Yadav

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Yadav (यादव)[1] [2] Yadava (यादव)[3] are the ancestors of many Jat gotras. Yadav Jat Gotra is also found in Ahirs.[4]

The branches of Yadu race are: 1. Yadu (Chief Karauli), 2. Bhatti (Chief Jaisalmer), 3. Jareja (Chief Cutch Bhuj), 4. Samecha (Muhammadans in Sind), 5. Madecha, 6. Bidman, 7. Badda, 8. Soha.[5]

Origin

They are said to be descendants of Maharaja Yadu (यदु). [6]

History

James Todd[7] writes that Yadu, Yadava was the most illustrious of all the tribes of Ind, and became the patronymic of the descendants of Budha, progenitor of the Lunar (Indu) race. Yudhishthira and Baladeva, on the death of Krishna and their expulsion from Delhi and Dwaraka, the last stronghold of their power, retired by Multan across the Indus. The two first are abandoned by


[p.102]: tradition ; but the sons of Krishna, who accompanied them after an intermediate halt in the further of the five rivers, eventually left the Indus behind, and passed into Zabulistan,[8] founded Gajni, and peopled these countries even to Samarkand. The place where they found refuge was in the cluster of hills still called Yadu ka dang, ' the Yadu hills '.[9]

The Annals of Jaisalmer, which give this early history of their founder, mix up in a confused manner[10] the cause of their being again driven back into India ; so that it is impossible to say whether it was owing to the Greek princes who ruled all these countries for a century after Alexander, or to the rise of Islamism.

Driven back on the Indus, they obtained possession of the Panjab and founded Salivahanpur. Thence expelled, they retired across the Sutlej and Ghara into the Indian deserts ; whence expelling the Langahas, the Johyas, Mohilas, etc., they founded successively Tanot, Derawar, and Jaisalmer,[11] in S. 1212(A.D. 1155) the present capital of the Bhattis, the lineal successors of Krishna.

Bhatti was the exile from Zabulistan, and as usual with the Rajput races on any such event in their annals, his name set aside the more ancient patronymic, Yadu. The Bhattis subdued all the tracts south of the Ghara ; but their power has been greatly circumscribed since the arrival of the Rathors. The Map defines their existing limits, and their annals will detail their past history.

Jareja, Jadeja is the most important tribe of Yadu race next to the Bhatti. Its history is similar. Descended from Krishna, and migrating simultaneously with the remains of the Harikulas, there is the strongest ground for believing that their range was not so wide as that of the elder branch, but that they settled them- selves in the valley of the Indus, more especially on the west shore in Seistan ; and in nominal and armorial distinctions, even in Alexander's time, they retained the marks of their ancestry [86].

Sambos, who brought on him the arms of the Grecians, was in


[p.103]: all likelihood a Harikula ; and the Minnagara of Greek historians Samanagara ('city of Sama'), his capital.The capital of Sambos was Sindimana, perhaps the modern Sihwan [12].

The most common epithet of Krishna, or Hari, was Shania or Syama, from his dark complexion. Hence the Jareja bore it as a patronymic, and the whole race were Samaputras (children of Sama), whence the titular name Sambos of its princes.

The modern Jareja, who, from circumstances has so mixed with the Muhammadans of Sind as to have forfeited all pretensions to purity of blood, partly in ignorance and partly to cover disgrace, says that his origin is from Sham, or Syria, and of the stock of the Persian Jamshid : consequently, Sam has been converted into Jam ; which epithet designates one of the Jareja petty governments, the Jam Raj. They have an infinitely better etymology for this, in being descendants of Jambuvati, one of Hari's eight wives. The origin of the term Jam is very doubtful.[13]

These are the most conspicuous of the Yadu race ; but there are others who still bear the original title, of which the head is the prince of the petty State of Karauli on the Chambal.

