Kamboja

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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Ancient Indian Kingdoms in 600 BC

Kambojas (कंबोज) were a tribe of Iron Age India, frequently mentioned in Sanskrit and Pali literature. The tribe coalesced to become one of the solasa (sixteen) Mahajanapadas (great kingdoms) of ancient India mentioned in the Anguttara Nikaya.

Variants

  • Kamboja (कांबोज) = दे. कंबोज (AS, p.160)
  • Kamboja कंबोज (AS, p.123)

Jat clan

Kamboj (काम्बोज)[1] Kamboh (काम्बोह)[2] is a gotra of Jats found in Rajasthan and Madhya Pradesh. Kamboh (काम्बोह) is Muslim Jat clan found in Pakistan. Kamboh clan is found in Afghanistan.[3]Dilip Singh Ahlawat has mentioned it as one of the ruling Jat clans in Central Asia. [4] It is an important tribe of Punjab (Pakistan).[5]

Kambojs Jats are said to be the descendants of rishi Kondilya (कोंडिल्य). They are also called Kamedia. [6]

Mention by Panini

Kamboja (कंबोज) is mentioned by Panini in Ashtadhyayi. [7]

Ethnicity

The ancient Kambojas were probably of Indo-Iranian origin.[8] They are, however, sometimes described as Indo-Aryans[9] and sometimes as having both Indian and Iranian affinities.[10][11][12] The Kambojas are also described as a royal clan of the Sakas.[13]

History

V. S. Agrawala[14] writes that The Janapadas known to Panini include: Kamboja (कंबोज) (IV.1.175), under Kachchhadi (कच्छादि) (IV.2.133) (शैषिक अण्। काच्छ:)[15] and Sindhvadi (सिन्ध्वादि) (IV.3.93) (सोअस्याभिजन:,अण्। सैन्धव:)[16]. Gandhara, Kapisha, Balhika and Kamboja are four janapadas mentioned by Panini in Ashtadhyayi (IV.1.175) of which relative positions is to be understood clearly.


The Harsha Charita of Bana/Chapter II mentions The Visit of Bana to the King Harshavardhana....The doorkeeper, having come up and saluted him, addressed him respectfully in a gentle voice, "Approach and enter, his highness is willing to see you." Then Bana entered, as he directed, saying, "I am indeed happy that he thinks me worthy of this honour." He next beheld a stable filled with the king's favourite horses from Vanayu, Aratta, Kamboja, Bharadvaja, Sindh, and Persia....


Bhim Singh Dahiya[17] mentions that When Arjuna went to that northwest area, for his Digvijaya, he fought with another Jat tribe, called the Lambas, (their name is Sanskritised into Lampakas meaning long, tall statured, high, the same as Lamba). Mahabharata mentions, another Jat clan, viz., the Lohnas :"लोहान परमकाम्बोजान".[18] Lohanas are a still existing Jat clan, whereas Kambojas are a separate caste of the Hindus, nowadays called Kamboh and Kamoha found on the G. T. Road near Karnal town and other areas.

The Nakodar, town and tahsil in Jalandhar district in Punjab, according to one account, is a said to be derived from the Persian words Neki ka dar, which mean 'Gate of Goodness or Virtue' and it was named so by the Persian Kambohs. According to another version, the town was so-named after Nikudari legion of the Mongols[19].

