Jat History Thakur Deshraj/Chapter II

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जाट इतिहास
लेखक: ठाकुर देशराज
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द्वितीय अध्याय : जाट शब्द मीमांसा

बौद्ध-काल के बाद हिन्दू-काल में जातियों में हेर-फेर

पीछे लिखे विवरण से यह बात तो सबकी समझ में आ सकती है कि बौद्ध-काल में तथा बौद्ध-काल के बाद हिन्दू-काल में जातियों में इतना हेर-फेर हुआ कि वास्तव में जो जाति-समूह आगे थे वे पीछे और जो पीछे थे वे आगे हो गये। जहां कुछ समूह नितान्त लुप्त हो गये, वहां कुछ बिल्कुल नवीन पैदा भी हुए। क्रान्ति में होता भी ऐसा ही है। भारत में बौद्ध-धर्म का बहिष्कार एक महान् क्रान्ति के पश्चात् हुआ था। अर्जुन, शुंगमित्र, शशांक आदि हिन्दू राजाओं ने बौद्ध लोगों के साथ वैसे ही व्यवहार किये थे जैसे कि आगे उनके धर्म बन्धुओं के साथ मुसलमानों ने किये थे। हमें यहां उस रक्त-रंजित इतिहास की चर्चा नहीं करनी है जो धर्मान्धता में हिन्दू-नरेशों द्वारा बौद्ध लोगों के साथ, हिन्दू-पुजारी और आचार्यों के संकेत से बनाया गया था। हमें तो यह बताना है कि इन दो धार्मिक क्रान्तियों के बाद, आर्य जाति में इतना घपला हुआ कि आज इतिहासकारों के लिए यह बताना जटिल समस्या हो गई है कि अमुक जाति (उपजाति से अभिप्राय है) अमुक-वर्ण और अमुक-वंश से है। इस समस्या को विदेशी जातियों के भारत के आगमन और सम्मेलन ने और भी पेचीदा बना दिया है। शक, सीथियन, तुरष्क, कुषाण, तातार आदि विदेशी विजेता जाति-समूह भारत में आकर आबाद हुए और आज उनका कोई अलग अस्तित्व है नहीं? तब अवश्य ही भारत की जातियों में कुछ जातियां ऐसी हैं जो आर्य-नस्ल के सिवाय दूसरी नस्लें हैं। इसी आधार को लेकर कुछ विदेशी इतिहासज्ञों ने जाटों को भी राजपूत, मराठे और गूजरों के प्रसंग में शक, सीथियन और हूण आदि जातियों के उत्तराधिकारी साबित करने की व्यर्थ चेष्टा की है। ऐसे लोगों में मि. स्मिथ और उनके अनुयायियों को पहला नम्बर है। स्मिथ महोदय का अनुमान है कि विजेता हूणों में से जिनके पास राजशक्ति आ गई वे राजपूत और जो कृषि करने लग गये वे जाट और गूजर है। हम कहते हैं कि स्मिथ की यह धारणा जहां निर्मूल है, वहीं बगैर सोचे समझे और अनुसंधान किये हुए ही जल्दबाजी में बनाई हुई है।


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जाट विशुद्ध आर्य हैं

श्री सी.बी. वैद्य के ‘‘हिस्ट्री आफ मिडीवल हिन्दू इंडिया’’ में स्मिथ जैसे ख्याल के लोगों के विचारों की काफी आलोचना है। पहले हम उन्हीं के उद्धरण का हिन्दी रूपान्तर अपने कथन की पुष्टि में पेश करते हैं-

Lastly we have to speak about the Jats. Their ethnological characteristics also, as we have already seen, are clearly Aryans. They are fair, tall, high nosed and long headed. Does their history contradicts their being Aryans? It may be stated at once that the Jats have very little history of their own till we come to quite recent times when the present lat kingdoms both Hindus and Sikhs in the U.P. and the Punjab were founded. But the Jats have the oldest mention of the three. They are mentioned in the Mahabharat as Jartas in the Karna Parva. The next mention we nave of them is in the sentence अजय जर्टो हुणान in the grammer of Chandra of the fifth century. And this shows that the Jats were the enemies of Huns and not their friends. The Jats opposed and defeated Huns : they must, therefore, have been the inhabitants of the Punjab and not invaders or intruders along with the Huns. Does the above sentence indicate that the Yashodharma Of Mandsor inscription who decisively defeated the Huns was a Jat? He may have been so, as Jats have been known to have migrated into the country of the Malvas or Central India as in to Sindh, But this is not material to our inquiry. The sentence amply shows that the Jats were not invaders along with the Huns but were their opponents. Though treated as Sudras by modern opinion owing to their being agriculturists and the practice of widow marriage they are the purest Aryan in India and belong to the first race of Aryan invaders according to our View, the Solar race of Aryans. It is therefore. strange that inspite of the fact that every person who had had intimate acquaintance with the people of the Punjab has marked the ethnic identity of the Jats, Gujars, and Rajputs plainly Aryans and not [Scythians]], theories have usually been propounded by scholars about their being Scythians, Getae, Yue-chi, Khizar and what not and about their having come into India within historical times, nay, on this side even of the Christian era. There is not a scrap of historical evidence even to suggest much less to prove such immigration (there is neither foreign mention of their coming into India nor have they any tradition of their own of some time coming into India nor is there any historical

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Indian record, stone, inscription or other of their so coming) and we can only ascribe such theories to unaccountable bias of the winds of many European and native scholars, to assign a foreign and Scythian origin to every fine and energetic caste in India. (See C.V. Vaidya :History of Medieval Hindu India, Being a History of India From 600 to 1200 A.D., Vol I (600-800 AD), 1921, pp.76-88)

अर्थात वे लिखते हैं कि - अन्त में हम जाटों के सम्बन्ध में कुछ लिखना चाहते हैं कि उनके मानव तत्व अनुसंधान के लक्षण जैसा कि हम देख ही चुके हैं साफ तौर से आर्य हैं। वे सुन्दर, लम्बे और बड़े नाक वाले हैं। क्या उनके इतिहासकार उन्हें अनार्य बताते हैं? यह एकदम कहा जा सकता है कि जाटों का अपना कोई भी इतिहास उस समय से पहले का नहीं है (है तो सही किन्तु लेख-बद्ध नही - ‘ले.’) जबकि वर्तमान हिन्दू, सिख जाटों के राज्य यू.पी. और पंजाब में कायम हुए। जाट, गूजर और मराठा इन तीनों में (किन्तु राजपूतों से भी - ‘ले.’) जाटों का वर्णन सबसे पुराना है। महाभारत के कर्ण-पर्व में इनका वर्णन जरित्का नाम से मिलता है। उनका दूसरा वर्णन हमको ‘‘अजयज्जर्तो हूणान्’’ वाक्य में मिलता है, जो कि पांचवीं सदी के चन्द्र के व्याकरण में है और यह प्रकट करता है कि जाट हूणों के सम्बन्धी नहीं, किन्तु शत्रु थे । जाटों ने हूणों का सामना किया और उनको परास्त किया । अतः वे पंजाब के निवासी ही होंगे और आक्रमणकारी और घुसपैठिये नहीं । क्या उपर्युक्त वाक्य यह साबित करता है कि मन्दसौर के शिलालेख वाला यशोधर्मन जिसने कि लगातार हूणों का परास्त किया था जाट था? वह जाट था, क्योंकि यह मालूम हो चुका है कि जाट मालवा-मध्यभारत में सिन्ध की भांति पहुंच चुके थे । परन्तु यह विषय हमारे प्रसंग से बाहर है । यह वाक्य यह तो प्रकट करता है कि जाट आक्रमक हूणों के साथी नहीं, किन्तु उनके विरोधी थे।

आधुनिक सम्मति के अनुसार कृषक होने के कारण और पुनर्विवाह को मानने के कारण उनको शूद्र माना गया है (किन्तु यह बात वैदिक-काल में प्रशंसनीय और श्रेष्ठ जातियों में करने की थी - ‘ले.’) लेकिन भारत में वे सब से शुद्ध आर्य हैं और हमारी दृष्टि के अनुसार वे भारत में आने वाले आर्यों में सबसे पहले वंश के हैं। (पृ. 87-88)

अतः यह अचम्भे की बात है कि इस सचाई के होते हुए भी कि प्रत्येक मनुष्य जो कि पंजाब के रहने वालों से पूरी जानकारी रखता है और जाट, गूजर एवं राजपूतों की मानव-तत्व अनुसन्धान की तुलना को देख लिया है कि वे स्पष्टतया सीथियन नहीं, आर्य हैं । तो भी अन्वेषकों ने आम तौर पर उनको सीथियन, गेटाई, यूची और खिजर न मालूम क्या-क्या होने के सिद्धान्त बना लिये हैं। यह भी निर्णय कर लिया है कि वे ऐतिहासिक काल में भारत में आये हैं। यही नहीं, अपितु सन् ईस्वी का भी बता दिया है। इस प्रकार के आ बसने के प्रमाण के लिए


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किंचित् भी ऐतिहासिक उल्लेख नहीं है। (उनका भारत में आने का न तो कोई विदेशी वर्णन ही है और न उनकी अपनी ही कोई दन्त-कथा ही है ताकि भारत में आने का उनका समय बताया जा सके। न ऐतिहासिक व शिलालेख के प्रमाण हैं) हम ऐसे सिद्धान्तों को देशी व यूरोपियन के दिमाग का केवल भ्रम ही कह सकते हैं, जो कि भारत की हर एक अच्छी और उत्साही जाति को विदेशी और सीथियन साबित करते हैं। (पृ. 87-88)

जाट न हूणों की संतान हैं और न शक सीथियनों की किन्तु वे विशुद्ध आर्य हैं। उपर के उद्धरण से यह पूर्णतया सिद्ध हो जाता है, किन्तु इससे भी अधिक गहरा उतरा जाए तो पता चलता है कि बेचारे हूणों और शकों के आक्रमणों का जब नाम निशान तक न था, तब जाट उस समय भी भारत में आबाद थे। पाणिनि, जो कि ईसा से लगभग 900 वर्ष पहले हुआ है उसके व्याकरण (धातु पाठ) में जट शब्द आता है जिसके कि माने संघ के होते हैं। पंजाब में जाट की अपेक्षा जट अथवा जट्ट शब्द का प्रयोग अब तक होता है। अरबी यात्री अलबरूनी तो यहां तक लिखता है कि श्रीकृष्ण जाट थे। ऐसे प्रबल प्रमाणों के होते हुए भी जाटों को हूण लिखने वाले लेखकों ने अपने अन्वेषण कार्य की जल्दबाजी को ही प्रकट किया है।

जातियों की पहचान के लिये अंग्रेज-अन्वेषकों ने कई साधन निकाले हैं जिनमें से दो मुख्य है - 1. शारीरिक बनावट, 2. भाषा-विज्ञान। शरीर-शास्त्र के साधन से अन्वेषकों ने मनुष्य जाति को पांच भागों में विभक्त कर दिया है - 1. आर्य, 2. मंगोलियन, 3. मलय, 4. हबशी और 5. अमेरिकन। रंग के हिसाब से ये ही जातियां गौरी, पीली, बादामी, काली और लाल कहलाती है। आर्य लोग रंग के गोरे या उजले उंचे ललाट वाले, सुआसारी नाक, चौड़ी छाती और काली आंखें तथा लम्बी बाहें और टांगें रखने वाले होते हैं। मंगोलियन अथवा तातारियों की चिपटी नाक, पीला रंग, चपटा माथा होता है। शक, सीथियन और हूण मंगोलियन टाइप के ही बताये जाते हैं। हमारे विचार से उनकी सूरत आर्य और मंगोलियन दोनों टाइपों की है। अपने जाट इन टाइपों (ढांचों) में से किस टाइप के हैं, इस प्रश्न का इन सिद्धान्तों के मानने वाले प्रत्येक विद्वान् ने यही उत्तर दिया है कि जाट सोलह-आना आर्य टाइप के हैं। पिछले पृष्ठ में ऐतिहासिक उदाहरणों से यह सिद्ध किया जा चुका है कि जाट आर्य हैं। अब मानवतत्व अनुसंधानशास्त्र के अनुसार जाटों के आर्य होने के कुछ उदाहारण लीजिये। मि. ई. बी. हेवल लिखते हैं -

Ethnographic investigations show that the Indo-Aryan type described in the the Hindu epic - a tall, fair complexioned, long headed race, with narrow prominent noses, broad shoulders, long arms, thin-waists like a lion and thin legs like a deer

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is how (as it was in the earliest times) most confined to Kashmere, the Punjab and Rajputana and represented by the Khattris, Jats and Rajputts. - The History of Aryan rule in India by E.B. Havell. (Page 32)

अर्थात - मानव-तत्व विज्ञान की खोज बतलाती है कि भारतीय आर्य जाति जिसको कि हिन्दू-वीर-ग्रन्थों में लम्बे कद, सुन्दर चेहरा, पतली लम्बी नाक, चौडे़ कन्धे, लम्बी भुजाएं, शेर की-सी कमर और हिरण की-सी पतली टांगों वाली जाति बतलाया है, (जैसी कि यह प्राचीन समय में थी) आधुनिक समय में पंजाब, राजपूताना और काश्मीर में खत्री, जाट और राजपूत जातियों के नाम से पुकारी जाती हैं । आगे के पेज में यही महाशय लिखते हैं कि -

The Indo-Aryan type, occupying the Punjab, Rajputana and Kashmere and having its characteristic members the Rajputs, Khatris and Jats. This type approaches most closely to that ascribed to the traditional Aryan colonists of India. The stature is mostly tall, complexion fair, eyes dark, hair on face plentiful, head long, nose narrow and prominent, but not especially long. (Page 33)

अर्थात - भारतीय आर्य जाति जिसके कि वंशधर आज राजपूत, खत्री और जाट हैं, पंजाब राजपूताना और काश्मीर में बसी हुई है। यह जाति उस प्राचीन आर्य जाति से बहुत अधिक मिलती-जुलती है जो भारत में आकर बसी थी। इसकी शारीरिक बनावट, अधिकतर लम्बी, सुन्दर चेहरा, काली आंखे, चेहरे पर पर्याप्त बाल, लम्बा सिर और उंची पतली नाक जो अधिक लम्बी नहीं होती है। और भी -

We are concerned merely with one fact that there exists in the Punjab and Rajputana at the present day, a definite physical type represented by the Jats and Rajputs which is marked by a relatively long head, a straight finely cut nose, a long symmetrically narrow face, a well-developed forehead, regular features, and a high facial angle. The stature is high and the general build of the figure is well proportioned, being relatively massive in the Jats and relatively slender in the Rajputs.

अर्थात् यह बात नितान्त सत्य है कि पंजाब और राजपूताना में जो जाट और राजपूत जातियां बसती हैं, वे अपने लम्बे सिर, सीधी सुन्दर नाक, लम्बे और पतले चेहरे, अच्छे उंचे मस्तिष्क, क्रमबद्ध गठन और उंचे घुटने होने के कारण पहचानी जाती हैं। उनका कद लम्बा होता है। उनका साधारण शरीर गठन क्रमबद्ध


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सुन्दर होता है। हां जाटों का कुछ मोटेपन पर तो राजपूतों का कुछ पतलेपन पर होता है।

सन् 1901 की जनगणना की रिपोर्ट सफा 500 पर सर एच. रिजले साहब ने स्पष्ट स्वीकार किया है कि जाट शारीरिक बनावट के अनुसार आर्य हैं । मि. नैस्फील्ड साहब ने यहां तक जोर देकर लिखा है -

As Nesfield has observed, if appearance goes for anything the Jats could not but be Aryans.
‘‘यदि सूरत-शक्ल कुछ समझे जाने वाली चीज है तो जाट सिवाय आर्यों के कुछ और हो नहीं सकते।’’

भाषा विज्ञान के अनुसार जातियों को पहचानने की जो तरकीब है, उसके अनुसार भी जाट आर्य हैं। इस प्रमाण में मिस्टर सर हेनरी एम. इलियट के. सी.बी. ‘‘डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ दी रेसेज ऑफ दी नार्थ-वेस्टर्न प्राविंसेज ऑफ इण्डिया’’ में लिखते हैं कि -

I have long ago convinced myself, from my journeys from Peshawar to Karachi that the Jat-folk is not more separated from the rest of the community than can be accounted for by various circumstances. The argument derived from language is strongly in favour of the pure Aryan origin of the Jats. If they were Scythian conquerors, where has their scythian language gone ? How come it that they now speak, and have for centuries, spoken an Aryan language, a dialect of Hindi? In Peshawar, the Dera Jat and across the Suleman range in Kach Gondana this language is known by the name of Hindki or Jat speech. The theory of the Aryan origin of Jats, if it is to be overthrown at all, must have stronger arguments directed against it than any that have yet been adduced. Physical type and language are considerations which are not to be set aside by mere verbal resemblance especially when the words on which reliance is placed come to us mingled beyond recognition by Greeks or Chinese.1

1. Memoirs on the History , Folk-lore and distribution of the races of the North Western Provinces of India : Being an amplified edition of the original Supplemental Glossary of India terms ...by Sir Henery M. Elliot K.E.B


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-63


"बहुत समय हुआ मैंने कराची से पेशावर तक यात्रा करके स्वयम् अनुभव कर लिया है कि जाट लोग कुछ खास परिस्थितियों के सिवाय अन्य शेष जातियों से अधिक पृथक् नहीं हैं। भाषा से जो कारण निकाला गया है वह जाटों के शुद्ध आर्य वंश में होने के जोरदार पक्ष में हैं। यदि वे सीथियन विजेता थे तो उनकी सीथियन भाषा कहां चली गई? और ऐसा कैसे हो सकता है कि वे अब आर्य भाषा को जो कि हिन्दी की एक शाखा है बोलते हैं, तथा शताब्दियों से बोलते चले आये हैं! पेशावर में डेरा जाट और सुलेमान पर्वत माला के पार कच्छ गोंडवा में यह भाषा हिन्दकी या जटकी भाषा के नाम से प्रसिद्ध है। जाटों के आर्य वंश में होने के सिद्धान्त को यदि कतई एक ओर फेंक देना है तो इसके विरूद्ध बहुत ही जोरदार प्रमाण देने होंगे जैसे कि अब तक कहीं नहीं दिये गये हैं। शारीरिक गठन और भाषा ऐसी चीज हैं जो कि केवल क्रियात्मक समानता के आधार पर एक तरफ नहीं रखे जा सकते, खासकर जबकि ये शब्द जिन पर कि समानता अवलम्बित है हमारे सामने आते हैं तो वे यूनानी या चीनियों से भिन्न पाये जाते हैं।"

उपर दी हुई पहचान ऐसी हैं, जिन पर देशी-विदेशी - दोनों भांति के इतिहासकार और मानव-तत्व अनुसंधानकर्ता विश्वास करते हैं। इन पहचानों के अलावा धार्मिक भावनाओं और रस्म-रिवाजों की भी एक पहचान है जिससे प्रत्येक जाति का पता चल जाता है कि आया वह किस नस्ल और देश की है? इस पहचान (सिद्धान्त) के अनुसार भी जाट आर्य नस्ल से हैं, यह बात पूर्णतया सिद्ध है । आर्य सभ्यता प्रारम्भिक काल में गंगा-यमुना के दोआबे में ही यौवन को प्राप्त हुई थी। इस नाते से गंगा-यमुना से उन्हें स्वाभाविक प्रेम तथा उनके प्रति श्रद्धा होनी चाहिए। जाटों में गंगा-यमुना की भक्ति और श्रद्धा इतनी कूट-कूटकर भरी हुई है कि वे गंगा-यमुना के किनारे (स्नान) करना अपना अहोभाग्य समझते हैं। आज उनमें से कुछ लोग गंगा-यमुना से सैकड़ों और हजारों मील की दूसरी पर बसे हुए हैं। किन्तु मरने वालों की अस्थियां गंगा-यमुना मे ही फेंकते हैं। वे शपथ भी गंगा-यमुना और गऊ माता की खाते हैं। प्राचीन (वैदिक) आर्यो में पृथ्वी के लिये बड़ी भक्ति थी। वेदों में पृथ्वी की प्रशंसा और स्तुति में एक अलग पृथ्वी सूक्त है। जाट युवक कबड्डी खेलते समय धरती माता पूजूं तोय - हाथ पांव बल दीजे मोय कहकर अपनी भक्ति प्रकट करते हैं। मरने से पूर्व कुशा (डाभ) पर लेटना प्राचीन ऋषि-मुनियों की प्रथा की रूढ़ि उनके यहां अब तक चली आती है। प्राचीन त्यौहार और उत्सव पर उनके घरों में अग्निहोत्र (जिसे अपभ्रंश रूप में वह अब वैश्वान्दर - बलि वैश्व - कहते हैं) होता है। बहुत संभव है कि वह मौजूदा कृत्रिम हिन्दू-धर्म की कुछेक रिवाजों को नहीं मानते हैं। किन्तु वैदिक कालीन आर्यो की ऐसी कोई प्रथा नहीं जो अब तक


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जाटों में किसी-न-किसी रूप में न चली आती हो। वैदिक आर्यों के आठ प्रकार के विवाह उनमें अब तक होते हैं। भीष्म-पितामह ने पांडु के विवाह के लिये मद्रनरेश के सामने प्रस्ताव रखा था। वर्तमान हिन्दू रिवाजों के अनुसार लड़के का बाप लड़की के बाप के सामने ऐसा प्रस्ताव नहीं रखता है। किन्तु अजमेर मेरवाड़े के जाटों में यह प्रथा अब तक प्रचलित है। जाट-बालक बजाने के लिये बांसुरी-अलगोजा पसन्द करता है जो कि उसके बहुत पुराने पुरूष श्रीकृष्ण का खास बाजा है। जाट-बालक को जब तक कि वह युवा नहीं होता, कछनी पसन्द होती है। जाट गृहस्थ अतिथि-सत्कार को अपना पैतृक रिवाज बतलाता है। जहां के जाटों का मस्तिष्क वर्तमान हिन्दू रिवाजों का गुलाम नहीं बना, वहां की जाट-स्त्रियां पर्दे को वहशीपन समझती हैं। वह अपने हाथों से अपने पति और पारिवारिक जनों को भोजन खिलाती हैं। जाट दास-प्रथा को बुरा मानते हैं। उनके यहां कुछेक लोकोक्तियां ऐसी चली आती हैं जो कि इन्हें वैदिक आर्यों के उत्तराधिकारी होने में तनिक भी सन्देह नहीं रहने देतीं। बाप का बदला लेने वाले पुत्र को प्रकट्यो सुत जन्मेदा (जन्मेजय) की लोकोक्ति से और उद्दण्ड पुत्र को बब्राहन (बब्रहन) नाम से पुकारते हैं। उन्हें रसिक रागों की अपेक्षा तत्व ज्ञान और भक्ति तथा वीर रस के राग अधिक पसन्द होते हैं । अपनी ओर से वे किसी से झगड़ा-बखेड़ा करने के आदी नहीं हैं। मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे का सिद्धान्त जो कि प्राचीन आर्यों का था, उनका स्वभाव बन गया है। अतः धार्मिक भावनायें और रस्म रिवाज उन्हें वैदिक आर्यों का सच्चा उत्तराधिकारी सिद्ध करती हैं। यह निर्विवाद सही बात है कि, जाट विशुद्ध आर्य हैं।1

फिर भ्रम क्यों?

