Chhapar Churu

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Note - Please click Chhapar for similarly named villages at other places.


Location of Chhapar in Churu district

Chhapar (छापर) is a city located in Sujangarh tahsil of Churu district of Rajasthan. Chhapar was capital of Mohil Jats prior to Rathores.[1]

Variants of name

Origin

The Founders

Jat Gotras

There are approx 54 Jat gotras in Chhapar. There are 397 Jat families in Chhapar. [2] Male:683, Female:743, Boys:683, Girls:517, Sex Ratio: Boys to Girls 758[3]

Location

It is 210 km from Jaipur and situated on road from Ratangarh to Sujangarh. PIN Code - 331502. It is known for black bucks but it is also home to a variety of birds. Here is a famous sanctuary known as Tal Chhapar Sanctuary


The Tal Chappar lies in the Sujangarh Tehsil of Churu District. It lies on Nokha- Sujangarh state Highway and is situated at a distance of 85 KM from Churu & about 132 km from Bikaner. The nearest Railway station is Chappar which lies on Degana – Churu – Rewari broad gauge line of Northern Western Railways. The nearest Airport is Sanganer (Jaipur) which is at a distance of 215 km from Chappar.

The Tal Chhapar sanctuary is located on the fringe of the Great Indian Desert. Tal Chhapar nestles a unique refuge of the most elegant Antelope encountered in India, "the Black buck". Tal Chhaper sanctuary, with almost flat tract and interspersed shallow low lying areas, has open grassland with scattered Acacia and prosopis trees which give it an appearance of a typical Savanna. The word "Tal" means plane land. The rain water flows through shallow low lying areas and collect in the small seasonal water ponds.

History

Its ancient name was Dronapura (द्रोणपुर)[4] or Dronaka (द्रोनक).[5][6]


The Harsha Charita of Bana/Chapter VII mention a person named Dronaka ....'We have a long way to go; why do you linger, Dronaka, now?


Mohils of Chhapar (Dronapur) - Chauhan Dhandhu's son was Indra whose descendant Mohil started this branch. This area earlier was occupied by Bagadiyas who obtained from the descendants of Shishupala in V. 631 (574 AD). It is said that Kauravas had granted this kingdom to Dronacharya and hence the name Dronapura. (K.Devi Singh Mandawa, Prithviraja, p.132)

James Tod[7] writes that The warriors assembled under Visaladeva Chauhan against the Islam invader included the ruler of The Mohil of Dronapur with tribute sent excuse.

इतिहास

कर्नल जेम्स टोड ने लेख किया है कि इनके अलावा तीन और विभाग थे - बागौर, खारी पट्टी और मोहिल। इन पर भी राठौड़ों का प्रभुत्व कायम हो गया था। राजपूत शाखाओं से छिने गए तीन विभाग राज्य के दक्षिण और पश्चिम में थे जिनका विवरण नीचे दिया गया है. [8]

अनुक्रमांक नाम जनपद नाम मुखिया गाँवों की संख्या राजधानी अधिकार में प्रमुख कस्बे
7. बागौर 300 बीकानेर, नाल, किला, राजासर, सतासर, छतरगढ़, रणधीसर, बीठनोक, भवानीपुर, जयमलसर इत्यादि।
8. मोहिल 140 छापर छापर, सांडण, हीरासर, गोपालपुर, चारवास, बीदासर, लाडनूँ, मलसीसर, खरबूजा कोट आदि
9. खारी पट्टी 30 नमक का जिला

मोहिल-महला-माहिल जाटवंश का इतिहास

दलीप सिंह अहलावत[9] लिखते हैं:

मोहिल-महला-माहिल - यह चन्द्रवंशी जाटवंश है जिसका प्राचीनकाल से शासन रहा है। रामायणकाल में इनका जनपद पाया जाता है। महाभारत भीष्मपर्व 9-48 के अनुसार माही और नर्मदा नदियों के बीच इनका जनपद था। यह जनपद गुजरात एवं मालवा की प्राचीन भूमि पर था। पं० भगवद्दत्त बी०ए० ने अपने ‘भारतवर्ष का इतिहास’ में इनके इस जनपद को इन्हीं दोनों नदियों के बीच का क्षेत्र लिखा है। टॉड और स्मिथ ने इस जनपद को सुजानगढ़ बीकानेर की प्राचीन भूमि पर अवस्थित लिखा है। जैमिनीय ब्राह्मण 1-151, बृहद्दवेता 5-62, ऋक्सर्वानुक्रमणी 5-61 के अनुसार अर्चनाना, तरन्त पुरुमीढ़ नामक तीन मन्त्रद्रष्टा-तत्त्वज्ञ कर्मकाण्डी माहेय ऋषियों का वर्णन मिलता है।

मोहिल जाटवंश राज्य - मोहिल जाटवंश ने बीकानेर राज्य स्थापना से पूर्व छापर में जो बीकानेर से 70 मील पूर्व में है और सुजानगढ़ के उत्तर में द्रोणपुर में अपनी राजधानियां स्थापित कीं। इनकी ‘राणा’ पदवी थी। छापर नामक झील भी मोहिलों के राज्य में थी जहां काफी नमक बनता है। कर्नल जेम्स टॉड ने अपने इतिहास के पृ० 1126 खण्ड 2 में लिखा है कि “मोहिल वंश का 140 गांवों पर शासन था।

