Maheshwar

From Jatland Wiki
Jump to navigation Jump to search
Author: Laxman Burdak IFS (R)
Maheshwar on Map of Khargone district

Maheshwar (महेश्वर) is a town and tahsil in Khargone district in Madhya Pradesh. Its ancient name was Mahishmati.

Variants of name

Mention by Panini

Mahishmati (माहिष्मती) is a place name mentioned by Panini in Ashtadhyayi under Katrryadi (कत्र्य्रादि) (4.2.95) group. [1]

In Mahavansha

Mahavansa/Chapter 12 mentions that when the thera Moggaliputta, the illuminator of the religion of the Conqueror, had brought the (third) council to an end and when, looking into the future, he had beheld the founding of the religion in adjacent countries, (then) in the month Kattika he sent forth theras, one here and one there.....the thera, Mahadeva he sent to Mahisamandala....The thera Mahadeva who had gone to the Mahisamandala country preached in the midst of the people the Devadütasuttanta. Forty thousand (persons) made pure (in themselves) the eye of the truth and yet forty thousand received from him the pabbajja-ordination.

Visit by Xuanzang in 636 AD

Alexander Cunningham[2] writes....Much difficulty has been felt regarding the position of Fa-Hian's " great kingdom of Shachi," and of Hwen Thsang's Visakha, with its enormous number of heretics or Brahmanists ; but I hope to show in the most satisfactory manner that these two places are identical, and that they are also the same as the Saketa and Ajudhya of the Brahmans. The difficulty has arisen chiefly from an erroneous bearing recorded by Fa-Hian, who places She-wei, or Sravasti, to the south of Shachi, while Hwen Thsang locates it to the north- east, and partly from his erroneous distance of 7+3+10=20 yojanas instead of 30, from the well-known city of Sankisa. The bearing is shown to be erroneous


[p.402]: from the route of a Hindu pilgrim from the banks of the Godavari to Sewet or Sravasti, as recorded in the Ceylonese Buddhist works. This pilgrim, after passing through Mahissati and Ujjani, or Mahesmati and Ujain, reaches Kosambi, and from thence passes through Saketa to Sewet, that is along the very route followed by Hwen Thsang.[3]

History

It was a major trade centre in Mauryan and post Mauryan period. Mahishmati was terminus of Dakshinapath trade route which was extended to Amravati in Andhra Pradesh. Mahishmati is identified to be modern day Maheshwar, a town in the Khargone District in Madhya Pradesh state of India.

During the 6th and 7th centuries, Mahishmati may have served as the capital of the Kalachuri kingdom.[4] The Kalachuris were the builders of the famous cave temples on Elephanta Island in Mumbai harbor and also of several caves at the well-known site of Ellora, including the famous Rameshwara cave (Cave 21). Both Elephanta and Ellora are World Heritage Sites.

महेश्वर मध्य प्रदेश

महेश्वर मध्य प्रदेश के खरगौन ज़िले में स्थित एक ऐतिहासिक नगर तथा प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। यह नर्मदा नदी के किनारे पर बसा है। प्राचीन समय में यह शहर होल्कर राज्य की राजधानी था। महेश्वर धार्मिक महत्त्व का शहर है तथा वर्ष भर लोग यहाँ घूमने आते रहते हैं। यह शहर अपनी 'महेश्वरी साड़ियों' के लिए भी विशेष रूप से प्रसिद्ध रहा है। महेश्वर को 'महिष्मति' नाम से भी जाना जाता है। महेश्वर का हिन्दू धार्मिक ग्रंथों 'रामायण' तथा 'महाभारत' में भी उल्लेख मिलता है। देवी अहिल्याबाई होल्कर के कालखंड में बनाये गए यहाँ के घाट बहुत सुन्दर हैं और इनका प्रतिबिम्ब नर्मदा नदी के जल में बहुत ख़ूबसूरत दिखाई देता है। महेश्वर इंदौर से सबसे नजदीक है।[5]