इतिहासकारों में कुछ एक लोगों को यह भ्रम क्यों हुआ कि जाट शक तथा हूणों में से हैं? हमारी समझ में इस भ्रम के निम्न कारण हैं-

  • 1. जाटों का अन्य हिन्दुओं की अपेक्षा सामाजिक रीति-रिवाजों से बहुत कुछ स्वतंत्र होना,
  • 2. उनके अन्दर छूआछूत और भेद-भाव के सिद्धान्तों की शिथिलता,
  • 3. समकक्ष क्षत्रिय जातियों के रस्म-रिवाज में विदेशी जातियों के रस्म-रिवाज का सामंजस्य,
  • 4. उनके नाम से मिलती-जुलती जातियों का विदेश में अस्तित्व,
  • 5. कुछ इतिहासों में जाटों में ब्राह्मणों तथा उनके पिट्ठुओं द्वारा किये गये अत्याचार के उदाहरण मिलना,
  • 6. व्यास, चारण आदि की वंशावलियों में जाटों को दोगला लिखा हुआ होना,
  • 7. उनके प्रामाणिक इतिहास की कमी,
  • 8. एकतंत्र शासन की अपेक्षा गणतंत्र शासन की प्रणाली पर चलने के कारण साम्राज्य भावना का न होना।

1. जाट सूर्य-उपासक नहीं हैं फिर सीथियन कैसे हुए?


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-65


संभव है इन कारणों के सिवाय भी एक-दो कोई और कारण हों। किन्तु वे भी इन्हीं से मिलते-जुलते होंगे। किसी विदेशी विद्वान् को इतने कारण सहज ही में भ्रम में डाल सकते हैं और वह जो नतीजा निकालेगा उलटा ही होगा क्योंकि उसकी निगाह में वास्तविक परिस्थितियां तो सहज में आ नहीं सकतीं, जैसे -

  • 1. विदेशी विद्वान् इतिहासकारों ने जब देखा कि हिन्दू-धर्म पुनर्विवाह का निषेध करता है और जाटों में यह रिवाज प्रचलित है, तब सहज में ही उनके मस्तिष्क में यह भाव पैदा हुआ - हो न हो यह उन लोगों में से हैं जो तातार या हूण आदि कहलाते हैं। यदि ऐसे विद्वानों को वैदिक रस्म-रिवाजों और जाटों की रस्म-रिवाजों की समानता का ख्याल आ जाता तो उन्हें गलत रास्ते पर न जाना पड़ता।
  • 2. हिन्दू-धर्म के अनुसार ‘आठ पुविंया नौ चूल्हे’ की भोजन-व्यवस्था और दूसरी ओर जाटों का नाई, गड़रिया, लोधे, अहीर, गूजर, माली, राजपूत आदि सब के घर और हाथ का बना भोजन खा लेना एक-दूसरे के विपरीत देखा, तब उन्होंने यह अनुमान लगा लिया कि ‘जाट बहुत पीछे के भारत में आए हुए हैं जो कि शनैः शनैः हिन्दू-धर्म में लिप्त हो रहे हैं।’ यह उन विद्वानों का बिना परिश्रम का ख्याल था। निश्चय ही उन्हें आर्य-सभ्यता का ज्ञान होता तो समझ लेते कि जाट प्राचीन आर्य-धर्म के पालक हैं। उन पर कृत्रिम हिन्दू-धर्म का प्रभाव बहुत कम पड़ा है।
  • 3. बकरे, भैंसे आदि के बलिदान, दुर्गा और सूर्य की पूजा के रिवाजों के आधार पर विदेशी इतिहास लेखकों ने राजपूतों और उनके साथियों को ऐसे ही रस्म-रिवाज वाली विदेशी जातियों का वंशज अनुमान कर लिया। चूंकि अनेक जाटों के वे ही गोत्र हैं जो राजपूतों के हैं, वैसे भी राजपूत और जाटों में कुछेक रिवाजों को छोड़कर समानता है, बस इसी आधार पर उन्होंने राजपूतों के साथ ही जाटों को भी वही लिख दिया, जो राजपूतों के लिए लिखा है। गूजर और जाट दो समुदाय ऐसे हैं जिनके रस्म-रिवाज में 19-20 का अन्तर है, गूजरों में दो-एक गोत्र ऐसे हैं जो विदेशी जातियों के नाम पर हैं, जैसे हूण। गूजरों को विदेशी मानने के लिए इतनी सी सामग्री मिल जाना, उनके लिए काफी था और अब गूजर विदेशी हैं तो उनके साथी जो कि उनसे थोड़े ही श्रेष्ठ हैं क्यों न विदेशी होंगे ! सामंत अधिक दान-दक्षिणा में समर्थ थे, अतः उनको दक्षिणा भोगी पुरोहित ने ऊंचा बताया और लोकतंत्र में आस्था वाले जाटों को जो दान-दक्षिणा विरोधी थे, नीच।
यदि इसी बात को विदेशी इतिहासकार इस तरह समझ लेते कि हूण गूजरों की खानि में जज्व (मिल) हो गए तो सहज ही उनका भ्रम मिट सकता था। राजपूतों के अग्नि-कुल वाली कथा ने भी राजपूत, जाट, गूजरों को विदेशी और अनार्य होने के लिए काफी भ्रम फैलाया। विदेशी इतिहासकार समझते हैं कि भारत से बाहर के लोगों को शुद्ध करके आर्य (क्षत्रिय) राजपूत बनाया गया था।

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-66


वास्तव में बात यह है कि बौद्ध-क्षत्रियों के मुकाबले के उन्हीं में से अथवा भारत के ही कुछ निम्न दल के लोगों को हिन्दू-धर्म में (बौद्ध धर्म से) दीक्षित किया था।
  • 4. समानवाची देशी-विदेशी नामों ने भी ऐसे इतिहासकारों को खूब धोखे में डाला है । यूरोप के गाथ, गेटि, जेटो, चीन के यूची, यूती ऐसे नाम हैं जो जाट शब्द से मिलते हैं। इस शब्द-समानता के मिलते ही फौरन ही उन्होंने जाटों को मंगोलियन और सीथियनों के उत्तराधिकारी अथवा विदेशों से भारत में आया हुआ लिख दिया । यदि वे संस्कृत-साहित्य अथवा पाली-साहित्य और पारसी, अरबी तथा चीनी इतिहासों को परिश्रम के साथ पढ़ने और कुछ खोज करने की चेष्टा करते तो उन्हें मालूम हो जाता कि यदि यूरोप और चीन में कहीं भी जाटों के भाई-बन्धु (गेटे, गाथ, यूची आदि) पाए जाते हैं तो वे भारत से गए हुए हैं न कि उन स्थानों से आकर भारत में बसे हैं। कर्नल टाड ने स्कन्धनाभ में जाटों की बस्तियों का वर्णन किया है, किन्तु जिस समय स्कन्धनाभ में उनके प्रवेश का वर्णन आता है उससे कई शताब्दी पहले भारत में उनका अस्तित्व पाया जाता है। जाट भारत से बाहर गए थे, ईसा से कई सौ वर्ष पहले गए और कई सौ वर्ष पीछे तक जाते रहे, इसका विस्तृत वर्णन आगे के पृष्ठों में करेंगे। यंहा इतना ही लिखना काफी है जैसा कि श्री चिन्तामणि विनायन वैद्य मानते हैं कि - न किसी विदेशी इतिहास में ऐसा वर्णन है कि जाट अमुक देश से भारत में गए और न जाटों की दन्तकथाओं में । पं. इन्द्र विद्या वाचस्पति ‘मुगल साम्राज्य का क्षय और उसके कारण’ नामक इतिहास पुस्तक में यही बात लिखते हैं कि - जब से जाटों का वर्णन मिलता है वे भारतीय ही हैं और यदि भारत के बाहर कहीं भी उनके निशान मिलते हैं तो वे भी भारत से ही गये हुए हैं।
  • 5. सिन्ध में ब्राह्मण नरेश चच ने जाटों के साथ जो व्यवहार किया था तथा उन्हें सामाजिक स्थिति से गिराने के लिए जो नियम बनाये थे, उससे भी एकाध लेखक को जाटों के आर्यों के सिवाय अन्य कुछ होने का भ्रम हुआ है, किन्तु यह तो बात अधिक न थी। साम्प्रदायिक अन्तर भाई-भाई को शत्रु बना देता है। जाट नवीन हिन्दू-धर्म के बन्धन से मुक्त रहना चाहते थे। वह कुछ सीमा तक बौद्ध-धर्म के कायल थे। यही कारण था कि चच और उसके उत्तराधिकारियों ने उनके साथ कठोरता की। विजेता जाति पराजित जाति पर अत्याचार सदैव करती आई है। यदि धार्मिक मतभेद हो तो यह अत्याचार और भी बढ़े हुए होते हैं। लेकिन यह याद रखने की बात है कि धर्म या मजहब (नेशन) को नहीं बदल सकते हैं।
  • 6. राजपूताने में वंशावली रखने वाली कौम को व्यास या जागा कहते हैं; चारण भी यही काम करते हैं। उनकी बहियों में अनेक जाट गीतों के लिये लिखा हुआ है कि अमुक राजपूत ने जाटिनी से शादी कर ली अतः वह जाट हो गए। ऐसे व्यास या भाट यू.पी., पंजाब सभी जगह हैं। उनसे किसी भी जाट गोत्र की उत्पत्ति का हाल पूछिये, ऐसी ही वाहियात और निर्मूल

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कथा का हवाला देते हैं। ऐसे ही लोगों के कथन के आधार पर पटियाला, फरीदकोट और भरतपुर जैसी स्टेटों के इतिहास में उनके राजवंश के हवाले तक लिखे जा चुके हैं। यह भी एक आधार था जिससे विदेशी और उनका आंख मूंदकर अनुसरण करने वाले देशी इतिहासकार इस नतीजे पर पहुंच गये कि जाट क्षत्रिय-कौम के अलावा बाहर की कोई लड़ाकू कौम हैं, जिन्होंने समय पाकर भारत पर आक्रमण करके स्थान प्राप्त कर लिया है। हालांकि वे ऐसे व्यासों-भाटों की वंशावलियों और बहियों को विश्वास योग्य और प्रामाणिक मानने में हिचकते रहे, किन्तु जाटों के विपक्ष में तो कलम चला ही गये। हम कहते हैं और चैलेंज-पूर्वक कहते हैं कि भाटों और व्यासों की बहियों में जाटों को राजपूतों में से होने की जो कथा लिखी हुई है, वह सफेद झूठ है। व्यासों ने ऐसा क्यों लिखा, इसका पूरा विवरण आगे के पृष्ठो में दिया जाएगा। यहां केवल जस्टिस केम्पवेल का मत दिया जाता है -

It may be possible that the Rajputs are Jats who have advanced further into Hindustan, have there Intermingled with Hindu races, have become more high and Strict Hindus and achieved earlier power and glory. But that the Jats are Rajputs who have receded from a higher Hindu position, is a theory for which there is not the least support and which is contradicted by every feature in the present position of the now rapidly progressive Jats.
अर्थात् - यह संभव हो सकता है कि राजपूत जाट हैं जो कि भारत में आगे बढ़ आये हैं और वहां हिन्दू-जातियों से परस्पर मिल गए हैं तथा ऊंचे और कट्टर हिन्दू हो गए हैं। उन्होंने अपने प्राचीन बल-वैभव को प्राप्त कर लिया है। लेकिन यह कि जाट राजपूत हैं और ऊंचे दर्जे से घट गए हैं, यह एक ऐसा सिद्धान्त है जिसके लिए बिल्कुल सबूत (पक्ष) नहीं है और जो आज वर्तमान उन्नतिशील जाटों के बाहरी वर्तमान आचरण से स्पष्ट तौर से प्रकट होता है।
  • 7. प्रमाणिक इतिहास की कमी ने जाटों को उनके स्थान से गिराने में बहुत सहायता दी है। मथुरा मेमायर्स के लेखक मि. ग्राउस ने जाटों को अपना इतिहास न लिखने पर काफी फटकार बताई है। वास्तव में उनकी कोई इतिहास-पुस्तक न पाकर दूसरे लोगों से जैसा उन्होंने सुना या, जैसा उन्हें बताया गया, वे लिखने को विवश हुए। फिर भी उन्होंने जाटों के लिए इतिहास लिखने का रास्ता साफ कर दिया है। यह सिद्ध करना कुछ भी कठिन नहीं है कि जाट ‘इंडो आर्यन’ हैं जिन्हें कि किसी-किसी इतिहासकार व गजेटियर के संपादक ने ‘इंडोसीथियन’ लिख दिया है चूकि वे जाटों के भारतीय इतिहास से अनभिज्ञ थे।

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  • 8. यद्यपि जाटों में कुछ एक व्यक्ति या समूह ऐसे थे, जिन्होंने एकतंत्र या साम्राज्य शाही को पसन्द किया और ऐसे शासन भी स्थापित किए किन्तु पूरा समुदाय गणतंत्र (प्रजातंत्रशाही) का मानने वाला था। यही क्यों, वे एकतंत्र शासन के पक्ष में विचार रखने वालों के विपक्षी भी बन जाते थे। इनमें से कोई कोई समुदाय तो बिल्कुल अराजकतावाद थे। वे न वंशानुगत राजा चाहते थे न ही सरदार प्राणि के काइल होना चाहते थे। अराजकतावाद के विरूद्ध भारत में सदैव संघर्ष रहा है। शतपथ ब्राह्मण और महाभारत में अराजकतावाद के विरूद्ध खूब चर्चा की गई है। कारण यह था कि अराजक लोगों में न किसी धर्म का प्रचार हो सकता था और न किसी जाति का दूसरी जाति पर प्रभुत्व स्थापित। इसीलिए ब्राह्मण-वर्ग सदैव अराजकतावाद के विरूद्ध रहा है। उसने यादव और तक्षक आदि जातियों को इसीलिए अनार्य और शूद्र करार दे दिया। प्रजातंत्र और एकतंत्र भी भिन्न हैं। नया हिन्दू-धर्म भी प्रजातंत्र के नितान्त विरूद्ध था, क्योंकि एकतंत्र में उन्हें धर्म-प्रचार के लिए सुविधा रहती थी। एक राजा के धर्म बदलते ही सारी प्रजा धर्म बदल लेती थी किन्तु गणतंत्र में अनेक सरदारों को शीघ्र धर्म-परिर्वतन करा देना कठिन था। नवीन हिन्दू-धर्म ने प्रजातंत्र को इसलिए भी बुरा समझा कि बौद्ध-धर्म के संघों का संगठन गणतंत्र प्रणाली के अनुसार ही हुआ था। ब्राह्मण, धर्म के मामले में एक पुजारी या आचार्य को सर्वाधिकारी होने के पक्षपाती थे। बौद्ध-संघों में सब बातें वोट द्वारा तय होती थीं। ब्राह्मण ने अथवा नवीन हिन्दू धर्म ने आखिरकार गणतंत्री जाति-समूहों को राजतंत्री समूहों से पतित करार दे ही दिया। इस घरेलू संघर्ष का आधार भी जल्दबाज इतिहासकारों के लिए जाटों को इंडो-सीथियन बनाने के लिए काफी हुआ। पर ऐसे लेखक 10 प्रतिशत थे। 90 प्रतिशत लेखकों ने मुक्त-कंठ से जाटों को प्राचीन आर्यों के विशुद्ध वंशज बताया है। सिद्धांत है कि सच्चाई छिपाने से छिपती नहीं है। लाल गूदड़ों में भी पहचाने जा सकते हैं और जादू सर पर चढ़कर बोलता है। जाटों ने इस बात के विरूद्ध न तो आवाज उठाई कि कोई उनके विरूद्ध क्या प्रचार करता है न प्रतिवाद किया। फिर भी निष्पक्ष और मनन-शील विद्वानों, अन्वेषकों और इतिहासकारों को यह स्पष्ट तौर से मानना पड़ा कि जाट आर्य हैं और प्राचीन आर्यों के वह वास्तविक उत्तराधिकारी हैं

जाट क्षत्रिय हैं

जाट, वैदिक वर्ण-व्यवस्था के क्षत्रिय वर्ण में से हैं। वे उन राजवंशों की संतान हैं, जिन्हे श्रेष्ठ क्षत्रिय कहा गया था। नये हिन्दू-धर्म ने जो कि बौद्ध-धर्म के बाद भारत में फैला है, पुराने क्षत्रियों को यह कहकर भुलाने की चेष्टा की थी कलियुग में क्षत्रिय वर्ण की नहीं है । कारण इसका यही था कि पुराने क्षत्रियों ने ब्राह्मणों की दासता के विरूद्ध कई बार आन्दोलन किया था।


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वे कहते थे कि हम ब्राह्मणों से निम्न श्रेणी के कैसे हैं? विश्वामित्र जैसे नर्म विचार के कुछ क्षत्रिय ब्राह्मण बनने की चेष्टा में पूर्ण उद्योग करते थे। बुद्ध और महावीर ने तो ब्राह्मण वैशिष्ट्य को कतई उठा दिया था। जैन-नेताओं ने तो परम्परागत ब्राह्मणों के मुकाबले में शूद्रो में से ब्राह्मण बनाये थे जैसा कि हम पहले अध्याय में सप्रमाण लिख चुके हैं। बौद्ध और जैन धर्मों के परास्त होने पर ब्राह्मणों ने भी बौद्ध-जैन क्षत्रियों को जो कि उनके धर्म में सम्मिलित होने से किनाराकशी कर रहे थे, भरपूर गिराने की चिष्टा की। यही क्यों, पुराने क्षत्रियों के मुकाबले में उन्होंने ब्राह्मण भर और यहां तक कि जंगली जातियों में से भी क्षत्रिय बना डाले। धर्म इतिहास रहस्य के लेखक ने नवीन हिन्दू-धर्म की वर्ण-व्यवस्था पर बड़ी मजेदार बातें लिखी हैं, वे इस प्रकार हैं - जब ये जातियां हिन्दू मत में आ गई तो धर्म-शास्त्र की आज्ञानुसार उनकी इस स्वच्छन्दता को रोकना आवश्यक था। यदि ब्राह्मण और जैनी लोग आचार-विचार को न मानते तो वर्ण-व्यवस्था स्थिर करने में कुछ बाधा न पड़ती। अब तो बौद्धादि मतों के मनुष्यों को मिलाना भी आवश्यक था, क्योंकि टूटी भुजा गले से ही बांधनी पड़ती है। तीर्थ जाने पर तो मुंड़ाना ही पड़ता है। ..... जब स्वामीजी (शंकराचार्य) ने देखा कि भिन्न-भिन्न आचार विचार और वंशों की जातियां हिन्दू मत में आ गई हैं तो वे एक चक्कर में पड़ गए कि वर्ण-व्यवस्था किस प्रकार स्थिर की जाए? पर कार्य तो चलाना ही था, इसलिए टूटे-फूटे वर्ण बना दिए। प्रथम वर्ण ब्राह्मण कहे जाते थे, चाहे वे किसी सम्प्रदाय के थे। इन पुराने ब्राह्मणों में प्रायः शैव, वैष्णव, वामी, कापालिक, जैन और बौद्ध मत से आए थे। अब जितने अब्राह्मण आचार्य थे, उनमें से बहुतों ने जब पांचवी शताब्दी में ही बौद्ध मत का सूर्य ढलता देखा और ब्राह्मणों के मत को चढ़ते हुए देखा तो अपने को ब्राह्मण चिल्लाना आरम्भ कर दिया था। अब तो अपने को ब्राह्मण नहीं कहते थे उनको भी ब्राह्मण माना, क्योंकि प्रथम तो यह लोग विद्वान्, दूसरे उनकी सत्यपरायणता, तीसरे उनके बिगड़ने का भय था, चौथे उनको ब्राह्मण न माना जाता, तो क्या माना जाता? पांचवें यदि ब्राह्मण की ओर से इन आचार्यों को ब्राह्मण न माना जाता तो अन्य वर्ण भी विधर्मियों को अपने-अपने वर्ण में स्वीकार न करते। पुराणों को देखने से पता चलता है कि इस विषय पर झगड़ा भी चला है। हम देखते हैं कि पुराणों में विषय कुछ चल रहा है और बीच में धींगा-धींगी से वर्ण-व्यवस्था का झगड़ा ठूंस दिया है। जहां देखिए, वहां ब्राह्मणत्व द्वारा तबाही।

अब वर्ण तो बन गया, किन्तु परस्पर खानपान और विवाहादि के सम्बन्ध कैसे स्थिर किए जाएं? भला दक्षिण देश के नम्बूद्रि और शुद्धाचरण रखने वाले ब्राह्मण


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एक कापालिक और वामी को अपनी पुत्री कैसे दे सकते थे? उधर इन रंगरूटों का विश्वास भी कुछ नहीं था। इसलिए इसके सिवाय कुछ उपाय नहीं था कि ब्राह्मणों की भिन्न-भिन्न जातियां बना दी जाएं, और कह दिया जाए कि परस्पर सम्बन्ध करो। उस समय के लिए यह उपाय सर्वथा उचित था। जो ब्राह्मण आचार-विचार को मानते चले आते थे वे तो इसे प्रसन्न हो गए, क्योंकि इनमें से बहुत से तो देवीजी के उपासक थे। बहुत से इस नवीन मत में आने और पुराने मत के छूटने के मोह में बड़े खिन्न थे। वे लोग नहीं चाहते थे कि इस बन्धन पूर्ण मत में जाकर अपनी पिछली बातों की तिलांजली दे डालें।

वे लोग तो कोई बड़े आचार्य तो नहीं थे, पर उनमें ब्राह्मण का भी कुछ रक्त था, उन्हें उनके कर्मों के सम्बन्ध से ज्योतिषी, पड़िया, भरारा भाटादि के नाम दे दिए। चौथी शताब्दी के शासक जातियों का क्षत्री नाम से पुकारा जाना बन्द हो गया था। जो लोग राज करते थे, वे अपने अपने वंशों के नाम से प्रसिद्ध थे। इसका कारण यह था कि बौद्ध मत ने अपने प्रबल प्रभाव से वैदिक वर्ण-व्यवस्था और वंश गौरव को बिल्कुल उलट पलट कर दिया था। क्या आश्चर्य है कि वर्तमान खत्री जाति प्राचीनों की वंशज हों? हमें जहां तक पता चला है, खत्रियों की बहुत-सी क्षत्रियों से लग्गा खाती हैं। इसी प्रकार जाट नामक जाति में कुछ बातें अभी तक प्राचीन चन्द्रवंशी क्षत्रियों अर्थात् कौरव पाण्डवों से टक्कर खाती हैं। पर इन जातियों की गिरावट ऐसी विवश कर देती है कि जिससे हम इनके विषय में कुछ भी निश्चय नहीं कर सकते।

यद्यपि सामयिक शासक जातियों को क्षत्रिय कहने में कुछ भी हानि नहीं थी, क्योंकि क्षात्र धर्म के सब पूरे-पूरे गुण थे, और वाम-काल में ऐसा हो भी चुका था । महात्मा बुद्ध स्वयं शक जाति के होने से शाक्यवंशी क्षत्रिय कहलाते थे। पर उस काल में जन्मवाद ने ऐसा गहरा रूप धारण नहीं किया था। विदेशीय जातियों के लोगों को क्षत्रिय नाम देने में झगड़ा होने का भय था कि कहीं वे जातियां जो अपने को राम-कृष्ण आदि के वंश से बतलाती हैं बिगड़ न बैठें। 600 ईस्वी से जब हिन्दू मत ने कुछ उभरना आरम्भ किया था, ये जातियां अपने को राजपुत्र कहने लगीं थीं, इसका कारण यह भी था कि ये लोग ब्राह्मणों का तो इसलिए मान करते थे कि वे हमको नीच वंश1 से न कहने लगें, उधर बौद्धों को इसलिए


1 . हम "धर्म इतिहास रहस्य" के लेखक के मत के पूर्ण समर्थक नहीं. हमारी सम्मति में सारे राजपुत्र न विदेशी हैं न नीच वंशों से. उनमें से अनेक वंश ऐसे हैं जिनमें प्राचीन (वैदिक) क्षत्रियों का रक्त है. कुछ थोड़े से क्षत्रियेतर भले ही हों. (लेखक).


