Taranagar

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Location of Taranagar in Churu district

Taranagar (तारानगर) is the name of a city and tahsil headquarter in Churu district in the Indian state of Rajasthan.

Old name of Taranagar

It is learnt that Taranagar town was earlier known as Reni or Rini.

Jat Gotras

Villages in Taranagar tahsil

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History

...जाखड़ गोत्र के एक जाट राजा का राज्य गुजरात प्रान्त में था। वह वहां से आकर बीकानेर में बस गया। इस राजा के विषय में “जाट वर्ण मीमांसा” के लेखक पण्डित अमीचन्द शर्मा ने लिखा है कि - “इस जाखड़ राजा की राजधानी रेणी थी।[1]


The ancient name of Taranagar was Rini. Col. Tod has mentioned that the swampy areas inundated in water when dries up gets converted to flat lands known as Ran, Reni or Rini. This is probably the origin behind the name Rini.[2]

It was part of Jangladesh and capital of the Jakhar gotra Jat, rulers prior to its annexation by the Rathor rulers. Thakur Deshraj writes that the king of the Jakhar clan, Jakhabhadra, settled in Jangladesh and made his capital at Reni (modern-day Taranagar). [3]

Dasharatha Sharma gives us details of Towns and Villages of Chauhan Dominions from C. 800 to 1316 A.D. in his book Early Chauhān dynasties.[4] S.No.103 in first table mentions Reni. (See:Towns and Villages of Chauhan Dominions)

Reni was the headquarter of nizāmat and tehsil of the same name in the princely state of Bikaner in Rajasthan, situated at 28° 41'N 75° 3'E, about 120 miles northeast of Bikaner city. The nizāmat consisted of five eastern tehsils of Bhadra, Churu, Nohar, Rajgarh and Reni.


During British rule in India, the Rathores of princely state Bikaner changed the names of important towns of this area in the names of Rathore Jagirdars and thikanedars. Rini was renamed Taranagar on 16 March 1941.[5]

तारानगर का नामकरण

संदर्भ - तारानगर के इतिहास का यह भाग 'श्री सार्वजनिक पुस्तकालय तारानगर' की स्मारिका 2013-14: 'अर्चना' में प्रकाशित जगमाल सिंह सांसी (मोबा:9649788077) के लेख 'तारानगर की प्राचीनता' (पृ.100-109) से लिया गया है।

नामकरण तारानगर - तारानगर का यह नाम बीकानेर रियासत के रियासतपति तारा सिंह के नाम पर 16 मार्च 1941 को इसके पूर्व नाम रिणी को बदलकर तारानगर किया गया। ('अर्चना':पृ.100)

नामकरण रिणी - रिणी का संबंध सरस्वती नदी से है। ऐसी मान्यता है कि अत्यंत प्राचीन काल में सरस्वती, दृष्वती तथा अयापा नदियां तारानगर-नोहर (रिणी) क्षेत्र के बहुत निकट से होकर बहती थी।[6] रामदत्त सांकृत्य लिखते हैं कि सरस्वती और उसकी सहायक सातों नदियां सुप्रभ, कांचनाक्षी, विशाला, मनोरमा, ओघवती, सुरेणु और विमलोंदका थी। ये कुरुक्षेत्र से लेकर पुष्कर तक फैली हुई थी। यह सारस्वत प्रदेश कहलाता था। [7] ('अर्चना': पृ.101)

भूगोल वेताओं का मानना कि काटली नदी, खंडेला की पहाड़ियों से निकल कर राजगढ़ तक बहती थी। कुछ विद्वानों के अनुसार काटली नदी ही ऋग्वेद की दृष्वती या आश्वन्ती थी। अरावली का पानी हरयाणा के 'सतनारा' तक बहता था तथा वहाँ से मुड़कर एक धारा भादरा-नोहर-भटनेर (हनुमानगढ़) की ओर बढ़ गई थी तथा दूसरी धारा भादरा - सिद्धमुख - ददरेवा- बाँय - तारानगर (रिणी) - लूणास (लवनांश) - कालाश (कालांश) - नेठवा - गड़ाना (गादाना) - कोयलापत्तन (फोगां) - पल्लू- डूंगरगढ़ के कुछ भाग को पार करती हुई बीकानेर से आगे लुप्त होती थी। इस प्रकार रिणी सरस्वती तथा इसकी सहायक नदियों से परिपोषित थी।('अर्चना': पृ.101)

2000 ई. पूर्व से पहले नदियों के शुष्क होने की अवधारणा है। रिणी जियोलोजिकल शब्द है जिसका अर्थ है जल शुष्क होने से बने रेतीले मैदान। इसको भाषा भेद के कारण 'रिन', 'रिणी', 'रैनी', 'रैणी' आदि बोलते हैं। 2000 ई. पूर्व नदियों के शुष्क होने की स्थिति बनी तब रिणी का मैदान अस्तित्व मे आया। ('अर्चना': पृ.101)

इतिहासकर डॉ वासुदेव शरण अग्रवाल ने पाणिनी की अष्टाध्यायी को आधार मानकर पुस्तक 'पाणिनी कालीन भारत' मे 'रौणी' स्थान को 'रिणी' होने की संभावना व्यक्त की है। [8] ('अर्चना': पृ.102)


