Jat History Thakur Deshraj/Chapter XI

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जाट इतिहास
लेखक: ठाकुर देशराज
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एकादश अध्याय : मालवा के जाट-राज्य

मालवा नामकरण

दशपुर का किला मंदसौर

इस प्रदेश का नाम मालवा क्यों पड़ा? ऐसा प्रश्न होना स्वाभाविक है। हमारे मत से तो मल्ल लोगों के कारण इसका नाम मालवा पड़ा है। मल्ल गण-तन्त्री थे और वे महाभारत तथा बौद्ध-काल में प्रसिद्ध रहे हैं। ये मल्ल ही आगे चलकर, सिकन्दर के समय में, मल्लोई के नाम से प्रसिद्ध थे। इस समय इनका अस्तित्व ब्राह्मण और जाटों में पाया जाता है। ‘कात्यायन’ ने शब्दों के जातिवाची रूप बनाने के जो नियम दिए हैं, उनके अनुसार ब्राह्मणों में से मालवी और क्षत्रियों (जाटों) में माली कहलाते हैं ये दोनों शब्द मालव शब्द से बने हैं। मल्ल लोग विदेहों के पड़ौसी थे। इधर कालान्तर में आये होंगे। पहले यह देश अवन्ति के नाम से प्रसिद्ध था। राजा विक्रमादित्य इसी देश में पैदा हुए थे। मालवा समृद्धिशाली और उपजाऊ होने के लिए प्रसिद्ध है। पंजाब और सिन्ध की भांति जाटों की निवास भूमि होने का इसे सौभाग्य प्राप्त है। जाटों का इस धन-धान्य के सम्पन्न भूमि पर राज्य ही नहीं, किन्तु साम्राज्य रहा है। खेद इतना है कि उनके राज्य और साम्राज्य का पूरा हाल नहीं मिलता। अब तक जो सामग्री प्राप्त हुई है, वह गौरवपूर्ण तो अवश्य है, किन्तु पर्याप्त नहीं है।

ईसा से चार शताब्दी पूर्व का इतिहास अंधकार में है और जो मिलता भी है, वह क्रमबद्ध नहीं। महाभारत काल में उज्जैन में बिन्दु और अनुबिन्दु नाम से राजा राज करते थे। उनका राज्य द्वैराज्य-प्रणाली पर चलता था। वे अवश्य ही दो जातियों की ओर से चुने हुए होंगे। इस तरह उनका राज्य ज्ञाति-राज्य था। वर्तमान में जिस देश को मालवा कहते हैं, उसमें दशार्ण, दशार्ह, मालवत्स्य, कुकर, कुन्ति, भोज, कुन्तल और चर्मन् आदि अनेक जाति-समूह रहते थे। धारानगर के निकटवर्ती प्रदेश में भोज और मन्दसौर के आसपास दशार्ण और दशार्ह लोगों का राज्य था।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-706


आज के मन्दसौर का पूर्व नाम दशपुर अथवा दसौर था।1 चम्बल के किनारे पर चम्पानगरी में चर्मन्वत लोगों का राजा था। भारत के राष्ट्रीय इतिहास में (जिसे कि श्री विजयसिंह जी पथिक लिख रहे थे) दशार्ण लोगों को दस जातियों का समूह माना गया है। किन्तु प्राचीन ग्रन्थों में वे एक ही जाति के माने गए हैं।

इन जातियों के अलावा इस देश पर मौर्य, गुप्त, अन्धक और पंवार लोगों का भी राज रहा है। ये जातियां मालवा-प्रदेश से बाहर की थीं और इन्होंने ऊपर लिखे प्रजातंत्रों को नष्ट करके अपना राज्य जमाया था। इनसे पहले यहां मल्लोई जाति का प्रजातंत्र बहुत बड़ा था। सिकन्दर के समय के साथ क्षुद्रक लोगों का भी पता इनके ही पड़ौस में लगता है। इन सब जातियों में से कुछ न कुछ समूह जाट और राजपूत दोनों में पाए जाते हैं। किन्तु दशपुरिया, भोज और कुन्तल केवल जाटों में ही मिलते हैं। मालवा में बांगरी लोगों का भी आधिपत्य रहा था और उनके नाम से एक हिस्से का नाम बांगर प्रसिद्ध हो गया था। उनका निशान ब्राह्मण और जाट जातियों में मिलता है।

