चौधरी चरणसिंह

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Author: Laxman Burdak, IFS (R)
For article in English see Chaudhary Charan Singh
चौधरी चरणसिंह

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जीवन परिचय: चौधरी चरणसिंह

चौधरी चरणसिंह के पिता श्री मीरसिंह और माता श्रीमती नेत्रकौर

जिस व्यक्ति को इस देश की मिट्टी के साथ लगाव है, जो इस देश की जनता की खुशहाली में रूची रखता है और भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के प्रति आस्थावान है उस सच्चे हितैषी का नाम चौधरी चरणसिंह था। कारण यह था कि कृषक व पिछडे वर्ग के लोगों की आबादी का 80.2 प्रतिशत भाग ग्रामीण क्षेत्र में रहता है इसलिए उन्होने यह नारा दिया था- "देश की समृद्धि का रास्ता गांवों के खेतों एवं खलिहानों से होकर गुजरता है।" और इस मार्मिक नारे को उन्होंने पूर्णतया सत्य साबित भी किया था। चौधरी चरणसिंह भारत के उन जननायकों में से थे जिन्होने जिंदगी भर अन्याय, शोषण और अत्याचार के विरुद्ध तथा गरीबी व किसानों के हितों के लिए संघर्ष किया। वे निडरता व साहस के धनी तथा किसानों के हिमायती व प्रखर वक्ता थे। उनकी जीवनी स्कूलों में पढ़ाई जानी चाहिए जिससे आज का युवा वर्ग समझ सके कि हमारे पूर्वजों ने कितने संघर्ष से अधिकार और आजादी प्राप्त की है जिसका उपयोग आज हम कर रहे हैं और हमारा समाज दिनों-दिन प्रगति के राह पर आगे बढ़ रहा है। ऐसे युगपुरूष का जीवन परिचय जानना प्रत्येक किसान व समाज के प्रबुद्ध व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। भारत के राजनैतिक क्षितिज पर अर्द्धशती तक छाये रहने वाले लौहपुरूष चौधरी चरणसिंह का जन्म उत्तरप्रदेश राज्य के मेरठ जिले के नूरपुर ग्राम के एक साधारण किसान (जाट) परिवार में 23 दिसम्बर 1902 का हुआ था। अनके पिता का नाम श्री मीरसिंह और माता का नाम नेत्रकौर था। चौधरी चरणसिंह जी ने छात्रजीवन में सबसे अधिक महात्मा गांधी जी के त्याग, बलिदान व उत्कृष्ट देशभक्ति से प्रभावित होकर महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के प्रगतिशील धार्मिक विचारों को अपने जीवन में अपनाया था और स्वामी जी की विचारधाराओं से प्रभावित होकर ही उन्होंने देश की स्वतंत्रता के आनदोलन में भाग लिया और इस आन्दोलन को सफल बनाने में अपना तन-मन-धन न्यौछावर कर दिया।

चौधरी चरणसिंह का जीवन परिचय कैप्टन दलीपसिंह अहलावत की पुस्तक जाट वीरों का इतिहास, अध्याय 10, (पृष्ठ.940-969) से निम्नानुसार साभार प्रकाशित किया जा रहा है:

चौ० चरणसिंह बड़े बुद्धिमान्, विद्वान्, अर्थशास्त्रज्ञ, प्रवीण राजनीतिज्ञ, कुशल शासक, कर्मयोगी, निडर एवं ईमानदार, निपुण कार्यकर्त्ता, सिद्धान्तों के धनी, स्वाभिमानी, सत्य के पुजारी, भ्रष्टाचार व अन्याय के विरोधी, सरदार पटेल की भांति लोहपुरुष, महर्षि दयानन्द सरस्वती के धार्मिक शिष्य, सच्चे गांधीवादी, भारतवर्ष के किसानों के वास्तविक नेता तथा मजदूरों व गरीबों के मसीहा, महान् देशभक्त एवं भारत माता के सच्चे सपूत थे। वे अपने देश की भलाई में रुचि रखते थे और उनकी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के प्रति श्रद्धा थी। बड़े-बड़े पदों पर रहते हुए भी सरकारी साधनों के व्यक्तिगत प्रयोग के कट्टर दुश्मन रहे। सरकारी विभागों में खर्च की कमी को व्यावहारिक रूप देते रहे, पूंजीपतियों से चन्दा लेने के पक्ष में कभी नहीं रहे। मार्क्सवादी न होते हुए भी मार्क्स के इस कथन के समर्थक रहे कि पूंजी के साथ प्रभाव भी ग्रहण करना पड़ता है। अतः चुनाव प्रचार के लिए धन का अभाव होते हुए भी मिल मालिकों से चन्दा लेने के विरोधी रहे। सिम्पिल लिविंग और हाई थिंकिंग के साक्षात् अवतार, गृहमन्त्री एवं प्रधानमंत्री होते हुए भी अपने बंगले में भी एक कमरे में कालीन बिछाकर बैठते और सामने छोटी मेज रखकर लिखते थे। चौधरी साहब एक साधारण ग्रामीण की भांति खद्दर की धोती, कुर्ता, सिर पर गांधी टोपी और सादी जूती पहनते थे।

राजा नाहरसिंह, बल्लबगढ़

चौधरी चरणसिंह जी का वंश परिचय: चन्द्रवंश में शिवि गोत्र वैदिक कालीन जाट गोत्र है। इसी शिवि गोत्र के जाट भटिण्डा क्षेत्र में आबाद थे। इसी शिवि गोत्र का एक जाट सरदार गोपालसिंह जो कि भटिंडा के निकट गांव तिब्बत (तिरपत) के रहने वाले थे, अपने वंशजों के साथ वहां से चलकर सन् 1705 में बल्लबगढ़ के उत्तर में 3 मील की दूरी पर Sihi गांव में आकर आबाद हो गया। सरदार गोपालसिंह अपनी शक्ति के बल पर बल्लभगढ़ को अपनी राजधानी बनाकर उस क्षेत्र का राजा बन बैठा। राजा गोपालसिंह तथा उसके वंशजों ने यहां आकर अपने शिवि गोत्र के स्थान पर अपने को तिब्बत (तिरपत) गांव के नाम पर तेवतिया प्रसिद्ध कर दिया। फरीदाबाद में उस समय मुग़लों की ओर से मुर्तिज़ा खां हाकिम था। उसने भयभीत होकर गोपालसिंह को फरीदाबाद परगने का चौधरी बना दिया। राजा गोपालसिंह की मृत्यु होने के बाद उसका पुत्र चरनदास इस रियासत का राजा बना और फिर उसका पुत्र बलराम, महाराजा सूरजमल भरतपुर नरेश की सहायता से बल्लबगढ़ परगने का शासक हुआ। यह घटना सन् 1747 ई० की है। बलराम ने बल्लबगढ़ में एक सुदृढ़ किला बनाया और अपने राज्य की शक्ति को बढ़ाया। उसी राजा बलराम के नाम से यह बल्लबगढ़ प्रसिद्ध हुआ। 29 नवम्बर, 1753 में राजा बलराम तेवतिया की मृत्यु हो गई। महाराजा सूरजमल ने उसके पुत्र बिशनसिंह और किशनसिंह को बल्लबगढ़ का शासक बना दिया। वे 1774 तक यहां पर शासक रहे। इसी वंश में वीर योद्धा राजा नाहरसिंह बल्लबगढ़ का नरेश हुआ। सन् 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता युद्ध, जो अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ा गया, के समय राजा नाहरसिंह की शक्तिशाली सेना ने दिल्ली के दक्षिण तथा पूर्व की ओर से अंग्रेजी सेना को दिल्ली में प्रवेश नहीं होने दिया। अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिये। इस पर अंग्रेज सेनापति ने भी कहा “दिल्ली के दक्षिण पूर्वी भाग में राजा नाहरसिंह की जाट सेना के मोर्चे लोहगढ़ हैं, जिनको तोड़ना असम्भव है।” अंग्रेजों ने इस वीर योद्धा राजा नाहरसिंह को


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धोखे से पकड़ लिया और चांदनी चौक में फांसी पर लटका दिया। (पूरी जानकारी के लिए देखो, सप्तम अध्याय, सन् 1858 ई० के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में जाटों का योगदान, प्रकरण।)

राजा नाहरसिंह की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने बल्लबगढ़ पर अधिकार कर लिया और यहां से तेवतिया जाटों का राज्य समाप्त कर दिया। बल्लबगढ़ से जाकर तेवतिया जाटों ने भटौना गांव में भटौना नाम की एक नई रियासत की स्थापना की। यह भटौना गांव जिला बुलन्दशहर में है। इस भटौना से तेवतिया जाटों ने चारों ओर जाकर अपनी वंश वृद्धि की। अब ये जाट तेवतिया के साथ भटौनिया नाम से कहे जाते हैं। क्योंकि इनके 60-70 गांव भटौना गांव से निकल कर बसे थे। (अधिक जानकारी के लिए देखो, नवम अध्याय, तेवतिया/भटौनिया जाटों का बल्लबगढ़ एवं भटौना राज्य, प्रकरण)।

चौधरी चरणसिंह के दादाजी बदामसिंह इसी तेवतिया जाट राज्य घराने के थे जो भटौना गांव में बसे थे। इनका परिवार भटौना में कई वर्ष तक रहा। चौ० बदामसिंह के पांच पुत्र थे जिनके नाम - लखपतिसिंह सब से बड़ा, बूटासिंह, गोपालसिंह, रघुवीरसिंह और मीरसिंह सबसे छोटा था। चौ० मीरसिंह अपने परिवार वालों के साथ भटौना से नूरपुर गांव जिला मेरठ में जाकर आबाद हो गया। उस समय उनकी आयु 18 वर्ष की थी। इसी गांव नूरपुर में 23 दिसम्बर 1902 को चौ० मीरसिंह के यहां एक नूर का जन्म हुआ जिसका नाम चरणसिंह रखा गया1। चौ० मीरसिंह एक गरीब किसान था, जो मकान बनाने में असमर्थ होने के कारण एक छप्पर में रहता था। जब बालक चरणसिंह की आयु 6 वर्ष की थी तब उनके पिता चौ० मीरसिंह को गांव भूपगढ़ी जिला मेरठ में जाना पड़ा। यहां पर चौ० मीरसिंह के यहां चार बच्चे और हुए जिनके नाम - श्यामसिंह, मानसिंह, पुत्री रामदेवी और रिसालकौर थे। ये चौ० चरणसिंह के दो भाई और दो बहनें थीं। इन बच्चों के जन्म के बाद चौ० मीरसिंह को पुनः स्थान बदलना पड़ा और वे अपने परिवार के साथ मेरठ के ही ग्राम भदौला में आ बसे। यह चौ० मीरसिंह की अन्तिम निवास यात्रा थी। इसी गांव भदौला में चौ० मीरसिंह के भाई आबाद थे, वे इनके साथ मिलकर रहने लगे।

चौ० मीरसिंह के पास इस गांव में केवल 15 एकड़ जमीन (मेरठ के एक सौ बीघे) थी, जिसमें से 5 एकड़ जमीन चौ० मीरसिंह के हिस्से में आती थी। यह सामान्य किसान परिवार में पले। अतः गरीबी को और ग्रामीण किसान जीवन को निकट से परखा। बाल्यकाल से पिता के साथ खेती में कार्य किया अतः मिट्टी में लिपटे हाथ और पसीने की कीमत भलीभांति पहचानी।

चौधरी चरणसिंह की शिक्षा प्राप्ति: चौ० चरणसिंह के ताऊ जी लखपतिसिंह इनसे बहुत प्यार रखते थे। अतः इन्होंने ही चौ० चरणसिंह की उच्च शिक्षा का सब खर्च अपने पास से दिया। इनके गांव में स्कूल न होने के कारण इनको निकट के गांव जानी के स्कूल में दाखिल करवा दिया। प्रतिदिन घर जाते तथा कृषि कार्यों में पिताजी के साथ हाथ बंटाते। उस स्कूल से प्राइमरी शिक्षा पास करने पर चौ० चरणसिंह को गवर्नमेन्ट कालिज मेरठ में दाखिल कराया गया। आपने वहां से 1919 में मैट्रिक तथा 1921 में इण्टर की


