Hathi Singh Jat

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Hathi Singh Kuntal

Hathi Singh Jat was a (Kuntal, Tomar) Chieftain of Saunkh in Mathura tahsil and district in Uttar Pradesh.

Chieftain of Saunkh in Mathura

Hathi Singh (हाथीसिंह) was a (Kuntal, Tomar) clan Chieftain of Saunkh in Mathura tahsil and district in Uttar Pradesh. Mathura memoirs mentions that Ch. Hathi Singh, a Khuntail Jat, occupied Saunkh and reconstructed the fort of Saunkh. This was at the time of Maharaja Suraj Mal. [1]

History

One incident has been mentioned by Ishwar Das is that when Prince Aurangzeb, on his way to oppose Dara Shikoh, came to the fords of Chambal, he found them barred by the opposite entrenchment. He was ignorant about other ferries, while the waters were deep. This perturbed Aurangzeb. At this critical juncture Hathi Singh Jat, a zamindar of Gohad, came forward to lead his troops to a neglected ford (Kanira), where from Aurangzeb crossed the Chambal. Though by itself a small incident, it in one stroke turned the scales against Dara. He had to hurry up for the Capital, leaving heavy artillery behind, which greatly weakened his position. [2] [3]

कुन्तलों का इतिहास

ठाकुर देशराज[4] लिखते हैं कि महाभारत में कुन्ति-भोज और कौन्तेय लोगों का वर्णन आता है। कुन्ति-भोज तो वे लोग थे जिनके कुन्ति गोद थी। कौन्तेय वे लोग थे, जो पांडु के यहां महारानी कुन्ती के पैदा हुए थे। महाराज पांडु के दो रानी थीं - कुन्ती और माद्री। कुन्ती के पुत्र कौन्तेय और माद्री के माद्रेय नाम से कभी-कभी पुकारे जाते थे। ये कौन्तेय ही कुन्तल और आगे चलकर खूटेल कहलाने लग गए। जिस भांति अपढ़ लोग युधिष्ठिर को जुधिस्ठल पुकारते हैं उसी भांति कुन्तल भी खूटेल पुकारा जाने लगा। बीच में उर्दू भाषा ने कुन्तल को खूटेल बनाने में और भी सुविधा पैदा कर दी। खूटेल अब तक बड़े अभिमान के साथ कहते हैं -

“हम महारानी कौन्ता (कुन्ती) की औलाद के पांडव वंशी क्षत्रिय हैं।”

भाट अथवा वंशावली वाले खूटेला नाम पड़ने का एक विचित्र कारण बताते हैं - “इनका कोई पूर्वज लुटेरे लोगों का संरक्षक व हिस्सेदार था, ऐसे आदमी के लिये खूटेल (केन्द्रीय) कहते हैं।” किन्तु बात गलत है। खूटेल जाट बड़े ही ईमानदार और शान्ति-प्रिय होते हैं।


7. ट्राइब्स एण्ड कास्टस् आफ दी नार्दन प्राविंसेस एण्ड अवध, लेखक डब्ल्यू. क्रुक।
8. सरस्वती। भाग 33, संख्या 3 ।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-559


वंशावली वाले इन्हें भी तोमरों में से मानते हैं ‘मथुरा सेमायर्स’ पढ़ने से पता चलता है कि हाथीसिंह नामक जाट (खूटेल) ने सोंख पर अपना अधिपत्य जमाया था और फिर से सोंख के दुर्ग का निर्माण कराया था। हाथीसिंह महाराजा सूरजमल जी का समकालीन था। सोंख का किला बहुत पुराना है। राजा अनंगपाल के समय में इसे बसाया गया था। गुसाई लोग शंखासुर का बसाया हुआ मानते हैं। मि. ग्राउस लिखते हैं -

"जाट शासन-काल में (सोंख) स्थानीय विभाग का सर्वप्रधान नगर था।1 राजा हाथीसिंह के वंश में कई पीढ़ी पीछे प्रह्लाद नाम का व्यक्ति हुआ। उसके समय तक इन लोगों के हाथ से बहुत-सा प्रान्त निकल गया था। उसके पांच पुत्र थे - (1) आसा, (2) आजल, (3) पूरन, (4) तसिया, (5) सहजना। इन्होंने अपनी भूमि को जो दस-बारह मील के क्षेत्रफल से अधिक न रह गई थी आपस में बांट लिया और अपने-अपने नाम से अलग-अलग गांव बसाये। सहजना गांव में कई छतरियां बनी हुई हैं। तीन दीवालें अब तक खड़ी हैं ।

मि. ग्राउस आगे लिखते हैं -

"इससे सिद्ध होता है कि जाट पूर्ण वैभवशाली और धनसम्पन्न थे। जाट-शासन-काल में मथुरा पांच भागों में बटा हुआ था - अडींग, सोसा, सांख, फरह और गोवर्धन2

‘मथुरा मेमायर्स’ के पढ़ने से यह भी पता चलता है कि मथुरा जिले के अनेक स्थानों पर किरारों का अधिकार था। उनसे जाटों ने युद्ध द्वारा उन स्थानों को अधिकार में किया। खूंटेला जाटों में पुष्करसिंह अथवा पाखरिया नाम का एक बड़ा प्रसिद्ध शहीद हुआ है। कहते हैं, जिस समय महाराज जवाहरसिंह देहली पर चढ़कर गये थे अष्टधाती दरवाजे की पैनी सलाखों से वह इसलिये चिपट गया था कि हाथी धक्का देने से कांपते थे। पाखरिया का बलिदान और महाराज जवाहरसिंह की विजय का घनिष्ट सम्बन्ध है।