This portion of the Yadu stock would appear never to have strayed far beyond the ancient limits of the Suraseni,their ancestral abodes. The Suraseni of Vraj, the tract so named, thirty miles around Mathura. They held the celebrated Bayana ; whence expelled, they established Karauli west, and Sabalgarh east, of the Chambal. The tract under the latter, called Yaduvati, has been wrested from the family by Sindhia. Sri Mathura is an independent fief of Karauli, held by a junior branch. Its chief, Rao Manohar Singh, was well known to me, and was, I may say, my friend. For years letters passed between us, and he had made for me a transcript of a valuable copy of the Mahabharata.

The Yadus, or as pronounced in the dialects Jadon, are scattered over India, and many chiefs of consequence amongst the Mahrattas are of this tribe.

There are eight sakha of the Yadu race : ,

1. Yadu . . . Chief Karauli.
2. Bhatti . . Chief Jaisalmer.
3. Jareja . . Chief Cutch Bhuj.
4. Samecha . . Muhammadans in Sind.

[p. 104]:

5. Madecha Unknown [87] (N.No. 5-8).
6. Bidman
7. Badda
8. Soha

यादव वंश

यादव वंश - दलीप सिंह अहलावत [14] लिखते हैं कि इस सुप्रसिद्ध प्राचीन वंश के प्रवर्तक महाराजा यदु थे जो स्वयं चन्द्रवंश में जन्मे थे। चन्द्र ने आचार्य बृहस्पति की पत्नी तारा को छीनकर अपनी पटरानी बना लिया जिससे बुध नामक पुत्र हुआ। जो कि देवों द्वारा चढाई करके तारा को बृहस्पति को दिलवा देने के बाद भी सम्राट् चन्द्र के ही पास रहा। इसी चन्द्र के नाम से ही चन्द्रवंश प्रचलित हुआ। बुध का विवाह मनु कन्या इला से हुआ। जिससे सूर्य और चन्द्रवंश की आपस में मैत्री हो गई। बुध का पुत्र पुरुरवा हुआ जिससे एलवंश की प्रसिद्धि हुई।

सम्राट् पुरुरवा को अपने नाना मनु का विशाल राज्य प्रतिष्ठानपुर (वर्तमान झूसी प्रयाग) मिला। पुरुरवा का विवाह सुन्दरी उर्वशी से हुआ जिससे छः पुत्र हुये। इनमें से आयु और अमावसु ने वंशवृद्धि की। ऐतिहासिकों के मतानुसार चीन, मंगोलिया, तातार देशों के बसाने में आयु ने विशेष सफलता प्राप्त की। आज भी ये तीनों देश ‘अय’ नामक आदि पुरुषा को ही अपना मूल पुरुषा मानते हैं। कर्नल टॉड ने इस बात की पुष्टि की है। उसने तो लिखा है कि ये तीनों देश अपने को चन्द्रवंशी क्षत्रिय बतलाते हैं। यह ‘अय’पुरुरवापुत्र ‘आयु’ही है1। आयु का विवाह स्वर्भानु उपनाम राहु की कन्या प्रभा से हुआ जिससे नहुष आदि पांच पुत्र हुए। नहुष महान् धर्मात्मा राजा हुए। देवताओं ने इन्हें इन्द्र अर्थात् राष्ट्रपति चुना। इनके यति, संयाति ययाति आदि छः पुत्र हुए। विशेष प्रतापवान् होने पर ययाति को राज्य मिला। इन्होंने वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा और अपने कुलगुरु शुक्राचार्य ब्राह्मण की कन्या देवयानी दोनों से विधिपूर्वक विवाह किया। वेदव्यास ने ययाति को सम्पूर्ण वेदों का विद्वान् और सामान्य योद्धा लिखा है। इनके ब्राह्मणी देवयानी से यदु, तुर्वसु और शर्मिष्ठा से द्रुह्यु, अनु, पुरु नामक पांच पुत्र हुए। (देखो ब्रह्मा की वंशावली, प्रथम अध्याय)।