1. चौ० चरणसिंह की माता जी का नाम श्रीमती नेत्रीदेवी था।


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परीक्षा पास की। सन् 1923 में आगरा कॉलिज से बी० एस० सी० तथा 1925 में एम० ए० (इतिहास) की उपाधि प्राप्त की। तथा एल० एल० बी० की सन् 1926 में उपाधि प्राप्त की।

चौ० चरणसिंह को गरीबों और किसानों के उत्थान एवं उन्नति का ध्यान सदा रहता था। अतः इसी हेतु उन्होंने सन् 1928 में गाजियाबाद में वकालत आरम्भ कर दी। यहां पर आपने किसानों के मुकदमों के फैसले कराये, उनको आपस में लड़ाई झगड़ा न करने और झगड़ों को आपसी बातचीत तथा पंचायती तौर से सुलझाने की शिक्षा दी। उनका किसानहित की दिशा में यह पहला कदम था। यही कार्य चौ० सर छोटूराम जी ने पंजाब में करके किसानों को समृद्ध बनाया।

चौधरी चरणसिंह और पत्नी श्रीमती गायत्रीदेवी

चौ० चरणसिंह का विवाह व सन्तान: हरयाणा प्रान्त के जिला सोनीपत में ग्राम कुण्डलगढ़ी में एक प्रतिष्ठित जटराणा गोत्र के जाट परिवार में चौ० गंगारामजी की पुत्री गायत्री देवी के साथ, 4 जून 1925 को, जब वह एम० ए० की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके थे, चौ० चरणसिंह का विवाह कर दिया गया। श्रीमती गायत्री देवी जालन्धर कन्या विद्यालय की मैट्रिक पास अत्यन्त मृदुभाषी, सुशील और चतुर महिला है। वह चौ० चरणसिंह के गांव में रहकर परिवार का कृषि आदि का प्रत्येक कार्य देखती रही। पढ़े लिखेपन का बनावटीपन उनमें लेशमात्र भी नहीं है। ग्रामीण किसानों की हर समस्या को सुनना और उनके उचित निराकरण का प्रयास करना उनके स्वभाव में निहित है। जब देश के कोने-कोने से आये दल के कार्यकर्त्ता चौधरी साहब से मुलाकात नहीं कर पाते या किसी कारण निराश होकर जाते तो मात्र माताजी गायत्री देवी ही उनकी आशा का केन्द्र होती थी। वह अब तक भी कार्यकर्त्ताओं के बीच घिरी देखी जा सकती हैं। वह अनेकों की समस्याओं को सुलझाती हैं और अनेकों को धैर्य व साहस का पाठ पढ़ाती हैं।

माताजी अपने जीवन में दो बार विधान सभा की सदस्या क्रमशः ईंगलास (जिला अलीगढ़]] और गोकुल (जिला मथुरा) से चुनी गयीं। फिर कैराना (मुजफ्फरनगर) से लोकसभा की सदस्या चुनी गई।

श्रीमती गायत्री देवी ने चौधरी चरणसिंह को ऊंचे पद तक पहुंचाने में अपना आवश्यक योगदान दिया। जीवन के साथी होने के नाते वह अपने पति को प्रामाणिक आवश्यकता पड़ने पर सूचित करती थीं। दो अवसरों पर गायत्री देवी ने चौधरी साहब पर उचित समय पर, उचित निर्णय लेने के लिए, अपना प्रभाव डाला। पहला, जब सन् 1965 में चौ० साहब ने कांग्रेस पार्टी से त्यागपत्र दिया। दूसरे, जब वे देसाई सरकार में वरिष्ठ उपप्रधानमन्त्री एवं आर्थिक (Finance) मन्त्री थे, देसाई सरकार से त्यागपत्र दिया। गायत्री देवी केवल चौधरी साहब की भक्तिपूर्वक पत्नी ही न थी बल्कि उनके प्रधानमन्त्री कार्यों में अपना बड़ा सहयोग प्रदान किया। उसने सदा अपने पति के स्वास्थ्य का ध्यान रखा।

यदि चौधरी चरणसिंह और गायत्री देवी की तुलना महाराजा सूरजमलमहारानी किशोरी से की जाए तो उचित होगा।

श्रीमती गायत्री देवी ने अपनी कोख से चौ० चरणसिंह के घर पांच पुत्रियों और एक पुत्र को जन्म दिया जो सभी शादीशुदा हैं। चौ० चरणसिंह ने अपने आर्यसमाजी सिद्धान्तों के अनुसार अपनी दो पुत्रियों की अन्तर्जातीय शादी कराकर आर्यसमाजी कट्टरपन का परिचय दिया है। स्वयं


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को कभी जातिवाद के घेरे में कैद नहीं किया और अपनी ईमानदारी और नेकनीयती के समक्ष जाति या धर्म को आड़े नहीं आने दिया। यद्यपि देश के कुछ कुत्सित मनोवृत्ति के लोग और निकृष्ट प्रकार के राजनीतिज्ञ उनके ऊपर जातिवाद का आरोप थोपने का पूर्णतया निष्फल प्रयास करते रहे हैं। चौधरी साहब जब गाजियाबाद में वकालत कर रहे तो उनके घर का रसोइया एक सामान्य हरिजन था। वे कहा करते थे कि मुझे जाट जाति में जन्म लेने का गौरव है लेकिन यह मेरी इच्छा से नहीं हुआ। बल्कि ईश्वर की कृपा से हुआ है। मेरे लिए भारतवर्ष में निवास करने वाले सभी जातियों के मनुष्य एक समान हैं। चौधरी साहब को जाट परिवारों से कहीं अधिक यादव, राजपूत, लोधे, कुर्मी, गुर्जर, मुसलमान और पिछड़े वर्ग में अधिक सम्मान प्राप्त था। माताजी गायत्री देवी को सन् 1978 में यादव महासभा के अखिल भारतीय सम्मेलन बम्बई में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया था। यही नहीं, अनेक ब्राह्मण एवं वैश्य परिवारों में जहां जातीय कट्टरपन नहीं है, चरणसिंह जी की एक आदर्शवादी सिद्धान्तनिष्ठ नेता और विचारशील तथा संघर्षशील, राजनैतिक व्यक्ति के रूप में मानो पूजा होती थी।

चौ० चरणसिंह की सबसे बड़ी पुत्री सत्या का विवाह एक विद्वान् प्रो० गुरुदत्तसिंह सोलंकी के साथ हुआ। वह आगरा के पास कस्बा कागारौल के मूल निवासी थे। वह खेरागढ विधान सभा क्षेत्र (जिला आगरा) से उत्तर प्रदेश विधानसभा के एम० एल० ए० चुने गये और इसी सदस्य के रूप में ही उनका मार्च 1984 ई० में निधन हो गया।

डॉ जयपाल सिंह और पत्नी वेदवती, पुत्री चौधरी चरणसिंह, 1959

दूसरी पुत्री वेदवती का विवाह, राम मनोहर लोहिया हस्पताल के एक योग्य डाक्टर जे० पी० सिंह के साथ हुआ। तीसरी पुत्री ज्ञानवती, जो मेडिकल ग्रेजुएट है, सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देकर जेनोआ में अपने पति के पास चली गई। वह आई० पी० एस० अफसर है। चौथी पुत्री सरोज का विवाह श्री एस० पी० वर्मा के साथ हुआ है जो कि उत्तरप्रदेश में गन्ना विभाग में अफसर है। इनका यह अन्तर्जातीय विवाह है।

अजीतसिंह

चौ० चरणसिंह का एक ही पुत्र अजीतसिंह है जिसने यन्त्रशास्त्र विश्वविद्यालय की उपाधि धारण की है। वह अमेरिका में नौकरी करते थे। वहां से त्यागपत्र देकर भारत आ गये और लोकदल के प्रमुख मन्त्री (General Secretary) चुने गये। आप लोकसभा के सदस्य भी हैं।

चौ० चरणसिंह लोकदल के अध्यक्ष थे और हेमवती नन्दन बहुगुणा उपाध्यक्ष थे। चौ० चरणसिंह की भयंकर बीमारी के समय चौ० अजीतसिंह और बहुगुणा के मध्य मतभेद हो गया जिससे लोकदल के दो धड़े हो गये। चौ० चरणसिंह के स्वर्गवास होने पर बहुगुणा को लोकदल अध्यक्ष बनाया गया। परन्तु अजीतसिंह ने अपना अलग लोकदल बना लिया। इस तरह लोकदल दो भागों में विभाजित हो गया। एक का नाम लोकदल (ब) है जिसका अध्यक्ष बहुगुणा है और दूसरे का नाम लोकदल (अ) है जिसका अध्यक्ष चौ० अजीतसिंह है। चौ० अजीतसिंह किसानों का एक नेता है, विशेषकर उत्तरप्रदेश में। उनके भारत के किसानों के योग्य नेता बनने की सम्भावना है।

चौ० अजीतसिंह का विवाह राधिका से हुआ जिनके तीन बच्चे हैं।

चौ० चरणसिंह का राजनीति में प्रवेश

चौ० चरणसिंह ने सन् 1928 में गाजियाबाद में वकालत शुरु की और वहां से सन् 1939 में


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मेरठ आ गये। चौ० साहब सन् 1929 से 1939 तक गाजियाबाद नगर कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे और कई अन्य सेवायें भी कीं। आप सन् 1930 में गोपीनाथ ‘अमन’ के साथ नमक सत्याग्रह में शामिल हो गये और एक बड़े समुदाय का नेतृत्व करते हुये पकड़े गये। यह आपकी प्रथम जेल यात्रा थी जिसमें 6 माह की सजा हुई। जेल में रहकर आपने “मंडी बिल” व “कर्जा कानून” नामक पुस्तकें लिखीं। बाहर आने पर “भारत की गरीबी व उसका निराकरण” नामक बहुचर्चित पुस्तक लिखी। “जमींदारी नाशन कानून” जो लागू हुये, इन्हीं की देन है। उसी समय पंजाब के प्रसिद्ध माल व कृषि मन्त्री चौ० सर छोटूराम आपके सम्पर्क में आये, जिन्होंने इन पुस्तकों के अध्ययन व चरणसिंह जी से विचार मंथन किया तथा अपने मंत्रित्वकाल में कर्जा व मंडी कानून लागू किये। आप सन् 1939 में मेरठ गये और वहां जिला बोर्ड के चेयरमैन चुन लिये गये। उस समय आपने अपने ग्रामीण-क्षेत्रों की सड़कें तथा स्कूलों की हालत ठीक कराई, अनुचित भत्ता लेने वाली प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया, कार्यालय के बाबुओं को समय पर आने के लिये विवश किया और चपरासियों से निजी काम लेने की आदत को छुड़ाया। सारांश यह है कि इस काल में, किसान तथा आम आदमी का भला करना, कार्य प्रणाली में ईमानदारी तथा निष्ठा भावना का समावेश करना, आपके दो विशेष गुण रहे हैं, जिनके लिये वे हमेशा याद किए जायेंगे।

आपने सन् 1939 से 1948 तक मेरठ जिला कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष, महामन्त्री व अध्यक्ष पदों पर रहकर कार्य किया। उस समय आपकी जिले की राजनीति पर धाक थी। अतः पं० गोविन्द वल्लभ पंत के सम्पर्क में आये और उनके काफी नजदीक आ गये।

चौ० चरणसिंह ने गांधी के नेतृत्व में स्वाधीनता की लड़ाई प्रारम्भ की। आप द्वितीय महायुद्ध के आरम्भ में मेरठ सत्याग्रह समिति के मन्त्री चुने गये थे इसीलिए आप समस्त मण्डल के गांवों के दौरे पर निकल पड़े और किसानों को स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के लिये उत्साहित किया। 28 अक्तूबर 1940 को किसानों के एक जत्थे के साथ जिलाधीश निवास पर धरना दिया जिसमें आपको गिरफ्तार किया गया और डेढ़ वर्ष के कारावास की सजा दी तथा जुर्माना किया गया।

