Spain

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The Roman republic and its neighbours in 58 BC
Map of Spain

Spain (स्पेन) is a sovereign state and a member of the European Union .

Location

It is located on the Iberian Peninsula in southwestern Europe.

Origin of name

The origins of the Roman name Hispania, from which the modern name España was derived, is uncertain and is possibly unknown due to the inadequate evidence. Hispania may derive from the poetic use of the term Hesperia, reflecting the Greek perception of Italy as a "western land" or "land of the setting sun" (Hesperia, Ἑσπερία in Greek) and Spain, being still further west, as Hesperia ultima.[1]

History

Modern humans first arrived in the Iberian peninsula around 35,000 years ago. It came under Roman rule around 200 BC, after which the region was named Hispania. In the Middle Ages it was conquered by Germanic tribes and later by the Moors to the south. Spain emerged as a unified country in the 15th century, following the marriage of the Catholic Monarchs and the completion of the centuries-long reconquest, or Reconquista, of the peninsula from the Moors in 1492.

Jat History

Mangal Sen Jindal[2] quotes the Jat Itihas Page 44 ? [which further refers to a research work viz., 'Portholan' by Ch. Dhanraj Singh B.A., P.C.S.,] Banda page 108 ? to his work where the scholar has referred to the city named Jativa established by Jats in European Countries.


According to Ram Swarup Joon:[3] In 500 BC, Jats took part in the civil war in Italy. When the hunters invaded Italy, the Jats defeated them on the battlefield of Nester. As a reward the ruler of Italy permitted them to occupy the Danube basin called Balkans now. After four years, differences arose between the Jats and king Theodius of Italy, who attacked the Jats. The Jats were victorious and occupied Asia Minor. Then they attacked Rome and after defeating the famous military commander Allers, occupied the south Eastern portion of Italy. Theodius gave his daughter in marriage to the Jat leader. The Jats vacated Italy, advanced into and settled in Spain and Portugal.

In 490 BC, there was another battle after which Jats occupied the whole of Italy and ruled there for 65 years upto 425 BC. During this period Italy made a great measure of progress.

After the death of the great Jat leader Totila, the Jat power declined and they were driven out of Italy. Soon after, the Arabs drove the Jats out of Spain and Portugal. Consequently Jats were so weakened and scattered that they ceased to exist as a recognised group in this area,


Bhim Singh Dahiya writes: When the Romans threatened Alarik, the Goth, in 410 A.D. with the vast multitudes of Roman population, and its wrath against him, he gave a typical Jat reply, “Thicker the hay, easier moved”.[4]

Mangal Sen Jindal writes: [5]

"Before long, one of the German chieftains, Alaric, became dissatisfied with the treatment that he received. He collected an army, of which the nucleus consisted of West Goths, and set out for Italy. Rome fell into his hands in 410 and was plundered by his followers. Alaric appears to have been deeply impressed by the sight of the civilization about him. He did not destroy the city, hardly even did serious damage to it, and he gave especial orders to his soldiers not to injure the churches or their property.


History of Origin of Some Clans in India:End of p.46


Alaric died before he could find a satisfactory spot for his people to settle upon - permanently. After his death the West Goths wandered into Gaul, and then into Spain, which had already been occupied by other barbarian tribes, the Vandals and Suevi. These had crossed the Rhine into Gaul for years before Alaric took Rome; for three years they devastated the country and then proceeded across the Pyrenees. When the West Goths reached Spain they quickly concluded peace with the Roman government. They then set to work to fight the Vandals, with such success that the emperor granted them a considerable district (419) in Southern Gaul, where they established a West Gothic Kingdom. Ten years after, the Vandals moved on into Africa, where they founded a kingdom and extended their con trot over the Western Mediterranean. Their place in Spain was taken by the West Goths who, under their king, Ruric (466-484), conquered a great part of the peninsula, so that their kingdom extended from the Loire to the Straits of Gibraltar"- History of Western Europe pages 26-27.