विष्णुवर्द्धन

मालवे के बाहर से आने वाले जाति-समूहों ने यहां के गणवादी और ज्ञातिवादी राज्यों को बहुत हानि पहुंचाई। अपनी स्वाधीनता की रक्षा के लिए उन्होंने लम्बे अरसे तक लड़ाइयां लड़ीं, किन्तु साम्राज्यवादियों द्वारा वे पराजित और अर्द्धमूर्च्छित कर दिए गए। कई शताब्दियों के पश्चात्, गणवादियों में विवश होकर अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए, एकतंत्र के प्रति रुचि जागी। उनमें से कुछ महामना व्यक्ति आगे बढ़े और अपने राज्य, कई-कई ने अपने साम्राज्य भी स्थापित किए। ज्ञातिवादी (जाट) लोगों में से ऐसे महानुभावों में कनिष्क, शालेन्द्र और यशोधर्मा के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। महाराज विष्णुवर्द्धन सम्राट् यशोधर्मा के पिता थे।

महाराज विष्णुवर्द्धन जिन्हें कि कहीं-कहीं विष्णुधर्मा भी लिखा गया है, वरक् वंश के जाट थेबयाने में जो उनका विजय-स्तम्भ है, उस पर उनका नाम वरिक् विष्णुवर्द्धन लिखा हुआ है।2 आज की स्थिति में वरक् या वरिक् वंश अधिक प्रसिद्ध नहीं है। उसका केवल अस्तित्वमात्र मौजूद है जो कि जाटों के गोत्रों की लम्बी सूची में आ जाता है।3 सी. वी. वैद्य ने अपने ‘हिन्दु मिडिवल इण्डिया’ में


1. भारत का राष्ट्रीय इतिहास। श्री बी. एस. पथिकजी द्वारा लिखित (अप्रकाशित)।
2. ब्रजेन्द्र वंश-भास्कर में बयाने का वर्णन।
3. जाटों की उत्पत्ति और इतिहास, पृ. 48


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विष्णुवर्द्धन के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा है-

The kingdom of Molapo or western Malwas belonged to Yasodharman Vishnuvardhan of the Mandsaur inscription. In our surmise, their name ending Vardhana shows that he was a Vaisya like the Guptas1. His great exploit was that he defeated Mihirgula, the Hun. Now we already quoted the sentence in Chandra's Grammar अजय जर्टो हुणान "The Jats conquered the Huns." If we apply this sentence to Yashodharman and there is none else to whom I can well be applied, we may surmise that he was a Jarta or Jat from the Punjab. In fact, like the Gujars of Bhinwal, we may suppose the Jats from the Punjab to have migrated to Malwa (which like Rajputana is a favourite land with Migrators) to take refuge from the invasions of the Huns and these Jats in Malwa of getting strong under Yasodharman inflicted in 528 A.D. a signal defeat on the Huns who had over-run their motherland, the Punjab.

अर्थात्-मालायो या पच्छिमी मालवे का राज मन्दसौर के शिलालेख वाले यशोधर्मा व विष्णुवर्द्धन के अधिकार में था। हमारे अनुमान में नाम के वर्द्धन से यह ज्ञात होता है कि वह गुप्तों की भांति वैश्य था। उसकी महान् वीरता का काम यह था कि उसने मिहिरकुल हूण को जीत लिया था। चन्द्र के व्याकरण के इस वाक्य को ‘अजयज्जर्टो हूणान्’ जाटों ने हूणों को जीत लिया, हम उद्धृत कर ही चुके हैं। अगर हम इस वाक्य का प्रयोग यशोधर्मा पर करें क्योंकि यह किसी अन्य पर प्रयोग भी नहीं हो सकता है तो वह (यशोधर्मा) पंजाब का जर्ता या जाट था। वास्तव में भीनमाल के गूजरों की तरह हम यह अनुमान कर सके हैं कि पंजाब के जाट लोग मालवा में जा बसे,2 (जो कि राजपूताने की तरह बसने वालों के लिए इष्ट देश है) और वह वहां हूणों के धावों से बचने के लिए चले गए और यशोधर्मा के आधिपत्य में 528 ई. में इन जाटों ने हूणों को पूर्ण रूप से हरा दिया