कर्नल जेम्स टोड (अनाल्स एंड अंटीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान के हिन्दी अनुवाद - राजस्थान का इतिहास पृ 1108 संस्कारण 1909) के अनुसार 'रन' या 'रिन' संस्कृत के 'अरण्य' शब्द का अपभ्रंश है। ('अर्चना': पृ.102)

तारानगर का इतिहास

कसवां जाटों का शासन: 'चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास' पुस्तक में लेख किया है कि ईसा पूर्व चौथी सदी मे कसवां जाट जांगलप्रदेश मे आबाद हो गए थे। [9]('अर्चना': पृ.103) ठाकुर देशराज लिखते हैं कि आरम्भ में यह सिन्ध में राज्य करते थे। ईसा की चौथी सदी से पहले जांगल-प्रदेश में आबाद हुए थे। इनके अधिकार में लगभग चार सौ गांव थे। सीधमुख राजधानी थी। राठौरों से जिस समय युद्ध हुआ, उसय समय कंवरपाल नामी सरदार इनका राजा था। इस वंश के लोग धैर्य के साथ लड़ने में बहुत प्रसिद्ध थे। कहा जाता है दो हजार ऊंट और पांच सौ सवार इनके प्रतिक्षण शत्रु से मुकाबला करने के लिए तैयार रहते थे। यह कुल सेना राजधानी में तैयार न रहती थी। वे उत्तम कृषिकार और श्रेष्ठ सैनिक समझे जाते थे। राज उनका भरा-पूरा था। प्रजा पर कोई अत्याचार न था। सत्रहवीं शताब्दी में इनका भी राज राठौंरों द्वारा अपहरण कर लिया गया। इनके पड़ौस में चाहर भी रहते थे।[10]

चाहर जाटों का शासन: संवत 1324 विक्रम (1268 ई.) में कंवरराम चाहरकानजी चाहर ने नसीरुद्दीन शाह के वारिस बादशाह गियासुद्दीन बलवन (1266 -1287) को पांच हजार चांदी के सिक्के एवं घोड़ी नजराने में दी। बादशाह बलवान ने खुश होकर कांजण (बीकानेर के पास) का राज्य दिया। 1266 -1287 ई तक गयासुदीन बलवान ने राज्य किया। सिद्धमुख एवं कांजण दोनों जांगल प्रदेश में चाहर राज्य थे।

राजा मालदेव चाहर - जांगल प्रदेश के सात पट्टीदार लम्बरदारों (80 गाँवों की एक पट्टी होती थी) से पूरा लगान न उगा पाने के कारण दिल्ली का बादशाह खिज्रखां मुबारिक (सैयद वंश) नाराज हो गए। उसने उन सातों चौधरियों को पकड़ने के लिए सेनापति बाजखां पठान के नेतृतव में सेना भेजी। खिज्रखां सैयद का शासन 1414 ई से 1421 ई तक था। बाजखां पठान इन सात चौधरियों को गिरफ्तार कर दिल्ली लेजा रहा था। यह लश्कर कांजण से गुजरा। अपनी रानी के कहने पर राजा मालदेव ने सेनापति बाजखां पठान को इन चौधरियों को छोड़ने के लिए कहा. किन्तु वह नहीं माना। आखिर में युद्ध हुआ जिसमें मुग़ल सेना मारी गयी. इस घटना से यह कहावत प्रचलित है कि -

माला तुर्क पछाड़याँ दे दोख्याँ सर दोट ।
सात जात (गोत) के चौधरी, बसे चाहर की ओट ।

ये सात चौधरी सऊ, सहारण, गोदारा, बेनीवाल, पूनिया, सिहाग और कस्वां गोत्र के थे।

विक्रम संवत 1473 (1416 ई.) में स्वयं बादशाह खिज्रखां मुबारिक सैयद एक विशाल सेना लेकर राजा माल देव चाहर को सबक सिखाने आया। एक तरफ सिधमुख एवं कांजण की छोटी सेना थी तो दूसरी तरफ दिल्ली बादशाह की विशाल सेना।

मालदेव चाहर की अत्यंत रूपवती कन्या सोमादेवी थी। कहते हैं कि आपस में लड़ते सांडों को वह सींगों से पकड़कर अलग कर देती थी। बादशाह ने संधि प्रस्ताव के रूप में युद्ध का हर्जाना और विजय के प्रतीक रूप में सोमादेवी का डोला माँगा। स्वाभिमानी मालदेव ने धर्म-पथ पर बलिदान होना श्रेयष्कर समझा। चाहरों एवं खिजरखां सैयद में युद्ध हुआ। इस युद्ध में सोमादेवी भी पुरुष वेश में लड़ी। युद्ध में दोनों पिता-पुत्री एवं अधिकांश चाहर मारे गए।[11]


ददरेवा में बुरड़कों का शासन:

बुरडक गोत्र के बडवा (भाट) श्री भवानीसिंह राव (फोन-09785459386) की बही के अभिलेखों में ददरेवा का सम्बन्ध बुरड़क गोत्र के इतिहास से है । अजमेर के चौहान वंश में राजा रतनसेण के बिरमराव पुत्र हुए । बिरमराव ने अजमेर से ददरेवा आकर राज किया । संवत 1078 (1021 AD) में किला बनाया । इनके अधीन 384 गाँव थे । बिरमराव की शादी वीरभाण की बेटी जसमादेवी गढ़वाल के साथ हुई । इनसे तीन पुत्र उत्पन्न हुए:

  1. सांवतसी - सांवतसी के पुत्र मेलसी, उनके पुत्र राजा घंघ, उनके पुत्र इंदरचंद तथा उनके पुत्र हरकरण हुए । इनके पुत्र हर्ष तथा पुत्री जीण उत्पन्न हुयी । जीणमाता कुल देवी संवत 990 (933 AD) में प्रकट हुयी ।
  2. सबलसी - सबलसिंह के बेटे आलणसी और बालणसी हुए. सबलसी ने जैतारण का किला संवत 938 (881 AD) में आसोज बदी 10 को फ़तेह किया । इनके अधीन 240 गाँव थे । बालणसी साम्भर से उठकर आये और माघ सुदी बसंत पंचमी के दिन संवत 821 (765 AD) को चूरु के पश्चिम में बालरासर गाँव बसाया. संवत 825 (768 AD) में बालरासर से उठकर चौधरी मालसिंह ने चैत सुदी राम-नवमी के दिन कारी गाँव बसाया.
  3. अचलसी -

सबलसी के बेटे आलणसी के पुत्र राव बुरडकदेव, बाग़देव, तथा बिरमदेव पैदा हुए । आलणसी ने संवत 979 (922 AD) में मथुरा में मंदिर बनाया तथा सोने का छत्र चढ़ाया । ददरेवा के राव बुरडकदेव के तीन बेटे समुद्रपाल, दरपाल तथा विजयपाल हुए । राव बुरडकदेव (b. - d.1000 AD) महमूद ग़ज़नवी के आक्रमणों के विरुद्ध राजा जयपाल की मदद के लिए लाहोर गए । वहां लड़ाई में संवत 1057 (1000 AD) को वे जुझार हुए । इनकी पत्नी तेजल शेकवाल ददरेवा में तालाब के पाल पर संवत 1058 (1001 AD) में सती हुई । राव बुरडकदेव से बुरडक गोत्र निकला । राव बुरडकदेव के बड़े पुत्र समुद्रपाल के 2 पुत्र नरपाल एवं कुसुमपाल हुए. समुद्रपाल राजा जयपाल के पुत्र आनंदपाल की मदद के लिए 'वैहिंद' (पेशावर के निकट) गए और वहां पर जुझार हुए । संवत 1067 (1010 AD) में इनकी पत्नी पुन्यानी साम्भर में सती हुई ।

चौहानों का शासन - सांभर के चौहानों का रिणी के पास स्थित ददरेवा और घांघु (चूरु) मे शासन रहा। 10 वीं शताब्दी के लगभग अंत में मरुप्रदेश के चौहानों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करने प्रारम्भ कर दिये थे। इसी स्थापनाकाल मे घंघरान चौहान ने वर्तमान चुरू शहर से 10 किमी पूर्व मे घांघू गाँव बसा कर अपनी राजधानी स्थापित की। [12] ('अर्चना',पृ.21)

राणा घंघरान की दूसरी रानी से कन्हराज, चंदराजइंदराज हुये। कन्हराज के चार पुत्र अमराज, अजराज, सिधराज व बछराज हुये। कन्हराज का पुत्र अमराज (अमरा) उसका उत्तराधिकारी बना। अमराजका पुत्र जेवर (झेवर) उसका उत्तराधिकारी बाना। लेकिन महत्वाकांक्षी जेवर ने ददरेवा को अपनी राजधानी बनाई और घांघू अपने भाइयों के लिए छोड़ दिया। जेवर ने उत्तरी क्षेत्र मे अपने राज्य का विस्तार अधिक किया। असामयिक मृत्यु के कारण यह विजय अभियान रुक गया। जेवर के पश्चात उनका पुत्र गोगा (गोगदेव) चौहान युवावस्था से पूर्व ही माँ बाछलदे के संरक्षण में ददरेवा का राणा बना। [13]('अर्चना',पृ.21)


ददरेवा के चौहानों मे एक चाहिल भी थे। इनके शासन को चाहिलवाड़ा नाम से जाना जाता था। चाहिलों ने एक समय रिणी पर भी कब्जा कर लिया था। [14] ('अर्चना': पृ.105)

रिणी को विक्रम संवत 999 तदानुसार 942 ई. को ऐतिहासिक ख्याति मिली जब आदि जैन मंदिर मे मूर्ति स्थापित हुई। उस समय जसवंत डहलिया यहाँ के शासक थे। ('अर्चना': पृ.105)


