Bal

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Bal (बल)[1][2] [3] Bala (बल )Balyan (बलयाण) is a gotra of Jats found in Punjab and Haryana in India and Pakistan. Bala Jat clan is found in Afghanistan.[4] James Tod places it in the list of Thirty Six Royal Races.[5]

Origin

Ancestry of Bali as per Bhagavata Purana

Bal people are said to be descendants of Raja Bali (बलि). [6] According to Bhim Singh Dahiya, name of the country Bulgaria is after the Bal Jat clan. 'Bulgaria' means the land of the caravan (wagons) of the Balls. [7]

In Mahabharata

Mahabharata Shalya Parva in Sanskrit mentions Balas as under in shloka 72:

यॊगयुक्ता महात्मानः सततं बराह्मण परियाः
पैतामहा महात्मानॊ महापारिषथाश च ह
यौवनस्दाश च बालाश च वृद्धाश च जनमेजय

History

Vala king is mentioned in Rajatarangini[8].

H.A. Rose[9] writes that Bal (बल), a Jat tribe of the Bias and Upper Sutlej, said to be a clan of the Sekhu tribe with whom they do not intermarry. Their ancestor is also said to have been named Baya Bal, a Rajput who came from Malwa. The name Bal, which means " strength," is a famous one in ancient Indian history, and recurs in all sorts of forms and places. In Amritsar they say they came from Ballamgarh, and do not inter-marry with the Dhillon. Bal (बल), a Jat clan found in Amritsar.


Ram Swarup Joon[10] writes.... According to Bhagwatdatta, Baluchis of (of Balochistan) today are the descendants of Anu. Baluchya, Balhara, Bal, Balan are Jat gotras. Kak, Kakarzai, Klock, Kukar, Khokar, Karskar Jats belong to the Anu Branch. Thirty thousand Baluchis in Makran were recognised as Jats. Baluchis of the Lomri region are described as Jats in their chronicles. In the Rig-Veda, there are references to the Kabul River of Afghanistan, Gomal Valley, and rivers Ganga and Jamuna. There are also references to Kshatriya and the five branches of the Yayati Dynasty.


Ram Swarup Joon[11] writes that People belonging to the Bal gotra claim to be descendants of Suryavanshi Raja Bali. But according to Bhagvat Dutt they belong to the Anu dynasty. According to the Mahabharat (Chapter - Adi Parva) King Bali is called the grandson on the maternal side of Raja Daksha. According to "Deva Samhita," some Jats are the descendants of the daughter of Raja Daksha. Many historians regard Bali as the descendant of Yayati. Bhagwat Dutt has proved that the Baluchis (of Baluchistan) are the descendant of Anu. In Haryana several villages are found belonging to this gotra. The Sikh Jats belonging to this gotra are found in several big villages like Sathila, Batala in Amritsar. This gotra traces its origin from Ghazni (now in Afghanistan).

Vala clan in Gujarat

The Vala are a Rajput clan found in the state of Gujarat in India. They claim to be the earliest Rajput settlers in Saurashtra, and are descendents of Shiladitya, the Valabhi ruler of Gujarat. After the overthrow of Valabhi, the Valas settled in the south western Saurashtra, which is known as Valak, after the clan. The Vala were overthrown by the Gohil Rajputs, and are now found as landholders. A few live in villages near the town of Mahuva, in a village Nanivavdi near the town Ranpur, and in Kadvasan in Kodinar area and also in a village of Khadol near the town Dhandhuka. Some twelve villages where Valas are located are along Venu river near Jam Jodhpur and some more twelve villages near Valank in Talaja area in Bhavnagar district.

James Tod on Balas

James Tod is a pioneer historian on Jats who thoroughly scrutinized the bardic records of Rajasthan and Gujarat and also brought to light over a dozen inscriptions on the Jats. We reproduce the Chapter 7 Catalogue of the Thirty Six Royal Races from Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume I, Publisher: Humphrey Milford Oxford University Press 1920, p. 134-135:


Bala

All the genealogists, ancient and modern, insert the Bala tribe amongst the Rajkulas. The birad, or ' blessing,' of the bard is Tatta Multan ka rao, Princes of Tatta and Multan, indicative of their original abodes on the Indus. They lay claim, however, to descent from the Suryavansi, and maintain that their great ancestor, Bala or Bapa, was the offspring of Lava, the eldest son of Rama ; that their first settlement in Saurashtra was at the ancient Dhank, in more remote periods called Mungi Paithan ; and that, in conquering the country adjacent, they termed it Balakshetra (their capital Valabhipura), and assumed the title of Balarae. Here they claim identity with the Guhilot race of Mewar : nor is it impos-


[p. 135]: sible that they may be a branch of this family, which long held power in Saurashtra.1 Before the Guhilots adopted the worship of Mahadeo, which period is indicated in their annals, the chief object of their adoration was the sun, giving them that Scythic resemblance to which the Balas have every appearance of claim.