1. वैद्यजी के इस अनुमान की निस्सारता हम दूसरे अघ्याय में सिद्ध कर चुके हैं। वर्द्धन नाम से यदि वैद्यजी विष्णुवर्द्धन को अथवा उसके सजातीय जाटों को वैश्य मानते हैं तो क्या वैदिक-कालीन दिवोदास को दास शब्द साथ आने से शूद्र मानेंगे? (लेखक)।
2. किन्तु अति प्राचीन काल से वहां रहते थे जो दशार्ण और भोज कहलाते थे और आज दसौर, दशपुरिया और भोजू कहलाते हैं। (लेखक)।

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था, जो कि उनकी मातृभूमि पंजाब में अत्याचार कर रहे थे।

बयाना जो कि इस समय भरतपुर राज्य का एक प्रसिद्ध नगर गिना जाता है में, महाराज विष्णुवर्द्धन का एक स्तंभ है, जो भीम की लाट के नाम से मशहूर है। इससे पता चलता है कि उनका राज्य इतना विस्तृत था जिसमें बयाना भी आ जाता था। ब्रजेन्द्र-वंश-भास्कर के लेखक ने लिखा है कि वरिक विष्णुवर्द्धन ने संवत् 428 में यहां यज्ञ किया था। हमारे मत से यह समय संवत् 528 के आसपास का है, क्योंकि यशोधर्मा ने संवत् 586 अर्थात् सन् 529 के आसपास हूणों को हराया था। यदि ब्रजेन्द्र-वंश-भास्कर में दिए हुए (संवत् 428) को ही ठीक मानें तो विषणुवर्द्धन का समय संवत् 400 संवत् 550 के बीच का अर्थात् 150 वर्ष के लगभग मानना पड़ता है और यदि हम मान लें कि यशोधर्मा ने लगभग अस्सी वर्ष की आयु में हूणों को हराया तो इस तरह विष्णुवर्द्धन का शासन-समय 90-95 का मानने से भी काम चल जाता है।

जनरल कनिंघम के मत से, काश्मीर के प्रवरसेन का समय 423 ई. है।1 प्रवरसेन यशोधर्मा का समकालीन था, क्योंकि उसने यशोधर्मा के पुत्र शिलादित्य को काश्मीर ले जाकर गद्दी पर बिठाया था। यदि इस मत को सही मान लिया जाए तो ब्रजेन्द्र-वंश भास्कर में दिए हुए विषणुवर्द्धन के यज्ञ संवत् 428 अर्थात् सन् 371 को मानने में कोई आपत्ति नहीं रहती। किन्तु इतिहासवेत्ताओं का एक बड़ा दल इसी मत का पोषक है कि यशोधर्मा ने हूणों को 529 ई. के लगभग हराया। इस तरह विष्णुवर्द्धन के जय (यज्ञ) स्तंभ का समय संवत् 528 के आसपास का मानना ही ठीक है।