10 वीं 11 वीं सदी में देश व्यापी अकाल था। [15] कर्नल जेम्स टोड के अनुसार महमूद गजनवी से प्रताड़ित जाट रिणी के आस-पास बस गए थे। महमूद गजनवी 1024 ई मे सोमनाथ को लूटकर वापस जा रहा था तब रिणी के आस-पास से गुजरा था। महमूद सोमनाथ पर आक्रमण कर उस अद्वितीय धरोहर को नष्ट करने में सफल रहा लेकिन उसको इतनी घबराहट थी कि वापसी के समय बहुत तेज गति से चलकर अनुमानित समय व रणयोजना से पूर्व गोगा के राज्य के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र मे प्रवेश कर गया। गोगा द्वारा आमंत्रित उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की सेनाएँ समय पर नहीं पहुंची थी। गोगा ने हिम्मत नहीं हारी। अपने पुत्र भाई-भतीजों एवं स्थाई तथा एकत्रित सेना को लेकर प्रस्थान किया। ददरेवा से 25 कोस (75 किमी) उत्तर-पश्चिम के रेगिस्तानी निर्जन वन क्षेत्र में तेज गति से जाते हुये महमूद का रास्ता रोका। उस समय महमूद रास्ता भटका हुआ था और स्थानीय लोगों के सहयोग से गजनी शहर का मार्ग तय कर रहा था। गोगा के चतुर सैनिकों ने रास्ता बताने के बहाने महमूद की सेनाके निकट पहुँचकर उसकी सेना पर आक्रमण कर दिया। गोगा के पास साहस तो था पर सेना कम थी। महमूद की सेना के काफी सैनिक मारे गए। महमूद के सैनिकों की संख्या बहुत अधिक थी। गोगा अपने 45 से अधिक पुत्र, भतीजों एवं निकट बंधु-बांधवों के अतिरिक्त अन्य सैंकड़ों सैनिकों के साथ बालू मिट्टी के एक टीले पर सांसारिक यात्रा को विराम दिया।[16]('अर्चना',पृ.23)


विक्रम की 10 वीं सदी मे शिशुपाल के वंशज जसवंत डाहलिया यहाँ के शासक थे और उनके पूर्वज 'रिंणीपाल' थे। ('अर्चना': पृ.102) जसवंत डाहलिया से जाट जनपदों की अनबन हो गई थी। इस प्रसंग से ऐतिहासिक गढ़ के निर्माण की संभावना 10-11 वीं सदी मे बनती है। स्वतन्त्रता सेनानी चौधरी मनीराम आर्य के अनुसार बुड़िया जाटों के नेतृत्व मे जाटों ने दुर्ग पर कब्जा कर लिया था। ('अर्चना': पृ.105)

गोरखनाथ जी के विख्यात शिष्यों चौरंगीनाथ (पूरनभगत), विचारनाथ (भरथरी) तथा बैरागनाथ (गोपीचन्द) ने इस धरा को अपने चरण कमलों से पवित्र किया था। भामरा गाँव मे आज भी भरथरी आश्रम है। [17]('अर्चना': पृ.106)


ददरेवा के कायमखानी: राजस्थान के इतिहासकार मुंहता नेणसी ने अपनी ख्यात में लिखा है कि हिसार के फौजदार सैयद नासिर ने ददरेवा को लूटा. वहां से दो बालक एक चौहान दूसरा जाट ले गए. उन्हें हांसी के शेख के पास रख दिया. जब सैयद मर गया तो वे बहलोल लोदी के हुजूर में भेजे गए. चौहान का नाम कायमखां तथा जाट का नाम जैनू रखा. जैनू के वंशज (जैनदोत) झुंझुनु फतेहपुर में हैं. कायमखां हिसार का फौजदार बना. चौधरी जूझे से मिलकर झुंझुनूं क़स्बा बसाया. कायमखां ददरेवा के मोटेराव चौहान का पुत्र था. कायमखां के वंशज कायमखानी कहलाते हैं. [18][19] मोटेराव चौहान का समय प्राय: 1315 ई. होता है जो फिरोज तुग़लक के काल के नजदीक है. इससे स्पस्ट होता है कि कायम खां फीरोज तुग़लक (1309-1388) के समय में मुसलमान बना. [20] कायमखनियों के लिए दादरेवा पवित्र भूमि मानी जाती है वैसे ही जैसे हिन्दू के लिए अयोध्या। ('अर्चना': पृ.106)

12-13 वीं सदी मे रिणी व्यापार का बड़ा केंद्र था। [21] दिल्ली से गुजरात एवं मंसौर की ओर जाए वाला राजस्थान का मुकी मार्ग से होकर गुजरता था। कर्नल टोड के अनुसार रेनी , राजगढ तथा चूरु के बाजार सिंधु व गंगा प्रदेश से आयातित माल से भरे रहते थे। ('अर्चना': पृ.106)

14वीं सदी मे तो "रिणी मुद्रा" प्रचालन मे थी। [22] ठक्कर फेरु ने द्रव्य परीक्षा पुस्तक (1318 ई.) लिखी थी जिसमें रिणी मुद्राका उल्लेख है। ('अर्चना': पृ.106)

