Bikaner Sambhag Men Prachin Jat Ganarajyon Ka Itihas

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बीकानेर संभाग में प्राचीन जाट गण राज्यों का इतिहास
                                  लेखक – लक्ष्मणराम बुरड़क, सेवा निवृत IFS 

राजस्थान एक परिचय: राजस्थान भारत वर्ष के पश्चिम भाग में अवस्थित है जो प्राचीन काल से विख्यात रहा है। तब इस प्रदेश में कई इकाईयाँ सम्मिलित थी जो अलग-अलग नाम से सम्बोधित की जाती थी। उदाहरण के लिए जयपुर राज्य का उत्तरी भाग मध्यदेश का हिस्सा था तो दक्षिणी भाग सपादलक्ष कहलाता था। अलवर राज्य का उत्तरी भाग कुरुदेश का हिस्सा था। अलवर जिले का पूर्वी क्षेत्र, बयाना और भरतपुर का समस्त भूभाग काठेड़ कहलाता था। धोलपुर, करौली राज्य शूरसेन देश में सम्मिलित थे। इसी प्रकार जैसलमेर राज्य के अधिकांश भाग वल्लदेश में सम्मिलित थे। जोधपुर मरुदेश के नाम से जाना जाता था। जोधपुर का दक्षिणी भाग गुर्जरत्रा (गुजरात) के नाम से पुकारा जाता था। प्रतापगढ़, झालावाड़ तथा टोंक का अधिकांश भाग मालवादेश के अधीन था। मेवाड़ जहाँ शिवि जनपद का हिस्सा था वहाँ डूंगरपुर-बांसवाड़ा बागड़ के नाम से जाने जाते थे। बीकानेर राज्य तथा जोधपुर का उत्तरी भाग बागड़ प्रदेश अथवा जांगल देश कहलाता था। सीकर और झुंझुनू जिले अनंतगोचर का भाग थे।

जाट इतिहास की आवश्यकता

जाट इतिहास की आवश्यकता - इतिहास देश और जातियों के उत्थान और पतन का दर्पण है।समाज के निर्माण, उत्थान और विकास में इतिहास की अहम् भूमिका होती है। ऐतिहासिक तथ्यों की खोज अत्यंत दुसाध्य और खर्चीला कार्य है और यह कार्य उन परिस्थितियों में और भी दुष्कर हो जाता है जबकि विभिन्न कालों से संबन्धित जानकारी उपलब्ध न हो तथा जैसी कि जाट परंपरा रही है, ऐतिहासिक जानकारी अभिलेखित नहीं की गई हो। जब कोई समुदाय नेता विहीन होता है तो इतिहास ही राह दिखाता है और आगे बढने की प्रेरणा देता है। दुर्भाग्य से अब तक इस कौम के इतिहास को सही ढंग से उजागर नहीं किया गया। समाज का मनोबल ऊंचा करने के लिये हर समाज का तथ्यपरक सन्तुलित इतिहास का होना और इसकी जानकारी समाज को होना आवश्यक है। मुगलों के लगातार आक्रमण और लम्बे समय तक राज करने से भारतीय इतिहास में असन्तुलन पैदा हो गया। समाज वैज्ञानिक कहते हैं कि किसी कौम को समाप्त करना है तो उसके इतिहास को लुप्त करादो। वह कौम स्वयं ही समाप्त हो जायेगी।

जाटों का इतिहास अत्यंत शानदार रहा है। जाट समाज के हर सदस्य को चाहिए कि जाट इतिहास पढ़े, समझे और अन्य भाईयों को भी बतावे। हम स्कूल कालेजों में आक्रांताओं का इतिहास पढ़ते हैं, समाज शोषक राजाओं का इतिहास पढ़ते हैं परन्तु इन आक्रांताओं और समाज शोषकों का दृढ़ता से सामना करने वाले देशभक्त जाटों का इतिहास पाठ्यपुस्तकों में नहीं पढ़ने को मिलता। यदि पाठ्य पुस्तकों में कहीं जाट शब्द आता है तो केवल इतना आता है कि जाट एक विद्रोही जाति रही है। जाटों ने विद्रोह हमेशा शासक की गलत नीतियों के विरुद्ध किया है। जाट इतिहास लिखने के प्रयास निश्चय ही सफल होंगे और जाट समाज के प्रति भरी गई दुराग्रह की भावना दूर होगी। समग्र जाट इतिहास लेखन से सही तस्वीर धीरे-धीरे सामने आ रही है। समाज के लिए ख़ुशी की बात है कि NCERT पुस्तकों में यह समावेश हो चुका है कि गुप्त सम्राट धारण गोत्र के जाट थे। (देखें - भारत का इतिहास - कुलदीपराज दीपक, अध्याय-12, कक्षा-11)

जाट इतिहास का संकलन - समय की मांग है कि अब जाट इतिहास संकलित किया जावे। जाट कीर्ति संस्थान चूरु द्वारा चूरू अंचल के जाट इतिहास का लेखन कार्य हाथ में लिया गया है। जयपुर स्थित तेजा फ़ाउंडेशन द्वारा भी राजस्थान के जाटों का इतिहास संकलन का कार्य किया जा रहा है। यह एक सराहनीय पहल है। प्रस्तुत लेख में मेरे द्वारा जाटलैंड वेबसाईट (http://www.jatland.com) पर विभिन्न स्रोतों से संकलित बीकानेर संभाग संबन्धित स्थानों और गोत्रों के इतिहास पर आधारित विवरण दिया जा रहा है। लेख के अंत में संदर्भ सूची दी गई है परंतु यदि पाठक विस्तृत संदर्भ देखना चाहते हों तो जाटलैंड वेबसाईट पर जाकर उस गांव या गोत्र के विवरण में देख सकते हैं।

जाटों का सिंध से राजस्थान आगमन

जाटों का सिंध से राजस्थान आगमन: डॉ. पेमाराम लिखते हैं कि जाट मूलत: सिंधु घाटी के निवासी थे और सिंधु नदी के दोनों किनारों पर आबाद थे। इनकी मुख्य आबादी निचले सिंध विशेषकर ब्राहमणाबाद (मनसुरा) में थी। सिंध प्रांत यानि उत्तर में पेशावर से लेकर दक्षिण में देवल बन्दरगाह तक यानि सिंधु नदी का पूरा इलाका जिसमें मकरान (आधुनिक बलोचिस्तान) भी सम्मिलित है। (डॉ पेमाराम, p.13)

326 ई.पूर्व में जिस समय भारत पर सिकन्दर का आक्रमण हुआ, उस समय पंजाब में बसे जाटों को सिकंदर के आक्रमण से जर्जरित तथा अपनी स्वतंत्रता को बनाये रखने के लिए राजस्थान की ओर आने को विवश होना पड़ा यहाँ आकर वे अपनी सुविधा अनुसार बस गये। पानी के साधन हेतु बस्तियों के आस-पास तालाब, कुएं व बावड़ियां खोद ली। इन जातियों में शिवि, यौधेय, मालव, मद्र आदि प्रमुख थे। मरूभूमि में जो शिवि, रावी और व्यास नदियों से आये, उन्होंने सोजत, सिवाना, शेरगढ़, शिवगंज आदि नगर आबाद किये। यह इलाका सिंध देश से मिला हुआ था, जहाँ बहुतायत से जाट बसे हुए थे। (डॉ पेमाराम, p.13)

राजस्थान में आने के बाद शिवि, मालव, यौधेय आदि जातियां जनपद के रूप में व्यवस्थित हो गये। शिवि जनपद के प्राचीन पुरावशेष राजस्थान के माध्यमिका अथवा वर्तमान मेवाड़ में मिले हैं । मालव जाती का केंद्र जयपुर के निकट नगर था। समयांतर में मालव अजमेर, टोंक तथा मेवाड़ के क्षेत्र में फ़ैल गये और प्रथम शताब्दी के अंत तक गणतंत्रीय राज्य के रूप में बने रहे। राजस्थान के उत्तरी भाग में यौधेय भी एक बलशाली गणतंत्रीय कबीला था जिसमें कुमारस्वामी इनका बड़ा शक्तिशाली नेता हो चुका है। यौधेय सम्भवत: उत्तरी राजस्थान की कुषाण शक्ति को नष्ट करने में सफल हुए थे। इस तरह दूसरी शताब्दी ई. पूर्व से लेकर चौथी शताब्दी के प्रारंभ तक शिवि, मालव, यौधेयों की प्रभुता का काल राजस्थान में विद्यमान था। (डॉ पेमाराम, p.14)

महमूद गजनवी के 1008 से 1027 ई. के आक्रमणों के दौरान बडी संख्या में जाटों को मौत के घाट उतारा। इस दौरान अनेक जाटों ने भागकर अपने प्राण बचाये और वे सिन्ध व पंजाब को छोडकर राजस्थान में आये और सरस्वती के किनारे-किनारे आगे बढकर गंगानगर, बीकानेर और चूरु क्षेत्र में बस गये। (डॉ पेमाराम, p.16)

इसके बाद शाहबुद्दीन मुहम्मद गौरी ने 1175 ई. से भारत पर अनेक आक्रमण किये और दिल्ली, कन्नौज, अजमेर आदि स्थानों पर अधिकार कर लिया। 1192 में तराईन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज तृतीय को पराजित कर जब कुतुबुद्दीन ऐबक ने पंजाब पर अधिकार करने की कोशिश की तब कुतुबुद्दीन ऐबक के अत्याचारों से तंग आकर अधिकांश जाट पंजाब व हांसी से हिसार, राजगढ, रिणी, लूणकरणसर, सिद्धमुख, नोहर, सरदारशहर, डूंगरगढ आदि इलाकों में आकर आबाद हुये। (डॉ पेमाराम, p.17)

इस प्रकार 326 ई.पूर्व के सिकन्दर आक्रमण से लेकर अरबों व तुर्कों के आक्रमण के कारण जाटों की अश्रय-भूमि सिन्ध और पंजाब को छोडकर सुरक्षित स्थान के लिये राजस्थान की ओर आना पडा। राजस्थान में जाटों ने तीन ओर से प्रवेश किया:- 1. पहला, सिन्ध नदी से उमरकोट होते हुये बाढमेर, जालोर, सिरोही तक। 2. दूसरा सतलज की ओर से बीकानेर (जांगलू) के रास्ते नागौर, बून्दी, कोटा आगे मालवा तक और 3. तीसरा पंजाब में सिरसा, हिसार, हांसी होते हुये हनुमानगढ, सिद्धमुख, नोहर, राजगढ, तारानगर, सरदारशहर, लूणकरणसर व डूंगरगढ तक। (डॉ पेमाराम, p.18)

मारवाड और जांगल प्रदेश में बसने के कारण पानी की कमी की पूर्ति के लिए पानी के साधनों का विकास किया। मारवाड और जांगल प्रदेश में जितने कुएं, तालाब, बावडियां बनी हैं उनमें से अधिकांश जाट व्यक्तियों द्वारा बनाई गई और वे उन्हीं के नाम से जानी जाती हैं। (डॉ पेमाराम,p.18)

बीकानेर संभाग में स्थापित प्राचीन जाट गण राज्य

बीकानेर संभाग में स्थापित प्राचीन जाट गण राज्य - प्रस्तुत लेख में बीकानेर संभाग में स्थापित प्राचीन जाट गण राज्यों का इतिहास दिया जा रहा है। वर्तमान बीकानेर संभाग के अंतर्गरत वर्तमान बीकानेर, चुरू, हनुमानगढ़ और गंगानगर जिले आते हैं। राजस्थान के प्राचीन जाट गण राज्य गोत्र के रूप में संगठित थे। इन्हीं की प्रतिरूप हरयाणा और पश्चिम उत्तरप्रदेश में खाप व्यवस्था थी। बीकानेर संभाग का अधिकांश भाग यहाँ राठोड़ों के आगमन से पूर्व प्राचीन बागड़ अथवा जांगलप्रदेश का हिस्सा था। बीकानेर संभाग का कुछ भाग प्राचीन हरयाणा के अंतर्गत होने का भी उल्लेख इतिहासकारों द्वारा किया गया है। उल्लेखनीय है कि भगवान हर (शिव) के मैदानी क्षेत्रों में आगमन के समय प्राचीन हरयाणा का गठन हुआ था। तत्समय राजस्थान का उत्तर-पूर्वी भाग (गंगानगर, हनुमानगढ़, झुंझनुं एवं चूरू) प्राचीन हरयाणा में सम्मिलित था। ये जिले प्राचीन बागड़ देश का भाग थे। बीकानेर संभाग के प्राचीन भूभागों पर यौधेय जाट गणों का लंबे समय तक गणतांत्रिक पद्धती का शासन रहा है।

इतिहासकार रतन लाल मिश्र मानते हैं कि राजस्थान में राजपूतकुलों के शासन के पूर्व इस क्षेत्र में जाट जाति उपस्थित थी जिसका शासन गणराज्य की पंचायत पद्धति पर चलता था। ठाकुर देशराज और दलीप सिंह अहलावत ने जाट इतिहास में अनेक जाट गणराज्यों का वर्णन किया है। डॉ. पेमा राम ने 'राजस्थान के जाटों का इतिहास' पुस्तक में राजस्थान के जाटों के गणराज्य एवं उनका पतन तथा जाट जनपदों की प्रशासनिक व्यवस्था पर विस्तार से प्रकाश डाला है। बाद में जब राजपूतों ने इस राज्य के विविध भागों पर अपना आधिपत्य जमा लिया तो उन भागों का नामकरण अपने-अपने वंश अथवा स्थान के अनुरुप कर दिया। ये राज्य उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़, प्रतापगढ़, जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, सिरोही, कोटा, बूंदी, जयपुर, अलवर, करौली और झालावाड़ थे। भरतपुर एवं धोलपुर में जाटों का राज्य रहा तथा टोंक में मुस्लिम राज्य था।

बीकानेर रियासत की स्थापना से पूर्व यह इलाका सात जाट जनपदों के अधीन था। प्राचीनकाल व पूर्व मध्यकाल तक जाट जाती उन्नत अवस्था में थी और राजस्थान के विभिन्न भागों में उनका गणतंत्रात्मक शासन था। जाटों के गणतंत्रात्मक शासन व्यवस्था पर बागड़ प्रदेश में लोकोक्ति प्रचलित थी। "सात पट्टी, सताईस मांजरा और सब आदर-खादरा" अर्थात इस जाङ्गल प्रदेश में सात बड़े जनपद, सताईस मझले प्रदेश तथा शेष असंख्य जाट जनपद थे। बालू के टीलों से भरी-पूरी वृक्ष विहीन बंजर भूमि, नदी नाले से विहीन, कम वर्षा व विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले इस मरुप्रदेश में जाटों ने दूर-दूर तक अपनी बस्तियां बसाई तथा अन्य जातियों को अपने साथ बसाया। पीने के पानी के नितांत अभाव वाले इस क्षेत्र में कुए बनाए, वर्षा जल संग्रहण हेतु तालाब बनाये। धरती पुत्र अन्नदाता जाटों ने इस प्रदेश को कृषि योग्य बनाया तथा कृषि और पशुपालन से सबका भरण-पोषण किया। इस जांगल प्रदेश में मानव जीवन की रेखा खींचकर इसे आबाद किया। बीकानेर स्टेट की स्थापना से पूर्व भाडंग, सिद्धमुख, लुदी, धानसिया, रायसलाना, पल्लू आदि प्राचीन व्यापारिक केंद्र थे। (दौलतराम सारण डालमाण, 'धरती पुत्र', 30.12.2012, पृ. 8-10)

यौधेय जाट गणों का शासन

यौधेय जाट गणों का शासन – पाणिनी (500 ई.पू.) को जाटों की शासन प्रणाली का ज्ञान था। तभी उन्होने अष्टाध्यायी (III.3.19) व्याकरण में 'जट' धातु का प्रयोग कर जट झट संघाते सूत्र बना दिया. जाट शब्द एक संघ के रूप में परिभाषित हुआ है। संस्कृत के ‘जट’ धातु से ही हिन्दी का ‘जाट’ शब्द बना है।

पाणिनी द्वारा अष्टाध्यायी में यौधेयादि (IV.1.178,V.3.116-17) जनपदों के अंतर्गत अनेक आयुधजीवी संघों का वर्णन किया है। यथा – 1. शौभ्रेय (IV.1.123) जो संस्कृत के शुभ्र से बना है और राजस्थानी में धोलिया कहलाते हैं। ये चिनाब नदी के निचले भूभाग में बसे थे जहां रवी नदी इसमें मिलती है। इनका सामना सिकंदर से लौटते में हुआ था। 2. शौक्रेय – इनको सिथियन जाट बताया गया है। 3. वार्तेय – ये महाभारत के वरात्य और जाट इतिहास के वरतेति या विजयराणिया या बिजारणिया थे। 4. धार्तेय – ये महाभारत के धार्तराष्ट्र और जाट इतिहास के धरतवाल या धतरवाल थे। 5. ज्याबाणेय....6 त्रीगर्त (V.3.116 ) – इनसे अनेक जाट गोत्र निकले हैं। 7 भारत.... 8 उसीनर (IV.2.118) - ये अनेक जाट गोत्रों के पूर्वज रहे हैं। (वासुदेव सरन अग्रवाल: इंडिया एज नॉन टु पाणिनी,पृ. 426, 431, 434-436, 445,449,500)

सिंध और पंजाब से समय-समय पर ज्यों-ज्यों जाट राजस्थान में आते गए, मरूस्थलीय प्रदेशों में बसने के साथ ही उन्होने प्रजातांत्रिक तरीके से अपने छोटे-छोटे गणराज्य बना लिए जो अपने सुरक्षा की व्यवस्था स्वयं करते थे तथा मिल बैठकर अपने आपसी विवाद सुलझा लेते थे। ऐसे गणराज्य तीसरी शदी से लेकर सोलहवीं शदी तक चलते रहे। तीसरी शदी तक जांगल प्रदेश पर यौधेयों का अधिकार था। इसके बाद नागों ने उन्हें हराकर जांगल प्रदेश (वर्तमान बीकानेर और नागौर जिला) पर अधिकार कर लिया। (डॉ पेमाराम, p.19)