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज: स्पेन, गाल

यह पीछे लिखा जा चुका है कि थियोडोसियस की पुत्री के साथ अटाल्फस जाट नेता के शादी कर लेने पर उन्होंने स्पेन और गाल के प्रदेशों पर जाकर कब्जा कर लिया था। हूणों ने भी इस प्रान्त पर चढ़ाई की थी, किन्तु वे असफल लौटे थे। सन् 711 ई. में तरीक की अध्यक्षता में मुसलमानो ने स्पेन के गाथ लोगों पर चढ़ाई की, उस समय उनका नेता रोडरिक (रूद्र) था, वह युद्ध में हार गया और बर्बर अरबों का स्पेन और गाल पर अधिकार हो गया।1

जटलेंड : इस देश में स्कंधनाभ के जाट गए थे और इनके सरदार जिनके साथ यहां से अन्य देशों में पहुंचे थे, हेंगिस्ट और होरसा नाम के दो महान वीर थे। ये जटलेंड में असिवंश से मशहूर हुए थे।

स्काटलेंड : यहां होरसा और हेंगिस्ट के साथ अनेक जाट समूहों ने सागर पार करके प्रवेश किया था। कहा ऐसे जाता है कि यूरोप के सभी देशों में ट्रांसकोसियाना से जाट फैले हैं।

समोस द्वीप : यह द्वीप एजियन सागर में है। एशियाई रोम के ठीक पच्छिमी किनारे पर बसा हुआ है। यहां जो जाट समूह गया था, वह क्षौथी (Xuthi) कहलाता था। क्रुक साहब ने ‘ट्राइब्स एन्ड कास्टस आफ दी नार्थ वेस्टर्न


1. रोम, स्पेन और गाल के जाटों का प्रायः सारा वर्णन रामकिशोर मालवीय के यूरोप के इतिहास के आधार पर किया है।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-193


प्राविन्शेज एन्ड अवध’ नामक पुस्तक में लिखा है -

"Their course from the Oxus to Indus may, perhaps, be dimly traced in the Xuthi of, Dianosius of Samos and the Xuthi of Ptolemy who occupied the Karmanian desert on the frontier of Drangiana."

इसी बात को जनरल कनिंघम साहब ने अपनी तवारीख में इस भांति लिखा है -

"Xuthi of Dianosius of Samos were Jatii or Jats, who are coupled with the Ariene and in the Xuthi of Ptolemy, who occupied the Karmanian desert on the frontier of Drangiana. (Cunningham Vol.II P.55)

अर्थात् - सामोस के डाईनीसीअस के क्षूति जटी या जाट थे जो ऐर्रानी से टोलेमी के जूथी में मिल गए, जिन्होंने ड्रेनजिआना के सीमांत के करमानिया के ऊपर अधिकार कर लिया।

रोमस्पेन के जाट शासक

दलीप सिंह अहलावत[6] ने लिखा है: अलारिक रोम की गद्दी पर बैठने वाला पहला जाट राजा था परन्तु वह पूरे रोमन साम्राज्य का सम्राट् नहीं बन सका। उसकी प्रमुख सफलता रोमन साम्राज्य को नष्ट करने की थी। इसके आक्रमणों के कारण से रोमन सेनाओं को ब्रिटेन व गॉल* को छोड़ देना पड़ा। अनेक साहसी योद्धाओं ने जिनमें गोथ (जाट) भी शामिल थे, गॉल पर अनेक आक्रमण किये जिससे ऐतिहासिक जानकारी मिलने में गड़बड़ी है।

जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज पृ० 80, पर बी० एस० दहिया ने लिखा है कि “जाट राजा इयूरिक सन् 466 से 484 ई० तक स्पेनपुर्तगाल का शासक रहा। उसके शासनकाल में शिवि गोत्री जाटों को इन्हीं के भाई जाटों ने स्पेन से निकलकर रूम सागर पार करके अफ्रीका में चले जाने को विवश किया। शिवि जाट अफ्रीका में पहुंच गये।” (जाटों का मिश्र सेनाओं से युद्ध प्रकरण इसी अध्याय में देखो)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-392


