Barh

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Barh (बाढ़) (born:1097 AD) was ancestral King of Punias who founded city of Barmer in 1127 AD. Barhadev constructed Shiva temple at Jeenmata in 1178 AD. He founded Punia Kingdom at Jhansal in 1188 AD. [1]

Variants of name

History

H.A. Rose[2] writes that The Jats of the south-east Punjab have two other divisions, 1. Shibgotra and 2. Kashib-gotra. The former are also called asl or real Jats and confess that their progenitor sprang from Shiva's matted hair and was so called jat bhadra. They have 12 gots, which are descended from the 12 sons of Barh, who conquered a large part of Bikaner. His descendants are chiefly sprung from Punia and they held the country round Jhansal. These 12 Gotras are: 1. Punia. 2. Dhanian. 3. Chhacharik. 4. Bali. 5. Barbra. 6. Solahan/Sulakhan. 7- Chiria. 8. Chandia. 9. Khokha. 10. Dhanaj. 11. Letar. 12. Kakar.

इतिहास: चौधरी कन्हैयालाल पूनिया

चौधरी कन्हैयालाल पूनिया[3] ने लिखा है कि... लगभग 900 साल पहले श्री उतगर के दो संतान पैदा हुई जिसमें से एक का नाम बाढ़ तथा दूसरे का नाम मेर था। बाढ़देव का जन्म विक्रम संवत 1154 (1097=ई.) कार्तिक सुदी पूर्णिमा को पुणे महाराष्ट्र में हुआ। बाढ़देव ने विक्रम संवत 1184 (1127=ई.) आषाढ़ सुदी नवमी वार शनिवार को बाड़मेर की स्थापना की। बाढ़ और मेर दोनों भाईयों के नाम पर आज के बाढ़मेर का नामकरण हुआ। कालांतर में दोनों भाईयों के झगड़े का फायदा उठाकर सोढ़ा राजपूतों ने उस पर कब्जा कर लिया। बाढ़देव उत्तर भारत की ओर प्रस्थान कर गए। उनकी संताने पूनिया कहलाई और मेर महाराष्ट्र में मेरठा (मराठा) के नाम से जाने गए।

बाढ़देव बाड़मेर से विक्रम संवत 1235 (1178=ई.) में पुष्कर आए और आगे जीनमाता के स्थान पर हर्ष के पहाड़ पर शिव मंदिर बनवाया। जीनमाता ने बाढ़देव को वरदान स्वरूप एक पत्थर शीला दी और कहा कि यह जहां गिरे वहीं पर नीम की हरी शाखा काटकर डालना वह संजीवनी हो जाएगी तथा वहीं आपका राज्य सदा-सदा के लिए कायम रहेगा। पूनिया गोत्र आज भी उस शीला का आदर करता है। उस पर स्नान नहीं करते।

विक्रम संवत 1245 (1188=ई.) मिति चैत्र सुदी 2 वार शनिवार को पूनिया गोत्र के आदि पुरुष बाढ़देव ने झांसल में अपने प्रसिद्ध गणराजय की नींव रखी। विक्रम संवत 1245 से 1822 के राठोडों के साथ राजीनामे तक पुनिया आज के हिसार-पिलानी-चुरू-तारानगर एवं भादरा तक काबिज रहे। इस बीच राज्य कायम रखने के समकालीन संघर्षों में पुनियों की राजधानी झांसल से लूदी में तब्दील करनी पड़ी। पडोस के दईया सरदार दीर्घपाल पर विजय, रठौड़ों और गोदारों की संयुक्त सेना के साथ लगातार संघर्ष , जबरिया राठौड़ शासक रायसिंह द्वारा धर्मभाई बनाने का बुलावा देकर धोके से पूनिया सरदारों चेचू और खेता को अपने राजगढ़ वाले किले की नींव में दबाने का बदला राठौड़ रायसिंह के वध से लेने आदि की ऐतिहासिक घटनाएँ हुई। इस कालावधि में कान्हादेव पुनिया गोत्र का इतिहास प्रसिद्ध योद्धा बनकर उभरा जिसने लूदी में अपना स्वतंत्र गढ़ निर्माण किया। लगभग 360 गांवों का यह पूनिया गणराज्य अंतत: जोधपुर शासन के विस्तार हेतु कांधल और बीका तथा जाट गणराज्यों की फूट का शिकार हो गया।