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प्रसन्न रखते थे कि उनके मत में जन्म का कुछ मूल्य न था। राजपुत्र नाम ऐसा था कि जिसको किसी मत का मनुष्य भी बुरा नहीं कह सकता था। इसलिए इनका नाम राजपुत्र ही रहने दिया। यह एक नियम है जिन जातियों को अपने शत्रुओं का भय रहता है वे परस्पर मिल ही जाती है। (2) क्षत्रियों को दूरे राजाओं की कन्या लेने का अधिकार सदा से रहा है। चित्तौड़ के विशुद्ध क्षत्रियों के पूर्वज ने नौशेरवां बादशाह की पोती से अपना विवाह किया था।

तीसरा वर्ण वैश्य होना चाहिए था, पर आर्य-ग्रर्न्थों में जो गुण, कर्म, स्वभाव बतलाए थे, वे पूर्ण रूप से किसी में भी न थे। बौद्ध-काल में जो जातियां जो कर्म करती चली आती थीं, वही उनका नाम भी था, इसलिए उन लोगों के वे ही पुराने नाम वणिक, व्यापारी, बनजारे, किसान, माली आदि रहने दिए और उनकी भी भिन्न-भिन्न जातियां बना डालीं। धीरे-धीरे धनवानों ने भूमि-देवों की कृपा से वैश्य की पदवी प्राप्त कर ली। इन वैश्यों में भी कुछ जातियां तो ऐसी हैं कि वे थोड़े ही काल से राज्य-च्युत होकर वैश्य बन गई हैं। चौथे वर्ण शूद्र की भी यही दशा हुई।1

नवीन हिन्दू-धर्म द्वारा जाटों का सामाजिक दर्जा गिराने की चेष्टा:

जब कि नवीन हिन्दू-धर्म नये सिरे से समाज-रचना कर रहा था, उस समय जाट क्षत्रियों ने उससे कोई सहयोग नहीं किया, वे अपने कुछेक परम्परागत रिवाजों को नहीं छोड़ना चाहते थे। उदाहरणार्थ विधवा-विवाह और सामाजिक समानता। उन्हें स्त्रियों को पर्दे में रखने तथा बलात् सती कर देने की रिवाज भी न रूची, वे अपनी सामाजिक व्यवस्था की रचना में इतना हेर-फेर एकदम बर्दास्त नहीं कर सकते थे। यद्यपि उन पर बौद्ध-धर्म का प्रभाव था, पर एकेश्वरवाद के वे समर्थक थे। हिन्दू-धर्म की बहुदेव पूजा भी उन्हें न रूची। वे अपने पूर्वजों की भांति देवर-विवाह-प्रथा के अधिकार को नहीं छोड़ना चाहते थे। खान-पान के मामले में भी वे चौंके की गुलामी में फंसने को बुरा समझते थे। वे तो एक हाथ में रोटी और एक हाथ में शत्रु का लहू लुहान सिर थामने वाले पुरूखाओं के भक्त थे। आखेट को वे बुरा नहीं मानते थे किन्तु, चामुंडादेवी पर बकरा, भैंसा काटना उन्हें नितान्त स्वीकार न था। यद्यपि उनमें एकतंत्रवादी विचार के भी कुछ लोग थे किन्तु अधिकांश में वे गण-राज्य के पक्षपाती थे, जो कि नवीन हिन्दू-धर्म के विधान से बाहर की वस्तु थी। ये ही कारण थे कि नवीन हिन्दू-धर्म ने उन्हें सामाजिक दर्जे से गिराने की चेष्टा की। हालांकि सारा जाट-समुदाय अटल न रह सका, उनमें से अनेक वंश और कुल नये हिन्दू-धर्म में दीक्षित हो गए और राजपुत्र कहलाने लगे जैसा कि जस्टिम कैम्पबैल के कथन और इम्पीरियल गजेटियर जिल्द दूसरी पृ. 308-309 के लेख से प्रकट होता है।


1. धर्म इतिहास रहस्य पृ. 145 से 150


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जाटों ने अपने प्राचीन रस्मो-रिवाज को नवीन हिन्दू-धर्म के आघात-प्रत्याघात सहते हुए आज तक सुरक्षित रखा है। किन्तु ज्यों-ज्यों समय बीतता गया, उन पर नवीन हिन्दू-धर्म की छाया पड़ती गई। ब्रज के निकटवर्ती जाट तो नवीन हिन्दू-धर्म के गढ़ मथुरा वृन्दावन से बहुत दूर नहीं रहते हैं, अब से 5-6 सदी पूर्व के अपने पुरूखों की आन को छोड़ बैठे हैं और पूरे हिन्दू हो गए हैं, आर्य नहीं रहे। उनमें से अनेक राजपूतों की तरह कन्यावध करने लगे हैं।1 अपनी विधवा लड़कियों का पुनर्विवाह नहीं करते। भौजाई के साथ नाता करना भी छोड़ दिया है। पर्दे की उनके घरों में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। गूजरों और अहीरों के साथ जो पुरातन खान-पान का व्यवहार चला आता था, उसमें शिथिलता आ गई। बहुदेव पूजा भी वृद्धि पर है। अपने को वे अन्य जाटों की अपेक्षा जिनमें कि प्राचीन रस्में अभिमान के साथ मानी जाती हैं - श्रेष्ठ समझते हैं। कहीं कम और कहीं अधिक नये हिन्दू-धर्म का रंग आरम्भिक काल से अब बहुत कुछ उन पर चढ़ गया है। लेकिन ब्राह्मणों ने जो धारणा उनके प्रति आरम्भ में बनाई थी, उनमें वे बहुत कम झुके हैं।2 बौद्ध-काल के पश्चात् उदय होने वाले ब्राह्मण-धर्म अथवा नवीन हिन्दू-धर्म में शीघ्र से प्रविष्ट न होने वाले जाटों को ही सामाजिक-मान की हानि नहीं उठानी पडी है, वरन् अहीर, गूजर, मराठा, काठी, खत्री आदि अनेक क्षत्रिय समुदायों को उसका कोप-भोजन होना पड़ा है।

महात्मा कार्ल मार्क्स लिखते हैं - धर्म अफीम जैसा नशीला पदार्थ है । यह सिद्धान्त कहां तक झूठ व सही है, इस पर तो हमें विवेचना नहीं करनी, किन्तु यह प्रत्यक्ष है कि धर्म या मजहब मनुष्य-समुदाय की टुकड़े-बन्दी करने के सिवाय उनमें शत्रुता भी पैदा कर देता है व भाई को भाई से अलग करके एक दूसरे का प्राणान्त करने पर भी उतारू कर सकता है। ब्राह्मणों, व्यासों आदि की मनोवृत्तियां जाट, गूजर अथवा मराठों के साथ केवल धार्मिक मत-भेद से कुछ भी रही हों, किन्तु अधिकांश राजपूत जो उन्हीं में से निकले हुए थे, अथवा उन्हीं की भांति क्षत्रिय-वृक्ष की शाख थे, जाटों तथा उन्हीं के जैसे विचारों की जातियों के साथ निकृष्ट बर्ताव करने पर उतर आए । वर्तमान में राजपूताना कहे जाने वाली भूमि पर जहां गूजर, अहीर, जाट बहुत पहले से आबाद थे, जब नवीन धर्म से मंडित यह समुदाय आया तो जाटों ने इनका कोई अधिक विरोध न किया, क्योंकि जाट इन्हें गैर न मानते थे। परन्तु इन्होंने उनके साथ वही व्यवहार किया जो सभ्य समाज के माथे पर कलंक-कालिमा लगा सकता है । इनके सहारे से पलने वाले ब्राह्मणों, भाटों और चारणों ने जाट, गूजर और अहीरों को क्षत्रिय न कहने और


1 . अब से 10 वर्ष पहले सिनसिनवार, नोहवर आदि में ऐसा होता था.
2 . अभी 6 -7 साल पहले दरभंगा के ब्राह्मण नरेश का भाषण उनकी मनोवृति का प्रतिबिम्ब है.

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मानने का मौखिक और लिखित काफी प्रचार किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि इन योद्धा-जातियों की यह अवस्था हो गई कि वे स्वंय अपने स्वरूप को भूल गईं। साथ ही आम जनता की भी सदियों से सुनते रहने के कारण यह धारण हो गई कि जाट क्षत्रिय नहीं हैं। जाटों को वैश्व लिखने की भूल - ऐसे ही कारणों और धारणाओं के आधार पर कुछ इतिहासकारों ने जाटों को वैश्व लिखने की भूल की है। श्री सी.बी. वैद्य ने जहां अपने हिन्दू मिडीवल इण्डिया में जाटों को विशुद्ध आर्य वंश के लिखा है, वहां उन्हें वैष्व वर्ण के अन्तर्गत शामिल किया है। एक तो उनके उत्तम खेतिहर होने और दूसरे जाट-नरेश यशोधर्मा के बाप विष्णुवर्द्धन के साथ वर्द्धन शब्द होने से उन्हें यह भ्रम हुआ कि जाट वैश्य हैं। यदि वर्ण पेशे के अनुसार बदलने वाली चीज है तो हमें कोई ऐतराज नहीं कि खेती करने के कारण जाट वैश्य हैं और जिस समय वे फौज में भर्ती होकर या अपने नेता के साथ मिलकर युद्ध करते हैं, क्षत्रिय हैं। परन्तु जैसा कि वैद्यजी ने लिखा है कि शायद वे वेदों के विश् हों हम कहेंगे उनका यह अनुमान निराधार एवं निर्मूल हैं। उनके नगरों की रचना, पंचायतों के नियम, शरीर की मजबूती, आपत्ति का सामना करने की शक्ति, उत्सव और त्यौहारों के मानने का ढंग, बदला लेने की प्रवृत्ति, वेश-भूषा कोई भी वैश्यों से नहीं मिलतीं। वे अपने नगरों को दुर्ग के रूप में बसाते हैं, या तो उसके चारों ओर बाड़ लगा देते हैं या उसका मुख्य द्वार एक ही रखते हैं। उनके प्रत्येक गांव में एक गढ़ी होती है, प्रायः वे अपने गामों के नाम के साथ गढ़, दुर्ग और ढाना लगाना पसंद करते हैं। उनकी पंचायतों में जो दण्ड दिया जाता है, वह मान-अपमान अथवा सैनिक दण्ड होता है, वे दण्ड में आर्थिक सजा बहुत कम देते हैं। उनमें सबसे बड़ा दण्ड अपमानित करने का है। कभी-कभी तो वे अपना फैसला मैदान में निकलकर युद्ध द्वारा करते हैं। शरीर की मजबूती, फूर्ती और सुडौलपन में भारत की सभी क्षत्रिय जातियों मे वे श्रेष्ठ हैं। वैश्य-जाति के शारीरिक गठन में उन्हें उत्तराधिकारी मानना महान् भूल है। वे मिट सकते हैं, किन्तु अपने शत्रु से झुकते नहीं। उन्होंने कभी-कभी मुट्ठी भर होते हुए भी बड़े-बड़े अत्तेखा शत्रुओं के दिमाग ठंडे किए हैं। गोलियों की बौछार, तीरों की वर्षा में कहीं भी जाटों को विचलित होते नहीं देख गया। वे अपने उत्सव के दिनों में दंगल जोड़कर, कुश्तियां लड़कर, तलवार घुमा कर और दौड़-दौड़कर खुशियां मनातें हैं। रक्षाबंधन और दिवाली की अपेक्षा अक्षय-तीज, विजय-दशमी और देवोत्थान को वे अपना त्यौहार मानते हैं। दशहरे और होली के दिन उनके बच्चे खड्ग बांध कर उछलते-कूदते हैं। आर्मस एक्ट के जमाने में भी लाठी ने उनका साथ नहीं छोड़ा है। वे मां, बहन और पत्नी की इज्जत के लिए और अपने से बड़ों की मान-रक्षा के लिए मर मिटने को सदैव तैयार रहते हैं।


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उनकी बस्तियों में गौ-वध उनके जिन्दे रहते हुए न कभी हुआ है और न अब वे बर्दास्त कर सकते हैं। क्रोध कम आता है, किन्तु बदला लेने की प्रवृत्ति उनमें उत्कृष्ट रूप में हैं। सिर पर भारी कसी हुई पगड़ी, शरीर में चुस्त अंगरखी, घुटने तक की दुहरी लांग की सख्त बंधी हुई और उपर से लंगोट से कसी हुई धोती, बिल्कुल सैनिक जैसी उनकी पोशाक है। घोड़े, रथ, भारी नाल और मुग्दर उनके द्वार की शोभाएं हैं। फिर कैसे मान लिया जाय कि जाट वैश्य हैं? जाटों ने न कभी अपने लिए वैश्य होने व बनने की मनोवृत्ति प्रकट की है; वे सदैव अपने लिए क्षत्रिय ही कहते आए हैं, क्योंकि वे क्षत्रिय ही हैं। आज जातियों में अपने-अपने उत्थान के लिए हड़बड़ है, वे अपने लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्व-वर्ण में सम्मिलित होने की चेष्टा कर रही हैं। नाइयों का एक दल कहता है कि वे न्याई ब्राह्मण हैं तो दूसरा कहता है चूकि वे ठाकुर कहलाते हैं इसलिए क्षत्रिय हैं। इसी भांति तेलियों की एक पार्टी अपने लिए साहु-वैश्य और दूसरी पार्टी क्षत्रिय होने की बात कहती है। जाटों के अन्दर न कोई इस बात की तड़बड़ाहट है न कि मत-विभिन्नता कि वे अमुक वर्ण में से हैं। उन्होंने समय पर अपने कर्तव्यों से बता दिया है कि वे क्या हैं? उन्हें मुगलों ने परखा, पठानों ने उनकी चासनी ली, अंग्रेजों ने पैंतरे देखे। उन्होंने भी देहली, काबुल, भरतपुर, पुष्कर, पानीपत और जर्मनी तथा फ्रांस की भूमि पर अपने गर्म-गर्म लहू की स्याही और कटार-कलम से लिखकर सिद्ध किया है कि जाट क्षत्रिय हैं - सी.वी. वैद्य । क्षत्रियों का मान-मर्दन करने वाले और उनकी स्त्री-बच्चों को कैदी बनाने वाले महमूद गजनवी, गाजर मूली की भांति क्षत्रियों के इस भारत-भू पर मौजूद रहें, उन्हें सुधारने का कोई क्षत्रियोचित कार्य नहीं किया!

जाटों के कुल और गोत का सम्बन्ध अति प्राचीन राजवंशों से - जाटों के अन्दर जो कुल और गोत हैं उनमें से अनेक ऐसे हैं जो उनका सम्बन्ध अति प्राचीन राजवंशों से जोड़ देते हैं, जैसे - पांडु, कैरू, गांधार, जादू आदि (इन गोतों के जाट क्रमशः पंजाब, यू.पी. और राजस्थान में पाये जाते हैं) । कुछ गोत बिल्कुल राजपूतों से मिलते हुए भी उनमें पाये जाते हैं जैसे - परिहार, सोलंकी, तोमर, कछवाये, सेंगर, भट्टी आदि। मध्यकालीन क्षत्रियों के गोत्र भी मोरी, राठी, दीक्षित, दाहिमा, दहिया आदि जाटों में पाये जाते हैं। उनमें जघीनियां, सोंखिया, बन्सल, गर्ग, पालीवाल, धारीवाल, मीत्तल, ओसवाल, अग्रवाल, महेश्वरी किसी किस्म के वैश्यों के गौत्र नहीं मिलते हैं। फिर कैसे माना जाए कि वे वैश्य वर्ण में से हैं? बिल्कुल बेबुनियाद बात होगी कि जाटों को क्षत्रिय के अलावा वैश्य या अन्य किसी वर्ण से माना जाए।


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यदि सी.बी. वैद्य महोदय अथवा उनके विचार वाले महोदय जाटों के बीच में अधिक समय तक रहे होते तो उन्हें पूर्णतया मालूम हो जाता कि जाट क्षत्रिय हैं।

नवीन हिन्दू-धर्म के आरम्भ से अब तक वे अपने पुरूषों से प्राप्त हुए रिवाजों को बिना किसी परिवर्तन के मानते चले आ रहे हैं। उनमें विधवा-विवाह का एक ऐसा रिवाज था जो ब्राह्मणों और उनके पटु-शिष्य व अन्य लोगों की निगाह में खटकता था। इस रिवाज के कारण कहीं प्रत्यक्ष और कहीं अप्रत्यक्ष तौर से इन लोगों ने जाटों को शूद्र कहने तक की घृष्टता की। हालांकि कमलाकर ग्रन्थ में जिसमें शूद्र जातियों को वर्णन है, जाटों का नाम नहीं है। फिर भी उन्हे जलील करने में इन लोगों ने कसर नहीं छोड़ी। जाटों ने केवल इसी विश्वास से कि ब्राह्मणों के हाथ इस समय हिन्दू-समाज की बागडोर है, इनका अपमान करने से राष्ट्रीय कलह फैलगा, उनके इस प्रचार को उपेक्षा की दृष्टि से ही देखा । वरना क्या कारण था कि जो बर्बर पठानों के सिर तोड़ सकते थे, ऐसे जातिगत अशांति फैलाने वाले लोगों के दिमाग की गर्मी न निकाल देते? श्री सी.वी. वैद्य ने जाटों के विरूद्ध ऐसे भाव फैलाने वालों की कड़े शब्दों में भर्त्सना की है। वे लुहानों और जाटों के सम्बन्ध में लिखते हुए कहते हैं -

These two races have still kept up their martial instinct but the historian cannot but observe that the gathering of strength by Hindu orthodoxy led to the demoralizing of certain races which had an unfavourable influence on the future course of events. (History of Medieval India P.161)
अर्थात् - इन दोनों जातियों ने अपनी लड़ाकू प्रवृत्ति को अब तक कायम रखा है परन्तु इतिहासज्ञ देख सकते हैं कि कट्टर हिन्दुत्व ने प्रभुता संचय करने में कुछ जातियों की सैनिक-शक्ति को नष्ट कर दिया, जिसका कि आगे की घटनाओं पर बुरा असर हुआ।

बौद्ध और जैन-काल में ब्राह्मणों को मक्कार और अक्षर-म्लेच्छ तक कहा और लिखा गया था, फिर कोई अचंभे की बात नहीं है कि उन्होंने भी जाट, गूजर और अहीरों से जो शीघ्र ही उनके धर्म में (यथा समय) दीक्षित नहीं हुए, शूद्र कह दिया। इस बात का वर्णन आगे के पृष्ठों में मिलेगा कि जाट बुद्ध और जैन दोनों के अनुयायी थे और बौद्धों के ग्रन्थ जातक इन्हीं क्षत्रियों के लिखे हुये है। हमने पहले अध्याय में यह भी बता दिया है कि कृषि करना और पशु पालना वैदिककाल में सभी वर्ण के आर्यों का कार्य था। वेद, रामायण, महाभारत के हवालों से यह बात हमने सिद्ध कर दी है। इसलिए यहां उसे दुहारने की आवश्यकता नहीं है। खेती करने, पशु पालने से ही कोई जाति शूद्र होती है तो दिलीप, कृष्ण, युधिष्ठिर और दुर्योधन सबके सब शूद्र थे और जाटों को भी अभिमान होना चाहिए कि वे


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कायर, प्रमादी, दूसरे की कमाई खाने वाले और राष्ट्र के विधातक लोगों से 36 (उल्टे) हैं।

अज्ञानांधकार सदैव नहीं रहता, प्रकाश होता है, झूठ को एक दिन परास्त होना पड़ता हैं। वह समय आ गया है कि जाटों ने जिन बातों को आर्ष-विधान समझ कर अब तक पालन किया था, और जिनके कारण विराधियों ने उन्हें धर्महीन वैश्य शूद्र और न मालूम क्या कहा, अब वही विधार-विरोधी लोग अपने समूह में प्रचलित करने को तड़बड़ा रहे हैं। वे विधवा-विवाह को वैदिक मर्यादा, खेती और पशु-पालन का शुभ कर्म, पर्दा बहिष्कार को मानवता, अन्तर्जातीय विवाह को राष्ट्रीयता के पवित्र नामों से पुकारते हैं। उनमें से अधिक समझदार तो यहां तक कहते हैं कि भारत का भविष्य जाटों के ऊपर निर्भर है, जाट भारतीय राष्ट्र की रीढ़ हैं। भारत मां की दृष्टि जाट जैसी कौमों की ओर लगी हुई है। इन बातों को एक तरफ भी रख दें तो भी यह चैलेंज के साथ कहा जा सकता है कि जाट वैदिक कालीन क्षत्रियों के वास्तविक उत्तराधिकारी हैं

यद्यपि जाट बौद्ध-धर्म को तत्काल छोड़कर वर्तमान हिन्दू धर्म में शामिल नहीं हुये फिर भी ब्राह्मणों ने उनके साथ इतनी तो कृपा की ही कि संस्कृत-साहित्य के ग्रन्थों में उनके विरूद्ध जहर नहीं उगला, जब कि वे किसी छोटे से कारण पर अपने अनुयायी राजपूतों को ही कर्ण कन्या में जन्मा हुआ लिख गये। मालूम ऐसा होता है कि राजपूतों को भी उन्होंने कई सदी बाद, कड़ी परीक्षा पश्चात् क्षत्रिय माना । वरना क्या कारण था कि कछवाहा राजपूतों को जो कि सारे राजपूतों में श्रेष्ठ समझे जाते हैं ,कच्छप जाति और कंजपारि (अस्पृश्य) जाति लिखते ।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि मौजूदा हिन्दू-धर्म जिसका कि आधार पुराण है भारत की राष्ट्रीयता के लिए बड़ा विघातक सिद्ध हुआ। इस्लाम और इसाईयत ने भारत में हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई प्रश्न खड़े करके राष्ट्र-निर्माण में अवश्य बाधा डाली है, किन्तु जब हम इस पौराणिक धर्म की जाति-विषयक व्यवस्थाओं पर दृष्टि डालते हैं, तो इस राष्ट्र का हितैषी नहीं पाते। इसने बड़ी-बड़ी योद्धा जातियों को म्लेच्छ, यवन, शूद्र, व्रात्य करार देकर आर्य जाति को बलहीन कर दिया है।