The Balas on the continent of Saurashtra, on the contrary, assert their origin to be Induvansa, and that they are the Balaka- putras who were the ancient lords of Aror on the Indus. It would be presumption to decide between these claims ; but I would venture to surmise that they might be the offspring of Salya, one of the princes of the Mahabharata, who founded Aror.

The Kathis claim descent from the Balas : an additional proof of northern origin, and strengthening their right to the epithet of the bards, ' Lords of Multan and Tatta.' The Balas were of sufficient consequence in the thirteenth century to make incursions on Mewar, and the first exploit of the celebrated Rana Hamir was his killing the Bala chieftain of Chotila, in Kathiawar (BG, viii. 407). The present chief of Dhank is a Bala, and the tribe yet preserves importance in the peninsula.

सूर्यवंशी बल-बालान-बालियान जाटवंश का इतिहास

दलीप सिंह अहलावत[12] लिखते हैं:

कुछ इतिहासकार इस वंश का आदिप्रवर्तक चन्द्रवंशी सम्राट् ययाति के पुत्र अनु की परम्परा में बलि को मानते हैं। महाभारत आदिपर्व, 66वें अध्याय में लिखा है कि ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष प्रजापति की 13 कन्याओं का विवाह सूर्यवंशी कश्यप महर्षि के साथ हुआ। उनमें से एक का नाम दिति था जिससे एक पुत्र हिरण्यकशिपु हुआ जिसका पुत्र प्रह्लाद था। प्रह्लाद का पुत्र विरोचन था जिसका पुत्र बलि हुआ1। बहुत से इतिहासकारों के लेख अनुसार यह माना गया है कि इस बल वंश के आदिप्रवर्तक सूर्यवंशी विरोचनपुत्रशिरोमणि प्रतापी राजा बलि ही थे। कर्नल टॉड ने इस वंश को भी 36 राजवंशों में गिना है। यह बलवंश जाटवंश है। इस बलवंश के सम्राटों की प्राचीन राजधानी के विषय में ठीक निर्णय नहीं हुआ है। अयोध्या, प्रयाग और मुलतान में से कोई एक इनकी राजधानी थी।

527 से 814 संवत् (सन् 470 से 757 ई०) तक इस बलवंश का शासन गुजरात में माही नदी और नर्मदा तक, मालवा का पश्चिमी भाग, भड़ौच कच्छ सौराष्ट्र, काठियावाड़ पर रहा। वहां पर राज्य की स्थापना करने वाला भटार्क नामक वीर महापुरुष था। यह संवत् 512 से 524 (सन् 455 से 467 ई०) तक सम्राट् स्कन्दगुप्त का मुख्या सेनापति था। किन्तु संवत् 526 (सन् 469 ई०) में


1. जाट वीरों का इतिहास प्रथम अध्याय, दक्ष की पुत्री दिति की वंशावली देखो।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-234


गुप्त राज्य के अस्त होने पर भटार्क ने अपने वंश के नाम पर कच्छ काठियावाड़ में बलभीपुर राज्य की स्थापना की। इस नगर का दूसरा नाम बला भी था। “कार्पस इन्स्कृशन्स इन्डिकेर” 3/169 के उल्लेखानुसार विक्रमी 559 के लिखे हुए मालिया से मिले एक शिलालेख द्वारा यह प्रमाणित हुआ है कि भटार्क के चार पुत्रों धरसेन, ध्रुवसेन, द्रोणसिंह और धरपट में से प्रत्येक ने बला नगर की स्थिति को क्रमशः राज्यसत्ता पाने पर अधिकाधिक सुदृढ़ किया। इन चारों ने महासामन्त - महाप्रतिहार - महादण्डनायक - महाकार्ताकृतिक महाराज की उपाधि धारण की थी। ह्युनसांग ने लिखा है कि -

भटार्क के चारों पुत्रों के शासनकाल के पश्चात् क्रमशः गुहसेन, धरसेन द्वितीय, शिलादित्य, खरग्रह, धरसेन तृतीय, ध्रुवसेन द्वितीय राजा हुए। कन्नौज के वैस1 सम्राट् हर्षवर्द्धन ने अपनी पुत्री का विवाह ध्रुवसेन द्वितीय से किया था। इस ध्रुवसेन द्वितीय के पुत्र धरसेन चतुर्थ ने भड़ोंच को बला राज्य में मिलाया। इस सम्राट् ने परमेश्वर चक्रवर्ती उपाधि भी धारण की। इसके ही आश्रित महाकवि भट्टी ने भट्टीमहाकाव्य की रचना की। इस बला राज्य को बल्लभी अथवा गुजरात राज्य कहा गया है जिसका शासक ध्रुवसेन द्वितीय था।”