राठौड़ नरेश रायसिंह केध के बाद पोनियागढ़ का नाम राजगढ़ रख दिया। आज भी राजगढ़ के चारों ओर 100 गाँव पूनिया के हैं। जांगल प्रदेश के नैनसुख पुनिया को ब्रिटिश सरकार ने मुरादाबाद के 50 गाँव एवं बुलंदशहर के 17 गाँव की स्वतंत्र रियासत पुरस्कार स्वरूप प्रदान की थी। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के 2 गाँव, मेरठ के 10 गाँव, अलीगढ़ सासनी के 10 गाँव और अतरौली की पौनियावाटी प्रसिद्ध है जहां मुगल-पतन काल में पुनिया के 84 गाँव स्वतंत्र घोषित हो गए थे। आगरा की पुनिया टेकरी एवं बुलंदशहर का पौनीयों का मण्डौना गाँव प्रसिद्ध है। उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान के अलावा पंजाब के जालंधर एवं पटियाला और हरयाणा की भिवानी में 150 गाँव पुनिया खाप से संबन्धित हैं। भगवान शिव और नाग से जन्म रिस्ता रखने वाली जाटों की इस गोत्र का युद्ध तथा खेल इतिहास में भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण संसार में खास मुकाम है।

पूनिया जाट हिन्दू, सिख और मुसलमान तीनों धर्मों में और अनेक जतियों में पाये जाते हैं। पाकिस्तान के बन्नू, डेरा इसमाईल खान, डेरा गजीखान, डेरा फतह खान, पौनीया जाटों के इस्लामिकरण की खुशी में बसाये गए प्राचीन नगर हैं। डेरा इसमाईल खान के किले पर शिलालेख में दर्ज है कि – “मान पौनीयां चटठे, खान-पान में अलग-अलग लूटने में कट्ठे”।

पूनिया वंशावली

पंडित अमीचन्द्र शर्मा[4] ने लिखा है - रियासत बीकानेर में पूनिया गोत्र के कई गाँव हैं। इनके बड़े का नाम बाहड़ था। उसने अपने प्राक्रम से बीकानेर रियासत का बहुत सा देश अपने वश में कर लिया था। उसने बाड़मेल कोटर नाम का गाँव बसाया। जब उसकी संतान बढ़ गई तो वहां से चलकर झांसल ग्राम बसाया जो बीकानेर रियासत में है। उसके 12 पुत्र हुये – 1 पुनिया, 2 धानिया, 3 छाछरेक, 4 बाली, 5 बरबरा, 6 सुलखन, 7 चिड़िया, 8 चांदिया, 9 खोख, 10 धनाज, 11 लेतर, 12 ककरके

इनके नाम पर जाटों के 12 गोत्र शुरू हुये। सबसे बड़ा पूनिया था उसने झांसल के आसपास बहुत गाँव बसाये। इसीलिए उस भाग को पूनिया इलाका कहते हैं।


[p.42]: आईने अकबरी में इलाका पूनिया प्रथक लिखा है। बाहड़ का पुत्र पूनिया था। जिससे पूनिया गोत्र चला। पूनिया जाट अपने आपको शिव गोत्री बताते हैं। दूसरे जाटों को कश्यप गोत्री बताते हैं। लेखक ने यह विवरण सरकारी किताब से लिखा है जो जिला हिसार के पुराने बंदोबस्त में जिला हिसार के सब जातियों के वर्णन में दिया है।

References

  1. Kanhaiyalal Punia:Hanumangarh Jila Jat Samaj Smarika-2010,p.16-17
  2. A glossary of the Tribes and Castes of the Punjab and North-West Frontier Province By H.A. Rose Vol II/J,p.375-376
  3. Hanumangarh Jila Jat Samaj Smarika-2010,p.16-17
  4. Jat Varna Mimansa (1910) by Pandit Amichandra Sharma, p.41-42

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