अंग्रेज भारत छोड़ो आंदोलन में स्वतन्त्रता प्राप्ति में सक्रिय योगदान दिया, जिसके कारण आपको 8 अगस्त 1942 में 2 वर्ष की सजा मिली और सन् 1944 में छोड़ दिया गया। सन् 1944 में चौधरी साहब के भाई श्यामसिंह व भांजे गोविन्दसिंह को बम केस में गिरफ्तार कर लिया गया। अदालत में मुकदमा चला जिसमें गोविन्दसिंह रिहा हो गया और श्यामसिंह को पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा मिली। चौ० चरणसिंह अपने कार्य तथा लग्नशीलता एवं लोकप्रियता के कारण सन् 1936, 1946, 1952, 1957, 1962, 1968, 1974 में लगातार छपरौली से विधानसभा के लिए चुने गये। 1977 में पहली बार बागपत क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुने गये तथा अन्तिम समय तक इसी क्षेत्र से चुने जाते रहे। आप प्रान्तीय सरकार से लेकर केन्द्रीय सरकार के सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे।

प्रान्तीय सरकार में संसदीय सचिव, सन् 1951 में सूचना तथा न्याय मन्त्री, सन् 1952 में कृषि एवं राजस्व मन्त्री, 1959 में राजस्व एवं परिवहन मंत्री, 1960 में गृह तथा कृषि मंत्री, 1962 में कृषि तथा वन मन्त्री, 1966 में स्थानीय निकाय प्रभारी रहे। किसानों के लिए खून पसीना बहाने


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वाले किसानों के ‘मसीहा’ ने कांग्रेस की किसान विरोधी नीतियों के कारण कांग्रेस से सन् 1967 में त्यागपत्र दे दिया। 3 अप्रैल 1967 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री बने। मध्यवर्ती चुनाव के बाद पुनः सन् 1969 में उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री बने। सन् 1977 से 1978 तक केन्द्र में गृहमंत्री, वित्तमंत्री तथा वरिष्ठ उपप्रधानमंत्री रहे। 28 जुलाई 1979 को केन्द्र में आपके नेतृत्व में साझा सरकार ने शपथ ग्रहण की और इस प्रकार चौधरी साहब देश के पांचवें प्रधानमंत्री बने।

चौ० चरणसिंह किसानों के लिए पैदा हुए, उन्हीं के लिए जिये तथा अन्त में उन्हीं के लिए समर्पित हो गये। उन्होंने किसानों के लिए जमींदारी उन्मूलन तथा भूमि सुधार कानून बनाकर उन्हें शोषण से मुक्त कराया। सहकारी खेती का विरोध किया एवं चकबन्दी की लाभकारी योजना प्रदान की।

इन सब घटनाओं का अगले पृष्ठों पर विस्तार से वर्णन किया जाएगा।

चौधरी चरणसिंह का सक्रिय राजनीतिक जीवन: सन् 1936 में जब अंग्रेजों ने परिषद् के चुनाव कराये तो चौ० चरणसिंह, खेकड़े के एक बड़े जमींदार चौधरी दलेराम, जो अंग्रेज समर्थित था, के विरुद्ध छपरौली (जिला मेरठ) चुनाव क्षेत्र से मैदान में उतरे तथा अपने विरोधी की जमानत जब्त कराकर विजयी हुये। आप इसी क्षेत्र से लगातार सन् 1977 तक 40 वर्ष उत्तर प्रदेश असेम्बली के सदस्य रहे और इस तरह से भारतवर्ष में एक रिकार्ड स्थापित किया। सन् 1936 के चुनाव में भारतवर्ष के कई प्रान्तों में कांग्रेस सरकार स्थापित हुई, किन्तु अंग्रेजों के विरोध के फलस्वरूप तमाम कांग्रेस सरकारों ने इस्तीफे दे दिये।आप सन् 1936 में विधान मंडल के गैर सरकारी सदस्य के रूप से उत्तर प्रदेश के राजनैतिक रंगमंच पर उतरे। सन् 1946 में धारा सभाओं के चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पं० गोविन्द वल्लभ पंत ने श्री चन्द्रभान गुप्त, सुचेता कृपलानी, लालबहादुर शास्त्री के साथ चौ० चरणसिंह को भी सचिव बनाया। चौधरी साहब सन् 1948 से 1956 तक प्रान्तीय कांग्रेस पार्टी के जनरल सेक्रेट्री रहे और 1946 से अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे और 1946 से 1951 तक स्टेट पार्लियामेन्ट्री बोर्ड के सदस्य रहे। चूंकि 1950 में चरणसिंह जी अपनी समस्त योग्यताओं तथा क्षमता के बावजूद भी केवल अपनी ईमानदारी व स्वाभिमान के कारण स्थापित नहीं हो पा रहे थे, उस समय प्रदेश की राजनीति श्री पुरुषोत्तम दास टण्डन तथा उनके अनुयायियों चन्द्रभानु गुप्त तथा मोहनलाल गौतम के हाथ में थी, जिनके नाम को जनता ईमानदारी के साथ भूल से भी नहीं जोड़ सकती थी, अतः चौधरी साहब की उनसे पटरी बैठाने की उम्मीद करना भी गलत था।

सन् 1951 में चौ० चरणसिंह को प्रथम बार सूचना व न्याय मंत्री के रूप में मंत्रीमण्डल में आने का अवसर प्राप्त हुआ। जब 1952 में भारतीय गणराज्य के प्रथम चुनाव हुये और नया मंत्रिमण्डल बना तो श्री पंत केन्द्र में गृहमंत्री होकर चले गए और डा० सम्पूर्णानन्द उ० प्र० के मुख्यमंत्री बनाये गये तो चौ० चरणसिंह को कृषि एवं राजस्व मंत्रालय दिया गया। किन्तु वह निर्भीक स्पष्टवादी व स्वाभिमानी होने के कारण डा० सम्पूर्णानन्द जैसे सबल अहमयुक्त व्यक्ति के कतिपय विचारों से सहमत न हो सके और कुछ समय के बाद मंत्रीमण्डल से त्यागपत्र दे दिया।

सन् 1957 में चुनाव हुए। आपके विरोध में आपके खानदानी भतीजे चौ० विजयपालसिंह


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एडवोकेट को खड़ा कर दिया गया जो जाटों के बड़े प्रिय और पुराने एम० एल० ए० थे। किन्तु विजय चौधरी जी की हुई। चन्द्रभानु गुप्त मंत्रीमण्डल में 1959 में आपको राजस्व एवं परिवहन मंत्री, 1960 में गृह तथा कृषि मंत्री मनाया गया सन् 1962 में चौ० चरणसिंह सुचेता कृपलानी मंत्रिमण्डल में कृषि तथा वन मंत्री रहे। लेकिन इसी दौरान में अपने व्यक्तित्व के कुछ गुणों के कारण जनवरी 1959 में नागपुर में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में नेहरू जी से किसानों के हित में संघर्ष कर बैठे तथा सहकारी खेती प्रस्ताव को पास न होने दिया। वापिस आकर त्यागपत्र दे दिया। लगभग डेढ़ वर्ष तक मंत्रीमण्डल से पृथक् रहे।

चौधरी चरणसिंह राज्यपाल विश्वनाथदास से मुख्य मंत्री की शपथ गृहण करते हुये, 3.4.1967

चौ० चरणसिंह मुख्यमंत्री बने: सन् 1967 में जब सारे देश में कांग्रेस का बुरा हाल हो गया तब उत्तरप्रदेश में भी मात्र बहुमत प्राप्त कर सकी थी। उसी नेता पद के चुनाव हेतु चन्द्रभानु गुप्त के विरोध में चौ० चरणसिंह मैदान में जम गये किन्तु कांग्रेस हाईकमांड के अनुरोध पर अपना नाम वापिस ले लिया, किन्तु कुछ ऐसे चेहरों को मंत्रीमण्डल में शामिल न करने की शर्त रखी जो उस समय जनता की निगाह में भ्रष्ट तथा बेईमान साबित हो चुके थे। उनमें से अधिकांश मुख्यमंत्री श्री गुप्त के दाएं-बाएं हाथ थे, अतः बाद में उन्हें मंत्रीमंडल में स्थान दिया गया और चौ० चरणसिंह की शर्त को महत्त्व न दिया। इस प्रकार स्वाभिमानी नेता ने जब यह अनुभव किया कि अब प्रदेश कांग्रेस भ्रष्टाचारियों, कालाबाजरियों और उनके चाटुकारों के हाथों की कठपुतली बनती जा रही है तथा केन्द्रीय स्तर पर भी कोई ऐसा नेता नहीं जो सत्य को सत्य कहने का साहस करे। अतः चौ० चरणसिंह ने अप्रैल 1967 में कांग्रेस से अपना नाता तोड़ लिया। सौभाग्य से उस समय समस्त विरोधी दलों ने संगठित होकर चौधरी साहब से नेतृत्व करने का अनुरोध किया, तभी 16 अन्य वरिष्ठ कांग्रेस विधायक कांग्रेस से त्यागपत्र देकर चौधरी साहब के साथ जुड़ गये और कांग्रेस के गुप्ता मंत्रीमण्डल का पतन हो गया। चौ० चरणसिंह को प्रथम बार प्रदेश का मुख्यमंत्री 3 अप्रैल 1967 को बनाया गया। किन्तु अपने स्वाभिमान के गुणों को वह छुपा न सके और दलों की आपसी खींचातानी से तंग आकर अपना तथा मंत्रीमण्डल का त्यागपत्र राज्यपाल को 17 फरवरी 1968 को प्रस्तुत करते हुए नये चुनाव कराये जाने की सिफारिश की।

अप्रैल 1967 में ही कांग्रेस से त्यागपत्र देकर अपने एक नये दल जन कांग्रेस की स्थापना की जिसमें 16 विधायक थे। किन्तु आपकी सिफारिश पर जब 1969 में मध्यावधि चुनाव कराये गये उससे पूर्व ही आपने जन कांग्रेस से भारतीय क्रांति दल (BKD) नामक संगठन को जन्म दिया और आपकी प्रतिभा के संबल पर ही इस दल को विधान सभा में 101 स्थान प्राप्त हुए। यह उनकी बढ़ती हुई लोकप्रियता का ज्वलंत उदाहरण था। इस समय कांग्रेस दो धड़ों ‘इण्डीकेट’ व “सिण्डीकेट” में बंट गयी और मौकापरस्त तथा पूंजीपतियों के एजेण्ट चन्द्रभानु गुप्त के अनेक अनुरोधों तथा चालों के बावजूद भी चौधरी साहब ने उनके साथ सरकार नहीं बनाई। अतः आपने इंदिरा गुट के साथ मिलकर सरकार बनाई। उस सरकार के मुख्यमंत्री तथा गृहमंत्री भी आप ही थे। अतः इंदिरा गुट के प्रदेश के नेता कमलापति त्रिपाठी के पुत्र लोकपति द्वारा एक नाबालिग हरिजन कन्या रजिया (12 वर्षीय) के साथ बलात्कार करने के बाद जब उसे कत्ल करा दिया गया और उस केस को दबाने के लिए चौधरी साहब पर दबाव डाला गया तो वह स्वाभिमानी व्यक्तित्व मंत्रीमंडल को दुत्कार कर अलग हो गये। इस प्रकार अगस्त 1970 में चौ० चरणसिंह के मुख्यमन्त्री पद से त्यागपत्र के साथ ही यह संयुक्त मंत्रीमंडल भंग हो गया।