दलीप सिंह अहलावत ने लिखा है कि चन्द्रवंशी सम्राट् ययाति के चौथे पुत्र का नाम अनु था। अनु की नौवीं पीढ़ी मे उशीनर था जो पंजाब की अधिकांश भूमि का शासक था। उनकी पांच रानियां थीं। बड़ी रानी नृगा से नृग पुत्र हुआ। नृग के पुत्र का नाम यौधेय था। इससे ही यौधेय वंश चला जो जाट वंश है। यह भाषाभेद से जोहिया नाम से प्रचलित हुआ। यौधेय गणराज्य शतद्रु (सतलुज) नदी के दोनों तटों से आरम्भ होता था। बहावलपुर (पाकिस्तान) राज्य इनके अन्तर्गत था। वहां से लेकर बीकानेर राज्य के उत्तरी प्रदेश गंगानगर आदि, हिसार, जींद, करनाल, अम्बाला, रोहतक, गुड़गावां, महेन्द्रगढ़, दिल्ली राज्य तक प्रायः समूचे उत्तरी दक्षिणी और पूर्वी राजस्थान में फैला था। अलवर, भरतपुर, धौलपुर राज्य इसी के अन्तर्गत आ जाते थे। यौधेयों के समूह के संघों में होशियारपुर, कांगड़ा तक प्रदेशों की गिनती होती थी। देहरादून, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बुलन्दशहर, अलीगढ़, मथुरा, आगरा, मैनपुरी, एटा, बदायूं, बरेली, बिजनौर, पीलीभीत, मुरादाबाद, रामपुर जिला आदि सारा पश्चिमी उत्तरप्रदेश यौधेय गण के अन्तर्गत था। एक समय तो ऐसा आया था कि मुलतान के पास क्रोडपक्के का दुर्ग तथा मध्यप्रदेश का मन्दसौर तक का प्रदेश भी यौधेयों के राज्य में सम्मिलित था। सिकन्दर सम्राट् इनकी शक्ति से डरकर व्यास नदी से वापिस लौट गया था। (दलीप सिंह अहलावत,पृ:197)

ईसा की तीसरी शताब्दी तक यौधेय दल ने मारवाड़ (जोधपुर), जैसलमेर, बीकानेर (जांगल) प्रदेश की बहुत बड़ी भूमि पर अधिकार कर लिया था। जाटों में इस समय यौधेय के जो वंशज हैं वे कुलरिया, कुहाड़, महिला (महला), माहिल, खीचड़ आदि कहलाते हैं। (डॉ पेमाराम, p.14)

भूरूपाल के जोहिया जाट

जोधा जी के पुत्र बीका जी राठौर ने जब नया राज्य बीकानेर स्थापित करने का प्रयत्न प्रारम्भ किया तो जोहिया जाटों, जो यौधेय जाटों के ही वंशज थे, का वहां 600 गांवों पर अधिकार था। शेरसिंह नामक वीर योद्धा उनका राजा था जिसकी राजधानी भूरूपाल में थी। इस शूरवीर शेरसिंह ने राठौरों को नाकों चने चबवा दिये। बीका जी ने कुछ समय अपनी व्यवस्था ठीक करने और शक्तिसंचय करने में लगाया। वहां के निकट क्षेत्र पर गोदारा जाटों की बड़ी शक्ति थी। जोहिया व गोदारा जाटों की आपसी शत्रुता होने के कारण से गोदारों का नेता गोदारा ‘पाण्डु’ जाट ने बीका जी से कुछ शर्तों पर संधि कर ली। अब बीका जी ने अपनी और गोदारों की सेना लेकर जोहिया जाटों पर आक्रमण कर दिया। वीर शेरसिंह ने अपनी सेना लेकर दोनों बड़ी शक्तियों का साहस से मुकाबला किया। (अहलावत,पृ.198; देशराज, पृ.624)

“देशी राज्यों के इतिहास” में सुखसम्पत्तिराय भण्डारी ने लिखा है – “शेरसिंह ने अपनी समस्त सेना के साथ बीका जी के खिलाफ युद्ध करने की तैयारी कर रखी थी। बीका जी जो कई युद्धों के विजेता थे, इस युद्ध में सरलता से विजय प्राप्त न कर सके। शत्रुगण अद्भुत पराक्रम दिखाक्र साहस छोड़ गया। अन्त में विजय की कोई सूरत न देख, बीका जी ने षडयन्त्र द्वारा शेरसिंह को मरवा दिया।” (अहलावत,पृ.199; देशराज, पृ.624)

‘वाकए-राजपूताना’ में भी यही बात लिखी है। यह युद्ध रामरत्न चारण के लेखानुसार सीधमुख के पास ढाका गांव में हुआ था। शेरसिंह के मारे जाने के बाद भी जोहिया जाट विद्रोही बने रहे। उन्होंने सहज ही में अधीनता स्वीकार नहीं की। उनका प्रत्येक युवक प्राणों की बाजी लगाकर स्वाधीनता की रक्षा करना चाहता था। शेरसिंह के बाद उन्हें कोई योग्य नेता नहीं मिला। (दलीप सिंह अहलावत,पृ.199)

“भारत के देशी राज्यों के इतिहास” का लेख - “यद्यपि बीका जी ने जोहिया जाटों को परास्त करके अपने अधीन कर लिया था तथापि वे बड़े स्वाधीनताप्रिय थे और अपनी हरण की हुई स्वाधीनता को फिर से प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे थे। अतः बीका जी के वंशज रायसिंह ने अपने भाई भीमसिंह जी के संचालन में एक प्रबल राठौर-सेना उनके दमन करने के लिए भेजी। इस सेना ने वहां पहुंचकर भयंकर काण्ड उपस्थित कर दिया। प्रबल समराग्नि प्रज्वलित हो गई। हजारों जोहिया जाटगण स्वाधीनता के लिए प्राण विसर्जन करने लगे। वीर राठौर भी अपने ध्येय से न हटे। उन्होंने इस देश को यथार्थ मरुभूमि के समान कर दिया।” (दलीप सिंह अहलावत,पृ.199)

इस तरह से 15वीं सदी में जांगल प्रदेश पर से जोहिया जाटों का राज्य समाप्त हो गया। इन यौधेयों की कालान्तर में कई शाखायें भी हो गईं यथा कुलरिया, कुहाड़, महिला (महला), माहिल, खीचड़ आदि। राजस्थान, हरयाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में ये शाखाएँ फैल गई। जोहिया जाट जोधपुर, बीकानेर तथा जालन्धर जिले में जड़िया, जोड़ा, बिनौला, थाबलक, जड़ियाला, जोहल आदि 12 गांवों में बसे हुए हैं। जोहिया जाट सतलुज नदी के किनारे उस स्थान पर रहते थे जहां बहावलपुर राज्य था। आजकल वह पाकिस्तान में है। उस स्थान पर इस वंश के जाटों के नाम पर जोहियावार प्रदेश (क्षेत्र) विद्यमान है। (दलीप सिंह अहलावत,पृ.199)

जय यौधेय लेखक राहुल सांकृत्यायन, पृ० 5 पर लिखते हैं कि - भावलपुर रियासत से मुलतान तक फैला एक इलाका जोहियावार कहा जाता है और बहुसंख्यक निवासी जोहिया (यौधेय) कहे जाते हैं। कराची के कोहिस्तान में जोहियार रहते हैं, बल्कि उनके सरदार को ‘जोहिया-जोजन्म’ कहा जाता है। अलवर और गुड़गांव के मेव अब भी यौधेय भूमि में ही बसते हैं और उनकी वीरगाथायें सुनकर आज भी रोमांच हो उठते हैं। (दलीप सिंह अहलावत,पृ.199)

सात बड़े जाट जनपद:गोदारा, सारण, सोहुआ, कसवा, सिहाग, बेणीवाल, पूनिया

राजस्थान के अनेक क्षेत्रों पर जाटों ने भिन्न-भिन्न समय पर राज किया था परन्तु उनकी मुख्य सत्ता राजस्थान के उत्तरी - पूर्वी इलाके पर थी, जहाँ इनके सात बड़े राज्य थे । ये थे - 1. लाघडिया व शेखसर के गोदारा, 2. भाड़ंग के सारण, 3. धाणसिया के सोहुआ, 4. सीधमुख के कसवा, 5. लूद्दी (लून्दी) के पूनियां, 6. सूई के सिहाग, 7. रायसलाणा के बेणीवाल। इनके अतिरिक्त भादू, भूकर, जाखड, कल्हेर, नैन आदि अन्य छोटे ठिकाने भी थे। इन सब जाट राज्यों के सम्बन्ध में एक कहावत प्रसिद्द थी- सात पट्टी सातवां मांझरे अर्थात सात बड़े और सतावन छोटे राज्य थे । (डॉ पेमाराम, पृ.28)

वर्तमान बीकानेर तथा जोधपुर संभाग का उत्तरी भाग प्राचीन काल से जांगल देश कहलाता था । इसके अंतर्गरत वर्तमान बीकानेर, चुरू, हनुमानगढ़ और गंगानगर जिले आते हैं। भूतपूर्व बीकानेर राज्य की स्थापना से पहले इस भूभाग में जाटों के सात बड़े गणराज्य थे। दयालदास के अनुसार विक्रम की 16 वीं शताब्दी पूर्वार्ध में इन जनपदों (राज्य) की स्थिति निम्न प्रकार थी। दयालदास के अनुसार उस समय जाटों के अधीन गाँवों की संख्या 2040 थी। (दयालदास की ख्यात, भाग-2, पृ.8)

जबकि कर्नल टाड ने जोहियों को भी जाट मानते हुए जाट राज्यों के गाँवों की संख्या 2200 बताई है जिनका विवरण नीचे दिया गया है। प्रत्येक शाखा के नाम से उनके अधिकृत क्षेत्र प्रसिद्ध हुये। (जेम्स टोड कृत राजस्थान का इतिहास, अनुवाद कालूराम शर्मा, पृ.402-403)

अनुक्रमांक नाम जनपद नाममुखिया गाँवों की संख्या राजधानी अधिकार में प्रमुख कस्बे
1. पूनिया कान्हा 300 बड़ी लून्दी (लूद्दी) भादरा , अजीतपुरा, सीधमुख , राजगढ़ , ददरेवा , सांखू
2. बेणीवाल रायसल 150 रायसलाणा भूकरका, सोनरी, मनहरपुरा, कूई , बाय
3. जोहिया शेरसिंह 600 भुरूपाल जैतपुर , कुमाना, महाजन , पीपासर, उदासर
4. सिहाग चोखा 150 सूई/पल्लू रावतसर , बिरमसर , दांदूसर, गण्डेली, देवासर ,मोटेर
5. सारण पूला 360 भाड़ंग खेजड़ा, फोग , बुचावास , सूई , बन्धनाऊ, सिरसला
6. गोदारा पाण्डू 700 शेखसर/लाघड़िया शेखसर, पुण्डरासर , गुसांईसर बड़ा , घड़सीसर , गरीबदेसर , रुन्गायसर, कलू

गाँवों की कुल संख्या 2200

कर्नल जेम्स टोड ने लेख किया है कि इनके अलावा तीन और विभाग थे - बागौर, खारी पट्टी और मोहिल। इन पर भी राठौड़ों का प्रभुत्व कायम हो गया था। राजपूत शाखाओं से छिने गए ये तीन विभाग राज्य के दक्षिण और पश्चिम में थे जिनका विवरण नीचे दिया गया है। (जेम्स टोड कृत राजस्थान का इतिहास, अनुवाद कालूराम शर्मा, पृ.403)

अनुक्रमांक नाम जनपद नाम मुखिया गाँवों की संख्या राजधानी अधिकार में प्रमुख कस्बे
7. बागौर 300 बीकानेर, नाल, किला, राजासर, सतासर, छतरगढ़, रणधीसर, बीठनोक, भवानीपुर, जयमलसर इत्यादि।
8. मोहिल 140 छापर छापर, सांडण, हीरासर, गोपालपुर, चारवास, बीदासर, लाडनूँ, मलसीसर, खरबूजा कोट आदि
9. खारी पट्टी 30 नमक का जिला


इनसे अलग ठाकुर देशराज ने जाटों के अधीन गाँवों की कुल संख्या 2660 बताई है. डॉ. कर्णी सिंह (1974) लिखते हैं कि बीका राठोड से पहले राजस्थान के इस प्रदेश पर जाटों के सात गोत्रों के शक्तिशाली गणराज्य थे। इनका विवरण निम्नानुसार है (डॉ. कर्णी सिंह-1974, द जाट्स भाग 2, पृ.250)

अनुक्रमांक नाम जनपद नाममुखिया गाँवों की संख्या राजधानी अधिकार में प्रमुख कस्बे
1. पूनिया कान्हा 300 बड़ी लून्दी (लूद्दी) भादरा , अजीतपुरा, सीधमुख , राजगढ़ , ददरेवा , सांखू
2. बेणीवाल रायसल 150 रायसलाणा भूकरका, सोनरी, मनहरपुरा, कूई , बाय
3. जोहिया शेरसिंह 600 भुरूपाल जैतपुर , कुमाना, महाजन , पीपासर, उदासर
4. सिहाग चोखा 150 सूई/पल्लू रावतसर , बिरमसर , दांदूसर, गण्डेली, देवासर ,मोटेर
5. सारण पूला 360 भाड़ंग खेजड़ा, फोग , बुचावास , सूई , बन्धनाऊ, सिरसला
6. गोदारा पाण्डू 700 शेखसर/लाघड़िया शेखसर, पुण्डरासर , गुसांईसर बड़ा , घड़सीसर , गरीबदेसर , रुन्गायसर, कलू
7. कसवां कंवरपाल 400 सीधमुख चुरू, खासोली, खारिया, सरसला, पीथीसार, आसलखेड़ी, रिड़खला, बूंटिया, रामसरा, थालोड़ी, ढाढर, भामासी, बीनासर, बालरासर, भैंरुसर, ढाढरिया, धान्धू, आसलू, लाखाऊ, दूधवा, जसरासर, लाघड़िया, चलकोई

गाँवों की कुल संख्या 2660


जाटों की इन शाखाओं के अलावा ठाकुर देशराज ने जाटों की कुछ अन्य शाखाओं और उनके राज्यों का उल्लेख किया है जिसमें सुहाग, भादू, भूकर, चाहर, जाखड़ और नैण मुख्य हैं। इस तरह इतिहासकारों द्वारा दी गयी संख्या में पर्याप्त अन्तर है। ऐसा लगता है की इन प्रमुख जाट पट्टियों में जाटों की दूसरी शाखाओं व अन्य जातियों के गाँव भी मिले हुए थे। कभी-कभी एक शाखा के गाँव एक स्थान पर न होकर अलग-अलग भी होते थे। जैसे सीधमुख तहसील राजगढ़ में कसवां जाटों का आधिपत्य था और चुरू तथा चुरू तहसील के अनेक गाँवों पर भी उनका अधिकार था, किंतु इन दोनों स्थानों के बीच लूद्दी में पूनिया जाटों का तथा ददरेवा में चौहानों के ठिकाने थे। इस तरह एक गाँव के विभिन्न भागों को विभिन्न जाट शाखाओं में जोड़ने से व अलग-अलग गिनने से जाट राज्यों के अधीन इन गाँवों की संख्या आई होगी। (गोविन्द अग्रवाल, पृ. 109-110) (डॉ पेमा राम, पृ.29-30 )

जाट इतिहास लिखते समय उन जाट गोत्रों को छोड़ दिया गया जो नवगठित राजपूत क्षत्रीय वर्ग के किसी शासक संघ में सम्मिलित हो गए। ददरेवा के चौहान भी वास्तविक रूप में जाट ही थे जैसा कि बुरड़क इतिहास की खोज से सपष्ट होता है। राजपूत शाखाओं से छिने गए तीन विभाग बागौर, मोहिल एवं खारी पट्टी के अधीश्वर भी पूर्व में जाट ही थे। मोहिल चन्द्रवंशी जाटवंश हैं और उनका वर्णन दलीप सिंह अहलावत ने जाट इतिहास में किया है। खारी पट्टी संभवतया खारी कर्मसोता था जिसके राजा लोयल जाट थे और यह नागौर जिले में पड़ता है। ये पूर्व में जाट गोत्र थे जो चौहान संघ में शामिल हो गए थे। बागौर का उल्लेख भी जाट गोत्रों की सूची में है। बागौर के स्वामी जयपरतनामी तूर संघ के थे। इनके वंशज घंघस जाट गोत्र के थे जो हरयाणा की तरफ प्रस्थान कर गए और वहाँ अनेक गाँव बसाये। (पंडित अमीचन्द्र शर्मा, पृ.10)

जाटों के सात बड़े जनपदों का विवरण: -

1. लाघडिया व शेखसर के गोदारा: शेखसर व लाघड़िया दोनों ही गोदारों की राजधानियाँ थी। शेखसर चुरू से लगभग 58 मील उत्तर-पश्चिम में है जबकि लाघड़िया डूंगरगढ़ तहसील में है। इनके अधीन 360 से 700 गाँवों का होना लिखा है। अतः जाट राज्यों में गोदारों की शक्ति सबसे अधिक थी। वैसे इन जाटों में फूट और प्रतिस्पर्धा रहती थी। राठोड़ बीका ने जब इस इलाके की और राज्य स्थापित करने की दृष्टी से प्रयाण किया तो उस समय लाघड़िया का शासक पांडू गोदारा था जिसके दान देने की चर्चा चारों और फ़ैली हुई थी। (डॉ. पेमाराम, पृ.30)

इसमें कोई सन्देह नहीं, पांडु बड़ा बहादुर सरदार था। उसके गोदारे बांके योद्धा थे। जांगल-प्रदेश में सबसे अधिक राज्य गोदारों के ही पास थे। उनके अधिकार में 700 गांव थे। इसी एक बात से जाना जाता है कि वे प्रसिद्ध योद्धा और महत्वाकांक्षी थे। एक ओर से मोहिल जाति गोदारों की शत्रु बनी हुई थी, दूसरी ओर से जैसलमेर के भाटी उन्हें हड़प जाना चाहते थे, तीसरी ओर स्वयं जाट उन्हें मिटाने पर तुले हुए थे और चौथी ओर से प्रबल राठौर आक्रांता आ रहे थे। ऐसी हालत में उन्होंने राठौर के साथ जो संधि की थी, उसकी शर्तें मांडलिक राजाओं से कम नहीं हैं। मुन्शी ज्वालासहाय जी ने लिखा है - बीका के वंशजों ने उन शर्तों का पालन नहीं किया। (ठाकुर देशराज,पृष्ठ.621)

गोदारों का सरदार पाण्डु जो सेखसर में रहता था और रूनियां का सरदार जो उससे दूसरे दर्जे पर था, गोदारा जाटों की सभा ने इन दोनों को बीका के पास अधीनता स्वीकार करने की बात तय करने को भेजा। उन्होंने बीका के सामने निम्न प्रस्ताव रखे-

• 1. जोहिया आदि दीगर फिरकों के मुकाबले में हमारी मदद की जाये,

• 2. पश्चिमी सीमा की हिफाजत रखें,

• 3. हमारी जमात के अधिकार और लाभों में कोई हस्तक्षेप न किया जाये, अर्थात् सुरक्षित रखें।

