Asirgarh

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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Asirgarh Fort

Asirgarh (असीरगढ़) is a site of an ancient fort in Burhanpur district in Madhya Pradesh.

Variants

Origin of name

The Asiagh Jats were inhabitants of Asirgarh. One group of them migrated to Europe. Another group moved to Jangladesh which coincided with Bikaner princely state. The religious book Edda of the Scandinavia mentions of this place. It is mentioned that Aryans moved from Asirgarh to scandinavia. According to Bhim Singh Dahiya Asirgarh town in Malwa was founded by one Beeka Jat. Its corresponding town is called Asigord in Scandinavia.[1]

There is description of the Malwa in the religious book of Scandinavia- Edda, according to Thakur Deshraj. Thakur Deshraj has mentioned in his book on History of Jats “Jat Itihas” (Hindi) (1934) that the country Assyria gets its name from Asiagh gotra Jats. The origin of word Asiagh is from Sanskrit word ‘Asi’ meaning sword. According to Kautilya the people who depended on ‘Asi’ (sword) for their living were known as Asiagh. The Asiaghs moved from Asirgarh in Malwa to Europe. Those who settled in Jangladesh were called Asiagh and those who moved to Scandinavia were known as Asi.

History

Jats entered Scandinavia around 500 BCE and their leader was Odin. James Tod considers Odin to be derived from Buddha or Bodan. The Asi Jats founded Jutland as their homeland in Scandinavia. The religious book of Scandinavia ‘Edda’ mentions that the ancient inhabitants of Scandinavia were Jats or Jits who were Aryans known as Asi people and came to this land from Asirgarh.

Thakur Deshraj further quotes Scandinavian writer Mr Count Johnsturn who says that Scandinavians came from India. According to James Tod Scandinavia is derived from Sanskrit word ‘Skandhnabh’.

The pass through the Satpuras that connects Burhanpur and Khandwa is one of the main routes connecting northern and southern India, and the Asirgarh fortress, which commands the pass, is known as the "Key to the Deccan".

The ancient inscriptions in the Pali Buddhist character have been discovered in various parts of Rajasthan of the race of Taxak or Tak, relating to the tribe Mori and Parmara are their descendants. Taxak Mori was the lord of Chittor from very early period. [2][3]

The Huna Kingdom of Sialkot (of Mihir Kula 515-540 AD), destroyed by Yashodharman, was subsequently seized by a new dynasty of kshatriyas called Tak or Taxaka. The Taxak Mori as being lords of Chittor from very early period and few generations after the Guhilots supplanted the Moris, this palladium of Hindu liberty was assailed by the arms of Islam. (725-35) we find amongst the numerous defenders who appear to have considered the cause of Chittor their own the Tak from Asirgarh. This race appears to have retained possession of Asirgarh for at least two centuries after this event as its chieftain was one of the most conspicuous leaders in the array of Prithvi Raj. In the poems of Chandar he is called the "Standard, bearer, Tak of Asir." [4]

Ishtpal, the founder of the Hara Chauhans, obtained Aser in S. 1081† (or A.D. 1025).[5]

In 1536 A.D., the Mughal Emperor Humayun, after his conquest of Gujarat, had visited Burhanpur and Asirgarh via Baroda, Broach (Bharuch) & Surat. Raja Ali Khan (1576-1596 A.D.), also known as Adil Shah, was asked to submit to Akbar, when the latter had sent an expedition to Khandesh, in the summer of 1577 A.D. The former, to avoid the unequal contest with the mighty Akbar, dropped his royal title of Shah and accepted the Suzerainty of Akbar. This marked an epoch in the Deccan policy of the Mughals, for Khandesh was used as a base for the future Conquest of Deccan. Raja Ali Khan constructed many buildings like Jama Masjid in the upper portion of the fort of Asir in 1588 A.D., Jama Masjid at Burhanpur in 1590 A.D., Idgah at Asir, mausoleums & Serai at Burhanpur and Serai & Mosque at Zainabad.

Bahadur Khan (1596-1600 A.D.) successor of Raja Ali Khan declared his independence & refused to pay homage to Akbar & his son Prince Daniyal, which enraged Akbar, who marched towards Burhanpur in 1599 and occupied the City without any opposition on 8th April 1600 A.D. Akbar paid a visit to Asirgarh, so as to inspect it personally, where he stayed for 4 days before returning to his Head Quarter at Burhanpur.