यथा-

शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः।

वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥43॥

पौंड्रकाश्चौडद्रिवडाः कम्बोजा: यवनाः शकाः ।

पारदा पल्हवाश्चीन: किराता दरदाः खशाः ॥44॥

मुखबाहूरूपज्जानां या लोके जातयो वहिः ।

म्लेच्छ वाचश्चार्य भाषा सर्वे ते दस्यवः स्मृताः ॥45॥

(मनु.10)

अर्थात् - पौन्ड्र, ओड, द्रविड़, कम्बोज, शक, पारद, पल्हव, चीन,


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किरात, दरद, खश ये क्षत्रिय जातियां हैं किन्तु ब्राह्मणों के दर्शन न करने और क्रियालोप होने से वृषल हो गईं और म्लेच्छ कहलाने लगीं। (दूसरे) इस लोक (देश) से बाहर रहने के कारण ये ब्राह्मण-क्षत्रिय होते हुए भी-चाहे ये आर्य-भाषा बोलती थीं चाहे म्लेच्छ भाषा, सब दस्यु कहलाईं ।

विष्णु पुराण भी कहता है -

क्षत्रियाश्चते धर्मपरित्यागाद् ब्राह्मणैश्च परित्यक्ता म्लेच्छतां ययुः ।

अर्थात् - ये सब क्षत्रिय धर्म और ब्राह्मणों को त्याग देने से म्लेच्छ बन गये हैं। (वि.पु.4-3)


इन उद्धरणों से हमारे कथन की पुष्टि हो जाती है कि जिस किसी जाति ने ब्राह्मणों के प्रभुत्व को स्वीकार न किया, विप्र जनार्दनः के सिद्धान्त की उपेक्षा की, उनके दर्शन ही को पापमोचन का सिद्धान्त न समझा अथवा उनके बनाये गये नियम-विधानों को सिर माथे पर नहीं रखा, उसे ही म्लेच्छ, दस्यु और शूद्र बना दिया गया। सन्तोष यहीं पर नहीं हुआ, किन्तु इन वीर जातियों की उत्पति का वर्णन भी बड़े ही घृणाजनक और अपमानकारी शब्दों में किया। यथा -

झल्लो, मल्लश्च, राजन्याद् व्रात्यान्निच्छिवि रेव च।

नटश्च, करणश्चैव, खसो द्रविड एव च ॥ मनुस्मृति, 10.20

अर्थात् - व्रात्य क्षत्रिय से (समान जाति की स्त्री से ) उत्पन्न, झल्ल, मल्ल, नट, करण, खस, लिच्छवि, द्रविड़ कहलाते हैं। ये सब राजवंश बौद्ध-काल में प्रजातंत्री शासक थे। भगवान महावीर स्वयम् लिच्छवियों में पैदा हुए थे। इनमें से झाला तो अब तक शासक हैं, जो राजपूतों में गिने जाते हैं। वास्तव में बात यही है कि ये सब व्यवस्थायें धार्मिक-विद्वेष में दी गई थीं, जो कई सदियां बीतने पर वेद वाक्य मानी जाने लगीं। ज्यों-ज्यों ये व्यवस्थायें प्रचारित और प्राचीन होती गईं, राष्ट्रीय जीवन को धक्का लगता गया। प्रसंग से बाहर होते भी यह बात हम बता देना चाहते हैं कि जिन धर्म-ग्रन्थों में यह आज्ञा है, वे सबके सब ग्रन्थ या तो ईस्वी पूर्व 400 से ईस्वी 800 के बीच के बने हैं, जो कि बौद्ध-काल कहा जाता है या उन ग्रन्थों में से कुछ पहले के भी हों तो इस समय में ऐसी बातें उनमें घुसड़ी गई हैं।

जाट शब्द की उत्पत्ति

जाट नाम कब से पड़ा और वे इस नाम को किस कारण से प्राप्त हुए? इस प्रश्न के उत्तर अनेक विद्वानों ने अपनी मति के अनुसार दिये हैं किन्तु उनका ज्ञान इस प्रश्न के सुलझाने में पूर्णता को नहीं पहुंचा है।


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यह नहीं कहा जा सकता कि उनकी खोज शून्य सिद्ध हुई। किन्तु इसमें सन्देह नहीं कि वे सोलहों आना सफल भी नहीं हुए। जाट शब्द की छान-बीन करने वाले सज्जनों में से कुछेक के निष्कर्ष यहां देने के बाद अपनी स्थापना एवं धारणा को प्रकट करेंगे।

जाठरोत्पति - सम्वत् 1926 विक्रमी में पं. अंगद शास्त्री ने ‘जाठरोत्पति’ नाम की एक संस्कृत पुस्तक राजा साहब श्री गिरिप्रसादसिंह बेसमा (अलीगढ़) के प्रोत्साहन से तैयार की थी। उसमें पुराणों की परशुराम और सहस्त्रार्जुन वाली कथा का उल्लेख कर के कहा गया है कि जब 21 बार के युद्ध से पृथ्वी क्षत्रिय विहीन हो गई तो राज-कन्याओं ने ब्राह्मणों से वीर्य-दान लिया। क्षत्राणियों के पेट से पैदा होने के कारण वे सन्तानें (संस्कृत में पेट को जठर कहते हैं) जाठर कहलाई। और दक्षिण-भारत को छोड़कर उत्तर में हिमालय के अंचल में जठर देवकूट पहाड़ में रहने लगीं।

यह बात इतनी अवैज्ञानिक, निराधार और इतनी वाहियात है कि आज के विज्ञान प्रधान समय में इसमें कोई सत्य नहीं मान सकता। न यह सत्य है कि पृथ्वी क्षत्रिय विहीन हुई थी। हां, उस समय सहस्त्राबाहु जैसे स्वतंत्र विचार के ब्राह्मणों में संघर्ष अवश्य हुआ था और उस समय जब कि ब्राह्मण-क्षत्रिय परस्पर विवाह कर लेते थे, तो उन राजकुमारियों के जठर से उत्पन्न होने वाले जाठर ब्राह्मण क्यों नहीं कहलाये? कोई भी क्षत्रिय-कन्या अपने कुल का नाश करने वाले को घृणा की दृष्टि से ही नहीं देखेगी, किन्तु उसके विरूद्ध युद्ध की तैयारी कर देगी। फिर सैकड़ों-हजारों राजकुमारियां अपने कुछ घातकों से सन्तान लेने की इच्छुक कैसे हो गई? और भी क्या वे ब्राह्मण मूर्ख थे जो अपने शत्रुओं की स्त्रियों में सन्तान पैदा करके उन्हें आजाद छोड़ देते? पुराणों में ऐसी कथायें हैं तो वह केवल क्षत्रियों पर रौब डालने के लिये हैं कि वे क्षत्रियों का यहां तक सर्वनाश कर सकते हैं कि उनकी स्त्रियों को इन्हीं ब्राह्मणों से संतान लेनी पड़ेगी। उत्तर में जठर देवकूट कोई पर्वत है और उसका यह नाम इसलिये है कि वह महान् हिमालय के मध्य (पेट) में है। पर्वत में रहने से कोई समुदाय पार्वत्य या पहाड़ी कहला सकता है, इसी भांति जठर के इर्द-गिर्द रहने वाले मनुष्य जाठर कहला सकते हैं। किन्तु यह नितान्त असत्य है कि ब्राह्मणों के औरस जाठरों की उत्पत्ति से उसका नाम जठर हो गया, क्योंकि भागवत के वर्णन के अनुसार देवकूट (महाभारत:II.82.122) का नाम जठर उस समय भी प्रसिद्ध था, जबकि प्रथम मनु स्वायुम्भू के पौत्रों में पृथ्वी का बंटवारा हुआ था। उस समय बेचारे परशुराम के बाप-दादों का निशान न था। व्याकरण के नियम के अनुसार मूल शब्द से जो जया शब्द बनता है वह उससे माप, तौल में भारी और बड़ा होता है। जैसे - पुत्र से पौत्र, मधु से माधुर्य आदि। इसी भांति जाठरों के बसने से किसी स्थान का नाम बनता तो वह जाठर शब्द से लम्बा और भारी होता है, जैसे - जाठरा, जाठरिया, जाठरान, जाठरम आदि। जठर नाम जाठर के कारण


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(अथवा से ) नहीं बना, किन्तु जठर से जाठर बन सकता है। अतः यह कथन असत्य है कि जाठर लोगों के बसने से उस पहाड़ का नाम जठर हुआ। सारांश यह है कि जाठर लोगों की इस नाम की प्रसिद्ध जठर पर्वत के नाम से हो सकती है। जाठर वहां दूसरी जगह से आकर नहीं बसे। परशुराम का यह युद्ध भी उत्तर के क्षत्रियों से नहीं हुआ था, इसलिए यह पौराणिक अनुमान गलत है कि जठर पर्वत के निवासी ब्राह्मणों की सन्तान थे। जठर पर्वत के निवासी भारत की किन जातियों में सम्मिलित हो गये, इसका कोई भी इतिहास हमारे सामने नहीं है। फिर यह कैसा माना जा सकता है कि जाठर ही जाट हैं जबकि जाटों में, पाण्डु, कौरव, गान्धार, मदेरना (मद्र), जांदू, मौर्य, जतरान (जत्रि) सिन्धू आदि प्राचीन राजवंश भी पाये जाते हैं। अंगद शास्त्री भी यदि जाटों के इन प्राचीन राज-वंशों का ख्याल कर लेते तो उन्हें ‘जाठरोत्पत्ति’ लिखने को कष्ट न करना पड़ता, न व्यर्थ की थोथी दिमाग-पच्ची करनी पड़ती। अंगद शास्त्री, परशुराम की निःक्षत्रीकरण की पौराणिक कहानी के आधार पर उन ब्राह्मणों की सन्तान यदि ‘ब्रह्मक्षत्रियों’ को बताते तो बहुत संभव था भारतीय इति-वृत से अपरिचित कोई यूरोपियन इतिहास लेखक उनके कथन का समर्थन कर देता। परन्तु उन्होंने बिना चूने सीमेंट के ईंटों से ही नदी का पुल बांधने की चेष्टा की है। ‘‘पहाड़ खोद कर चूहा निकाला’’। इस पुस्तक के वर्णन को प्रो. कालिकारंजन कानूनगों ने भी व्यर्थ ही बताया है।

जरित्का - महाभारत में साकला के जरित्का का वर्णन है। पूना के प्रसिद्ध इतिहासकार श्री चिन्तामणि विनायक वैद्य इन्ही जरित्काओं को जाट मानते हैं। किन्तु देशी राज्यों का इतिहास के लेखक श्री सुखसंपतिराय भंडारी तवारीख राजस्थान (उर्दू) के लेखक देवतास्वरूप भाई परमानंद इस राय से सहमत नहीं हैं। हिस्ट्री आफ जाट्स के लेखक श्री कालिकारंजन कानूनगो और जदुनाथ सरकार भी वैद्यजी के मत के पोषक नहीं है। महाभारत के कर्ण पर्व (VIII.30.14) में ‘जटित्का’ और साकला नगरी का वर्णन युद्ध के समय कर्ण के मुख से कराया गया है। कर्ण, शल्य को उलाहना देता है कि - तेरे देश की स्त्रियां खड़ी होकर पेशाब करती हैं वे ऊंट की तरह चिल्ला-चिल्लाकर गीत गाती हैं। लहसुन के साथ गौ-मांस भी तेरे देश के साकलानगरी का एक जरित्का खाता है। वह बहुत सी स्त्रियों से रमण करता है। मैंने यह वर्णन एक ब्राह्मण के मुख से सुना है जो कि तेरे देश में गया था और उसका कोई सत्कार नहीं हुआ था, उसने कौरवों की सभा में यह वर्णन किया था। अरे शल्य! ऐसे देश का स्वामी होकर भी तू मुझसे बढ़ बढ़कर बातें करता है? श्री वैद्यजी ने जरित्का के सम्बन्ध के इस वर्णन को अतिरंजित बताया है और इसी जरित्का को तथा उसके समूह को जाट माना है। हम कहते हैं यह वर्णन एक पुरूष का है जाति का नहीं। बहुत संभव है वह पुरूष जरत्कारू हो जो कि उस समय का एक ऋषि था और बहुत सी स्त्रियों का सहगमन उसकी आदत थी।


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वास्तव में तो कर्ण पर्व का यह वर्णन व्यास का लिखा हुआ नहीं है, इस सौति ने जो कि महाभारत का तीसरा लेखक कहा जाता है, बढ़ाया है। सौति जैन बौद्ध-काल में हुआ है।1 यह हो सकता है कि महावीर के कुल ज्ञातृ के विरूद्ध अथवा जैन नरेश महाराज जरत्कुमार के विरूद्ध यह आक्षेप कर्ण द्वारा सौति से कहलाया हो।

महाभारत ग्रन्थ में बड़ा हेर-फेर - आरंभ से महाभारत ग्रन्थ में बड़ा हेर-फेर और वृद्धि हुई है। सी.वी. वैद्य की महाभारत की मीमांसा के ही उदाहरण हम अपने कथन की पुष्टि में पेश करते हैं। महाभारत के ही कथनानुसार महाभारत के रचयिता तीन हैं - 1. कृष्ण द्वैपायन व्यास, 2. वैशम्पायन और 3. सौति। भारतीय-युद्ध के बाद व्यास ने जय नाम के ग्रन्थ की रचना की। यह इतिहास व्यासजी के शिष्य वैशम्पायन ने जन्मेजय को सर्पसत्र के समय सुनाया और वहां उस कथा को सुनकर सूत लोमहर्षण के पुत्र सौति उग्रश्रवा ने नेमिषारण्य में सत्र करने वाले ऋषियों को सुनाया। इसमें सन्देह नहीं है कि जो प्रश्नोत्तर वैशम्पायन और जन्मजेय के बीच हुए होंगे वे व्यासजी के मूल ग्रन्थ से कुछ अधिक अवश्य होंगे। इस प्रकार सौति तथा शौनक ऋषियों के बीच जो प्रश्नोत्तर हुए होंगे, वे वैशम्पायन के ग्रन्थ से कुछ अधिक अवश्य होंगे। सारांशतः व्यास के ग्रन्थ को वैशम्पायन और वैशम्पायन के ग्रन्थ को बढ़ाकर सौति ने एक लाख श्लोकों का कर दिया। इसके प्रमाण में सौति का यह स्पष्ट वचन है -

एकं शतसहस्त्रं च मयोक्तम् वै निबोधत (आदि पर्व अध्याय 1 श्लोक 109)

बहुतेरे विद्वानों का कथन है कि महाभारत के रचियता तीन से भी अधिक थे। पर यह तर्क निराधार है क्योंकि उसके तीन नाम जय, भारत, महाभारत ही इस बात के सबूत हैं कि वह तीन से अधिक का बनाया हुआ नहीं।

इस ग्रन्थ का आरम्भ तीन स्थानों से होता है - मनु आस्तिक और उपरिचर। राजा उपरिचर के आख्यान से (आदि पर्व अध्याय 63) व्यास के ग्रन्थ का आरम्भ है। आस्तिक के आख्यान (आ.अ.13) से वैशम्पायन के ग्रन्थ का आरम्भ है, क्योंकि वैशम्पायन का ग्रन्थ सर्प-सत्र के समय पढ़ा गया था इसलिए उसमें आस्तिक की कथा का कहा जाना आवश्यक था। यह समझना स्वाभाविक है कि सौति के बृहत् महाभारत ग्रन्थ का आरम्भ मनु शब्द से अर्थात् प्रारम्भिक शब्द वैवस्वत से होता है।

मेकडोनल्ड, वेबर आदि पाश्चात्य विद्वानों का कथन है कि व्यासजी के जय ग्रन्थ के श्लोकों की संख्या आठ हजार आठ सौ थी। अष्टौ श्लोक सहस्त्राणि, अष्टौ श्लोकशतानि च। अहं वेद्मि शुको वेत्ति वा न वा। परन्तु यह मत हमें ग्राह्म नहीं है क्योंकि समर्थन केवल तर्क के आधार पर किया गया है।


1. देखो महाभारत मीमांसा, सी.वी. वैद्य लिखित।


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वैशम्पायन के भारत के श्लोकों की संख्या 24000 होगी। महाभारत में ही स्पष्ट कहा गया है कि - भारत संहिता 24000 श्लाकों की है और 76000 श्लाकों में गत कालीन लोगों की कथाओं का वर्णन है। सौति के ग्रन्थ के विषय में यह बतलाने की आवश्यकता नहीं कि उसका विस्तार कितना है? सब लोग जानते हैं कि वैशम्पायन के भारत में उपाख्यान आदि जोड़कर उसे एक लाख श्लोकों का महाभारत बना दिया गया है।

सौति ने अपने ग्रन्थ के 18 पर्व बनाये। यह पर्व-विभाग नया है और उसी का किया हुआ है। वैशम्पायन ने अपने भारत में जो पर्व बनाए थे वे भिन्न है, छोटे हैं। उनकी संख्या सौ है। यह बात महाभारत में दी हुई सौति की ही अनुक्रमणिका से प्रकट है।

व्यास भारती युद्ध के समकालीन थे। महाभारत के अनेक वर्णन उनके प्रत्यक्ष देखे हुए जान पड़ते हैं और उनमें कई बातें ऐसी हैं जिनकी कल्पना कोई कवि पीछे से नहीं कर कसता। वैशम्पायन व्यासजी के एक शिष्य थे। ये अर्जुन के पौत्र ‘[[Janamejaya|जन्मेजय’ के समकालीन थे।

शक से तीन शताब्दी पहले भारत को महाभारत का रूप दिया गया। अशोक के समय अथवा उस समय के लगभग बौद्ध और जैन धर्मों ने सनातन धर्म पर जो हमला किया था, उसका प्रतिकार करने के लिए सनातन धर्मावलम्बियों के पास कुछ भी साधन या उपाय न था, और उनके धर्म में भिन्न-भिन्न मतों की खींचा-तानी हो रही थी। ऐसी अवस्था में सौति ने भारत को महाभारत का वृहत् स्वरूप दिया। सनातन-धर्म के अन्तस्थ सब मतों की कथा कहानियों को एक स्थान में संग्रह करके तथा उनको उचित स्थान देकर भारत ग्रन्थ की शोभा बढ़ाई। बस, भारत ग्रन्थ को महाभारत बनाने का यही कारण है।

व्यास रचित भारत-ग्रन्थ में श्रीकृष्ण की भक्ति अधिक है, किन्तु सौति ने धर्मों की एकता के लिए शंकर, देवी, नारायण आदि सभी देवताओं की कुछ पर्व जोड़कर स्तुति जोड़ दी है।

बौद्ध और जैन लोग हिन्दुस्तान के प्रसिद्ध पुरूषों की कथाओं को अपने-अपने धर्म के स्वरूप में मिला देने का जो यत्न कर रहे थे, उसमें रूकावट डालने का काम सौति ने अपने महाभारत की कथाओं द्वारा अच्छी तरह से किया। कुछ चमत्कारिक कथाएं भी सौति ने बढ़ाई हैं। यथा - अंशावतारों की कथा, श्रीकृष्ण के रथ से उतरते ही रथ का जल जाना, यौद्धाओं की भविष्यवाणी करना आदि। (महाभारत मीमांसा पृ.5 से 24 तक का सार)

इतना लम्बा हवाला देने से हमारा अभिप्राय यह है कि महाभारत ग्रन्थ में समय-समय पर काफी घटा-बढ़ी हुई है । जिस कारण से घटा-बढ़ी हुई, वह भी


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उपर के हवाले से प्रकट हो जाता है। इससे हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि कर्ण पर्व में जरित्का और उसकी शाकल नगरी तथा वहां की स्त्रियों की निन्दा जो कर्ण के मुंह से कहलाई गई है, वह सौति का जैन लोगों के प्रति धार्मिक विद्वेष मात्र है । या तो वे लोग बौद्ध या जैन-धर्म के अनुयायी रहे होंगे अथवा गणतन्त्रवादी होंगे। हम यह दावे के साथ कहते हैं कि शल्य और कर्ण के समय न शाकल नगरी थी, न जरित्का जाति अथवा पुरूष। क्योंकि इतिहास हमें बतलाता है कि शाकल जिसे कि अब स्यालकोट कहते हैं, बौद्ध-काल में मद्र देश की राजधानी थी और पहली शताब्दी के आरम्भ से महाराज शाठिल और उसमें वाहन से लगाकर सातवीं सदी तक, शालेन्द्र (409 ई.) आदि जाट राजाओं का आधिपत्य रहा। महाभारत ग्रन्थ में बढ़ोतरी ई. सन् 300 तक होती रही है जैसा कि महाभारत मीमांसा पृ. 169 की इन लाईनों से साबित होता है -

महाभारत ग्रन्थ हिन्दोस्तान की उस परिस्थिति का पूरा-पूरा प्रतिबिम्ब है जो कि सन् ईसवी से पूर्व 3000 से 300 वर्ष तक थी। ब्राह्मण-काल से यूनानियों की चढ़ाई की पूरी जानकारी यदि किसी ग्रन्थ में है तो वह महाभारत की है।

इससे यह मालूम होता है कि महाभारत की रचना के अन्तिम काल में पंजाब के बौद्ध लोगों को अन्य लोगों की निगाह से गिराने के लिए यह झूठी कथा गढ़ी गई, वरना ठीक युद्ध के समय कर्ण और शल्य में जो कि एक-दूसरे के साथी थे और एक दूसरे का उस समय भला भी इसी में था कि वे प्रेम के साथ दोनों मिलकर, शत्रु का मुकाबला करते। पर उस समय उनमें जो जली-कटी बातें हुई हैं, वे बिल्कुल अप्रासंगिक हैं।

जैन-ग्रन्थों में हमें एक ओर जरित्का नाम से मिलते-जुलते नाम वाले महाराज जरत्कुमार का वर्णन मिलता है जो कि जैन-धर्म का अनुयायी था। यह भी हो सकता है कि उसके ही विरूद्ध महाभारत में ऐसे आक्षेप किये गये हों!