श्री सी. वी. वैद्य इन जाट नरेशों का शासनकाल 500 ई. से 641 ई. तक मानते हैं। किन्तु हमें इनका समय सन् 340 ई. से आरम्भ होने का पता चलता है। उस समय इनकी स्थिति यशोधर्मा जैसे सम्राट की जैसी तो न थी, किन्तु मालवे के पश्चिमी हिस्से पर राज्य इनका अवश्य था। जिस समय उज्जैन में गुप्त राजाओं का शासन था, उसी समय मन्दसौर में इनका भी राज था। इनमें से एक-दो नरेश तो गुप्तों के मांडलिक भी रहे थे। गुप्त राजाओं के साथ-साथ ही, एक-दूसरे राजवंश को भी राज करते हुए मालवा में हम देखते हैं। उस राजवंश की सूची इस प्रकार प्राप्त होती है-

सिंहवर्मा

यह समुद्रगुप्त का समकालीन था। समुद्रगुप्त गुप्त-वंश का परम प्रतापी राजा हुआ है जिसका कि शासन ईसवी सन् 335 से 385 तक बताया


1. राजतरंगिणी - कमल बाबू-हरिश्चन्द्र भारतेन्दु द्वारा संपादित।

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जाता है। सिंहवर्मा के दो पुत्र चन्द्रवर्मा और नरवर्मा हुए। चन्द्रवर्मा ने मालवा से हटकर पुष्करन (मारवाड़)? में राज्य स्थापित किया और नरवर्मा मालव-राज बने रहे। नरवर्मा के पुत्र हुए, बंधुवर्मा और भीमवर्मा। गुप्तों का प्रभाव बढ़ गया था इसलिए बंधुवर्मा को उज्जैन के गुप्त राजाओं की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। भीमवर्मा ने कुमारगुप्त प्रथम के पुत्र स्कंदगुप्त विक्रमादित्य के यहां सामन्त के स्थान पर रहना स्वीकार कर लिया और वह सम्भवतः कौशाम्बी का सामन्त बनाया गया। स्कन्दगुप्त का समय ईसवी सन् 455 से 467 तक का है।1

गुप्त-वंश के स्कंधगुप्त विक्रमादित्य के चालीस वर्ष पश्चात् उज्जैन की राजगद्दी पर भानुगुप्त बालादित्य बैठता है। जाट नरेश यशोधर्मा के साथ हूणों को हराने में इसी बालदित्य का नाम आता है।2 यदि बंधुवर्मा के बाद विष्णुवर्द्धन का नाम जोड़ दें तो यह वंश-सूची इस प्रकार बन जाती है -

  • सिंहवर्मा,
  • इनके दो हुए - चन्द्रवर्मा और नरवर्मा।
  • नरवर्मा का एक पुत्र था - विश्ववर्मा।
  • इसके दो पुत्र हुए - रघुवर्मा और भीमवर्मा।
  • रघुवर्मा का पुत्र विष्णुवर्द्धन था और इनका यशोधर्मा,
  • यशोधर्मा का शीलादित्य हुआ।
Victory pillar of Yashodharman at Sondani, Mandsaur

बंधुवर्मा जो कि प्रथम कुमारगुप्त और समुद्रगुप्त का समकालीन था, यशोधर्मा की हुण-विजय से 70-80 वर्ष पहले मालवा के पच्छिमी हिस्से अर्थात् मन्दसौर का शासक था। यहां से उसके समय का एक लेख मिला है। मन्दसौर में रेशम के कारीगरों का बनवाया हुआ एक सूर्य का मन्दिर था। जीर्ण हो जाने के कारण बन्धुवर्मा ने मालव संवत् 530 तदनुसार सन् 473 ई. में इसकी मरम्मत कराई थी। इसी सुकृत्य का उस लेख में वर्णन है। अर्थात् बन्धुवर्मा दशपुर (मन्दसौर) में सन् 473 तक मौजूद था। बन्धुवर्मा के बाद मन्दसौर के शासक विष्णुवर्द्धन ने बयाना में विजय स्तंभ खड़ा किया था, जिसके कारण बयाने का नाम भी विजयगढ़ पड़ गया था, अवश्य ही गुप्तों से स्वतंत्रता प्राप्त की होगी। बन्धुवर्मा यदि वर्द्धन के पूर्वजों में न होकर शत्रुओं में रहा होता तो मन्दसौर के शिलालेखों में अवश्य ही उससे मन्दसौर छीनने का वर्णन होता। बन्धुवर्मा से मिले हुए राज्यों को पाकर थोड़े ही समय में विष्णुवर्द्धन व यशोधर्मा ने सम्राट-पदवी धारण कर ली। हमें यह भी लिखा मिलता है कि यशोधर्मा के पिता विष्णुवर्द्धन ने महाराधिराज की पदवी धारण की थी।3