‘भारत के देशी राज्य’ नामक इतिहास में लिखा है कि - “बीका ने उक्त प्रस्ताव स्वीकारते हुए कहा था - ‘मैं’ तथा मेरे उत्तराधिकारी किसी भी समय तुम्हारे अधिकारों में हस्तक्षेप न करेंगे। और जब तक इस तरह राजतिलक न दिया जाएगा, तब तक राजसिंहासन सूना समझा जाएगा।”। मुन्शी ज्वालासहाय जी ‘वाकए-राजपूताना’ में आगे लिखते हैं - "इस पर गोदारों ने अपने इलाके में महसूल धुआं फी घर एक रुपया और जोता जमीन फी सौ बीघे पर दो रुपया लगान वसूल करने का अधिकार बीका को दिया।" (ठाकुर देशराज,पृष्ठ.622)

गौदारों की अनबन से बीका को बिना लड़ाई-झगड़ा किए भू-भाग व हुकूमत मिल गई। आज तक दस्तूर जारी है कि बीका की औलाद में से कोई तख्तनशीन होता है तो पांडु खानदान का कोई शख्स उसके राजतिलक करता है। उस जाट को राज पच्चीस अशर्फियां देता है। अलावा इसके जिस जमीन को बीका ने अपनी राजधानी बनाने के लिए पसन्द किया था, उसका मालिक एक नेरा जाट था। उसने भी दावा किया कि शहर के नाम के साथ मेरा नाम भी शामिल किया जाये तो वह अपने बपौता की भूमि देने को तैयार है। बीका ने उसकी शर्त को स्वीकार कर लिया। इसलिए बीका और नेरा के नाम से राजधानी का नाम बीकानेर रखा गया। बीका के वंशजों की वृद्धि के साथ-साथ पुरानी बातों को भुलाया जाने लगा, फिर भी जाटों से सत्ता प्राप्ति की याद कई अवसरों पर ताजा करली जाती है। दिवाली और होली के अवसर पर गोदारा के दोनों प्रतिनिधि शेखसर और रूनियां के जमींदार बीकानेर के राजा को टीका करते हैं। रूनियां का सरदार चाँदी की थाली में टीका की सामाग्री तैयार करता है और शेखसर का सरदार उस सामाग्री से राजा के तिलक करता है। प्रत्युत्तर में राजा दोनों प्रधानों को स्वर्ण मुद्रा और रुपये भेंट देता है। (जेम्स टोड कृत राजस्थान का इतिहास, अनुवाद कालूराम शर्मा, पृ.404-5)

ऊपर के वर्णन से मालूम होता है कि गोदारों की जो सन्धि बीकाजी के साथ हुई थी, वह सम्मानपूर्ण थी। उसमें यह कहीं भी जाहिर नहीं होता कि उन्होंने अपनी स्वाधीनता खो दी थी। यह ठीक है कि पीछे से शनैः-शनै उनकी स्वाधीनता नष्ट हो गई। कई इतिहासकारों ने राठौरों को इसके लिए दोष दिया है कि उन्होंने यह अच्छा नहीं किया कि अपने सहायक गोदारों की स्वतन्त्रता नष्ट कर दी, उन्हें ठिकानेदारों के रूप में भी नहीं रहने दिया। कुछ लोगों की ऐसी भी शिकायत है, किन्तु हम इस बात के लिए राठौर शासकों एवं बीकाजी के वंशजों को तनिक भी दोष देना उचित नहीं समझते। राजनीति में ऐसा होता है। यदि हमें भी राठौरों जैसा अवसर प्राप्त होता तो हम भी उनके साथ यही व्यवहार करते। (ठाकुर देशराज,पृ.623)


2. भाड़ंग एवं पूलासर के सारण - राठोड़ों के आगमन से पहले सारण जाटों की राजधानी तारानगर तहसील का गाँव भाड़ंग थी। खेजड़ा, फोग, बुचावास, सूई, बदनु, सिरसला आदि इस राज्य में जिलों के नाम थे। चूरू जनपद के जाट इतिहास पर दौलतराम सारण डालमाण ने अनुसन्धान किया है। पृथ्वीराज चौहान के बाद अर्थात चौहान शक्ति के पतन के बाद भाड़ंग पर किसी समय सारण जाटों का आधिपत्य स्थापित हो गया था जो 16 वीं शताब्दी में राठोडों के इस भू-भाग में आने तक बना रहा। पहले यहाँ सोहुआ जाटों का अधिकार था और बाद में सारण जाटों ने छीन लिया। जब 16 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में राठोड़ इस एरिया में आए, उस समय पूला सारण यहाँ का शासक था और उसके अधीन 360 गाँव थे। पूला सारण ने अपने नाम पर पूलासर (तहसील सरदारशहर) बसाया था जिसे बाद में सारण जाटों के पुरोहित पारीक ब्राह्मणों को दे दिया गया। पूला की पत्नी का नाम मलकी था, जिसको लेकर बाद में गोदारा व सारणों के बीच युद्ध हुआ। मलकी के नाम पर ही बीकानेर जिले की लूणकरणसर तहसील में मलकीसर गाँव बसाया गया था। सारणों में जबरा और जोखा बड़े बहादुर थे। उनकी कई सौ घोड़ों पर जीन पड़ती थी। उन्हीं के नाम पर जबरासर और जोखासर गाँव अब भी आबाद हैं, मन्धरापुरा में मित्रता के बहाने राठोडों द्वारा उन्हें बुलाकर भोज दिया गया और उस स्थान पर बैठाने गए जहाँ पर जमीन में पहले से बारूद दबा रखी थी। उनके बैठ जाने पर बारूद आग लगवा कर उन्हें उड़ा दिया गया। (डॉ. पेमाराम, पृ.30)


3. धाणसिया के सोहुआ : धाणसिया हनुमानगढ़ जिला, राजस्थान में, चुरू से लगभग 45 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित था। इस पर सोहुआ जाटों का अधिकार था। दयालदास की ख्यात के अनुसार इनका 84 गाँवों पर अधिकार था और राठोडों के आगमन के समय इनका मुखिया सोहुआ अमरा था। कहा जाता है कि पहले भाड़ंग पर सोहुआ जाटों का अधिकार था। किंवदन्ती है कि सोहुआ जाटों की एक लड़की सारणों को ब्याही थी। उसके पति के मरने के बाद वह अपने एकमात्र पुत्र को लेकर अपने पीहर भाडंग आ गयी और वहीं रहने लगी। भाड़ंग के सोहुआ जाट उस समय गढ़ चिनवा रहे थे लेकिन वह गढ़ चिनने में नहीं आ रहा था। तब किसी ने कहा कि नरबली दिए बिना गढ़ नहीं चिना जा सकता. कोई तैयार नहीं होने पर विधवा लड़की के बेटे को गढ़ की नींव में चुन दिया। वह बेचारी रो पीटकर रह गयी। गढ़ तैयार हो गया, लेकिन माँ के मन में बेटे का दुःख बराबर बना रहा। एक दिन वह ढाब पर पानी भरने गयी तो वहां एक आदमी पानी पीने आया। लड़की के पूछने पर जब आगंतुक ने अपना परिचय एक सारण जाट के रूप में दिया तो उसका दुःख उबल पड़ा। उसने आगंतुक को धिक्कारते हुए कहा कि क्या सारण अभी जिंदा ही फिरते हैं ? आगंतुक के पूछने पर लड़की ने सारी घटना कह सुनाई. इस पर वह बीना पानी पिए ही वहां से चला गया। उसने जाकर तमाम सारणों को इकठ्ठा कर उक्त घटना सुनाई। तब सारणों ने इकठ्ठा होकर भाडंग पर चढाई की। बड़ी लड़ाई हुई और अंततः भाड़ंग पर सारणों का अधिकार हो गया। इसके बाद सोहुआ जाट धाणसिया की तरफ़ चले गए और वहां अपना अलग राज्य स्थापित किया। उनके अधीन 84 गाँव थे। (डॉ. पेमाराम, पृ.31)

सहू गोत्र का प्रभावशाली शासक श्रीकर्ण था। इसी वंश के अमरसी हुए जिनको आमतौर पर अमरा कहा जाता था। वह हेमछत का पौता था। अमरा बादशाह अकबर (1542–1605) का समकालीन था। अमरा ने बादशाह अकबर को कर देना बंद कर दिया था। कहते हैं की अकबरने बीरबल की सहायता से अमरा से संधी की थी। सहू गोत्र की एक छोटी सी सेना थी, जिसमें 80 घुड़सवार थे। सहू गोत्र के प्रमुख गढ़ हैं – धानसिया, दुरजाना, भाड़ंग (चुरू)। भाड़ंग (चुरू) में इनके किले के खंडहर अभी भी मौजूद हैं। कहते है जब यह किला बनाया गया तब एक सारण गोत्र के जाट की बली दी गई थी। इस पर सारण और सहू लोगों में लड़ाई हुई जिसमें सारण विजई हुये। तब से सहू लोग गाँव छोडकर इधर-उधर चले गए। इनमे से कुछ बीबीपुर (जींद), मदनहेड़ी (हिसार) व रानीला (भिवानी) में बस गए। कुछ परिवार उत्तरप्रदेश के मेरठ जिले में आबाद हुये। कुछ मुसलमान बन गए जो अब शहीवाल पाकिस्तान में आबाद हैं। कुछ सिक्ख और बिश्नोई भी बन गए। (डॉ. जयसिंह सहू, जाट समाज आगरा, जुलाई 2015, पृ.17)

दौलतराम सारण डालमाण (धरती पुत्र, 30.12.2012, पृ. 8-10) ने सहू पट्टी का विवरण निम्नानुसार दिया है:

जनपद क्षेत्रफल राजधानी मुखिया प्रमुख ठिकाने
सहू पट्टी 84 गाँव धाणसिया (नोहर) अमरुजी सहू धाणसिया, खुईया, रायपुरा

4. सीधमुख के कसवा : सीधमुख राजगढ़ तहसील में चुरू से 45 मील उत्तर-पूर्व में बेणीवालों की राजधानी रायसलाना से 18 मील दक्षिण-पूर्व में स्थित है। कर्नल टाॅड ने यद्यपि जाटों की कसवा शाखा का उल्लेख जाटों के प्रमुख ठिकानों में नहीं किया है लेकिन दयालदास, पाऊलेट, मुंशी सोहन लाल आदि ने कसवा जाटों को प्रमुख ठिकानों में गिना है। उनके अनुसार कसवां जाटों का प्रमुख ठिकाना सीधमुख था और राठोडों के आगमन के समय कसवां कंवारपल उनका मुखिया था तथा 400 गाँवों पर उसकी सत्ता थी। (डॉ पेमाराम, पृ.31)


कसवां जाटों के भाटों तथा उनके पुरोहित दाहिमा ब्रह्मण की बही से ज्ञात होता है की कंसुपाल कसवां पड़िहार संघ छोड़कर 5000 फौज के साथ मंडोर से पहले तालछापर आए, जहाँ मोहिलों का राज था। कंसुपाल ने मोहिलों को हराकर छापर पर अधिकार कर लिया। इसके बाद वह आसोज बदी 4 संवत 1125 मंगलवार (19 अगस्त 1068) को सीधमुख आया। वहां रणजीत जोहिया राज करता था जिसके अधिकार में 125 गाँव थे। लड़ाई हुई जिसमें 125 जोहिया तथा कंसुपाल के 70 लोग मारे गए। इस लड़ाई में कंसुपाल विजयी हुए। सीधमुख पर कंसुपाल का अधिकार हो गया और वहां पर भी अपने थाने स्थापित किए। सीधमुख विजय के बाद कंसुपाल सात्यूं (चुरू से 12 कोस उत्तर-पूर्व) आया, जहाँ चौहानों के सात भाई (सातू, सूरजमल, भोमानी, नरसी, तेजसी, कीरतसी और प्रतापसी) राज करते थे। कंसुपाल ने यहाँ उनसे लड़ाई की जिसमें सातों चौहान भाई मारे गए। चौहान भाइयों की सात स्त्रियाँ- भाटियाणी, नौरंगदे, पंवार तथा हीरू आदि सती हुई। इस प्रकार कंसुपाल ने कसवां गोत्र को प्रसिद्धि दिलवाई। फाल्गुन सुदी 2 शनिवार, संवत 1150, 18 फरवरी, 1049, के दिन कंसुपाल का सात्यूं पर कब्जा हो गया। फिर सात्यूं से कसवां लोग समय-समय पर आस-पास के भिन्न-भिन्न स्थानों पर फ़ैल गए और उनके अपने-अपने ठिकाने स्थापित किए। (डॉ. पेमाराम, पृ.32)


ज्ञानाराम ब्रह्मण की बही के अनुसार कंसुपाल के बाद क्रमशः कोहला, घणसूर, महसूर, मला, थिरमल, देवसी, जयसी और गोवल सीधमुख के शासक हुए। गोवल के 9 लडके थे- चोखा, जगा, मलक, महन, ऊहड, रणसी, भोजा और मंगल। इन्होने अलग अलग ठिकाने कायम किए जो इनके थाम्बे कहे जाते थे।

चोखा के अधिकार में 12 गाँव यथा दूधवा, बाड़की, घांघू, लाघड़िया, सिरसली, सिरसला, बिरमी, झाड़सर, भुरड़की इत्यादि।

बरगा के अधिकार में हड़ियाल, महणसर, गांगियासर, लुटू, ठेलासर, देपालसर, कारंगा, कालेराबास (चुरू का पुराना नाम) आदि।

रणसी के अधिकार में जसरासर, दूधवामीठा, रिड़खला, सोमावासी, झारिया, आसलखेड़ी, गिनड़ी, पीथीसर, धीरासर, ढाढर, बूंटिया इत्यादि।

जगा के अधिकार में गोंगटिया, बीगराण, मठौड़ी, थालौड़ी, भैंरूसर, इन्दरपुरा, चलकोई आदि तथा

ऊहण के अधिकार में नोपरा, जिगासरी, श्योरा टाडा, मुनड़िया, रुकनसर आदि। इसी प्रकार अन्य थामों के नाम और गाँवों का वर्णन है।

परवाना बही राज श्रीबिकानेर से भी ज्ञात होता है की चुरू के आसपास कसवां जाटों के अनेक गाँव रहे थे यथा चुरू (एक बास), खासोली, खारिया (दो बास), सरसला, पीथुवीसींसर, आसलखेड़ी, रिड़खला (तीन बास), बूंटिया, रामसरा, थालोड़ी, ढाढर, भामासी, बीनासर, बालरासर, भैंरुसर (एक बास), ढाढरिया (एक बास) धान्धू, आसलू, लाखाऊ, दूधवा, जसरासर, लाघड़िया, चलकोई आदि। भाटों की बही के अनुसार कंसुपाल के एक वंशज चोखा ने संवत 1485 माघ बदी 9 शुक्रवार (31 दिसम्बर 1428) को दूधवाखारा पर अधिकार कर लिया। (डॉ. पेमाराम, पृ.32)


विक्रम की 16 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अन्य जाट राज्यों के साथ कसवां जाटों के राज्य को भी राठोडों ने अधिकृत कर लिया। यद्यपि मूल रूप में कसवां जाटों के प्रमुख सीधमुख के कंवरपाल ने राठोडों की अधीनता ढाका युद्ध (1488 ई.) के बाद ही स्वीकार कर ली थी, लेकिन हो सकता है कि बाकी कस्बों के स्थानीय ठिकानों पर छोटे-मोटे भूस्वामी काबिज बने रहे हों, जिन्हें हराकर राठोडों ने शनैः शनैः उन सब ठिकानों पर अधिकार कर लिया। (डॉ. पेमाराम, पृ.32)


5. सूई और पल्लू के सिहाग' : सूई चुरू से उत्तर-पश्चिम में 58 मील दूर तथा गोदारा जाटों के ठिकाने शेखसर से 12 मील उत्तर-पूर्व में लूणकरणसर तहसील में है। यह सिहाग जाटों की राजधानी थी और यह प्रदेश सियागगोटी कहलाता था। दयालदास ने इनके गाँवों की संख्या 140 लिखी है जबकि कर्नल टाड व ठाकुर देशराज ने इनको असिहाग लिखा है तथा इनके गाँवों की संख्या 150 बताई है जिन पर इनका अधिकार था। ठाकुर देशराज व दयालदास के अनुसार इनकी राजधानी पल्लू थी। और राजा का नाम चोखा था। इनके राज्य की सीमा में रावतसर, बीरमसर, दांदूसर, गण्डेली आदि थे। सिहागों का दूसरा ठिकाना संभवतः पल्लू रहा हो जो सूई से कुछ मील दूर नोहर तहसील में है। (डॉ. पेमाराम, पृ. 34)


चौहानों के काल में पल्लू जैन धर्म का एक प्रमुख केन्द्र था, जहाँ से 11 वीं शताब्दी की अनेक मूर्तियाँ मिली हैं जिनमें एक राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली व एक बीकानेर संग्रहालय में है। कहा जाता है कि पहले इसका नाम कोट-किलूर था जो बादमें इस ठिकाने के जाट सरदार की लड़की के नाम पर पल्लू हो गया। पल्लू के बारे में एक कथा प्रचलित है कि मूगंधड़का नामक जाट का कोट किलूर पर अधिकर था। उसने डरकर दिल्ली के साहब नामक शहजादे से अपनी बेटी पल्लू का विवाह कर दिया। लेकिन वह मन से नहीं चाहता था, अतः उसने अपने दामाद को भोजन में विष देदिया जो अपने महल में जाकर मरगया। कुछ देर बाद जाटने अपने बेटे को पता लगाने के लिए भेजा कि साहब मरगया या नहीं। उसने जैसे ही महल की खिड़की में मुंह डाला, क्रुद्ध पल्लू ने उसका सिर काट लिया और उसकी लाश को महल में छुपा लिया। इस प्रकार बारी-बारी से उसने पांचो भाइयों को मार दिया, इस पर जाट ने कहा-

जावै सो आवै नहीं, यो ही बड़ो हिलूर (फितूर)। के गिटगी पल्लू पापणी, के गिटगो कोट किलूर ।।

पल्लूकोट के सुहाग : पल्लू के संबंध में हमें सुहाग गोत्र के इतिहास से विवरण मिलता है। कोड खोखर नामका सरदार उदयपुर रियासत में रहता था। वह चौहान संघ में था और वहाँ से चलकर ददरेड़े नामक गाँव में आ बसा। बाद में वह पल्लूकोट में आ बसा इस वंश के लोग पहले मेवाड़ कोडखोखर नामक स्थान पर सरदारी करते थे। कुछ समय के पश्चात् मारवाड में पहुंचकर एक किला बनवाया उसका नाम अपने सरदार पहलू के नाम पर पहलूकोट (पल्लूकोट) रखा। पल्लूकोट और ददरेड़े के आस-पास कुल भूमि पर आधिपत्य जमा लिया। सरदार पहलू अथवा पल्लू राणा की उपाधि थी। उससे पहले इसी वंश के वीर राणा और धीर राणा ने मेदपाट की भूमि पर राज किया था। (ठाकुर देशराज, पृ.596-597)