पुर्तगाल, स्पेन में राजा इयूरिक का पुत्र अलारिक द्वितीय जाटों का आठवां राजा था जो कि 24 दिसम्बर 484 ई० में अपने पिता का उत्तराधिकारी बना। उसकी मुख्य स्मरणीय सफलता यह थी कि उसने रोमन कानूनों की एक सूची तैयार करवाई तथा रोमन लोगों के लिये सरकारी कानून बनाये जिनसे अपने अधीन रोमनों के लिये कानूनी अधिकार मिल गये। यह “अलारिक के स्तोत्र संग्रह” के नाम से प्रसिद्ध है।

अन्य जाट राजाओं ने दूसरे साधारण राजाओं की तरह अपना समय व्यतीत किया। जाटों ने रोमन गद्दी पर अधिकार कर लिया था। सन् 493 ई० में थयोडोरिक गोथ (जाट) रोम का राजा बना। रोम के जाट राजा तोतिला (Totila) ने यूनानियों से नेपल्स वापिस छीन लिया। नेपल्स पर अधिकार करते समय जाटों ने वहां की स्त्रियों का अपमान नहीं होने दिया तथा कैदी सैनिकों के साथ मानवता से व्यवहार किया1

विजेता जाट अत्तीला (Attila)

अत्तीला सीथियन जाट नेता बालामीर का वंशज था जिसने कैस्पियन सागर के उत्तर से बढ़कर डैन्यूब नदी तथा उससे भी पार तक कई देशों पर विजय प्राप्त की थी। अत्तीला जाटों की उसी शाखा से सम्बन्धित था जिससे इण्डोसीथियन थे। इसके पिता का नाम मुञ्जक था। यूरोप में विजयी अत्तीला का चरित्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा है।

उसका राज्य डैन्यूब नदी के पूर्व में मैदानी क्षेत्र पर था। उसने यूरोप तथा एशिया दोनों में अपने राज्य का बहुत विस्तार किया। उसने चीनी सम्राट् के साथ समान शर्तों पर समझौता किया। उसने रेवेन्ना तथा कांस्टेंटीपल को 10 वर्ष तक भयभीत रखा।

पूर्वी रोमन सम्राट् थियोडोसियस द्वितीय की पोती हांनारिया को, दरबार के एक कर्मचारी पर मोहित होने के कारण बन्दी बनाया गया था। उस लड़की ने निराश होकर अपनी अंगूठी अत्तीला को भेजी तथा अपने को मुक्त कराने और पति बनने की प्रार्थना की। अत्तीला तुरन्त दक्षिण की ओर बढ़ा और कांस्टेंटीपल के निकट पहुंच गया। इतिहासज्ञ गिब्बन के अनुसार उसने अपनी सफलता में 70 नगर नष्ट कर दिए। रोमन सम्राट् ने उससे बहुमूल्य शान्ति-सन्धि करनी पड़ी। अत्तीला हांनारिया को अपनी दुल्हन समझता रहा। उसने अगले आक्रमण के लिये बहाने के रूप में उस सम्बन्ध को कायम रखा। सम्राट् को एक और सन्धि करने के लिये विवश कर दिया गया। अतः सम्राट् थियोडोसियस ने अपनी पौती हांनारिया का डोला अत्तीला को दे दिया।

सम्राट् ने अत्तीला के कैम्प में अपना एक राजदूत भेजा जिसके साथ एक साहित्यकार प्रिस्कस भी गया। उसने अत्तीला के कैम्प में जो कुछ देखा उसका एक विस्तृत विवरण लिखा। वह लिखता है कि “अत्तीला शराब के स्थान पर मधुपानीय, अनाज के प्रति बाजरा तथा शुद्ध पानी या जौ के पानी का सेवन करता था। (यह अत्यन्त रोचक है कि हरयाणाराजस्थान के जाटों का प्रिय भोजन बाजरा है)। उसकी राजधानी एक बहुत विस्तृत कैम्प के रूप में थी। उसमें रोमन नमूने का एक स्नानघर तथा पत्थर की बनी हुई एक कोठी थी। अधिकतर लोग


1. आधार लेख अनटिक्विटी ऑफ जाट रेस, पृ० 54 से 62, लेखक उजागरसिंह माहिल।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-393