स्थिति तथा नामकरण: महेश्वर शहर मध्य प्रदेश के खरगौन ज़िले में स्थित है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 3 (आगरा-मुंबई राजमार्ग) से पूर्व में 13 किलोमीटर अन्दर की ओर बसा हुआ है तथा मध्य प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर से 91 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह नगर नर्मदा नदी के उत्तरी तट पर स्थित है। शहर आज़ादी से पहले होल्कर वंश के मराठा शासकों के इंदौर राज्य की राजधानी था। इस शहर का नाम 'महेश्वर' भगवान शिव के ही एक अन्य नाम 'महेश' के आधार पर पड़ा है। अतः महेश्वर का शाब्दिक अर्थ है- "भगवान शिव का घर"।[6]

इतिहास

महेश्वर प्रसिद्ध नगरों में से एक रहा है। निमाड़ एवं महेश्वर का इतिहास लगभग 4500 वर्ष पुराना है। रामायण काल में महेश्वर को 'माहिष्मती' के नाम से जाना जाता था। उस समय 'महिष्मति' हैहय वंश के बलशाली शासक सहस्रार्जुन की राजधानी हुआ करता था, जिसने बलशाली लंका के राजा रावण को भी परास्त किया था। महाभारत काल में यह शहर अनूप जनपद की राजधानी बनाया गया था। सहस्रार्जुन द्वारा ऋषि जमदग्नि को प्रताड़ित करने के कारण उनके पुत्र भगवान परशुराम ने सहस्त्रार्जुन का वध किया था। कालांतर में यह शहर होल्कर वंश की महान् महारानी देवी अहिल्याबाई की राजधानी रहा।

चोली महेश्वर: महेश्वर को 'चोली-महेश्वर' भी कहा जाता है, प्राचीन स्थल माहेश्वरी पर स्थित यह स्थान हैहय राजा अर्जुन कर्तवीर्य (लगभग 200 ई.पू.) की राजधानी था, जिसका उल्लेख रामायण और महाभारत और कुछ पुराणों में भी मिलता है। महेश्वर भारत के उन कुछ विशिष्ट नगरों में से है, जिनका ईस्वी सन् के आरंभ से आधुनिक काल तक का सुप्रमाणित इतिहास उपलब्ध है, विशेषज्ञों द्वारा की गई खुदाई से विभिन्न संस्कृतियों का पता चला है, जो आरंभिक पाषाण युग से 18वीं शताब्दी तक के हैं। आरंभिक और मध्य पाषाण युग के लगभग 400 पुरापाषाण युग के औज़ार यहां पाए गए हैं। खुदाई के आधार पर इसे महाकाव्यों में वर्णित माहिष्मती नामक स्थान के रूप में पहचाना गया है। नर्मदा नदी से क़िले, मंदिरों और अहिल्याबाई के महल तक जाते हुए सीढ़ीदार घाट हैं। अहिल्याबाई ने 1767 में महेश्वर को अपनी राजधानी के रूप में चुना था। 16वीं शताब्दी की एक मस्जिद भी ऐतिहासिक महत्त्व की है। नर्मदा नदी के दूसरे तट पर नवदाटोली का प्राचीन स्थल है, जहां खुदाई में मिट्टी के रंगीन बर्तन और अन्य कलाशिल्प प्राप्त हुए हैं। यह शहर कृषि विपणन केंद्र है, जो व्यापार और खुदरा बाज़ार के लिए महत्त्वपूर्ण है। यहां की हथकरघा साड़ियां और पीतल से बने घर में काम आने वाले बर्तन भी प्रसिद्ध हैं।[7]