इसके बाद ध्रुवसेन तृतीय, खरग्रह द्वितीय, शिलादित्य तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्ठ, सप्तम शिलादित्य क्रमशः राज्याधिकारी हुए। इन अन्तिम राजाओं के अनेक उल्लेख निम्न प्रकार से मिलते हैं - शिलालेखों, ताम्रपत्रों की प्रतिलिपियां एपिग्राफिका इण्डिका जिल्द 4 पृ० 76, इण्डियन एन्टिक्वेरी जिल्द 7-11-5-17, वीनर जीट्स काफ्ट जिल्द 1 पृ० 253, लिस्ट आफ इन्सक्रिपशन्स आफ नार्दन इण्डिया नं० 492-493, गुप्त इन्सक्रिपशन्स पृ० 173 आदि में उल्लिखित है। इनके आधार पर यह निश्चयात्मक रूप से कहा जा सकता है कि ये सम्राट् शैवधर्मानुयायी थे क्योंकि इनके ताम्रपत्रों और सिक्कों पर बैल की मुहर, नन्दी और शिवलिंग की मूर्तियां अंकित हैं। कुछ राजाओं की विशेष रुचि बौद्धधर्म की ओर भी हुई थी। इस वंश ने कला-कौशल और विद्या में विशेष उन्नति की थी। चीनी यात्री इत्सिंग ने लिखा है कि “इस समय भारत में नालन्दा और बल्लभी दो ही विद्या के घर समझे जाते हैं।” दूसरे चीनी यात्री ह्यूनसांग ने बलवंश की इस राजधानी को 6000 बौद्ध भिक्षुओं का आश्रय स्थान तथा धन और विद्या का घर लिखा है।

विक्रमी संवत् 814, हिजरी सं० 175 (सन् 757 ई०) में सिन्ध के अरब शासक हशाब-इब्न-अलतधलवी के सेनापति अवरुबिन जमाल मे गुजरात काठियावाड़ पर चढ़ाई करके बला (बल्लभी) के इस बलवंश के राज्य को समाप्त कर दिया।

मुहणोंत नैणसी भाट के लेखानुसार यहां से निकलकर इस वंश से ही गुहिलवंश प्रवर्तक गुहदत्त उत्पन्न हुए। टॉड ने भी इसी मत की पुष्टि करते हुए ‘शत्रुञ्जय महात्म्य’ नामक जैन ग्रन्थ के आधार पर विजोल्या नामक स्थान के एक चट्टान पर खुदे हुए एक लेख को उद्धृत किया है। प्रतोल्यां बलभ्यां च येन विश्रामितं यशः - अर्थात् मेवाड़ के गुहिल वंशियों ने बल्लभी पर भी यश स्थापित किया।

उदयपुराधीश राजा राजसिंह के ‘चरित्र राजविलास’ ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही लिखा है कि “पश्चिम


1. यह वैस जाट गोत्र है। सम्राट् हर्षवर्द्धन वैस या वसाति गोत्र का जाट था। वैश्य दूसरा शब्द है जो एक वर्ण का नाम है तथा वैश्य बनिया (महाजन) को भी कहते हैं।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-235


दिशा प्रसिद्ध देश सोरठधरदीपत नगर बाल्लिका नाथ जंग करि आसुर जीपत।”

सोरठ से पराजित बल्ल लोगों के नाथ के लिए गौरीशंकर हीराचंद ओझा मेवाड़ इतिहास पृ० 18 पर इसी राजविलास का उल्लेख करते हैं कि बल्लभी क्षेत्र के राजा का रघुवंशी पुत्र गुहादित्य बाप्पा रावल मेवाड़ में आया। उसने अपने नाना राजा मान मौर्य जो कि चित्तौड़ का शासक था, को मारके चित्तौड़ का राज्य हस्तगत कर लिया। नैणसी भाट के लेख अनुसार - “मौरी दल मारेव राजरायांकुर लीधौ।” ‘राजप्रशस्ति महाकाव्य’ सर्ग 3 में भी लिखा है -

ततः स निर्जित्य नृपं तु मौरी, जातीयभूपं मनुराजसंज्ञम् ।
गृहीतवांश्चित्रितचित्रकूटं, चक्रेऽत्र राज्यं नृपचक्रवर्ती ॥