झोंपड़ियों तथा तम्बुओं में रहते थे। अत्तीला तथा उसके प्रमुख नेता अपनी पत्नियों एवं मन्त्रियों के साथ लकड़ी के महलों में रहते थे। लूटी हुई वस्तुओं का बहुत बड़ा दिखावा था। किन्तु अत्तीला एक जाट की तरह ही बहुत साधारण जीवन व्यतीत करता था। वह लकड़ी के प्यालों तथा थालों में भोजन करता था। वह बड़ा परिश्रमी था। अपने महल के द्वार पर दरबार लगाता था तथा साधारण गद्दी पर बैठता था।”

451 ई० में अत्तीला ने पश्चिमी साम्राज्य पर धावा बोल दिया। उसने गॉल (फ्रांस) पर आक्रमण करके वहां के बहुत से नगरों तथा सुदूर दक्षिण में आर्लिअंज (Orleans) तक लूटमार की। फ्रैंक्स उसे हराने के लिये बहुत कमजोर थे किन्तु वीसी गोथ (पश्चिमी गोथ) कहलाने वाले जाटों की एक और शाखा फ्रैंक्स लोगों से मिल गई। 451 ई० में चालोञ्ज़ के स्थान पर एक भयंकर युद्ध हुआ जिसमें दोनों ओर से 1,50,000 आदमी मारे गये। यूरोप में अत्तीला को यह पहली पराजय मिली क्योंकि उसके विरुद्ध प्राचीन जाट विजेताओं की एक शाखा शत्रु की ओर मिलकर लड़ रही थी। इस हार से वह निराश नहीं हुआ। उसने अपना ध्यान दक्षिण की ओर दिया और उत्तरी इटली पर आक्रमण कर दिया। अक्वीला एवं पाडुआ को जला दिया तथा मिलान को उसने लूट लिया। यहां पोपलियो ने उसे अग्रिम आक्रमणों से रोका। चमत्कारिक अत्तीला ने ईसाइयों के मुख्य पादरी की प्रार्थना पर शान्ति स्थापित कर ली। उस साहसी वीर योद्धा की सन् 453 ई० में मृत्यु हो गई। उसका साम्राज्य कैस्पियन सागर से राइन नदी (पश्चिमी जर्मनी में) तक फैला हुआ था1

जाट इतिहास पृ० 186 पर ठा० देशराज ने लिखा है कि “रोमन सम्राट् थियोडोसियस जाटों से बहुत भयभीत था, अतः उसने लड़की हांनारिया की शादी अत्तीला से कर दी। इस तरह से जाट और रोमन लोगों का रक्त सम्बन्ध स्थापित हो गया। इस लड़की की सलाह के अनुसार जाटों ने इटली से बाहर स्पेन और गॉल के बीच में अपना साम्राज्य स्थापित किया जो 300 वर्ष तक कायम रहा। सन् 446 ई० में हूण लोग रोम का ध्वंस करते हुए गॉल में प्रवेश कर गए। वहां पर रोमनों व गाथों (जाटों) ने मिलकर हूणों को हरा दिया।”

अत्तीला के मरने के बाद उसके साम्राज्य को उसके तीन पुत्रों अल्लाक, हरनाम तथा देंघिसक में बराबर-बराबर बांट दिया। इस बंटवारे के समय अन्य दो निकट सम्बन्धी उजीन्दर व एमनेद्ज़र ने अपने अधिकार की मांग की। इसलिये अन्त में उस साम्राज्य को पांच भागों में बांटा गया। पिता की सम्पत्ति या साम्राज्य को उसके पुत्रों में विभाजन का यह तरीका प्राचीन आर्य रीति के अनुसार है जो कि जाट समाज में आज भी प्रचलित है।

इसी प्रकार बलवंशियों का राजा कुबरत जिसने 630 ई० में रोमन सम्राट् हरकलीन्ज से सन्धि की थी, के मरने पर उसका राज्य उसके पांच पुत्रों में बराबर-बराबर बांट दिया गया था2

अत्तीला के मरने के बाद कुल्लर और उदर गोत्र के जाटों ने मिलकर रोमन साम्राज्य पर आक्रमण किया तथा (485 ई० से 557 ई०) 72 वर्ष तक लड़े। इनका शासन चलता रहा। बाद में