अडींग के किले पर महाराज सूरजमल से कुछ ही पहले फौंदासिंह नाम का कुन्तल सरदार राज करता था।


1. मथुरा मेमायर्स, पृ. 379 । आजकल सोंख पांच पट्टियों में बंटा हुआ है - लोरिया, नेनूं, सींगा, एमल और सोंख। यह विभाजन गुलाबसिंह ने किया था।
2. मथुरा मेमायर्स, पृ. 376 ।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-560


पेंठा नामक स्थान में जो कि गोवर्धन के पास है, सीताराम (कुन्तल) ने गढ़ निर्माण कराया था। कुन्तलों का एक किला सोनोट में भी था।

कुन्तल (खूंटेल) सिनसिनवारसोगरवारों की भांति डूंग कहलाते हैं। लोग डूंग शब्द से बड़े भ्रम में पड़ते हैं। स्वयं डूंग कहलाने वाले भी नहीं बता सकते कि हम डूंग क्यों कहलाते हैं? वास्तव में बात यह है कि डूंग का अर्थ पहाड़ होता है। पंजाब में ‘जदू का डूंग’ है। यह वही पहाड़ है जिसमें यादव लोग, कुछ पाण्डव लोगों के साथ, यादव-विध्वंश के बाद जाकर बसे थे। बादशाहों की ओर से खूंटेल सरदारों को भी फौजदार (हाकिम-परगना) का खिताब मिला था।

हाथी सिंह का इतिहास और वंशावली

संदर्भ:- लेखक: कंवरपाल सिंह, पाण्डव गाथा, 2014

महाराजा हाथीसिंह का जन्म 17 वीं सदी के अन्त में सौंख गढ़ के स्वामी सुखपाल सिंह के घर हुआ. राजा हाथीसिंह को इंग्लिश इतिहासकारों ने हठी सिंह नाम से इनको संबोधित किया है. राजा हठी सिंह को ही हाथी सिंह नाम से इतिहास में जाना गया. कुछ लोग इसके पीछे का कारण यह बताते हैं कि अपने पूर्वज पांडवों की तरह उन में हाथी के समान बल था.

'पांडव गाथा' कविवर के शब्दों में

हम सुनाते है पांडव वीरों में
हठी सिंह हुए बड़े बलवान
सिहों से करता मल्ल युद्ध था
था जोश जवानी बचपन में उसके
दुश्मन की रण-भूमि मध्य
तड़िता सी चलती तेग उसकी
सन्मुख न एक भी मुग़ल बचे

भरतपुर नरेश सूरजमल के दरबारी कवि सुदन ने सुजान चरित्र में पेज 57 पर हठी (हाथी) सिंह का चित्रण निम्न प्रकार किया है:-

जीत रण हथिसिंह वीर बड्डा है
पाखर सुमल्ल जो करतु रण हडाक
जब होत असवार भुव मार के निवारक
तब खुटेला झुझार वीर वार दे

आगे यही लेखक पेज 109 पर लिखा है:-

सस्त्र्ज वस्त्र बधाई जान चढ़ दीये नर वाहन
झलझलात रस रूद्र नैन मानो कन दाहन
धरिय मुच्छ पर हथ्थ तथ्थ सैधुहि घुराहीय
गुण गाइक गावत चिरद गिर्द सुभट संघट्ट हुव
बल बढ़िय कधीय पुनि सदन तै महाधीर हाथीसिंह हूव

हाथी सिंह की वंशावली

अनंगपाल प्रथम (736-754) → वासुदेव (754-773) → गंगदेव/गांगेय (773-794) → पृथ्वीमल (794-814) → जयदेव (814-834) → नरपाल देव/वीरपाल (834-849) → उदय राज (849-875) → आपृच्छदेव → पीपलराजदेव → रघुपालदेव → तिल्हण पालदेव → गोपालदेव → सलकपाल/सुलक्षणपाल (976-1005) → जयपाल → कुँवरपाल (महिपाल प्रथम) → अनंगपाल द्वितीय (1051-1081) → सोहनपाल → जुरारदेव → सुखपाल → चंद्रपाल → देवपाल → अखयपाल → हरपाल → हथिपाल → नाहर → प्रहलाद सिंह (5 पुत्र, एक गोद किया) → सहजना (डूंगर सिंह ) → पाला सिंह → करना (करनपाल) → नौधराम → सुरतपाल → भीकम → लालसिंह → भूरिया(भूरसिंह) → अमर सिंह → गुलाब सिंह → सुखपाल → हठी सिंह/हाथी सिंह (1630 ?-) → श्याम सिंह

नोट - अनंगपाल द्वितीय (1051-1081) से 22 वीं पीढ़ी में हठी सिंह हुये. एक पीढ़ी का काल 25 वर्ष मानते हुये हठी सिंह का जन्म 1630 में परगणित किया गया है. अभिलेखों से इसकी पुष्टि किए जाने की आवश्यकता है.

