Chunar

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(Redirected from Chandelagadha)
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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Chunar (चुनार) is an ancient historical town located in Mirzapur District of Uttar Pradesh state, India,

Location

National Highway-7 passes through Chunar. It is connected to Varanasi, the ancient and pilgrimage city also well known as Kashi or Benaras, by roads and rails. Chunar is well known for its pottery work, especially clay toys.

Origin

Variants

  • Chunar (चुनार) (जिला मिर्जापुर, उ.प्र.) (AS, p.340)
  • Chandelagadha (चंदेलगढ़) = Chunar चुनार (p.315)
  • Charanadri (चारणाद्रि) = दे. Chunar चुनार (p.328)
  • Nainagarh

History

The Chunar Fort was established by Maharaja Vikramaditya, the King of Ujjain, in honour of the stay of his brother Raja Bharthari. It is believed that Raja Bharthari left his body and took Mahasamadhi at this fort, a servant disciple is still taking care of the place and offers deepam dhupam to the Raja everyday.

As per Alha Khand in 1029 AD. King Sahadeo made this fort as his capital and established the statue of Naina Yogini in a cave of Vindhya hill and put the name as Nainagarh. King Sahadeo built a stone umbrella based on 52 pillars in the memory of the victory on 52 other kings, inside the fort which is still preserved. He had a brave daughter who got married with Alha the then King of Mahoba whose marriage place in still preserved with the name of Sonava Mandap. Beside this some other stories are also related with the fort as Magna- Deogarh, Ratan Deo’s Burj (tower) and King Pithaura who named it Patthargarh as well.

In mid July 1537 Humayun left Agra and arrived at Chunar after 5 months and spent 3 months besieging the Chunar fort. Humayun later offered Chunar and Jaunpur to Sher Shah Suri in exchange for Bengal.[1]

It has got much importance due to the stay of the founder of Mughal Dynasty Babar in 1525 AD. Later on Shershah Suri obtained the possession of the fort by marrying the widow wife of Taj Khan Sarang-Khani, the Governor of Ibrahim Lodi.

In 1574 AD. Akbar the great captured this fort and since that very time it was in the Mughal regime up to 1772 AD. Once emperor Jahangir appointed one Iftikhar Khan as Nazim and in the regime of Aurangzeb one of his Governor’s Mirza Bairam built a mosque in 1663 AD. near the Bhairo-Burj.

In 1772 AD this fort was captured by East India Company who established in it a depot of Artillery and ammunition. Later it was taken by Maharaja Chet Singh of Benaras temporarily and after Chet Singh outbreak in 1781 AD. Warren Hestings retired for safety to Chunar where a force was collected by Major Phophan, which expelled Chet Singh from his stronghold in his neighbourhood. Hastings liked the situation and climate, his residence is still standing. Near it, there is a sundial bearing the inscription.

Chunargarh of 'Chandrakanta', the famous classic novel by Babu Devakinandan Khatri, is only 40 km from the holy city of Varanasi. The Chunar Fort is situated on an extension of the Vindhyan range of mountains, with the river Ganges flowing near its base. Various exotic waterfalls and religious worship places attract thousands of tourists and locals.

चुनार

विजयेन्द्र कुमार माथुर[2] ने लेख किया है ...चुनार (AS, p.340) उत्तर प्रदेश राज्य के मिर्ज़ापुर ज़िले में विंध्याचल की पहाड़ियों में गंगा तट पर स्थित है। चौदहवीं शताब्दी में यह चंदेलों के अधिकार में था। सोलहवीं शताब्दी में चुनार को बिहार तथा बंगाल को जीतने के किए पहला बड़ा नाका समझा जाता था।

नामकरण: बनारस से 39 मील (लगभग 62.4 कि.मी.) और प्रयाग से 75 मील (लगभग 120 कि.मी.) की दूरी पर चुनार स्थित है। इसका प्राचीन नाम 'चरणाद्रि' था। कहा जाता है कि यह नाम वहाँ की पहाड़ी की मानवचरण के समान आकृति होने के कारण ही पड़ा है। (चरण+आद्रि=पहाड़ी) संभवत: 'धोनसारव' जातक में वर्णित भग्गों की राजधानी 'सुंसुमारगिरि' भी इसी पहाड़ी पर बसी हुई थी। चुनार गंगा नदी के किनारे बसा है। जनश्रुति है कि चुनार में गंगा उल्टी बहती है। यहाँ गंगा में एक घुमाव है; नदी उत्तर-पश्चिम की ओर घूमकर फिर पूर्व की ओर मुड़कर काशी की ओर बहती है। घुमाव का कारण चुनार की पहाड़ी की स्थिति है। इसी विशेष स्थिति के कारण चुनार का प्राचीन काल में नदी मार्ग का नाका समझा जाता था।


'रघुवंश'16, 33 के अनुसार कुशावती से अयोध्या लौटते समय कुश की सेना ने जिस स्थान पर गंगा को पार किया था, वहा गंगा 'प्रतीपगा' या 'पश्चिम-वाहिनी' थी- 'तीर्थे तदीये गजसेतुबंधात्प्रतीपगामुत्तरतोस्यंगगाम्, अयत्नबालव्यजनीवभूवुर्हसानभोलंधनलोलपक्षा:'। संभवत: यह स्थान चुनार के निकट ही था। कुशावती से अयोध्या जाने वाले मार्ग में चुनार की स्थिति स्वाभाविक ही जान पड़ती है। (देखें: कुशावती) महाकवि कालिदास ने, जो इस विशष्ट स्थान के वर्णन में गंगा की प्रतीप गति बताई है, उससे यह संभव दीखता है कि कवि के ध्यान में चुनार की स्थिति ही रही होगी, क्योंकि किसी अन्य स्थान पर गंगा की उल्टी ओर बहना प्रसिद्ध नहीं हैं। संभव है कि हिन्दी के मुहावरे- 'उलटी गंगा बहना' का संबंध भी चुनार में गंगा के उल्टे प्रवाह से हो।