Asirgarh Copper Seal Inscription of Sarvavarman Maukhari

  • (There was) the illustrious Mahârâja Harivarman, whose fame stretched out beyond the four oceans; who had other kings brought into subjection by (his) prowess and by affection (for him); who was like (the god) Chakradhara, in employing (his) sovereignty for regulating the different castes and stages of religious life; (and) who was the remover of the afflictions of (his) subjects. His son, who meditated on his feet, (was) the illustrious Mahârâja Âdityavarman, begotten on the Bhattârikâ and Dêvî Jayasvâminî. His son, who meditated on his feet, (was) the illustrious Mahârâja Îshvâravarman, begotten on the Bhattârikâ and Dêvî Harshaguptâ. His son, who meditated on his feet, (was) the Mahârâjâhirâja, the glorious Îshânavarman, begotten on the Bhattârikâ and Dêvî Upaguptâ. His son, who meditates on his feet, (is) the most devout worshipper of (the god) Mahêshvara, the Mahârâjâhirâja Sharvavarman, the Maukhari, begotten on the Bhattârikâ and Mahâdêvi Lakshmîvatî.
  • From: Fleet, John F. Corpus Inscriptionum Indicarum: Inscriptions of the Early Guptas. Vol. III. Calcutta: Government of India, Central Publications Branch, 1888, 221.

असीरगढ़

विजयेन्द्र कुमार माथुर[6] ने लेख किया है ... असीरगढ़ (AS, p.53) प्राचीन नाम अश्वत्थामागिरि कहा जाता है. यहां का किला मुगलों के समय में बहुत प्रसिद्ध था. अकबर इसे बड़ी कठिनाई से जीत सका था. किले के अंदर शिव मंदिर है जिसका संबंध अश्वत्थामा से बताया जाता है. [p.54]: यह बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) के निकट स्थित है. बुरहानपुर मुगल काल में दक्षिण भारत पहुंचने का नाका समझा जाता था. किला 850 फुट ऊंची पहाड़ी पर है. आशा अहीर के नाम पर इस किले को पहले आशा असीरगढ़ कहा जाता था. 1317 ई. से 1600 ई. तक यहां का शासन बुरहानपुर के फरुखी वंश के हाथ में था.

असीरगढ़ परीचय

असीरगढ़ क़िला बुरहानपुर से लगभग 20 किमी. की दूरी पर उत्तर दिशा में सतपुड़ा पहाड़ियों के शिखर पर समुद्र सतह से 750 फ़ुट की ऊँचाई पर स्थित है। यह क़िला आज भी अपने वैभवशाली अतीत की गुणगाथा का गान मुक्त कंठ से कर रहा है। इसकी तत्कालीन अपराजेयता स्वयं सिद्ध होती है। इसकी गणना विश्व विख्यात उन गिने चुने क़िलों में होती है, जो दुर्भेद और अजेय, माने जाते थे।

इतिहास: इतिहासकारों ने इसका 'बाब-ए-दक्खन' (दक्षिण द्वार) और 'कलोद-ए-दक्खन' (दक्षिण की कुँजी) के नाम से उल्लेख किया है, क्योंकि इस क़िले पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् दक्षिण का द्वार खुल जाता था, और विजेता का सम्पूर्ण ख़ानदेश क्षेत्र पर अधिपत्य स्थापित हो जाता था। इस क़िले की स्थापना कब और किसने की यह विश्वास से नहीं कहा जा सकता। इतिहासकार स्पष्ट एवं सही राय रखने में विवश रहे हैं। कुछ इतिहासकार इस क़िले का महाभारत के वीर योद्धा गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा की अमरत्व की गाथा से संबंधित करते हुए उनकी पूजा स्थली बताते हैं। बुरहानपुर के 'गुप्तेश्वर महादेव मंदिर' के समीप से एक सुंदर सुरंग है, जो असीरगढ़ तक लंबी है। ऐसा कहा जाता है कि, पर्वों के दिन अश्वत्थामा ताप्ती नदी में स्नान करने आते हैं, और बाद में 'गुप्तेश्वर' की पूजा कर अपने स्थान पर लौट जाते हैं।