यह वह दौर था जब वीर गोकुला धर्म के लिए बलिदान हो चुके थे. उनके साथ खुटेल पट्टी के सैकड़ों वीर बलिदान हुए. उनकी वीरता के किस्सों ने हाथी सिंह के बाल मन पर गहरा असर किया. उनके अन्दर जन्मजात विद्रोह के बीज अंकुरित हो गये थे. राजा हठीसिंह और राजा बदनसिंह (1722–1756), राजा चूड़ामण (r.1695 – 1721) के साथ मिल कर मथुरा में विद्रोह का बिगुल बजा दिया. औरंगज़ेब ने ब्रज संस्कृति को खत्म करने के लिए ब्रज के नाम तक बदल डाले थे. उसने मथुरा को इस्लामाबाद, वृन्दावन को मेमिनाबाद और गोवर्धन को मुहम्मदपुर का बना दिया था गोवर्धन में मानसी गंगा पर निर्मित मनसा देवी का भव्य मंदिर तोड़ दिया गया. इसके साथ सोनोठ के मनसा देवी के मंदिर में भी हमला किया जिस पर युद्ध के बाद मंदिर का कुछ हिस्सा बचा लिया गया था.

पुरखो का मान न खोवेगे
जाटों की शान न खोवेगे
निज जान भले ही खो देंगे
पर क्षत्रिय वान न खोवेंगे
पाना हमे पूर्वज का वैभव
यह कसम वीरों ने खाई थी

ब्रज के जाटों में गोकुला वीर, कान्हा रावत वीर की मृत्यु के बाद विद्रोह की कमान डीग क्षेत्र में वीरवर राजाराम और चूड़ामणि ने, खुटेल पट्टी क्षेत्र में हाथी सिंह और फौदा सिंह ने , चाहरवाटी में अनूप सिंह, रामकी चाहर (1732) ने संभाली. कुछ समय के लिए क्षीण हुई जाट शक्ति को गोवर्धन क्षेत्र में दुबारा स्थापित करने ने हाथी सिंह, फौदा सिंह, सीताराम खुटेल का योगदान रहा. राजा हठी सिंह ने मानसी गंगा पर दुबारा मनसा देवी के मंदिर का निर्माण करवाया जिसको आज भी ब्रह्म घाट पर देखा जा सकता है.

औरंगज़ेब ने ब्रज संस्कृति को खत्म करने के लिए ब्रज के नाम तक बदल डाले थे. उसने मथुरा को इस्लामाबाद, वृन्दावन को मेमिनाबाद और गोवर्धन को मुहम्मदपुर का बना दिया था. इन जगहों को उनके पुराने नाम से पहचान दिलवाने में इन वीरों का ही योगदान था. महाराजा हाथी सिंह ने सौंख के पुराने किले का पुन निर्माण करवाया.

अंग्रेजी इतिहास मि. ग्राउस लिखते हैं - हाथी सिंह (हठी सिंह) जाट के शासन-काल में मथुरा पांच भागों में बटा हुआ था - अडींग, सोसा, सांख, फरह और गोवर्धन. इन्होने गोवर्धन का नाम पुन मोहम्मदपुर से बदल कर गोवर्धन किया. साथ मानसी गंगा का पुन: निर्माण करवाया बाद में दिल्ली विजय के बाद भरतपुर नरेश जवाहर सिंह ने दिल्ली विजय के बाद कुसुम सरोवर का निर्माण करवाया.

इनके सौंख किले और गोवर्धन क्षेत्र के पुन निर्माण के बारे में विभिन्न इतिहासकारों के कथन

1. जर्मन इतिहासकार Annette Achilles-Brettschneider ने अपनी बुक die besonderen scherben" von sonkh में लिखा है- Die Nachkommen von Anangpal Tomar ließen sich in Sonkh nieder Zu seinen Nachkommen gehörte Jat Raja Ahlad Singh Ahlad Singh und König von Anangpals Nachkommen hatten Raja gesungen, der das Fort von Sonkh wiederaufgebaut hatte

अर्थ – अनंगपाल तोमर के वंशज सौंख में बस गए उनके वंशजों में जाट राजा अहलाद सिंह हुए थे. अहलाद सिंह और अनंगपाल के वंश में हठी सिंह राजा थे, जिन्होंने सौंख किले का पुनर्निर्माण किया था.

2. जर्मन बुक Jahrbuch der Stiftung Preussischer Kulturbesitz, Volume 12 में लेखक gebr पेज 136 पर लिखता है- Saunkh altes Fort, das von einem named hathi singh jat wieder aufgebaut wurde. Maharaja Hati Singh Soukch war zeitgenössisch für Maharaja Surajmal von Bharatpur.

अर्थ – सौंख के पुराने किला जिसका पुन निर्माण जाट राजा हठी सिंह ने करवाया था जो महाराजा सूरजमल के समकालीन थे.

3. German scholars on India contributions to Indian studies Volume 2 page 70-76-77 (लेखक -Friedrich Max Müller) - हिंदी रूपांतर – सौंख का किला मजबूत किला था जिसका निर्माण हठी सिंह ने करवाया. यह किला इसके 800 साल पहले भी मोजूद था.

4. रत्न चन्द्रिका – ओरिएंटल स्टडीज में लेखक देवेन्द्र हंडा और अश्वनी अग्रवाल पेज 76 पर लिखते हैं कि सौंख के किले पर राजा हठी सिंह राज करता था जो भरतपुर के राजा सूरजमल और जवाहर सिंह के समकालीन था |

5. Indian Archaeological Survey of India, 1975 phase 11 पेज 43 पर लिखा है कि सौंख के किले का पुन निर्माण जाट राजा हठी सिंह ने करवाया.

6. Mathura-Brindaban-The Mystical Land Of Lord Krishna नामक बुक के पेज 421 पर सौंख के किले का पुन निर्माण जाट राजा हठी सिंह ने करवाया.