विक्रम की 16 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अन्य जाट ठिकानों की तरह पल्लू व सूई पर भी राठोड़ों का अधिकार हो गया। कहते हैं कि सिहाग जाटों ने बाद में भी सरलता से राठोड़ों की अधीनता स्वीकार नहीं की थी। तब सिहाग जाटों को धोखे से बुलाकर एक बाड़े में खड़ा करके जला दिया गया था। (डॉ. पेमाराम, पृ. 34)

सिहाग नरेश चोखाजी के बारे में एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है। एक बार गोदारा नरेश ने सिहाग नरेश को चिड़ाने के लिए एक दूत भेजा। उस समय सिहाग नरेश चोखाजी पल्लू के पास देवासर गाँव में एक तालाब पर स्नान कर रहे थे। जब चोखाराम जी स्नान कर पूजा में ध्यानमग्न थे तब दूत उनके पास आया और कहा कि मैं गोदारा नरेश का दूत हूँ, मुझे भेंट दीजिये। चोखाजी ने जबाब दिया कि आपको भोजन करना है तो तैयार हो जाएगा परन्तु मैं भेंट नहीं देता। दूत ने वैसा ही कहा जैसा उसको आदेशित किया गया था कि आप कैसे राजा हैं? इस पर चोखा रामजी ने चुल्लूभर पानी लिया और दूत पर फैंक दिया और कहा कि यह भेंट लो और अब जाओ। दूत आश्चर्य चकित रह गया जब पानी सोने की असर्फियों में बदल गया। जब दूत गोदारा नरेश के पास लोटा तो उसने सुनाया -

सियागां मैं सम्प घणों, दूजी जात न जोड़ । सियाग चोखै दान दियो, छपन लाख करोड़ ।।


6. रायसलाणा के बेणीवाल: रायसलाणा चुरू से 50 मील उत्तर-पूर्व में और सारण जाटों के ठिकाने भाड़ंग से 18 मील उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह बेणीवाल जाटों की राजधानी था। बेणीवालों के कितने गाँव थे, इसके बारे में इतिहासकारों में बड़ा मतभेद है। ठाकुर देशराज ने बेणीवालों के गाँवों की संख्या 84, चारण रामनाथ रत्नू ने 40, और मुंशी ज्वालासहय ने वाकए राजपूताना में 150 दी है। दयालदास ने अपनी ख्यात में संख्या 360 गाँवों के होने का उल्लेख किया है। राठोड़ों के आगमन के समय इनका सरदार रायसल था। रायसल की बेटी मलकी का विवाह भाड़ंग के सरदार पूला सारण के साथ हुआ था। इसी मलकी के अपहरण काण्ड को लेकर गोदारों का शेष सब जाटों से युद्ध हुआ था और अंत में सीधमुख के पास ढाका नमक स्थान पर जो लड़ाई हुई, उसमें गोदारों के सहायक राठोड़ों की विजय हुई थी, जिसके परिणाम स्वरूप रायसलाणा के ठिकाने पर भी राठोड़ों का अधिकार हो गया था। (डॉ. पेमाराम, पृ.35)


7. झासल और राजगढ़ के पूनिया – कैप्टन दलीपसिंह अहलावत लिखते हैं कि पूनिया लोगों का स्वतन्त्र राज्य काला सागर के निकट लघु एशिया में था। ये लोग अमू दरिया के निकट क्षेत्र में भी रहे हैं। पूनिया व तोखर जाट छठी शताब्दी ई० पू० यूरोप में भी थे। चन्द्रवंशी राजा वीरभद्र के पुत्र पौनभद्र के नाम से यह पौनिया या पूनिया जाटगोत्र प्रचलित हुआ। इस वंश को हिसार गजेटियर ने शिवगोत्री और महादेव से उत्पन्न लिखा है। (दलीपसिंह अहलावत, पृ.219)

दूसरे जाट वंशों की भांति समय अनुसार पौनिया जाट भी विदेशों से अपने पैतृक देश भारतवर्ष में लौट आये। ये लोग भारतवर्ष के उत्तर-पश्चिमी दर्रों से आये। पहले ये लोग इसी पश्चिमी सीमा में बस गये। इसके प्रमाण इस बात से हैं कि आज भी पौनिया जाटों की संख्या पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर बसे हुए बन्नूं, डेरा ईस्माइलखान, डेरा गाजीखान, डेरा फतहखान नगरों में हैं। ये डेरा नाम वाले तीनों किले पौनिया जाट राजा जसवन्तसिंह ने अपने तीन पुत्रों सहित इस्लाम में प्रवेश करने पर बनवाये थे। डेरा इस्माइलखान के किले पर यह लेख लिखा हुआ है। वहां पर एक कहावत भी प्रचलित है कि “मान पैनिया चट्ठे, खानपीन में अलग-अलग लूटने में कट्ठे।” अर्थात् ये तीनों गोतों के जाट मान, पूनिया और चट्ठा उधर के आतंककारी बहुसंख्यक गिरोह थे। उस क्षेत्र में मान और चट्ठा मुसलमानधर्मी जाटों की भी बड़ी संख्या है। (दलीपसिंह अहलावत, पृ.220)

भारत की पश्चिमी सीमा से चलकर पौनिया जाटों का एक बड़ा दल जांगल प्रदेश (राजस्थान) में ईस्वी के आरम्भिक काल में पहुंच गया था। इन्होंने इस भूमि पर पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्तिम काल तक राज्य किया था। जोधपुर नाम से प्रसिद्ध हो जाने वाले देश से पौनिया जाटों ने दहिया लोगों को निकाल दिया था। जिस समय राठौरों का दल बीका और कान्दल के संचालन में जांगल प्रदेश में पहुंचा था उस समय पौनिया जाट सरदारों के अधिकार में 300 गांव थे। इनके अतिरिक्त जांगल प्रदेश में पांच राज्य जाटों के और थे। पौनिया के 300 गांव परगनों में बांटे हुए थे जिनके नाम - 1. भादरा 2. अजीतगढ़ 3. सीधमुख 4. ददरेवा 5. राजगढ़ 6. साकू थे। ये बड़े नगर थे जिनमें किले बनाये गये थे। इन जाटों का यहां प्रजातंत्र राज्य था। उस समय इनकी राजधानी झासल थी जो कि हिसार जिले की सीमा पर है। (दलीपसिंह अहलावत, पृ.220)

चौधरी कन्हैयालाल पूनिया ने लिखा है कि... लगभग 900 साल पहले श्री उतगर के दो संतान पैदा हुई जिसमें से एक का नाम बाढ़ तथा दूसरे का नाम मेर था। बाढ़देव का जन्म विक्रम संवत 1154 (1097 ई.) कार्तिक सुदी पूर्णिमा को पुणे महाराष्ट्र में हुआ। बाढ़देव ने विक्रम संवत 1184 (1127 ई.) आषाढ़ सुदी नवमी वार शनिवार को बाड़मेर की स्थापना की। बाढ़ और मेर दोनों भाईयों के नाम पर आज के बाढ़मेर का नामकरण हुआ। कालांतर में दोनों भाईयों के झगड़े का फायदा उठाकर सोढ़ा राजपूतों ने उस पर कब्जा कर लिया। बाढ़देव उत्तर भारत की ओर प्रस्थान कर गए। उनकी सन्ताने पूनिया कहलाई और मेर महाराष्ट्र में मेरठा (मराठा) के नाम से जाने गए। (चौधरी कन्हैयालाल पूनिया, पृ.16)

बाढ़देव बाड़मेर से विक्रम संवत 1235 (1178 ई.) में पुष्कर आए और आगे जीनमाता के स्थान पर हर्ष के पहाड़ पर शिव मंदिर बनवाया। जीनमाता ने बाढ़देव को वरदान स्वरूप एक पत्थर शीला दी और कहा कि यह जहां गिरे वहीं पर नीम की हरी शाखा काटकर डालना वह संजीवनी हो जाएगी तथा वहीं आपका राज्य सदा-सदा के लिए कायम रहेगा। पूनिया गोत्र आज भी उस शीला का आदर करता है। उस पर स्नान नहीं करते। (चौधरी कन्हैयालाल पूनिया, पृ.16)

विक्रम संवत 1245 (1188 ई.) मिति चैत्र सुदी 2 वार शनिवार को पूनिया गोत्र के आदि पुरुष बाढ़देव ने झांसल में अपने प्रसिद्ध गणराज्य की नींव रखी। विक्रम संवत 1245 से 1822 के राठोडों के साथ राजीनामे तक पुनिया आज के हिसार-पिलानी-चुरू-तारानगर एवं भादरा तक काबिज रहे। इस बीच राज्य कायम रखने के समकालीन संघर्षों में पुनियों की राजधानी झांसल से लूदी में तब्दील करनी पड़ी। पडोस के दईया सरदार दीर्घपाल पर विजय, रठौड़ों और गोदारों की संयुक्त सेना के साथ लगातार संघर्ष, जबरिया राठौड़ शासक रायसिंह द्वारा धर्मभाई बनाने का बुलावा देकर धोके से पूनिया सरदारों चेचू और खेता को अपने राजगढ़ वाले किले की नींव में दबाने का बदला राठौड़ रायसिंह के वध से लेने आदि की ऐतिहासिक घटनाऐं हुई। इस कालावधि में कान्हादेव पूनिया गोत्र का इतिहास प्रसिद्ध योद्धा बनकर उभरा जिसने लूदी में अपना स्वतंत्र गढ़ निर्माण किया। लगभग 360 गांवों का यह पूनिया गणराज्य अंतत: जोधपुर शासन के विस्तार हेतु कांधल और बीका तथा जाट गणराज्यों की फूट का शिकार हो गया। (चौधरी कन्हैयालाल पूनिया, पृ.16)

राठौड़ नरेश रायसिंह के वध के बाद पोनियागढ़ का नाम राजगढ़ रख दिया। रामरत्न चारण ने “राजपूताने के इतिहास” में इन राज्यों का वर्णन किया है और पौनिया जाटों की राजधानी लुद्धि नामक नगर बताया है। लूद्दी चुरू से 38 मील उत्तर-पूर्व में और सीधमुख से 16 मील दक्षिण-पूर्व में राजगढ़ कसबे के पास है। यह पूनिया जाटों की राजधानी थी। किसी समय लूद्दी स्मृद्ध कस्बा रहा होगा, लेकिन अब यह अति साधारण गाँव है। पूनियों के अधीन 360 गाँव थे। ठाकुर देशराज ने लिखा है कि पूनिया जांगल देश में ईसा के प्रारम्भिक काल में पहुँच गए थे। उन्होने इस भूमि पर 16 वीं सदी के पूर्वार्ध तक राज किया। रठोड़ों के आगमन के समय इनका राजा कान्हादेव था। कान्हा बड़ा स्वाभिमानी योद्धा था। उसने राव बीका की अधीनता स्वीकार नहीं की। अंत में राठोडों ने उसके दमन के लिए उनके एरिया में गढ़ बनाना प्रारंभ किया। दिन में राठोड़ गढ़ बनाते थे और पूनिया जाट रात को आकर गढ़ ढहा देते थे। कहा जाता है कि राजगढ़ के बुर्जों में कुछ पूनिया जाटों को चुन दिया गया था। बड़े संघर्ष के बाद ही पूनियों को हराया जा सका था। पूनियों ने राठोड नरेश रामसिंह को मारकर बदला चुकाया।

यह बदला लेने की बात “भारत के देशी राज्य” इतिहास में भी लिखी हुई है। पौनियों की पुरानी राजधानी झांसल में जहां उनका किला था, कुछ निशान अब तक भी हैं। बालसमंद में भी ऐसे ही चिह्न पाये जाते हैं। राठौरों के राजा पूनिया लोगों को खुश करने के लिए इनके मुखियों को दस पौशाक और कुछ नकद प्रतिवर्ष दिया करते थे। पौनिया जाटों की हार होने पर कुछ ने तो वह मरुभूमि छोड़ दी और बहुत से शासित रूप से वहीं रहते रहे। वहां पौनियागढ़ का नाम बदलकर राजगढ (शार्दूलपुर) रखा गया जिसके चारों ओर 100 गांव पौनिया जाटों के अब भी बसे हैं। बीकानेर से चलकर चौ० नैनसुख पौनिया अपने एक संघ के साथ गुड़गांवा होता हुआ मुरादाबाद पहुंच गया। वहां नैनसुख ने पौनियों की “मुरादाबाद रियासत” की स्थापना की। (दलीपसिंह अहलावत, पृ.221)

उत्तरप्रदेश में पौनिया जाटों की बड़ी संख्या है। मुरादाबाद जिले में 2 गांव, मेरठ जिले में 10 गांव, अलीगढ़ जिले में सासनी के समीप 10 गांव हैं और अलीगढ़ जिले की अतरौली तहसील में “पौनियावाटी” सुप्रसिद्ध है, जहां के पौनिया जाटों के 84 गांव मुगल पतनकाल में सर्वथा स्वतंत्र हो गये थे। आगरा जिले में टूण्डले के समीप पौनियों की एक टीकरी नाम की अच्छी रियासत थी। चुलाहवली, मदावली, बलिया नंगला यहां के प्रसिद्ध गांव इनके हैं। बुलन्दशहर जिले में पौनियों का मण्डौना गांव बड़ा प्रसिद्ध है। (दलीपसिंह अहलावत, पृ.221)

जालन्धर जिले में 9 गांव पौनियां सिख जाटों के हैं। अम्बाला में नूरपुर, जांडली, मानका, हिसार में लाडवा, सातरोड कलां व खुर्द, हांसी के पास खरक पूनिया, सिरसाना, विदयान खेड़ा, ज्ञानपुरा, मतलौहडा और सरेरा गांव पौनिया जाटों के हैं। जिला पटियाला (पहले रियासत पटियाला) में भी बहुत गांव पौनिया जाट सिक्खों के हैं। भिवानी जिले (पूर्व जींद रियासत) में 150 गांव पौनियां जाटों के हैं। पाकिस्तान में पौनिया जाट बड़ी संख्या में आबाद हैं। पौनिया जाटों के राजा पौन का यज्ञवाला एक एक शिलालेख जिला देहरादून (उ० प्र०) में चूहदपुर के समीप जगतग्राम में मिला है। इन लोगों का राज्य यमुना किनारे जगाधारी के निकट क्षेत्र पर था। (दलीपसिंह अहलावत, पृ.221)

पौनिया जाट हिन्दू, सिक्ख और मुसलमान तीनों धर्मानुयायी हैं। अन्य जाटवंशों (गोत्रों) की अलग-अलग जनगणना में पौनिया जाटवंश के लोग सबसे अधिक संख्या में हैं। परन्तु प्रतिष्ठा (सम्मान) की दृष्टि से सब जाटवंश (गोत्र) एक समान हैं चाहे उनकी जनसंख्या कम हो या अधिक हो। (दलीपसिंह अहलावत, पृ.221)

जोहिया वंश के जाट: कुलडिया, कुहाड़, दूलड़, भाटी, मोहिल, खीचड़,

जाटों में इस समय जोहिया (यौधेय) के जो वंशज हैं वे कुलरिया, कुहाड़, महिला (महला), माहिल, खीचड़ आदि कहलाते हैं। (डॉ पेमाराम, p.14)। इनके गणराज्यों का विवरण नीचे दिया गया है:

कुलडिया (c.11 ई.): यह जोहिया जाटों की एक शाखा है। इनका इतिहास इनके डूम, सांसी और भाटों से मिलता है। मरुधर देश की भूमि पर वहिपाल नाम का जोहिया सरदार कोट मरोट नामक गढ़ में बैठकर मारवाड़ के एक बड़े हिस्से पर राज करता था। हिसार में जो सूबेदार उनके समय में था उससे वहिपाल की लड़ाई हुई। यह घटना ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी के बीच की है। कोट-मरोट का राज्य इस लड़ाई में इनके हाथ से निकल गया। तब वहिपाल ने काठोद में जाकर राज्य कायम किया। यह स्थान अजमेर से सात-आठ कोस की दूरी पर पच्छिम की ओर है पहाड़ों से सुरक्षित स्थान में रहते हुए इसके वंशजों ने कोलीय में एक अपना किला स्थापित कर लिया। इसी बीच में कोइल पट्टान के राजा ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। भाट ग्रन्थों में लिखा है - “इनकी कुल देवी पाड़ा ने उस कोइल पट्टन के राजा को परास्त करके इनको छुड़ा लिया।” और डीडवाना को अपनी राजधानी बनाया, फिर वहीं पर वहिपाल की और उस देवी की मूर्ति स्थापित की। इनका राज कोलीय से लेकर डीडवाना तक था। चूड़ी और सांगासी में फैल गया। शेखावतों ने अपने समय में इन लागों की स्वतंत्रता नष्ट कर दी। डीडवान के आस-पास राठौरों ने इनके सरदारी तंत्र के जनपद मिटा दिये। (ठाकुर देशराज,पृ.606-7)

कुहाड़, दूलड़, भाटी जाट वंश - ये जोहिया जाटों की शाखा हैं। कुहाड़, दूलड़, जाट गोत्र पूर्व में भाटी संघ में शामिल थे। भटनेर और भटिण्डा पर जाट भाटियों का और जैसलमेर के विशाल प्रदेश पर राजपूत भाटियों का राज रहा है। हांसी और हिसार कभी जाट और कभी राजपूतों के कब्जे में एक लम्बे अरसे तक रहे हैं। ‘वाकए-राजपूताना’ के लेखक ने भाटी जाटों के राज्य के विषय में इस प्रकार लिखा है- "भटनेर जो अब रियासत बीकानेर का भाग है पुराने जमाने में जाटों के दूसरे समूह की राजधानी था। यह जाट ऐसे प्रबल थे, कि उत्थान के समय में बादशाहों का मुकाबला किया और अब आपत्ति आई हाथ सम्भाले। कहा जाता है कि भटनेर का नाम भाटियों से जो कि उनमें अवस्थित हुए थे, सम्बन्ध नहीं रखता है, किन्तु किसी प्रसिद्ध रईस के वरदाई अर्थात् भाट से निकला है। उसको यह मुल्क प्रदान हुआ और उसने कवियों के खानदान को प्रसिद्ध करने के अभिप्राय से, बतौर संस्थापक के अपनी रियासत का पेशे के नाम से नामकरण किया। किन्तु ‘वाकआत जैसलमेरी’ में लिखा है कि भाटियों की आबादी की वजह से इस इलाके का नाम भटनेर हुआ। ‘भारसुथल’ के प्राचीन भूगोल के आधार पर उत्तरी हिस्से का नाम नेर है और जब भाटियों की चन्द शाखाओं ने इस्लाम-धर्म को स्वीकार किया तो अपने नाम से अकार को निकाल दिया, इस तरह भट और नेर मिलकर भटनेर हो गया। जो लोग मध्य-एशिया से भारत पर आक्रमण करते थे, उनके मार्ग में स्थित होने से भटनेर ने इतिहास में भारी प्रसिद्धि प्राप्त की है। विश्वास है कि जाटों ने सिन्ध नदी की नाविक लड़ाई में महमूद गजनवी से मुकाबला होने से पहले ही पंजाब के जंगलों में बस्तियां आबाद कर दी थीं। यह भी विश्वास है कि महमूद से सैकड़ों वर्ष पहले जाट शासक थे। जिस समय शहाबुद्दीन ने भारत को विजय किया था, उससे सिर्फ बारह वर्ष बाद सन् 1205 में उसके उत्तराधिकारी कुतुब को मजबूरन उत्तरी जंगलों के जाटों से बजात खुद लड़ना पड़ा। अभागी रजिया बेगम, फीराज-आजम के योग्य उत्तराधिकारी ने दुश्मन के खौफ से तख्त छोड़कर जाटों की शरण ली। उन्होंने संयोग से गकरों की कुल फौज इकट्ठी करके उक्त मलिका की इम्दाद में शत्रु पर चढ़ाई की। उसके भाग्य में शत्रुओं पर विजय पाना था, किन्तु वे बैर लेने में नेकनामी से मारे गये। फिर 1397 ई. में तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया, तब मुल्तान-युद्ध में अड़चन और कष्ट पहुंचाने के कारण उसने भटनेर पर हमला किया। कुल कौम का कत्ल करके मुल्क को प्रकाश रहित कर दिया। सारांश यह है कि भट्टी और जाट ऐसे मिले-जुले हैं कि उनमें भिन्नता करना कठिन है।"(ठाकुर देशराज,पृ.601)