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चौ० चरणसिंह ने कांग्रेस के भ्रष्ट शासन को देश से उखाड़ फेंकने का विचार किया जिससे देश का उत्थान हो सके। इसी उद्देश्य के मातहत आपने अपने राजनैतिक ध्रुवीकरण के चक्र को आगे बढ़ाया और इसी के प्रतिफलस्वरूप 29 अगस्त, 1974 को आपका स्वप्न कुछ अंशों में पूरा हुआ जब भारतीय क्रांति दल में स्वतन्त्र पार्टी, संसोपा, उत्कल कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दल, किसान मजदूर पार्टी तथा पंजाब खेतीबाड़ी यूनियन, इन सात दलों को मिलाकर भारतीय लोकदल नामक दल को जन्म दिया। चौधरी साहब को सर्वसम्मति से इस दल का अध्यक्ष बनाया गया तथा श्री पीलू मोदी, राजनारायण, बलराज मधोक, रामसेवक यादव, बीजू पटनायक, चौधरी देवीलाल, चौ० चांदराम, प्रकाशवीर शास्त्री, कुम्भाराम आर्य, रविराय और कर्पूरी ठाकुर जैसे जंगजू और जुझारू नेता इस दल के साथ जुड़ गये। इसके बाद चौधरी साहब विरोधी दल के नेता के रूप में विधान सभा की गरिमा बढ़ाते रहे और आपकी लोकप्रियता उत्तर प्रदेश के कोने-कोने के बाद हरयाणा, पंजाब, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, जम्मू कश्मीर से लेकर समग्र भारत में फैलती गयी और देश के किसान आपके व्यक्तित्व से जुड़ते चले गये और आप ही किसानों के सच्चे नेता माने गये।

जब गुजरात से नौजवान विद्यार्थियों ने एक आंदोलन को जन्म दिया और यह प्रलय की ज्वाला बिहार से लेकर सारे देश में फैली तो भारतीय लोकदल (भालोद) ने अपनी अग्रणी भूमिका का पालन किया। उत्तर भारत में बाबू जयप्रकाशनारायण के बाद दूसरा चौ० चरणसिंह का ही नाम था जो इस आन्दोलन में हर व्यक्ति की जबान पर था। यदि सच पूछा जाये तो आज तक के परिवर्तन के सूत्रपात करने का श्रेय मात्र भालोद और उसके नेता चौधरी चरणसिंह को ही प्राप्त है। क्योंकि यदि जब श्री चरणसिंह, राजनारायण को बल देकर राजनीति के आसन पर न बिठाते तो हाईकोर्ट में इन्दिरा का पिटीशन भी न जाता और इन्दिरा पिटीशन न हारती तो आपात स्थिति भी लागू न होती और वह लागू न होती तो जनता पार्टी के गठन के लिए परिस्थितियां पैदा न होतीं, न ही सरकार बनने की यह स्थिति पैदा होती। अतः चौधरी चरणसिंह का व्यक्तित्व और राजनारायण का कृत्य आज तक हुए परिवर्तन के जनक हैं। इसी प्रकार जनता पार्टी के गठन के लिए चौ० चरणसिंह ने अपने दल का हर बलिदान स्वीकार करके तथा अपनी प्रतिष्ठा को दांव पर लगा करके भी भूमिका तैयार की और उसे पूरा कराया।

चौ० चरणसिंह की सन् 1937 से 1967 तक जनता की सेवायें

चौ० चरणसिंह 1937 में विधानसभा के लिये निर्वाचित हुए और 1967 तक कांग्रेस में रहे। इस दौरान आपने उत्तर प्रदेश में अनेक विभागों में कार्य किया और जनसेवा को अपना प्रमुख लक्ष्य माना। आपकी विभिन्न विभागों में रहकर की गयी सेवाओं का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है -

(क) कृषि एवं राजस्व मन्त्री

  • 1. चौधरी साहब ने सन् 1939 में ऋण विमोचन विधेयक पास कराया, जिससे किसानों के खेतों की नीलामी बच गई और सरकार के ऋणों से किसानों को मुक्ति मिली।
चौधरी सर छोटूराम ने पंजाब में ऐसा ही कानून बनाकर लाखों किसानों को लाभ पहुंचाया। सर छोटूराम ने साहूकारों के ऋणों से पंजाब के किसानों व गरीबों को मुक्त

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कराया और उनकी प्रत्येक सम्पत्ति को कुर्क होने से बचाया तथा अन्य कई प्रकार के लाभ किसानों को कानून द्वारा दिये।
  • 2. सन् 1939 में ही चौ० चरणसिंह ने किसान सन्तान को सरकारी नौकरियों में 50% आरक्षण दिलाने के पक्ष में लेख लिखे; कांग्रेस दल की बैठकों में प्रस्ताव रखा, लेकिन तथाकथित राष्ट्रवादी कांग्रेसियों के विरोध के कारण, इस उद्देश्य में सफलता नहीं मिली। वे निरन्तर किसान के हित में सोचते थे। उनका “आर्थिक दर्शन” (पुस्तक) इस बात का ज्वलन्त प्रमाण है।
नोट - सन् 1961 में की गई जांच के अनुसार भारतवर्ष में कुल 1347 आई. सी. एस. (ICS) और आई. ए. एस. (IAS) में केवल 155 यानी 11.5% किसान वर्ग के थे।
  • 3. सन् 1939 में ही चौधरी साहब ने कांग्रेस विधायक दल के सामने एक प्रस्ताव रखा था कि सरकारी नौकरी के लिए साक्षात्कार के समय हिन्दू उम्मीदवारों से जाति न पूछी जाय, केवल पूछा जाय कि वह अनुसूचित जाति का है अथवा नहीं? आपका यह कार्य इस बात का प्रतीक है कि वे हरिजन तथा अनुसूचित जाति के लोगों की उन्नति के प्रश्न पर केवल सैद्धान्तिक दृष्टि से नहीं, वरन् व्यावहारिक स्तर पर सोचते रहे हैं। हिन्दुओं में ऊंच-नीच के भेद मिटाने के उद्देश्य से, आपने पं० नेहरू को पत्र लिखा था और इसकी व्यवस्था करने का आग्रह किया था कि सरकारी सेवाओं में प्रवेश की एक शर्त हरिजन कन्या से विवाह करना लगाई जाए।
  • 4. दिसम्बर 1939 में आपने भूमि उपयोग बिल तैयार किया जिसके अन्तर्गत प्रदेश के किसानों को इज़ाफा लगान तथा बेदखली के अभिशाप से मुक्त करने का; कृषि जोतों के स्वामित्व का अधिकार ऐसे काश्तकारों या किसानों को दिये जाने का प्रस्ताव रखा गया, जो सरकारी कोष में वार्षिक लगान के दस गुने के बराबर की रकम अपने भूस्वामी के नाम जमा करने के लिये तैयार थे। धारा सभा के सदस्यों में उसे वितरित कराया। सभा में पेश करने का नोटिस भी दिया गया। बाद में यही प्रस्ताव भूमि सुधार कार्यक्रम का आधार बना। यह उद्देश्य 1939 में पूरा न होकर सन् 1952 में हुआ जब “जमींदारी उन्मूलन अधिनियम” पास कराने में सफल हुए थे। “जमींदारी उन्मूलन” से उत्तर प्रदेश के किसानों को अनुमान से भी अधिक लाभ चौधरी साहब की कृपा से हुआ।
  • 5. सन् 1939 में ही चौधरी चरणसिंह ने एक प्राईवेट मेम्बर के तौर पर विधान सभा में एक “कृषि उत्पादन मार्केटिंग बिल” (Agriculture Produce Marketing Bill) प्रवेश किया। उन्होंने एक लेख जिसका नाम “Agriculture Marketing” था, लिखा, जो कि 31 मार्च, 1932 के Hindustan Times of Delhi में छपा था। इसका उद्देश्य किसानों की पैदावार को व्यापारियों (महाजनों) द्वारा की जाने वाली मनमानी लूट से बचाना था। यह सभी प्रान्तों ने अपना लिया। परन्तु सर छोटूराम ने पंजाब में यह सबसे पहले लागू किया। उत्तर प्रदेश में यह कानून सन् 1964 में चौधरी साहब के प्रयत्न से लागू हुआ। इस उपाय का, जो कि किसानों के लिए लाभदायक था, व्यापारी वर्ग तथा

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शहरी तत्त्वों ने यह दलील देकर दृढ़ता से विरोध किया, कि चूँकि किसान धनवान एवं शिक्षित हैं, अतः वे व्यापारियों के विपरीत स्वयं अपना बचाव कर सकते हैं इसलिए यह उपाय अनावश्यक है।

भूमि सुधार के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश ने सारे राष्ट्र को मार्ग दिखाया इस सन्दर्भ में सभी उपलब्धि जो चौधरी साहब के द्वारा हासिल की गई, की विस्तृत विवेचना करना सम्भव नहीं किन्तु संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत है –
  • 6. 1 जुलाई 1952 को कानून संग्रह में शामिल “जमींदारी उन्मूलन भूमि सुधार अधिनियम” के अन्तर्गत, हालांकि उत्तर प्रदेश के सभी मैदानी भागों की सब भूमि का स्वामित्व सरकार के हाथों चला गया, फिर भी सभी पुराने भू-स्वामियों या जमींदारों को भूमिधर घोषित किया गया। तदनुसार उन्हें स्वयं करने वाली खेती तथा उससे सम्बद्ध कुंआं, वृक्ष, मकान आदि पर उसका अधिकार हो गया। इस प्रकार सभी काश्तकारों को उन जोतों का “सीरदार” घोषित किया जिन्हें वे जोत रहे थे। उन्हें कृषि कार्यों बागवानी तथा पशुपालन के लिए भूमि उपयोग का पूरा अधिकार दिया गया, किन्तु हस्तान्तरण का अधिकार सीरदारों को नहीं मिला, किन्तु अपने लगान का दस गुना के बराबर की रकम सरकारी खाते में जमा कर दी थी, उनको लगान में 50% कटौती का हकदार बनाया गया और उनकी तरक्की करके “भूमिधर” का दर्जा दिया गया। यह योजना राष्ट्रीय स्तर पर अपना ली गई।
  • 7. ऐसे सभी ग्रामवासियों को जो काश्तकार थे, श्रमिक, शिल्पी थे, को अपने मकानों, कुओं तथा आबादी में अपने वृक्षों से संलग्न भूमि का स्वामी घोषित किया गया, जिसकी कोई कीमत उन्हें नहीं देनी पड़ी। इस योजना से तमाम गरीब खेतीहर मजदूर व हरिजन, जमींदारों के बेदखली के डण्डे से बच गये। कृषि योग्य भूमि को छोड़कर शेष भूमि सरकार ने अपने नियन्त्रण में लेकर ग्राम पंचायतों को उनका विकास व प्रबन्ध करने की जिम्मेदारी सौंप दी तथा “ग्राम समाज पुस्तिका” प्रकाशित करके ग्राम पंचायतों के अधिकार, कर्त्तव्य भी व्यवस्थित कर दिए। इस प्रकार सामन्तवाद के सभी बन्धनों से ग्रामों को मुक्त कर दिया गया। यह क्रान्तिकारी परिवर्तन देश के लिए कम्युनिज्म के समान एक नया चमत्कार था, जो चौ० चरणसिंह द्वारा किया गया था।
  • 8. पुनः अपनी गहन अध्ययनशीलता के आधार पर चौ० चरणसिंह जी को यह महसूस हुआ कि पुराने जमींदार पुनः जमीन खरीदकर या अन्य गलत तरीकों से अपने पास संग्रहीत कर लेंगे। अतः यह प्रावधान किया कि भविष्य में किसी भी परिवार के पास (पति-पत्नी व नाबालिग बच्चे) 12.5 एकड़ से अधिक भूमि नहीं रखी जायेगी तथा जब भी किसी विभाजन के मुकदमे में कचहरी के समक्ष रखी गई जोत का आकार 3¼ एकड़ से अधिक न होगा, कचहरी उसे विभाजित करने की बजाय उसे बेचकर उसकी आय का बंटवारा करने को निर्देशित करेगी।
  • 9. कारखाने, स्कूल, अस्पताल या अन्य सार्वजनिक स्थान के आधे मील की परिधि में कोई जोत के अयोग्य भूमि उपलब्ध है तो कृषि योग्य भूमि को अधिगृहीत नहीं किया जा सकेगा। लगभग 15 वर्ष बाद भारत सरकार ने भी इस नियम का अनुसरण किया।