1. यह वंश-सूची जयशंकर ‘प्रसाद’ के ‘स्कंदगुप्त विक्रमादित्य’ नामक नाटक के परिशिष्ट में भी दी हुई है।
2. भारत के प्राचीन राजवंश, भाग 2
3. काशी नगरी प्रचारिणी पत्रिका, भाग 2, अंक 3, पृ. 342
? पुष्करन मारवाड़ में स्थित न होकर बांकुरा जिला पश्चिम बंगाल में है। Laxman Burdak (talk) 07:04, 19 September 2015 (EDT)


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-710


यशोधर्मा

Victory pillar of Yashodharman at Sondani, Mandsaur

भारत क्या, संसार के इतिहास में हूणों के आक्रमण प्रसिद्ध हैं। इन्होंने यूरोप और एशिया दोनो ही जगह उथल-पुथल मचा दी थी। जाट-जाति के लिए यह सर्वत्र नाशकारी सिद्ध हुए। किन्तु यूरोप और एशिया दोनो ही स्थानों पर जाटों ने इनकी शक्ति का सामना किया। यद्यपि जाट भी इनके युद्धों में क्षीणबल हो गए, किन्तु उन्होंने हूणों के बढ़ते हुए प्रभाव को इतना धक्का पहुंचाया कि आज हूणों की न कोई स्वतंत्र जाति है और न राज्य। सुदूर कश्मीर में अवश्य कुछ दिन उनका राज्य रहा। यूरोप को रोंदते हुए इनका दल जब रोम पहुंचा तो वहां के गाथ (जाट) योद्धाओं ने ऐसा लोहा बजाया कि उन्हें उलटे पैरों लौटना पड़ा। भारत में आने पर भी जल-प्रलय की भांति जब ये आगे बढ़ने लगे तो मध्य-भारत के अधीश्वर महाराजा यशोधर्मा ने इनको ऐसा खदेड़ा कि कश्मीर में जाकर दम लिया।

यशोधर्मा के समय के तीन शिलालेख प्राप्त हुए हैं। ये तीनों ही मन्दसौर में पाए गए हैं। इनमें एक शिलालेख मालव संवत् 589 ईसवी (सन् 532) का है। इन लेखों में से पहले लेख में लिखा है-

Text

ये भुक्ता गुंप्तनाथैर्न्न सकलवसुधाक्क्रान्तिदृष्टप्रतापै -

र्न्नाज्ञा हूणाधिपानां क्षितिपतिमुकुटाध्यासिनी यान्प्रविष्टा।।

... ... ... ...

... ... ... ...

आलौहित्योप मण्ठात्तलवनगहनोपत्यकादामहेंनद्रा-

दागंगाश्लिष्टसानोस्तुहिनशिखरिणः पश्छिमादापयोधे।।

सामन्तैर्यस्य बाहुद्रविणहृततदैः पादयोरानमद्भिः।

... ... ... ...

नीचैस्तेनापि यस्य प्रणतिभुजबलावर्ज्जनक्लिष्टूर्ध्ना-

चुडापुष्पोपहारैर्मिहिरकुलनृपेणार्चितं पदयुग्मं ।।

Mandasor Pillar Inscription of Yashodharman

अर्थात्- प्रबल पराक्रमी गुप्त-राजाओं ने जिन प्रदेशों को नहीं भोगा था और न अतिबली हूण राजाओं की ही आज्ञाओं का जहां तक प्रवेश हुआ था, (ऐसे प्रदेशों पर भी महाराज यशोधर्मन् का राज है)। पूर्व मे लौहित्य नदी अर्थात ब्रह्मपुत्र से लेकर पश्चिम में समुद्र तक और