ऐतिहासिक-साहित्यिक पृष्ठभूमि: हिन्दी साहित्य के युग प्रवर्तक महाकवि जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटक 'चंद्रगुप्त मौर्य' में लिखा है कि राजस्थान के पंवार कुल के मौर्य नृपतिगण ने इतिहास प्रसिद्ध बड़े-बड़े कार्य, मौर्य काल के परमार कभी उज्जयिनी की ओर तो कभी राजस्थान की ओर अपनी राजधानी बनाते थे। उसी दीर्घकाल व्यापिनी अस्थिरता में मौर्य उसी तरह अपनी प्रतिभा बनाये थे, मौर्य कुल के महेश्वर नामक राजा ने विक्रम सवत के 600 वर्ष बाद सहस्त्रार्जुन किर्तिक वीर्याजुन की महिश्मती को नर्मता तट पर फिर से बसाया और उसका नाम महेश्वर रखा। विक्रमशिला विश्वविद्यालय उज्जैन के डॉ. हरिन्द्रभूषण जैन के अनुसार महिश्मती के और भी नाम थे जैसे- मत्स्य तथा पलिश्वर तीर्थ, मुसलमान ग्रन्थ में इसे मुंह मोहर बताया है, जिसे पाली भाषा में महिश्मती कहा गया है, संस्कृत में महिश्मती तथा महेश्वरी नगरी और अपभ्रंश में महेश्वरी तथा हिन्दी में महेश्वर।[8]


महेश्वर नगर के मध्य भाग की बसाहट पाषाण काल के पूर्व की प्रतीत होती है। जैसा कि नर्मदा तौडी से प्राप्त पुरातत्वीय वस्तुएं दर्शाती हैं। महेश्वर का भारतीय इतिहास शास्त्रों में महिश्मति के रूप में संदर्भ मिलता है, पुराणों में उल्लेख हैं कि महिश्मति की स्थापना राजा यदु के पुत्र मचकुंद ने की थी। यहां पर आठवीं सदी में शंकराचार्य के भारत भ्रमण पर विद्या पंडित मंडप मिश्र विदूषी शारदा शास्त्री से शास्त्रार्थ हुआ था। सांची के स्तूप में संकलित बोध साहित्य सिक्कों एवं दानपत्रों में भी महिश्मति का उल्लेख किया गया। वर्ष 1952-1954 में महेश्वर क्षेत्र में पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खुदाई से इस क्षेत्र के बसाव प्रतिरूप के कालानुक्रमिक इतिहास का निम्नानुसार पता चला है[9]

-
  • पुरा पाषाण युग में प्रचलित पत्थर के औजार।
  • मध्य पाषाण युगीय औजार।
  • ईसा के पूर्व के प्रथम दिव्ययुग के पूर्व मध्यकालीन चित्रित बर्तन (भांडे)।
  • पांचवी सदी की संस्कृति के सिक्के तथा काले एवं लाल रंग के बर्तन।
  • 10वीं सदी से 19वीं सदी के सिक्के।

उसके उपरांत कुछ कतिपय क्षेत्रों में खुदाई में आने कोई पुरातत्व अवशेष उपलब्ध नहीं हो सके। यहां परमार वंशीय एवं दूसरे हर्ष वंशीय युग के पूर्व अथवा पूर्व मुग़लकालीन आदिवासीकाल का भी पता नहीं चलता है तथा मुग़लकालीन चमकदार बर्तनों के रूप में मध्ययुगीन मुस्लिम पुरावशेष यहां प्राप्त हुए है। 17वीं शताब्दी में महेश्वर के भव्य क़िले का निर्माण हुआ था। मुग़ल शासकों नें यहां अधिक समय अधिवास नहीं किया, यह नगर 18वीं शताब्दी के पूर्व मराठा राजाओं द्वारा व्यवस्थित कर स्थापित किया गया था। प्रशासनिक दृष्टि से यह नगर महल में समाविष्ट था, जिसे महेश्वर चोली के नाम से भी जाना है। वर्ष 1767 से 1795 के कालखण्ड महारानी अहिल्याबाई होल्कर के शासन काल में महेश्वर नगर को अपनी कलात्मक तथा संस्कृतिक धरोहर को विकसित करने का अद्भुत संरक्षण प्राप्त हुआ। औरंगजेब के शासन काल में नष्ट किये गये हिन्दू मंदिरों को महारानी अहिल्याबाई ने अपने शासनकाल में इनका पुर्ननिर्माण कराया। उनकी धार्मिक प्रकृति के कारण यहां अनेकों मंदिरों का निर्माण किया गया। उनका अनुकरण करते करते परवर्ती होल्कर नरेशों के और उनके सभासदों आदि ने यहां मंदिर, सुन्दरघाट एवं छतरियां बनवाई गई। कुछ मंदिर यो यहां परमार काल (10वीं सदी) से पूर्व के निर्माण है। जिनमें कालेश्वर, ज्वालेश्वर, वृद्धकालेश्वर, केशव मंदिर, चतुर्भुजन मंदिर, बाणेश्वर तथा मातर्गेश्वर, शिवालय के नाम उल्लेखनीय हैं। [10]