15-16 वीं सदी रिणी के लिए महत्वपूर्ण है। गुरु नानकदेव के रिणी भू-भाग मे आने की दंत-कथा है। नानकदेव का जन्म 1469 ई. मे हुआ था। आज साहवा मे नानकटीला स्थान पर भव्य गुरुद्वारा बना है। [23]('अर्चना': पृ.106)

ढाका का युद्ध (1488) और जाट गणराज्यों का पतन

ठाकुर देशराज लिखते हैं कि जोहिया यौधेय-वंशीय हैं। प्रजातंत्री समुदायों में यौधेय बहुत प्रसिद्ध रहे हैं | जैसलमेर, जांगल और मारवाड़ के बहुत से प्रदेश पर किसी समय इनका राज रहा है। राठौरों से पराजित होने से पहले उनका 600 गांवों पर अधिपत्य था। शेरसिंह इनका राजा था। जैसा नाम था, वैसा ही वह शूरवीर भी था। राठौरों को नाकों चने शेरसिंह ने ही चबाए थे। भूरूपाल में उसकी राजधानी थी।

गोदारों से सन्धि हो जाने के बाद बीका जी ने कुछ समय अपनी व्यवस्था ठीक करने और शक्ति संचय करने में लगाया। जब अवकाश मिला तो गोदारों की ओर अपनी सेनाएं लेकर जोहिया जाटों पर आक्रमण किया। शेरसिंह ने अपनी सेनाएं इकट्ठी करके दोनों शक्तियों का मुकाबला किया। शेरसिंह बड़ा बांका योद्धा था। भय उसके पास तनिक भी न फटकता था। वास्तव में यह निरन्तर लड़ने वाले शूरों मे से था। ‘देशी राज्यों के इतिहास’ में सुखसम्पत्ति राय भंडारी ने लिखा है-

“शेरसिंह ने अपनी समस्त सेना के साथ बीका जी के खिलाफ युद्ध करने की तैयारी कर रखी थी। बीका जी जो कई युद्धों के विजेता थे इस युद्ध में सरलता से विजय प्राप्त न कर सके। शत्रुगण अद्भुत् पराक्रम दिखाकर आपके छक्के छुड़ाने लगे। अन्त में विजय की कोई सूरत न देख, आपने षड़्यन्त्र द्वारा शेरसिंह को मरवा डाला।”[24][25]


शेरसिंह के मारे जाने के बाद भी जोहिया जाट विद्राही बने रहे। उन्होंने सहज ही में अधीनता स्वीकार नहीं की। उनका प्रत्येक युवक प्राणों की बाजी लगाकर स्वाधीनता की रक्षा करना चाहता था। जब भी उनका कोई दल संगठित हो जाता, विद्रोह खड़ा कर देते। शेरसिंह के बाद उन्हें कोई उतना योग्य नेता नहीं मिला। जोहिया जाट राठौरों को जांगल-प्रदेश से अवश्य ही खदेड़ देते यदि गोदारे उनके साथ न होते। गोदारों की भी शक्ति जोहियों से कम नहीं थी। दो प्रबल शत्रुओं के मुकाबले में आखिर उन्हें विवश होना पड़ा। धीरे-धीरे उनका विद्रोही स्वभाव भी जाता रहा। जाटों से अब राठौर निष्कंटक हो गए। जाट और राठौरों की सबसे बड़ी लड़ाई सीधमुख के पास ढाका गांव में हुई थी।[26][27]

ढाका एवं सिद्धमुख को लूट कर नष्ट-भ्रस्त करके 30 पीढ़ी तक गुलामी भोगते रहे। ढाका गाँव जाट समाज का तीर्थस्थल है, जहाँ युद्ध में लड़ते हुए काम आये वीरों के स्मारक अभी भी मौजूद हैं। [28]

इधर गोदारों की और से पांडू का बेटा नकोदर राव बीका व कान्धल राठोड़ के पास पुकार लेकर गया जो उस समय सीधमुख को लूटने गए हुए थे. नकोदर ने उनके पास पहुँच कर कहा कि तंवर नरसिह जाट आपके गोदारा जाटों को मारकर निकला जा रहा है. उसने लाघड़िया राजधानी के बरबाद होने की बात कही और रक्षा की प्रार्थना की. इसपर बीका व कान्धल ने सेना सहित आधी रात तक नरसिंह का पीछा किया. नरसिंह उस समय सीधमुख से 6 मील दूर ढाका नमक गाँव में एक तालाब के किनारे अपने आदमियों सहित डेरा डाले सो रहा था. रास्ते में कुछ जाट जो पूला सारण से असंतुष्ट थे, ने कान्धल व बीका से कहा की पूला को हटाकर हमारी इच्छानुसार दूसरा मुखिया बना दे तो हम नरसिंह जाट का स्थान बता देंगे. राव बीका द्वारा उनकी शर्त स्वीकार करने पर उक्त जाट उन्हें सिधमुख से 6 मील दूरी पर उस तालाब के पास ले गए, जहाँ नरसिंह जाट अपने सैनिकों सहित सोया हुआ था.[29] [30]