1. आधार लेख अनटिक्विटी ऑफ जाट रेस, पृ० 54 से 62, लेखक उजागरसिंह माहिल।
2. जाट्स दी ऐन्शेन्ट रूलर्ज पृ० क्रमशः 88, 84, 85, लेखक बी० एस० दहिया।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-394


बलवंशीय जाटों का शासन हुआ जिनके नाम पर बुल्गारिया नाम पड़ा। (J.J. Modi in JBRRAS, 1914, P. 548)1

ये तीनों कुल्लर, उदर, बल वंश के लोग मध्यएशिया से यूरोप को बड़े संघों के रूप में गये। इनके नेता बालामीर (376 ई०), उलदस (400 ई०), रौलस (425 ई०), रूगुल (433 ई०) और अत्तीला (जो कि 453 ई० में मर गया) थे2

सन् 489 ई० में पूर्वी गाथों के सरदार थियोडेरिक (देवदारुक) ने इटली पर आक्रमण किया। 4 वर्ष की निरन्तर लड़ाई के बाद इटली के तत्कालीन सम्राट् ओडोवर ने इटली का आधा राज्य देकर गोथों से सन्धि कर ली। थोड़े ही दिन बाद देवदारुक ने सम्राट् ओडोवर को मरवाकर सारी इटली पर गाथों का अधिकार जमा दिया। इस जाट सम्राट् ने इटली पर 493 ई० से 526 ई० तक 33 वर्ष शासन किया। उसने रोमानों को बड़े-बड़े पदों पर नियुक्त किया। नगर, बाग-बगीचे, सड़कें और नहरों की मरम्मत कराई। कृषि और उद्योग-धन्धों की उन्नति कराई। रोमन लोगों के साथ न्याय व अच्छा व्यवहार किया जिससे वे कहने लग गये कि खेद है “जाट इससे पूर्व ही हमारे यहां क्यों न आये।” उन्होंने जाट राज्य को राम राज्य की संज्ञा दी।

थियोडोरिक जाट सम्राट् की सन् 526 ई० में मृत्यु हो गई जिससे जाटों तथा रोमनों को बड़ा दुख हुआ। उसके बाद सन् 553 ई० तक उसके वंशजों का इटली पर शासन रहा। इसी वर्ष उनके हाथ से रोमन सम्राट् जस्टिनियन ने इटली का राज्य छीन लिया।

यूरोप में एक नया धर्म खड़ा हुआ था जिसका नाम महात्मा यीशु के नाम पर ईसाई धर्म था। इसके सिद्धान्त भी बौद्ध-धर्म से मिलते-जुलते थे तथा एक ईश्वर को ही मानने के थे। इसलिए यूरोप के जाटों पर भी ईसाई धर्म का प्रभाव पड़ने लगा। वे 12वीं सदी तक सबके सब ईसाई हो गये।

सन् 711 ई० में तरीक की अध्यक्षता में मुसलमानों ने स्पेन में जाट लोगों पर चढ़ाई की। उस समय जाटों का नेता रोडरिक (रुद्र) था। वह युद्ध में हार गया और बर्बर अरबों का स्पेन और गॉल (फ्रांस) पर अधिकार हो गया। (जाट इतिहास पृ० 188-189, में ठा० देशराज)

इसके बाद फिर स्पेन पर जाटों का राज्य रहा। इसका प्रमाण यह है। दसवीं शताब्दी में स्पेन के अन्तिम जाट सम्राट् का पौत्र अलवारो था। एक साहित्यिक लेख में उसको स्पष्ट रूप से बहुत ऊँचे स्तर की पुरानी गेटी (जाट) जाति का वंशज बताया गया है। (Journal of Royal Asiatic society, 1954, P. 138)। अलवारो कहता है कि मैं उस जाट जाति का हूं जिसके लिये (1) सिकन्दर महान् ने घोषणा की थी कि जाटों से बचो, (2) जिनसे पाइरस डरा (3) जूलियस सीज़र कांप गया (4) और हमारे अपने स्पेन के सम्राट् जेरोम ने जाटों के विषय में कहा था कि इनके आगे सींग हैं, सो बचकर दूर रहो। (Episola XX, Nigne, Vol 121, Col, 514) बी० एस० दहिया, पृ० 58-59)।

Notable persons

References