जैन हरिवंश पुराण में महाराज जरत्कुमार का वर्णन इस प्रकार है - वसुदेव की अनेक रानियां में से एक जरा नाम की रानी भी थी। उसके दो पुत्र थे - जरत्कुमार और वाहीक। यादवों का नाश होने के पश्चात् उनके वंश में जरत्कुमार ही बचा था। पाण्डवों ने उसी को गद्दी पर बिठाया (किन्तु हिन्दू-पुराण और ग्रन्थ मानते हैं कि यादवों में ‘उग्र’ बचा था और उसे ही पाण्डवों ने मथुरा और द्वारिका का राजा बनाया था)। जिस समय उग्र शासन के धारक राजा जरत्कुमार ने पृथ्वी का शासन किया, उस समय उसके प्रताप से समस्त राजे उसके बस में हो गए, प्रजा उससे बड़ा प्रेम करने लगी और परम प्रसन्न हुई। राजा जरत्कुमार की पटरानी कलिंगराज की पुत्री थी और उससे अति सुखदायी राजकुल की ध्वजा-स्वरूप वसुध्वज नाम का पुत्र हुआ। हरिवंश का शिरोभूषण महाव्यवसायी कुमार वसुध्वज जिस समय युवा हुआ, उस समय राजा जरत्कुमार ने राज्य तो वसुध्वज को दिया और आप वन को चल दिया। कुछ काल के पश्चात् राजा वसुध्वज के चन्द्रमा के समान प्रजा को


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प्रिय, पराक्रम में राजा वसु की तुलना करने वाले - सुनवस (सुवसु) नाम का पुत्र हुआ। सुवसु के कलिंग देश की रक्षा करने वाला भामवर्मा हुआ। उसके वंश में और भी बहुत से राजा हुए। पश्चात् उसी वंश का भूषण-स्वरूप कपष्टि नामक राजा हुआ। उसका पुत्र अजातशत्रु, अजातशत्रु का पुत्र शत्रुसेन, उसका जितारि और और जितारि का पुत्र राजा जितशत्रु हुआ। इसी जितशत्रु राजा के साथ भगवान महावीर के पिता सिद्धार्थ की छोटी बहन का विवाह हुआ। यह समस्त पृथ्वी में प्रसिद्ध हुआ। भगवान महावीर को उपदेश करते देख राजा जितशत्रु को भी संसार से उदासीनता हो गई। वह भी समस्त पृथ्वी का त्याग कर दिगम्बर हो गए।

ऊपर के वर्णन से यह मालूम होता है कि जरत्कुमार और उसके साथी अथवा सन्तान के कोई लोग कलिंग देश में विवाह सम्बन्ध होने के उपरान्त उत्तर-भारत को छोड़कर के उधर ही चले गए थे। जरत्कुमार का समय भी महाभारत-कालीन ही है और उसे किसी कारण से यादवों ने अलग कर भी दिया था। अलग करने का कारण जैन-हरिवंश पुराण में यह बतलाया गया है कि -

"दीपायन जब क्रोधवश द्वारिका को भस्म कर देगा तो उसके बाद कृष्ण जरत्कुमार के बाण से मारा जाएगा। यद्यपि जरत्कुमार कृष्ण का भाई था फिर भी इस अनिष्ट से बचने के लिए वह द्वारिका को छोड़ गया। क्योंकि उसे बताया गया था कि यह अनिष्ट बारह वर्ष के भीतर ही होने वाला है।" (जैन हरिवंश पुराण सर्ग 61)

सम्भव है कि जरत्कुमार जाकर के पंजाब में रहा हो और इसी के चरित्र का बहुत पीछे के समय में सौति ने हवाला देकर पंजाब के तत्कालीन लोगों को बदनाम करना चाहा हो। यदि वास्तव में सौति ने इसी जरत्कुमार का जिकर किया है जैसा कि कर्ण पर्व के श्लोकों से भी किसी एक पुरूष के चरित्र का भी भान होता है, तो हम कहेंगे कि सी.बी. वैद्य जैसे विचार के लोगों ने यह धारणा करके कि जरित्का ही जाट हैं, महान् भूल की है। हमें ऐसा भी मालूम होता है कि जरत्कुमार से कई पीढ़ी आगे चलकर के (एक दर्जन से भी अधिक) जितारि और जितशत्रु नाम के राजा हुए है। जाटों के जटट्, जिट नामों के साथ ही जित नाम भी आता है। क्या यह संभव नहीं कि जरत्कुमार के वंशजों ने जितारि और जितशत्रु नाम जाटों से शत्रुता रखने के कारण रखे? और यह शत्रुता शायद उस समय जाकर मिटी जबकि ज्ञातृवंशी (कुछ लोगों ने ज्ञातृ को ही आगे चलकर जात अथवा जाट माना है - ले.) भगवान महावीर के पिता ने अपनी छोटी बहन का विवाह सम्बन्ध इन लोगों (जितशत्रु) के साथ कर दिया, जो कि पीछे जाकर के जरत्कुमार के वंशज भगवान महावीर के अनुयायी हो गये।

जरित्का के उपर दिये हुए हमारे उल्लेखों से यह बात भली प्रकार सिद्ध हो जाती है कि -

  • 1. महाभारत का वर्णन जरित्का के सम्बन्ध में भारतीय-युद्ध से या तो पीछे जोड़ा हुआ है या वह इसी जरत्कुमार (जैन इतिहास उल्लिखित) के सम्बन्ध में हैं,

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  • 2. महाभारत में ऐसे वर्णन काफी हैं जो बौद्ध और जैन-धर्म से घृणा उत्पन्न कराने के लिए लिखे गए हैं,
  • 3. महाभारत के उपाख्यान और कथायें यथा-समय और यथा-आवश्यकता अनेक बार में लिखी गई हैं,
  • 4. सी.वी. वैद्य जैसे महानुभावों ने एक व्यक्ति को जिसका कि महाभारत में वर्णन है, जाति मान कर धोखा खाया है,
  • 5. जरित्का शब्द का जितना जरत्कुमार से सम्बन्ध है उतना ‘जाट’ शब्द से नहीं, और
  • 6. भागवत् आदि ग्रन्थों में कृष्ण के मारने वाले का व्याध नाम दिया है।

जाटों और जरित्का का कोई सम्बन्ध नहीं - जैनियों के कथनानुसार भी जरत्कुमार जरा नाम की भीलनी का लड़का था। महाभारत में उल्लिखित जरित्का का आचरण तथा खान-पान भील और व्याधों जैसा हो सकता है ये दलीलें और निष्कर्ष सिद्ध करते है कि जाटों और जरित्का का कोई सम्बन्ध नहीं। खेद तो इस बात का है कि सी.वी. वैद्य जाटों को वैदिक विश (वैश्य) मानते हैं, वही उन्हें लहसुन और गोश्त खाने वाले अवैदिक आचरण वाले लोगों में मानने को तैयार हो जाते हैं। क्या वैद्यजी के वैदिक विश (वैश्य) मांस और लहसुन खाने वाले तथा असभ्य आचरणी थे? या वैद्यजी भी विधर्मी इतिहासकारों की भांति यह मानते हैं कि वैदिक-कालीन सभी आर्य (ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, शूद्र) गो-मांस भक्षी थे? बौद्ध और जैन-धर्म तो पशुहिंसा तथा मांस-भक्षण के पूर्ण विरोधी थे जिनसे कि जाटों का कुछ काल तक सम्बन्ध रहा है। जाटों में आज भी जब कि भारतवर्ष की प्रायः सभी क्षत्रिय जातियों में मांस-भक्षण बुरा नहीं समझा जाता (थोड़े से फौजी जाटों को छोड़कर) सभी जाट मांस-भक्षण को पाप समझते हैं। वैद्यजी जैसे विचार के लोगों की भ्रम-पूर्ण धारणा को दूर कर देने के लिए हमारी दलीलें और निष्कर्ष काफी होंगे।

ज्येष्ठ से जाट शब्द की उत्पत्ति

कुछ लोग जाट शब्द की उत्पत्ति का इतिहास इस तरह से मानते हैं कि -

महाभारत युद्ध के पश्चात् राजसूय यज्ञ के समय पर भारत के सभी राजाओं ने महाराज युधिष्ठर को ज्येष्ठ की पदवी दी थी। उन्हीं के वंश के लोग आगे चलकर के ‘ज्येष्ठ’ से ‘जाट’ कहलाने लगे। कुछ किम्बदन्तियां ऐसी भी है कि - ज्येष्ठ की पदवी महाभारत से पहले भगवान कृष्ण को मिली थी। यह वही दिन था, जिस दिन कि शिशुपाल का उन्होंने वध किया था। कहा जाता है इसी दिन से भगवान कृष्ण ने भविष्य में शस्त्र ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा की थी और इसी प्रतिज्ञा के कारण उन्होंने महाभारत में शस्त्र धारण नहीं किया था। बहुत समय बीतने पर कृष्ण के साथी और वंशज यादव लोग दो दलों में विभक्त हो गए। एक वे जो अपने लिए यादव ही कहते रहे और दूसरे थे जो ज्येष्ठ के अपभ्रंश में जाट कहलाने लगे।

यह सत्य है कि जाटों में युधिष्ठिर-वंशी और कृष्ण-वंशी दोनों ही तरह के लोग शामिल हैं। पंडित लेखरामजी आर्य मुसाफिर ने ‘रिसाला जिहाज’ में जाट शब्द के अपभ्रंश यदु, जादू, जाद, जात और जाट बतलाये हैं।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-85


कर्नल टाड ने भी इस बात को माना है कि जाट यादव हैं। मिस्टर विल्सन साहब ने भी टाड की राय को दाद दी है। मि. नेशफील्ड साहब जो भारतीय जातीय-शास्त्र के एक अद्वितीय ज्ञाता माने जाते हैं, लिखते हैं कि -

"जाट जदु के वर्तमान हिन्दी-उच्चारण के सिवाय कोई दूसरा शब्द नहीं है, यह वही जाति है, जिसमें कृष्ण पैदा हुए थे।"

(The word Jat is nothing more than the modern Hindi pronunciation of Yadu or Jadu, the tribe in which Krishna was born.)

यदु और ज्येष्ठ से जाट शब्द बन गया। भाषा-शास्त्र के अनुसार इसमें कोई एतराज नहीं हो सकता और यह कल्पना तथा धारणा बहुत अंश तक सही भी है। युधिष्ठिर और कृष्ण दोनों ही चन्द्रवंशी राजा हैं, किन्तु जाटों में कुल अथवा गोत्र सूर्यवंश के भी पाये जाते हैं। या तो वे किन्हीं खास कारणों से जाटों में शामिल हुए या जाट शब्द की रचना का उपर वाली युक्ति से मिलता-जुलता कोई दूसरा इतिहास है। यह प्रामाणिक बात है कि कोई जाति या राजवंश या तो राजनैतिक कारणों से एक-दूसरे में मिलते हैं या धार्मिक कारणों से। एक तीसरा कारण आकस्मिक क्रान्तियों का भी है। सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी दोनो प्रकार के राज्यवंशों में जाट शब्द सन्निहित हो जाने का जो इतिहास है, वही जाट शब्द की व्युत्पत्ति का भी है। इस सम्बन्ध में अपनी स्थापना आगे चलकर देंगे।

शिव की जटा से जाट की उत्पति

महादेवजी

जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक मनोरंजक कथा और भी कही जाती है। वह इस तरह से है कि -

"महादेवजी के श्वसुर राजा दक्ष ने यज्ञ रचा और अन्य प्रायः सभी देवताओं को तो यज्ञ में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया, पर न तो महादेवजी को ही बुलाया और न अपनी पुत्री सती को ही निमन्त्रण दिया। पिता का यज्ञ समझकार सती बिना बुलाये हुए ही पहुंच गई, किन्तु जब वहां उसने देखा कि यज्ञ में न तो उनके पति का भाग ही निकाला गया है और न उसका ही सत्कार किया गया इसलिए उसने वही प्राणान्त कर दिया। महादेवजी को जब यह समाचार मिला, तो उन्होंने दक्ष और उसके सलाहकारों को दण्ड देने के लिये अपनी जटा में से वीरभद्र नामक गण उत्पन्न किया। वीरभद्र ने अपने अन्य साथी गणों के साथ राजा दक्ष का सर काट दिया और उसके साथियों को भी पूरा दण्ड दिया। यह कथा केवल किम्वदन्ती के रूप में ही नहीं रही, वरन् संस्कृत श्लोकों में इसकी पूरी रचना की गई है जो देवसंहिता के नाम से जानी जाती है।1

1. देवसंहिता के कुछ एक श्लोक निम्न प्रकार हैं -
पार्वत्युवाच
भगवन् सर्व भूतेश सर्व धर्म विदांवरः।
कृपया कथ्यतां नाथ जाटानां जन्म कर्मजम्।।12।।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-86


उस पुस्तक में लिखा है कि विष्णु ने आ करके शिवजी को प्रसन्न करके उनके वरदान से दक्ष को जीवित किया और दक्ष और शिवजी में समझौता कराने के बाद शिवजी से प्रार्थना की कि महाराज आप अपने मतानुयायी जाटों का यज्ञोपवीत संस्कार क्यों नहीं करवा लेते? ताकि हमारे भक्त वैष्णव और आपके भक्तों में कोई झगड़ा न रहे। लेकिन शिवजी ने विष्णु की इस प्रार्थना पर यह उत्तर दिया कि मेरे अनुयायी भी प्रधान है।"

अर्थ - हे भगवन् ! हे ! भूतेश हे सर्व धर्म विशारदों में श्रेष्ठ ! हे स्वामिन् ! आप कृपा करके मेरे ताई जट जाति का जन्म एवं कर्म कथन कीजिए।।12।।
का च माता पिता ह्येषां का जाति वद किंकुलं।
कस्मिन् काले शुभे जाता प्रश्नानेतान वद प्रश्नानेतान वद प्रभो ॥13॥
अर्थ - हे शंकरजी ! इनकी माता कौन है, पिता कौन है, जाति कौन है, किस काल में इनका जन्म हुआ है? ॥13॥
श्रीमहादेव उवाच
श्रृणु देवि जगद्वन्दे सत्यं सत्यं वदामि ते ।
जटानां जन्मकर्माणि यन्न पूर्वप्रकाशितं ॥14॥
अर्थ - महादेवजी पार्वतीजी का अभिप्राय जानकार बोले कि हे जगन्माता भगवती ! जट जाति का जन्म एवं कर्म मैं तुम्हारे ताई सत्य-सत्य कथन करता हूं कि जो आज पर्यन्त किसी ने न श्रवण किया है और न कथन किया है ॥14॥
महाबला महावीर्या महासत्व पराक्रमाः ।
सर्वाग्रे क्षत्रिया जट्टा देवकल्पा दृढ़व्रताः ॥15॥
अर्थ - शिवजी बोले कि जट महाबली हैं, महा वीर्यवान् और बड़े पराक्रमी हैं। क्षत्रिय प्रभृति क्षितिपालों के पूर्व काल में यह जाति ही पृथ्वी पर राजे-महाराजे रही। जट जाति देव-जाति से श्रेष्ठ है, और दृढ़-प्रतिज्ञा वाले हैं ॥15॥
सृष्टेरादौ महामाये वीरभद्रस्य शक्तितः।
कन्यानां दक्षस्य गर्भे जाता जट्टा महेश्वरी ॥16॥
अर्थ - शंकरजी बोले हे भगवति ! सृष्टि के आदि में वीरभद्रजी की योगमाया के प्रभाव से उत्पन्न जो पुरूष उनके द्वारा और ब्रह्मपुत्र दक्ष महाराज की कन्या गणी से जट्ट जाति की उत्पत्ति होती भई, सो आगे स्पष्ट होवेगा ॥16॥


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जटाओं से उत्पन्न हुए वीरभद्र आदि गणों को जाट मान लेने की कथा देखने में अवैज्ञानिक और अविवेकपूर्ण जान पड़ती है, किन्तु यह नितान्त निराधार भी नहीं है। यह ठीक है कि जाट जटाओं से उत्पन्न नहीं हुए और न ऐसा होना संभव है किन्तु इसके अन्दर जो ऐतिहासिक तत्व छिपा हुआ है, वह यह कि पंजाब में शिवि नाम की एक जाति थी। उसकी शासन-प्रणाली गणतन्त्री थी। पुराणों में गणेश की जो कथा है, वह ऐसे ढंग से वर्णन की गई है कि गणेश की वास्तविकता पर परदा पड़ जाता है। तुलसीकृत रामायण में तो गणेश के सम्बन्ध में गुसाईं बाबा एक बड़ी मजेदार बात लिख गए हैं। उन्होंने शिवजी के विवाह में जो कि उनका पुत्र कहा जाता है गणेश की पूजा कराई है और इस बात का ख्याल होने पर कि बाप से पहले बेटा कहां से आ गया, गुसाई बाबा लिखते हैं कि देवों के सम्बन्ध मे ऐसी शंकाएं करना उचित नहीं । हमारी हिन्दुओं के पुराणों की कथाओं के कथनानुसार यह धारणा हो गई कि शिवजी का लड़का एक गणेश था जिसके हाथी जैसे नाक, कान और सिर थे। वर्णन भी एक जगह ऐसा ही आता है कि गणेश का वास्तविक सिर काट कर उस पर हाथी का सिर स्थापित कर दिया। हिन्दू चित्रकार गणेश की जो मूर्ति बनाते हैं, वह बड़ी बेढब और हास्यास्पद होती है। ये सब बातें गणेश की वास्तविकता पर आवरण पड़ जाने के कारण लोक में मानी जाने लगी हैं। गणेश, शिवि और उनके गणों का जो वैज्ञानिक और राजनैतिक इतिहास होना चाहिए वह यह है - जैसा कि उपर लिख चुके हैं, शिवि पंजाब में एक प्रजातन्त्री राज्यवंश अथवा जाति थी। उसकी सभा के मेम्बरों के लिए गण और सभापति या सरदार के लिए गणपति एवं गणेश कहा जाता था।

वेदों में गण शब्द का प्रयोग सैनिक-समूह के लिए किया गया है जैसा कि ऋग्वेद के इस मंत्रभाग सूत्र से सिद्ध होता है -

व्रातं व्रातं गणम् गणम् (ऋ. 3-26-6)

गण का संक्षिप्त अर्थ समूह होता है। इस तरह गणतन्त्र का अर्थ समूह द्वारा संचालित राज्य हुआ। सारांश यह है कि गणराज्य उस शासन-प्रणाली को कहते थे जो बहुत से लोगों के समूह के द्वारा होती थी। बौद्ध-ग्रन्थ महावग्ग में गणपूरको वा भविस्सामीति शब्द आता है जिससे मालूम होता है कि गणों की


गर्वखर्चोत्र विप्राणां देवानां च महेश्वरी।
विचित्रं विस्मयं सत्वं पौराणकैःसाडीपितं ॥17॥
अर्थ - शंकरजी बोले हे देवि ! जट्ट जाति की उत्पत्ति का जो इतिहास है सो अत्यन्त आश्चर्यमय है। इस इतिहास में विप्र जाति एवं देव जाति का गर्व खर्च होता है। इस कारण इतिहास वर्णनकर्ता कविगणों ने जट्ट जाति के इतिहास को प्रकाश नहीं किया है। हम उस इतिहास को तुम्हारे पास यथार्थ रूप से वर्णन करते हैं ॥17॥


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राजसभा में संख्या-पूर्ति एवं कोरम देखने वाला भी एक अधिकारी होता था। राजसभा में आने वाले सदस्य गण इसलिए कहलाते थे कि वे किसी कुल, परिवार अथवा समूह की ओर से गणना किए हुए (निर्वाचित किए हुए) होते थे। कहीं संघ और गण का एक ही अर्थ लिया गया है, परन्तु संघ शब्द से राज्य का और गण शब्द से शासन-प्रणाली का बोध होता है। अनेक संस्कृत ग्रन्थों में गण और संघ शब्दों का प्रयोग हुआ है। पाणिनि ने अपने व्याकारण में संघो द्वौ गणप्रशंसयोः, नारद स्मृति में आदिशब्दो गणसंघादि समूहविपक्षयोः शब्द आते हैं। इसके सिवा ‘काशिका’, ‘अमर कोश’, ‘महाभारत’, कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ और स्वयं वेदों तक में गण और संघ शब्द आये हैं। इससे सिद्ध होता है कि गणतन्त्र-प्रणाली भारत में अति प्राचीन समय से प्रचलित थी। बौद्ध-ग्रन्थ गणतन्त्र-प्रणाली के वर्णनों और नियमों से भरे पड़े हैं। बौद्धों के सबसे पुराने ग्रन्थ पालिपिटक तथा मज्झमनिकाय, महावग्ग, अवदान शतक में संघ और गणों का काफी वर्णन पाया जाता है। बुद्ध के जमाने में भारतवर्ष में लगभग 116 प्रजातन्त्र थे । गणों के सम्बन्ध में अधिक परिचय करा देने के लिए शान्ति पर्व 108वें अध्याय के उद्धरण हम यहां देते हैं ।

शान्ति पर्व से गणों के सम्बन्ध में उद्धरण

शान्ति पर्व 108वें अध्याय में गणों के सम्बन्ध में निम्नानुसार उल्लेख किया गया है-

युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं कि गणों के सम्बन्ध में आप मुझे यह बताने की कृपा कीजिए कि किस प्रकार वर्द्धित होते हैं और किस प्रकार शत्रु की भेदनीति से बचते हैं? शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की और अपने मित्र प्राप्त करने की उनकी क्या तरकीबें हैं? वे अपने गुप्त मन्त्रों को बहुसंख्यक होते हुए भी किस तरह से छिपाते हैं?