The Town is of considerable antiquity and had been held in succession by three different races, the Jats , Kambohs (Kamboj) and then by the muslim Rajputs, traces of whom still exist in the extensive ruins by which the town is surrounded. The town was anciently founded by the Hindu Kamboh, according to Sir William Wilson Hunter and others [20]. The Kamboh settlements lay to the west of present town and the sites are still marked by extensive ruins and two old fine tombs, now called the Black and Red Domes, from the color of the material. Tradition attributes the Kamboh expulsion to the Nawab Kutb Khan who came with an army from Indor near Nuh in 1570 AD [21]. As a consequence, the lordship of the town thus passed over to the Khanzadaas from the Kamboj tribe. Within two generations, the Rajputs got the town in jagir from Emperor Jahangir, in later sixteenth century, apparently divesting the Khanzadahs, the successor race to the Kambohs. The Rajputs were themselves later ousted during Sikh period by one Sardar Tara Singh Ghaiba who made a fort and made himself the master of the surroundings. From Ghaiba, the town was seized by Maharaja Ranjit Singh in 1816. The town is well pave and has thriving appearances and currently forms a Tehsil of District Jalandhar. Outside the town, there are two large and handsome tombs dating at least from the times of Emperor Jahangir, later one of them is said to be the burial place of the adviser of Emperor Shah Jahan, but it is known who stand buried in the earlier tomb.

Rajatarangini[22] tells that king of Kashmir Lalitaditya, finding that almost all the kings had been conquered, turned towards the north, and had to fight his way with the haughty kings in that direction. He robbed the king of Kamvoja of his horses. In the mountains of Bhuskhāra the horses of the king became excited at the sight of the horse-faced women of the country.

कंबोज

विजयेन्द्र कुमार माथुर[23] ने लेख किया है ...कंबोज महाजनपद (AS, p.123) प्राचीन समय में भारतवर्ष के प्रमुख जनपदों में गिना जाता था। प्राचीन संस्कृत साहित्य में कंबोज देश या यहाँ के निवासी कांबोजों के विषय में अनेक उल्लेख हैं, जिनसे जान पड़ता है कि कंबोज देश का विस्तार स्थूल रूप से कश्मीर से हिन्दूकुश तक था। वंश ब्राह्मण में कंबोज औपमन्यव नामक आचार्य का उल्लेख है। वाल्मीकि रामायण में कंबोज, वाल्हीक और वनायु देशों के श्रेष्ठ घोड़ों का अयोध्या में होना वर्णित है- 'कांबोज विषये जातैर्बाल्हीकैश्च हयोत्तमै: वनायुजैर्नदीजैश्च पूर्णाहरिहयोत्तमै: (वाल्मीकि रामायण बाल काण्ड 6,22)

महाभारत के अनुसार अर्जुन ने अपनी उत्तर दिशा की दिग्विजय-यात्रा के प्रसंग में दर्दरों या दर्दिस्तान के निवासियों के साथ ही कांबोजों को भी परास्त किया था- 'गृहीत्वा तु बलं सारं फाल्गुन: पांडुनन्दन: दरदान् सह काम्बोजैरजयत् पाकशासनि:' (सभा पर्व महाभारत 27,23। शांतिपर्व महाभारत 207,43)

अंगुत्तरनिकाय (1,213; 4,252, 256-261) और अशोक के पांचवें शिलालेख में कंबोज का गंधार के साथ उल्लेख है। महाभारत (शांतिपर्व महाभारत 207,43) और राजतरंगिणी (4,163-165) में कंबोज की स्थिति उत्तरापथ में बताई गई है। महाभारत में कहा गया है कि कर्ण ने राजपुर पहुंचकर कांबोजों को जीता, जिससे राजपुर कंबोज का एक नगर सिद्ध होता है- 'कर्ण राजपुरं गत्वा काम्बोजानिर्जितास्त्वया'। (द्रोण पर्व महाभारत 4,5)

ईशानपुर प्राचीन कम्बोडिया का एक नगर था। कर्निघम के अनुसार राजपुर कश्मीर में स्थित राजौरी है (एशेंट ज्योग्रेफी आफ इंडिया, पृ. 148)

कालिदास ने रघुवंश में रघु के द्वारा कांबोजों की पराजय का उल्लेख किया है—

[p.124]: 'काम्बोजा: समरे सोढुं तस्य वीर्यमनीश्वरा:, गजालान् परिक्लिष्टैरक्षोटै: सार्धमानता:' ( रघुवंश 4,69।) इस उद्धरण में कालिदास ने कंबोज देश में अखरोट वृक्षों का जो वर्णन किया है वह बहुत समीचीन है। इससे भी इस देश की स्थिति कश्मीर में सिद्ध होती हैं। युवानच्वांग ने भी राजपुर का उल्लेख किया है (युवानच्वांग, भाग 1, पृ. 284)।