क़िले का नामकरण: कुछ इतिहासकार इसे रामायण काल का बताते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार 'मोहम्मद कासिम' के कथनानुसार इसका 'आशा अहीर' नामक एक व्यक्ति ने निर्माण कराया था। आशा अहीर के पास हज़ारों की संख्या में पशु थे। उनकी सुरक्षा हेतु ऐसे ही सुरक्षित स्थान की आवश्यकता थी। कहते हैं, वह इस स्थान पर आठवीं शताब्दी में आया था। इस समय यहाँ हज़रत नोमान चिश्ती नाम के एक तेजस्वी सूफ़ी संत निवास करते थे। आशा अहीर उनके पास आदरपूर्वक उपस्थित हुआ और निवेदन किया कि उसके व परिवार की सुरक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना करें, ताकि वह क़िले पर अपने परिवार सहित रह सके। इस तरह वह हज़रत नोमान की आज्ञा एवं आशीर्वाद पाकर, इस स्थान पर ईट मिट्टी, चूना और पत्थरों की दीवार बनाकर रहने लगा। इस तरह आशा अहीर के नाम से यह क़िला असीरगढ़ नाम से प्रसिद्ध हो गया।

असीरगढ़ कुछ समय के लिए चौहान वंश के राजाओं के आधिपत्य में भी रहा था.

कुछ समय बाद असीरगढ़ क़िले की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फेल गई। फ़िरोज़शाह तुग़लक़ के एक सिपाही मलिक ख़ाँ के पुत्र नसीर ख़ाँ फ़ारूक़ी को असीरगढ़ की प्रसिद्धि ने प्रभावित किया। वह बुरहानपुर आया। उसने आशा अहीर से भेंट कर निवेदन किया कि "मेरे भाई और बलकाना के ज़मीदार मुझे पेरशान करते रहते हैं, एवं मेरी जान के दुश्मन बने हुए हैं। इसलिए आप मेरी सहायता करें और मेरे परिवार के लोगों को इस सुरक्षित स्थान पर रहने की अनुमति दें, तो कृपा होगी" आशा अहीर उदार व्यक्ति था, उसने नसीर ख़ाँ की बात पर विश्वास करके उसे क़िले में रहने की आज्ञा दे दी। नसीर ख़ाँ ने पहले तो कुछ डोलियों में महिलाओं और बच्चों को भिजवाया और कुछ में हथियारों से सुसज्जित सिपाही योद्धाओं को भेजा। आशा अहीर और उसके पुत्र स्वागत के लिए आये। जैसे ही डोलियों ने क़िले में प्रवेश किया, डोलियों में से निकलकर एकदम आशा अहीर और उसके पुत्रों पर हमला किया गया और उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। इस प्रकार देखते ही देखते नसीर ख़ाँ फ़ारूक़ी का इस क़िले पर अधिकार हो गया। आदिलशाह फ़ारूक़ी के देहांत के बाद असीरगढ़ का क़िला बहादुरशाह के अधिकार में आ गया था। वह दूर दृष्टि वाला बादशाह नहीं था। उसने अपनी और क़िले की सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं की थी।

अकबर की कूटनीतिक चाल: सम्राट अकबर असीरगढ़ की प्रसिद्धि सुनकर इस किले पर अपना अधिपत्य स्थापित करने के लिए व्याकुल हो रहा था। उसने दक्षिण की ओर पलायन किया। जैसे ही बहादुरशाह फ़ारूक़ी को इस बात की सूचना मिली, उसने अपनी सुरक्षा के लिए क़िले में ऐसी शक्तिशाली व्यवस्था की, कि दस वर्षों तक क़िला घिरा रहने पर भी बाहर से किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं पड़ी। सम्राट अकबर ने असीरगढ़ पर आक्रमण कराना प्रारंभ कर दिया था, एवं क़िले के सारे रास्ते बंद कर दिये थे। वह क़िले पर रात-दिन तोपों से गोलाबारी करने लगा था। इस प्रकार युद्ध का क्रम निरंतर चलता रहा, परंतु अकबर को हर बार असफलता का ही मुंह देखना पडा था। उसने अपने परामर्शदाताओं से विचार-विमर्श किया, तब यह निश्चित हुआ कि बहादुरशाह से बातचीत की जाए। संदेशवाहक द्वारा संदेश भेजा गया। साथ ही यह विश्वास भी दिलाया गया कि बहादुरशाह पर किसी भी प्रकार की आँच नहीं आएगी। बहादुरशाह ने सम्राट अकबर की बात पर विश्वास किया। वह उससे भेंट करने के लिए क़िले के बाहर आया। बहादुरशाह फ़ारूक़ी ने अभिवादन किया और तत्पश्चात् बात प्रारंभ हुई। बातचीत चल ही रही थी कि एक सिपाही ने पीछे से बहादुरशाह पर हमला कर दिया और उसे जख्मी कर बंदी बना लिया। उसने अकबर से कहा "यह तुमने मेरे साथ विश्वासघात किया" है। इस पर अकबर ने कहा कि "राजनीति में सब कुछ जायज है।" फिर अकबर ने राजनीतिक दांव-पेंच और छल-कपट से क़िले के क़िलेदारों और सिपाहियों का सोना, चाँदी, हीरे, मोतियों से मूंह भर दिया। इन लोभियों ने क़िले का द्वार खोल दिया। अकबर की फ़ौज क़िले में घुस गई। बहादुरशाह की सेना अकबर की सेना के सामने न टिक सकी। इस तरह देखते ही देखते 17 जनवरी सन् 1601 ई. को असीरगढ़ के क़िले पर अकबर को विजय प्राप्त हो गई और क़िले पर मुग़ल शासन का ध्वज फहराने लगा।