1.काशी नगरी प्रचारिणी पत्रिका, भाग 2, अंक 3, पृ. 342

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-711


उत्तर में हिमालय से दक्षिण में महेन्द्र पर्वत के सामन्त जिसके पैरों में गिरते हैं। जिसके चरणों पर प्रतापी (राजा हूणों के सरदार) भी सिर झुकाना पड़ता है।

महाराज यशोधर्मा ने मिहिरकुल हूण को हराकर अपने को उत्तरी-भारत का सम्राट घोषित किया।1 गुप्त-राज्य की समाप्ति भी इसी समय के कुछ काल के पश्चात् हो गई होगी।

हूणों से जिस समय यशोधर्मा का युद्ध हुआ था, उस समय उनकी अध्यक्षता में उज्जैन औरमगध प्रदेशों के राजा इकट्ठे हुए थे। कोई-कोई इतिहास-लेखक कहरूर में इस युद्ध का होना बतलाते हैं और कोई-कोई मध्य भारत के किसी स्थान पर। मि. एलन लिखते हैं कि - :“बालादित्य ने तो केवल मगध की रक्षा की होगी, परन्तु अन्त में यशोधर्मा ने ही उसे पूर्णतया परास्त कर कैद कर लिया होगा।”

‘अर्ली हिस्ट्री आफ इण्डिया’ के पृष्ठ 318-319 में मि. विनसेण्ट स्मिथ ने भी इस बात का समर्थन किया है कि महाराज यशोधर्मा ने मिहिरकुल को गिरफ्तार कर लिया था।

कुछ दिन कैद रखने के पश्चात् महाराज यशोधर्मा ने मिहिरकुल को छोड़ दिया और वह छूटने पर काश्मीर की ओर चला गया, क्योंकि इसी बीच साकल नगरी, जो कि आरम्भ में वहां के जाट-राज्य को इन्होंने नष्ट करके अपनी राजधानी बनाई थी, इसके हाथ से निकल चुकी थी। इसी के छोटे भाई ने उस पर अपना अधिकार जमा लिया।

महाराज यशोधर्मा के संबंध में यह भी कहा जाता है कि उन्होंने विक्रमादित्य की पदवी धारण की थी2 और मालवे के मालव संवत् को विक्रमी संवत के नाम से प्रसिद्ध किया था। अभी इस मत का समर्थन पूरी तरह से नहीं हुआ है। कुछ इतिहासकार इस मत का विरोध भी करते हैं।

काश्मीर के प्रसिद्ध संस्कृत-कवि कल्हण [1] ने तीन कालिदासों का वर्णन किया है। दूसरा कालिदास जिसने कि रघुवंश और ज्योतिर्विदाभरण आदि ग्रन्थ लिखें हैं इन्हीं महाराज यशोधर्मा की सभा का एक रत्न था। रघुवंश में राजा रघु की दिग्विजय के वर्णन को पढने से स्पष्ट हो जाता है कि महाराज यशोधर्मा ने किस भांति से किन-किन देशों को विजय किया था। कालिदास ने महाराज यशोधर्मा के ही विजय को रघु-दिग्विजय का रूप दिया है। जिन प्रदेशों का वर्णन रघुवंश में है, रामायणकाल में उनके इनसे कुछ भिन्न नाम थे। इनका राज्य उत्तर में हिमालय


1.भारत के प्राचीन राजवंश भाग 2
2. राजतरंगिणी काव्य ।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-712


से लेकर दक्षिण में ट्रावनकोर तक फैल गया था। मगध का राजा इनका मित्र बन गया था। उसी समय भारत में फाहियान चीनी यात्री आया था। उसने भारत के बारे में लिखा है-