इस प्रकार बल वंश की ही शाखा गुहिल सिसौदिया सिद्ध होती है - स्थान-परिवर्तन से इस प्रकार नाम भी परिवर्तित हुआ।

बलवंश का मूलस्थान पंजाब ही था। यहीं से धारणवंशी (जाट गोत्र) गुप्त सम्राटों का सेनापति भटार्क पहले बिहार मगध और बाद में वल्लभी पर अपनी सत्ता स्थिर कर सका। किन्तु वह पद्धति एकतन्त्री थी। पंजाब में इस बलवंश के शेष वंशधर प्रजातन्त्री रूप से अपनी आदि भूमि पंजाब में ही भूमि के अधिपति रहे। इनका पंजाब में यह बल जनपद मुगलकाल में बहावलपुर के अन्तर्गत देवागढ़ उपनाम देवरावर किले के अधिपति देवराज भट्टी यादव द्वारा समाप्त कर दिया गया। किन्तु ‘जनरल रायल एशियाटिक सोसायटी’ सन् 1894 पृ० 6 के अनुसार -

येन सीमाकृता नित्यास्त्रवलीबल्लदेशयो: ।
भट्टिकं देवराजं यो बल्लमण्डलपालकम् ॥

काकराणवंशी राजा शिलुक ने बल्लमण्डल के पालक देवराज भट्टी को मारकर त्रवणी और बल्ल देश तक अपनी सीमा स्थिर की1। तदनन्तर कुछ बलवंशी सीमाप्रान्त की ओर सिंध में और कुछ ऊंचे स्थान पर आबाद हो गये। जहां वे बलोच नाम से प्रसिद्ध होकर इस्लाम धर्म के अनुयायी हो गये। वैदिक सम्पत्ति पृ० 416, लेखक स० पं० रघुनंदन शर्मा साहित्यभूषण ने लिखा है कि “बलोचिस्तान भी बलोच्च्स्तान शब्द का अपभ्रंश है। इसमे कलात नामक नगर अब तक विद्यमान है। यह कलात तब का है, जब किरातनामी पतित आर्यक्षत्रिय यहां आकर बसे थे। ये क्षत्रिय होने से ही बल में उच्च स्थान प्राप्त कर सके थे2।”

इस बलवंश (गोत्र) के जाट सिक्ख अमृतसर, जालन्धर, गुरदासपुर, कपूरथला, लुधियाना जिलों में बड़ी संख्या में बसे हुए हैं।

बल गोत्र के हिन्दू जाट अम्बाला, करनाल, हिसार और मुरादाबाद जिलों में अच्छी संख्या में हैं। उत्तरप्रदेश में मुजफ्फरनगर एक ऐसा जिला है जहां आज भी बलवंशी हिन्दू जाट बालियान नाम से एक विशाल जनपद के रूप में बसे हुए हैं। इन लोगों के 50 वर्गमील उपजाऊ भूमि पर 84 विशाल गांव हैं जिनमें इनकी बहुत सम्पन्न स्थिति है। काली नदी के दाएं-बाएं 20 मील तक यात्रा करने पर विशाल अट्टालिकाएँ नजर आती हैं जो इनके वैभव का परिचय देती हुई इनके गांव का बोध कराती हैं।


1. देखो तृतीय अध्याय, काकुस्थ या काकवंश प्रकरण।
2. सूर्यवंशी बल-बालान-बालियान जाटवंश, जाटों का उत्कर्ष पृ० 313-316, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-236


बालियान खाप - उत्तरप्रदेश में बालियान खाप के छोटे-बड़े लगभग 100 गांव हैं। इस खाप का सबसे बड़ा गांव सिसौली है। दूसरा प्रसिद्ध गांव शोरम है जहां सर्वखाप पंचायत का मुख्य कार्यालय पुराने समय से चला आ रहा है। इसी सर्वखाप पंचायत के सम्बन्ध में पुराने हस्तलिखित ऐतिहासिक कागजात चौ० कबूलसिंह मन्त्री (वजीर) सर्वखाप पंचायत के घर में आज भी सुरक्षित रक्खे हुए हैं। मैंने (लेखक) भी चौ० कबूलसिंह मन्त्री के घर कई दिन तक ठहर कर इनकी सहायता से इन कागजात के जाटों के विषय में आवश्यक ऐतिहासिक घटनायें लिखी हैं जिनका उल्लेख उचित स्थान पर किया जायेगा। इस बलवंश के अति प्रसिद्ध वीर योद्धा ढलैत की हरयाणा में कहावत “वह कौन सा ढलैत है”, “जैसा तू ढलैत है, सब जानते हैं”, “देख लेंगे तेरे ढलैत ने” सैंकड़ों वर्षों से प्रचलित है। उसी वीर योद्धा का संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार से है -