भीष्म ने युधिष्ठिर के प्रश्नों का उत्तर इस प्रकार दिया कि - लोभ और अमर्ष (द्वेष) दो मुख्य कारण ऐसे हैं, जिनसे गणों में परस्पर वैर उत्पन्न होता है। इन्हीं से राजाओं के कुलों में भी वैर उत्पन्न होता है। पहले गणों या कुलों में लोभ उत्पन्न होता है, बाद में द्वेष और तब इन दोनों के कारण क्षय-हानि होती है जिससे एक दूसरे का विनाश हो जाता है। साम, दान और विभेद के द्वारा तथा क्षय व्यय और भय के दूसरे उपायों का अवलम्बन करके वे गुप्तचर, गुप्त मन्त्रणा और सैनिक बल की सहायता से एक दूसरे को दबातें हैं। जो अनेक गण अपना एक संघ बना लेते हैं, उनमें इन्हीं उपायों से विभेद उत्पन्न किया जाता है। विभेद हो जाने के कारण वे उदास हो जाते हैं और अन्त में भय के वशवर्ती होकर शत्रु के वश में जो जाते हैं। इस प्रकार विभेद उत्पन्न होने के कारण वे अवश्य विनष्ट होते हैं। अलग-अलग हो जाने के कारण शत्रु उन पर सहज में विजय प्राप्त कर लेते हैं। अतः गणों को सदा अपनी संघ-शक्ति को बनाए रखना चाहिए। संघात् बल के पौरूष से अर्थ की प्राप्ति होती है। और बाहरी लोग भी संघात् वृत्ति वालों से मैत्री करते हैं। गणों की इन सम्भावित हानियों को बताने के उपरान्त, भीष्म ने युधिष्ठिर से इनकी विशेषताओं को इस प्रकार वर्णन किया है -


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-89


ज्ञानवृद्धाः प्रशंसन्ति सुश्रूषन्तः परस्परम् ।

विनिवृत्ताभिसन्धानाः सुखमेधन्ति सर्वशः ॥16॥

धर्म्मिष्ठान् व्यवहारांश्च स्थापयन्तश्च शास्त्रतः ।

यथावत् प्रतिपश्यन्तो, विवर्द्धन्ते गणोत्तमाः ॥17॥

पुत्रान् भ्रातॄन्, विगृह्णन्तो विनयन्तश्च तान् सदा ।

विनीतांश्च प्रगृह्णन्तो विवर्द्धन्ते गणोत्तमाः ॥18॥

चार मंत्रविधानेषु कोष सन्नि च मेषु च ।

नित्य युक्ता महा बाहो वर्द्धन्ते सर्वतो गुणा: ॥19॥

प्राज्ञान् शूरान् महोत्साहान् कर्मसु स्थिरपौरूषान् ।

मानयन्तः सदा युक्तान् विवर्द्धन्ते गणा नृप ॥20॥

द्रव्यवन्तश्चत शूराश्च शस्त्रप्रज्ञाः शास्त्रपारगाः ।

कृछ्रास्वापत्सु संमूढ़ान् गणाः संतारयन्ति ते ॥21॥

क्रोधो भेदो भयं दण्डः कर्षणं निग्रो वधः ।

नयत्यरिवशं सधो गणान् भरतसत्तम ॥22॥

तस्मान्मानयितव्यास्ते गणमुख्याः प्रधानतः ।

लोकयात्रा समायत्ता भूयसी तेषु पार्थिव ॥23॥

मंत्रगुप्ति प्रधानेषु चारश्चारित्रकर्षण ।

न गणाः तत्सनशो मंत्रं श्रोतुर्मन्ति भारत ॥24॥

गणमुख्यैस्तु संभूय कार्यं गणहितं मिथः ।

पृथग्गणस्य भिन्नस्य विततस्य तयोऽन्यथा ॥25॥

अर्थाः युत्यवसीदन्ति ततोऽनर्था भवंति च ।

तेषामन्योन्यभिन्नानां स्वशक्तिमनुतिष्ठताम् ॥26॥

निग्रहः पण्डितैः कार्यः क्षिप्रमेव प्रधानतः ।

कुलेषु कलहा जाताः कुलवृद्धैरूपेक्षिताः ॥27॥

गोत्रस्य नाशं कुर्वन्ति गणभेदस्य कारकम् ।

आभ्यंतरं भयं रक्ष्यमसारं बाह्यतो भयम् ॥28॥

आभ्यंतरं भयं राजन् सद्यो मूलानि कृन्तति ।

अकस्मात् क्रोधमोहाभ्यां लोभाद्वाऽपि स्वभावजात् ॥29॥

अन्योन्यं नाभिभाषन्ते तत् पराभवलक्षणम् ।

जात्या च सदृशाः सर्वे कुलेन सदृशास्तथा ॥30॥


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-90


न चोद्योगेन बुद्ध्या वा रूपद्रव्येण वा पुनः ।

भेदाच्चैव पुरात्रा च भिद्यन्ते रिपुभिर्गणा ॥31॥

तस्मात् संघानेवाहुर्गणानां शरणं महत् ॥32॥

अर्थात् - अच्छे गणों में सब परस्पर एक दूसरे की सुश्रूषा करते हैं। जिससे ज्ञान-वृद्ध उनकी प्रशंसा करते हैं। वे एक दूसरे के साथ बहुत ही अच्छी रीति से व्यवहार करते रहने के कारण सब प्रकार का सुख प्राप्त करते हैं। जो उत्तम गण होते हैं वे शास्त्र-सम्मत धर्मपूर्ण व्यवहार स्थापित करने से प्रसन्न होते हैं। आपस में एक-दूसरे के साथ अच्छा व्यव्हार करते हैं। अच्छे गण इसलिए विवर्द्धित होते हैं कि वे अपने पुत्रों और भ्राताओं को ठीक मर्यादा से रखते हैं और सदा उन्हें विनयी बनने की शिक्षा देते हैं और उन्हीं को ग्रहण करते हैं, जो विनीत होते हैं। वे सदा अपने गुप्तचरों व मन्त्रणा की व्यवस्था में लगे रहने और खजाने का सब काम ठीक तरह से करते रहने के कारण सदैव सर्व प्रकार से विवर्द्धित होते रहते हैं। अपने विद्वानों, शूरों, महान् उत्साहियों और कर्तव्यनिष्ठ रहने वाले पुरूषों का सदा उचित मान करते रहने के कारण विवर्द्धित होते रहते हैं। धनवान, शूर, शास्त्रज्ञ, योद्धागण संकटों और कष्टों में पड़े हुए असहायों अर्थात् अपने सहयोगियों की सहायता करते हैं। क्रोध, भेद, भय, पारस्परिक विश्वास के अभाव, दण्ड, सैनिक आक्रमण, अत्याचार, निग्रह पारस्परिक दमन और वध के कारण गण तुरन्त ही शत्रु के वश में हो जाते हैं। अतः गण के प्रधान के द्वारा अच्छे अच्छे गणों का मान होना चाहिए। गुप्त मंत्र या राजकीय मन्तव्यों को प्रकट न होने देने का कार्य गणों के प्रधानों के हाथ में रहना चाहिए। सारे गण लोग इन मन्त्रों को जान लें यह ठीक नहीं हैं। मुख्य गण एकत्रित होकर गणों के हित का कार्य करें। गणों में पृथकता और भिन्नता की वृद्धि उनकी गिरावट की ओर ले जाती है। जब वे एक दूसरे से भिन्न या अलग हो जाते हैं और केवल अपनी व्यक्तिगत शक्ति पर ही निर्भर रहते हैं, तब उनके यहां अर्थ के बजाय अनर्थ हो जाता है। निग्रह अर्थात् दण्ड-विधान का कार्य विद्वान् के द्वारा होना चाहिए। यदि गणों के कुल में कलह उत्पन्न हों और कुलपति अर्थात् कुल की ओर से चुना हुआ गण उस ओर उपेक्षा करे तो इस से वे गोत्र का नाश करते हैं तथा गण का भेद करते हैं। उन्हें भीतरी भयों से अपनी रक्षा करनी चाहिए। बाहरी भय तो कुछ नहीं बिगाड़ सकता, क्योंकि भीतरी भय तुरन्त ही जड़ को काट देता है। अकस्मात् क्रोध और मोह के कारण एवं स्वभाव-जन्य लोभ के कारण वे एक दूसरे से बोलना बन्द कर देते हैं। वही उनके पराभव का कारण होता है। गणों में सब कुलों की समानता जाति की दृष्टि से एक सी है। उन लोगों में उद्योग-वृद्धि या रूप के लालच से भेद नहीं उत्पन्न किया जा सकता। उनमें आपसी मन-मुटाव पैदा करने से ही भेद उत्पन्न हो सकता है। इसलिए गणों की रक्षा इसी में है कि वे संघ की शरण में रहें।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-91


शिवी और जाट संघ

यह वर्णन तो हुआ गणतन्त्र के सम्बन्ध में। इससे सहज ही जाना जा सकता है कि कुलों की ओर से निर्वाचित मेम्बरों को गण और उनकी सभा को संघ, उनके अधिपति को गणों का अधिपति अर्थात् गणेश और गणपति कहते थे। उनके शासनतंत्र में सभी कुल समान समझे जाते थे। शिवि लोगों के यहां भी गणतन्त्र शासन-प्रणाली थी। महाभारत में इसका नाम शैवल करके आया है। बौद्ध-ग्रन्थों में इन्हें शिवि और पतंजलि ने ‘शैव्य’ लिखा है। सिकन्दर के साथी यूनानी लेखकों ने इसे शिबोई नाम से उल्लेख किया है। पीछे से पंजाब प्रान्तों को छोड़ ये लोग मालवा में जा बसे थे। सिकन्दर के समय में शिवि लोग मालवों के साथी थे। चित्तौड़ के निकट ‘नगरी’ स्थान में इनके सिक्के पाये गए हैं। उन सिक्कों पर ‘‘मज्झिमकाय शिवि जनपदस’’ अंकित है। मध्यमिका (मज्झिमिका) इनकी राजधानी थी। हिन्दू पॉलिटी के लेखक श्री काशीप्रसाद जायसवाल लिखते हैं कि - ई.पू. पहली शताब्दी के बाद इनके अस्तित्व का कोई प्रमाण या लेख अभी तक नहीं मिला है।1 जाटों में एक बड़ा भाग शिवि गोत्री जाटों का है। ट्राइब्स एण्ड कास्ट्स ऑफ दी नार्थ वेस्टर्न प्रॉविन्सेज एण्ड अवध में मिस्टर विलियम क्रुक साहब लिखते हैं -

The Jats of the south-eastern provinces divide them selves into two sections - Shivgotri or of the family of Shiva and Kashyapagotri.

अर्थात् - दक्षिणी पूर्वी प्रान्तों के जाट अपने को दो भागों में विभक्त करते हैं - शिवगोत्री या शिव के वंशज और कश्यप गोत्री ।

इससे यह नतीजा तो नहीं निकालना चाहिए कि शिवि लोग ही जाट हैं। हां, यह अवश्य है कि शिवि लोग भी महान् जाट जाति का एक अंग हैं। ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि अनेक गण मिल करके एक संघ या लीग स्थापित कर लेते थे। क्षुद्रक और मालवों ने मिल करके एक संघ स्थापित किया था। इसी तरह से शिवि लोग भी एक बड़े संघ जट (पाणिनि ने जट का अर्थ संघ किया है) में मिल गये और आज भी एक गोत्र के रूप में जाटों में विद्यमान हैं। बौद्ध-धर्म के अन्तिम काल तक भारतवर्ष में गणतन्त्र शासन-प्रणाली मौजूद थी। ज्यों-ज्यों नवीन हिन्दू-धर्म और राजपूतों का उत्कर्ष होता गया, त्यों-त्यों भारतवर्ष में एकतन्त्र शासन का जोर बढ़ता गया और प्रजातन्त्र घटते गए। यह भी हो सकता है कि यह शिव-वंश के जाट शैव-मतानुयायी रहे हों। चूंकि आरम्भ में शैव और वैष्णव सम्प्रदायों में काफी विरोध रहा था, उसी विरोध को तोड़-मरोड़ करके दक्ष के यज्ञ वाली कथा का सम्बन्ध जोड़ा गया हो। नवीन हिन्दू धर्म की व्यवस्था के अनुसार गण-तन्त्रवादी


1.हिन्दू राज्य-तंत्र, पेज 108


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-92


अथवा जैन-बौद्ध-धर्मावलम्बी अनार्य म्लेच्छ और धर्म-हीन संज्ञा से पुकारे ही जाते थे। यदि शिव जाति के सम्बन्ध में भी उनके धर्म-ग्रन्थों में इन्हीं शब्दों में याद किया हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। गणतन्त्रवादी कुछ समुदायों में से जब कुछ समूह हिन्दू-धर्म में सम्मिलित हुए हों तो बहुत सम्भव है कि उनके पूजनीय और श्रद्धेय गणेश की पूजा को उनकी प्रसन्नता के लिए सम्मिलित कर लिया हो। हमारा कथन इस बात से भी पुष्ट होता है कि गणपति-पूजा का रिवाज महाराष्ट्र प्रान्त में अधिक है और यह सर्वविदित बात है कि मराठे आरम्भ में गणतन्त्रवादी ही थे। पं. सातवलेकर ने मराठों को नागवंशी माना है। नाग एकतन्त्री न होकर प्रजातन्त्रवादी ही थे। हमारा प्रसंग सिर्फ जटा और जाट तक है। गणेश का इतना विस्तृत विवरण हमें इसलिए करना पड़ा है कि लोग शिवजी की जटा से जाटों की उत्पत्ति की अवैज्ञानिक बात का विश्वास छोड़ करके वास्तविक इतिहास समझ लें।

पुराणों के अन्दर एक कथा और आती है कि - शिवि नाम के एक राजा थे। उनकी दयालुता की चर्चा जब स्वर्ग में पहुंची तो देवराज इन्द्र और यम उसकी परीक्षा करने के लिये श्येन (बाज) और कपोत का रूप धारण करके उसके पास आये। श्येन ने कबूतर का पीछा किया। कपोत भागता हुआ शिवि की गोद में आकर छिपा। श्येन ने आकर शिवि से कपोत की याचना की और कहा कि यह मेरी भोज्य वस्तु है। मैं कई दिन से भूखा हूं। आज मुझे यह कई दिन में दैवयोग से मिला है। यदि आप मुझे इसे न देंगे तो मेरे प्राण चले जाएंगे। राजा ने कहा यह तो मेरी शरण में आ चुका है इसे तो दूंगा नहीं। लेकिन तू कोई ऐसी युक्ति बता जिससे तेरे भी प्राण बच जाएं। श्येन न कहा यदि आप कबूतर के बराबर अपना मांस तोलकर दें तो मैं मान जाऊंगा। राजा ने तुला मंगवाई और एक पलड़े में कबूतर को रखकर दूसरे में अपना मांस काट कर रखा। पर सारे शरीर का मांस काट-काटकर चढ़ा देने पर भी वह पलड़ा न उठा। अन्त में राजा स्वयं पलड़े में बैठने लगा। राजा की इस धार्मिक पराकाष्ठा को देखकर इन्द्र स्वयं प्रकट हो गया और राजा के शरीर को पूर्ववत् बना दिया।

यही कथा बौद्ध-धर्म-ग्रन्थ शिविजातक में इस तरह से लिखी है कि - बोधिसत्व ने एक समय शिवि देश में एक राजा का जन्म लिया (राजा से अभिप्राय यहां गणपति का है - लेखक)। राजा बड़ा उदार और दानशील था। उसने अपने राज्य में अनेक दानशाला, धर्मसत्र स्थापित किये थे। कोई याचक राजा के पास से विमुख नहीं फिरता था, दीन-दुखियों के लिये वह दिल खोलकर दान देता था। उसकी ऐसी उदारता को देखकर देवराज इन्द्र का आसन हिल गया। वह राजा के दान की परीक्षा करने के लिये अन्धे ब्राह्मण का रूप धर के उसकी राजधानी में गया। राजा अपनी सभा में बैठा था। अन्धे ब्राह्मण ने कहा -


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-93


शक्रस्य शक्र प्रतिमानुशिष्टस्त्वां याचितुं चक्षुरिहा गतोऽस्मि । संभावनां तस्य ममैव चाशां चक्षु प्रदानात्सफली कुरूष्व।।

अर्थात् इन्द्र की आज्ञा से मैं आपसे आंख मांगने आया हूं। मुझे आशा है और उसे संभावना है कि आप उन्हें सफल कीजियेगा। राजा अपनी आंख निकाल कर देने को तैयार हो गया। मंत्रियों के लाख मना करने पर भी वैद्य से अपनी एक आंख निकलवाकर उसे दे दी। ब्राह्मण ने वो आंख अपनी आंख के स्थान में लगा ली। राजा उसे एक आंख से देखते हुए देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और दूसरी आंख भी उसे दे दी। कुछ दिन के बाद अन्धे राजा के पास इन्द्र आकर के कहने लगा - राजा जो चाहो मुझसे मांग लो। राजा ने कहा -

प्रभूतं मे धनं शक्र शक्तिमच्च महत् बलम्।

अंधभावात्तिवदानीं मे मृत्युरेवाभिरोचते।।

अर्थात्- हे इन्द्र ! मेरे पास बल, धन, सब है किन्तु अंधा होने के कारण मैं याचकों का मुंह नहीं देख सकता, अतः मृत्यु मांगता हूं। इन्द्र ने कहा - धन्य है ! इस दशा को पाकर भी आप याचकों को देखना चाहते हैं। राजा ने इन्द्र की बातों पर क्रोध-प्रकट करते हुए कहा -

तदेव चेत्तर्हि च याचकानां वचांसि या´चानियताक्षराणि ।

आशीर्मयानीव मम प्रियाणि यथा तथोदेतु ममैकचक्षुः ॥

अर्थात् - यदि मुझे याचकों का आर्शीवाद प्रिय हो तो मेरी एक आंख जयों-की-त्यों अभी हो जाए। यह कहते ही राजा की आंख पूर्ववत् हो गई । पुनः राजा ने कहा -

यश्चापिना चक्षुरयाचतैकं तस्मै मुदा द्वे नयने प्रदाय।

प्रीत्युत्संवैकाग्रमतिर्यथासं द्वितीयमप्यक्षि तथा ममास्तु।।

अर्थात् - यदि एक आंख के मांगने पर मैंने अपनी दोनों आंख हर्ष पूर्वक दे दी हों तो दूसरी आंख भी त्यों हो जाएं। राजा का कहना था कि दूसरी आंख जैसी थी वैसी ही हो गई। फिर सारी पृथ्वी कांप उठी, आकाश में देवता दुंदुभी बजाने लगे। देवराज इन्द्र राजा को यह आर्शीवाद देकर साधु-साधु कह सुरलोक सिधारे -

ननो न विदित राजस्तव शुद्धशयाशयः।

एवं नु प्रतिदत्ते ते मयेमे नयने नृप ॥

समन्ताद्योजनशतं शैलैरपि तिस्कृतम् ।

द्रष्टुम् व्याहता शक्तिर्भविष्यत्यनयोश्चते ॥

अर्थात् - हे राजन् ! आपका आशय मुझसे छिपा नहीं है इसीलिये मैं आपको


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ये दो आंखे देता हूं। आप सौ योजन तक पर्वत की ओट होते हुए भी देखेंगे और आपकी देखने की शक्ति अव्याहत होगी।1

महाराज शिवि का यह स्थान पेशावर से सात दिन की यात्रा के पश्चात् सिंध नदी के उस पार था। यहां राजा अशोक ने इनकी स्मृति के लिये एक विहार और एक स्तूप बनवाया था। जातक ग्रन्थों से यह भी मालूम होता है कि राजा शिवि भगवान बुद्ध से पूर्व पैदा हुए थे। इस तरह से शिवि जाति का अस्तित्व बौद्ध-काल से पहले का पाया जाता है। लगभग यही समय जट-संघ के स्थापित होने का और भिन्न-भिन्न राजवंशों का जट-संघ में शामिल होकर जाट कहलाने का है। शिवि जाति में जो कि इस महान जाट-जाति का एक अंग है, कई प्रसिद्ध राजा उत्पन्न हुए, जिनका वर्णन हम यथास्थान करेंगे। चूंकि शिवि जाति जट-संघ में शामिल हो गई थी, अनेक पीढ़ियों के बाद तक भी उन लोगों के लिये जो कि शिवि-जाति में से आये थे यह बात तो याद रही कि उनके पुरखे शिवि कहलाते थे। पर इस बात को वे कतई भूल गये कि शिव किसी एक पुरूष का नाम न होकर जाति का नाम था। इसलिये वे स्वयं को शिवजी अर्थात् पौराणिक महादेव का वंशज मान बैठे। लेकिन यह प्रश्न कि वह शिवजी के वंशज होकर जाट नाम को कैसे प्राप्त हुए, मोटी अकल से यही मान लिया कि वे अवश्य ही शिवजी की जटाओं से पैदा हुए हैं। क्योंकि उनके सामने एक पौराणिक कथा भी थी कि शिवजी ने जटा में से कुछ आदमियों को पैदा किया जो कि वीरभद्र तथा गणादिक कहलाते थे। हालांकि यह कथा भी बहुत संभव है गणतंत्र के विरूद्ध गणों की राजनैतिक संस्थाओं के बजाय धार्मिक पुरूष बताने के लिये तथा वास्तविकता पर आवरण डालने के लिये रची गई हो। जाटों के सम्बन्ध में शिवजी के जटा में से पैदा होने की दन्तकथा का यही आधार और कारण है।

जाट हैहय क्षत्रियों की शाखा ?