चीनवाले अपने को चन्द्रवंशी मानते हैं। आयु को प्रथम राजा मानते हैं जिसे वे ‘यु’ या ‘अयु’ कहते हैं। वे इसकी उत्पत्ति इस तरह मानते हैं कि एक तारे (बुध) का समागम ‘यू’ की माता के साथ हो गया। इसी से ‘यू’ हुआ। ये बुध और इला ही थे। तातार लोग भी अपने को चन्द्रवंशी मानते हैं। तातार शब्द यों बना है - तातः = पिता तारको यस्य स ताततारः। जिस वंश का तातः (पिता) तारा हो वह वंश ताततार होता है। ताततार शब्द आगे चलकर तातार हो गया। इस प्रकार तातारों का अय, चीनियों का अयु या यू और पौराणिकों का आयु एक ही व्यक्ति है। इन तीनों का आदिपुरुष चन्द्रमा था और ये चन्द्रवंशी क्षत्रिय हैं, यह अच्छी तरह सिद्ध होता है2। जर्मन भी अपने को तातार मानते हैं और इसीलिए चन्द्रमा को अपना पूज्य मानते हैं3


1. क्षत्रिय जातियों का उत्थान पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 282 लेखक कविराज योगेन्द्रपाल शास्त्री। तथा जाट इतिहास पृ० 7-8 लेखक श्रीनिवासाचार्य महाराज ।
2. जाट इतिहास पृ० 7-8 लेखक श्रीनिवासाचार्य महाराज; वैदिक सम्पत्ति पृ० 426 लेखक स्व० पं० रघुनन्दन शर्मा साहित्यभूषण; टॉड परिशिष्ट, अध्याय 2.
3. जाट इतिहास पृ० 8 लेखक श्रीनिवासाचार्य महाराज ।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-184


चीनियों के आदिपुरुष के विषय में प्रसिद्ध चीनी विद्वान यांगत्साई ने सन् 1558 ई० में एक ग्रन्थ लिखा था। इस ग्रन्थ को सन् 1776 ई० में हूया नामी विद्वान् ने फिर सम्पादित किया। उसी पुस्तक का, पादरी क्लार्क ने अनुवाद किया है। उसमें लिखा है कि “अत्यन्त प्राचीन काल में भारत के मो० लो० ची० राज्य का आइ० यू० नामक राजकुमार यून्नन प्रान्त में आया। इसके पुत्र का नाम ती० मोगंगे था। इसके नौ पुत्र पैदा हुए। इन्हीं के सन्ततिविस्तार से समस्त चीनियों की वंशवृद्धि हुई है1।”

ययाति महाराज जम्बूद्वीप के सम्राट् थे। जम्बूद्वीप आज का एशिया समझो। यह मंगोलिया से सीरिया तक और साइबेरिया से भारतवर्ष शामिल करके था। इसके बीच के सब देश शामिल करके जम्बूद्वीप कहलाता था। कानपुर से तीन मील पर जाजपुर स्थान के किले का ध्वंसावशेष आज भी ‘ययाति के कोट’ नाम पर प्रसिद्ध है। राजस्थान में सांभर झील के पास एक ‘देवयानी’ नामक कुंवा है जिसमें शर्मिष्ठा ने वैरवश देवयानी को धकेल दिया था, जिसको ययाति ने बाहर निकाल लिया था2। इस प्रकार ययाति राज्य के चिह्न आज भी विद्यमान हैं।

महाराजा ययाति का पुत्र पुरु अपने पिता का सेवक व आज्ञाकारी था, इसी कारण ययाति ने पुरु को राज्य भार दिया। परन्तु शेष पुत्रों को भी राज्य से वंचित न रखा। वह बंटवारा इस प्रकार था -

1. यदु को दक्षिण का भाग (जिसमें हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरयाणा, राजस्थान, दिल्ली तथा इन प्रान्तों से लगा उत्तर प्रदेश, गुजरात एवं कच्छ हैं)।

2. तुर्वसु को पश्चिम का भाग (जिसमें आज पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, सऊदी अरब,यमन, इथियोपिया, केन्या, सूडान, मिश्र, लिबिया, अल्जीरिया, तुर्की, यूनान हैं)।

3. द्रुहयु को दक्षिण पूर्व का भाग दिया।

4. अनु को उत्तर का भाग (इसमें उत्तरदिग्वाची3 सभी देश हैं) दिया। आज के हिमालय पर्वत से लेकर उत्तर में चीन, मंगोलिया, रूस, साइबेरिया, उत्तरी ध्रुव आदि सभी इस में हैं।