तैमूर के हमले के थोड़े दिन बाद एक गिरोह ने अपनी हुकूमत को वापस लेने के लिए मारोट और फूलरा से निकलकर भटनेर पर हमला किया। उस समय भटनेर में तैमूर या दिल्ली के बादशाह का हाकिम शासन करता था। भटनेर उनके हाथ में आ गया। इस सरदार का नाम वीरसिंह या वैरीसाल था जिसने कि फिर से भटनेर को अपने कब्जे में कर लिया था। वैरीसाल ने सत्ताईस वर्ष हुकुमत की और उसका बेटा भारू उसके बाद भटनेर का शासक हुआ। वैरीसाल के समय में चगताखां ने दिल्ली के बादशाह से मदद लेकर भटनेर पर चढ़ाई की। दो बार तो उन्हें हारकर लौटना पड़ा। तीसरी बार फिर चढ़ाई की। भटनेर के लोग हमलों से तंग आ गये थे, इसलिए भारू ने सुलह के लिए प्रार्थना की। कहा जाता है कि आखिर में भारू और उसके साथी मुसलमान हो गए। जब राठौर प्रबल हुए तो उनके सरदार रायसिंह ने भटनेर को जीत लिया। (ठाकुर देशराज,पृ.602)


मुन्शी ज्वालासहाय जी ‘वाकए राजपूताना’ के लेखक ने आगे लिखा है- "हाकरा नदी के आसपास बहुत से खंडहर पाये जाते हैं। रंगमहल के मकानात जो दिखाई पड़ते है बहुत जमाने के हैं। धांधूसर जो कि भटनेर से दक्षिण 25 मील के फासले पर है, उसके सम्बन्ध में एक भटनेर निवासी सज्जन ने बतलाया था कि यह कस्बा कभी सिकन्दर के आक्रमण के समय पूरा रईस था। x x अगर कोई हांसी व हिसार की ओर से बीकानेर में प्रवेश करे तो इन मशहूर खंडहरों के सम्बन्ध की कहावतों की बखूबी जानकारी हासिल कर सकता है, जो पुराने जमाने में परमार, जोहिया अथवा जाट रईसों के महल की बुनियाद थी। इधर से यात्री को काफी ऐतिहासिक सामग्री मिल सकती है। अमौर, बंजीर का नगर, रंगमहल, सोदल (सूरतगढ़) माचूताल, रातीबंग, बन्नी, मानिकखर, सूर सागर, कालीबंग, कल्यान सर, फूलरा, मारोट, तिलवाड़ा, गिलवाड़ा, भामेनी, कोरीवाला, कुल ढेरनी, नवकोटि, मासका ये ऐसे स्थान हैं जिनमें से अधिकांश के सम्बन्ध में काफी ऐतिहासिक सामग्री मिल सकती है।"(ठाकुर देशराज,पृ.602)


‘वाकए-राजपूताना’ के लेख से जहां यह बात प्रकट होती है कि जाटों का एक बडे़ प्रदेश पर लम्बे समय तक राज रहा है तथा उन्होंने प्रत्येक आक्रमणकारी मुसलमान विजेता से सामना किया है, वहां जाट-राज्यों के सम्बन्ध में यह बात भी इस लेख से मालूम हो जाती है कि ये जाट-राज्य सब प्रकार से समृद्धिशाली थे। उनके समय में कला-कौशल की भी वृद्धि हुई। यही तो कारण था कि सिकंदर ने आने के समय उनका धांधूसर नामक नगर पूरे वैभव पर पाया गया। उनकी राजधानियों में जहां सरदारों के रहने के लिए अच्छे-अच्छे राज-भवन थे, वहां प्रजा के सुख के लिए तालाब भी थे। पशुओं के लिए वे काफी गोचर भूमि छोड़ते थे। (ठाकुर देशराज,पृ.602)


खास भटनेर से भाटी जाटों की हुकूमत यद्यपि अकबर के समय अर्थात् सत्राहवीं सदी में नष्ट हो गई थी, किन्तु फिर भी वे जांगल तथा ढूंढार पंजाब के बहुत से भू-भाग को विभिन्न स्थानों पर दबाये रहे। अठारहवीं सदी में कुहाड़वास और उसके प्रदेश पर कुहाड़सिंह और उसका पुत्र पन्नेसिंह शासक था। हालांकि यह उनकी बहुत ही छोटी रियासत थी। आगे चलकर कुहाड़सर के भाटी कुहाड़ नाम से प्रसिद्ध हुए। शेखावाटी के लोक-सेवक कुंवर पन्नेसिंह जी से कुहाड़ का शासक पन्नेसिंह 15 पीढ़ी पहले हुआ था। कुहाड़ों की भांति पंजाब से सरककर दूलड़ भाटियों ने भी एक छोटा-सा राज्य स्थापित कर रखा था। मालवा में भी वे चुप नहीं बैठे रहे। भूमि पर कब्जा करके अपने प्रभुत्व को जमाने का अधिकार तो उन्होंने अब तक नहीं छोड़ा है। भाट लोगों की शाखा ने गोरीर और सिंधाना के निकट की भूमि पर प्रभुत्व स्थापित किया ऐसा भी भाट-ग्रन्थों में वर्णन मिलता है। (ठाकुर देशराज,पृ.603)


मोहिल-महला-माहिल - दलीप सिंह अहलावत लिखते हैं: यह चन्द्रवंशी जाटवंश है जिसका प्राचीनकाल से शासन रहा है। ये चौहान शासक संघ में शामिल हो गए थे। रामायणकाल में इनका जनपद पाया जाता है। महाभारत भीष्मपर्व 9-48 के अनुसार माही और नर्मदा नदियों के बीच इनका जनपद था। यह जनपद गुजरात एवं मालवा की प्राचीन भूमि पर था। पं० भगवद्दत्त बी०ए० ने अपने ‘भारतवर्ष का इतिहास’ में इनके इस जनपद को इन्हीं दोनों नदियों के बीच का क्षेत्र लिखा है। टॉड और स्मिथ ने इस जनपद को सुजानगढ़ बीकानेर की प्राचीन भूमि पर अवस्थित लिखा है। जैमिनीय ब्राह्मण 1-151, बृहद्दवेता 5-62, ऋक्सर्वानुक्रमणी 5-61 के अनुसार अर्चनाना, तरन्त पुरुमीढ़ नामक तीन मन्त्रद्रष्टा-तत्त्वज्ञ कर्मकाण्डी माहेय ऋषियों का वर्णन मिलता है। (दलीप सिंह अहलावत, पृ.250)

मोहिल जाटवंश ने बीकानेर राज्य स्थापना से पूर्व छापर में जो बीकानेर से 70 मील पूर्व में है और सुजानगढ़ के उत्तर में द्रोणपुर में अपनी राजधानियां स्थापित कीं। इनकी ‘राणा’ पदवी थी। छापर नामक झील भी मोहिलों के राज्य में थी जहां काफी नमक बनता है। कर्नल जेम्स टॉड ने अपने इतिहास के पृ० 1126 खण्ड 2 में लिखा है कि “मोहिल वंश का 140 गांवों पर शासन था। 140 गांवों के जिले (परगने) - छापर (मोहिलों की राजधानी), हीरासर, गोपालपुर, चारवास, सोंदा, बीदासर. लाडनू, मलसीसर, खरबूजाराकोट आदि। जोधा जी के पुत्र बीदा (बीका का भाई) ने मोहिलों पर आक्रमण किया और उनके राज्य को जीत लिया। मोहिल लोग बहुत प्राचीनकाल से अपने राज्य में रहा करते थे। पृ० 1123.(दलीप सिंह अहलावत, पृ.250)

मोहिलों के अधीश्वर की यह भूमि माहिलवाटी कहलाती थी।” जोधपुर के इतिहास के अनुसार राव जोधा जी राठौर ने माहिलवाटी पर आक्रमण कर दिया। राणा अजीत माहिल और राणा बछुराज माहिल और उनके 145 साथी इस युद्ध में मारे गये। राव जोधा जी राठौर की विजय हुई। उसी समय मोहिल फतेहपुर, झुंझुनू, भटनेर और मेवाड़ की ओर चले गये। नरवद माहिल ने दिल्ली के बादशाह बहलोल लोधी (1451-89) से मदद मांगी। उधर जोधा जी के भाई कांधल के पुत्र बाघा के समर्थन का आश्वासन प्राप्त होने पर दिल्ली के बादशाह ने हिसार के सूबेदार सारंगखां को आदेश दिया कि वह माहिलों की मदद में द्रोणपुर पर आक्रमण कर दे। जोधपुर इतिहास के अनुसार कांधलपुत्र बाघा सभी गुप्त भेद जोधा जी को भेजता रहा। युद्ध होने पर 555 पठानों सहित सारंगखां परास्त हुआ और जोधा जी विजयी बने। कर्नल टॉड के अनुसार जोधा के पुत्र बीदा ने मोहिलवाटी पर विजय प्राप्त की। राव बीदा के पुत्र तेजसिंह ने इस विजय की स्मृतिस्वरूप बीदासर नामक नवीन राठौर राजधानी स्थापित की। तदन्तर यह ‘मोहिलवाटी’ ‘बीदावाटी’ के नाम से प्रसिद्ध की गई। इस प्रदेश पर बीदावत राजपूतों का पूर्ण अधिकार हो गया। राजपूतों ने इस प्राचीनकालीन मोहिलवंश को अल्पकालीन चौहानवंश की शाखा लिखने का प्रयत्न किया। किन्तु इस वंश के जाट इस पराजय से बीकानेर को ही छोड़ गये। कुछ राजपूत भी बन गये। माहिलों की उरियल (वर्तमान उरई-जालौन) नामक रियासत बुन्देलखण्ड में थी। आल्हा काव्य के चरितनायक आल्हा, उदल, मलखान की विजयगाथाओं से महलाभूपत के कारनामे उल्लेखनीय हैं। बिल्कुल झूठ को सत्य में और सत्य को असत्य में परिणत करने की कला में ये परम प्रवीण थे। जाट इतिहास उत्पत्ति और गौरव खण्ड पृ० 105 पर लेखक ठा० देशराज ने मलखान को वत्स गोत्र का जाट लिखा है। (दलीप सिंह अहलावत, पृ.251)

इस माहिल वंश के जाट राणा वैरसल के वंशज मेवाड़ में बस गये तथा शेष माहिल लोग पंजाब, हरयाणा, बृज, रुहेलखण्ड के विभिन्न जिलों में आबाद हो गये। भाषाभेद से इस वंश को कई नामों से पुकारा जाता है जैसे पंजाब में माहे-माहि-माहिय और बृज से मध्यप्रदेश तक महला-मोहले तथा हरयाणा, यू० पी० में माहिल मोहिल कहा जाता है। माहिल वंश की शाखा.... 1. गोधारा (गोदारा), 2. महनार्या। (दलीप सिंह अहलावत, पृ.251)

सिद्धमुख के खीचड़: खीचड़ों का इतिहास एवं वंशावली की जानकारी प्रबोध खीचड़, खीचड़ों की ढाणी, बछरारा, रतनगढ़, चुरू, राजस्थान द्वारा ई-मेल से उपलब्ध कराई है। (Mob: 9414079295, Email: prabodhkumar9594@gmail.com)

खीचड़ों का गोत्र-चारा: नख - जोईया, वंश - सूर्यवंशी क्षत्रीय, गुरु - वशिष्ठ (रामचन्द्र जी के गुरु), शाखा - माधनिक, निकास - कोट मलोट (मुक्तसर पंजाब), राजा - श्योसिंह अथवा शिवसिंह, राजधानी - कोट मलोट (मलौट पंजाब), कुलदेवी - कोटवासन माता (माता का धाम हींगलाज क्वेटा पाकिस्तान में)

कोट-मलौट के राजा: विक्रम संवत 1015 (959 ई.) में क्षत्रिय जाति के राजा शिवसिंह राज करते थे। इनकी राजधानी कोट-मलौट थी जो अब मुक्तसर पंजाब में है। सन् 959 ई. में यवनों ने इस राजधानी पर आक्रमण किया। यवनों की सेना बहुत विशाल थी परिणाम स्वरूप शिवसिंह को कोट-मलोट (मलौट पंजाब) छोडना पड़ा। राजा शिवसिंह अपने 12 पुत्रों के साथ आकर सिद्धमुख (चुरू) में रहने लगे। राजा शिवसिंह के सबसे बड़े पुत्र खेमराज थे। बड़वा के अनुसार इनके वंशजों से खीचड़ गोत्र बना। खेमराज के वंशजों ने सर्वप्रथम कंवरपुरा गाँव बसाया। (तहसील: भादरा, हनुमानगढ़)। राजा शिवसिंह के पुत्रों से निम्न 12 उपगोत्र निकले -

  • 1. खेमराज की सन्तानें खीचड़ कहलाई जिन्होने कंवरपुरा गाँव बसाया (तहसील: भादरा, हनुमानगढ़)
  • 2. बरासी की सन्तानें बाबल कहलाई जिन्होने बरासरी (जमाल) गाँव बसाया
  • 3. मानाजी की सन्तानें मांझु, सिहोल और लूंका कहलाई
  • 4. करमाजी की सन्तानें करीर कहलाई
  • 5. करनाजी की सन्तानें कुलडिया कहलाई
  • 6. जगगूजी की सन्तानें झग्गल कहलाई
  • 7. दुर्जनजी की सन्तानें दुराजना कहलाई
  • 8. भींवाजी की सन्तानें भंवरिया कहलाई
  • 9. नारायणजी की सन्तानें निराधना कहलाई
  • 10. मालाजी की सन्तानें मेचू कहलाई

शिवसिंह के 12 पुत्रों में से 2 की अकाल मृत्यु हो गई थी। शेष 10 में से उपरोक्त गोत्र बने। मानाजी की तीन शादियाँ हुई थी जिनकी सन्तानें मांझु, सिहोल और लूंका कहलाई। इस प्रकार 12 भाईयों से उपरोक्त 12 गोत्र बने। इस प्रकार उपरोक्त 12 गोत्र एक ही नख जोहिया, एक ही वंश सूर्यवंशी, एक ही गुरु वशिष्ठ, कुलदेवी कोटवासन माता जो हिंगलाज (क्वेटा पाकिस्तान में है) व भैरव का नाम भीमलोचन है। यहाँ सती का ब्रह्मरंध्र गिरा था।

दक्षिण की और प्रस्थान - कोट मलौट छूटने के बाद सब बारह भाई सिधमुख आए। खेमराज जी की संतान खीचड़ कहलाई। खेमराज का बड़ा पुत्र कंवरसिंह था जिसके नाम से कंवरपुरा (भादरा) बसाया जो आज भी है। कंवरसिंह के दश-बारह पीढ़ियों के बाद इनको कंवरपुरा छोडना पड़ा। वहाँ 12 वर्ष तक अकाल पड़ा। ये दक्षिण की और झुंझुनु नवाव की रियासत में चले गए। इनके वंशजों ने वहाँ कई गाँव बसाये।

चौहान संघ के जाट: बुरड़क, सुहाग, रोज, भूकर, डूडी, मोठसरा, दहिया, भड़िया

जाट इतिहास लिखते समय उन जाट गोत्रों को छोड़ दिया गया जो नवगठित राजपूत क्षत्रीय वर्ग के किसी शासक संघ में सम्मिलित हो गए। ददरेवा के चौहान भी वास्तविक रूप में जाट ही थे जैसा कि बुरड़क इतिहास की खोज से सपष्ट होता है। चौहान संघ के जाट गणराज्यों का संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है:

ददरेवा के बुरड़क (975-1258 ई.): बुरड़क चौहान शासक संघ में शामिल हो गए थे। चौधरी बालणसिंह बुरड़क साम्भर से उठकर आये और माघ सुदी बसंत पंचमी के दिन संवत 821 (765 ई.) को बालरासर गाँव बसाया। गाँव से उत्तर दिशा में बालाणु नाम से जोहड़ खुदवाया। इसके नीचे सवा पांच सौ बीघा जमीन छोड़ी। शिव बद्रीनारायण का मंदिर बनवाया। संवत 825 (768 ई.) में बालरासर से उठकर चौधरी मालसिंह ने चैत सुदी राम-नवमी के दिन कारी गाँव बसाया। गोपीनाथजी का मंदिर बनवाया। कारंगा गाँव से आथुनी सवा दो सौ बीघा जमीन बीरभाण चोहान के समय छोड़ी। संवत 835 (778 ई.) में कारी गाँव हांसी के राव राजा बीरभाण चुहान के अधीन था। राजा रतनसेण के बिरमराव पुत्र हुए। बिरमराव ने अजमेर से ददरेवा आकर राज किया। बिरमराव की शादी वीरभाण की बेटी जसमादेवी गढ़वाल के साथ हुई। इनसे तीन पुत्र उत्पन्न हुए: 1. सांवत सिंह, 2. सबलसिंह, 3. अचल सिंह। सबलसिंह के बेटे आलणसिंह और बालणसिंह हुए। सबलसिंह ने जैतारण का किला संवत 938 (881 ई.) में आसोज बदी 10 को फ़तेह किया। इनके अधीन 240 गाँव थे। सबलसिंह के बेटे आलणसिंह के पुत्र राव बुरडकदेव, बाग़देव, तथा बिरमदेव पैदा हुए। आलणसिंह ने संवत 979 (922 ई.) में मथुरा में मंदिर बनाया तथा सोने का छत्र चढ़ाया। ददरेवा के राव बुरडकदेव के तीन बेटे समुद्रपाल, दरपाल तथा विजयपाल हुए। ददरेवा के राव बुरडकदेव (1000 ई.) महमूद ग़ज़नवी के आक्रमणों के विरुद्ध हिन्दुशाही राज्य के राजा जयपाल की मदद के लिए लाहोर गए। वहां लड़ाई में संवत 1057 (1000 ई.) को वे जुझार हुए। इनकी पत्नी तेजल शेकवाल ददरेवा में तालाब के पाल पर संवत 1058 (1001 ई.) में सती हुई। राव बुरडकदेव के बड़े पुत्र समुद्रपाल राजा जयपाल के पुत्र आनंदपाल की मदद के लिए 'वैहिंद' (पेशावर के निकट) गए और वहां पर जुझार हुए। संवत 1067 (1010 ई.) में इनकी पत्नी पुन्याणी साम्भर में सती हुई। समुद्रपाल संभवत: गुजरात के समुद्री किनारे के किसी भू-भाग के शासक रहे हैं। अनुसंधान में बोडकदेव नामक स्थान अहमदाबाद के पश्चिम में वस्त्रापुर झील किनारे पाया गया है। इस प्रकार बुरड़क गोत्र के दो पूर्वज शासकों ने महमूद ग़ज़नवी के विरुद्ध लड़ते हुये जान गंवाई है। ददरेवा पर जब आक्रमण बढ़ गए तो इन्होने अपनी राजधानी अनंतगोचार में सीकर के पास सुरक्षित स्थान सरणाऊ में बनाई। (बड़वा भवानीसिंह राव, गाँव-महेशवास, तहसील- फूलेरा, जिला-जयपुर की बही)