चुनार का दुर्ग: चुनार का विख्यात दुर्ग राजा भर्तृहरि के समय का कहा जाता है। इनकी मृत्यु 651 ई. में हुई थी। (श्री नं. ला. डे के अनुसार पाल राजाओं ने इस दुर्ग का निर्माण करवाया था।) किंवदंती है कि सन्न्यास लेने के उपरान्त जब भर्तृहरि विक्रमादित्य के मनाने पर भी घर न लौटे, तो उनकी रक्षार्थ विक्रमादित्य ने

[p.341]: यह क़िला बनवा दिया था। उस समय यहाँ घना जंगल था। क़िले का संबंध 'आल्हा-ऊदल' की कथा से भी बताया जाता है। यह स्थान जहाँ आल्हा की पत्नी मुनवा का महल था, अब 'सुनवा बुर्ज' के नाम से प्रसिद्ध है। इसके पास ही 'माडो' नामक स्थान है, जहाँ आल्हा का विवाह हुआ था। चुनार का दुर्ग प्रयाग के दुर्ग की अपेक्षा अधिक दृढ़ तथा विशाल है। क़िले के नीचे सैंकड़ों वर्षों से गंगा की तीक्ष्ण धारा बहती रही, किंतु दुर्ग की भित्तियों को कोई हानि नहीं पहुँच सकी है। इसके दो ओर गंगा बहती है तथा एक ओर गहरी खाई है। दुर्ग, चुनार के प्रसिद्ध बलुआ पत्थर का बना है और भूमितल से काफ़ी ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। मुख्य द्वार लाल पत्थर का है और उस पर सुंदर नक़्क़ाशी है। क़िले का परकोटा प्राय: दो गज चौड़ा है। उपर्युक्त माड़ो तथा सुनवा बुर्ज दुर्ग के भीतर अवस्थित हैं। यहीं राजा भर्तृहरि का मंदिर है, जहाँ उन्होंने अपना सन्न्यास काल बिताया था। क़िले के निकट ही सवा सौ या डेढ़ सौ फुट गहरी बावड़ी है। किले में कई गहरे तहखाने भी हैं, जिनमें सुरंगे बनी हैं।

मुस्लिम आधिपत्य: 1333 ई. के एक संस्कृत अभिलेख से सूचित होता है कि उस समय यह दुर्ग स्वामीराजा चंदेल के अधिकार में था। चंदेलों के समय में चुनार का नाम 'चंदेलगढ़' भी था। इसके बाद यहाँ मुस्लिमों का आधिपत्य हो गया। चुनारगढ़ का उल्लेख शेरशाह व मुग़ल बादशाह हुमायूँ की लड़ाइयों के संबंध में भी आता है। इस काल में चुनार को, बिहार तथा बंगाल को जीतने तथा अधिकार में रखने के लिए, पहला बड़ा नाका समझा जाता था। शेरशाह ने हुमायूँ को चुनार के पास हराया था, जिससे हुमायूँ को भारी विपत्ति का सामना करना पड़ा था।

मुग़लों का अधिकार: 1575 ई. में बादशाह अकबर ने चुनार को जीता और तपश्चात् मुग़ल साम्राज्य के अंतिम दिनों तक यह मुग़लों के अधिकार में रहा। 18वीं शती के द्वितीय चरण में अवध के नवाबों ने चुनार को अवध राज्य में सम्मिलित कर लिया, किंतु तत्पश्चात् 1772 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रभुत्व स्थापित हुआ। बनारस के राजा चेतसिंह को जब वारेन हेस्टिंग्स का कोप भाजन बनने के कारण काशी को छोड़ना पड़ा, तो काशी की प्रजा की क्रोधाग्नि भड़क उठी और हेस्टिंग्स को काशी, जहाँ चेतसिंह को गिरफ्तार करने आया था, छोड़ कर भागना पड़ा। उसने इस अवसर पर चुनार के क़िले में शरण ली थी।

स्मारक: चुनार में कई प्रसिद्ध प्राचीन स्मारक हैं। कामाक्षा मंदिर ऊंची पहाड़ी पर है। मंदिर के नीचे दुर्गाकुंड और एक अन्य प्राचीन मंदिर है। दुर्गाकुंड और दुर्गाखोह के आस-पास अनेक पुराने मंदिरों के भग्नावशेष पड़े हुए हैं और गुप्त काल से लेकर 18वीं शती के अनेक अभिलेख प्राप्त हुए हैं। यहाँ की

[p.342]: प्रसिद्ध मसजिद 'मुअज्जिन' नामक है, जिसमें मुग़ल सम्राट फ़र्रुख़सियर के समय में मक्का से लाए हुए 'हसन-हुसैन' के पहने हुए वस्त्र सुरक्षित हैं।

External links

References

  1. The Mughal Throne by Abraham Eraly, pg 50
  2. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.340-342