बलगोत्री जाट ढमलचन्द उपनाम ढलैत वीर योद्धा -

वीर ढमलचन्द का जन्म संवत् 1550 (सन् 1493 ई०) में ग्राम सिसौली जिला मुजफ्फरनगर में हुआ था। इसके पिता का नाम चौ० मेहरचन्द तथा माता का नाम श्यामो देवी था जो कि दहिया जाट गोत्र की थी। इस वीर का वजन 52 धड़ी (6½ मन) था। यह जंगली भैंसे के सींगों को पकड़ कर उसे चक्कर कटा देता था। इसके कोई बहिन नहीं थी। अतः इसने जसवन्तनगर के हरिराम ब्राह्मण की पुत्री हरकौर को अपनी धर्मबहिन बनाया। हरकौर के कोई भाई नहीं था सो उसने इसको धर्मभाई बना लिया। हरकौर ने ही ढमलचन्द का उपनाम ढलैत रख लिया।

ढलैत की शक्ति व योग्यता को जानकर रीवा के राजा वीरसिंह बघेला ने इसको अपनी सेना में भरती कर लिया और 200 घुड़सवारों और 300 पैदल सैनिकों का सरदार बना दिया। एक बार राजा वीरसिंह ढलैत को साथ लेकर किसी जंगल में से जा रहे थे। वहां पर एक शेर ने राजा पर अकस्मात् आक्रमण करके, उसके घोड़े को एक ही थाप में मार दिया। राजा पर वार करने से पहले ही ढलैत ने शेर की थाप को अपनी ढाल पर रोक लिया और अपनी 15 सेर वजन की तलवार से एक ही वार में शेर के दो टुकड़े कर दिये। इससे प्रसन्न होकर राजा ने ढलैत को 2000 सवारों का मनसबदार नियुक्त कर दिया। इसके पश्चात् ढलैत ने अपने पुराने साथियों कीर्तिमल और भीमपाल उपकरण को महाराज की सेना में ऊँचे पदों पर लगवा दिया। राजा वीरसिंह का एक राजपूत भीमपाल नामक 7 गांव का जागीरदार था। उसकी पुत्री राजकली थी। यह 28 धड़ी वजन के पत्थर के मुदगर को दोनों हाथों से कई-कई बार ऊपर-नीचे कर देती थी। एक बार राजा वीरसिंह बघेला अपने साथ ढलैत वीर योद्धा को लेकर जागीरदार भीमपाल के निवास-स्थान पर आये थे। वहां पर मल्लों की युद्धकला का प्रदर्शन हुआ। राजकली भी प्रदर्शन देख रही थी। महाराजा की आज्ञा से ढलैत ने राजकली के उस 28 धड़ी के मुदगर को कभी दायें हाथ और कभी बायें हाथ से ऊपर नीचे और चारों ओर घुमाकर भूमि पर दूर फेंक दिया। तीन बार ऊपर फेंककर अपने कन्धों पर रोककर नीचे गिरा दिया। इससे भी भारी मुदगरों को उठाने की कला दिखलाकर दर्शकों को चकित कर दिया। उसी अवसर पर एक मरखना हाथी बिगड़कर इस प्रदर्शन स्थल पर आ गया। उसे देखकर लोग भागने लगे। इतने में ढलैत ने बड़ी तेजी से आगे बढ़कर 19 धड़ी की मोगरी उस हाथी के माथे पर जोर से मारी जिसके लगते ही हाथी पीछे को भाग गया। इस अद्भुत मल्ल युद्ध की कला को देखकर उपस्थित जनसमूह ने जोर-जोर से जयकारे लगाये “हरयाणा के मल्ल


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-237


ढलैत की जय हो।” उसी समय उस राजपूत लड़की राजकली ने ढलैत को मन से अपना पति मान लिया और उससे स्वयंवर विवाह कर लिया।

ढलैत की धर्मबहिन ब्राह्मण लड़की हरकौर का विवाह पण्डित प्रेमनाथ के पुत्र देवव्रत के साथ हुआ। देवव्रत हरद्वार में अध्यापक थे और वहां के निकट गांव बाहपुर जाट के निवासी थे। एक दिन हरकौर अपने देवर जयभगवान के साथ बहली में बैठकर अपने गांव जसवन्तनगर से अपनी ससुराल जा रही थी। रास्ते के जंगल में हैदरगढ़ के नवाब के बेटे हसनखां ने अपने शस्त्रधारियों सहित बहली पर आक्रमण कर दिया और हरकौर को हैदरगढ़ के किले में ले गया। यह घटना संवत् 1580 (सन् 1523 ई०) की है। उस समय इब्राहीम लोधी दिल्ली का बादशाह था।