7. बुद्धिस्ट इंडिया नामक बुक में रमेश चन्द्र शर्मा लिखते हैं - अनंगपाल के वंशज जाट राजा ने गोवर्धन का पुराना वैभव लोटा दिया. उसने सौंख के किले का दुबारा से निर्माण करवाया.

6. Cultural News from India, Volume 17 – 1976 सौंख के किले का अंतिम निर्माण हाथी सिंह नाम के जाट राजा ने करवाया था.


दिल्लीपति जाट महाराजा अनंगपाल के वंश में 22 वीं पीढ़ी में पांडव वंशी महाराजा हठी पाल का जन्म हुआ.

मथुरा मेमायर्स, पृ. 376 पर मि. ग्राउस लिखते हैं - हठी सिंह जाट के शासन-काल में मथुरा पांच भागों में बटा हुआ था - अडींग, सोसा, सांख, फरह और गोवर्धन जाट पूर्ण वैभवशाली और धनसम्पन्न थे।

महाराजा हठी सिंह के पिता महाराजा सुखपाल ने ब्रज के अन्य जाट वंशो के साथ मिलकर एक संगठन बनाया जिसका मुखिया मथुरा क्षेत्र में हठी सिंह, हाथरस - मुरसान में नंदराम जाट, भरतपुर क्षेत्र में चूड़ामणि को बनाया गया गया. ब्रज क्षेत्र को मुगलों के आतंक से मुक्ति दिलवाने में इन वीरों का बड़ा योगदान रहा.

The Jats - Their Role in the Mughal Empire के लेखक पंडित गिरीशचन्द्र द्विवेदी पेज 59 और 60 पर लिखते हैं कि तोमर खुटेल जाट सरदार सुखपाल सिंह, हठी सिंह, फौदासिंह अडिंग और सीताराम खुटेल पेंठा ने चुरामन के साथ मिलकर मुगलों के नाक में दम कर दिया. बाद में मुगलों ने हार कर चूरामणि , सरदार हठी सिंह, फौदासिंह अडिंग और सीताराम खुटेला पेंठा को जिन प्रदेश पर उन्होंने कब्ज़ा किया था उस का राजा घोषित किया.

'दस्तरूल इंसा’ के लेखक ‘यार मोहम्मद’ के अनुसार “आगरा तथा दिल्ली का शाही मार्ग दो महीने तक इन जाटों वीरों के कारण पूर्णतः बन्द रखा, जिससे हजारों यात्रियों को अपनी सरायों में ही रुकना पड़ा। इन काफिलों में सुप्रसिद्ध योद्धा अमीन्नुद्दीन सम्भाली की पत्नी भी शामिल थी। उसे भी जाट वीरों के कारण मार्ग में दो महीने तक रुकना पड़ा।

मुग़ल इतिहासकारों के अनुसार चूड़ामणि और हठी सिंह और नंदा जाट अमर सिंह जाट ने खुर्जा परगना में 1687 में मुगलों की छावनी लुट ली थी, जिसका बदला लेने के लिए बेदारबख्त को भेजा पर वह असफल रहा. उल्टा जाट वीर राजाराम ने अकबर की कब्र जला दी तब मुगलों ने बिशन सिंह आमेर को भेजा जो अपने सेनापति हरिसिंह खंगारौत के साथ मथुरा आया.

सितम्बर 1688 में विशन सिंह ने सौंख गढ़ी पर घेरा डाला यहाँ भयंकर युद्ध हुआ. इसको जीतने में मुगलों जैसी शक्तिशाली सेना को भी चार महीने लग गये. हठी सिंह के पिता उस समय यहाँ के अधिपति थे. कुछ इतिहासकारों ने हठी सिंह को यहाँ का शासक लिखा है. जनवरी 1689 में बड़े संघर्ष के और अपने कई अजय योद्धाओं को खोने के बाद ही मुग़ल और बिशन सिंह इस पर कब्ज़ा कर पाए परन्तु कुछ ही वर्ष बाद हठी सिंह ने इस पर पुन कब्ज़ा कर लिया.

गावत विजय गीत सुहागने चली आई बहि थान
जहाँ खड़े रण रस में सने वीर बहादुर खुटेल जट्ट जवान

(King of the world: the life and times of Shah Alam -- Michael Edwarde, p. 127)

ठाकुर चूड़ामणि सिनसिनवार और कुंवर हठी सिंह खुटेल के विद्रोह को रोकने के लिए 1716 ईस्वी में राजा जय सिंह को दिल्ली के मुग़ल बादशाह ने सेना दे कर हमला करने भेजा. फारसी अखबारात पेज 15 के अनुसार जयपुर के राजा जय सिंह और आगरा का मुग़ल प्रशासक नुसरतयार खान जय सिंह की सहायता के लिए सैनिक टुकड़ी लेकर आया. उन्होंने सौंख और थून की गढ़ी पर हमले की योजना बनाई. चूड़ामणि ने हठी सिंह के पिता के साथ मिल कर मथुरा और सहार परगनों पर लुट मचा दी. खुटेलों ने अडिंग और सौंख पर मुग़ल थानेदार की हत्या कर पुन कब्ज़ा कर लिया जाटों के आगे मुग़ल राजपूत संगठन विफल हो गया.