“भारत में इस समय सुख-संपर्ति पूर्ण रूप से है। सदाचार उसके निवासियों का धर्म है। धार्मिक सत्रों में निर्धनों को अन्न बांटे जाते हैं। मुफ्त इलाज करने वाले औषधालय जगह-जगह स्थापित हैं। अपराध बहुत ही कम होते हैं। राज्य कर्मचारियों को ठीक समय पर वेतन मिलता है। रिश्वत लेना पाप समझा जाता है। समस्त देश में मांस-मदिरा का प्रचार बहुत ही थोड़ा है। प्याज और लहसुन खाना अच्छा नहीं समझा जाता। बौद्ध भिक्षुओं के खान-पान का प्रबन्ध धनिकों की ओर से होता है। डकैतियां और चोरियां भी नहीं होती हैं। प्राण-दण्ड किसी को भी नहीं दिया जाता। कठोर दण्ड देते समय पंचायत से राय ली जाती है। सिक्के थोड़े हैं, कौड़ियों का भी चलन है। लोग इतने ईमानदार हैं कि ताले नही लगाने पड़ते।”

शिलादित्य

यह महाराज यशोधर्मा के पुत्र थे। अपने पिता के पश्चात् मालवे के शासक हुए। यह बौद्ध-धर्म के मानने वाले थे। चीनी यात्री ह्वानच्वांग ने अपने यात्रावर्णन में इनका उल्लेख किया है। इनके पड़ौसियों ने जो कि ब्राह्मण धर्म के मानने वाले थे इन पर आक्रमण करके यहां से भगा दिया। यह काश्मीर पहुंचे।1 540 ई. के लगभग काश्मीर के प्रवरसेन ने इनको फिर से राजा बना दिया।

जिन दिनों ह्वानच्वांग ने मालवे की यात्रा की, उन दिनों यहां यशोधर्मा के नाती शिलादित्य, हर्षदेव राज करते थे। यह बौद्ध-धर्म के पालक थे। इनके समय में मंदिर जो कि राजधानी के निकट कई पीढ़ियों पहले से बन रहा था पूर्ण हो गया। इसी समय कान्य-कुब्ज और थानेश्वर में हम एक हर्ष उपनाम शिलादित्य को और शासन करते देखते हैं। थानेश्वर का शिलादित्य-हर्ष उस समय विश्व-विजेता था, इसलिए मालवे के इस हर्ष का चरित्र विलुप्त-सा होता है। बहुत-सी घटनाएं ऐसी आ जाती हैं कि जिनका निर्णय करना कठिन हो जाता है कि आया वह किस हर्ष से संबंध रखती हैं। राजतरंगिणी में मालवा के हर्ष को मातृगुप्त का समकालीन बताया गया है।

श्री सी. वी. वैद्य लिखते हैं कि -

“अतः यह वंश अवश्य ही 541 ई. तक खत्म हो गया जो कि ह्वानच्वांग के भ्रमण के समय है। हम इस बात का वर्णन नहीं कर सकते कि हर्ष के पश्चात् इसका क्या हुआ? मालवे का इतिहास परमार

1. सी. वी. वैद्य की ‘हिन्दू मिडीवल इण्डिया’


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-713


वंश से पहले का अन्धकार में है। परन्तु हम यह वर्णन कर सकते हैं कि पच्छिमी मालवा गुजरात और मध्यभारत के किनारों पर था और बहुधा बदलता रहता था। इसके पश्चात् यह कुछ समय के लिए वल्लभी राजाओं ने बख्शीसें (दान) दी थीं। यहां तक कि उन्होंने मन्दसौर के पास तक की भूमि दान में दी थी। अतः यह स्पष्ट है कि जब हर्ष-साम्राज्य का अन्त हो गया तो मोलायो-पच्छिमी मालवा-वल्लभी राजाओं के अधिकार में चला गया।”