राव कान्धल ने रात में ही नरसिंह जाट को युद्ध की चुनोती दी. नरसिंह चौंक कर नींद से उठा. उसने तुरंत कान्धल पर वार किया जो खाली गया. कान्धल ने नरसिंह को रोका और और बीका ने उसे मार गिराया. [31] घमासान युद्ध में नरसिंह जाट सहित अन्य जाट सरदारों कि बुरी तरह पराजय हुई. दोनों और के अनेक सैनिक मरे गए. कान्धल ने नरसिह जाट के सहायक किशोर जाट को भी मार गिराया. इस तरह अपने सरदारों के मारे जाने से नरसिह जाट के साथी अन्य जाट सरदार भाग निकले. भागती सेना को राठोड़ों ने खूब लूटा. इस लड़ाई में पराजय होने के बाद इस एरिया के सभी जाट गणराज्यों के मुखियाओं ने बिना आगे युद्ध किए राठोड़ों की अधीनता स्वीकार कर ली और इस तरह अपनी स्वतंत्रता समाप्त करली. फ़िर वहाँ से राव बीका ने सिधमुख में डेरा किया. वहां दासू बेनीवाल राठोड़ बीका के पास आया. सुहरानी खेड़े के सोहर जाट से उसकी शत्रुता थी. दासू ने बीका का आधिपत्य स्वीकार किया और अपने शत्रु को राठोड़ों से मरवा दिया. [32] इस तरह जाटों की आपसी फूट व वैर भाव उनके पतन का कारण बना.[33]

बीकानेर रियासत के अधीन

बीकानेर रियासतपति कर्णसिंह (1631-1669 ई.) थे। कर्ण सिंह के समय रिणी का चंगोई हलचल का केंद्र बन गया था। चंगोई का ठिकानेदार बनमालीदास कर्ण सिंह का दासी पुत्र था। कर्ण सिंह की निजी कमजोरी का लाभ लेकर वह बीकानेर की रियासत हतियाना चाहता था। तत्कालीन राठोड सरदारों ने बनमालीदास को छल-कपट से मरवा दिया तथा अनूप सिंह को रियासत पति बना दिया। बनमालीदास की छतरी व शीललेख आज भी जर्जर अवस्था मे चंगोई मे है । ('अर्चना': पृ.107)

अनूप सिंह के चार पुत्रों मे एक आनंद सिंह थे। आनंद सिंह का राज मुख्यालय रिणी मे था। इनके चार पुत्र अमर सिंह, तारा सिंह, गुददड़ सिंह तथा गजराज थे। उधर बीकानेर रियासत के अधिपति अनूप सिंह, सरूप सिंह, सुजान सिंह और उनके बाद जौरावार सिंह (1735-1746 ई) अधिपति थे। जौरावार सिंह नि:संतान होने से रिणी के आनंद सिंह के पुत्र गज सिंह को गोद लेकर 1746 से 1787 तक बीकानेर रियासत पति बनाया। तारा सिंह को राजवंश की कुटिलता का शिकार होना पड़ा था। तारा सिंह की छतरी गढ़ के सामने है तथा उनकी तत्कालीन सतियों का हस्त-थापा गढ़ के मुख्य द्वार के बाईं और शिलालेख सहित स्थापित है तथा इनके पिता आनंद सिंह की छतरी भी गुसाइयों के मोहल्ले मे बनी हुई है। ('अर्चना': पृ.107)

रिणी का सान 1782 के बाद महत्व तब बढ़ गया जब पूर्व रियासत पति गज सिंह के वंश मे लाल सिंह के पुत्र डूंगर सिंह को गोद लेकर रियासत पति नियुक्त किया था। डूंगर सिंह नि:संतान होने से उनके छोटे भाई गंगा सिंह को 31-8-1887 मे गद्दी पर बैठाया। रिणी से सदैव उनकी अपनायत बनी रही थी। ('अर्चना': पृ.107-08)

सान 1884 मे रिणी को निजामत केंद्र बनने का अवसर मिला। सान 1941 तक इस रिणी निजामत के अधीन नोहर, भादरा तथा पल्लू भी थे। सन् 1888 मे राज्य की ओर से सरकारी स्कूल खुला था जिसके अध्यापक पंडित राम दयाल शर्मा थे। [34] रियासत मे गंगा सिंह लोकप्रिय थे परंतु रियासत के बुद्धिजीवी, किसान तथा शोषित और पीड़ित लोग सामंतसाही के विरुद्ध आंदोलनरत हो गए थे। 16 मार्च 1941 को इसका नाम बदलकर तारानगर कर दिया गया । ('अर्चना': पृ.108)

स्वतन्त्रता आंदोलन में भी यहाँ की भूमिका रही। तारानगर के सीताराम अग्रवाल ने विद्यार्थी जीवन में और काशी मे स्वतन्त्रता आंदोलन मे भाग लिया। चौधरी कुंभाराम आर्य, चौधरी मनीराम आर्य, तुलसी राम सरावगी, चौधरी गोवर्धन राम कानसूजिया (राजपुरा), बेगा राम बुड़ानीया (मोरथल), माला राम कस्वा, स्वामी गोपालदास, दौलत राम सारण, वैद्य उमाशंकर शर्मा, गोपीराम शर्मा आदि ने स्वतन्त्रता आंदोलन में भाग लिया। ('अर्चना': पृ.108)

Monuments

Charan Singh Statue Taranagar
Taranagar Jain Temple of year 942AD

Taranagar is very old village and famous for its temples, ancient Havelies, paintings inside them and chatries. The wood work inside the hawelies is excellent. The most famous temple in the village is Jain Mandir built in 942 AD. It has very old statues of jain's thirthkars and a history related to that.