भौगोलिक स्थिति: महेश्वर भौगोलिक दृष्टि से 22°11" उत्तरी अक्षांश तथा 75°36" पूर्वी देशांतर रेखा पर समुद्र सतह से 159 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। पतित पावन माँ रेवा के उत्तरी तट पर स्थित ऐतिहासिक एवं पुरातन महेश्वर नगर, बड़वाह-धामनोद मार्ग पर स्थित होकर पश्चिम निमाड़ ज़िले का तहसील मुख्यालय है। यह नगर धामनोद से 13 कि.मी तथा बड़वाह से 49 कि.मी संभागीय मुख्यालय, इन्दौर से 90 किलोमीटर तथा राजधानी भोपाल से 289 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। महेश्वर नगर का रेल मार्ग द्वारा सम्पर्क नहीं है, किंतु नगर के मध्य से धामनोद-बड़वाह मार्ग गुजरात है जो धामनोद में राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 3 (आगरा-मुम्बई) एवं बड़वाह में राज्य मार्ग क्रमांक 27 (खण्डवा-इन्दौर) को जोड़ता है, जिससे नगर सड़क मार्ग से सभी प्रमुख नगरों से जुड़ा हुआ है।[11]


भौगोलिक विशेषताएँ: महेश्वर नगर के दक्षिण में नर्मदा नदी प्रवाहित होती है। क़िले का भाग एवं नदी का कछार वाला भाग छोड़कर नगर का सम्पूर्ण क्षेत्र समतल है तथा नगर का ढलान पूर्व एवं दक्षिण में महेश्वरी नदी एवं नर्मदा नदी की ओर है। महेश्वरी नदी का ढलान नर्मदा नदी की ओर है। निमाड़ घाटी में नर्मदा नदी के प्रवाह के कारण हुए कटाव से कई ऊंचे टीले बने हैं। महेश्वर नगर इन्हीं टीलों में से एक है। नगर के आसपास भी पहाड़ीनुमा टीले स्थित होने से नगर का विस्तार नहीं हो पाया, नगर के दक्षिण में नर्मदा नदी प्रवाहित होने से इस ओर नगर की सीमा समाप्त हो गई है। पूर्व दिशा में महेश्वरी नदी जो नर्मदा नदी में मिलती है, के कारण भी नगर का विकास अवरुद्ध हुआ है। वर्तमान में नगर का कुछ विकास मेहतवाड़ा एवं धामनोद मार्ग पर हुआ है, भविष्य में धामनोद मार्ग पर हुआ है, भविष्य में धामनोद मार्ग पर विकास की सम्भावना अधिक है। नगर का ढलान दक्षिण में नर्मदा नदी एवं पूर्व में महेश्वरी नदी की ओर होने से नगर का प्रदूषित जल एवं वर्षा का पानी इन्हीं नदियों में विसर्जित होता है। अत: इसके लिये उचित प्रबंधन किया जाना आवश्यक है। वर्षाकाल में पेशवा मार्ग, मल्हारगंज, बस स्टेण्ड आदि क्षेत्र में वर्षा के पानी का फैलाव होता है, अतः सतही जल निकासी की व्यवस्था की जाना उचित है।[12]