कोई-कोई इतिहासकार और विद्वान् यह भी मानता है कि जाट हैहय क्षत्रियों की उन शाखाओं में से हैं जो सुजात और जात नाम से प्रसिद्ध थीं। देशी इतिहासकारों में भाई परमानन्दजी इसी मत के समर्थक हैं। जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में भाई परमानन्दजी के जो विचार हैं, उन्हें हम ज्यों का त्यों उद्धृत करते हैं। वे लिखते हैं कि -

"ऐसा मालूम पड़ता है यादु नस्ल की एक शाख जाट कहलाने लगी। जाट और यादु लफ्ज एक-दूसरे से बहुत मिलते-जुलते हैं। यादुओं के हैहय कबीले की एक शाख का नाम जात या सुजाता था। यह भी कहा जाता है कि कश्यप ऋषि ने अग्नि-कुल राजपूतों की तरह जाटों को भी क्षत्रिय बनाया । नस्ल के लिहाज से जाट बिल्कुल राजपूतों से मिलते हैं। राजपूत लोग उन्हें इसलिये

1. ‘‘सुंगयुन का यात्रा विवरण’’ काशी नागरी प्रचारिणी सभी द्वारा प्रकाशित पेज 46-47।
2. वही, पेज 36


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अपने से छोटा समझते हैं कि उनमें करेवा का रिवाज पाया जाता है। लेकिन गौर करने पर यह भी नतीजा निकल सकता है कि जाट हिन्दू-समाज की उस हालत से ज्यादा मिलतें हैं जो कि पुराणों के पहले पाई जाती थी। देवर लफ्ज के माने दूसरे पति के हैं। दूसरी कई बातें से भी यह मालूम होता है कि जाटों पर बनिस्वत दूसरे हिन्दुओं के पुराणों की तालीम का बहुत कम असर हुआ है। मसलन जाट अभी तक ‘कुल’ की हालत में पाये जाते हैं। उनमें जाति-पाति की तकसीम नहीं पाई जाती जो बाकी हिन्दू-समाज में इतने जोर से पाई जाती है। भाषा, करेक्टर और विचारों से भी यही जाहिर होता है कि जाट लोग वैदिक जमाने की सुसाइटी के आम हिन्दुओं की निस्बत बेहतर कायम मुकाम हैं।"

जाति या सुजाति शब्द से जाट शब्द का बनना संबंध समझकर शायद भाईजी ने सुजात लोगों को ही जाट मान लिया है और इसमें भी सच्चाई है कि जात शब्द से आगे चलकर, परिस्थितियों के कारण, जाट शब्द बन गया। किन्तु यह कथन गलत है कि परशुराम वाले सुजात या जात लोग ही अब के जाट हैं। परशुराम और हैहय लोगों का युद्ध रामायण काल से भी पहले का है। यदि सुजात लोग ही जाट कहलाने लग गये होते तो महाभारत के समय अवश्य इनकी हस्ती होती। हैहय क्षत्रिय एकतन्त्र विचार के थे। परशुराम के बाद अवश्य ही वे लोग कहीं अपना राज्य स्थापित करते। लेकिन लाखों वर्षों के अन्तर (कुछ विदेशी इतिहासकारों ने रामायण-काल से लेकर महाभारत के बीच का समय दस हजार वर्ष तक माना है) में सुजात लोगों को पैतृक गौरव प्राप्त करने की चेष्टा (साम्राज्य स्थापन) करते हम कहीं नहीं पाते। इस परशुराम वाली कहानी का हम पीछे के पृष्ठों में काफी खंडन कर चुके हैं। यहां इतना ही लिख देना उचित समझते हैं कि उनके गौत्र जो कि पांडवों, शैव्यों, गान्धारों, मालवों आदि राजवंश से निकलते हुए हैं वे सुजात के वंशज कैसे कहला सकते हैं? यहां तक कि उनमें नाग वंशी तथा सूर्यवंशी (पूणिया, सिकरवार) गोत्र भी पाये जाते हैं। इस सिद्धान्त का खण्डन करने के लिए यही एक बात पर्याप्त है। उनके गोत्र व कुल न तो कुछ भी हैहय क्षत्रियों से मिलते हैं और न हैहयों की आदिभूमि दक्षिण में उनका (जाट) कोई नाम निशान ही पाया जाता है।

यात शब्द से जाट

जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में एक और सिद्धान्त है जिसके आविष्कर्ता एक जाट सज्जन श्री रामलालजी हाला हैं । उनका कहना है - चन्द्रवंश में श्रीकृष्ण से कई पीढ़ी पहले महाराज ‘यात’ हुए थे। यात शब्द से ही याट फिर जाट बन गया । यह फिलासफी भी सुजात शब्द से जाट बनने की जैसी ही है। यदि बात ऐसी ही हो तो यात की संतान के लोग जाटों का नाम महाभारत में खूब आता। हमारे कहने का मतलब यह है कि जाट शब्द के बनने के कारण और तिथियां भारतीय युद्ध से पुराने समय की नहीं है। और किसी एक व्यक्ति की संतान के लोग ही जाट कहलाये तो पाणिनि का जट झट संघाते सूत्र गलत हो जाता है।


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वास्तव में जट शब्द संघ के लिये प्रयुक्त हुआ था जैसा कि हमारे आगे कथन से अधिक स्पष्ट हो जाएगा। यूरोप के कई देशों में जाट शब्द से मिलते-जुलते गाथ, गेटि, यूटी, श्यूची आदि शब्दों को देखकर विदेशी इतिहासकारों को बड़ी उलझन में पड़ना पड़ा है। हीरोडोटस, स्ट्रबो, कनिंघम आदि जैसे लोगों ने इन शब्दों के आधार पर यह साबित करने की चेष्टा की है कि जाट अवश्य ही इन्ही जातियों के उत्तराधिकारी हैं जो विदेशों से भारत में आकर आबाद हुई। कुछ लोग ऑक्सस के किनारे से, कुछ सिरिया से, कुछ बैक्ट्रिया से और कुछ स्कैण्डनेविया से इनको आया हुआ बताते हैं। मेजर बिंगले ‘‘सेविन्थ डक ऑफ कन्नाउटस ऑन राजपूत्स’’ में लिखते हैं कि-

‘‘ईसा के पूर्व पहली और दूसरी शताब्दी में जाट लोग आक्सस के किनारे से चलकर दक्षिणी अफगानिस्तान होकर के भारत में आये।’’

इस कथन का खण्डन मि. नेशफील्ड, सर हर्बर्ट रिजले, डाक्टर ट्रम्प और वीम्स तथा अनेक अरब इतिहासकारों ने किया है। देशी इतिहासकारों में श्री चिन्तामणि वैद्य ने तो बड़े मजबूत प्रमाणों के साथ उक्त विचारों का खण्डन किया है। उनके लेख के कुछ अंश हमने पीछे के पृष्ठों में दे दिये हैं।

कनिघम और उनके सहयोगियों को यह भ्रम क्यों हुआ, हमारी समझ में उसके निम्न कारण हैं -

  • 1. नामों की समानता,
  • 2. ईसवी सन् पूर्व 200-300 वर्ष से अधिक पहले का उन्हें जाटों का कोई इतिहास नहीं मिला -

वैसे इन कारणों पर हम पहले प्रकाश डाल चुके हैं फिर भी संक्षेप से यहां इतना और बता देना उचित समझते हैं -

  • 1. नामों की समानता से यदि वह भ्रम में पड़े हैं तो उन्हें यह मान लेना चाहिए था कि गेटि, जेति, गात, श्यूची आदि समूह जिनके कि यूरोप व चीन में निशान पाये गए हैं, उन जाटों के वंशज हैं जो कि परिस्थितियों के कारण भारत से बाहर गए थे, और वहां जाकर उन्होंने उपनिवेश स्थापित किये थे। इस बात के विदेशी साहित्य में भी काफी प्रमाण भरे पड़े हैं कि भारतीय क्षत्री यहां से बाहर गए और वहां जाकर उन्होंने अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इस बात के कुछ हवाले आगे दिये जाते हैं।

मि. कुकटेलर नेशन्स आफ एण्टीक्वयरी के पेज 11-12, पर लिखते हैं - वास्तव में यह अनुमान किया है कि मिश्रियों ने अपनी सभ्यता की व्यवस्था हिन्दुओं से ली होगी।

मि. पी. कॉक इण्डिया इन ग्रीस नामक पुस्तक में लिखते हैं - :"यूनानी समाज की सारी दशा किसी को भी एशियायी ही जंचेगी और उसमें भी अधिक अंश भारतीय मालूम पड़ेगा। मैं उन घरानों की बातों का उल्लेख करूंगा जो भारत से तो लुप्त हो गए पर भारतीय उपनिवेश संस्थापन के चिन्हों के साथ वही अपने धर्म तथा भाषा सहित यूनान में फिर प्रकट हुए थे। (पृ.12) ब्राह्मणों और बौद्धों के धर्म एशिया के एक बड़े भाग पर आज के दिन भी सिक्का जमाये हुये हैं।


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इस लम्बे युद्ध में दो बड़े नेता थे। इन दोनों में ब्राह्मण-धर्म की विजय हुई। बौद्ध-धर्म के नेता खदेड़ दिये गये, जिन्हें अपने उत्पीड़न करने वालों से बचने के वास्ते उनकी पहुंच के बाहर आश्रय लेना पड़ा था। वे लोग बैक्ट्रिया, फारस, एशियामाइनर, यूनान, फिनीसिया और ग्रेट ब्रिटेन को चले गए, और अपने साथ पहले के अपनी ऋषियों की श्रद्धा और विचित्र दर्जे की व्यापारिक शक्ति के साथ ज्योतिष और तन्त्र-विद्या की अनोखी योग्यता भी लेते गए।’’1 (पृ. 26)

भारतीय जाटों का विदेशों में जाना

स्कैण्डनेविया की धर्म पुस्तक ‘एड्डा’ में उल्लेख - स्कैण्डनेविया की धर्म पुस्तक ‘एड्डा’ में लिखा हुआ है कि - "यहां के आदि निवासी जटेस और जिटस पहले आर्य कहे जाते थे तथा वे अलीगढ़ के निवासी थे।" (जो कि मालवा के निमाड़ जिले में है। - लेखक) मिस्टर पिंकाटन का विचार है कि - ईसा से 500 वर्ष पूर्व डेरियस के समय में यहां (स्कैंडिनेविया) ओडन नाम का एक आदमी आया था जिसका उत्तराधिकारी गौतम था। इनके अतिरिक्त स्कैंडिनेविया की धारणाएं भी धार्मिक हिन्दू कथाओं से मिलती-जुलती हैं। इनके दिवस विभाग आदि सभी हिन्दुओं के ढंग पर हैं। अतः स्कैंडिनेविया निवासी काउण्ट जोर्नस्टर्न का कथन अक्षरशः सत्य प्राचीन होता है कि - हम लोग भारत से आये हैं।

स्कैण्डनेविया संस्कृत शब्द स्कंधनाभ का अपभ्रन्श हैं। स्कंधनाभ का अर्थ है - मुख्य सैनिक। इससे भी यही ध्वनि निकलती है कि इस देश को भारतवर्ष की सैनिक-जाति-क्षत्रियों ने बसाया। मि. रेम्यूसेट का दावा है कि - कुल मध्य ऐशिया ही यादवों की बस्ती है। प्रोफेसर पी. कॉ कहते हैं - फारस, कोल, कीच और आरमीनिया के प्राचीन नक्शे भारत वासियों के उपनिवेश होने के स्पष्ट और आशचर्यजनक सबूतों से भरे पड़े हैं। काउन्ट जोर्नस्टर्न कहते हैं - रोम की इट्रस्कन जाति भी हिन्दूओं में से है। कर्नल टाड कहते हैं - जैसलमेर के इतिहास से पता चलता है कि हिन्दू जाति के बाल्हीक खानदान ने महाभारत के पश्चात् खुरासान में राज्य किया। मि.पी. कॉक का मत है कि - महाभारत का युद्ध समाप्त होते ही कुछ लोग यहां से निकाल दिए गए तथा कुछ लोग प्राण-रक्षा के कारण जान लेकर भागे थे। उनमें से कतिपय आदि सभ्यता के पटु थे और कुछ व्यवसायी योद्धा थे।..... अधिकतर लोग यूरोप में और अमरीका में जाकर बसे । महाभारत के लोग भिन्न भिन्न मार्ग से गए। कुछ तो पूर्व की ओर से, श्याम, चीन, भारतीय द्वीप-समूह में, कुछ लोग पश्चिमोत्तर से तुर्किस्तान, साइबेरिया, स्कैण्डनेविया, जर्मनी, इंगलिस्तान, फारस, ग्रीक, रोम आदि की ओर जा बसे और कुछ लोग पश्चिम से पूर्वी अफ्रीका


1. आर्यों का मूल स्थान 14 वां अध्याय।


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और वहां से मिश्र को गए। 1

प्रोफेसर हीरन कहते हैं - विदेशों में बस्तियां बसाने के सिवाय भारत जैसा अत्यन्त आबाद और किन्हीं भागों में अत्यधिक आबाद देश अपनी जनसंख्या के निवास का और क्या प्रबन्ध कर सकता था ?

कर्नल अलकोट ने लिखा है - हमें यह समझने का अधिकार है कि 8000 वर्ष पूर्व भारत से (कुछ लोग) अपना देश छोड़कर अपने कला-कौशल तथा उच्च सभ्यता के साथ उस स्थान में पहुंचे थे जो कि आज हमें ईजिप्ट (मिश्र) के नाम से ज्ञात है।

कई अंग्रेज विद्वानों ने एक मिश्रवासी और एक बंगालवासी की खोपड़ियों की घनिष्टता साबित की है। मि. विल्सन साहब के विचार में बर्मा तथा तिब्बत वासियों की सभ्यता भी भारत से गई हुई है। सर विलियम जोन्स का कहना है कि - चीनवासी अपनी उत्पत्ति हिन्दुओं से स्वीकार करते हैं। कहा जाता है बौद्ध-काल में एक समय तीन हजार से अधिक भारतीय संन्यासी 10000 से अधिक भारतीय गृहस्थ अपने जातीय धर्म और कला-कौशल का चीन देश में प्रभाव डालने के निमित्त केवल एक प्रदेश लायंग में वास करते थे।

वैरिन हम्बोल्ट का दावा है कि - अमेरिका में हिन्दुओं के रहने के चिन्ह अब तक विद्यमान हैं। मैक्सिको के निवासी एक ऐसे मनुष्य की पूजा करते थे जिसका सिर हाथी था और धड़ मनुष्य का था। 2 यह गणेश ही हो सकते हैं (सं.)

इनके अतिरिक्त भी और कितनी ही सम्मतियां हैं। हमारी समझ से पाठक इस विषय में कि विदेशी विद्वान् भी इस बात से सहमत हैं कि भारतीय क्षत्रिय बाहर गए और हां प्रभुत्व स्थापित किया एवं आबाद हुए, भली प्रकार जान गए होंगे। संस्कृत-साहित्य में भी ऐसे प्रमाण हैं जिनसे साबित होता है कि भारतीय आर्यों ने अन्य देशों में जाकर उपनिवेश कायम किए । महाभारत के वर्णन के अनुसार पांडवों का हिमालय को पार करना सर्व-विदित बात है। हरिवंश में एक कथा आती है कि कौरवों के राजकुमार को भारत से इस कारण निकाल दिया गया था कि उसने गोमेध के समय गोमांस खा लिया था। उसी की सन्तान के लोग अरब में कुरेश कहलाए। यादव कुल दिग्विजय यादवों द्वारा संसार के भिन्न-भिन्न देशों को जीतकर अपने वश में करने की कथाओं से भरा पड़ा है। कालिदास का बनाया हुआ रघुवंश इस बात की साक्षी देता है कि सूर्यवंश के


1. देखो मासिक पत्र 'स्वार्थ' के संवत 1976 माघ, फाल्गुन के अंक 4 , 5 में (प्राचीन भारत के उपनिवेश) नामक लेख ले. बा. शिवदास गुप्त.
2. संस्कृत साहित्य का इतिहास पे. 49 से 51 तक का सार. लेखक महेश चन्द्र बी.ए.


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योद्धाओं ने विदेशों में जाकर विजय प्राप्त की। पुराणों में यह कथा बार-बार दुहराई गई है कि शुक्राचार्य असुरों के देश अर्थात् ईरान में रहते थे। कृष्ण का पुत्र साम्ब श्यामनगर में राज्य करता था, जिसे ग्रीक वालों ने मीनगढ़ कहा है। बौद्ध और जैन-ग्रन्थों से भी यहां से भारतीयों का बाहर जाना पुष्ट होता है। भविष्य पुराण के हवालों से यह मालूम होता है कि महाराजा शालिवाहन तथा उनके साथी हिमालय पार करके हूण देश में शायद काकेशश पर्वत की ओर गए थे, जहां कि उनकी मुलाकात हजरत ईसा से हुई थी, जैसा कि इन श्लोकों से प्रकट होता है -

एकदातु शकाधीशो हिमतुंगं समाययौ ।

हूणदेशस्य मध्ये वै गिरिस्थं पुरूषं शुभम् ॥

ददर्श बलवान् राजा गोरांगश्वेतवस्त्रकम् ॥22॥

को भवानि तितंप्राहस होवाच मदान्वितः ।

ईश पुत्रं च मां विद्धि कुमारी गर्भ संभवम् ॥23॥

(भविष्य पुराण प्र. सय. 4 खं 3)

अर्थ - एक बार शक देश के राजा शालिवाहन हिमालय की चोटी पर गए। तब उस बलवान राजा ने हूण देश के मध्य में पर्वत पर बैठे हुए गोरे रंग वाले तथा सफेद वस्त्र पहने हुए पवित्र पुरूष को देखा। राजा ने उससे पूछा आप कौन हैं? वह खुश होकर बोला मैं कुमारी के गर्भ से पैदा हुआ खुदा का बेटा (यीशु) हूं ।

भारतीय इतिहासकारों ने भी इस बात को प्रमाणित किया है कि आर्य क्षत्रिय लोगों ने विदेशों में जाकर बस्तियां आबाद की और साथ ही अपने धर्म का भी प्रचार किया। आचार्य रामदेव ने भारत का इतिहास द्वितीय खंड में ईरान, यूनान तथा मिश्र में भारतीय लोगों के जाने तथा बसने का वर्णन किया है। दिगम्बररत्न और दिगम्बर मुनि इतिहास-लेखक कामता प्रसाद जैन एम.आर.एस. ने अनेक प्रमाणों से यह साबित किया है कि जैन-आचार्यों ने विदेशों में जाकर के प्रचार किया। जैन-इतिहास में वर्णन है कि ईसवी सन् पूर्व, पहली शताब्दी में, भरोंच से एक श्रवणाचार्य रोम में प्रचारार्थ गए थे। उसमें यूनान और बैक्ट्रिया में श्रवणों के विहार होने का उल्लेख किया है ।

भारतीय जाटों के विदेश जाने के प्रमाण - उपर्युक्त उद्धरणों से हमारे कथन की पुष्टि हो जाती है कि जाट बाहर से आये हुए लोगों के स्टाक के नहीं हैं बल्कि विदेशी इतिहासकारों ने जिन गेटा, मेटा जातियों का नाम बतलाया है और उसके कारण ही जाटों को उनमें से बतलाया है, ये जातियां ही भारतीय जाटों के विदेश में गए हुए स्टाक में से हैं। भारत से जाटों का स्थानांतरित होने का भी ऐतिहासिक विवरण मिलता है। बृज से द्वारिका और द्वारिका से जदु का डूंग और जदु से गजनी, कंधार और फिर ईरान में जहां


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जाकर के उन्होंने जाटालि प्रदेश बसाया था, के भ्रमणकारी वर्णन मिलते हैं। खलीफा अबू-बकर के समय में उन्हें रोमन लोगों के विरूद्ध लड़ने के लिए और हजरत अली के समय में बसरे के खजाने की रक्षा करने के लिए तथा इससे भी पहले हजरत मुहम्मद की अंग-रक्षा के लिए अरब और रोम की सीमा तक जाट-जत्थों के जाने की अरबी साहित्य साक्षी देता है। भारत में जाटों के अनेक दलों का स्थानांतरित होना ईसा सन् से कम से कम 900 वर्ष पहले आरंभ हो गया था। दूसरे, एक यह भी बात है कि गेटा, गात आदि जातियों का इतिहास प्रायः इससे बाद में आरंभ होता है। ईसा से 800 वर्ष पहले महावल जाट राजा, जो कि ईसवी सन् से 506 वर्ष पहले, दिल्ली में राज्य करने वाले जीवन जाट के आदि पुरूषों में से था, दिल्ली में राज्य कर रहा था। 1 तीसरे, संस्कृत-साहित्य के प्रसिद्ध वैयाकरण पाणिनि के धातु पाठ में जट शब्द आता है जो कि ईसा से लगभग 900 वर्ष पहले हुआ था। जट शब्द भारत में पाणिनि से कई शताब्दी पूर्व प्रचलित होगा, तभी पाणिनि ने इसको अंकित किया होगा। इन सब बातों के देखते हुए यही संभव है कि जटजैंड, स्कैण्डनेविया तथा चीन आदि देशों में जो जाट शब्द के समावाची संज्ञक समूह पाये जाते हैं, वे भारतीय जाटों के बाहर गए स्टाक में से हैं।

ज्ञात शब्द से जाट की उत्पत्ति

जाट शब्द की उत्पत्ति और उसके प्रचलन का कारण हमारी स्थापना के अनुसार जो बिल्कुल वैज्ञानिक और सत्य है यह है कि - जाट शब्द संस्कृत के ज्ञात शब्द से बना है। जिसका ज्ञात और फिर आगे चलकार जाट हो गया। के स्थान पर का उच्चारण उत्तर-भारत की प्रचलित प्राकृतिक भाषा के कारण हो गया।

अब प्रश्न दो हो सकते हैं कि जाट नाम की कब और किस कारण से सृष्टि हुई और क्या जट शब्द 900 ई.पूर्व से प्रचलित था। इन प्रश्नों का उत्तर देने से पहले महाभारत का एक सन्दर्भ पेश करना आवश्यक समझते हैं -

नासुहृत् परमं मन्त्रं नारदार्हति वेदितुम् ।

अपण्डितो वाऽपि सुहृत्पण्डितो वाप्यनात्मवान् ॥3॥

सते सौहृद मास्थाय किं चिद् वक्ष्यामिनारद ।

कृत्स्नां बुद्धिं च तेप्रेक्ष्य संपृच्छे त्रिदिवडग्म ॥4॥

दास्य यैश्वर्य वादेन ज्ञातीनां वै करोम्यहम् ।

अर्धभोक्ताऽस्मि भोगानां वाग् दुरूक्तानि चक्षभे ॥5॥


1. वाकयात पंज हजार रिसाला उर्दू ।


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अरणींमग्निकामो वा मथ्नाति हृदयंमम।

वाचा दुरूक्तं देवर्षें तन्मां दहतिनित्यद ॥6॥

बलं संकर्षणं नित्यं सौकुमारूर्यं पुनर्गदे

रूपेणमत्तः प्रद्युम्रुः सोऽसहायोऽस्मि नारद ॥7॥

अन्येहि सुमहाभागा बलवन्तोदुरा सदाः ।

नित्योत्थानेन सम्पन्ना नारदांधकवृष्णयः ॥8॥

यस्य न स्युर्न स स्याद्यस्य स्युः क्रृत्स्नमेव तत्।

द्वयोरेनं प्रचरतोर्वृणोम्येकतरं न च ॥9॥

स्यातां यस्याहुकाक्रूरौ किं नु दुःखतरं ततः ।

यस्य चापि न तौ स्यातां किं न दुःखतरं ततः ॥10॥

सोऽहं कितव मातेव द्वयोरपि महामुने ।

नैकस्य जयमाशं से द्वितीयस्य पराजयम् ॥11॥

ममैव क्लिश्यमानस्य नारदो भयदर्शनात् ।

वक्तुमर्हसि यच्छ्रेयो ज्ञातीनामात्मनस्तथा ॥12॥ नारद उवाच

आपदो द्विविधा कृष्णः बाह्मश्चाभ्यन्तराश्च ह।

प्रादुर्भवन्ति वार्ष्णेय स्वकृता यदि वाऽन्यतः॥13॥

सेयमाभ्यन्तरा तुभ्यमापत् कृच्छ्रा स्वकर्मजा ।

अक्रूरभोज प्रभवासर्वेह्येते तदन्वयाः ॥14॥

अर्थहेतोर्हि कामाद्वा वीर वीभत्स याऽपि वा।

आत्मना प्राप्तमैश्वर्य मन्यत्र प्रतिपादितम् ॥15॥

कृतमूलमदानीतंत् ज्ञातिशब्दं सहायवत्।

न शक्यं पुरा दातुं वान्तमनन मिवस्वयम् ॥16॥

वभ्रूगसेन तो राज्यं नाप्तुं शक्यं कथं च न।

ज्ञातिभेदभयात्कृष्ण त्वया चाऽपि विशेषतः ॥17॥

तच्च सिद्धयेत्प्रयत्नेन कृत्वा कर्म मुदुष्करम्।

माहक्षरं ब्ययो वास्या द्विनाशो वा पुनरभवेत् ॥18॥

अनायसेन शस्त्रेण मृदुना हृदयच्छिदा ।

जिव्हा मुद्धर सर्वेषां परिमृज्यानु मृत्य च ॥19॥


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वासुदेव उवाच

अनायसं मुने शस्त्रं मृदु विद्यामहं कथम्।

येनैषामुद्धरे जिह्नां परिमृज्यानुमृज्य च ॥20॥ नारद उवाच

शक्यान्नदाने सततं तितिक्षाऽऽर्जवमार्दवम् ।

यथार्थप्रतिपूजा च शस्त्रमेतदनायसम् ॥21॥

ज्ञातीनां वक्तुकामानां कटुकानि लघूनि च।

गिरा त्वं हृदयं वाच शमयस्व मनांसि च।।22।।

नामहापुरूषः कश्चिन्नामानासहायवान् ।

महतीधुरमादाय समुद्यम्योरसा वहेत् ॥23॥

सर्व एव गुरूं भारतमनड्वान् वहते समे।

दुर्गे प्रतीतः सुगवो भारं वहति दुर्वहम् ॥24॥

भेदाद् विनाशः संघानां संघमुख्योसि केशव ।

यथा त्वां प्राप्य नोत्सीदेदयं संघस्तथा कुरू ॥25॥

नान्यत्र बुद्धिक्षान्तिभ्यां नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात् ।