वैदिक काल में कंबोज आर्य-संस्कृति का केंद्र था जैसा कि वंश-ब्राह्मण के उल्लेख से सूचित होता है, किंतु कालांतर में जब आर्यसभ्यता पूर्व की ओर बढ़ती गई तो कंबोज आर्य-संस्कृति से बाहर समझा जाने लगा। यास्क और भूरिदत्तजातक (काँवेल 6,110) में कंबोजों के प्रति अवमान्यता के विचार प्रकट किए गए हैं। युवानच्वांग ने भी कांबोजों को असंस्कृत तथा हिंसात्मक प्रवृत्तियों वाला बताया है। कंबोज के राजपुर, नंदिनगर (लूडर्स, इसंक्रिप्शंस, 176, 472) और राइसडेवीज़ के अनुसार द्वारका नामक नगरों का उल्लेख साहित्य में मिलता है।

महाभारत में कंबोज के कई राजाओं का वर्णन है जिनमें सुदर्शन और चंद्रवर्मन मुख्य हैं। कौटिल्य अर्थशास्त्र में कंबोज के 'वार्ताशस्त्रोपजीवी' (खेती और शस्त्रों से जीविका चलाने वाले) संघ का उल्लेख है जिससे ज्ञात होता है कि मौर्यकाल से पूर्व यहाँ गणराज्य स्थापित था। मौर्यकाल में चंद्रगुप्त के साम्राज्य में यह गणराज्य विलीन हो गया होगा।

कंबोज महाजनपद

कंबोज उत्तरापथ के गांधार के निकट स्थित प्राचीन भारतीय जनपद इसकी ठीक-ठाक स्थिति दक्षिण पश्चिम के पुँछ के इलाके के अंतर्गत मानी जा सकती है। प्राचीन संस्कृत एवं पाली साहित्य में कंबोज और गांधार का नाम प्राय: साथ-साथ आता है। जिस प्रकार गांधार के उत्कृष्ट ऊन का वर्णन ऋग्वेद में मिलता है (1,126) उसी प्रकार कंबोज के कंबलों का उल्लेख यास्क के निरुक्त में हुआ है (2, 2)। वास्तव में यास्क ने 'कंबोज' शब्द की व्युत्पत्ति ही सुंदर कंबलों का उपभोग करनेवाले या विकल्प में सुंदर भोजन करनेवाले लोग-इस प्रकार की है। गांधार और कंबोज इन दोनों जनपदों के अभिन्न संबंध की परंपरा से ही इनका सान्निध्य सिद्ध हुआ है। गांधार अफगानिस्तान (कंदहार) का संवर्ती प्रदेश था और इसी के पड़ोस में पूर्व की ओर कंबोज की स्थिति थी।