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  • 10. शहरी क्षेत्रों में जर-ए-चहरूम की प्रथा भी चौधरी साहब ने ही समाप्त की, तदनुसार भू-स्वामी या पट्टादाता क्रेता या विक्रेता से उसकी कीमत का एक-चौथाई भाग वसूल करता था, समाप्त हो गया।
  • 11. जमींदारी उन्मूलन तथा भू-स्वामी काश्तकार सम्बन्धों की समाप्ति और सारे राज्य में कृषि की समानता लाये जाने से अब जोतों की चकबन्दी का कार्य आसान हो गया था। अतः चौधरी साहब ने अविलम्ब इसके लिये कानून बना दिया और कर्मचारियों के प्रशिक्षण की व्यवस्था कर दी किन्तु कुछ समाजवादियों व कांग्रेसियों ने इसका डटकर विरोध किया तथा 1959 में चौ० चरणसिंह के त्यागपत्र के बाद मुख्यमन्त्री सम्पूर्णानन्द ने इसे रद्द कर दिया। किन्तु एक माह के बाद ही राष्ट्रीय योजना आयोग ने इस योजना को स्वीकार किया और सारे देश में लागू कर दिया। 1948 के कृषि आयकर अधिनियम को चौधरी साहब ने रद्द कर दिया। इसके स्थान पर बड़ी कृषि जोतों के कराधान का अधिनियम बनाया जो कि किसानों के लिये वरदान सिद्ध हुआ क्योंकि भ्रष्टाचार व परेशानी से वे बच गये तथा बेईमान बड़े किसानों के लिए आयकर चोरी का रास्ता बन्द हो गया। इस प्रणाली में बागवानी आदि को मुक्त कर वृक्षारोपण का रास्ता खुला रखा गया।
  • 12. एक ओर जमींदारी उन्मूलन व भूमि सुधार अधिनियम लागू किया जा रहा था, दूसरी तरफ प्रदेश के 28,000 पटवारी जो मालगुजारी प्रशासन की आवश्यक कड़ी थे, वेतन वृद्धि तथा अन्य सुविधाओं के लिये आन्दोलन कर रहे थे। चौ० चरणसिंह ने उन्हें सलाह दी कि जनहित में कुछ समय के लिए आन्दोलन वापिस ले लें या त्यागपत्र दे दें। इस पर जनवरी 1953 में सभी पटवारियों ने सामूहिक रूप से त्यागपत्र दे दिया। चौधरी जी ने स्थिति से निपटने के लिए त्यागपत्र स्वीकार कर लिये और ‘लेखपाल’ नाम से नयी नियुक्तियां कर दीं जिसके लिए उन्हें अनेकों विरोधों का सामना करना पड़ा। किन्तु इसका परिणाम यह हुआ कि आगामी 13 वर्ष तक प्रदेश में कोई सरकारी कर्मचारी हड़ताल पर नहीं गया।
  • 13. 1954 में कानून संग्रह में भूमि संरक्षण अधिनियम को शामिल किया तथा कानपुर के राजकीय कृषि महाविद्यालय के दो वर्ष के स्नाकोत्तर पाठ्यक्रम में एक पृथक् विषय के रूप में शुरु कर चौधरी साहब पुनः देश के अगुआ बने।

उत्तर प्रदेश में किये गये क्रांतिकारी भूमि सुधारों की सफलता का मूल्यांकन विख्यात कृषि विशेषज्ञ श्री वुल्फ लेजेन्सकी, जिन्हें फोर्ड फाउण्डेशन ने भारत के गहन कृषि कार्यक्रम वाले जिलों का अध्ययन करने भारत भेजा था, के इन शब्दों से किया जा सकता है-

“भूमि सम्बन्धी नियम केवल उत्तर प्रदेश में ही सुस्पष्ट और विस्तृत बनाये गये हैं और प्रभावकारी तरीके से इन्हें लागू किया गया है। वहां लाखों काश्तकारों और उप काश्तकारों को स्वामी बना दिया गया और हजारों ऐसे लोगों को जिन्हें बेदखल कर दिया गया था, उनके अधिकार वापस दिलाये गये।” (पृष्ठ 3 रिपोर्ट प्रेषित योजना आयोग 1963)|

प्रधानमन्त्री श्री जवाहरलाल नेहरु के सहकारी कृषि प्रस्ताव का विरोध

जनवरी, 1959 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का वार्षिक अधिवेशन नागपुर में स्थापित


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हुआ। उस अवसर पर पं० जवाहरलाल नेहरू ने सहकारी कृषि योजना एवं खाद्यान्न का सरकारी व्यापार का प्रस्ताव रखा। उस अधिवेशन में चौ० चरणसिंह, जो उस समय उत्तरप्रदेश के कांग्रेस मंत्रीमण्डल में राजस्व एवं परिवहन मन्त्री थे, भी उपस्थित थे। चौधरी साहब ने इस प्रस्ताव का बड़े साहस से तर्कानुसार जोरदार शब्दों में खण्डन करके प्रधानमन्त्री नेहरू को हिला दिया। नागपुर कांग्रेस के इस ऐतिहासिक अधिवेशन की इस घटना की सूचना चौ० चरणसिंह के विषय में पहली बार राष्ट्रीय समाचार पत्रों के शीर्षक में छपी थी। चौ० चरणसिंह ने सहकारी कृषि करने तथा खाद्यान्न का सरकारी व्यापार के विषय में इस कांग्रेस अधिवेशन में दलील देकर एक जोरदार भाषण दिया जिसने नेहरू और उसी जैसे विचार वाले कांग्रेसियों के इस प्रयत्न को नकारा कर दिया। चौधरी साहब ने वहां पर उपस्थित कांग्रेसी प्रतिनिधियों को सूचित किया कि भूमि को इकट्ठा करने और मजदूरों द्वारा खेती करवाने से पैदावार नहीं बढ़ेगी। अतः यह दोनों योजना हमारे प्रजातन्त्रीय जीवन के विरुद्ध दुष्कर और असफल हैं।

पहले वाली योजना से पैदावार घटेगी और दूसरी से जनता के पैसे की फजूल बरबादी एवं भ्रष्टाचार होगा। नेहरू की उपस्थिति में चौ० चरणसिंह के इस मत तथा साहसी एवं स्पष्ट वर्णन के कारण उनको 1959 में उत्तरप्रदेश मन्त्रीमण्डल से त्यागपत्र देना पड़ा था। लेकिन वे देश एवं किसानों की भलाई के लिए यह ठोस कदम उठाने में बिल्कुल नहीं हिचकिचाए। यह चौ० चरणसिंह की ही निडरता तथा योग्यता थी कि जिसके सामने बोलने तक की किसी की हिम्मत नहीं थी। नेहरू के उस प्रस्ताव को पास नहीं होने दिया जिससे भारतवर्ष के किसानों की भूमि को उनके पास से छीनी जाने से बचा दिया, जिसके वे मालिक थे। ऐसा करने से चौ० चरणसिंह किसानों के ‘मसीहा’ कहे जाने लगे तथा राष्ट्रीय स्तर के चोटी के नेताओं की श्रेणी में आ गये।

सहकारी कृषि योजना के अनुसार भूमि के वास्तविक मालिक किसान, मजदूरों के तौर पर कृषि कार्य करते और उनके ऊपर सरकारी प्रबन्धकर्त्ता गैर किसान विद्वान् अफसर होते। खेती की पैदावार सरकार के हाथों में आ जाती। समय के अनुसार किसानों की भूमि सरकार के अधीन हो जाती।

सन् 1959 के बाद कई प्रधानमन्त्री, खाद्य मन्त्री तथा कृषि मन्त्री भारत सरकार में रहे, किन्तु आज तक भी देश में सहकारी कृषि एवं अन्न का सरकारी व्यापार का कार्य लागू नहीं हो सका है। इसका श्रेय चौ० चरणसिंह को है।

चौ० चरणसिंह ने भूमि सुधार के विषय में देश को मार्ग दिखाया तथा अग्रसर रहे। वे भूमि सुधार कानूनों के विषय में उत्पादक थे तथा उत्तरप्रदेश में जमींदारी समाप्त कानून बनाने में अपूर्व बुद्धि के मनुष्य थे और उन्होंने इनकी इतनी चतुराई से रूपरेखा तैयार की कि न्यायाधीशों द्वारा एक भी नियम अयोग्य नहीं ठहराया गया। चौधरी साहब हड़तालों के विरुद्ध थे तथा चाहते थे कि प्रत्येक कर्मचारी कारखानों में या बाहर मेहनत से काम करे और धर्मनिष्ठा से अपने कर्त्तव्य का पालन करे। वे सरकारी कर्मचारियों के उपद्रव तथा अनुशासनहीनता को सहन नहीं कर सकते थे। ऐसी हालत में वे कठोरता से व्यवहार करते थे। उनके लम्बे समय तक राजनीतिक पद पर रहने के दौरान में कोई भी व्यक्ति या उनका विरोधी भी उनको दोषी नहीं बता सकता, यह उनके उच्च चरित्र के लिए कितना बड़ा उपहार है।

चौ० चरणसिंह की जनता व बुद्धिमानों में बड़ी प्रसिद्धि है। इसका प्रमाण फरवरी 1967 में


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हुए उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में उनकी बड़ी भारी जीत है जिसमें उन्होंने अपने समीप प्रतिद्वन्द्वी को 52,000 से भी अधिक मतों से हराया। यह भारतवर्ष में अब तक हुए चार विधानसभा के चुनावों में सबसे अधिक मतों वाली विजय थी।

चौ० चरणसिंह द्वारा जनता सरकार में केन्द्रीय गृहमन्त्री रहकर ग्रामीण विकास

चौ० चरणसिंह, केन्द्रीय गृहमन्त्री होते हुए भी, ग्रामीण विकास के प्रधान उद्देश्य से पृथक् नहीं रहे। अगली पंचवर्षीय योजना का प्रारूप तैयार कराने में चौधरी साहब ने विशेष रुचि दिखाई और 33% गांवों के लिए बजट में व्यवस्था कराई। किसानों के लिए हर सम्भव लड़ाई, मन्त्रीमण्डल में रहकर भी वे लड़ते रहे और मात्र इन्हीं सवालों पर मतभेद के कारण मन्त्रीमण्डल से पृथक् होना पड़ा। सन् 1977 में जनता पार्टी के विधिवत् गठन के बाद, जिसके अध्यक्ष श्री चन्द्रशेखर बनाये गये थे, प्रथम बैठक में चौ० चरणसिंह ने देश विदेश की कृषि व्यवस्था का गहन अध्ययन कर एक 66 पृष्ठ का नोट तैयार कर, जनता पार्टी कार्य समिति के समक्ष प्रस्तुत किया, हिसका संक्षिप्तस्वरूप इस प्रकार था -

  1. भारत के लिए सहकारी खेती अनुपयोगी है। अधिक उपज लेने और अधिक रोजगार देने के लिए स्वतन्त्र वैयक्तिक कृषि व्यवस्था को प्रोत्साहन देना चाहिए।
  2. प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने और प्रति एकड़ श्रमिकों की संख्या घटाने की आवश्यकता है, शेष लोगों को अन्य लघु उद्योगों में लगाया जाए।
  3. हमारे यहां जमीन कम है अतः वैज्ञानिक उपकरणों से पैदावार बढ़ाई जाए।
  4. खेती की चकबन्दी अनिवार्य है, अतः मध्यम किस्म के फार्म बनाये जायें। एक व्यक्ति के पास 2.5 एकड़ से छोटी और 27 एकड़ से बड़ी जोत नहीं होनी चाहिए।
  5. भूमि सुधार सख्ती से लागू किए जायें और बड़े भूपतियों को समाप्त किया जाए।
  6. औद्योगीकरण के आइने में पहले कुटीर उद्योग फिर लघु उद्योग और अंततः भारी उद्योग को स्थान मिलना चाहिए।
  7. सम्पूर्ण बजट का 33% कृषि पर व्यय किया जाए
  8. कुल बिजली का 50% गांवों में दिया जाए तथा बिजलीघर शहर व गांव दोनों में समान समान हों।
  9. प्रति 10,000 की जनसंख्या पर गांवों में अनाज गोदाम तैयार किये जायें तथा इन सुरक्षित अन्न भण्डारों के आधार पर 80% तक ऋण दिया जाए, साथ ही बाजार में अन्न्की कीमतें बढ़ने पर, अन्न निकालकर बेचने की स्वतन्त्रता हो।