5. पुरु को सम्राट् पद पर अभिषेक कर, बड़े भाइयों को उसके अधीन रखकर ययाति वन में चला गया4। यदु से यादव क्षत्रिय उत्पन्न हुए। तुर्वसु की सन्तान यवन कहलाई। द्रुहयु के पुत्र भोज नाम से प्रसिद्ध हुए। अनु से म्लेच्छ जातियां उत्पन्न हुईं। पुरु से पौरव वंश चला5

जब हम जाटों की प्राचीन निवास भूमि का वर्णन पढते हैं तो कुभा (काबुल) और कृमि (कुर्रम) नदी उसकी पच्छिमी सीमायें, तिब्बत की पर्वतमाला पूर्वी सीमा, जगजार्टिस और अक्सस नदी


1. वैदिक सम्पत्ति पृ० 426-27 लेखक स्व० पण्डित रघुनन्दन शर्मा साहित्यभूषण ।
2. महाभारत आदिपर्व 78वां अध्याय, श्लोक 1-24.
3. ये वे देश हैं जो पाण्डव दिग्विजय में अर्जुन ने उत्तर दिशा के सभी देशों को जीत लिया था। इनका पूर्ण वर्णन महाभारत सभापर्व अध्याय 26-28 में देखो।
4. जाट इतिहास पृ० 14-15 लेखक श्रीनिवासाचार्य महाराज ।
5. महाभारत आदिपर्व 85वां अध्याय श्लोक 34-35, इन पांच भाइयों की सन्तान शुद्ध क्षत्रिय आर्य थी जिनसे अनेक जाट गोत्र प्रचलित हुए । (लेखक)


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-185


उत्तरी सीमा और नर्मदा नदी दक्षिणी सीमा बनाती है। वास्तव में यह देश उन आर्यों का है जो चन्द्रवंशी अथवा यदु, द्रुहयु, तुर्वसु, कुरु और पुरु कहलाते थे। भगवान् श्रीकृष्ण के सिद्धान्तों को इनमें से प्रायः सभी ने अपना लिया था। अतः समय अनुसार वे सब जाट कहलाने लग गये। इन सभी खानदानों की पुराणों ने स्पष्ट और अस्पष्ट निन्दा ही की है। या तो इन्होंने आरम्भ से ही ब्राह्मणों के बड़प्पन को स्वीकार नहीं किया था या बौद्ध-काल में ये प्रायः सभा बौद्ध हो गये थे। वाह्लीक,तक्षक, कुशान, शिव, मल्ल, क्षुद्रक (शुद्रक), नव आदि सभी खानदान जिनका महाभारत और बौद्धकाल में नाम आता है वे इन्हीं यदु, द्रुहयु, कुरु और पुरुओं के उत्तराधिकारी (शाखायें) हैं1

सम्राट् ययातिपुत्र यदु और यादवों के वंशज जाटों का इस भूमि पर लगभग एक अरब चौरानवें करोड़ वर्ष से शासन है। यदु के वंशज कुछ समय तो यदु के नाम से प्रसिद्ध रहे थे, किन्तु भाषा में ‘य’ को ‘ज’ बोले जाने के कारण जदु-जद्दू-जट्टू-जाट कहलाये। कुछ लोगों ने अपने को ‘यायात’ (ययातेः पुत्राः यायाताः) कहना आरम्भ किया जो ‘जाजात’ दो समानाक्षरों का पास ही में सन्निवेश हो तो एक नष्ट हो जाता है। अतः जात और फिर जाट हुआ। तीसरी शताब्दी में इन यायातों का जापान पर अधिकार था (विश्वकोश नागरी प्र० खं० पृ० 467)। ये ययाति के वंशधर भारत में आदि क्षत्रिय हैं जो आज जाट कहे जाते हैं। भारतीय व्याकरण के अभाव में शुद्धाशुद्ध पर विचार न था। अतः यदोः को यदो ही उच्चारण सुनकर संस्कृत में स्त्रीलिंग के कारण उसे यहुदी कहना आरम्भ किया, जो फिर बदलकर लोकमानस में यहूदी हो गया। यहूदी जन्म से होता है, कर्म से नहीं। यह सिद्धान्त भी भारतीय धारा का है। ईसा स्वयं यहूदी था। वर्त्तमान ईसाई मत यहूदी धर्म का नवीन संस्करण मात्र है। बाइबिल अध्ययन से यह स्पष्ट है कि वह भारतीय संसकारों का अधूरा अनुवाद मात्र है।