इर्विन भाग—1 पृष्ठ 324 के अनुसार (1716 -1718) के अभियान: थून और सौंख की गढ़ी को जीतने के लिए एक शाही सेना दिल्ली से रवाना की गयी. इसकी सूचना चूड़ामणि को गुप्तचरों से मिलने पर सिन खुंट की पंचायत की गयी जिसमे फौदासिंह को गोवर्धन से सिनसिनवार सरदारी के जंगल तक अपने छापामार सैनिकों को तैनात करने का आदेश पंचायत में दिया गया. साथ ही चूड़ामणि को थून के किले को मजबूत करने और हाथी सिंह को सौंख में रसद और हथियारों का संग्रह करने का निर्देश दिया गया. मुगलों की शाही सेना ने राधाकुंड पर कैम्प लगाया जिसको तोमरवंशी खुटेल जाटों ने छापामार कर लुट लिया.

अखबारात 13 जिल्हज हि. पृष्ठ-11 के अनुसार - सिनसिनवार वतन में प्रवेश करने से पहले मुग़ल सेना की टुकड़ी को बहज गाम के पास सौंख के तोमरवंशी जाट राजा हाथी सिंह खुटेल ने घेर लिया. इस समय हाथी सिंह के साथ अडिंग के जाट ठाकुर (राजा) फौंदासिंह के बड़े कुंवर अनूप सिंह(भुबन सिंह ), हाथी सिंह के पुत्र श्याम सिंह, तोफा सिंह ओर अपने पांच सहस्त्र सैनिकों के साथ शामिल हुआ. भीषण लड़ाई हुई जिसमे मुगलों के बहुत से सैनिक खेत रहे. खुटेल वीरों के आगे शाही सेना पीछे लड़ गई. फारसी लेखको ने इस लड़ाई को 13 जिल्हज के दिन होना लिखा है जो नवम्बर माह में हुई थी. इस युद्ध में चूड़ामणि के पुत्र मोहकम सिंह भी शामिल हुआ था जो उस समय सौंख के दुर्ग में आया हुआ था.

दिसम्बर में मोकहम सिंह सिनसिनवार और मुगलों की शाही सेना के मध्य थून के जंगलो में संघर्ष हुआ. शिवदास सिंह कृति के अनुसार जाटों के डुंग सरदारों ने मुगलों और जय सिंह के इस अभियान को असफल बना दिया.

मुगलों की छाती भी दहल उठी
जब हठी सिंह रण भूमि में आया

मेवात पर कब्ज़ा

इस समय तक पांडववंशी हठी सिंह इतने शक्ति शाली हो चुके थे. उन्होंने 1716 में मुगलों के मेवात पर कब्ज़ा कर लिया था. जनवरी के अंत में इन्होने मेवात के मुस्लिम नबाब को बंदी बना कर मेवात के मुस्लिमों से कर वसूल किया. उनकी चौकियां नष्ट कर दी. मेवात का मुग़ल प्रशासक चूहे की तरफ जाटों के कब्ज़े में था. भरतपुर में वीर चूड़ामणि मुगलों के नाक में दम किये हुए था. जाटों की शौर्य वीरता से पूरा विश्व गुंजायमान हो रहा था. जिसके बारे में कुछ इतिहासकारों का मत इस प्रकार है.

“मरू भारती वॉल्यूम - 42 राजस्थान साहित्य बिडला एजुकेशन ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित के अनुसार” - ।सौंख के शासक हठी सिंह ने मेवात के मुग़ल फौजदार सैयद को हरा कर मेवात पर कब्ज़ा कर लिया. तब नारनौल के मुग़ल फौजदार गैरत खान को मेवात भेजा. गैरत और हठी सिंह में युद्ध हुआ, जिसमें गैरत खान परास्त हो गया. नारनौल के मुग़ल फौजदार गैरत खान ने दिल्ली में मुगलों से सहायता भेजने को कहा. तब मुगलों ने 16 मार्च को दुर्गादास के साथ एक बड़ी फ़ौज मेवात भेजी. तब जाकर हाथी सिंह पर काबू पाया जा सका.

दुर्गादास राठोड ग्रंथमाला के लेखक ठाकुर सुखबीर सिंह गहलोत पेज 86 पर लिखते है कि सौंख के जाट रजा हाथी सिंह ने मेवात पर कब्ज़ा कर लिया. 18 फरबरी 1716 को दुर्गादास मुगलों के दरबार में उपस्थित हुआ. तब मुग़ल और जोधपुर रियासत में वैवाहिक सम्बन्ध बने और दुर्गादास को जाट राजा हाथी सिंह के विरुद्ध युद्ध अभियान पर भेजा.

स्वतंत्रता प्रेमी दुर्गादास राठोड़ नामक किताब में इस घटना का उल्लेख है कि हाथी सिंह के विरुद्ध युद्ध में मुगलों की पूरी ताकत लगाने के बाद भी पांच महीने बाद जुलाई में सफलता मिल पायी.

राष्ट्रीयवीर दुर्गादास नामक किताब के लेखक हुकम सिंह भाटी ने लिखा है कि 18 फरबरी 1716 को दुर्गादास मुगलों के दरबार में सलावत खान के साथ उपस्थित हुआ. मुगलों की सेवा करना स्वीकार कर लिया उसको जाट राजा हठी सिंह के विरुद्ध युद्ध अभियान पर मेवात भेजा गया. इस जाट वीर ने मेवात में कोहराम मचा रखा था.