हसनरज़ाखान हरकौर से निकाह (विवाह) करने के प्रयत्न करता रहा। परन्तु वह इन्कार करती रही। हरकौर ने अपनी अंगरक्षक एक मुस्लिम फकीरनी के माध्यम से उसके पोते रमजान को पत्र देकर अपने धर्मभाई ढलैत के पास भेजा। रमजान ने यह पत्र ढलैत को मथुरा के राजा के कैम्प में दिया। ढलैत ने अपनी धर्म-बहिन हरकौर के सतीत्व को बचाने के लिये राजा वीरसिंह से आज्ञा लेकर अपने साथ कीर्तिमल, भीमपाल उपकरण तथा 200 घुड़सवार लिए और हैदरगढ को चल दिया। इनके साथ राजकली भी ऊँटनी पर सवार होकर चली। वहां पहुंचकर इन वीर योद्धाओं ने हैदरगढ़ किले को घेर लिया और बड़ी युक्ति से धावा करके नवाब के हजारों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। राजकली ने हसनरजा के उन 5 सैनिकों का अपनी तलवार से सिर उतार दिया जो कि हरकौर को जबरदस्ती ले जाकर हसनरजाखान के साथ निकाह करवाना चाहते थे।

वीर योद्धा ढलैत ने अपनी तलवार से हसनरज़ाखान का सिर काट दिया। इस तरह से ढलैत ने अपनी धर्म-बहिन हरकौर के प्राण एवं सम्मान को बचा लिया। ढलैत की वीरता तथा हरकौर के सतीत्व की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। यह है ढलैत की वीरगाथा।

ढलैत की पत्नी राजकली की 48 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई। इसके पश्चात् वीर ढलैत साथु बन गया। एक बार ढलैत अपनी धर्मबहिन हरकौर, मित्र कीर्तिमल एवं भीमपाल उपकरण के साथ शुक्रताल (जि० मुजफ्फरनगर) गंगा के तट पर स्नान करने गया। ये सब तीन दिन तक साधु सन्तों से धर्मकथा सुनते रहे। चौथे दिन ढलैत योद्धा का अकसमात् देहान्त हो गया। उसका दाह संस्कार वहीं गंगा तट पर किया गया। सतीदेवी हरकौर को अपने धर्म-भाई ढलैत की मृत्यु का भारी आघात पहुंचा। वह ढलैत की चिता के पास बैठकर “मेरा भाई ढलैत, मेरा भाई ढलैत” कहने लगी और तीन घण्टे पश्चात् अपने प्राण त्याग दिये1। यह है भाई-बहिन के सच्चे प्यार का उदाहरण।

बलवंश के शाखा गोत्र - 1. गुहिल-गहलोत गुहिलोत-गोहिल-गेलोत (सब एक हैं) 2. मुण्डतोड़ गहलावत 3. सिसौदिया 4. राणा 5. रावल

Origin

This gotra traces its origin from Ghazni (now in Afghanistan). People belonging to the Bal gotra claim to be descendants of Suryavanshi Raja Bali. [13] But according to Bhagvat Dutt they belong to the Anu dynasty. According to the Mahabharata (Chapter -Adi Parva) King Bali is called the grandson on the maternal side of Raja Daksha. [14]

According to "Deva Samhita", some Jats are the descendants of the daughter of Raja Daksha. Many historians regard Bali as the descendant of Yayati. Bhagwat Dutt has proved that the Baluchies (of Baluchistan) are the descendant of Anu. [15]

Badwa Yup inscription of Maukhari rulers mentions a Mahasenapati named Bala.

Badwa Yup inscription of Maukhari rulers

मौखरी शासक का बड़वा यूप अभिलेख

स्थान: बड़वा राजस्थान

भाषा: संस्कृत

लिपि: ब्राह्मी उत्तरी

काल: ६ वीं शती

विषय: प्रारम्भिक मौखरियों की स्थिति

[१]

१ सिद्धं(द्धं) (।) क्रितेहि1 २०० (+) ९० (+) ५ फ़(।)ल्गुण-शुक्लस्य2पञ्चे3 दि. श्रि-महासेनापते: मोखरे:बल-पुत्रस्य बलवर्द्धनस्य यूप: (।) त्रिरात्रसंमितस्य दक्षिण्यं4 गवां सहस्त्रं[१०००]5 (।)

[२]