वाल्मीकि रामायण में कंबोज का वातहीक और वनायु जनपदों के साथ वर्णन है और इन देशों में उत्पन्न श्रेष्ठ काले घोड़ों से अयोध्या नगरी को भरी पूरी बताया गया है (बाल. 6, 22)। महाभारत में अर्जुन की दिग्विजय के प्रसंग में परमकांबोज का लोह और ऋषिक जनपदों के साथ उल्लेख है (सभा. 27, 25)। (ऋषिक यूची का रूपांतरण जान पड़ता है। यूची जाति का निवासस्थन दक्षिण-पश्चिम चीन या चीनी तुर्किस्तान के अंतर्गत था। प्रसिद्ध बौद्ध सम्राट् कनिष्क का रक्तसंबंध इसी जाति के कुशान नामक कबीले से था।) द्रोणपर्व में सात्यकि द्वारा कांबोजों, यवनों, शकों, किरातों और बर्बरों आदि की दुर्मद सेना को हराने और उनके मुंडित मस्तकों और लंबी दाढ़ियों का चित्रमय उल्लेख (199, 45-48)-हे राजन्‌, सात्यकि ने आपकी (धृतराष्ट्र की) सेना का संहार करते हुए हजारों कांबोजों, शकों, शबरों, किरातों और बर्बरों के शवों से रणभूमि को पाठकर वहाँ मांस और रुधिर की नदी बहा दी थी। उन दस्युओं के, शिरस्त्राणों से युक्त मुँडित और लंबी दाढ़ियोंवाले सिरों से रणभूमि पंखहीन पक्षियों से भरी हुई सी दिखाई दे रही थी। महाभारत के युद्ध में काबोजों ने कौरवों का साथ दिया था। यह द्रष्टव्य है कि कांबोजादि को आकृति संबंधी जिन विशेषताओं का वर्णनमहाभारत के इस प्रसंग में हैं वे आज भी इस प्रदेश के निवासियों में विद्यमान हैं। महाभारत में कांबोजों के राजपुर नामक नगर का भी उल्लेख है जिसे कर्ण ने जीता था (द्रोण. 4, 5)।

कनिंघम ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'एंशेंट जियोग्रफी ऑव इंडिया' (पृ. 142) में राजपुर का अभिज्ञान दक्षिण-पश्चिम कश्मीर के राजौरी नामक नगर (जिला पुँछ, कश्मीर) के साथ किया है। इस प्रकारकंबोज देश की अवस्थिति का ज्ञान हमें प्राय: निश्चित रूप से हो जाता है। राइस डेविड्स ने इस प्रदेश की पूर्वबौद्धकालीन द्वारका नामक नगरी का उल्लेख किया है। लूडर्स के अभिलेखों (संख्या 176, 412) में कंबोज जनपद के एक दूसरे स्थान नंदिनगर का भी उल्लेख है जिसकी स्थिति का ठीक पता नहीं।

प्रसिद्ध वैयाकरण पाणिनि ने, जो स्वयं कंबोज के सहवर्ती प्रदेश के निवासी थे 'कंबोजाल्लुक' सूत्र से (अष्टाध्यायी 4, 1, 173) इस जनपद के बारे में अपनी जानकारी प्रकट की है। पतंजलि ने भी महाभाष्य में कंबोज का उल्लेख किया है।

सिकंदर के आक्रमण के समय (327 ई.पू.) कंबोज प्रदेश की सीमा के अंतर्गत उरशा (जिला हाजारा) और अभिसार (जिला पुँछ) नामक छोटे-छोटे राज्य बसे हुए थे।

पालि ग्रंथ अंगुत्तरनिकाय में भारत के 16 महाजनपदों में कंबोज की भी गणना की गई है (1,213; 4,252-256-261)। अशोक के अभिलेखों में कांबोजों का उल्लेख, सीमावर्ती यवनों, नाभकों, नाभपंक्तियों, भोजपितिनकों और गंधारों आदि के साथ किया गया है (शिलालेख 13)। इस धर्मलिपि से ज्ञात होता है कि यद्यपि कंबोज जनपद अशोक का सीमावर्ती पांत था तथापि वहाँ भी उसके शासन कापूर्ण रूप से प्रचलन था। विद्वानों का मत है कि शाहबाजगढ़ी (जिला पेशावर) और मानसेहरा (जिला हजारा) में प्राप्त अभिलेखों से, अशोक के समय में (मश्य तृतीय शताब्दी ई.पू.), क्रमश: गांधार और कंबोज जनपदों की स्थिति का ज्ञान होता है।