नान्यत्र धनसन्तयागात् गुणः प्राज्ञेऽवतिष्ठते ॥26॥

धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वपक्षेद्भावनं तथा ।

ज्ञातीनामविनाशः स्याद्यथा कृष्ण तथा कुरू ॥27॥

आयत्यां च तछात्वे च न तेऽस्त्यविदितं प्रभो ।

षाड्गुण्यस्य विधाने च यात्रामानविधौ तथा ॥28॥

यादवाः कुकुरा भोजाः सर्वे चान्धकवृष्णयः

त्वरूयायत्ता महाबाहो लोकालोकेश्वराश्च ये ॥29॥

अर्थात् - वासुदेवजी बोले - हे नारद ! राज्य सम्बन्धी महत्वपूर्ण बातें न तो उसी से कही जा सकती हैं जो अपना मित्र नहीं है, न उस मित्र से कही जा सकती है जो पण्डित नहीं है और न उस पण्डित से कही जा सकती हैं जो आत्मवान् या आत्म-संयमी नहीं है ॥3॥

हे नारद ! तुम में मैं वह सच्ची मित्रता पाता हूं जिस पर मैं निर्भर रह सकता हूं, इसलिए मैं तुमसे कुछ बातें करना चाहता हूं । हे सुप्रसन्न ! तुम्हारी वृद्धि बहुत प्रबल है, इसलिए मैं तुमसे एक बात पूछना चाहता हूं ॥4॥

यद्यपि लोग उसे ऐश्वर्य या प्रभुत्व कहते हैं तथापि मैं जो कुछ करता हूं वह वास्तव में अपनी जाति के लोगों का दासत्व है। यद्यपि मैं अच्छे वैभव या


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-103


शासनाधिकार का भोग करता हूं, तथापि मुझे उनके केवल कठोर वचन ही सहने पड़ते हैं ॥5॥

हे देवर्षि ! उन लोगों के कठोर वचनों में मेरा हृदय उसी आरणी की भांति जलता रहता है जिसे अग्नि उत्पन्न करने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति मथन करता है । वे वचन सदा मेरे हृदय को जलाते रहते हैं ॥6॥

(यद्यपि) संकर्षण अपने बल के लिए और गद अपने राजसी गुणों के लिए सदा से बहुत प्रसिद्ध हैं और प्रद्यमन रूप से मत्त है। तथापि हे नारद ! मैं असहाय हूँ, कोई मेरी सहायता करने वाला या अनुकरण करने वाला नहीं है ॥7॥

दूसरे अन्धक और वृष्णि लोग वास्तव में महाभाग, बलवान् और पराक्रमी हैं । हे नारद ! वे लोग सदा राजनैतिक (उत्थान) बल से सम्पन्न रहते हैं ॥8॥

वे जिसके पक्ष में हो जाते हैं उसकी सब बातें सच हो जाती हैं और यदि वे किसी पक्ष में न हों तो फिर उसका अस्तित्व ही नहीं रह सकता । यदि आहुक और अक्रूर किसी व्यक्ति के पक्ष में हों तो उसके लिए इससे बढ़कर और कोई आपत्ति ही नहीं हो सकती । और यदि वे किसी व्यक्ति के पक्ष में न हों तो उसके लिए इससे बढ़कर और कोई आपत्ति ही नहीं हो सकती । मैं दोनों दलों में से किसी दल का निर्वाचन नहीं कर सकता ॥9-10॥

हे महामुने! इन दोनों के बीच में मैं उन दो जुवारियों की माता की भांति रहता हूं जो आपस में एक दूसरे के साथ जुआ खेलते हैं और वह माता न तो इस बात की आकांक्षा कर सकती है कि अमुक जीते और न इस बात की आकांक्षा कर सकती है कि अमुक हारे। अब हे नारद ! तुम मेरी अवस्था और साथ ही मेरे सम्बन्धियों की अवस्था पर विचार करो और कृपाकर मुझे कोई ऐसा उपाय बतलायें जो दोनों के लिए श्रेय (कल्याण कारक) हो। मैं बहुत ही दुखी हो रहा हूं ॥11-12॥

नारद ने कहा - हे कृष्ण ! (प्रजातन्त्र गण में) दो प्रकार की आपत्तियां होती हैं । एक तो बाह्य या बाहरी और दूसरी आभ्यंतर या भीतरी, अर्थात् एक तो वे जिनका प्रादुर्भाव अपने अन्दर से होता है और दूसरी वे जिनका प्रादुर्भाव अन्य स्थान से होता है ॥13॥

यहां जो आपत्ति है वह आभ्यंतर है। वह (सदस्यों) स्वयं अपने कर्मों से उत्पन्न हुई । अक्रूर, भोज अनुयायी और उनके सब सम्बन्धी या जाति के लोग धन प्राप्ति की आशा से सहसा प्रवृत्ति बदलने के कारण अथवा वीरता की ईर्ष्या से युक्त हो गए हैं और इसीलिए उन्होंने जो राजनैतिक अधिकार ऐश्वर्य प्रतिपादित किया था, वह किसी दूसरे के हाथ में चला गया है ॥14-15॥

जिस अधिकार ने जड़ पकड़ ली है और जो ज्ञाति शब्द की सहायता से और भी दृढ़ हो गया है, उसे लोग वमन किए हुए भोजन की भांति से वापस नहीं ले सकते।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-104


ज्ञात या सम्बन्धी में मत-भेद या विरोध होने के भय से वभ्रू-उग्रसेन राज्य या शासनाधिकार वापस नहीं ले सकते । हे कृष्ण! विशेषतः तुम उनकी कुछ सहायता नहीं कर सकते ॥16-17॥

यदि कोई दुष्कर नियम विरूद्ध कार्य करके यह बात कर भी ली जाय, उग्रसेन को अधिकार च्युत कर दिया जाय, उसे प्रधानपद से हटा दिया जाय, तो महाक्षय, व्यय अथवा विनाश तक हो जाने की आंशका है ॥18॥

अगर तुम ऐसे शस्त्र का व्यवहार करो जो लोहे का न हो बल्कि मृदु हो और फिर भी जो सबके हृदय छेद सकता हो उस शस्त्र को बार-बार रगड़कर तेज करते हुए सम्बन्धियों की जीभ काट दो, उनका बोलना बन्द कर दो ॥19॥

वासुदेव ने कहा - हे मुनि ! तुम मुझे यह बताओ वह कौन-सा ऐसा शस्त्र है जो लोहे का नहीं है, जो बहुत ही मृदु है, और फिर भी जो सबके हृदय छेद सकता है और जिसे बार-बार रगड़कर तेज करते हुए मैं उन लोगों की जीभ काट सकता हूं ॥20॥

नारद ने कहा - जो शस्त्र लोहे का बना हुआ नहीं है, वह यह है कि जहां तक तुम्हारी शक्ति हो सके उन लोगों को कुछ खिलाया-पिलाया करो । उनकी बातें सहन किया करो। अपने अंतःकरण को सरल और कोमल रखो और लोगों की योग्यता के अनुसार उनका आदर सत्कार किया करो ॥21॥

जो सम्बन्धी या ज्ञाति के लोग कटु और लघु बातें कहते हैं, उनकी बातों पर ध्यान मत दो और अपने उत्तर से उनका हृदय और मन शान्त करो ॥22॥

जो महापुरूष नहीं है, आत्म-बलवान नहीं है और जिसके सहायक या अनुयायी नहीं है, वह उच्च राजनैतिक उत्तरदायित्व का भार सफलतापूर्वक वहन नहीं कर सकता ॥23॥

समतल भूमि पर तो हर एक बैल भारी बोझ लादकर चल सकता है पर कठिन बोझ लाद कर कठिन मार्ग पर चलना केवल बहुत बढ़िया और अनुभवी बैल का ही काम है ॥24॥

केवल भेद-नीति के अवलम्बन से संघो का नाश हो सकता है। हे केशव! तुम संघों के मुख्य नेता हो या संघों ने तुम्हें इस समय प्रधान के रूप में प्राप्त किया है। अतः तुम ऐसा काम करो जिससे यह संघ नष्ट न हो। बुद्धिमत्ता, सहनशीलता इन्द्रिय-निग्रह और उदाहरता आदि ही वे गुण हैं जो किसी बुद्धिमान मनुष्य में किसी संघ का सफलता पूर्ण नेतृत्व करने के लिये आवश्यक होते हैं ॥25-26॥

हे कृष्ण ! अपने पक्ष की उन्नति करने से सदा धन, वंश और आयु की वृद्धि होती है। तुम ऐसा काम करो जिससे तुम्हारे सम्बन्धियों या ज्ञातियों का विनाश न हो। हे प्रभु! भविष्य सम्बन्धी नीति, वर्तमान सम्बन्धी नीति, शत्रुता की नीति, आक्रमण करने की कला और दूसरे राज्यों के साथ व्यवहार करने की नीति में से एक भी बात ऐसी नहीं है जो तुम न जानते हो ॥27-28॥


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-105


हे महाबाहो ! समस्त अंधक-वृष्णि-यादव, कुकुर और भोज, उनके सब लोग और लोकेश्वर अपनी उन्नति तथा सम्पन्नता के लिये तुम्हीं पर निर्भर करते हैं ॥29॥ 1

श्रीकृष्ण द्वारा ज्ञाति-संघ की स्थापना

श्रीकृष्ण

महाभारत के उपर्युक्त सन्दर्भ (कथा) का सारांश यह है कि - यदुवंश के दो कुलों - अंधक और वृष्णियों - ने एक राजनैतिक-संघ (लीग) स्थापित किया था। उस संघ मे दो राजनैतिक दल थे जिनमें एक की तरफ श्रीकृष्ण और दूसरे की तरफ उग्रसेन थे । कृष्ण दल के जो लोग थे, वे बलवान बुद्धिमान होते हुए भी आलसी और प्रमादी थे। इसीलिये दूसरे दल के मुकाबले में श्रीकृष्ण को वाद-विवाद के समय अधिक दिक्कतें उठानी पड़ती थीं। उनकी पार्लियामेंट या कोन्सिल में खूब वाद-विवाद हुआ करते थे, क्योंकि वह प्रत्येक राजनैतिक काम में प्रभुत्व स्थापित करना चाहती थी । इन्हीं अपनी कठिनाइयों का वर्णन श्रीकृष्ण ने नारद से किया है और नारद ने उन्हें जोर के साथ यही सलाह दी है कि जैसे भी बन सके संघ (फेड्रेशन) को नष्ट न होने दें। अर्थात् संघ को नारद अत्युत्तम समझते थे।

संघ-संचालन के लिए जिन गुणों की आवश्यकता होती है, वे भी उन्होंने श्रीकृष्ण को बताए। हम पहले अध्याय में यह बता चुके हैं कि श्रीकृष्ण प्रजातंत्रवादी विचार के लोगों में से थे और उसी समय में दुर्योधन, जरासंघ, कंस, शिशुपाल आदि साम्राज्यवादी शासक भी मौजूद थे। श्रीकृष्ण का और उनके विरोध का यही मुख्य कारण था। मथुरा के आस-पास कंस ने गौपराष्ट्र, नवराष्ट्र आदि प्रजातंत्रों को नष्ट करके साम्राज्य की नींव डाल दी थी। मगध में जरासंघ ने एक बड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया था। कंस को परास्त करने के बाद श्रीकृष्ण ने यादवों के अनेक प्रजातन्त्री समूहों को श्रृंखलाबद्ध करने के लिए जरासंघ की निगाह से सुदूर द्वारिका में जा के एक ऐसी शासन-प्रणाली की नींव डाली जो प्रजातंत्री भी थी और जिसमें अनेक जातियां शामिल भी हो सकती थीं । इस शासन-प्रणाली को संयुक्त शासन-तंत्र या भोज-शासन-सम्बन्ध कह सकते हैं। इसमें प्रत्येक दल की तरफ से एक प्रेसिडेंट होता था जैसा कि ऊपर के वर्णन से प्रकट है कि अंधकों की ओर से उग्रसेन और वृष्णियों की ओर से श्रीकृष्ण निर्वाचित सभापति या प्रधान थे। हमारे इतिहास से सम्बन्धित बातें जो उक्त सन्दर्भ में निकलती हैं, वे ये हैं-

  • 1. श्रीकृष्ण द्वारा स्थापित जिस संघ का ऊपर वर्णन किया गया है ज्ञाति-संघ कहलाता था,
  • 2. कोई भी राजकुल या जाति इस जाति-संघ में शामिल हो सकती थी,
  • 3. चूंकि यह संघ ज्ञाति-प्रधान था, व्यक्ति-प्रधान नहीं, इसलिए संघ में शामिल होते ही उस जाति या वंश के पूर्व नाम की कोई विशेषता न रहती थी ।

1. उपर्युक्त श्लोकों का अर्थ ‘हिन्दू राज्य तंत्र’ से लिया गया है।

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-106


वह ‘ज्ञाति’ संज्ञा में आ जाता था। हां, वैवाहिक सम्बन्धों के लिए वे अपने वंशों के नाम को स्मरण रखते थे जो कालांतर में गोत्रों के रूप में परिणत हो गए,
  • 4. ज्ञाति के स्थापन से एक बात यह और हुई कि एक ही राज्यवंश के कुछ लोग साम्राज्यवादी विचार के होने के कारण और कुछ लोग प्रजातंत्रवादी मत रखने से दो श्रेणियों में विभाजित हो गए। एक साम्राज्यवादी अथवा राजन्य, दूसरे प्रजातन्त्र वादी (ज्ञातिवादी)। ज्ञाति के विधान तथा नियम और शासन-प्रणाली में विश्वास रखने वाले और उसे देश और समाज के लिए कल्याणकारी समझने वाले लोग आगे चलकर के ज्ञात कहलाने लगे। अर्थात्-ज्ञातवादी ही, ज्ञात, जात अथवा जाट नाम से प्रसिद्ध हुए। इसमें यह प्रश्न किया जा सकता है कि ज्ञाति से सम्बन्ध रखने वाले ज्ञात कैसे कहलाने लगे? इसके लिए प्रत्यक्ष उदाहरण है कि कम्यूनिज्म के मानने वाले कम्यूनिष्ट और शोशलिज्म के अनुयायी शोशलिस्ट कांग्रेस वाले कांग्रेसी, समाजवाद वाले समाजी कहे जाते हैं। पहले भी ऐसा ही होता था। विष्णु के उपासक ‘वैष्णव’, शिव के अनुयायी ‘शैव’ और शक्तियों में विश्वास रखने वाले ‘शाक्त’ कहलाते थे।
  • ज्ञात का उच्चारण हिन्दी और सरल संस्कृत में जात होता है। फिर जिस समय से ज्ञात से जात या जाट आम बोल-चाल में प्रयोग होने लगा, उस समय उत्तर भारत की भाषा संस्कृत मिश्रित पैशाची (प्राकृत) थी। इसलिए वह कोई असम्भव बात नहीं कि तत्कालीन बोलचाल के अनुसार ज्ञात अथवा जात से जट वा जाट हो गया1 और उसी को उत्तर-भारत के प्रसिद्ध व्याकरण रचियता पाणिनि ने जो कि जाटों के पूर्व इतिहास से पूर्णतया परिचित जान पड़ता है, अपने धातुपाठ में जट झट संघाते सूत्र लिखा है।

1. माधुरी वर्ष 4 खण्ड 2 संख्या 3 में आनन्द बन्धु लिखते हैं - हमें इस बात का पूर्ण ज्ञान है कि पंजाबी, हिन्दू-आर्य भाषाओं के मध्य-प्रान्त की भाषा है और यह निरी मिश्रित भाषा ही है। परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि लुन्डा, पंजाबी, पश्चिमी हिन्दी, और सिन्धी यह सारी भाषाएं प्राकृत से निकली हैं । उदहारण के तौर पर देख लीजिए कि संस्कृत शब्द भक्त का अपभ्रंश-प्राकृत के रूप भट्ट है जो पश्चिमी हिन्दी में ज्ञात, सिन्धी से भट कहलाता है। इस प्रकार ये सारी भाषाएं प्राकृत ये निकली हैं ।
प्राकृत भाषा कब प्रचलित हुई इस बात का पूरा पता नहीं। परन्तु यह तय हो चुका है कि संस्कृत भाषा पूर्वकाल में समस्त भारत में कहीं न कहीं बोली जाती थी। जिस प्रकार अंग्रेजी में बोल चाल की भाषा और लिपिबद्ध अंग्रेजी में बहुत भेद है अर्थात् कई शब्द ऐसे हैं जो केवल बोल-चाल में ही व्यवहृत होते हैं लेकिन लिखने-पढ़ने में प्रयुक्त नहीं होते। इसी प्रकार जब संस्कृत भाषा का प्रचार था तो प्राकृत बोल-चाल की भाषा थी। प्राकृत भाषा संस्कृत का रूपान्तर है और शेष सारी भाषाएं प्राकृत से निकली हैं। पृ.366
नोट - बस जैसा संस्कृत भक्त का प्राकृत भट्ट है, उसी भांति संस्कृत ज्ञात का प्राकृत जात अथवा जट्ट है। (लेखक)

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-107


श्रीकृष्ण के इस संघ का अनुकरण कर पूर्वोत्तर भारत में अनेक क्षत्रिय जाति अथवा राजवंशों ने ज्ञाति (संघ) की स्थापना की। पाणिनि ने 5, 3, 114 से 117 तक वाहीक देश के संघों के सम्बन्ध में तिद्धत के नियम दिए हैं। उन नियमों से यही सिद्ध होता है कि आर्य-जाति और राजवंशों के सम्मिलित से संघ स्थापित होते थे। श्री काशीप्रसाद जायसवाल हिन्दू राज्यतन्त्र में लिखते हैं कि - पाणिनि धार्मिक संघों से परिचित नहीं था। उसने अपने व्याकरण में जिन संघों का उल्लेख किया है वे सब राजनैतिक (प्रजातन्त्री) संघ थे।

ऐसे संघ अर्थात् इस तरह की ज्ञाति सबसे अधिक ‘वाहीक’ देश (पंजाब, सिन्ध, गन्धार) में बनी थी। काशीप्रसाद जायसवाल ने ‘वाहीक’ का अर्थ नदियों का प्रदेश माना है जिससे कि हमारे कथन की पुष्टि होती है। महाभारत में शान्तनु के भाई वाल्हीक के देश को ‘वाहीक’ कहा है और वाल्हीक प्रतीक का पुत्र और शान्तनु का भाई बताया गया है। इससे यह मतलब निकलता है कि पंजाब में अधिकांश संघ चन्द्रवंशी क्षत्रियों के थे। बिहार में अथवा नेपाल की तराई में शाक्य और वृजियों तथा लिच्छिवि आदि के संघ थे। यहां एक ऐसे राज्यवंश का भी पता चलता है जो कि अपने लिए ज्ञातृ कहते थे जो कि हमारे ज्ञात शब्द का समान-वाची है जिसमें कि भगवान महावीर पैदा हुए थे।

बिहार और बंगाल में इस समय ज्ञातृ वंश का कुछ भी पता नहीं चलता। जनवरी सन् 32 की गंगा मासिक पत्रिका में त्रिपिटकाचार्य राहुल सांकृत्यायन ने ‘बसाढ़ की खुदाई’ नामक लेख में यह साबित करने की चेष्टा की थी कि बेतिया का राजवंश जथरिया नाम होने के कारण ज्ञातृवंश है। किन्तु चूंकि बेतिया का राजवंश ब्राह्मण, ज्ञातृ लोग क्षत्री थे, इसी आधार को लेकर पं. जगन्नाथ शर्मा एम.ए. ने सांकृत्यायन की धारणा का विरोध किया है। निश्चय ही बिहार के ज्ञातृ भी जाट ही थे जो समय पाकर अधिक संख्या में बसे हुए अपने भाइयों की तरफ पंजाब में आ गए। उधर से उनके पंजाब की तरफ आने का कारण पौराणिक धर्म से संघर्ष भी हो सकता है।

जैसा कि हम ऊपर लिख चुके हैं पंजाब के चन्द्रवंशी क्षत्रिय बाल्हीक कहलाते थे। वेदों में वाहीक व वाल्हीक शब्द आते हैं। पुराणों में भी इनका जिक्र है|


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-108


लेकिन पुराणों ने उनको अच्छे शब्दों में नहीं लिया। इसका कारण यही हो सकता है कि पुराणपंथी प्रजातन्त्र शासन से सन्तुष्ट नहीं थे। धर्म-ग्रन्थों के सम्बन्ध में उनके चाहे जैसे विचार रहे हों, पर इसमें सन्देह नहीं कि वाहीक देश के प्रायः सारे राज्यवंश प्रजातंत्र शासन-प्रणाली के मानने वाले (ज्ञातिवाद) अथवा जाट थे। और वाहीक देश से ही ये मालवा, राजपूताना, अफगानिस्तान, ईरान आदि दूर देशों तक पहुंचे। चीन की तरफ बढ़ने वालों का नाम जिट, जेटा, गात आदि हो गया। अरबी साहित्य में जाट, शब्द के स्थान पर उनके लिए जत नाम शब्द का प्रयोग किया गया है। ईसा से 480 वर्ष पूर्व जरक्सीज ने जाटों की सहायता से यूनान पर धावा किया था। उस धावे में गांधार (जाटों का एक गोत विशेष) अधिक संख्या में शामिल थे।

जाट शब्द की उत्पत्ति के इतिहास और कारणों के सम्बन्ध में, हमारी स्थापना और धारणा के लिए, इतना वर्णन तथा सबूत काफी है। इसके सिवाय दूसरा कोई मत हो ही नही सकता कि जाट ज्ञात के अतिरिक्त कुछ और हैं

जाटों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अन्य इतिहासकारों को जो कल्पनाएं लगानी पड़ी हैं, उनकी समीक्षा करते हुए जाटों की उत्पत्ति-सम्बन्धी वास्तविक इतिहास तथा उत्पत्तिमूलक शब्द का प्रकाश में लाकर भविष्य के इतिहासकारों और अन्वेषकों की इस कठिनाई को सुलझा दिया गया है, जो उन्हें जाट शब्द की खोज के लिए उठानी पड़ती ! हमें यह भी आशा है कि जिन लोगों ने हैरानी के कारण अर्थात् तथ्य तक न पहुंचने की वजह से, कुछ अपूर्ण एवं निराधार धारणाएं बनाई थीं, वे भी हमारी खोजपूर्ण और सही स्थापना से सहमत होंगे।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-109


द्वितीय अध्याय समाप्त

नोट - इस पुस्तक में दिए गए चित्र मूल पुस्तक के भाग नहीं हैं. ये चित्र विषय को रुचिकर बनाने के लिए जाटलैंड चित्र-वीथी से लिए गए हैं.


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