मार्च 1716 से जुलाई 1716 तक पांच महीने 20 दिन तक यह युद्ध चला. अपने किले रियासत सौंख गढ़ से कई सौ किमी दूर मुस्लिम बाहुल्य मेवात में एक जाट राजा द्वारा दिल्ली की नाक के नीचे कब्ज़े जमाये रखना पड़ी बहादुरी का काम था. राजा हाथी सिंह के वीर रणबांकुरो ने मुगलों के सीने छलनी कर दिए. रोज होने वाली मुठभेड़ में मुगलों को ज्याद नुकसान उठाना पड़ रहा था. इस समय थून के सवामी चूड़ामणि भी खुल कर मुगलों की नाक में दम कर रहा था. निराश मुग़ल यह समझ चुके थे कि इन जाटों को लड़ कर जीतना लगभग असंभव है. इसलिए जब हठी सिंह को दबाया नहीं जा सका तब मुगलों ने दबाब की रणनीति अपनाई. उन्होंने जयपुर राजा जय सिंह के साथ 14 हज़ार की फ़ौज भरतपुर, थूनगढ़ और सौंख गढ़ की तरफ रवाना की ताकि जाट राजा चूड़ामणि और हाथी सिंह पर दबाब बना सके. वे जानते थे कि हठी सिंह के परिवार जन सौंख गढ़ में हैं और यह जाट जो मौत से भी नहीं डर रहे अपने परिवार जन की सुरक्षा के लिए अवश्य जाएगा. तब कही जाकर हाथी सिंह मेवात गढ़ी को खाली कर सकुशल ब्रज में पंहुचा. जहाँ जाट डूगो की विशाल पंचायत हुई. जुलाई में ही जाट वीरों ने जय सिंह को सबक सिखाने की तैयारी कर ली. सितम्बर में जय सिंह ने बूंदी के राजा और मुग़ल सूबेदार के साथ मिलकर युद्ध अभियान को तेज कर लिया, पर जाट तलवारों के आगे मुग़ल बह गए. वीर चूड़ामणि और हाथी सिंह , सोगरिया मुखिया, मोजिया चाहर की इस संयुक्त ताकत के आगे मुग़ल झुक गए.

राहदारी का अधिकार मिला

फौजदार और ठाकुर पदवी राहदारी का अधिकार हठी सिंह और चूड़ामणि को मिलना: 1720 ईस्वी में जाट पालों की ब्रज में पंचायत हुई. जिसमें चूडामणि को अध्यक्ष और हठी सिंह को मुख्य पंच चुना गया. मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह ने ब्रज के जाटों की सभी शर्त मान ब्रज से मुग़ल प्रशासकों के अधिकार छीन लिए गये. हिन्दुओं के धार्मिक स्थल मुगलों के कब्ज़े से मुक्त हो गये. सम्राट् मुहम्मदशाह ने इस समय चाहर, कुंतल, सिनसिनवार, सोगरवार पालों के मुखिया को को अधिकार देकर सम्मानित किया. जिसमें सिनसिनवार पाल का मुखिया चूड़ामणि और खुटेल पाल का मुखिया सुखपाल सिंह, चाहर पाल के राम सिंह, ठेनुवा पाल के मुखिया मुख्य थे. चूड़ामणि की मृत्यु 1921 में हुई. उसके कुछ महीने बाद मेवाती हमलवारों से लड़ते हुए सुखपाल सिंह की मृत्यु हो गयी. चूड़ामणि और सुखपाल की मृत्यु के बाद के एक अजीब घटनाक्रम घटित हुई. जाट डुंग (सिनसिनवार पाल, खुटेल (तोमर) पाल, चाहर पाल, सोगरवार पाल) और अन्य जाट पाल चूड़ामणि के उत्तराधिकारी के प्रश्न पर दो भागों में विभाजित हो गयी.

सिनसिनवार पाल के मुखिया बदनसिंह और कुंतल पाल के मुखिया फौदासिंह की बढ़ी हुई शक्ति से भयभीत होकर दोनों को 23 जनवरी 1726 को राजा (ठाकुर) पदवी और सिरोपाव मुग़ल बादशाह ने प्रदान किया. जयपुर इतिहास में यह तारीख भादो वदी 2 संवत 1783 अंकित है. साथ ही यह भी दर्ज है कि हठी सिंह और फौदाराम के पास 10 लाख आय का क्षेत्र इस समय मोजूद था. जयपुर इतिहास के अनुसार इसी वर्ष समझोते के बाद 1726 में कुम्हेर किले की नींव रखी.

सिन-खुंट संघ से जाटों की ताकत इतनी बढ़ गयी कि आमेर के राजा ने मालवा अभियान में उनसे सहायता मांगी. महाराजा सूरजमल ने अडिंग के राजा फौदासिंह कुंतल के पुत्र जैतसिंह और अपने पुत्र के नेतृत्व में एक सैनिक टुकड़ी सहायता के लिए भेजी.

उपेन्द्र नाथ शर्मा के अनुसार महाराजा सूरजमल ने अडिंग के राजा फौदाराम और सौंख के हाथीसिंह से सौंख के महल में मंत्रणा की और सिन-खुट गुट की यह एक सामान्य सभा थी. मई 1726 में हठी सिंह ने बालक सिंह को सेना सहित महाराजा सूरजमल की सहायता के लिए भेजा. दोनों ने फतेहगढ़ी पर हमला कर उसको खेमकरण से जीत लिया.यदु वंश का इतिहास लेखक गंगा सिंह के अनुसार सूरजमल ने 1732 को फतेहगढ़ी पर आक्रमण किया