अकबर की सेना ने बहादुरशाह के पुत्रों को बंदी बना लिया। अकबर ने बहादुरशाह फ़ारूक़ी को ग्वालियर के क़िले में और उसके पुत्रों को अन्य क़िलों में रखने के लिए भिजवा दिया। जिस प्रकार फ़ारूक़ी बादशाह ने इस क़िले को राजनीतिक चालों से, धूर्तता से प्राप्त किया था, ठीक उसी प्रकार यह क़िला भी उनके हाथों से जाता रहा था। इस प्रकार असीरगढ़ और बुरहानपुर पर मुग़लों का आधिपत्य स्थापित होने के पश्चात् फ़ारूक़ी वंश का पतन हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकार फ़रिश्ता लिखता है कि, "अकबर जैसे सम्राट बादशाह को भी असीरगढ़ क़िले को हासिल करने के लिए 'सोने की चाबी' का उपयोग करना पडा था"। अकबर के शासनकाल के पश्चात् यह क़िला सन् 1760 ई. से सन् 1819 ई. तक मराठों के अधिकार में रहा। मराठों के पतन के पश्चात् यह क़िला अंग्रेज़ों के आधिपत्य में आ गया। सन् 1904 ई. से यहाँ अंग्रेज़ी सेना निवास करती थी। असीरगढ़ का क़िला तीन विभागों में विभाजित है। ऊपर का भाग असीरगढ़, मध्य भाग कमरगढ़ और निचला भाग मलयगढ़ कहलाता है।

इस क़िले तक पहुँचने के लिये दो रास्ते बनाये गये हैं। एक रास्ता पूर्व दिशा में, जो एक सरल सीढ़ीदार रास्ता है, और दूसरा रास्ता उत्तर दिशा में है, जो अत्यंत कठिन एवं कष्टदायक है। यह मार्ग वाहनों के लिए है। वाहन की सुरक्षा के लिए रास्ते के दोनों ओर दीवार बना दी गई है। यह मार्ग एक बड़ी खाई के पास समाप्त हो जाता है। जहाँ एक बड़ा फाटक नज़र आता है, जो 'मदार दरवाज़े' के नाम से प्रसिद्ध है। नीचे से क़िले की ऊँचाई देखकर हिम्मत बैठ जाती है कि, इतनी ऊँचाई पर चढना कठिन होगा, परन्तु क़िले को देखने की इच्छा, शरीर को स्फूर्त करती है एवं एक नई शक्ति और उत्साह भर देती हैं। जैसे- जैसे हम ऊपर की ओर चढ़ते जाते हैं, आस-पास का प्राकृतिक सौन्दर्य हृदय को आकर्षित करता है। इन सुंदर दृश्यों में क़िले पर चढने वाला व्यक्ति इतना मग्न हो जाता है, कि उसे इस बात का अहसास तक नहीं होता है, कि वह कितनी ऊँचाई पर पहुँच गया है। क़िले की भूल-भुलैया भरा रास्ता देखकर मनुष्य आश्चार्यचकित हो जाता हैं। क़िले के इस विचित्र रंग को देखते हुए जब आगे जाएँ, तो क़िले का पहला द्वार नज़र आता है। इस दरवाज़े से कुछ दूर पूर्व दिशा में लम्बी-लम्बी घास में छुपे हुए गंगा-यमुना नाम के पानी के अलग-अलग दो स्रोत दिखाई देते हैं, जिनका पानी अत्यंत स्वच्छ और मीठा हैं यहाँ पानी कहाँ से आता है, किसी को नहीं मालूम। पानी में बनी सीढ़ियाँ स्पष्ट नज़र आती हैं, और आगे तक रास्ता भी नज़र आता है। आगे बढ़ने पर भय का अहसास होता है। ऐसा लगता है कि यहाँ कोई गुप्त मार्ग क़िले के किसी न किसी भाग तक अवश्य जाता होगा।

