Kakustha

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Kakustha (काकुस्थ)[1] was Suryavanshi King Kakustha son of Vikukshi (विकुक्षी) in lineage of Ikshavaku.

Jat Gotras from Kakustha

In Bhagavata Purana

Manu prayed to Vishnu for one hundred years for other sons. He got ten sons like unto himself. Ikshvaku was the eldest.[3]

Ikshvaku Ancestry in Bhagavata Purana

Ikshvaku (Skandha IX. Chaps 6-13) - Ikshvaku was born out of the nostrils of Manu when sneezing. He had one hundred sons. Vikukshi, Nimi, and Dandaka were the eldest born. Twenty five of them ruled on the east of Aryavarta, twenty five on the west and twenty five in the middle. The others ruled else where. For the performance of Ashtaka Sraddha, Ikshvaku once ordered [Vikukshi]] to get some good flesh. Vikukshi had a bagful of good game. But he was hungry and ate one rabbit out of his store.

Vasishtha found fault with this and Ikshvaku had to reject the whole of the game. The King became angry at this and he expelled his son from the kingdom. When Ikshvaku died, Vikukshi returned. He succeeded his father as king and was known as Sasada or Rabbit-eater. Puranjaya was the son of Sasada. He was also called Indravaha and Kakutstha. The Devas had a fight with the Asuras and Indra asked for the help of Puranjaya. Puranjaya wanted Indra to be his carrier, and the King of the Devas became a bull. Puranjaya ascended the bull on its hump. He is therefore called Indra-vaha or Indra-vehicled and Kakutstha or the mounter on the hump. He defeated the Asuras.

Ikshvaku → Vikukshi (Śaśāda)(+Nimi + 98 other sons) → Puranjaya (Indra vahu Kakutstha) → AnenaPrithuVisvagandhiChandraYuyanashva → Srāvasta (He built the town Sravasti) → BrihadasvaKuvalayasva (Dhundhumara)

With his 21 thousand sons, Kuvalayasva killed an Asura called Dhundhu, for the good of Rishi Utanka. But the Asura killed all his sons, except three, with fire from his mouth. Those three were Dridhāsva, Kapilāsva and Bhadrāsva.

Kuvalayasva (or Dhundhumara) → Dridhasva (+ Kapilasva + Bhadrasva) → HaryasvaNikumbhaBahulasvaKrisasvaSenajitYuvanasva

काकुस्थ या काकवंश का इतिहास

दलीप सिंह अहलावत[4] लिखते हैं:

काकुस्थ या काकवंश - सूर्यवंशज वैवस्वत मनु का पुत्र इक्ष्वाकु था जो कि वैवस्वत मनु


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ. 226-230


द्वारा बसाई गई भारत की प्रथम नगरी अयोध्या का शासक हुआ था। इक्ष्वाकु के विकुशी नामक पुत्र से पुरञ्जय जिसने देव-असुर युद्ध में असुरों को जीत लिया। इसी कारण वह ‘काकुस्थ’ नाम से प्रसिद्ध हुआ जो कि जाटवंश है। भाषाभेद से यह काकुस्थ जाटवंश दक्षिणी तैलगु में काक, काकतीय, पंजाब, कश्मीर में कक्क, कक्कुर और उत्तरप्रदेश में काकराणा नाम से बोला जाता है। इसी परम्परा में प्रतापी सम्राट् रघु हुए जिनके नाम पर इस काकुस्थवंश का एक समुदाय रघुवंशी प्रचलित हुआ जो कि जाटवंश है। इसी भाव का एक श्लोक इण्डियन ऐन्टिक्वेरी भाग 11 में भी अङ्कित है -

काकुस्थमिक्ष्वाकुरघूंश्च यद्दधत्पुराऽभवत्त्रिप्रवरं रघोः कुलम् ।
कालादपि प्राप्य स काकराणतां प्ररूढतुर्यं प्रवरं बभूव तत् ॥
“इक्ष्वाकु, काकुस्थ और रघु नाम से प्रसिद्ध कुल (वंश) ही कलियुग में काकराण के नाम से प्रचलित हुआ।”

विष्णु पुराण चतुर्थ अंश/अध्याय 2/ श्लोक 14 के अनुसार काकुस्थ वंश के 48 राजपुत्रों का दक्षिण देश में शासन स्थिर हुआ। वहां पर यह वंश काक नाम से प्रसिद्ध था। इस काकवंश का 'वांगलार इतिहास' प्रथम भाग के 46-47 पृष्ठ पर तथा राजपूताने के इतिहास गुप्त इन्सक्रिप्शन आदि पुस्तकों में वर्णन है। इतिहासज्ञ फ्लीट ने गुप्तों के परिचय में प्रयाग के किले में मौर्य सम्राट् अशोक के विशाल स्तम्भ पर गुप्तवंशी सम्राट् समुद्रगुप्त द्वारा खुदवाए हुए एक लेख का उल्लेख किया है। उस पर लिखा है -