महाभारत के वर्णन में कंबोज देश के अनार्य रीति रिवाजों का आभास मिलता है। भीष्म. 9,65 में कांबोजों को म्लेच्छजातीय बताया गया है। मनु ने भी कांबोजों को दस्यु नाम से अभिहित किया है तथा उन्हें म्लेच्छ भाषा बोलनेवाला बताया है (मनुस्मृति 10, 44-45)। मनु की ही भाँति निरुक्तकार यास्क ने भी कांबोजों की बोली को आर्य भाषा से भिन्न कहा है और इस तथ्य के प्रमाण में उन्होंने उदाहरण भी दिया है (11-2)। इसी प्रकार भूरिदत्त जातक में भी कांबोजों के अनार्याचरण तथा अनार्य धर्म का उल्लेख है।

चीनी यात्री युवानच्वांग ने (मध्य 7वीं सदी ई.) भी राजपुर के संवर्ती प्रदेश के निवासियों को भारत के आर्यजनों की सांस्कृतिक परंपरा के बहिर्गत माना है और उन्हें उत्तर-पश्चिम की सीमावर्ती असभ्य जातियों के अंतर्गत बताया है। युवानच्वांग ने राजपुर को चीनी भाषा में होलोशिपुलो लिखा है (द्र. युवानच्वांग, वाटर्स 1,284)। किंतु इसके साथ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि कंबोज में बहुत प्राचीन काल से ही आर्यों की बस्तियाँ बिद्यमान थीं। इसका स्पष्ट निर्देश वंशब्राह्मण के उस उल्लेख से होता है जिसमें कांबोज औपमन्यव नामक आचार्य का प्रसंग है। यह आचार्य उपमन्यु गोत्र में उत्पन्न, मद्रगार के शष्य और कंबोज देश के निवासी थे। कीथ का अनुमान है कि इस प्रसंग में वर्णित औपमन्यव कांबोज और उनके गुरु मद्रगार के नामों से उत्तरमद्र और कंबोज देशों के सन्निकट संबंध का आभास मिलता है। (द्र. वेदिक इंडेक्स-कंबोज)। पालि ग्रंथ मज्झिमनिकाय से भी कंबोज में आर्य संस्कृति की विद्यमानता के बारे में सूचना मिलती है।

महाभारत में कंबोज देश के कमठ और सुदक्षिण नामक राजाओं के नाम मिलते हैं-(सभा. 4, 22-उद्योग. 166, 1)। किंतु कौटिल्य के अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि चतुर्थ शताब्दी ई.पू. में कांबोज में संघ या गणराज्य की स्थापना भी की गई थी। अर्थशास्त्र (पृ. 318) में कांबोजों को वार्ताशस्त्रोपजीवी संघ अर्थात्‌ कृषि और शस्त्रों से जीविका अर्जन करनेवाले संघ की संज्ञा दी गई है। महा. 7, 89, 38 में भी 'कबोजानां च ये गणा:', ऐसा वर्णन मिलता है।

संस्कृत के काव्य ग्रंथों में भी कंबोज के विषय में अनेक उल्लेख मिलते हैं; उदाहरणार्थ, कालिदास ने रघुवंश में रघु की दिग्विजययात्रा के प्रसंग में कांबोजों पर उनकी विजय का सुंदर वर्णन इस प्रकार किया है-(रघु. 4, 69)-'रघु के प्रभाव को सहने में असमर्थ कंबोज-निवासियों को अपने देश के अखरोट के वृक्षों, जिनसे रघु की सेना के मदमत्त हाथियों की श्रृंखलाएँ बाँधी गई थीं, की भाँति ही विनत होना पड़ा।' यह द्रष्टव्य है कि कालिदास के समय में भी आज ही की तरह भारत के इस प्रदेश के अखरोट प्रसिद्ध थे।