अब यह सिद्ध हो गया कि जर्मनी, इंग्लैंण्ड, स्काटलैण्ड, नार्वे, स्वीडन, रूस, चेकोस्लोवाकिया आदि अर्थात् पूरा यूरोप और एशिया के मनुष्य ययाति के पौत्रों का परिवार है। जम्बूद्वीप, जो आज एशिया कहा जाता है, इसके शासक जाट थे2

इजरायल (जुडिया) यहूदियों का देश है। इसी में हजरत मूसा और हजरत ईसा जैसे जगत्प्रसिद्ध धर्माचार्य उत्पन्न हुए। बाइबिल में लिखा है कि पश्चिम में आने वालों की एक ही भाषा थी और वे सब पूर्व से ही आये हैं। इनके विषय में पोकाक नामी विद्वान् अपने इण्डिया इन ग्रीस नामी ग्रन्थ में लिखता है कि युडा (जुडा) जाति भारत की यदु अर्थात् यदुवंशीय क्षत्रिय जाति ही है। अतःएव यहूदियों के आर्य होने में कुछ भी सन्देह नहीं रह जाता। साथ ही यह भी सिद्ध हो जाता है कि वे भारत से ही जाकर वहां बसे हैं3

जापान में अभी तक आर्यजाति की एक शाखा मौजूद है, जिसकी अन्य शाखाओं से जापानियों की उत्पत्ति हुई है। उस मूलनिवासी जाति का नाम ऐन्यू है। इसको काकेशियन विभाग के अन्तर्गत समझा जाता है। ऐन्यू लोग अब तक प्राचीन ऋषियों के भेष में रहते हैं अर्थात् दाढी और केश नहीं निकालते। इसलिए इनको आजकल (Hairy Men) बालवाले लोग कहा जाता है। जापानी आर्य



1. जाट इतिहास (उत्पत्ति और गौरव खण्ड) पृ० 146-47 ले० ठा० देशराज।
2. जाट इतिहास पृ० 14-18 लेखक श्रीनिवासाचार्य महाराज ।
3. वैदिक सम्पत्ति पृ० 420 और 427 लेखक स्व० रघुनन्दन शर्मा साहित्यभूषण ।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-186


क्षत्रिय ही हैं। जापानियों का ‘बुशिडो’अर्थात् क्षात्रधर्म अब तक प्राचीन क्षत्रियपन का स्मरण दिला रहा है। ऐन्यू लोगों का प्रस्तुत होना, जापान की स्त्रियों में भारतीयपन का होना और पुरुषों का क्षात्रधर्म आदि बातें एकस्वर से पुकार रही हैं कि वे आर्यवंशज ही हैं1

जाट ययाति-वंशज हैं। इसी कारण ययात-यात-जाट नाम का प्रयोग इस वंश के साथ प्रचलित रहा है। परन्तु ययातिवंश के स्थान पर चन्द्रवंशी क्षत्रिय ही बोला जाता रहा। बहुत से जाटगोत्र ययाति के पांच पुत्रों की प्रणाली से तथा सात वीरभद्र की सन्तान से उत्पन्न हुए हैं। समय के अनुसार एशिया और यूरोप में फैल गए थे और लाचारी में बहुत से अपने देश भारतवर्ष में लौट आए2

महाराजा ययाति के ज्येष्ठ पुत्र यदु से चन्द्रवंश की महत्ता और अस्तित्व से विशेष शोभावृद्धि हुई। इनका वंशविस्तार सभी भाइयों से विशेष हुआ। आपके नाम पर ही ‘यादव वंश’चला, जो जाटवंश है। यदु के प्रपौत्र हय (हैहय) से हैहय वंश चला जो ‘कल्चुरि’नाम से प्रख्यात हुआ। हैहयों में कार्तवीर्यार्जुन माहिष्मती नगरी का शासक हुआ। चेदिदेश और गुजरात पर इस वंश का शासन रहा। वर्तमान में इस वंश के व्यक्त्ति बहुत कम हैं।