इसी आधार पर चौधरी साहब ने गांवों में बिजली, पेयजल, सड़क निर्माण आदि कार्यों के लिए मन्त्रीमण्डल में रहकर प्रधानमन्त्री की इच्छा के विपरीत भी अनेक निर्णय कराये और ग्रामीण किसानों व मजदूरों के हित में अनेक निर्णय कराये।

केन्द्रीय वित्त मन्त्री के रूप में भी चौधरी साहब ने ऐसा बजट प्रस्तुत किया कि बड़े उद्योगों पर बड़े-बड़े टैक्स लगाकर और कुटीर व लघु उद्योगों के टैक्स घटाकर सही समाजवादी दिशा में


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देश को बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। वह एक ऐतिहासिक घटना थी जब केन्द्रीय वित्तमन्त्री एवं उपप्रधानमंत्री चौ० चरणसिंह पूंजीपतियों से टक्कर लेने के लिए सीधे मैदान में उतर आए। इसके पीछे उनकी ईमानदारी, आदर्शवादिता और बेबाक निर्णय लेने की अटूट क्षमता ही काम आई। सारे देश के पूंजीपति अपने पर हुए इस हमले से तिलमिला गए और बजट को घोर प्रतिक्रियावादी, जनविरोधी आदि अनेक अलंकारों से अभिहित किया। किन्तु उसके व्यापक प्रभाव हुए और गरीबों तथा किसानों को राहत प्राप्त हुई, क्योंकि उनके उपयोग की खेती एवं किसानों की वस्तुओं पर टैक्स घटा दिए गए थे। इस प्रकार केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में रहकर भी चौधरी साहब ने देहात और गरीब की बात को आगे बढ़ाने का कार्य किया।

इसी प्रकार चौ० चरणसिंह केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में गृहमन्त्री, वित्तमन्त्री और प्रधानमन्त्री के रूप में भी देश में सर्वाधिक चर्चित नेताओं में माने जाने लगे थे। साथ ही उनकी ख्याति एक विचारक किसान नेता और कुशल प्रशासक के रूप में सदैव बनी रही है। यद्यपि राष्ट्रीय रंगमंच पर उतरने के बाद ही उनके यह गुण अधिक प्रखर हुए और सामान्य जन के समक्ष आये।

(ख) चौ० चरणसिंह का उत्तरप्रदेश में गृहमन्त्री रहकर कार्य

चौ० चरणसिंह सन् 1960 में उत्तरप्रदेश कांग्रेस सरकार में 15 माह तक गृहमन्त्री रहे। इस अवधि में आपने पुलिस विभाग के भ्रष्टाचार को कम करने, उसकी कार्यकुशलता को बढ़ाने तथा पुलिस की आन्तरिक समस्याओं को सुलझाने में आपका अपूर्व योगदान रहा है, जो निम्न प्रकार से है -

  • 1. आपने कार्यभार संभालते ही तुरन्त एक आई० जी० को सेवामुक्त कर दिया जो 5 वर्ष से अधिक इस पद पर था जो कि नियम के विरुद्ध था। तथा एक अत्यधिक ईमानदार डी० आई० जी० शरतचन्द्र मिश्रा को गुप्तचर विभाग में अतिरिक्त आई० जी० के पद पर नियुक्त किया।
  • 2. आपने पुलिस विभाग को यह खुला आश्वासन दिया कि सरकारी कार्य में किसी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करें जिसके फलस्वरूप पुलिस के मनोबल व कार्यक्षमता दोनों में वृद्धि हुई और प्रशासन में सुधार हुआ। इस संदर्भ में एक उदाहरण बहुत दिलचस्प है - लखनऊ में हजरतगंज चौराहे पर ट्रेफिक पुलिस ने कुछ छात्रों का चालान नियमों की अवज्ञा तथा सिपाही के साथ अशिष्टता के आरोप में कर दिया। उनमें से एक छात्र राजपत्रित सेवा के लिए चुना गया था जिसके चरित्र की पूर्व जांच पुलिस कर रही थी। तभी उस छात्र को माफ करने के लिए चौधरी साहब के सहयोगियों व अधिकारियों ने भी सिफारिश की, कारण वह एक अनाथ विधवा का पुत्र था। चौधरी साहब का विवेकपूर्ण उत्तर था कि “मैं अपने उन सिपाहियों के पास इसे भेजता हूं जिनके साथ इस छात्र ने हरकत की है। यदि वह सिपाही इसे माफ कर दें तो इसे माफ समझा जायेगा।”
  • 3. दिसम्बर 1961 में पुलिस सप्ताह के सन्दर्भ में बुलाई गई पुलिस अधिकारियों की एक बैठक में चौधरी साहब ने घोषणा की कि वे भविष्य में ऐसा आदेश जारी कर रहे हैं जिससे कचहरियों में पुलिस को झूठी गवाही नहीं देनी होगी तथा पुलिस के सभी उच्च अधिकारियों को आदेश दिया है कि वे किसी थाने का निरीक्षण करने जायें तो अपने

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खर्च को थानेदारों को वहन न करने दें, साथ ही अपने घरों में सिपाहियों द्वारा काम कराने या नियम विरुद्ध कोई सेवा लेने पर भी कड़ी रोक लगा दी है।
  • 4. सभी महानगरों में रेडियो यंत्रयुक्त गश्ती पुलिस की व्यवस्था भी आपने ही कराई जो सर्वप्रथम लखनऊकानपुर से शुरु हुई। इससे नागरिक सुरक्षा में वृद्धि हुई। सब-इन्सपेक्टरों की नियुक्ति के नियमों में भी आपने इस प्रकार परिवर्तन किया कि योग्य व गरीब परिवारों के युवकों को मौका मिल सका। इसी सन्दर्भ में ट्रेनिंग कालिज मुरादाबाद में प्रशिक्षणार्थियों द्वारा जमा करने वाली राशि 1000/- रुपया को रद्द करके मासिक व्यय के लिए 80/- रुपये की व्यवस्था सरकारी स्तर पर कर दी गई।
  • 5. मार्च 1962 में पुलिस बजट प्रस्तुत करते हुए घोषणा की कि अराजपत्रित पुलिस कर्मचारियों के मुठभेड़ में मारे जाने या अन्यत्र कार्यपालन में मृत्यु होने पर उनके उत्तरजीवियों को उसकी पूरी आय (मासिक वेतन वृद्धि सहित) दी जाती रहेगी तथा पेन्शन भी दी जायेगी।
  • 6. आपने थानों में सही रिपोर्ट दर्ज कराने और रिपोर्ट के आधार पर थाने की कुशलता आंकने की व्यवस्था की, जिससे अपराधों की सही स्थिति ज्ञात हो सकी। इसी प्रकार की गलतियों पर बड़े अधिकारियों को अधिक दण्ड देने का प्रावधान किया तथा तरक्की, नियुक्ति व तबादले के सन्दर्भ में किसी भी सिफारिश को पूर्णतः नजरअंदाज करने के लिए कहा। प्रतिफलस्वरूप 1961 में सब-इन्स्पेक्टरों की नियुक्ति के सन्दर्भ में स्वयं आई० जी० पुलिस ने घोषणा की कि इस वर्ष एक भी सिफारिश प्राप्त नहीं हुई।
  • 7. सन् 1962 में मेरठ के एक कांग्रेसी पर मुकदमा चलाने के आरोप में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (जो पूर्णतया उचित था) का स्थानांतरण मुख्यमन्त्री ने कर दिया। बाद में गुप्तचर विभाग ने उस कांग्रेसी को दोषी ठहराया तो मुख्यमण्त्री के निर्णय के विरोध में चौधरी चरणसिंह ने गृहमन्त्रालय से त्यागपत्र दे दिया तथा कहा कि यदि कर्त्तव्यपालन में संलग्न किसी अधिकारी को मैं संरक्षण नहीं दे सकता तो इस पद पर रहने का मेरा कोई औचित्य नहीं है।

(ग) चौ० चरणसिंह द्वारा अन्य विविध विभागों में रहकर कार्य

  • 1. पशुपालन विभाग में रहकर चौ० चरणसिंह ने 1954 में मवेशी अतिक्रमण अधिनियम 1955 को संशोधित किया। उत्तरप्रदेश में गोहत्या निवारण अधिनियम की तैयारी कर उसे 1955 में अधिनियम का रूप दिया। प्रदेश गोशाला अधिनियम तथा 1964 का मवेशी सुधार अधिनियम बनना भी चौ० साहब की उपलब्धि थी। 1953-54 में मवेशी मंडियों के नियन्त्रण के लिए एक विशेष विधेयक तैयार कराया, जो देश के स्तर पर पहला कदम था, किन्तु पंत जी दिल्ली चले गये, चौधरी साहब का विभाग बदल गया, फिर इसे अन्तिम रूप न मिल सका।
  • 2. आपने परिवहन विभाग में रहकर बसों तथा सार्वजनिक वाहनों के संचालन में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के अनेक कार्य किये। एक से अधिक परमिट देने पर रोक लगा दी गई। नाबालिग स्त्री, अपंग व विधवाओं को उपरोक्त स्थितियों में छूट दी गई।

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  • 3. सन् 1958 में वित्त विभाग संभालने पर आप ने सार्वजनिक धन की बर्बादी को रोकने के कारगर उपाय किए। खाद्यान्न व्यापारियों पर लगाये जाने वाले विक्रय की पुरानी प्रणाली को पूर्णतया संशोधित किया।
  • 4. सन् 1958-59 में चार माह के लिए सिंचाई व ऊर्जा विभाग देखा। जब इन क्षेत्रों में भ्रष्टाचार की जांच शुरु की तो आप से विभाग वापिस लिया गया। इसका कारण यह भी था कि चौधरी साहब ने रिहन्ध बांध परियोजना से प्राप्त समस्त विद्युत शक्ति के आधे से अधिक बिजली, बिड़ला परिवारों को अल्यूमिनियम कारखाने के लिए देने का कड़ा विरोध किया, जो मुख्यमन्त्री डा० सम्पूर्णानन्द को अखर गया। जलमार्गों के निर्माण कार्य भी, जिसके कारण करोड़ों रुपये के नलकूप कई वर्ष से बेकार खड़े थे, आप की विशेष उपलब्धि है।
  • 5. आपने वन विभाग में रहकर वनभूमि पर अनधिकृत कब्जे सख्ती से रोके और बेदखली कानून सरल किया। निजी वनभूमि के असंख्य टुकड़े मालिकों को दे दिये तथा प्रशासन योग्य क्षेत्र ही अपने पास रखे। लगभग 1600 वर्गमील जंगल जो कि जिला के प्रशासन से सम्बद्ध थे तथा बेकार हो गये थे, वन विभाग में शामिल कर दिये गये। यमुना, चम्बल की घाटियों को जंगल बनाने की योजना तैयार की, जिसने तमाम उपजाऊ भूमि के कटाव को रोकने तथा अपार वनसम्पदा देने का कार्य किया। 1966 में वन विभाग ने स्वयं सड़कों पर वृक्षारोपण का कार्य किया। जमींदारों के लिये वनों के विकास को द्रुतगामी गति प्रदान की तथा टेहरी क्षेत्र में प्राप्त वनों के संरक्षण का असाध्य प्रश्न जो 15 वर्ष से अनिर्णीत पड़ा था, एक अधिनियम द्वारा हल कर दिया गया।
  • 6. सन् 1970 में चौ० चरणसिंह ने अपने भारतीय क्रान्ति दल (BKD) के साथ इन्दिरा कांग्रेस को मिलाकर उत्तरप्रदेश में संयुक्त मन्त्रिमण्डल बनाया जिसके आप मुख्यमन्त्री थे। उस समय आपने अध्यादेश द्वारा घोषणा की कि शिक्षा संस्थाओं में विवश विद्यार्थी संघ नहीं होगा। ये सब संघ इच्छापूर्वक प्रकार से होंगे। इसके फलस्वरूप कोई हड़ताल न हुई, नकलें न हुईं, लड़कियों के साथ छेड़छाड़ बन्द हो गई और इसके बाद पहली बार शिक्षा संस्थाओं में आजादी से पढ़ाई होने लगी तथा उपस्थिति में वृद्धि हुई। चौ० चरणसिंह को संस्थाओं के अध्यक्षों की ओर से बड़ी संख्या में तार व पत्र मिले जिनमें लिखा गया था कि आपके इस उपाय से विद्यार्थी संघ तथा अध्यापकों के लिये बड़ा लाभ प्राप्त हुआ है।
  • 7. चौ० साहब ने इसी तरह से गुण्डा नियंत्रण अधिनियम बनाया। यह एक्ट पास भी न हुआ था, केवल इस अधिनियम की सरकार द्वारा विचार करने की सूचना सुनकर, गुण्डे जो अपने पास चाकू लिये सड़कों पर एकत्र हो जाते थे, सब अदृश्य हो गये और कहीं भी दिखाई नहीं दिये। ऐसे उदाहरण अवश्य थे कि माता-पिता अपने बच्चों को विशेषकर लड़कियों को बाहर नहीं जाने देते थे, किन्तु यह अध्यादेश जारी होने पर वे अपने बच्चों को शिक्षा संस्थाओं में भेजने लगे।