इतिहासकार अनंतगोचार को हर्ष के आस-पास का क्षेत्र मानते हैं। अनंतगोचार में जाटों के छोटे-छोटे कई गणराज्य थे। (रतनलाल मिश्र,पृ.37 -38)। बुरडक जाटों का ठिकाना सरणाऊ तहसील दांतारामगढ जिला सीकर में था। दिल्ली पति महीपाल तंवर के अधीन सरनाउ को रावराजा बुरड़कों की राजधानी संवत 1032 (975 ई.) में बनाया। बुरड़कों की राजधानी सरनाऊ संवत 1032 से संवत 1315 (975 - 1258 ई.) तक रही। संवत 1315 (1258 ई.) में सरनाऊ दिल्ली के बादशाह शमसुद्दीन इलतुतमिश (1211–1236) के पुत्र नसिरुदीन महमूद (1246–1266) के अधीन हुई। बादशाह ने गानोड़ा गाँव के ढाका मोमराज को मनसबदार बनाया। उस समय सरनाऊ कोट राजधानी चौधरी कालूरामजी बुरडक के पुत्र पदमसिंहजी बुरडक तथा जगसिंहजी बुरडक के अधिकार में थी। इस जागीर में 84 गाँव थे। मोम राज ढाका ने संवत 1308 से 1315 के बीच 6 बार बुरड़कों पर हमला किया पर बुरड़क अविजित रहे। अंत में एक भेदिये की सूचना पर संवत 1315 (1258 ई.) की आसोज माह के अमावस को सभी बुरड़क जब निशस्त्र हालाणी बावडी पर श्राध के लिये एकत्रित हुये उस समय मोमराज ढाका ने 25000 की फ़ौज लेकर उनपर तोपों से हमला किया। सभी बुरड़क मारे गए और किला नष्ट कर दिया गया। सरनाउ-कोट के राजा 'पदम सिंह की खर्रा गोत्र की पत्नी, जिसका नाम रम्भा था, वह उस समय सरनाउ-कोट से बाहर अपने पीहर खर्रा का गोठडा गयी हुई थी। रम्भा बच गयी। वह उस समय तीन माह की गर्भवती थी। गोसाईंजी के आशीर्वाद से चैत सुदी नवमी संवत 1316 को रम्भा को 10 बजे खर्रा के गोठडा डूंगर की घाटी पर एक लड़का हुआ। उसका नाम नानक रखा. नानक के बड़े होने पर उसकी शादी कुशलजी तेतरवाल की बेटी मानकौरी से की। सभी बुरड़क नानकजी से फले-फूले हैं। (बड़वा भवानीसिंह राव, गाँव-महेशवास, तहसील- फूलेरा, जिला-जयपुर की बही)

पल्लूकोट के सुहाग (1300 ई.): कोड खोखर नामका सरदार उदयपुर रियासत में रहता था। वह चौहान संघ में था और वहाँ से चलकर ददरेड़े नामक गाँव में आ बसा। बाद में वह पल्लूकोट में आ बसा इस वंश के लोग पहले मेवाड़ कोडखोखर नामक स्थान पर सरदारी करते थे। कुछ समय के पश्चात् मारवाड में पहुंचकर एक किला बनवाया उसका नाम अपने सरदार पहलू के नाम पर पहलूकोट (पल्लूकोट) रखा। पल्लूकोट और ददरेड़े के आस-पास कुल भूमि पर आधिपत्य जमा लिया। सरदार पहलू अथवा पल्लू राणा की उपाधि थी। उससे पहले इसी वंश के वीर राणा और धीर राणा ने मेदपाट की भूमि पर राज किया था। (ठाकुर देशराज, पृ.596-597)

पंडित अमीचन्द्र शर्मा (जाट वर्ण मीमांसा, पृ.34) ने सुहाग गोत्र की वंशावली निम्नानुसार दी है। कोड खोखर के 4 पुत्र हुये – 1. मान, 2. सुहाग, 3. देसा, 4. दलाल ।

1. मान की संतान मान गोत्र के जाट कहलाए, 2.सुहाग की संतान सुहाग गोत्र के जाट कहलाए, 3. देसा से देसवाल गोत्र के जाट कहलाए, 4. दलाल से दलाल जाट गोत्र प्रचलित हुआ।

सुहाग गोत्र के विख्यात जाट ने मातनहेल गाँव बसाया। जो अब जिला झज्जर में है। मातनहेल गाँव के सुहाग गोत्री जाटों की वंशावली निम्नानुसार है:

1 वीर राणा (1300 ई.), 2 धीर राणा (1325 ई.), 3 पल्लू राणा (1350 ई.), 4 कोड खोखर राणा (1375 ई.), 5 सुहाग (1400 ई.), 6 बाह (1425 ई.), 7 खुतेसा (1450 ई.), 8 खोखू (1475 ई.), 9 मैयल (1500 ई.), 10 महन (1525 ई.), 11 रत्न (1550 ई.), 12 बालू (1575 ई.), 13 कैंबो (1600 ई.), 14 नासी (1625 ई.), 15 मालम (1650 ई.), 16 सहवाज़ (1675 ई.), 17 बाग्घो (1700 ई.), 18 कल्ला (1725 ई.), 19 महासिंह (1750 ई.), 20 आलम (1775 ई.), 21 हठिया (1800 ई.), 22 दुल्लो (1825 ई.), 23 साहिब सुख (1850 ई.), 24 नत्थन सिंह जैलदार (1875 ई.), 25 रतिया (1900)

यह मानकर की रतिया लेखक का समकालीन होने से वर्ष 1900 ई. से एक पीढ़ी का काल 25 वर्ष मानते हुये उपरोक्त पीढ़ियों की काल गणना की जावे तो वीर राणा का काल लगभग 1300 ई. आता है।

रोज (855 ई.): रोज चौहान शासक संघ में शामिल हो गए थे। रोज गोत्र के जाटों का प्रवाह बीकानेर की ओर से मारवाड़ की तरफ है. 855 ई. में रोहितास नाम के सरदार ने रोजास नामक गाँव को आबाद किया था। उसके ही वंशज छाजूजी ने छाजोली गाँव बसाया था जो नागौर परगने में है। इस तरह रोजास (बीकानेर) से लेकर छाजोली (नागौर) तक रोज गोत्र के जाटों का राज था। छाजूजी के पोत्र चावड जी ने कठोती गाँव आबाद किया था। इनके वंशज छाजोली, कचरास, सांडिला, खाटू, खूनखुना आदि में आबाद हैं। जब राठोड इस इलाके में आये तो इनकी प्रभुता समाप्त हो गयी। (डॉ. पेमाराम, पृ.22)

भुखरेड़ी के भूकर – भूकर चौहान शासक संघ में शामिल हो गए थे। चूरु जिले में स्थित भुखरेड़ी गाँव का संबंध भूखर गोत्र के इतिहास से है। ठाकुर देशराज के अनुसार आरम्भ में यह साँभर के निकट आबाद थे। इनके राज्य की शैली भोमिया चोर की थी, किन्तु आगे चलकर अन्य लोगों से यह जमीन का कर लेने लग गए। इससे इनका नाम भूमि-कर लेने से भूकर हुआ।चाहुमान के वंशजों का एक दल नवीं शताब्दी में जब साँभर की ओर आया तो इन्हें नये धर्म में दीक्षित चौहनों ने वहां से निकल जाने पर बाध्य कर दिया। कहा जाता है, भूकर और चौहान उस समय तक एक ही थे जब तक कि चौहान लोग आबू के यज्ञ में जाकर नवीन हिन्दू धर्म में दीक्षित न हुए थे। भाट लोगों के हस्त-लिखित ग्रन्थों में लिखा हुआ है कि खेमसिंह और सोमसिंह दो भाई थे। इन्ही की अध्यक्षता में भूकर लोगों ने सांभर प्रदेश को प्रस्थान कर दिया।हिरास नामक स्थान बसाकर खेमसिंह के साथी अपना प्रभाव बढ़ाने लगे। सोमसिंह ने जंगलदेश में पहुंचकर भूकर नाम से नगर भुखरेड़ी बसाया। कई पीढ़ियों के बाद इनमें से कुछ लोग पानीपत की ओर चले गए और कुछ सीकर जिले के गाँव गोठड़ा भुखरान चले गए। गोठड़ा भुखरान के चौधरी रामबक्ष उसी खानदान में से थे। चौधरी रामबक्स एवं उनके पुत्र पृथ्वी सिंह ने शेखावाटी किसान आंदोलन में महती भूमिका अदा की। (ठाकुर देशराज,पृ.597-598)

गाजसर एवं सहजूसर के डूडी - डूडी चौहान शासक संघ में शामिल हो गए थे। चूरू के उत्तर की तरफ पास में ही गाजसर नामक गाँव बसा हुआ है। यह गाँव भालेरी - चूरू सड़क मार्ग पर बसा है। इसको डूडी जाटों ने बसाया था। इसके संस्थापक गजा डूडी थे। इनके नाम से गाँव का नाम गाजसर पड़ा। गजा और सहजा दो भाई थे। सहजा ने सहजूसर गाँव बसाया। गजा डूडी के एक लड़की थी, जिसका नाम आभलदे था। एक दिन सुबह के समय आभलदे कुएं से सर पर दोघड़ लेकर आ रही थी। रास्ते में एक सांड और झोटा लड़ रहे थे। तभी एक बारात उधर से आई। वह बारात सांड और झोटा की लड़ाई देखकर रुक गयी। आभलदे ने सर पर रखे दोघड़ सहित ही सांड और झोटे को अलग कर दिया। इस पर बारातियों ने कहा - इस युवती से पैदा होने वाला बच्चा अवश्य वीर होगा। आभलदे की शादी मंगल सारण शायद भाडंग (तारानगर) गाँव में हुई थी। गाजसर गाँव के सात बास थे। यहाँ एक बड़ा गढ़ बताते हैं जो अब नष्ट हो गया है। यह गाँव चूरू से पहले का बसा हुआ है। यह लगभग 625 विक्रम संवत (568 ई.) पूर्व का है। इस तिथि के संबंध में गहन अनुसंधान की आवश्यकता है। बडवा के अनुसार डूडीयों का निकास गाजसर से होना बताया है। (उद्देश्य, जून-2013, पृ.189)

डूडी गोत्र के बड़वा के अनुसार चौहान वंश में राव डेडराज ने डीडीयासर गाँव बसाया और इस गोत्र को प्रसिद्धि दिलवाई। देवसी डीडीयासर गाँव संवत 1290 (1233 ई.) में छोडकर गाँव जल को आया। चौधरी गजसिंह ने संवत 1352 में गाँव जल छोड़ दिया और गजसर बसाया। चौधरी सीतराम ने गजसर छोडकर बैसाख सुदी तीज संवत 1422 तदनुसार 1365 ई. को सीतसर गाँव (त: रतनगढ़) बसाया। सीतसर में लगभग 300 डूडी गोत्र के परिवार हैं। सुजानगढ़ तहसील में रणधीसर की पहाड़ी पर इनकी कुलदेवी है। (बड़वा छोटूसिंह राव, दादिया, अजमेर)

बीदासर के मोठसरा - मोठसरा चौहान शासक संघ में शामिल हो गए थे। मोठसरा गोत्र के बड़वा के अनुसार किसी समय में सुजानगढ़ तहसील के गाँव बीदासर में मोठसरा जाटों की पट्टी थी। बीदावतों के साथ प्रारम्भिक युद्ध में उनको हरा दिया था परंतु राठोड़ शक्ति बढने पर मोठसरा जाटों को यहाँ से भालेरी के लिए पलायन करना पड़ा। बाद में वहाँ से नहराना (भादरा तहसील) चले गए जहां अब भी वे निवासरत हैं।

मालासी के दहिया - दहिया चौहान शासक संघ में शामिल हो गए थे। सुजानगढ़ तहसील के मालासी गाँव को मालाराम दहिया जाट ने बसाया था । माला राम ने यहाँ एक कुँआ बनाया । माला राम दहिया के वंशज आज भी इस गाँव में काफी संख्या में बसते हैं । कहते हैं कि दहिया जाट की पुत्री को लेने जवाई आया । जवाई का नाम रिक्ता राम था । रिक्ता राम हंसमुख और मिलन सार नौजवान थे । ससुराल में शाम को औरतें कुकड़ला गीत गाने लगीं । सालियों और सालों को मजाक सूझी । वे रिक्ता राम को कुंवे पर ले गए और कुवें में उलटा लटका दिया । मजाक में जीजा रिक्ता राम के हाथ छूट गए और रिक्ता राम कुए में जा गिरा । उसके प्राण पखेरू उड़ गए । आस पास के गांवों के लोग इकट्ठे हुए और एक राय से फैसला किया कि जवाई रिक्ता राम प्रेम के प्रतीक के रूप में कुर्बान हुए अतः ये बाल बच्चों के देवता माने जायेंगे । तभी से उन्हें 'रिक्त्या भैरू' के रूप में पूजा जाता है । नवजात बच्चों का जडूला यहाँ इस गाँव के कुए पर चढाया जाता है । यहाँ हरयाणा, पंजाब, दिल्ली, आसाम, मध्य प्रदेश, गुजरात तक के श्रद्धालु आते हैं ।


ठठावता के भड़िया - भड़िया चौहान शासक संघ में शामिल हो गए थे। रतनगढ़ तहसील के गाँव ठठावता के भड़िया गोत्र के अभिलेख बड़वा से प्राप्त नहीं हुये परंतु जनश्रुति के अनुसार गाँव ठठावता 12 वीं सदी के अंत में ठठा नाम के भड़िया गोत्री वीर जाट सरदार द्वारा बसाया गया था। गाँव के चारों ओर ठठा भड़िया ने भाई बहनों के नाम चारागाह जमीन छोड़ी गई जिनके नाम हैं – किसनाणु, गोगाणु, रामाणी, उकलाई, हिराणु आदि। वर्तमान में ठठावता में कोई भड़िया नहीं रहता है। भड़िया गोत्र के अभिलेख बड़वा से प्राप्त कर गहन अनुसंधान की आवश्यकता है। भड़िया गोत्री जाटों ने पश्चात में सीकर जिले के रोल और बांठोद गाँव भी बसाये।

जाटों के अन्य ठिकाने: जाखड़, भादू, नैण, चाहर, कालेर, सींवर, घनघस, गुलेरिया

जांगल देश के 7 बड़े जाट जनपदों और चौहान संघ में शामिल जाटों के अलावा अन्य कुछ शाखाओं के ठिकाने भी थे जिनका विवरण नीचे दिया गया है।

रिड़ी-बिग्गा के जाखड़ (985 ई.): कैप्टन दलीपसिंह अहलावत लिखते हैं कि जाखड़ जाटवंश (गोत्र) दहिया जाटवंश की तरह ही वैदिककाल से है। इस वंश का संचालक राजा वीरभद्र का पुत्र जखभद्र था। जाखड़ चन्द्रवंशी हैं। जाखड़ एक प्रसिद्ध गोत्र है। आरम्भ में जाखड़ जाटों का दल शिवालिक की पहाड़ियों एवं हिमालय पर्वत की दक्षिणी तलहटी में रहा। अपने देश भारतवर्ष से ये लोग विदेशों में गये और वापिस लौटकर आ गये, इसका कुछ संक्षिप्त ब्यौरा इस प्रकार से है - महाभारत और मार्कण्डेय पुराण का हवाला देकर बी० एस० दहिया ने लिखा है कि “जाखड़ लोग कश्मीर के उत्तर में दूर मध्य एशिया बल्ख के क्षेत्र में निवास करते थे। ये अपने केसरिया रंग के लिए सदियों तक प्रसिद्ध रहे। इसका वर्णन महाभारत में भी है।” इससे साफ है कि जाखड़ लोग कश्मीर के रास्ते से वहां पर गये। समय के अनुसार अन्य जाटों की तरह जाखड़ जाट भी अपने पैतृक देश भारतवर्ष में लौट आए। इनका पश्चिमी घाटियों से होकर भारतवर्ष में आना सिद्ध होता है। इन लोगों ने विदेशी आक्रमणकारियों का समय-समय पर मुकाबला इन ही पश्चिमी घाटियों पर किया। जाखड़ जाट अफगानिस्तान, सिन्ध प्रान्त और पश्चिमी पाकिस्तान में बसे और वहां से इनकी कुछ संख्या राजस्थान में जाकर बस गई। वहां पर इन लोगों ने कई स्थानों पर राज्य किया। (दलीपसिंह अहलावत, पृ.217)

मि० डब्ल्यू क्रुक साहब ने अपनी पुस्तक “उत्तरी-पश्चिमी प्रान्त और अवध की जातियां” में लिखा है कि “द्वारिका के राजा के पास एक बड़ा भारी धनुष और बाण था। उसने प्रतिज्ञा की थी कि उसे कोई तोड़ देगा, उसका दर्जा राजा से उंचा कर दिया जाएगा। जाखड़ ने उस भारी कार्य की चेष्टा की और असफल रहा। इसी लाज के कारण उसने अपनी मातृभूमि को छोड़ दिया और बीकानेर में आ बसा।” इस कहानी से साफ है कि जाखड़ गोत्र (वंश) का एक जाट राजा था जिसका राज्य गुजरात में कहीं था। इससे पहले जाखड़ लोगों का अजमेर प्रान्त पर राज्य था। यह भाट ग्रन्थों में लिखा है। जाखड़ राजा बीकानेर में आकर कहां बसा, इसका पता “जाट वर्ण मीमांसा” के लेखक पंडित अमीचन्द शर्मा ने दिया है कि “जाखड़ राजा ने रेणी को अपनी राजधानी बनाया।” जाखड़ लोगों का राज्य मढौली पर भी था। मढौली जयपुर राज्य में मारवाड़ सीमा के आस-पास थी। उस समय फतेहपुर के आस-पास मुसलमान राज्य करते थे। इन मुसलमानों और जाखड़ों का युद्ध मढौली के पास हुआ था। (दलीपसिंह अहलावत, पृ.217)