२ सिद्धं (।) क्रितेहि6 २०० (+) ९० (+) ५ फ़(।)ल्गुण-शुक्लस्य पञ्चमे7 दि. श्री-माहसेनापते: मोखरे: बल-पुत्रस्य सोमदेवस्य यूप: (।) त्रिरात्रसंमितस्य दक्षिण्यं [गव](।ं) [सह]स्त्रं[१०००] (।)

३ क्रितेहि २०० (+) ९० (+) ५ फ़(।)ल्गुण-शुक्लस्य पञ्चमे [ ि] द. श्री-महासेनापते[:] [मो]खरे-

४ बलि-पुत्रस्य बलसिंहास्य यूप: (।) त्रिरात्रसंमितस्य दक्षिण्यं गवां सहस्त्रं[१०००] (।)


1.पढें : कृते. इसका अभिप्राय है कि कृत युग के २९५ वर्श व्यतीत होने पर

2.पाठ:फ़ाल्गुन

3.पढें : पञ्चमे, दि. दिवसे

4.दक्षिणा त्रिरात्रसम्मित से अभिप्राय यज्ञ से है.

5.अल्तेकर: सहष्रुं (स्त्रं). १००० का एक चिन्ह यहां बना है.एक उर्ध्वाकार रेखा पर त्रिकोण.

6.पढें :कृते

7.पढें :फ़ाल्गुन शुक्लस्य पञ्चमे

ऐतिहासिक महत्व

मौखरी राजाओं का यह सबसे पुराना और पहला अभिलेख है.यह एक यूप पर खुदा है. यूप एक प्रकार का स्तम्भ है. इस अभिलेख में कृत सम्वत का उल्लेख किया गया है तथा इससे मौखरियों की एक नई शाखा का पता लगता है. बडवा यूप मौखरी वन्श से सम्बन्धित है. मौखरी राजाओं की कई शाखायें थी. बडवा यूप का प्रमुख व्यक्ति बल था, जो अन्य शाखाओं से अधिक पुरानी शाखा से सम्बन्ध रखता है. उसकी उपाधी महासेनापति होने से अर्थ निकलता है कि वह बहुत बलशाली था. यह प्रतीत होता है कि ये शक-क्षत्रपों के अधीन रहे होंगे. [16]

In Chauhan records

Dasharatha Sharma in "Early Chauhan Dynasties" [180-191] writes about Jalor Chauhan ruler - Samantasimha and Kanhadadeva.

Samantasimha - [Page-180] The inscriptions of Samantasimha range from V. 1339 to 1362 and show Samantasimha ruling over almost the same territories as his father,Chachigadeva. Of Samantasimha's 16 inscriptions, four come from Bhinmal, three from the state of Sirohi, and the rest from various parts of the Jodhpur division of Rajasthan. About V. 1353, he associated his son, Kanhadadeva , with himself in the government of Jalor; The Jalor inscription of Samantasimha, V. 1353, refers itself to the reign of Maharajakula Sri-Samvatasimha, while Kanhadadeva was subsisting on his lotus like feet and bearing the burden of administration (EI, XI, pp. 61f.). Similarly the Chohtan inscription V. 1356, speaks of Maharajakula Sri-Samvatasimhadeva and Rajan Kanhadadeva.

In V. 1353 (1296 AD) the ruler on the throne of Delhi was Firuz's nephew and assassinator, Ala-ud-din Khalji, perhaps the greatest of Sultans of Delhi, whose avowed ambition was to end all Hindu principalities and kingdoms, and who had been advised by his trusted counselors to treat the Hindus as no better than slaves. Samantasimha of Jalor does not appear to


[Page-181] have been a man gifted or capable enough to fight against such a redoubtable adversary. It was good that he realised the need of some assistance, and acting probably on the advice of his people put the real direction of the affairs of the state into the hands of Kanhadadeva, then perhaps a young man of twenty five years or so.

Kanhadadeva - Kanhadadeva had not to wait long for a chance to prove his mettle. In the third year of his joint reign, i.e., 1298 A.D., Alauddin decided to conquer Gujarat and destroy the temple of Somanatha. As the best route for his army lay through Marwar, he despatched a robe of honour to Kanhadadeva and desired that he should permit the Khalji forces to pass through his territory. Worldly wisdom should have dictated instant submission to the imperial orders. But to the brave Kanhadadeva svadharma mattered more than worldly pleasures, or a kingdom or even his life. He therefore sent back Alauddin's messenger with the blunt answer,

"Your army would, on its way, sack villages, take prisoners, molest women, oppress Brahmanas and slay cows. This being against our dharma, we cannot accede to your request."