भीतरी जटिल संरचना: इस दरवाज़े के सामने एक काली चट्टान है, जिस पर अकबर, दानियाल, औरंगज़ेब और शाहजहाँ के चार शिलालेख फ़ारसी भाषा में स्थापित हैं। इन शिलालेखों पर क़िले के क़िलेदरों पर विजय प्राप्त करने वालों और सूबेदारों के नाम के साथ अन्य वर्णन अंकित है। शहाजहाँ के शिलालेख से ज्ञात होता है कि, उनके कार्यकाल में यहाँ कुछ ईमारतों का निर्माण करवाया गया था। इस चट्‌टान के पास जो दरवाज़ा है, उसे राजगोपालदास ने, जो क़िले का सूबेदार था, बनवाया था। यहाँ से खड़े होकर देखें तो, आस-पास के सुंदर दृश्य हृदय को आकर्षित करते हैं। क़िले की दीवारों पर और दरवाज़ों पर थोड़े-थोडे अंतर से छोटी तोपें स्थापित की गई थीं। क़िले के उपरी भाग पर प्रवेश करते ही सामने की ओर विशाल मैदान है, जिस पर घास उगी हुई दिखाई देती है। किसी समय यहाँ खेती की जाती थी, परंतु अब यह विशाल मैदान यूँ ही वीरान पड़ा है। आगे बढ़ने पर असीरगढ़ की मस्जिद की दो मीनारें साफ़ दिखाई देती हैं। यही असीरगढ़ की 'जामा मस्जिद' है। यह मस्जिद पूर्णतः काले पत्थर से निर्मित है। यह भव्य मस्जिद फ़ारूक़ी शासन काल की निर्माण कला का उत्कृष्ट नमूना है एवं यादगार है। यह मस्जिद बुरहानपुर की जामा मस्जिद से 5 वर्ष पूर्व निर्मित करवाई गई थी। इस मस्जिद की लंबाई 935 फुट और चौडाई 40 फुट है। इसकी छत 50 स्तंभों पर आधारित है। इसकी 13 मेहराबें और 4 दालान हैं। इसके मेहराबदार दरवाज़े भी पत्थर के हैं। यहाँ लगभग 1200 आदमी एक साथ आसानी से नमाज़ पढ सकते हैं। मस्जिद के सामने विशाल सेहन है, जिसके तीन ओर छत विहीन पत्थर के बरामदे बनाये गये हैं। मस्जिद के मध्यभाग की मेहराब के ऊपरी भाग पर अरबी भाषा का एक शिलालेख है, जिसमें फ़ारूक़ी वंश के सुलतानों का वंश एवं मस्जिद का निर्माण वर्ष 992 हिजरी अंकित है।