मराठा पेशवा बाजीराव और हठी सिंह: "तारीखे के हिन्द" नामक मुग़ल कालीन दस्तावेज में इस घटना का ज़िक्र किया गया है. आमेर नरेश जयसिंह ने जाटों से सहायता की याचना की. मराठा पेशवा आगरा के रास्ते मथुरा होते हुए दिल्ली जा रहा है. वह जाट मुल्क में लूट-पाट कर सकता है. आप हमारी सहायता करें. बदन सिंह ने जाट सरदारों की सभा बुलाकर यह निर्णय किया कि जाटों की मुख्य चार पाल अपने अपने योद्धा भेजें जिसमे कौन्तेय (तोमर) पाल और सौंख के राजा हाथीसिंह ने अपने पुत्र श्याम सिंह और अडिंग के राजा फौदासिंह के नेतृत्व में 3 हज़ार की सेना भेजी. उनके सिनसिनवार पाल की तरफ से डीग महाराजा बदन सिंह ने कुंवर सूरजमल, तुलाराम, अखैसिंह के नेतृत्व में, सोगरिया पाल ने महाबल और रामबल के नेतृत्व में और चाहर पाल ने अमर सिंह और दयासिंह के नेतृत्व में सेनिक भेजे. जिनको पेशवा का रास्ता आगरा से आगे जाकर चम्बल के तट पर रोका. सेना पहुँच गया पर कुछ दिन वह वहीं डेरा डाले रहा, जाटों की मोर्चा बंदी के कारण आगे नहीं बढ़ा.

क्योंकि पेशवा की सेना का रास्ता खुटेल पट्टी से गुजरता तो पेशवा ने जाट पालों के प्रधानों को आश्वासन दिया कि जाट मुल्क जटवाडा में उसके सिपाही किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं करेंगे. उनके उत्तर से संतुष्ट हो कर पेशवा को मथुरा के रास्ते दिल्ली जाने दिया. पेशवा की सेना में किसी भी प्रकार का कोई नुकसान नहीं किया साथ ही दिल्ली से वापसी के समय उसने जयपुर रियासत के लालसोट होते हुए जाना उचित समझा, जहाँ मराठा सैनिकों ने मुग़ल और राजपूत थानों में लुट पाट की.

पथैना रासो

कवि चतुरानन्द (कवि चतुरा) गढ़ पथैना रासो में पथेना में हुए मुग़ल सआदत खान और जाटों के एक युद्ध का वर्णन किया गया है जो माघ सुदी 11 सन् 1777 को लड़ा गया. मुग़ल सेनापति अमीर उलउमरा मिर्जा नजफखां (अब्दाली का प्रतिनिधि) के साले सआदत खान को टोडाभीम के कुछ भाग की जागीरी दी गयी. इन युद्ध के समय हाथी सिंह की मृत्यु हो चुकी थी सौंख पर उनके पुत्र तोफा सिंह का राज था.

सआदत खान पथैना के जाट जागीरदार से खिराज की मांग कर रहा था जिसको जाट सरदारों ने ख़ारिज कर उसको युद्ध को ललकारा. इस युद्ध में सभी जाट डुगों-पालों ने भाग लिया. इसमें सौंख और अडिंग के पांडव वंशी खुटेल जाटों ने तोफा सिंह शीशराम सिंह के साथ युद्ध में सेना भेजी. खुटेल सेना का संचालन तोफा सिंह ने किया. सआदत खान ने भैसिना गाम में पड़ाव डाला. इस समय भरतपुर नरेश रणजीत सिंह थे, जिन्होंने भी कुम्हेर से एक सैनिक टुकड़ी युद्ध स्थल पर भेजी. इस युद्ध में जाटों की वीरता के कारण सआदत खान ने संधि वार्ता के लिए सेठ सवाई राम को भेजा पर कोई हल नहीं निकला. जब युद्ध ख़त्म हो गया सभी खाप डुंग के सरदार अपने अपने गढ़ में लोट गये और पथैना के ठाकुर किशन सिंह सिनसिनवार पर अचानक मार्च के महीने में दूसरी बार हमला किया.

कवि चतुरानन्द ने रणभूमि में खुटेल सरदारों का मनमोहक वर्णन किया है:

काल खण्ड के खूटेल आये मुच्छ ऊचे को किये|
द्व-द्व धरे तरबार तीखी चाव लरिब को हिये||
तोफा सिंह आइयो ल साथ खुटेल सग ही |
जो सबै रण समरथ बलि अरि काटी डारे जग ही |
दाखिल गढ़ भीतर भये जिन मुख बरसात नूर ||


चतुरानन्द कवि ने लिखा है तोफा सिंह ,शीशराम सिंह और सैकड़ो खुटेल रणभूमि के वीरो को लाया जिन्होंने युद्ध में दुश्मनों को ज काट डाला तोमरवंशी खुटेलों की वीरता के कारन कवि चतुरानन्द ने पथेना के युद्ध में सौंख , अडिंग के इन तोमर वंशी खुटेलो को मुगलों के काल लिखा है जिन्होंने अपनी तलवार की धार में सैकड़ो मुगलों का रक्त बहा दिया इस युद्ध में सआदत खान के पठानों मुगलों के खिलाफ खुटेल वीरो ने दोनों हाथो से तलवार चलाकर जोहर दिखाए जब यह तोमरवंशी खुटेल पथेना गढ़ में दाखिल हुए तो इनका स्वागत किया गया उनके मुख पर रण में विजय होने की चमक थी यह जीत प्रथम हमले पथेना युद्ध में हुई