माहिष्मती

विजयेन्द्र कुमार माथुर[13] ने लेख किया है ...[पृ.742]: महेश्वर को प्राचीन समय में 'माहिष्मती' (पाली 'माहिस्सती') कहा जाता था। तब माहिष्मति चेदि जनपद की राजधानी हुआ करती थी, जो नर्मदा नदी के तट पर स्थित थी। महाभारत के समय यहाँ राजा नील का राज्य था, जिसे सहदेव ने युद्ध में परास्त किया था- 'ततो रत्नान्युपादाय पुरीं माहिष्मतीं ययौ। तत्र नीलेन राज्ञा स चक्रे युद्धं नरर्षभ:।' (महाभारत, सभापर्व 32,21) (II.28.11)

राजा नील महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ता हुआ मारा गया था। बौद्ध साहित्य में माहिष्मति को दक्षिण अवंति जनपद का मुख्य नगर बताया गया है। बुद्ध काल में यह नगरी समृद्धिशाली थी तथा व्यापारिक केंद्र के रूप में विख्यात थी। तत्पश्चात् उज्जयिनी की प्रतिष्ठा बढ़ने के साथ-साथ इस नगरी का गौरव कम होता गया। फिर भी गुप्त काल में 5वीं शती तक माहिष्मति का बराबर उल्लेख मिलता है। कालिदास ने 'रघुवंश' (6,43) में इंदुमती के स्वयंवर के प्रसंग में नर्मदा तट पर स्थित माहिष्मति का वर्णन किया है और यहाँ के राजा का नाम 'प्रतीप'


[पृ.743]: बताया है- 'अस्यांकलक्ष्मीभवदीर्घबाहो माहिष्मतीवप्रनितंबकांचीम् प्रासाद-जालैर्जलवेणि रम्यां रेवा यदि प्रेक्षितुमस्तिकाम:।'

इस उल्लेख में माहिष्मति नगरी के परकोटे के नीचे कांची या मेकला की भांति सुशोभित नर्मदा का सुंदर वर्णन है. माहिष्मती नरेश को कालिदास ने अनूपराज भी कहा है (रघुवंश 6,37) जिससे ज्ञात होता है कि कालिदास के समय में माहिष्मती का प्रदेश नर्मदा के तट के निकट होने के कारण अनूप (जल के निकट स्थित) कहलाता था. पौराणिक कथाओं में माहिष्मती को हैहयवंशीय कार्तवीर्यार्जुन अथवा सहस्त्रबाहु की राजधानी बताया गया है. किंवदंती है कि इसने अपनी सहस्त्र भुजाओं से नर्मदा का प्रवाह रोक दिया था.

चीनी यात्री युवानच्वाङ्ग, 640 ई. के लगभग इस स्थान पर आया था. उसके लेख के अनुसार उस समय महिष्मति में एक ब्राह्मण राजा राज्य करता था. अनुश्रुति है कि शंकराचार्य से शास्त्रार्थ करने के वाले मंडन मिश्र तथा उनकी पत्नी भारती महिष्मति के ही निवासी थे. कहा जाता है कि महेश्वर के निकट मंडलेश्वर नामक बस्ती मंडन मिश्र के नाम पर ही विख्यात है. महिष्मति में मंडन मिश्र के समय संस्कृत विद्या का अभूतपूर्व केंद्र था.

महेश्वर में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने नर्मदा के तट पर अनेक घाट बनवाए थे जो आज भी वर्तमान हैं. यह धर्मप्राण रानी 1767 के पश्चात इंदौर छोड़कर इसी पवित्र स्थल पर रहने लगी थी. नर्मदा के तट पर अहिल्याबाई होलकर नरेशों की छतरियां बनी हैं. ये वास्तुकला की दृष्टि से प्राचीन हिंदू मंदिरों के स्थापत्य की अनुकृति हैं. भूतपूर्व इंदौर रियासत की आद्य राजधानी यहीं थी.