मोहिल वंश के अधीन 140 गांवों के जिले (परगने) - छापर (मोहिलों की राजधानी), हीरासर, गोपालपुर, चारवास, सोंदा, बीदासर. लाडनू, मलसीसर, खरबूजाराकोट आदि। जोधा जी के पुत्र बीदा (बीका का भाई) ने मोहिलों पर आक्रमण किया और उनके राज्य को जीत लिया। मोहिल लोग बहुत प्राचीनकाल से अपने राज्य में रहा करते थे। पृ० 1123.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-250


मोहिलों के अधीश्वर की यह भूमि माहिलवाटी कहलाती थी।” जोधपुर के इतिहास के अनुसार राव जोधा जी राठौर ने माहिलवाटी पर आक्रमण कर दिया। राणा अजीत माहिल और राणा बछुराज माहिल और उनके 145 साथी इस युद्ध में मारे गये। राव जोधा जी राठौर की विजय हुई। उसी समय मोहिल फतेहपुर, झुंझुनू, भटनेर और मेवाड़ की ओर चले गये। नरवद माहिल ने दिल्ली के बादशाह बहलोल लोधी (1451-89) से मदद मांगी। उधर जोधा जी के भाई कांधल के पुत्र बाघा के समर्थन का आश्वासन प्राप्त होने पर दिल्ली के बादशाह ने हिसार के सूबेदार सारंगखां को आदेश दिया कि वह माहिलों की मदद में द्रोणपुर पर आक्रमण कर दे। जोधपुर इतिहास के अनुसार कांधलपुत्र बाघा सभी गुप्त भेद जोधा जी को भेजता रहा। युद्ध होने पर 555 पठानों सहित सारंगखां परास्त हुआ और जोधा जी विजयी बने। कर्नल टॉड के अनुसार जोधा के पुत्र बीदा ने मोहिलवाटी पर विजय प्राप्त की। राव बीदा के पुत्र तेजसिंह ने इस विजय की स्मृतिस्वरूप बीदासर नामक नवीन राठौर राजधानी स्थापित की। तदन्तर यह ‘मोहिलवाटी’ ‘बीदावाटी’ के नाम से प्रसिद्ध की गई। इस प्रदेश पर बीदावत राजपूतों का पूर्ण अधिकार हो गया। राजपूतों ने इस प्राचीनकालीन मोहिलवंश को अल्पकालीन चौहानवंश की शाखा लिखने का प्रयत्न किया।[10] किन्तु इस वंश के जाट इस पराजय से बीकानेर को ही छोड़ गये। कुछ राजपूत भी बन गये। माहिलों की उरियल (वर्तमान उरई-जालौन) नामक रियासत बुन्देलखण्ड में थी। आल्हा काव्य के चरितनायक आल्हा, उदल, मलखान की विजयगाथाओं से महलाभूपत के कारनामे उल्लेखनीय हैं। बिल्कुल झूठ को सत्य में और सत्य को असत्य में परिणत करने की कला में ये परम प्रवीण थे। (जाट इतिहास उत्पत्ति और गौरव खण्ड पृ० 105 पर लेखक ठा० देशराज ने मलखान को वत्स गोत्र का जाट लिखा है)।

इस माहिल वंश के जाट राणा वैरसल के वंशज मेवाड़ में बस गये तथा शेष माहिल लोग पंजाब, हरयाणा, बृज, रुहेलखण्ड के विभिन्न जिलों में आबाद हो गये।

1941 ई० की मतगणना के अनुसार ये लोग फिरोजपुर में 1045, अमृतसर में 2555, जालंधर में 1575, जींद में 4175, पटियाला में 795 सिख जाट माहिल थे।

शेखावाटी में पईवा, मेरठ में रसूलपुर, दबथला, बड़ला, मथुरा में छाता, बुलन्दशहर में चिट्ठा, हिसार में डाबड़ा, मिलकपुर, सौराया, खेड़ी, लाधड़ी, अलीगढ़ में भोजपुर, जहांगीराबाद गांव माहिल जाटों के हैं।

भाषाभेद से इस वंश को कई नामों से पुकारा जाता है जैसे पंजाब में माहे-माहि-माहिय और बृज से मध्यप्रदेश तक महला-मोहले तथा हरयाणा, यू० पी० में माहिल मोहिल कहा जाता है।

माहिल वंश की शाखा 1. गोधारा (गोदारा) 2. महनार्या


1. जाटों का उत्कर्ष, 337-338 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री; जाट इतिहास उर्दू पृ० 378-380, लेखक ठा० संसारसिंह।

नोट - बहलोल लोधी का शासन सन् 1451-1489 ई० तक् रहा। बीका ने बीकानेर नामक अपनी राजधानी की नींव सन् 1489 ई० में डाली।