अश्वत्थामा से सम्बन्ध: उत्तरी कोने की मेहराब में बुरहानपुर की जामा मसिजद के शिलालेख की तरह संस्कृत का शिलालेख है। इससे मस्जिद का निर्माण वर्ष आदि ज्ञात होता है। सामने के स्तंभ पर सम्राट अकबर ने एक शिलालेख फ़ारसी भाषा में अंकित करवाया था, जिसमें असीरगढ़ पर विजय का वर्णन है। इस शिलालेख को उस समय के प्रसिद्ध लेखाकार 'मोहम्मद मासूम' ने पत्थर पर तराशा था। मस्जिद के मध्य भाग में एक वर्गाकार पत्थर का चबूतरा है, इसके ऊपर लोहे का बडा पेच लगा हुआ है। बताया जाता है कि इस लोहे के दरवाज़े के नीचे एक गुप्त रास्ता है, जो क़िले के बाहर जाता है। यह रास्ता इतना चौडा है कि, घुडसवार सरलतापूर्वक इसमें से गुज़र सकता है। इसके बारे में यह भी बताया जाता है कि, यह भूमिगत गुप्त रास्ता बुरहानपुर तक जाता था। अंग्रेजों ने इस रास्ते के बारे मे खोज की, परंतु असफल रहे। मस्जिद के दालान से लगे हुए एक जैसे दो मीनारें हैं, जो लगभग 80 फुट ऊँचे हैं। इन मीनारों के ऊपरी भाग तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का घुमावदार रास्ता बना है। मस्जिद के प्रवेश द्वार के बाई तरफ़ एक कुंआ है, जिसका पानी, मीठा, ठंडा एवं स्वच्छ है। उसमें एक लोहे की जंजीर लगी है। नीचे उतरने पर आभास होता है कि, यहाँ विशाल तल घर है। मस्जिद से निकलकर क़िले के पूर्वी उत्तरी भाग में सामने की ओर एक प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर महाभारत कालीन अश्वत्थामा का पूजा स्थल बताया जाता है। मंदिर के बाहर नंदी विराजमान हैं, और उनके सामने शिवलिंग व मूर्तियाँ है। इस मंदिर में भी एक गुप्त रास्ता बताया जाता है, जो क़िले के बाहर पहले दरवाज़े से कुछ दूर गंगा-यमुना में आकर समाप्त हो जाता है। संभव है कि शत्रु के क़िले में प्रवेश कर जाने पर एवं उस पर धोखे से पीछे की तरफ से आक्रमण करने हेतु यह गुप्त मार्ग बनाया गया हो। निरंतर प्राकृतिक घटनाओं के घटित होते रहने के उपरांत भी यह मंदिर अब तक विद्यमान है।

स्थापत्य एवं प्रसिद्धि: वास्तव में यह क़िला मनुष्य द्वारा किये गये कार्यों का आश्चर्यचकित कर देने वाला अद्‌भुत कारनामा है, जो अपना उदाहरण आप ही है। असीरगढ़ के नीचे लगभग एक हज़ार की आबादी वाला ग्राम है, जो असीरगढ़ के नाम से प्रसिद्ध है। सोलहवीं शताब्दी मे यहाँ बडानगर आबाद था, और यह केवल अंगूर की काश्त के लिए मशहूर था, जिसके अंगूर 1870 ई. तक दूर दूर तक बिकने जाते थे। परंतु आज इन अंगूरों की काश्त देखने को आंखें तरसती हैं। उसकी जगह महुआ की काश्त ने ले ली है। ग्राम असीरगढ़ में भी फ़ारूक़ी काल की छोटी-सी मस्जिद है। मस्जिद के अंदर की दक्षिणी दीवार पर एक शिलालेख लगा है, जिस पर आयतें अंकित हैं। पूर्व में मस्जिद खंडित हो चुकी थी। शहर एवं ग्राम के लोगों ने चंदा एकत्रित करके इस को पुनः बनाया है। यहाँ की सड़क के पश्चिम में थोड़े फासले पर शिव का भव्य प्राचीन मंदिर है, जो काले पत्थर द्वारा निर्मित है। मंदिर आज भी अच्छी स्थिति में विद्यमान है। यह शिव मंदिर अति प्राचीन है तथा दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। कनिष्क के भी इस ओर आने के उल्लेख इतिहास में मिलते है। इस मंदिर के अहाते में एक तालाब है। इस मंदिर के थोडे फासले पर उत्तर दिशा में विश्राम गृह है, जहाँ सरकारी अफ़सरों के अलावा मंत्रीगण आदि आकर ठहरते हैं। विश्रामगृह से लगभग 50 क़दम चलने पर सामने की पहाड़ी पर एक भव्य मक़बरा दिखाई देता है। यह मक़बरा हज़रत शाह नोमान का है। यह फ़ारूक़ी शासन काल के महान् सूफ़ी संत थे। मक़बरे तक पहुँचने के लिए सुंदर सीढ़ीदार मार्ग बनाया गया है। यहाँ से कुछ दूरी पर मोतीमहल की इमारत है। वह भी मुग़ल कालीन बताई जाती है। असीरगढ़ क़िला पुरातत्त्व विभाग के अधिनस्थ है। जिस कारण मरम्मत आदि का कार्य होता रहता है। निगरानी एवं साफ-सफाई के लिए चपरासी नियुक्त किये गये हैं।

संदर्भ: भरतकोश-असीरगढ़

असीरगढ़:ठाकुर देशराज

ठाकुर देशराज[7] ने लिखा है.... तक्षक - बहुत पुराना खानदान है। नवीं सदी में यह लोग असीरगढ़ में राज्य करते थे। तक्षक गोत्र के जाट मालवा राजस्थान दोनों ही में हैं।

External links

References


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