एक पौराणिक अनुश्रुति में कहा गया है कि माहिष्मती का बसाने वाला महिष्मान् नामक चंद्रवंशी नरेश था. सहस्त्रबाहु इन्ही के वंश में हुआ था. महेश्वरी नामक नदी जो माहिष्मती अथवा महिष्मान् के नाम पर प्रसिद्ध है, महेश्वर से कुछ ही दूर पर नर्मदा में मिलती है. हरिवंश पुराण (7,19) की टीका में नीलकंठ ने माहिष्मती की स्थिति विंध्य और रिक्ष-पर्वतों के बीच में विंध्य के उत्तर में, रिक्ष के दक्षिण में बताई है.

महिष्मंडल

विजयेन्द्र कुमार माथुर[14] ने लेख किया है ...महिष्मंडल (AS, p.727) नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित है प्रदेश (खानदेश इसमें सम्मिलित था). इसका नाम माहिष्मति नगरी के संबंध में महिष्मंडल हुआ था. लंका के प्राचीन बौद्ध इतिहास महावंश (12,3) में इसका उल्लेख है. अशोक के समय में होने वाली प्रथम धर्मसंगीति के पश्चात मोग्गलिपुत्र ने कई स्थविरों को पड़ोसी देशों में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भेजा था. उनमें स्थविर महादेव को महिष्मंडल भेजा गया था.

Chauhans of Mahishmati

There were many branches of the Chahamanas. The first of these braches lived in the kingdom of Mahishmati situated at the bank of river Narmada. In the tenth century A.D. when Pratiharas became weak the Chahamanas established its kingdom in Sambhar area.

James Tod[15] (Annals of Haravati) informs about early seat of Chohans in Mahishmati that they were Macavati.

The line of Nerbudda, from Macavati, or Makauti, to Maheswar, was the primitive seat of sovereignty, comprehending all the tracts in its vicinity both north and south. Thence, as they multiplied, they spread over the peninsula, possessing Mandoo, Aser, Golconda and the Konkan; while to the north, they stretched even to the fountains of the Ganges.

It has already been observed, that Macaouti-Nagri was the ancient name of Garra Mandalla, whose princes for ages continued the surname of Pal, indicative, it is recorded by tradition, of their nomadic occupation. A. scion from Macaouti, named Ajaipal, established himself at Ajmer, and erected its castle of Taragarh.

Villages in Maheshwar tahsil

Ahilypura, Akhipura, Ashapur, Asukhedi, Awalya, Bablai, Bablai, Bada, Badadiya Surta, Baddiya, Badwel, Badwi, Bagkeria Khedi, Bahegawan, Bakaner, Balasgaon, Bandera, Banjari, Bardiya, Barfadkhurd, Barlay, Batholi, Bhagdara, Bhaklay, Bhampura, Bhawantalai, Bhedlya Chhota, Bhedlyabada, Bhudri, Bilbawdi, Borbawadiya, Borda, Chakmahetwada, Chakmatmur, Chidadiya, Chikli, Chingun, Chirakhan, Choli, Choti Khargone, Chougawan, Damkheda, Dehriya, Dhapla, Dhargoan, Digar, Fifriya, Gadbadi, Gadi, Gagantalab, Gangat Khedi, Gawala, Ghatya Baidi, Gogawan, Gujarmohna, Gulawad, Hadki, Harsgoan, Helababar, Hindolagwadi, Hirapur, Hodadiya, Itawadi, Jalkota, Jalkoti, Jalud, Jamnaya, Jamnaya, Jhapadi, Jhara, Jhirnaya, Jhirnya, Jhirwi, Kakadda, Kakariya, Kakwada, Kanykhdi, Karahi, Karodiya, Karoli, Katargaon, Kawadiya, Kawana, Kawdiya, Keriakhedi, Kharadi, Khariya, Khedi, Khedi, Kheygoan, Khumbhya, Kodala, Kogawan, Krodiya Bujurg, Krodiya Khurd, Kundiya, Kusumbhya, Ladvi, Lakhanpura, Machalpur, Maheshwar, (NP) Mahetawada, Mahmadpura, Maksi, Malshakhedi, Malya Khedi, Manawar, Mandleshwar,(NP) Mardanya, Mardhori, Matanda, Mathnaya, Matmur, Melkhedi, Mirjapura, Mogoan, Mohad, Mohana, Mohanya, Mohida, Mundya Kheda, Nagjhri, Najarpur, Nandra, Navrangpura, Nawalpura, Neemgad, Nimgul, Nimsar, Padlya Bujurg, Padlya Khurd, Palda, Palsud, Pathrad Khurd, Pipalpati, Pipliya Bujurg, Pipliya Khalsa, Pipliya Khurd, Pipliyadeo, Pitamali, Prampura, Rabadghati, Rajpura, Ramdad, Rangun, Rosayabari, Salipura, Samaspura, Samraj, Samstpura, Sangvi, Sejgoan, Sel, Semalda, Shitamau, Siralya, Sirsya, Sitoka, Somakhedi, Sulgawn, Sultanpura, Sulykhedi, Surwa, Tajpura, Tekwa, Temariya, Thangoan, Tigriyaw, Udepura, Urway, Vaslikundya, Veklya, Wani,