यदु के पुत्र करोक्षत्री की शाखा में यदु की सातवीं पीढी में प्रथम चक्रवर्ती सम्राट् शशविन्दु हुए जिन्होंने विदर्भ देश पर शासन करते हुए अश्वमेध यज्ञ किया। इसकी पुत्री विन्दुमती का विवाह चक्रवर्ती सम्राट् मान्धाता से हुआ। इस सम्राट् ने अपने बड़े पुत्र पृथुश्रवा को ही सारा राज्य दे दिया। इस सम्राट् पृथुश्रवा के धर्म नामक पुत्र से सम्राट् उशना हुए। उसने 101 अश्वमेध यज्ञ किए। इस कारण उनको ‘याट’ की उपाधि मिली। कुछ ऐतिहासिक इस उशना याट से ही जाट जाति का प्रारम्भ मानते हैं जो कि अनेक वंशों से मिलकर बने हुए जट्ट संघ के लिए अयुक्तियुक्त मत है3

इस यादव वंश में बड़े योद्धा राजे-महाराजे हुए और कईयों के नाम से जाटवंश चले, जिनका उचित स्थान पर वर्णन किया जायेगा। श्रीकृष्ण महाराज इसी यादव वंश में हुए जिन्होंने कई क्षत्रिय संघों को मिलाकर जाट संघ बनाया। वे स्वयं जाट थे। भगवान् श्रीकृष्ण ने क्षत्रियों का एक जाति संघ बनाय जो जाट कहलाया4

भरतपुर नरेश श्रीकृष्ण महाराज के वंशज हैं जो जाटवंश के प्रसिद्ध जाट क्षत्रिय हैं।

यदुवंश के शाखागोत्र - : 1. वृष्णि 2. अन्धक 3. हाला 4. शिवस्कन्दे-सौकन्दे 5. डागुर-डीगराणा 6. खिरवार-खरे 7. बलहारा 8. सारन 9. सिनसिनवाल 10. छोंकर 11. सोगरवार 12. हांगा 13. घनिहार 14. भोज[15]


1. वैदिक सम्पत्ति पृ० 420 और 427 लेखक स्वर्गीय पण्डित रघुनन्दन शर्मा साहित्यभूषण।
2. जाट इतिहास अनुवाद अंग्रेजी, पृ० 5-6 लेखक रामसरूप जून ।
3. क्षत्रियों जातियों का उत्थान, पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 283-84 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।
4. पूरी जानकारी के लिए देखो द्वितीय अध्याय, (जाटवीरों की उत्पत्ति प्रकरण)

Distribution in Uttar Pradesh

Villages in Budaun district

Dharampur,

Notable persons

External Links

References

  1. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. ज-35
  2. O.S.Tugania:Jat Samuday ke Pramukh Adhar Bindu,p.57,s.n. 2102
  3. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. य-5
  4. Ram Sarup Joon: History of the Jats/Chapter VI,p.111
  5. James Todd, Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume I,: Chapter 7 Catalogue of the Thirty Six Royal Races, pp.103-104
  6. Mahendra Singh Arya et al.: Ādhunik Jat Itihas, p. 277
  7. Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume I,: Chapter 7 Catalogue of the Thirty Six Royal Races, pp.101-104
  8. Zabulistan, with its capital, Ghazni, in Afghanistan.
  9. the Joudes of Rennell's geography [see p. 75 above].
  10. The date assigned long prior to the Christian era, agrees with the Grecian, but the names and manners are Muhammadan.
  11. Lodorwa Patan, whence they expelled an ancient race, was their capital before Jaisalmer. There is much to learn of these regions.
  12. (Smith, EHI, 101)
  13. see Yule, Hobson-Jobson, s.v.
  14. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.184- 187
  15. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.187

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