“समुद्रगुप्त को काक आदि कई जातियां कर दिया करती थीं।”
२२. समतट-डवाक-कामरूप-नेपाल-कर्त्तृपुरादि-प्रत्यन्त-नृपतिभिर्म्मालवार्जुनायन-यौधेय-माद्रकाभीर-प्रार्जुन-सनकानीक-काक-खरपरिकादिभिश्च5 सर्व्व-कर -दानाज्ञाकरण-प्रणामागमन-
(L. 22.)-Whose imperious commands were fully gratified, by giving all (kinds of) taxes and obeying (his) orders and coming to perform obeisance, by the frontier-kings of Samatata, Davaka, Kamarupa, Nepala, Kartripura, and other (countries), and by the Mālavas, Arjunāyanas, Yaudheyas, Madrakas, Abhiras, Prārjunas, Sanakanikas, Kākas, Kharaparikas, and other (tribes). [5]

इससे अनुमान किया गया है कि काकवंश एक प्रमुख एवं प्राचीनवंश है जो गुप्तों के समय में राज्यसत्ता में था। उस समय इनकी सत्ता दक्षिण में थी। 11वीं शताब्दी तक ये वहां शासक रूप से रहे। तामिल भाषा में इन्हें काकतीय लिखा है।

दक्षिण में काकवंश - इस काकवंश का दक्षिण में होना ईस्वी सन् से कई सदियों पहले का माना गया है। राजपूत युग में इस वंश के वेटमराज नामक महापुरुष उपनाम त्रिभुवनमल ने महामंडलेश्वर की उपाधि धारण करके वरंगल को अपनी राजधानी बनाया। इनके पुत्र परोलराज का संवत् 1174 में लिखवाया हुआ शिलालेख मिला है जिस पर बहुत सी विजयों का वर्णन है। इसने अपने राज्य की भूमि को तालाबों से सींचे जाने का प्रबन्ध करके यश उपार्जित किया। इसके पुत्र रुद्र ने मैलिगीदेव का राज्य जीता और दोम्भ को हराया। संवत् 1219 और 1242 के शिलालेख इन घटनाओं को सम्पुष्ट करते हैं। दक्षिणी नरेशों में इसका स्थान विशिष्ट था। इसने अपनी विशाल एवं सुशिक्षित सेना के बल पर पूर्व में कटक, पश्चिम में समुद्र, उत्तर में मलयवन्त और दक्षिण में सेलम तक अपने राज्य की सीमायें बढा ली थीं। इसकी मृत्यु होने पर इसके भाई महादेव ने कुछ दिन राज्य किया। महादेव के पुत्र गणपति ने संवत् 1255 में राज्य पाकर चोल राज्य को जीता और दक्षिण के प्राचीन राज्यवंशों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थिर किए। पांड्यों से इसे हानि उठानी पड़ी। इनकी दानमहिमा और सिंचाई विभाग के प्रति सतर्कता प्रसिद्ध रही। सम्राट् गणपति के समय के पश्चात् ईस्वी सन् 1309 (संवत् 1366) में


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-227


अलाउद्दीन खिलजी के प्रधानमंत्री मलिक काफूर ने देवगिरि को पार करके तेलंगाना राज्य पर, जिसकी राजधानी वरंगल थी, आक्रमण कर दिया। उस समय वहां का शासक काकतीय वंशज प्रताप रुद्रदेव था। इसने बड़ी वीरता से मुसलमान सेना का सामना किया। अन्त में विवश होकर सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ली। इस राजा ने मलिक काफूर को 300 हाथी, 7000 घोड़े और बहुत सा धन देकर संधि कर ली।

ऐतिहासिक मिश्रबन्धु के लेखानुसार मलिक काफूर ने इस चढाई में बीस हजार मन सोना वरंगल के चारों ओर से लूटा। यह लूट का माल 1000 ऊंटों पर लादकर दिल्ली लाया गया। इसके अतिरिक्त वरंगल के राजा प्रताप रुद्रदेव ने दिल्ली के सम्राट् को प्रतिवर्ष कर देना भी स्वीकार कर लिया। उसने मलिक काफूर को कोहनूर हीरा और अपार धनराशि दी।

अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के पश्चात् वरंगल की राजा प्रतापदेव ने दिल्ली के बादशाहों को कर देना बन्द कर दिया। इसी कारण से बादशाह गयासुद्दीन तुगलक ने अपनी सेना से वरंगल पर आक्रमण कराया, परन्तु शाही सेना विफल रही। उसने दो वर्ष पश्चात् सन् 1323 (संवत् 1380) में अपने पुत्र द्वारा वरंगल पर फिर आक्रमण कराया। इस बार वरंगल के राजा की हार हुई और वरंगल का नाम सुल्तानपुर रखा गया। वहां से काक/काकतीय वंश की सत्ता समाप्त हो गई। वहां से ये लोग अपने उन प्राचीन वंशधरों से आ मिले जो कि मालवा, गुजरात, सिंध और मारवाड़ प्रान्तों में बसे हुए थे। सिंध में ‘ककस्थान’ क्षेत्र इसी काकवंश का बसाया हुआ है, जो आज भी विद्यमान है।

मरुस्थान (राजस्थान) में काकवंश -

काकवंश के लोगों ने मरुस्थल में मांडव्यपुर जीतकर मण्डौर नामक एक प्रसिद्ध किला बनवाया जहां पर हरिश्चन्द्र राजा हुए। किन्तु इस किले के निर्माण के पूर्व ही आठवीं शताब्दी में काकवंशी इधर विद्यमान थे। इनके दो शिलालेख मिले हैं। एक जोधपुर से चल मील पर मण्डौर के विष्णु मन्दिर से संवत् 894 चैत्रसुदी 5 का लिखवाया हुआ और दूसरा जोधपुर से 20 मील पर घटियाले से संवत् 918 चैत्रसुदी 2 का लिखवाया हुआ। इस पर काकवंश के वहां पर राज्य करने वाले राजाओं की वंशावली अंकित है। इस वंशावली में राजा हरिश्चन्द्र को वेदशास्त्रों का ज्ञाता लिखा है और उसकी भद्रा नामक रानी से भोगभट्ट, कक्क, रज्जिल और दद्द नामक चार पुत्रों की उत्पत्ति भी लिखी है। रज्जिल को राज्य मिला, जिसका पुत्र नरभट्ट उपनाम पेल्ला पेल्ली था। नरभट्ट का पुत्र नामभट्ट उपनाम नाहाड़ था, जिसने मेड़ता को अपनी राजधानी बनाया। इसके तात और भोज नामक दो पुत्र हुए। तात ने मांडव्य ऋषि के पुराने और पवित्र आश्रम में रहकर अपना जीवन बिताया। वह धर्म के पथ पर अडिग रहा जिससे उसकी बड़ी प्रसिद्धि हुई। इसकी परम्परा में यशोवर्द्धन, चन्दुक और शिलुक हुए।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-228


शिलुक के एक शिलालेख को सन् 1894 ई० के ‘जनरल रायल एशियाटिक सोसायटी’ के पृष्ट 6 पर उद्धृत किया गया है - शिलुक ने देवराजभट्टी का राज्य छीनकर त्रवणी और बल्ल देशों पर अपना राज्य स्थापित किया। बल्ल क्षेत्र के राजा देवराजभट्टी को पृथिवी पर पछाड़कर उसका राजसिंहासन और ताज छीन लिया। इस शिलुक के पुत्र झोट का बेटा भिलादित्य था जो अपने पुत्र कक्क को राज्य देकर हरद्वार चला गया, जहां पर 18 वर्ष बाद स्वर्गीय हो गया।

भिलादित्य के पुत्र कक्क ने व्याकरण तर्क आदि शास्त्र एवं शस्त्रों में पूर्ण निपुणता प्राप्त की। इसने मुद्रगिरि (मुंगेर) बिहार में गौण्डवंशियों को परास्त किया। भट्टीवंशी राजकुमारी पद्मिनी से विवाह करके इसने दोनों वंशों में सद्भावना स्थापित की। इस रानी से पुत्र बाऊक और दूसरी रानी दुर्लभदेवी से कक्कुक पुत्र का जन्म हुआ। इसका एक शिलालेख पटियाला में मिला है जिस पर लिखा है कि कक्कुक ने राज्याधिकार प्राप्त करके मरु, माड़, बल्ल, त्रवणी, अज्ज और गुर्जर वंशों में अपने सद्-व्यवहार से प्रतिष्ठा प्राप्त की। जनरल रायल एशियाटिक सोसायटी सन् 1895 ई० के पृष्ठ 517-518 पर लिखा है कि “कक्कुक ने रोहन्सकूप और मण्डौर में जयस्तम्भ स्थापित किए।” यह संस्कृत भाषा का महान् पण्डित था। एक शिलालेख का उल्लेख एपिग्राफिका इण्डिया के 9वें भाग में पृष्ठ 280 पर किया गया है। यह श्लोक राजा कक्कुक ने स्वयं बनाया था। इस विद्वान् राजा ने लिखा था कि “वह मनुष्य अतीव सौभाग्यशाली है जिसका यौवन काल विविध सांसारिक भोगों में, मध्यम-काल ऐश्वर्य में और वृद्धावस्था धार्मिक कार्यों में व्यतीत होती है।”