Shiv Pandia Temple at Taranagar of Mahabharataperiod

One another famous temple is Shiv Pandia. Its history is old as Dwapar Yug. It is said that Kunti putra Bhima came there to call the pujari of temple, shiv pandia, for the Tilak ceremony of Yudhisthira after winning the battle of Mahabharata.

Sahawa is major village in Taranagar, Sahawa has got historical importance because of the Gurudwara, where the belief is this that 10th Sikh Guru - Guru Gobind Singh came. Sahawa is also very popular because of its POP (Plaster Of Paris) Industry.

चूरु मण्डल मे जैन धर्म

चूरु मण्डल मे जैन धर्म की विद्यमानतका प्रथम संकेत (रिणी) तारानगर के जैन मंदिर से मिलता है जो विक्रम की 10 वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों मे बना माना जाता है। प्राचीन फोगपत्तन (फोगां, तहसील सरदारशहर) भाड़ंग (तहसील तारानगर) जो अब थेड़ मात्र रह गया है। ये संभवत: जैन धर्म के प्राचीन मुख्य स्थान हैं । जैन धर्म के पहले मुख्य दो गच्छ क्रमश:खरतरगच्छ (संवत 1204) और लौकागच्छ (संवत 1533) थे। इसमे खरतरगच्छ के आचार्य युग प्रधान जिनचन्द्र सूरी ने संवत 1625 (सान 1568 ई. मे ग्राम बापडाउ (बापेउ, डूंगरगढ़) तथा संवत 1637 (सान 1580 ई) मे ग्राम सेरूणा (डूंगरगढ़) मे चातुर्मास किए। [35]

जिनरत्न सूरी के पट्टधर जिंचन्द्र सूरी और उनके पट्टधर जिनसुख सूरी हुये जो फ़ोगापतन (फोगा) के थे जिन्हें संवत 1762 आषाढ़ शुक्ल 11 को गच्छ नायक पद प्राप्त हुआ। संवत 1780 ज्येष्ठ कृष्ण 3 सान 1723 ई को रिणी (तारानगर) मे जिनमुख सूरि ने जिनभक्ति सूरी को गच्छ नायक पद प्रदान किया और स्वर्गस्थ हुये । [36]

Notable persons

  • Rati Ram Chaudhary - Who was an instrument in establishing 'Shri Sarvajanic' Library at Taranagar in 1926.[37]
  • Neelam Beniwal - From Taranagar, GS, Tagore Mahavidyalay Taranagar
  • Ramesh Danewa - Taranagar, Vice President, Chaudhary Mahavidyalay Taranagar
  • Anil Kumar Kaswan - S/O Duli Chand got 92 % in 10th.[38]
  • Anil Kadwasra - D/O Om Prakash Kadwasra, got 92% in 10 CBSE. [39]
  • Shakuntla Pachar - D/O Likhma Ram Pachar, First RAS from Taranagar,
  • Dr. Hanuman Singh Kaswan from Gaudas
  • Dr Amar Singh Doot From Bhadang
  • Dr. Rajendra Singh Godara from Haripura
  • Dr. Chandan Singh Mothasara From Dhana Bhakaran is posted at DADREWA PHC as MO/IC]
  • Dr. Ramniwas Saharan from Gaudas
  • Late Dr. Ajeet Singh Gadwal From Bhuras
  • Dr. Bhagawati Mothasara From Dhana Bhakaran] COMPLETED MBBS IN MARCH 2014 FROM SMS MEDICAL COLLEGE JAIPUR & ALSO GOT 1ST RANK IN RPMT 2008]
  • Dr. Rameshwar Bhakar from Bhanin
  • Saroj Saharan from Gadana Doing MBBS From SP Medical College Bikaner
  • Ram Kumar Beniwal - Sarpanch for last 20 yrs from Kalwas
  • SUMAN MOTHASARA D/O NANDRAM MOTHASARA FROM (BHANA BHAKARAN) IS DOING MBBS FROM SP MEDICAL COLLEGE BIKANER
  • MONIKA SIHAG D/O BAJARANG SIHAG FROM (RAIYATUNADA) GOT 93% IN SECONDARY EXAM 2013
  • PRAMOD KUMAR S/O RAMJAS MOTHASARA FROM DHANA BHAKARAN GOT 90% IN SECONDARY EXAM 2013
  • MUKUL S/O HANUMAN PRASAD MOTHASARA FROM DHANA BHAKARAN GOT 87% IN SECONDARY EXAM 2013
  • MUKESH KUMAR S/O RAMJAS MOTHASARA FROM DHANA BHAKARAN HAS DONE B TECK FROM NIT SURATHKAL IN MAY 2014
  • ROUNAK MOTHASARA D/O HARI RAM MOTHASARA FROM DHANA BHAKARAN GOT SELECTED IN NAVODAY VIDYALAY SARDARSHAHAR IN 2013
  • POOJA MOTHASARA D/O HEMRAJ MOTHASARA FROM DHANA BHAKARAN GOT 90% IN SECONDARY EXAM FROM NAVODAY VIDYALAY SARDARSHAHAR IN 2013
  • NISHA MOTHASARA D/O LAXMAN MOTHASARA FROM DHANA BHAKARAN GOT SELECTED IN NAVODAY VIDYALAY SARDARSHAHAR IN 2013
  • Mala Ram Kaswan - Freedom fighter and social worker from Godas.
  • Lalu Ram Kaswan - Freedom fighter and social worker from Godas.
  • Samwta Ram Kaswan - Freedom fighter and social worker from Dhani Asha.