In Mahabharata

Mahishmati (माहिष्मती) City is mentioned in Mahabharata (II.28.11),(V.19.23),


Sabha Parva, Mahabharata/Book II Chapter 28 mentions Sahadeva's march towards south: kings and tribes defeated. Mahishmati (माहिष्मती) City is mentioned in Mahabharata verse (II.28.11).[16]...And taking jewels and gems from them all, the hero (Sahadeva) marched towards the city of Mahishmati, and there that bull of men did battle with king Nila. The battle that took place between king Nila and the mighty Sahadeva the son of Pandu, was fierce and terrible.


Udyoga Parva/Mahabharata Book V Chapter 19 mentions Kings and tribes Who joined Duryodhana for war. Mahishmati (माहिष्मती) City as capital of Nila is mentioned in Mahabharata verse (V.19.23).[17]....And similarly came king Nila, the resident of the city of the Mahishmati, with mighty soldiers from the southern country who carried weapons of pretty make.


Mahishmati was an ancient city mentioned in the epic Mahabharata. It was the capital of the kingdom named Heheya. Kartavirya Arjuna, a Yadava king, was the foremost ruler of Mahismati and Haiheya (Mbh 13:52). He was killed by Bhargava Rama. Epic Ramayana mentions about the attack of Rakshasa king Ravana on Mahishmati. Pandava general Sahadeva also has attacked Mahishmati, when King Nila was its ruler (2:30). King Nila of Mahishmati is mentioned as a leader in the Kurukshetra War, rated by Bhishma as a Rathi. His coat of mail had blue colour (Mbh 5:19,167).

Notable persons

External links

References

  1. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.508
  2. The Ancient Geography of India/Vaisakha, p.401-402
  3. Hardy, ' Manual of Buddhism,' p. 334.
  4. "Kalachuris of Mahismati". CoinIndia.
  5. भारतकोश-महेश्वर
  6. भारतकोश-महेश्वर
  7. पुस्तक- भारत ज्ञानकोश खंड-4| एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका (इंडिया) |पृष्ठ-336
  8. भारतकोश-महेश्वर
  9. भारतकोश-महेश्वर
  10. भारतकोश-महेश्वर
  11. भारतकोश-महेश्वर
  12. भारतकोश-महेश्वर
  13. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.942-943
  14. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.727
  15. Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II, pp.408-409
  16. ततॊ रत्नान्य उपादाय पुरीं माहिष्मतीं ययौ,तत्र नीलेन राज्ञा सचक्रे युथ्धं नरर्षभः (II.28.11)
  17. तदा माहिष्मती वासी नीलॊ नीलायुधैः सह, महीपालॊ महावीर्यैर दक्षिणापदवासिभिः (V.19.23)

Back to Madhya Pradesh