मण्डौर में काकवंश का पतन और हरयाणा को प्रस्थान -

इस कक्कुक के बाद इस वंश की राज्यसत्ता समाप्त हो गई और मण्डौर का शासन राठौरों के हाथ में आ गया। राव जोधा जी ने मण्डौर का ध्वंस करके जोधपुर नामक नगर को बसाकर वहां राजधानी और किले का निर्माण कराया। यहां से वैभवशून्य होने पर इस काकवंश के लोगों ने मरुभूमि को छोड़ दिया और यहां से जाकर हरयाणा के जींद जिले में रामरायपुर में अपनी सत्ता स्थिर की और बस्तियां बसाईं। यहां पर ये लोग कक्कर और काकराण नाम से आज भी प्रसिद्ध हैं। यहीं से जाकर इस वंश के जाट मेरठ कमिश्नरी, बिजनौर जिला और अम्बाला में जगाधरी के पास बस गए, जहां पर आज भी विद्यमान हैं। जगाधरी के निकट अरनावली गांव के काकराण जाट बड़े प्रसिद्ध हैं।

काकराण वंश की भूतपूर्व किला साहनपुर नामक रियासत जिला बिजनौर में थी। इस रियासत के काकराणा जाटों ने सम्राट् अकबर की सेना में भरती होकर युद्धों में बड़ी वीरता दिखाई और अपनी ‘राणा’ उपाधि का यथार्थ प्रमाण देकर मुगल सेना को चकित कर दिया। इनका वर्णन आईने-अकबरी में है। साहनपुर रियासत में काकराणा वंश के चौदह महारथी (वीर योद्धा) थे जिनके नाम से इस वंश की शाखा चौदहराणा भी है जो पर्वों के अवसर पर साहनपुर स्टेट में मूर्ति बनाकर पूजे जाते हैं1। चौदहराणा जाट मेरठ में ककोर कलां, सबगा और बिजनौर में सिसौना चन्दूपुरा गांव में बसे हुए हैं। जिला रोहतक में इनका पाकसमा गांव है। साहनपुर रियासत में काकराणा जाटवंश के राज्य का पूरा वर्णन उत्तरप्रदेश में जाटवीरों का राज्य के अध्याय में किया जायेगा। काकराणावंशी काकज़ई काबुल कन्धार में पठानों का एक बड़ा


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-229


दल है। कैलाशपुर जि० सहारनपुर के पठान भी काकजई हैं। राजपूत स्टेट बस्तर काकतीय है। अलीगढ़ जिले की इगलास तहसील के लगसमा क्षेत्र में ठकुरेले-काकराणों के 52 गांव जाटों के हैं जिनमें गौण्डा, डिगसारी, रजावल, कैमथल, कूंजीनगला, गडाखेड़ा, मातीवसी, तलेसरा, मल्हू, जथोली, पीपली, बजयगढ, देवनगला, सहरी, कारीकर आदि बड़े गांव हैं। इन 52 गांवों में से 100 गांव और बस गए हैं। इस क्षेत्र को लगसमा भी कहते हैं। यहां अगस्मादेवी का मन्दिर भी है।

काकराणा जाटों में के मेरठ में मसूरी, बणा, राफण, पहाड़पुर;

मुजफ्फरनगर में फईमपुर, राजपुर, तिलौरा, मीरापुर, दलपत, ककरौली गांव हैं।

महाराजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में कक (जाटवंश) वंशज राजा तथा इस वंश के बहुत से लोग आये और उन्होंने तोखी लम्बी तलवारें, फरसे, सहस्रों रत्न और दूर तक जाने वाले बड़े-बड़े हाथी भेंट किए। (महाभारत सभा पर्व अध्याय 51वां, श्लोक 26-31)।

दुर्योधन ने अपने पिता धृतराष्ट्र को बताया कि कुक्कुर (काकुस्थ जाटवंश) उत्तम कुल के श्रेष्ठ एवं शस्त्रधारी क्षत्रिय राजकुमार ने अजातशत्रु युधिष्ठिर को बहुत धन अर्पित किया। (महाभारत सभापर्व, 52वां अध्याय, श्लोक 13-17)।

काकराणवंश के शाखा गोत्र - 1. चौदहराणा 2. ठकुरेले[6]

References


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