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  • 8. गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार और मध्यप्रदेश प्रान्तों में भयंकर कौमी उपद्रव हुए किन्तु चौ० चरणसिंह के शासनकाल में उत्तरप्रदेश में, जहां मुसलमानों की आबादी सबसे अधिक है, इस तरह का कौमी झगड़ा एक भी न हुआ। जितने समय चौ० चरणसिंह सरकार में रहे, किसी कारखाने में या सरकारी कर्मचारियों द्वारा पूरे उत्तरप्रदेश में एक भी हड़ताल नहीं हुई।
  • 9. चौ० चरणसिंह ने मंत्रियों के सादा जीवन के लिए सदा आवाज़ उठाई, मंत्रियों का वेतन घटाकर 1000/- रुपये प्रति मास, प्रयोग के लिए छोटी अम्बेसेडर कार, ट्रेन यात्रा में पी० ए० सी० गार्द की समाप्ति के निर्णय आपने ही कराये। प्रधानमंत्रित्व काल में भी श्यामनंदन मिश्र के संयोजकत्व में एक समिति गठित की, जो मंत्रियों के भारी व्यय पर प्रतिबन्ध लगाने के उद्देश्य से गठित की गई थी।

चौ० चरणसिंह द्वारा जनहित के लिए दिए गए त्यागपत्र: चौ० चरणसिंह ने अपने मंत्रीपद को सदैव जनसेवा का अवसर मानकर कार्य किया और त्यागपत्र सदैव साथ लेकर चले और जब भी जनहित के विरुद्ध प्रश्न उठा, त्यागपत्र दे दिया। महत्त्वपूर्ण त्यागपत्र इस कालान्तर में क्रमशः मार्च 1947, जनवरी 1948, अगस्त 1948, मार्च 1950, जनवरी 1951, नवम्बर 1957, अप्रैल 1959 तथा अगस्त 1963 में दिए। इसी प्रकार केन्द्रीय मंत्रीमण्डल से 1977-1978 में तीन बार त्यागपत्र दिए। प्रधानमन्त्री के रूप में चौ० चरणसिंह स्वयं एक छोटे से बंगले में रहे जो उनको सांसद के रूप में मिला था। प्रधानमंत्री की सभी शान शौकत उन्हें छू तक नहीं गई थी। उन जैसी सादगी देश के दूसरे नेता में देखने को नहीं मिलती। यद्यपि वे अपने लम्बे जीवन में काफी समय तक मन्त्रिमण्डल में रहे हैं किन्तु सत्ता का नशा, भ्रष्टाचार, ऐशो-आराम व अय्याशी के वे प्रबल विरोधी रहे हैं। यही कारण है कि वह सामान्य गरीब जनता के हित में सोचते और यथाशक्ति उन पर निर्णय भी कराते रहे हैं।

जनता पार्टी की उत्पत्ति: डॉ० राममनोहर लोहिया ने सन् 1967 में कांग्रेस विरोधी मोर्चे का गठन कर आठ प्रदेशों से कांग्रेस को सत्ताच्युत कर दिया था। इसके पीछे उनकी मात्र धारणा यही थी कि देश के कुल मतों के एक-तिहाई द्वारा कांग्रेस शासन करती है और दो-तिहाई वाला विरोधी पक्ष टुकड़े-टुकड़े होकर विपक्ष में सम्मान प्राप्त नहीं कर पाता। यदि सभी विपक्षी दल संगठित होकर कांग्रेस का विकल्प प्रस्तुत करें तो एक क्षण भी कांग्रेस सत्ता में नहीं रह सकती। सन् 1967 के गठबन्धन के बाद में विपक्षी एकता टूट गई और 10 वर्ष तक फिर कांग्रेस शासन करती रही। लेकिन चौ० चरणसिंह जो समय की गति को ठीक तरह देखना जानते थे, एकमात्र वह व्यक्ति थे जो कांग्रेस त्यागने के बाद ही डॉ० लोहिया की आधारशिला पर महल खड़ा करने का सपना दिल में संजोये राजनैतिक पथ पर बढ़ते जा रहे थे।

चौधरी साहब कांग्रेस छोड़कर भारतीय क्रांतिदल, संयुक्त विधायक दल और भारतीय लोकदल (भालोद) बनाकर कांग्रेस के विकल्प का बीजारोपण करने में सफल हो गये। आप ही जनता पार्टी के संस्थापक हैं। आपके सहयोगी राजनारायण, पीलू मोदी, बीजू पटनायक, कर्पूरी ठाकुर,


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चौधरी देवीलाल, रविराय आदि योग्य नेता थे। इन सबके सहयोग से चौधरी साहब ने उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, हरयाणा, राजस्थानगुजरात तक अपना सबल अस्तित्व बना लिया।

तभी देशव्यापी असन्तोष, आसमान छूती हुई कीमतें, सिर तक डूबा हुआ भ्रष्टाचार, अभाव और अव्यवस्था के कारण प्रस्फुटित हुआ और गुजरात से आन्दोलन के रूप में छात्रों और नौजवानों ने शासन के विरुद्ध बगावत का झण्डा उठाया। उनकी मांग विधान सभा भंग करने की थी जो पूरी हुई। इस प्रकार देश को एक नई दिशा मिली और शनैः शनैः यह आंदोलन बिहार से लेकर सारे देश को हिलाने लगा। यह आन्दोलन युवा पीढ़ी ने उठाया था और पूर्णतया गैर राजनैतिक सीमाओं में रखने क निर्णय लिया गया था किन्तु पूर्णतया राजनैतिक बनता चला गया। इसका नेतृत्व बाबू जयप्रकाश को सौंपा गया जो आन्दोलन के राष्ट्रीयस्वरूप और दलविहीन लोकतंत्र के लिए चिंतित थे, वहीं दूसरी ओर चौधरी चरणसिंह आन्दोलन की अव्यावहारिकता बताते हुए विपक्षी राजनीति को एक मंच पर खड़ा करने को आतुर थे। इस प्रकार आपातकाल के एक वर्ष पूर्व की स्थिति में देश में दो विचारधाराओं का साथ-साथ प्रादुर्भाव हुआ। अन्त में जे० पी० को चौधरी साहब के विचारों का होना पड़ा।

चौ० चरणसिंह ने जे० पी० से अनुरोध किया कि वह संगठन कांग्रेस, जनसंघ एवं सोशलिस्ट पार्टी को मिलाकर हमारे भारतीय लोकदल का नेतृत्व करें ताकि कांग्रेस को पराजित किया जा सके। किन्तु इस बात से जे० पी० सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि सभी प्रजातांत्रिक दलों को मिलाकर एक संघीय दल का गठन किया जाना चाहिए। किन्तु जब गुजरात के विधान सभा चुनावों में यह प्रयोग (संयुक्त मोर्चा रूप) असफल हो गया तो नए दल के गठन के पक्ष में वातावरण तैयार हुआ। इससे यह बात सिद्ध हो जाती है कि कांग्रेस विकल्प के लिए नये दल के गठन के पक्ष में प्रारम्भ से यदि कोई प्रयत्नशील था तो वह भारतीय लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी चरणसिंह का दूरदर्शी व्यक्तित्व था। बीजू पटनायक का कहना था -

“जितने पूर्वाग्रहों, संकोचों, हिचकिचाहटों तथा जानी अनजानी भयंकर प्रसव पीड़ाओं को भोगने के बाद जनता पार्टी का जन्म संभव हुआ था। विलय की उन समस्त प्रतिक्रियाओं की जब जब याद आती है, तो अनायास ही मेरा मन चौ० चरणसिंह जी के प्रति आदर, श्रद्धा एवं उपकार भावना से जुड़ जाता है। यदि चौधरी साहब कांग्रेस के विकल्प की सिद्धि के प्रति इतने समर्पित, भावुक और प्रतिबद्ध नहीं होते तो क्या देश तानाशाही के शिकंजे से इतनी जल्दी मुक्ति पा सकता था?”

आपातकाल 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक (21 माह): सभी दलों के एकीकरण सम्बन्धी चौधरी साहब के प्रस्ताव के लिए सभी दलों की बैठक बुलाई जाने वाली थी तभी 25 जून 1975 को प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी और इस प्रयास को एक बार झकझोर दिया।

इंदिरा गांधी सरकार ने चौ० चरणसिंह को 25 जून रात्रि, 1975 को तिहाड़ जेल में बन्द कर दिया। जयप्रकाश, मोरारजी, राज नारायण, देवीलाल आदि हरयाणा में कैद थे। तभी नानाजी देशमुख और सत्यपाल मलिक देश भर के विपक्षी दलों के कार्यकर्त्ताओं के नाम परिपत्र भेजकर


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गिरफ्तारी देने और जेल भरो आन्दोलन तथा भूमिगत आन्दोलन को सक्रिय बनाने के लिए संलग्न थे। इस दौरान में चौधरी साहब जेल से प्रकाशसिंह बादल के साथ वार्ता कर विलय के प्रश्न को आगे बढ़ाने के उत्सुक थे तथा अपने मिलने वालों से इस व्याकुलता को उजागर करते थे। वे तिहाड़ जेल से ही एक ही विपक्षी राजनैतिक पार्टी बनाने का भरपूर प्रयत्न करते रहे। नवम्बर 1975 में बाबू जयप्रकाश को मरणासन्न स्थिति में पैरोल दी गई कि कहीं जेल में ही उनका जीवन समाप्त न हो जाये। लेकिन जे० पी० अपने इलाज के लिए सीधे अस्पताल में गये अतः विशेष प्रगति इस दिशा में संभव न हुई। पुनः मार्च 1976 में चौ० साहब को रिहा कर दिया गया। कैद से छूटने पर चौधरी साहब ने इंदिरा की तानाशाही सरकार के विरुद्ध अपना कार्य जोरों से चालू किया। आपने 23 मार्च 1976 को विपक्षी नेता के तौर पर उत्तरप्रदेश विधान सभा में गड़गड़ाहट उत्पन्न करने वाला भाषण दिया, जिससे कांग्रेसियों का दिल दहल गया। इस भाषण को प्रजातन्त्र के प्रेमी सदा याद रखेंगे।