Though the refusal must naturally have angered Alauddin,he took no immediate steps against Jalor. The Khalji army, commanded by Ulugh Khan and Nusrat Khan, marched instead through Mewar. Like a storm of extreme fury, it laid low every state, every chiefship, every principality that lay across its path, conquered very soon the whole of Gujarat and Kathiawar, and destroyed the temple of Somanatha, in spite of the gallant opposition offered by the Jethava (जेठव), Vala (वला), Baja (बाजा) and Chudasama (चुडासामा). And then on its way back to Delhi, Ulugh Khan, either on his own initiative or acting on


[Page-182] instructions beforehand by Alauddin, decided to punish Kanhadadeva for the affront to Khalji authority. Victorious every where he marched through the Jalor. When the Khalji army reached Sakrana (tah-Ahore), a village 18 miles from Jalor, Kanhadadeva’s chief minister, Jaita Devada, conveyed his master’s message to Ulugh.


[Page-183] In a well planned raid led by Jaita Devada, Nusrat Khan’s brother, Malik Aizudin and a nephew of Alaudin were slain. Ulugh Khan barely escaped his life. They liberated thousands of Hindu prisnors and the rescue of an idol of Somanatha which was being carried to Delhi.


[Page-184] Kanhadadeva had its five fragments installed respectively at Prabhasa, Bagada, Abu, Jalor and his own garden. This rescue of Somanatha forms in the popular mind Kanhadadeva's best and greatest title to greatness.

Distribution in Punjab

Several people belonging to this gotra are are found in Haryana. The Sikh Jats belonging to this gotra are found in several big villages like Sathila, Batala in Amritsar.[17]

Villages in Amritsar district

In Amritsar district the Bal population is 17,934. This clan holds a total of 23 villages, for example, Bal Khurad, Bal Kalan, Bal Serai,Sathiala, Butala, and Jodhe.[18]

Villages in Ludhiana district

Bal population is 3,783 in Ludhiana district.[19]

Villages in Hoshiarpur district

Village Bachaurhi midway between Garhshankar and Balachaur has a fair concentration of Bal Jatts, many of whom are now settled abroad</ref>

Villages in Jalandhar district

According to B S Dhillon the population of Balh clan in Jalandhar district is 1,500.[20]

Villages in Gurdaspur district

Bal named Villages are in Dera Baba Nanak and Gurdaspur tahsils in Gurdaspur district in Punjab.

In Gurdaspur district the Bal population is 1,569. [21]

Villages in Firozpur district

Bal named village s in Firozpur district, Zira Tahsil, in Punjab, India.

Villages in Patiala district

Villages in Rupnagar district

Distribution in Pakistan

Bal is One of the largest Jat tribe, found through out the central districts of Lahore, Kasur, Sialkot, Narowal, Gujranwala and Okara. Prior to partition, Muslim Bal were also found in Amritsar, Jalandhar, Kapurthala and Ludhiana. Many have also settled in the canal colony districts of Faisalabad, Sahiwal and Sargodha.

Notable persons

References

  1. B S Dahiya:Jats the Ancient Rulers (A clan study)/Jat Clan in India, p.236, s.n.104
  2. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. ब-67
  3. O.S.Tugania:Jat Samuday ke Pramukh Adhar Bindu, p.50, s.n. 1649
  4. An Inquiry Into the Ethnography of Afghanistan,H. W. Bellew, p.14
  5. James Todd, Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume I,: Chapter 7 Catalogue of the Thirty Six Royal Races, pp.134-135
  6. Mahendra Singh Arya et al.: Ādhunik Jat Itihas, Agra 1998, p. 271
  7. Jats the Ancient Rulers (A clan study)/The Antiquity of the Jats, p. 303
  8. Book III (p.38)
  9. A glossary of the Tribes and Castes of the Punjab and North-West Frontier Province By H.A. Rose Vol II/B , p.40
  10. Ram Swarup Joon:History of the Jats/Chapter II,p.32
  11. Ram Swarup Joon| History of the Jats/Chapter V,p.72
  12. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.234-
  13. Mahendra Singh Arya et al: Adhunik Jat Itihas,
  14. Ram Swarup Joon: History of the Jats
  15. Ram Swarup Joon: History of the Jats
  16. Bharatiya Puralekhon Ka Adhyayan Studies In Ancient Indian Inscriptions By Shiv Swarup Sahaya,p.349
  17. Ram Swarup Joon: History of the Jats
  18. History and study of the Jats. B.S Dhillon. p.124
  19. History and study of the Jats. B.S Dhillon. p.123
  20. History and study of the Jats. B.S Dhillon.p. 127
  21. History and study of the Jats. B.S Dhillon. p. 127

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