इसने हठी सिंह के पुत्र तोफा सिंह का वर्णन भी किया है की उसने दुश्मनों को सभी जगह कठिन से कठिन मोर्चे पर दुश्मन के रक्त से अपनी तलवार की भूख शांत की


खुटेल एक तोफा
वह चतुर सामिल भयो
वाने मारे मोरचा बढ़ो

1777 का सोंख युद्ध

मुग़ल सेनापति अमीर उलउमरा मिर्जा नजफखां (अब्दाली का प्रतिनिधि) ने 1777 पर भरतपुर पर हमले की योजना बनाई. यह वह दौर था जब जवाहर सिंह की मृत्यु के बाद सिर्फ 10 साल में तीन राजा (रतन सिंह, केहरी सिंह, रणजीत सिंह) गद्दी पर बैठ चुके थे. सभी जाट पाल आपस में लड़ रही थी और अपनी ताकत को कमजोर कर रही थी. समरु और मैडिक की सहायता से मुग़ल सेनापति अमीर उलउमरा मिर्जा नजफखां (अब्दाली का प्रतिनिधि) ने जाट राज्य पर चढ़ाई करके उस समय नजब खान ने डीग पर हमले की योजना बनाई और वो गोवर्धन के समीप पहुंच गया. खुटेल वीरों ने उस की सेना की रसद लूट ली. दिसम्बर महीने 1777 में नजब खान ने सौंख के किले को घेर लिया खुटेल वीरों ने नजब खान की सेना के छक्के छुड़ा दिए. समरु और मैडिक जो पहले जाटों के साथ थे, गद्दारी कर मुगलों से जा मिले. इन्होने गुप्त रास्ते और किले से सम्बंधित गुप्त जानकारी नजब खान को दे दी.

अब महाराजा अनंगपाल के वंशजों ने अंतिम युद्ध से पहले अपनी कुल देवी मंशा देवी की स्तुति की. तोफा सिंह की सेना में अपने 5000 सैनिक थे, तो दूसरी तरफ मुगलों, पठानों और फ्रांस सेना के प्रशिक्षित कुल 70,000 सैनिक थे. पंडित गोकुलराम चौबे के अनुसार 11 दिसम्बर 1777 को भयंकर युद्ध हुआ.

अनंगपाल के वंशज खुटेल वीर जट्ट प्रथम पहर में मुगलों के लिए काल सिद्ध हुए. प्रथम हमले में मुगलों के हरावल को वीरों ने पीछे धकेल दिया. तब समरू ने अपनी बंदूकची सेना को आगे किया. प्रशिक्षित बंदूकची सैनिकों के छुप कर किये वार से तोफा सिंह (हाथी सिंह के पुत्र) घायल हो गये. इस युद्ध में मुगलों की सहायता पांडिचेरी (पण्डिच्चेरी) के फ्रांसीसी गवर्नर एम० चवलियर (M. Chevalier) ने की क्योंकि मुग़ल बादशाह शाहआलम ने अंग्रेजों के खिलाफ फ्रांसीसी गवर्नर को मदद करने का आश्वासन दिया हुआ था. गद्दारों ने हाथीसिंह (हठी सिंह) सेना और किले की समस्त जानकारी पहले ही मुगलों को दे दी थी इसलिए कवि ने लिखा है –

जाट हारा नहीं कभी रण में
तीर तोप तलवारों से,
जाट तो हारा हैं,गद्दारों से

Fall of Mughal Empire पेज 100 के लेखक जदुनाथ सरकार के अनुसार इस युद्ध में 3000 अनंगपाल के वंशज खुटेल जट्ट वीरों ने वीरगति पाई. मुग़ल सेना को जाटों से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा, मुगलों के आधी से ज्यादा सैनिक या तो घायल हो गये या मारे गए. तोफा सिंह समेत सभी मुख्य सरदार मारे गये. जिस कारण से सौंख के किले पर मुगलों ने कब्ज़ा कर लिया. इस किले को नष्ट कर दिया गया. नजब खान इस युद्ध में हुई हानि और अपने मुख्य योद्धाओं को खोने के कारण इतना अधिक विचलित हुआ कि उसने इस क्षेत्र की निर्दोष जनता पर अत्याचार करना शुरू कर दिए. पर शेष बचे खुटेल वीरों ने नजब खान को इतना परेशान किया कि उसे अपनी सैनिक छावनी यहाँ से उठानी पड़ी. इस युद्ध के बाद भी वीरों ने छापामार युद्ध कला से मुगलों को भारी नुकसान किया. इसके बाद नजफ़ खान ने डीग पर कब्ज़ा जमा लिया था.

'इन्तखाब्बुतवारीख’ में लिखा है- डीग के एक तरफ सिनसिनवार देश तो दूसरी तरफ कुछ ही दूर खुटेल पट्टी थी. नजब खान जानता था की जाट डीग और सौंख पर दुबारा कब्ज़ा कर लेंगे. उसकी रसद का मार्ग खुटेल पट्टी से गुजरता था. उसको लूट लिया जाता था. उस समय भरतपुर के नरेश महाराजा रणजीत सिंह थे. अजान के जागीरदार जयसिंह कुंतल सांतरूक के हरसुख जी उनके रिश्तेदार थे. दोनों की सम्मिलित ताकत ने उपद्रव शुरू कर दिए, इसलिए नजब खान ने हार कर यह क्षेत्र अब भरतपुर राजा के अधीन दे दिया. ऐसा करके वह जाटों के कोप से उत्पन्न हुए झगड़ों से निश्चिन्त हो गया.

References


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