कसवां जाटों के भाटों तथा उनके पुरोहित दाहिमा ब्रह्मण की बही से ज्ञात होता है की कंसुपाल पड़िहार संघ में सम्मिलित था। वह 5000 फौज के साथ मंडोर छोड़कर पहले तालछापर पर आए, जहाँ मोहिलों का राज था. कंसुपाल ने मोहिलों को हराकर छापर पर अधिकार कर लिया. इसके बाद वह आसोज बदी 4 संवत 1125 मंगलवार (19 अगस्त 1068) को सीधमुख आया. वहां रणजीत जोहिया राज करता था जिसके अधिकार में 125 गाँव थे. लड़ाई हुई जिसमें 125 जोहिया तथा कंसुपाल के 70 लोग मारे गए. इस लड़ाई में कंसुपाल विजयी हुए. सीधमुख पर कंसुपाल का अधिकार हो गया और वहां पर भी अपने थाने स्थापित किए. सीधमुख विजय के बाद कंसुपाल सात्यूं (चुरू से 12 कोस उत्तर-पूर्व) आया, जहाँ चौहानों के सात भाई (सातू, सूरजमल, भोमानी, नरसी, तेजसी, कीरतसी और प्रतापसी) राज करते थे. कंसुपाल ने यहाँ उनसे लड़ाई की जिसमें सातों चौहान भाई मरे गए. चौहान भाइयों की सात स्त्रियाँ- भाटियाणी, नौरंगदे, पंवार तथा हीरू आदि सती हुई. कंसुपाल की संतान कसवां कहलाई. फाल्गुन सुदी 2 शनिवार, संवत 1150, 18 फरवरी, 1094, के दिन कंसुपाल का सात्यूं पर कब्जा हो गया. फ़िर सात्यूं से कसवां लोग समय-समय पर आस-पास के भिन्न-भिन्न स्थानों पर फ़ैल गए और उनके अपने-अपने ठिकाने स्थापित किए. [11] [12]

Geography

The Geology of the zone is obscured by the wind blown over-burden. Some small hillocks and exposed rocks of slate and quartzite are found in the western side of the sanctuary. Area between hillocks and the sanctuary constitutes the watershed area of the sanctuary. The whole sanctuary used to be flooded by water during the heavy rains but with salt mining going on in the watershed. Hardly any rain water falling on the hillocks reach the Sanctuary

Chhapar is located at 27°49′N 74°24′E / 27.82, 74.4. The sanctuary is named after Chhapar village which is located at 27°-50' North and 74°-25' East. It is a flat saline depression locally known as "Tal" that has a unique ecosystem in the heart of the Thar Desert, Perched at a height of 302 meters (990 feet) above sea level.

Demographics

As of 2011 India census, Chhapar had a population of 26000. Males constitute 51% of the population and females 49%. Chhapar has an average literacy rate of 55%, lower than the national average of 59.5%; with male literacy of 65% and female literacy of 46%. 19% of the population is under 6 years of age.

Famous Temples and other

  • Salasar Balaji Temple (25 km. from Sujangarh on Jaipur Road)
  • Raghunathji ka bara Mandir (Maheswari Agrwal panchayat kameti)
  • Hanuman Mandir
  • Shivalaya
  • Lord Venkateshwara Temple (12 km. from chhapar at sujangarh)
  • Jain Vishwa Bharti (Ladnu)
  • Sri Digamber Jain Mandir (Sujangarh)
  • Sri Dungar Balaji Mandir
  • Ram Devera & Shivalaya Tharda
  • Pashu mela sandwa
  • Shri balaji dada ji mandir parsaneu dham 35km from chhapar
  • Jat Bhawan Chhapar - Under construction[13]

Notable Persons

  • Magharam Mali - Former member of Nagarpalika Chhapar
  • Prakash Mali (Jat) - Deputy XEN in NLC INDIA LTD("Navratna" Govt. of india enterprises under ministry of coal)
  • Rakesh Kumar Manda - Editor Jat Jagriti Smarika, Adhyaksh Jat Yuvak Mandal, Chhapar, Mob: 9784350841, Email: rakeshchoudhary672@gmail.com

Gallery

External Links

References

  1. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter III,p.250
  2. Jat Parivesh, 11/2016, p. 21
  3. Rakesh Kumar Manda: Jat Jagriti, September 2016, p. 23
  4. Towns and Villages of Chauhan Dominions, Table-1, S.No.101, Early Chauhān dynasties by Dasharatha Sharma
  5. Towns and Villages of Chauhan Dominions, Table-1, S.No.160, Early Chauhān dynasties by Dasharatha Sharma
  6. (See Sakrai inscription of s.v. 1155).
  7. James Tod: Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II,Annals of Haravati,p.414-416
  8. कर्नल जेम्स टोड कृत राजस्थान का इतिहास, अनुवाद कालूराम शर्मा,श्याम प्रकाशन, जयपुर, 2013, पृ.402-403
  9. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ-250,251
  10. जाटों का उत्कर्ष, 337-338 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री; जाट इतिहास उर्दू पृ० 378-380, लेखक ठा० संसारसिंह।
  11. गोविन्द अग्रवाल, चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास, पेज 115-116
  12. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 203-204
  13. Jat Parivesh, 11/2016, p. 17

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