है।

यहां चौहानों के फैलने से पहले जाटों के कुल-राज्य (वंश राज्य) थे जो प्रजातंत्री तरीके से चलते थे। यहां के जाटों का मुख्य देवता तेजाजी है। भादों में तेजा दशमी का त्योहार बड़े उत्साह से मनाया जाता है।

वर्तमान समय में जागृति का आरंभ सन् 1925 से हुआ जबकि भरतपुर के तत्कालीन महाराज श्री किशन सिंह के सभापतित्व में यहां के जाटों का एक शानदार उत्सव हुआ। इसने यहां के जाटों की आंखें खोल दी। इस उत्सव को कराने का श्रेय मास्टर भजनलाल को जाता है।


[पृ.95]: इसके बाद यहां सन् 1931 से सन 1932 के आखिर तक ठाकुर देशराज ने जागृति का दीपक जलाया। उन्होंने गांव में जाकर मीटिंग की और सराधना में एक अच्छा जलसा सन 1932 में 28 जून 30 सितंबर को कराया। पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर सैकड़ों जाटों के यज्ञोपवित संस्कार कराए। उस समय तक इस समय के तरुण नेता प्राय सभी शिक्षा पा रहे थे। सुवालाल सेल, किशनलाल लामरोड, रामकरण परोरा विद्यार्थी जीवन में थे अतः ठाकुर देशराज को देहात के लोगों से भी सहयोग लेना पड़ता था।


संत श्री कान्हाराम[6] ने लिखा है कि....अजमेर से डिवेर के के बीच के पहाड़ी क्षेत्र में प्राचीन मेर जाति का मूल स्थान रहा है। यह मेरवाड़ा कहलाता था। अब यह अजमेर–मेरवाड़ा कहलाता है। अजयपाल ने अपने नाम अजय शब्द के साथ मेर जाति से मेर लेकर अजय+मेर = अजमेर रखा। अजमेर का नाम अजयमेरु से बना होने की बात मनगढ़ंत है। अजयपाल ने मुसलमानों से नागौर पुनः छीन लिया था। बाद में अपने पुत्र अर्नोराज (1133-1153 ई.) को शासन सौंप कर सन्यासी बन गए। अजयपाल बाबा के नाम से आज भी मूर्ति पुष्कर घाटी में स्थापित है। अरनौराज ने पुष्कर को लूटने वाले मुस्लिम आक्रमणकारियों को हराने के उपलक्ष में आना-सागर झील का निर्माण करवाया।

Jat History

  • Bhadu rulers in Jangladesh: Bhadus were rulers in Jangladesh where they established an important city Bhadra. A famous ruler in Bhadus was Samantraj. Bhadus had a war with Bhagore people. After this war one of their group moved to Marwar. Bhadus also occupied many villages in Ajmer-merwara which were later occupied by Akbar. [7]

External links

references

  1. Geography of India
  2. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.76-78
  3. The Imperial Gazetteer of India, Oxford, Clarendon Press, 1908-1931
  4. Provinces of British India
  5. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.94-95
  6. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.77
  7. Thakur Deshraj:Jat Itihas, Delhi, 1992, p.597
  8. Jat History Thakur Deshraj/Chapter IX, p.595-596

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