सम्राट हर्ष या शिलादित्य और यह मालवा का हर्ष बिलकुल भिन्न हैं, किन्तु समकालीन होने से भारी भ्रम हो जाता है। एक बात और भी कठिनाई की आनकर पड़ती है कि जिस समय मन्दसौर के इस वंश का अभ्युदय होता है, उसी समय थानेश्वर में एक दूसरा वंश वैस-वंश प्रकट होता है और साथ ही दोनों समाप्त हो जाते हैं। यही क्यों, दोनों की समाप्ति भी हर्ष पर हो जाती है।

इतिहासों में थानेश्वर के राजाओं का आदि पुरुष पुष्पभूति पाया जाता है। यदि पुष्पभूति को भीमवर्मा का पुत्र मान लिया जाए जो कि समुद्रगुप्त का सामंत बन गया था तो मन्दसौर और थानेश्वर के दोनों राजवंश एक हो जाते हैं। गुप्तों के सामन्त रहने के कारण शायद उनको दूसरे लोग वैस या वैसोरा कहने लग गए हों। इस वंश के लोग राजपूत और जाट दोनों ही समूहों में पाए जाते हैं। अवध में वैसवाड़ा के राजपूत प्रसिद्ध हैं। आगरा प्रांत में बैसोरे नाम के जाट मौजूद हैं। थानेश्वर के राजा बौद्ध थे। मौखरी क्षत्रियों से उनकी लड़कियों की शादी हुई थी जिनकी उपाधि वर्मा थी। इसलिए वैस अथवा वर्द्धन उपाधि वाले होने से इनको वैश्य मानना तो भूल होगी। यह पीछे भी लिखा जा चुका है कि जाटों में मौखरी वंश के लोग भी हैं। धार्मिक मत-भेद के कारण यह वैस क्षत्रिय कुछ जाट और कुछ राजपूत दलों में बंट गए। मालवा के कुछ जाट संयुक्त प्रदेश में और कुछ राजपूतों की तरफ चले गए। संयुक्त-प्रदेश में जो मालवा के जाट हैं वे मान, भूलर, दशपुरिया, वरक, हिरन्द, परमार, पचहरे आदि गोत्र से प्रसिद्ध हैं।


मालवा से वरिक जाटवंश के राज्य के समाप्त होने पर जाटों के पास कोई बड़ा राज्य न रह गया था। फिर भी वे जहां-तहां अपने चार-चार पांच-पांच या दस-बीस गांव के छोटे-छोटे जनपदों के अधीश्वर बहुत समय तक बने रहे थे। मुसलमानी सल्तनत के भारत में आने के समय तक उन्होंने मालवा में पंचायती और भौमियाचारे के ढंगों से राज-सुख भोगा था। गुरु गोविन्दसिंह जिस समय मालवा में पधारे थे, उस समय भी वहां पर जाटों का शासकपने का ढंग अवशेष था। इतिहास गुरु खालसा में ऐसे एक जाट चौधरी का वर्णन है, जिसके अधिकार में कई गांव थे। लिखा हुआ है -

“संबत् 1761 में गरु गोविन्दसिंह मालवा के दीना नामक गांव में पहुंचे। यहां पर चौधरी लखमीर ने आपको गढ़ में ठहराया।

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-714


आज कल उस स्थान पर लोहगढ़ नाम गुरुद्वारा है।1 यहां आस-पास के अनेक प्रसिद्व लोगों ने आपके लिए इतने अस्त्र-वस्त्र और धन दिया कि थोड़े ही दिनों में गुरुजी के पास शाही ठाठ हो गया था।

लेकिन जिस स्थान पर जाटों के एक बड़े साम्राज्य की राजधानी रही थी, उस स्थान के आस-पास वह बहुत कम संख्या में पाए जाते हैं। परिस्थितियों ने उन्हें तितर-बितर कर दिया है।


1. ‘इतिहास गुरु खालसा’। साधु गुरु गोविन्दसिंह द्वारा लिखित


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-715



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नोट - इस पुस्तक में दिए गए चित्र मूल पुस्तक के भाग नहीं हैं. ये चित्र विषय को रुचिकर बनाने के लिए जाटलैंड चित्र-वीथी से लिए गए हैं.


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