जाखड़ जाटों के बीकानेर में भी कई छोटे-छोटे राज्य थे। जब राजस्थान में राजपूतों के राज्य स्थापित हो गये तब जाखड़ जाटों का एक दल रोहतक जिला (हरयाणा) में आ गया। इनका नेता लाढसिंह था। यहां पर जाखड़ों ने साहलावास, लडान आदि बहुत गांव बसाये। लाढसिंह बहादुर ने एक बड़े क्षेत्र पर जाखड़ जाटों का राज्य स्थापित किया जिसकी राजधानी लडान थी। दिल्ली के बादशाह की ओर से बहू झोलरी पर एक मुसलमान नवाब का शासन था। उसने बड़ी शक्तिशाली सेना के साथ जाखड़ों पर आक्रमण कर दिया और लडान पर अधिकार कर लिया। नवाब की सेना ने जाखड़ों के गांव को लूटना शुरु कर दिया और उन पर हर प्रकार के अत्याचार करने आरम्भ कर दिये। जाखड़ों के बुलावे पर डीघल गांव के जाट वीर योद्धा बिन्दरा के नेतृत्व में अहलावत जाटों का एक दल जाखड़ों से आ मिला। इन दोनों वंशों के जाटवीरों ने मुसलमान सेना एवं नवाब को मौत के घाट उतार दिया और बहू-झोलरी के किले पर अधिकार कर लिया। एक पठान सैनिक की गोली लगने से बिन्दरा वहीं पर शहीद हो गया। इस तरह से जाखड़ वीरों ने लडान का अपना राज्य फिर वापिस ले लिया और इनके बहुत से गांव आराम से बस गये थे। जाटों की शक्ति से डरकर दिल्ली का बादशाह जाखड़ों पर आक्रमण करने का साहस न कर सका। आई-ने-अकबरी में लिखा है कि जाखड़ों के नेता वीर लाढसिंह ने पठानों और दिल्ली के बादशाहों से युद्ध करके अपनी वीरता का प्रमाण दिया। (दलीपसिंह अहलावत, पृ.218)

इस तरह जाखड़ों के कई सरदारों ने औरंगजेब के समय तक राजस्थान और पंजाब के अनेक स्थानों पर राज किया। अन्तिम समय में इनके सरदारों के पास केवल चार-चार अथवा पांच-पांच गांव के राज्य रह गये थे। जाखड़ पाकिस्तान में सिंध व बिलोचिस्तान के प्रान्तों में बड़ी संख्या में हैं जो मुसलमान हैं। राजस्थान-बीकानेर आदि कई स्थानों पर बसे हुए हैं। इनके कुछ गांव अलवर एवं जयपुर में भी हैं। अलवर के चौ० नानकसिंह जाखड़ आर्यसमाज के सेक्रेटरी (मन्त्री) थे और जयपुर के माखर गांव के चौ० लाधूराम जाखड़ शेखावाटी जाट पंचायत के प्रधान थे। कश्मीर में जाखड़ मुसलमान हैं। (दलीपसिंह अहलावत, पृ.218)

हरयाणा प्रान्त के रोहतक जिले में जाखड़ जाटों के गांव निम्न प्रकार से हैं - राजस्थान से जिला रोहतक में जाखड़ जाटों का एक दल आया। उसका नेता चौ० लाढसिंह था। उसी के नाम पर यहां उसने सबसे पहले लडान गांव बसाया। यह जाखड़ों की राजधानी थी। लडान गांव से जाखड़ों के अन्य गांव बसे। आज यहां जाखड़ जाटगोत्र के 19 गांव हैं। इनके अतिरिक्त 19 गांव अन्य जाटगोत्र और दूसरी जातियों के जाखड़ खाप में शामिल हैं। इस तरह से जाखड़ खाप के 38 गांव हैं। जाखड़ खाप का प्रधान गाँव लडान रहता आया है। जाखड़ खाप की प्रधानता आज भी लडान गांव में ही है। (दलीपसिंह अहलावत, पृ.218)

रिड़ी-बिग्गा के जाखड़ जाटों का ठिकाना बिग्गा तहसील डूंगरगढ़ में था. इनका गोत्र पड़िहार बतलाया गया है. कहते हैं कि कोलियोजी पड़िहार पहले पहल मंडोर से आकर ग्राम केऊ तहसील डूंगरगढ़़ में बसा था. इसका बेटा जक्खा हुआ जिसने अपने नाम पर जाखासर बसाया. कहते हैं उसने अपने परिवार के रिश्ते वहां बसे जाटों में करने आरंभ कर दिए थे तथा 'नए जाट गोत्र' जाखड़ का जनक कहलाया. उसकी एक लड़की का नाम रिड़ी था, जिसके नाम पर रिड़ी गाँव बसाया. जक्खा का बेटा मैहन था, जिसका बेटा बिग्गा बड़ा शूरवीर हुआ. इसी के नाम पर बिग्गा गाँव बसा. कहते हैं कि बिग्गा ने गायों की रक्षा के लिए राठ मुसलमानों से युद्ध किया जिसमें गैरक्षार्थ वह संवत 1393 (1336) में काम आया. पाऊलेट ने बीकानेर गजेटियर में बिग्गा की म्रत्यु का समय 1315 दिया है. बिग्गाजी का जन्म विक्रम संवत 1358 (1301) में रिड़ी में हुआ रहा. बिग्गा और उसके आसपास के एरिया में बिग्गा गोरक्षक लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं. गाँव बिग्गा व रिड़ी में जाखड़ जाटों का भोमिचारा था और लंबे समय तक जाखड़ों का इन पर अधिकार बना रहा. (डॉ पेमा राम, पृ.35)

भादरा के भादू: महाभारतकालीन जनपदों में भद्रक लोगों का भी वर्णन आता है। महाभारत सभापर्व (II.13.25) में उल्लेख है की भद्रक लोग जरासंध के भय से पश्चिम की तरफ पलायन कर गए थे। ये जाटवंश अवश्य ही जांगल देश के भादरा नगर के क्षेत्र में रहे होंगे और निश्चित ही भादरा इनकी राजधानी रही होगी। भादरा से जोधपुर और अजमेर की ओर इनका बढ़ना पाया जाता है। ये लोग शान्तिप्रिय पाये जाते हैं और अब भादू और कहीं-कहीं भादा कहलाते हैं। (दलीपसिंह अहलावत, पृ.195)

बौद्ध ग्रंथ महावंश अध्याय-13,14 और सांची के स्तूप पर बौद्ध शिलालेखों में भी इनका उल्लेख मिलता है। महाभारतकाल में भारतवर्ष के जनपदों में भारद्वाज जाट जनपद भी था। (भीष्मपर्व, अध्याय 9) भदावर के प्रदेश का शासक जाट क्षत्रिय समुदाय भादू, भदौरिया, भदौतिया नाम से प्रसिध हुआ। यह लोग सपेऊ, सादावाद के मध्य 8 बड़े खेड़ों और जिला मथुरा के बहुत से गांवों में बसे हुए हैं। खौण्डा गांव के ठा० तोताराम ने तोसागढ़ी बसाई जो ठाकुर लालसिंह के पुत्र ठाकुर छत्तरसिंह के द्वारा भव्यभवन और कच्ची गढ़ी बनवाने पर छत्तरगढ़ी के नाम से प्रसिद्ध हुई। भादू नाम से प्रसिद्ध जाटों के बीकानेर राज्य में बहुत से गांव हैं (दलीपसिंह अहलावत, पृ.295)

जांगल देश को भादरा, भादू लोगों ने बसाया था जो आरम्भ में भादरा कहलाता था। संमतराज नाम का राजा बड़ा दानी हुआ है। वह भादू लोगों का एक प्रसिद्ध राजा हुआ है। भागोरे नामक लोगों से उसका युद्ध हुआ था। उस युद्ध के पश्चात् इन लोगों का दल मारवाड़ की ओर चला गया। अजमेर-मेरवाड़े में भी कई गांवों पर इन्होंने अधिकार कर लिया, जो कि अकबर के समय में इसके साथ से निकल गए थे। (ठाकुर देशराज, पृ.596)

नैण: नैन अत्यंत प्राचीन गोत्र है. कई शताब्दी ईशा पूर्व जाटों के छः वंश शिवी, सुरावी, किम्ब्री, हेमेंद्री, कलि व बैन हरिवर्ष (यूरोप) गए थे उनमें नैन भी थे. हेमेंद्री गोत्र की ही एक शाखा नैन थे. नैन ही डेनमार्क व इंग्लैंड में नॉर्मन, नरगर कहलाये. 326 ई.पू. सिकंदर के भारत आक्रमण के समय उनके साथ उनकी प्रेमिका/पत्नी महारानी ताया भी थी. सिकंदर ने पोरस के साथ हुए समझोते को तोड़ा और पोरस को विध्वंश कर जाट युवतियों को बंदी बनाया तो सिकंदर को सबक सिखाने तक्षिला विश्वविद्यालय के चार स्नातकों ने सिकंदर की महारानी ताया का अपहरण किया था. इनमें देवका नैन भी एक था. (भलेराम बेनीवाल, पृ.717)

जाट इतिहासकार भले राम बेनीवाल ने अपनी पुस्तक 'जाट योद्धाओं का इतिहास' में इस गोत्र का विस्तार से वर्णन किया है. उनके अनुसार यह चंद्रवंशी गोत्र है. यह जाटों के प्राचीनतम गोत्रों में से एक है. भले राम जी, ठाकुर देशराज के तंवर गोत्र से उत्पति के प्रमाण से सहमत नहीं हैं. नैन गोत्र इससे पहले भी अस्तित्व में था. राजस्थान में भिरणी गाँव जिला हनुमानगढ़ और बालेवास जिला हनुमानगढ़, राजस्थान में प्रचलित कहानी सच प्रतीत होती है. शमशेर सिंह पुत्र बलदेव सिंह अपनी 33 पीढियों का खुलासा करते हैं जो सभी राजा अनंगपाल तोमर से जाकर मिलती हैं. राजा अनंगपाल के कोई लड़का नहीं था. जिस समय उनकी आयु 90 वर्ष थी उस समय ईरान देश के निष्कासित राजा क़यामत खां अपनी बेगम व जवान पुत्री शाहबानो के साथ अनंगपाल के दरबार में आया, वह जाट कौम का था और उसके परिवार ने 8 वीं सदी में इस्लाम ग्रहण किया था. क़यामत खां की जवान बेटी को हिन्दू बनाकर उसका नाम बदल कर सुमन देवी रखा और उससे शादी की थी तब उससे एक लड़का पैदा हुआ था. राजा के कुल पुरोहितों ने राजा को सलाह दी कि यह बच्चा राज्य के लिए अहितकर है. इस कारण राजा ने आया को हुक्म दिया कि उस बालक की हत्या कर दे लेकिन उस आया के मन में रहम आ गया तथा उस अबोध बालक को 'गौर' (गोबर आदि फैंकने का स्थान) में फेंक दिया. जब एक कुम्हार व कुम्हारी गौर में पहुंचे तो उन्होंने उस बालक को उठा लिया तथा गौर में मिलने के कारण इनका नाम गौर सिंह रखा जो बाद में मोहम्मद गौरी के नाम से प्रसिद्ध हुआ. वह दिल्ली के राजा अनंगपाल का इकलोता पुत्र था तथा उसका गोत्र नैन था. इस गोत्र के बारे में जो वंशावली जाट इतिहास एवं समकालीन सन्दर्भ के लेखक प्रताप सिंह शास्त्री ने दी है वह शमशेर सिंह गाँव धमतान साहब जिला जींद, हरियाणा द्वारा दी गयी से मेल खाती है. आज नैनों के 52 गाँव नरवाना क्षेत्र, पूरे हरयाणा, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं. (भलेराम बेनीवाल, पृ.716)

ठाकुर देशराज के अनुसार 'नेन' शाखा अनंगपाल के एक वंशज नैनसी के नाम पर चली. कालांतर में ये लोग डूंगरगढ़ तथा रतनगढ़ तहसील में आकर आबाद हुए. इनमें श्रीपाल नामक व्यक्ति का जन्म संवत 1398 (1341 ई.) में हुआ, जिनके 12 लड़के हुए, जिनमें राजू ने लद्धोसर, दूला ने बछरारा , कालू ने मालपुर, हुक्मा ने केऊ, लल्ला ने बीन्झासर और चुहड़ ने चुरू आबाद किया. नैन गोत्र जाट यहाँ के प्राचीन निवासी हैं. (ठाकुर देशराज, बिकानेरीय जागृति के अग्रदूत चौधरी हरिश्चंद्र नैन, पृ. 335-337)

ठाकुर देशराज ने लिखा है ....चौधरी हरिश्चंद्र नैण ने अपने वंश का परिचय देने और अपने जीवन पर प्रकाश डालने के लिए “मेरी जीवनी के कुछ समाचार”, "संक्षिप्त जीवनी", और “मेरी जीवन गाथा” नामों से तीन प्रयत्न किए गए हैं। यह प्रयत्न जिस उत्साह से आरंभ किए गए हैं उससे पूरे नहीं किए गए हैं। मानो यह काम इन्हें बोझिल सा जंचा। ठाकुर देशराज को उनका यह अधूरा प्रयास भी बहुत सहारा देने वाला सिद्ध हुआ। उनके लेखानुसार उनका गोत्र नैण है। जो उनके पूर्व पुरुष नैणसी के नाम पर प्रसिद्ध हुआ। नैण और उनके पूर्वज क्षत्रियों के उस प्रसिद्ध राजघराने में से थे जो तंवर अथवा तोमर कहलाते थे। और जिनका अंतिम प्रतापी राजा अनंगपाल तंवर था। तंवरों ने दिल्ली को चौहानों के हवाले कर दिया था क्योंकि अनंगपाल तंवर नि:संतान थे, इसलिए उन्होने सोमेश्वर के पुत्र पृथ्वीराज चौहान, जो कि उनका दौहित्र था, को गोद ले लिया था। हांसी हिसार की ओर जो तंवर गए थे उनमें से कुछ ने राजपूत संघ में दीक्षा लेली और जो राजपूत संघ में दीक्षित नहीं हुये वे जाट ही रहे। नैणसी और उनके तीन भाई नवलसी, दाडिमसी, कुठारसी भी जाट ही रहे। ये चार थम्भ (स्तम्भ) कहलाते हैं। नैणसी के वंशज नैण, नवलसी के न्योल, दाडिमसी के दड़िया, और कुठारसी के कोठारी कहलाए। चौधरी हरिश्चंद्र जी का कहना है कि मैंने इन तीन गोत्रों को पाया नहीं। ठाकुर देशराज ने इनमें से न्योल गोत्र के जाट खंडेला वाटी में देखे हैं। वहाँ के लोगों का कहना है कि दिल्ली के तंवरों में से खडगल नाम का एक राजकुमार इधर आया था उसी ने खंडेला बसाया जो पीछे कछवाहों के हाथ चला गया। (ठाकुर देशराज: बीकानेरीय जागृति के अग्रदूत – चौधरी हरीशचन्द्र नैण, 1964, p.7,9)

यह उल्लेखनीय है कि जाट लैंड पर इन चारों गोत्रों - नैण, न्योल, दड़िया और कोठारी की जानकारी उपलब्ध है।

सिद्धमुख और कांजण के चाहर - संवत 1324 विक्रम (1268 ई.) में कंवराराम चाहर व कानजी चाहर ने नसीरुद्दीन शाह के वारिस बादशाह गियासुद्दीन बलवन (1266 -1287) को पांच हजार चांदी के सिक्के एवं घोड़ी नजराने में दी। बादशाह बलवान ने खुश होकर कांजण (चूरु जिले में राजगढ़ के पास) का राज्य दिया। 1266 -1287 ई तक गयासुदीन बलवान ने राज्य किया। सिद्धमुख एवं कांजण दोनों जांगलप्रदेश में चाहर राज्य थे। राजा मालदेव चाहर उनके राजा थे।

जांगलप्रदेश के सात पट्टीदार लम्बरदारों (80 गाँवों की एक पट्टी होती थी) से पूरा लगान न उगा पाने के कारण दिल्ली का बादशाह खिज्रखां मुबारिक (सैयद वंश) नाराज हो गए। उसने उन सातों चौधरियों को पकड़ने के लिए सेनापति बाजखां पठान के नेतृतव में सेना भेजी। खिज्रखां सैयद का शासन 1414 ई से 1421 ई तक था। बाजखां पठान इन सात चौधरियों को गिरफ्तार कर दिल्ली लेजा रहा था। यह लश्कर कांजण से गुजरा। अपनी रानी के कहने पर राजा मालदेव ने सेनापति बाजखां पठान को इन चौधरियों को छोड़ने के लिए कहा, किन्तु वह नहीं माना। आखिर में युद्ध हुआ जिसमें मुग़ल सेना मारी गयी।

इस घटना से यह कहावत प्रचलित है कि - माला तुर्क पछाड़याँ दे दोख्याँ सर दोट । सात जात (गोत) के चौधरी, बसे चाहर की ओट

ये सात चौधरी सऊ, सहारण, गोदारा, बेनीवाल, पूनीया, सिहाग और कसवां गोत्र के थे।

विक्रम संवत 1473 (1416 ई.) में स्वयं बादशाह खिज्रखां मुबारिक सैयद एक विशाल सेना लेकर राजा माल देव चाहर को सबक सिखाने आया। एक तरफ सिद्धमुख एवं कांजण की छोटी सेना थी तो दूसरी तरफ दिल्ली बादशाह की विशाल सेना। राजा मालदेव चाहर की अत्यंत रूपवती कन्या सोमदेवी थी। कहते हैं कि आपस में लड़ते सांडों को वह सींगों से पकड़कर अलग कर देती थी। बादशाह ने संधि प्रस्ताव के रूप में युद्ध का हर्जाना और विजय के प्रतीक रूप में सोमदेवी का डोला माँगा। स्वाभिमानी राजा मालदेव चाहर ने धर्म-पथ पर बलिदान होना श्रेयष्कर समझा। चाहरों एवं खिजरखां सैयद में युद्ध हुआ। इस युद्ध में सोमादेवी भी पुरुष वेश में लड़ी। युद्ध में दोनों पिता-पुत्री एवं अधिकांश चाहर मारे गए।