इतिहासकार कल्हण के अनुसार कश्मीर नरेश ललितादित्य ने उत्तरापथ के अन्य कई देशों के साथ कंबोज को भी जीता था। उसके वर्णन में भी कंबोज की परंपरा से प्रसिद्ध घोड़ों का उल्लेख (4, 163)। इस वर्णन से यह भी प्रमाणित होता है कि भारतीय इतिहास के प्राय: मध्यकाल (11वीं-12वीं सदी ई.) तक कंबोज देश के नाम का प्रचलन था तथा इसकी सीमाएँ भी प्राय: पूर्ववत्‌ ही थीं, किंतु यह जान पड़ता है कि तत्पश्चात्‌ धीरे-धीरे इस जनपद का विलय कश्मीर राज्य में हो जाने से इसकी पृथक सत्ता का अंत हो गया और इसके साथ ही इसका नाम भी विस्मृति के गर्त में जा पड़ा। फिर भी अभी तक कंबोज के नाम की स्मृति काफिरिस्तान के निकटवर्ती प्रदेश के कुछ कबीलों के नामों, जैसे कंबोजी, कमोज और कामोजे आदि में सुरक्षित है (द्र. एलफ़िंस्टन : ऐन एकाउंट ऑव द किंगडम ऑव काबुल, जिल्द 2, पृ. 375)।

संदर्भ: भारतकोश-कंबोज महाजनपद

शकस्थान

विजयेन्द्र कुमार माथुर[24] ने लेख किया है कि....शकस्थान शकों का मूल निवास स्थान था जो ईरान के उत्तर-पश्चिमी भाग तथा परिवर्ती प्रदेश में स्थित था. इसे सीस्तान कहा जाता है. शकस्थान का उल्लेख महा-मायूरि 95, मथुरा सिंहस्तंभ-लेख कदंम्बनरेश मयूरशर्मन् के चंद्रवल्ली प्रस्ताव लेख में है. मथुरा-अभिलेख के शब्द हैं-- 'सर्वस सकस्तनस पुयेइ' जिसका अर्थ, कनिंघम के अनुसार 'शकस्तान निवासियों के पुण्यार्थ' है. राय चौधरी (पॉलीटिकल हिस्ट्री ऑफ अनसियन्ट इंडिया, पृ. 526) के मत में शकस्तान ईरान में स्थित था और शकवंशीय चष्टन और रुद्रदामन के पूर्व पुरुष गुजरात-काठियावाड़ में इसी स्थान से आकर बसे थे.

शकों का उल्लेख रामायण ('तैरासीत् संवृताभूमि: शकैर्यवनमिश्रितै:' बालकांड 54,21; 'कांबोजयवनां श्चैव-शकानांपत्तनानिच' किष्किंधा 23,12 महाभारत ('पहलवान् बर्बरांश्चैव किरातान् यवनाञ्छकान्' सभापर्व 32,17); मनुस्मृति (पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविड़ा:कांबोजा यवना: शका:"' 10,44 तथा महाभाष्य (देखें इंडियन एंटिक्ववेरी 1857,पृ.244) आदि ग्रंथों में है.

द्वारका

विजयेन्द्र कुमार माथुर[25] ने लेख किया है ...2. द्वारका (AS, p.459): कांबोज की एक नगरी का नाम जिसका उल्लेख राइस डेवीस के अनुसार प्राचीन साहित्य में है.

काम्बोज चन्द्रवंशजी जाट

काम्बोज - इन चन्द्रवंशज जाट लोगों का राज्य आज के अफगानिस्तान पर था जो महाभारत काल में काम्बोज देश कहलाता था। (महाभारत सभापर्व)। (जाटों का उत्कर्ष, पृ० 18, लेखक कविराज योगेन्द्रपाल शास्त्री)। काम्बोज नरेश सुदक्षिण अपनी एक अक्षौहिणी सेना के साथ दुर्योधन की ओर होकर महाभारत युद्ध में लड़ा था।[26]

जाटों का शासन-विधान

ठाकुर देशराज [27] ने लिखा है... अब हमें यह विचार करना है कि प्राचीन भारत के वे खानदान जो जाटों में शामिल हैं उन्होंने कौन-कौन सी हुकूमतों को चलाया था।