External links

Gallery

Reni in Ukraine

Reni is also a city in southern Ukraine, near the confluence of Prut and Danube rivers.

References

  1. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter VI (Page 546)
  2. Churu Janpad Ka Jat Itihas
  3. Thakur Deshraj: Jat Itihas (Hindi), Maharaja Suraj Mal Smarak Shiksha Sansthan, Delhi, 1934, 2nd edition 1992 page 594-95.
  4. Dasharatha Sharma, Early Chauhān dynasties: a study of Chauhān political history, Chauhān political institutions, and life in the Chauhān dominions from C. 800 to 1316 A.D., by Dasharatha Sharma, Books treasure, Jodhpur. ISBN 0-8426-0618-1.
  5. Churu Janpad Ka Jat Itihas
  6. हरीसिंह भाटी, भटनेर का इतिहास, पृ. 16 संस्करण 2000
  7. मेगस्थनेस का पलिभोथ्र:पारिभद्र - रामदत्त सांकृत्य, द्वितीय संस्कारण 2002 ई., पृ. 50 फुट नोट 4, महाभारत शल्यपर्व
  8. गोविंद अग्रवाल: चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास, पृ.26 पर वर्णित नागरी प्रचारिणी पत्रिका वर्ष 57 अंक-2-3 पृ 219
  9. गोविंद अग्रवाल: चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास, पृ. 414
  10. Jat History Thakur Deshraj/Chapter IX,p.620
  11. अनूप सिंह चाहर, जाट समाज आगरा, नवम्बर 2013, पृ. 28-27
  12. गोविंद अग्रवाल: चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास, पृ. 51
  13. गोरी शंकर हीराचंद ओझा: बीकानेर राज्य का इरिहास भाग प्रथम, पृ. 64
  14. गोविंद अग्रवाल: चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास, पृ.491-92, लद्धदागर रास- बड़गच्छ के मुनीश्वर सूरी के शिष्य रत्नप्रभ सूरी द्वारा रचित
  15. गोविंद अग्रवाल: चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास, पृ. 14
  16. गोविंद अग्रवाल: चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास, पृ. 53, कर्नल टोड़ के आधार पर लिखित।
  17. गोविंद अग्रवाल: चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास, पृ.391
  18. नैणसी की ख्यात:मुंहनोत नैणसी पृ. 196
  19. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.71
  20. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.77
  21. गोविंद अग्रवाल: चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास, पृ.477
  22. गोविंद अग्रवाल: चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास, पृ.469
  23. नोहर इतिहास गाइड 1979
  24. वाक-ए राजपूताना में भी यही बात लिखी है।
  25. जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ-621
  26. रामरत्न चरण का इतिहास।
  27. जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ-621
  28. Dharati Putra: Jat Baudhik evam Pratibha Samman Samaroh Sahwa, Smarika 30 December 2012, by Jat Kirti Sansthan Churu, p.39
  29. नैणसी की ख्यात, भाग 2, पेज 203
  30. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 209
  31. नैणसी की ख्यात, भाग 2, पेज 203
  32. नैणसी की ख्यात, भाग 2, पेज 203
  33. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 210
  34. गोविंद अग्रवाल: चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास, पृ.452
  35. 'श्री सार्वजनिक पुस्तकालय तारानगर' की स्मारिका 2013-14: 'अर्चना' में प्रकाशित अशोक बच्छावत (अणु) का लेख 'जैन परम्परा' पृ.76
  36. 'श्री सार्वजनिक पुस्तकालय तारानगर' की स्मारिका 2013-14: 'अर्चना' में प्रकाशित अशोक बच्छावत (अणु) का लेख 'जैन परम्परा' पृ.76
  37. 'श्री सार्वजनिक पुस्तकालय तारानगर' की स्मारिका 2013-14: 'अर्चना', पृ. 11
  38. Dharati Putra: Jat Baudhik evam Pratibha Samman Samaroh Sahwa, Smarika 30 December 2012, by Jat Kirti Sansthan Churu, p.61
  39. Dharati Putra: Jat Baudhik evam Pratibha Samman Samaroh Sahwa, Smarika 30 December 2012, by Jat Kirti Sansthan Churu, p.62

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