स्रोत - अनूप सिंह चाहर, जाट समाज आगरा, नवम्बर 2013, पृ. 26-27, जागा सुरेन्द्र सिंह, ग्राम दादिया, तहसील - किशनगढ़, अजमेर, 2. राम चन्द्र चाहर, लाडनू, नागौर

कालेर जाटों द्वारा चूरु शहर की स्थापना: इतिहासकार डॉ. पेमाराम के अनुसार चूरु की स्थापना कालेर जाटों द्वारा किए जाने का उल्लेख है तथा इसका प्राचीन नाम ‘कालेरा बास’ था। चूरू के शोधपूर्ण इतिहास में लेख है कि ठाकुर बाघ के ज्येष्ठ पुत्र बणीर थे, जिनका ठिकाना घांघू था। भाटियों का एक दल पशुओं को लेकर खारिया आया हुआ था। उनके एक लड़की विवाह योग्य थी। ठाकुर बणीर का खारिया में भाटियों की लड़की से विवाह हो गया। भाटी सरदार ने तत्कालीन परंपरा के अनुसार अपनी बेटी को ‘कालेरा बास’ के चौधरी सरदार के गोद बैठा दिया। कालांतर में भटियानी के चार पुत्र हुए। इनमे बड़े का नाम मालदेव था। ठाकुर बणीर के स्वर्गवास पश्चात ठाकुर मेघराजसिंह घांघू की गद्दी पर काबिज हो गया । अतः मालदेव की माँ अपने बच्चों को लेकर कालेरा बास के धर्म पिता चौधरी सरदार के पास आ गयी। चौधरी ने उनका लालन-पालन किया। एक दिन मालदेव ने नाना चौधरी को उनकी बिरादरी सहित भोज के लिए आमंत्रित किया। सबको खूब शराब पिलाई और जब जब होश खो बैठे तो मालदेव ने सब को क़त्ल कर चूरू पर कब्ज़ा कर लिया। यह घटना संवत 1598 (वर्ष 1541 ई.) की है।‘ कालेरा बास’ की जगह मालदेव ने चूरू नाम दे दिया। कालेरा बॉस का धूलकोट संभवत: नगर के पूर्वी भाग में 'डाकोतों के मोहल्ले' (प्राचीन कालेरा बास) में स्थित ऊँचे टीले पर था। वहां एक छोटा सा मंडप है जिसमें स्लेटी रंग की पत्थर की मूर्ती है, जिसे मोहल्ले वाले जाटों का भोमिया बतलाते हैं।

ठाकुर देशराज के अनुसार 'नैन’ शाखा अनंगपाल के एक वंशज नैनसी के नाम पर चली। कालांतर में ये लोग डूंगरगढ़ तथा रतनगढ़ तहसील में आकर आबाद हुए। इनमें श्रीपाल नामक व्यक्ति का जन्म संवत 1398 (1341 ई.) में हुआ, जिनके 12 लड़के हुए, जिनमें राजू ने लद्धोसर, दूला ने बछरारा , कालू ने मालपुर, हुक्मा ने केऊ, लल्ला ने बीन्झासर और चुहड़ ने चुरू आबाद किया। इतिहासकार डॉ. पेमाराम के अनुसार नैन गोत्र जाट यहाँ के प्राचीन निवासी हैं। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में चुहड़ जाट द्वारा चूरु के बसाने का वर्ष 1620 ई. अभिलेखित किया गया है तथा इस बात की पुष्टि इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया खंड 10 (पृ.335) से भी होती है।

पिचकराई ताल के सींवर - तेजू पीर के रूप में 1200 ई. सन के लगभग सींवर जाट गोत्र में लोकदेवता का अवतरण हुआ। वे अपनी शूरवीरता, शहादत तथा रूहानियत की बदोलत लोकदेवता तेजू पीर के रूप में प्रसिद्ध हुए। राजस्थान के चूरू जिले की सरदारशहर तहसील के पिचकराई गाँव के पातवाणा में इनके बलिदान स्थल पर वीर तेजूपीर का धाम है। यहाँ प्रतिवर्ष वैशाख सुदी 4 को मेले का आयोजन होता है। तेजू जी सूफी संत फरिदुदीन शक्करगंज (1173 -1265) के शिष्य होने के कारण तेजू पीर कहलाये।

तेजू जी की बहन अंचला अत्यंत रूपवती तथा बलशाली थी। लंगड़खां अंचला से शादी करना चाहता था। सींवरजनों ने बाई जी अंचला की शादी मान गोत्रीय जाट सूआराम जी से करदी। इस पर लंगड़खां ने सेना सहित खोजेर पर हमला कर दिया। तेजू जी ने सींवरजनों सहित सेना लेकर आन-बान की रक्षा हेतु डटकर घमासान युद्ध किया। सींवर सेना के पराक्रम से लंगड़खां की सेना भा गयी। लंगड़खां के सिपाहियों ने पीछे से छुपकर तेजूजी व रातूजी का शीश तलवार से काट दिया। इसके उपरांत भी दोनों भाइयों की धड़ें लगातार लड़ती रहीं और लंगड़खां की सेना का संहार करने लगी। तेजू जी व रातू जी का शीश जोहड़ घुराणा में गिरा। इनके धड़ लड़ते-लड़ते पांच कोस आ गए। इस घटना से लंगड़खां घबरा गया। उसने दोनों धड़ों को नील का छींटा दिया, तब वे शिथिल होकर गिरे। दोनों की धड़ें जोहड़ पातवाणा में गिरी। सींवरजनों ने लंगड़खां की सेना का पूरी तरह सफाया कर दिया। पातवाणा जोहड़ में राजा तेजू जी व रातू जी का अंतिम संस्कार उनके वंशजों ने किया। इस जगह धाम बना हुआ है। यहाँ प्रतिवर्ष वैशाख सुदी 4 को मेला भरता है। इनके अनुयायी इन्हें तेजू पीर व दादो जी महाराज के नाम से पूजते हैं। (दौलत राम सारण, जाट बन्धु, आगरा, 25 फ़रवरी 2012. )

घनघस गोत्र : राजस्थान में गूगौर और बागौर नाम के दो गाँव थे। इनके स्वामी जयपरतनामी तूर संघ के थे। जयपरतनामी के 4 पुत्र हुये 1. जाटू, 2. सतरोल, 3. राघू, और 4. जरावता. ये हरयाणा की तरफ प्रस्थान कर गए। इनके वंशजों ने हरयाणा में अनेक गाँव बसाये। (पंडित अमीचन्द्र शर्मा,पृ.10)

बागौर जनपद के अंतर्गत बीकानेर, नाल, किला, राजासर, सतासर, छतरगढ़, रणधीसर, बीठनोक, भवानीपुर, जयमलसर इत्यादि प्रमुख कस्बे थे। (जेम्स टोड कृत राजस्थान का इतिहास, अनुवाद कालूराम शर्मा, पृ.403)

सुजानगढ़ के गुलेरिया: सुजानगढ़ के इतिहास में प्रथम आधार-शिला समाज के गुलेरिया गोत्र के पूर्वजों ने रखी थी। विक्रम संवत 1630 (=1573 ई.) में डीडवाना मोलासर के पास लादड़िया गांव से जाट गुलेरिया परिवार के दो भाईयों की ठाकुर के साथ लाग-बाग के संबंध में अनबन हो गई जिससे वे गाँव छोडकर निकल गए। ठाकुर ने यह दवाब बनाया कि जो लादड़िया गांव में रहेगा उसको ठाकुर की जय बोलनी पड़ेगी। इस संबंध में एक लोकोक्ति प्रचलित है - लादड़िया में रहीं जको जय ठाकुर की कहीं। स्वाभिमानी जाटों को यह मंजूर नहीं था सो बैल गाड़ियों में सामान डालकर अनजान स्थान के लिए रवाना हो गए। ठाकुर ने कहा कि जा तो रहे हो परंतु जोधपुर रियासत में नहीं बसने दूँगा। जसवंतगढ़ में आकर पूछा तो पता चला कि जोधपुर रियासत सामने पड़े ताल में समाप्त होती है। यह बिकानेर रियासत का इलाका था। यहीं गुलेरिया जाटों ने डेरा डाला। यह क्षेत्र मांडोता ठाकुर का बीदासर जागीर के अधीन था। ताल की बंजर जमीन जहां गुलेरिया जाट बसे वह वर्तमान गांधी चौक के इर्द-गिर्द थी। मांडोता गाँव के दयालदासोत मारवाड़ के समीप के गांवों में डाका डालकर आ जाते थे। गोपालपुरा और व मांडोता के आपस में अनबन चलती थी जिसके कारण चार परिवार क्रमस: बासनीवाल (प्रजापत), मेघवाल (मेहरड़ा), नाई (टोकसिया) और माली (सांखला) ये गुलेरियों की ढ़ाणी के पास आकार बस गए। जो 'पंच ढ़ाणी' के नाम से कहलाए। 'पंच ढ़ाणी' गैर आबाद थी तथा जोधपुर- बीकानेर रियासत की सीमा पर होने से बीकानेर महाराजा विशेष ध्यान रखते थे। कहते हैं कि 'पंच ढ़ाणी' में भी जब लूट-पाट होने लगी तब बीदासर जाकर बताने पर बीकानेर महाराज की ओर से 'पंच ढ़ाणी' के पहरे पर चार घुड़सवार भिजवाए जो एक साल तक यहाँ रहे। सुरक्षा व खेती की उपजाऊ जमीन पर बीकानेर महाराजा का वृद्धहस्त देख कर आस-पास के गावों से लोग आकार बसने लगे। ताल की जमीन में 5-6 फुट खोदने पर मीठा पनी निकलता था जिससे सिंचाई कर दो फसल व सब्जी भी खूब होती थी।

गुलेरिया परिवार के गुलोजी ने गुलेरिया गाँव बसाया। 'पंच ढ़ाणी' के गुलेरिया परिवार के भाई ने हरयाणा में खैर गाँव बसाया जहां आज 100 से ज्यादा गुलेरिया परिवार हैं। 'पंच ढ़ाणी' की आबादी बढने पर ख़रबुज़ी के नाम से संवत 1780 (1723 ई.) में ढ़ाणी का नाम ख़रबुज़ी रख दिया तथा लोग नया बाजार तक मुख्य सड़क पर बस गए। सांडवा ठाकुर ने यहाँ पर एक गढ़ बनवाया तब इसका नाम ख़रबुज़ी कोट या ख़रबूज़ी-रा-कोट हो गया। संवत 1808 (1751 ई.) में सेवाराम गुलेरिया का देहांत हुआ तब उनकी पत्नी सती हुई जो आज एफ.सी.आई. गोदाम के पास सती मंदिर है। वर्ष 1969 में जब एफ.सी.आई. का निर्माण हुआ तो उस समय सतीमाता के मंदिर के लिए स्थान नहीं छोडने के कारण निर्माण अवरूद्ध हो गया तब एफ.सी.आई. ने मंदिर के लिए अलग स्थान छोडकर निर्माण करवाया। महाराजा सूरतसिंह बीकानेर ने सांडवा ठाकुर से ख़रबूज़ी कोट ले लिया जिसके बदले दूसरी भूमि देदी। संवत 1835 (1778 ई.) में सुजानसिंह के नाम से गाँव का नाम सुजानगढ़ रखा गया। इसी संवत के आस पास नाथोजी गुलेरिया ने पशुओं के पीने के लिए नाथो तालाब खुदवाया।

संदर्भ: पीथाराम गुलेरिया, सुजानगढ़ जाट समाज निर्देशिका, 2015, पृ. 5-6


जाटों द्वारा स्थापित कस्बों के नाम बदलना : राठोड़ राजाओं द्वारा बीकानेर संभाग के जाटों द्वारा शासित और स्थापित अनेक कस्बों के नाम बदलकर स्वयं के राजाओं और जागीरदारों के नाम से रख दिये गए। इससे इन कस्बों का पुराना इतिहास खोजने में कठिनाई आती है। इस प्रकार इस इलाके की ऐतिहासिक पहचान जाटों व किसानों के स्थान पर राठोड़ों द्वारा आबाद क्षेत्र के रूप में बदल गयी। कुछ स्थान/कस्बे इस प्रकार हैं: चूड़ेहर → अनूपगढ़, मोहिलवाटी → बीदावाटी, नेहरी → देशनोक, नेहरास्थान → बीकानेर, विशाला जाट की ढाणी → बिसाहू, बगोर → फतेहगढ़, भटनेर → हनुमानगढ़, रामनगर → गंगानगर, कोहलासर → रतनगढ़, (?) → घड़सीसर, सेठोलाव → किशनगढ़, कनियाणा → लालगढ़, लूद्दी → राजगढ़, लक्ष्मीनारायण → राजासर बीकान, बबेरा → रूपनगढ़ , तेतरवाल की ढाणी → सालासर, पचारों की ढाणी → सरदारपुरा (राजगढ़), राजियासर → सरदारशहर, गुलेरियों की ढ़ाणी → सुजानगढ़, सोढल → सुरतगढ़, रेणी → तारानगर आदि, अलवाणा → सरदारगढ़ (सूरतगढ़) । (दौलतराम सारण डालमाण के 'धरती पुत्र', 30.12.2012, पृ. 8-10)

अन्य जाट गोत्रों के गणराज्य - उपरोक्त जाट गोत्रों की जानकारी अनुसंधान कर जुटाई गई है। गणेश बेरवाल (कामरेड मोहरसिंह, पृ.2) ने लिखा है कि राजगढ़ के बारे में सरकारी गज़ट में अंकित है कि यह महान थार रेगिस्तान का गेट है, जहां से होकर दिल्ली से सिंध तक के काफिले गुजरते हैं। 1620 ई. के पहले यहाँ प्रजातांत्रिक गणों की व्यवस्था थी जिसमें भामू, डुडी, झाझड़िया, मलिक, पूनीयां, राड़ व सर्वाग गणतांत्रिक शासक थे । जैतपुर पूनीया गाँव था जहां से झासल, भादरा (हनुमानगढ़) तक का बड़ा गण था। जिसका मुख्यालय सिधमुख था। गण में एक ही व्यक्ति सिपाही भी था और किसान भी। लड़ाई होने पर पूरा गण मिलकर लड़ता था। राठोड़ों की नियमित सेना ने इनको गुलाम बनाया।

उपरोक्त के अलावा भी अनेक जाट गोत्र हैं जिनका इतिहास बिकानेर संभाग में अभी खोजा नहीं जा सका है। यह इन गोत्रों के बड़वा से मिल सकता है। निम्न जाट गोत्रों ने गाँव बसाये हैं और उनमें उनकी जनसंख्या पर्याप्त है। नीचे उन कुछ गोत्रों की सूची दी जा रही है। साथ ही सुविधा के लिए जिस गाँव को बसाया है उसका नाम ब्रेकेट में दिया गया है। संभावित जाट गोत्र जिनके इतिहास की खोज की आवश्यकता है वे हैं -

  • बीकानेर जिला: बाना (बाना गाँव डूंगरगढ), चोटिया (धीरदेसर चोटियान), महिया (दुलचासर), तरड़ (जसरासर), झींझा (झंझेऊ), मूंड (मूंडसर), उत्पल (पलाना), हुड्डा (राजपुरा हुड्डान),
  • गंगानगर जिला: नोजल (छप्पनवाली), न्योल (रामपुरा न्योलां), ताखर (ताखरावाली),
  • हनुमानगढ़ जिला: ढाका (ढाका गाँव), खोथ (खोथांवाली), मोठसरा (मोठसरां), थालोड़ (थालड़का),
  • चुरू जिला: भींचर (भींचरी), भामू (भामासी, चाँदगोठी, ढढेरू भामूवान), जान्दू (जान्दवा), पड़िहार (पड़िहारा), पोटलिया (पोटी), न्योल (सातड़ा), डूडी (सीतसर), झाझड़िया (?), राड़ (?), सर्वाग (?) आदि।

संदर्भ

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• रतन लाल मिश्र, शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.43

• ठाकुर देशराज, जाट इतिहास, पृ. 594-598, 601-603, 606-607, 624, 587-627, 694

• डॉ पेमा राम:राजस्थान के जाटों का उत्थान, 2015, पृ. 13, 14, 16, 17, 18, 19, 22, 28, 29, 30, 34-37,

• इम्पीरियल गजैटियर

• वासुदेव सरन अग्रवाल, इंडिया एज नॉन टु पाणिनी,पृ. 426, 431, 434-436, 445,449,500

• दलीपसिंह अहलावत, जाट वीरों का इतिहास: पृष्ठ.195, 197, 198, 199, 217-218, 220-221, 250,251, 295,

• बड़वा (भाट) भवानीसिंह राव, गाँव-महेशवास, पोस्ट-बिचून, तहसील-फूलेरा, जिला- जयपुर (फोन-7742353459) की बही

• पंडित अमीचन्द्र शर्मा, जाट वर्ण मीमांसा, पृ.10, 34

• ठाकुर देशराज, बिकानेरीय जागृति के अग्रदूत चौधरी हरिश्चंद्र नैन, पृ.7,9, 335-337

• भलेराम बेनीवाल : 'जाट योद्धाओं का इतिहास', 2008, पृ.716, 717

• लक्ष्मणराम महला:सर्व-समाज बौद्धिक एवं प्रतिभा सम्मान समारोह स्मारिका, उद्देश्य, जून-2013, पृ.189

• दयालदास की ख्यात, भाग 2, पेज 8, 9, दयालदास ख्यात, देशदर्पण, पृ. 20

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• दौलतराम सारण डालमाण, 'धरती पुत्र : जाट बौधिक एवं प्रतिभा सम्मान समारोह, साहवा, स्मारिका दिनांक 30 दिसंबर 2012', पृ. 8-10

• सात्यूं के ब्राहमण ज्ञानाराम की बही (हस्तलिखित्), पृ. 10-16

• पंडित अमीचन्द्र शर्मा, जाट वर्ण मीमांसा, 1910, पृ.10,34

• चौधरी कन्हैयालाल पूनिया:हनुमानगढ़ जिला जाट स्मारिका-2010, p.16-17

• रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.37 -38

• पाऊलेट, बीकानेर गजेटियर, पृ. 90

• अनूप सिंह चाहर, जाट समाज आगरा, नवम्बर 2013, पृ. 26-27

• जागा सुरेन्द्र सिंह, ग्राम दादिया, तहसील - किशनगढ़, अजमेर, 2. राम चन्द्र चाहर, लाडनू, नागौर

• दौलतराम सारण डालमाण, जाट बन्धु, आगरा, 25 फ़रवरी 2012. गाँव डालमाण, सरदारशहर, चूरू, राजस्थान. मोब: 09413744238.

• गणेश बेरवाल, 'जन जागरण के जन-नायक कामरेड मोहरसिंह', 2016, साहित्य सदन प्रकाशन, फ़तेहपुर, पृ.2

• Churu in Britannica: http://www.britannica.com/EBchecked/topic/117390/Churu

• Churu in Imperial Gazetteer of India, v. 10, p. 335

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