कांभोज, कुंतीभोज और अवंती ये सब भौज्य पद्धति से शासन करते थे। भूमि में जो भी कुछ पैदा होता था उसका एक निश्चित अंश केंद्रीय सभा को देते थे। केंद्रीय सभा में परिवारों की ओर से कुलपति बैठते थे। यह सभा कुलक कहलाती थी। यह लोग राजस्व को कुआ बावड़ी खुदवाने, बाग लगाने और सेना रखने में खर्च करते थे। भोज लोगों की ही एक शाखा प्रमार कहलाने लगी थी। द्वारिका का जाति राष्ट्र भौज्य राज्य भी कहलाता था। कुछ लोग भौज्य के अर्थ संयुक्त शासन के भी करते हैं।

Distribution in Rajasthan

Villages in Pali district

Kamedia Jats live in villages: Chandawal Nagar,

Villages in Nimach district

Kamedia Jats live in villages: Nimach (1), Fatehnagar (3), Pipalyavyas (6),

Distribution in Haryana

Kamboh Pura is a village in Karnal district in Haryana.

Distribution in Pakistan

According to 1911 census the Kamboh were the principal Muslim Jat clans:

Distribution in Uttar Pradesh

Kamboh Majra is village in Saharanpur district, Uttar Pradesh.

External links

References

  1. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. क-128
  2. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. क-164
  3. An Inquiry Into the Ethnography of Afghanistan, By H. W. Bellew, p.80
  4. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter IV, p.341
  5. Punjabi Muslalman by J M Wikely
  6. Mahendra Singh Arya et al.: Adhunik Jat Itihas, Agra 1998, p. 231
  7. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.34, 37, 48, 425
  8. Dwivedi, R. K., (1977) "A Critical study of Changing Social Order at Yuganta: or the end of the Kali Age" in Lallanji Gopal, J.P. Singh, N. Ahmad and D. Malik (eds.) (1977) D.D. Kosambi commemoration volume. Varanasi: Banaras Hindu University.
  9. Mishra, Krishna Chandra (1987) Tribes in the Mahabharata: A Socio-cultural Study. New Delhi, India: National Pub. House. ISBN 81-214-0028-7
  10. See: Vedic Index of names & subjects by Arthur Anthony Macdonnel, Arthur. B Keath, I.84, p 138.
  11. See more Refs: Ethnology of Ancient Bhārata, 1970, p 107, Ram Chandra Jain; The Journal of Asian Studies, 1956, p 384, Association for Asian Studies, Far Eastern Association (U.S.)
  12. India as Known to Pāṇini: A Study of the Cultural Material in the Ashṭādhyāyī, 1953, p 49, Vasudeva Sharana Agrawala; Afghanistan, p 58, W. K. Fraser, M. C. Gillet; Afghanistan, its People, its Society, its Culture, Donal N. Wilber, 1962, p 80, 311
  13. Walker, Andrew and Nicholas Tapp (2001) in Tai World: A Digest of Articles from the Thai -Yunnan Project Newsletter. Or in Scott Bamber (ed.) Thai-Yunnan Project Newsletter. Australian National University, Department of Anthropology, Research School of Pacific Studies. http://www.nectec.or.th/thai-yunnan/20.html. ISSN 1326-2777
  14. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.48
  15. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.497
  16. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.498
  17. Jats the Ancient Rulers (A clan study)/The Jats, p.34
  18. Mahabharata:2.47.22-26
  19. Journal of Asiatic Society of Bengal, Vol. LXI, p.298 .
  20. Punjab gazetteers, 1883, bound in 10 vols., without title-leaves, 1883, p 159, Punjab
  21. Punjab gazetteers, 1883, bound in 10 vols., without title-leaves, 1883, p 159, Punjab
  22. Rajatarangini of Kalhana:Kings of Kashmira/Book IV,p. 69
  23. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.123
  24. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.886
  25. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.459
  26. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter III, Page 291
  27. Thakur Deshraj:Jat Itihas (Utpatti Aur Gaurav Khand)/Ashtam Parichhed,p.137-138

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