चौ० चरणसिंह ने बम्बई में, बाहर रहने वाले विपक्षी दलों के नेताओं की, एक बैठक अपने निर्देशन में बुलाई, जिसमें एक समिति का गठन इस विलय प्रक्रिया को आगे बढ़ाने हेतु किया गया। इस समिति के सर्वश्री एन० जी० गौरे संयोजक तथा एच० एम० पटेल, शांतिभूषण और ओ० पी० त्यागी सदस्य थे। इस समिति को जयप्रकाश जी का भी आशीर्वाद प्राप्त था। चौधरी साहब ने इसके तुरन्त बाद 4-5 अप्रैल को भालोद की राष्ट्रीय समिति की बैठक बुलाई। जिसमें इस समिति के महत्त्व की समीक्षा करते हुए कांग्रेस का विकल्प तैयार करने हेतु भालोद द्वारा अपना सर्वस्व त्याग कर आगे आने की पेशकश की गयी और निर्णय से संयोजक समन्वय समिति को अवगत करा दिया गया। इसके पश्चात् विलय के विषय में अनेक बैठकें हुईं।

18 जनवरी 1977 को अचानक इंदिरा गांधी ने चुनाव घोषणा कर विपक्ष को संकट में डाल दिया। 19 जनवरी को मोरारजी देसाई जेल से रिहा हुए। रात को मोरारजी के निवास पर सभी दलों के नेताओं की बैठक हुई जिसमें चरणसिंह, अटलबिहारी, सुरन्द्रमोहन, पीलू मोदी, नानाजी देशमुख,एन० जी० गोरेअशोक मेहता शामिल हुए और देसाई ने अध्यक्षता की। बैठक में गतिरोध पैदा हो गया। पहले मुरारजी ने मोर्चे की पेशकश की तब चौधरी व गोरे ने इस पर उत्तेजित होकर कड़ा रुख अपनाया तो वह अध्यक्ष पद के लिए अड़ गए, बात आगे बढ़ गई। जे० पी० को दिल्ली फिर बुलाया गया, उन्होंने फैसला कर दिया - “यदि विलय करके एक दल नहीं बनाया जाता तो मैं चुनाव प्रचार नहीं करूंगा।” इस पर मोरारजी झुके किन्तु अध्यक्ष पद छोड़ने को तैयार न थे। अतः जे० पी० ने निर्णय दिया कि “मोरारजी अध्यक्ष, चौ० चरणसिंह एकमात्र उपाध्यक्ष हैं और क्योंकि चौधरी का उत्तर भारत में सर्वाधिक प्रभाव है अतः चुनाव प्रचार, प्रत्याशियों का चयन और समस्त रणनीति वही तैयार करेंगे।” भालोद और उसके नेता चौ० चरणसिंह ने अपने एक-सूत्रीय कार्यक्रम को पूरा होते देखा तो सब कुछ समर्पित कर जे० पी० से सहमति व्यक्त कर दी। 23 जनवरी 1977 को देसाई के 5 डूप्ले रोड स्थित निवास पर जनता पार्टी के गठन की घोषणा के साथ चौधरी के 3 वर्ष पुराने भागीरथ प्रयास सफल हो गए। 21 माह तक आपातकाल स्थिति रहने के बाद 1977 में देश में आम चुनाव हुए।

यह चुनाव भालोद के नामांकन पत्र व सदस्यता पर ही लड़ा गया क्योंकि चुनाव आयोग ने जनता पार्टी को मान्यता नहीं दी थी। साथ ही इस चुनाव का नेतृत्व एकमात्र चौधरी चरणसिंह


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ने किया और अभूतपूर्व सफलता दिलाई जिसके परिणामस्वरूप 23 मार्च, 1977 को जनता पार्टी शासन की स्थापना हुई और कांग्रेस का विकल्प देश के सामने आया। इन्दिरा गांधी ने 21 मार्च, 1977 को आपातकाल उठाने की घोषणा कर दी।

जयप्रकाश बाबू और आचार्य कृपलानी ने जनता सरकार का प्रथम प्रधानमन्त्री मोरारजी भाई को घोषित कर दिया। चौ० चरणसिंह को गृहमन्त्री नियुक्त किया गया। मोरारजी ने अपने मन्त्रिमण्डल में कई मन्त्रियों को शामिल करके उनको भिन्न-भिन्न विभाग सौंप दिये।

सरदार पटेल के बाद दूसरा फौलादी पुरुष चौ० चरणसिंह

सरदार पटेल भारत की एकता और अखण्डता के निर्माता थे। साढ़े चार वर्ष की वह अवधि जिसमें सरदार पटेल भारत के उपप्रधानमन्त्री व गृहमन्त्री रहे, एक राजनीतिज्ञ के नाते उनकी अनेक उपलब्धियों के लिए उल्लेखनीय है। उन्होंने लगभग 500 देशी रियासतों को भारत में मिलाकर देश की एकता और अखण्डता के निर्माता की उपाधि प्राप्त की। इसी कारण वह लोह पुरुष और सरदार की ख्याति अर्जित कर पाये। यद्यपि बारदोली सत्याग्रह के दौरान साहसिक नेतृत्व देने के कारण उन्हें सरदार की उपाधि मिली, परन्तु वे केवल बारदोली के सरदार न रहकर देश के सरदार कहलाए। किन्तु आश्चर्य इस बात का है कि जिसे इस देश का सरदार मान लिया गया उसे अपने से 14 वर्ष छोटे और प्रत्येक क्षेत्र में कम योग्यता व कुशलता वाले व्यक्ति पं० जवाहरलाल नेहरू का नेतृत्व स्वीकार करना पड़ा। यह महात्मा गांधी के एकपक्षीय निर्णय और नेहरू परिवार की भव्यता के सामने, किसान परिवार के पटेल के ऊपर थोंपी गई राय थी। महात्मा जी ने अपने मस्तिष्क को संतुलित न बनाकर नेहरू के बड़प्पन के समक्ष स्वयं को समर्पित करते हुए सरदार पटेल जैसे कुशल व्यक्ति को नाजायज दबाकर नेहरू के हाथों देश को सौंप दिया, जिसका परिणाम आज देशवासी भोग रहे हैं। यदि संसद सदस्यों की राय ली जाती तो पटेल की बहुत मतों से विजय होती और वे प्रधानमन्त्री बनते।

चौ० चरणसिंह के साथ भी यही हुआ, चौधरी की सादगी, ईमानदारी और दृढ़ता से जो लोग कायल थे उन्होंने जयप्रकाश बाबू को दबाकर मोरारजी भाई का नाम उछाला। जयप्रकाश जी ने मोरारजी को देश का प्रधानमन्त्री नियुक्त कर दिया। इस तरह लोकतन्त्र की आज़ादी के बाद देश का नेतृत्व दूसरी बार एक पूंजीपतियों के रहनुमा के हाथों में सौंप दिया गया। चौ० चरणसिंह की भालोद के एम० पी० बड़ी संख्या में थे, उनके अतिरिक्त अन्य बहुत से एम० पी० उनकी ओर थे। चुनाव होने पर चौधरी साहब की विजय अवश्य होती और वे देश के प्रधानमन्त्री बनते। इस तरह देश का नक्शा दूसरा ही होता। चौधरी जी ने भी पटेल की भांति जयप्रकाश जी की बात मान ली। गांधी जी व जे० पी० दोनों की यह बहुत बड़ी गलती थी।

नेहरू जी सत्य को अंततः सत्य मान लिया करते थे और प्रतिद्वन्द्वी को सम्मान दिया करते थे किन्तु मोरारजी क्रूर एवं जिद्दी साबित हुए, जिनको इन्सानीयत छू तक नहीं गयी थी। यही कारण था कि उन्हें बेइज्जत होकर जल्द ही घर वापिस जाना पड़ा। इसके बावजूद भी चौधरी ने उनको सदैव सम्मान दिया। देश के उत्थान के प्रश्न पर चौधरी का मस्तिष्क जितना साफ था उतना भारतीय राजनीति में सरदार पटेल के अतिरिक्त किसी का नहीं माना जा सकता।

चौधरी साहब अपने चरित्र के बल पर ही वर्तमान व्यक्तित्व प्राप्त कर सके। समस्त


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गृहमन्त्रियों के व्यक्तित्व देखने के बाद ज्ञात होता है कि सरदार पटेल के बाद दूसरा लोह पुरुष यदि गृहमन्त्रालय में आया तो वह था चौधरी चरणसिंह। उनका व्यक्तित्व एक ऐसे लोह धातु से बना हुआ था जो अपनी अडिगता से टूट सकता था परन्तु झुकना पसन्द नहीं करता था। जिसमें अपने विचारों को रखने और उन पर अडिग रहने की क्षमता होगी, केवल वही कुशल प्रशासक हो सकता है।

सारे देश से जो चीत्कार सुनाई दिया वह एकमात्र यही था कि चौधरी साहब पटेल के बाद दूसरे आदमी हैं जो प्रशासनिक दूरदृष्टि में उनसे मेल खाते हैं। आपातकाल की लड़ाई के बाद यदि चौधरी चरणसिंह जैसा गृहमन्त्री न मिला होता तो स्थिति क्या होती, यह हमारी कल्पना से परे की बात है। चौधरी साहब की प्रसिद्धि एक ऐसे शक्तिशाली और दृढ़ प्रशासक के रूप में हो गई थी कि लोकतन्त्र के दुश्मन 30 वर्ष से सत्ता के अन्धकार में पले देश के शत्रु, पस्तहिम्मत हो गये। सारे विश्व की निगाहें भारत की ओर थीं। ईर्ष्यालु लोग आशंका व्यक्त कर रहे थे कि नेहरू परिवार के शासन के बाद वहां शासन दे पाना किसी के वश की बात नहीं है, लेकिन चौधरी साहब ने वह आशंका निर्मूल कर दी।

आम लोगों की मान्यता है कि पं० नेहरू कुशल प्रशासक नहीं थे, चिंतक, विचारक, स्वप्नद्रष्टा अधिक थे। यही बात चौ० चरणसिंह के लिए भी कही जाती है कि जनता सरकार के प्रथम प्रधानमन्त्री मोरारजी न होकर चरणसिंह रहे होते तो इन तीन वर्षों में ही देश की तस्वीर बदली नजर आती। चौधरी साहब ने गृहमन्त्री के रूप में जिस दृढ़ता का परिचय देते हुए आपातकाल के कारनामों के लिए आयोगों की नियुक्ति की और इन्दिरा जी को जेल के सींकचों के दर्शन कराये, उसके बाद तो मानो उनका नाम शेर की भांति भयानकता के साथ लिया जाने लगा और लोग उन्हें विनोद में ‘कमीशन सिंह’ के नाम से सम्बोधित करने लगे थे। इससे पूर्व प्रत्येक भारतीय घनघोर निराशा के वातावरण में पड़ा सिसक रहा था। भय, आतंक और अनियमितता के जितने भी घिनोने रूप हो सकते थे वह सब श्रीमती इन्दिरा गांधी, संजय गांधी और उनकी चांडाल चौकड़ी ने देश के समक्ष प्रस्तुत कर दिए थे। पुलिस के आतंक से जनता भयभीत तथा तंग थी।

स्वार्थियों, आततायियों व लंपटों की जो निरंकुश फौज मां-बेटे ने मिलकर खड़ी की थी वह जनता सरकार के समक्ष एक गम्भीर चुनौती थी। इस भयाक्रांत स्थिति से देश को बाहर निकाल कर एक स्वतन्त्र रूप में कानून के आधार पर जिस भारत की प्रतिष्ठा चौधरी साहब ने रखी, वह केवल इस देश के लिए नहीं वरन् जनतंत्रप्रेमी किसी भी देश के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है। तुरन्त बाद 8 राज्यों में विधान सभा भंग कर नए चुनाव कराने के लिए उन्होंने दूसरा महत्त्वपूर्ण लाभकारी निर्णय लिया था जिसके सारे विरोध, पार्टी के बाहर और अन्दर से होते रहे।

यदि सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता तो आज देश का नक्शा दूसरा ही होता, देश के अधिकतर कठिन प्रश्न हल हो गये होते और जो कुछ विवाद विषय रह जाते वह अद्भुत परिणाम ग्रहण न करते, जैसे कि किये हुए हैं। उस समय में जो नए विवाद विषय जिनका निर्माण नेहरू


(पटेल व चरणसिंह दो फौलादी पुरुष “चौधरी चरणसिंह व्यक्तित्व एवं विचारधारा” पृ० 7-12 लेखक डा० के. एस. राणा)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-960


द्वारा किया गया, वह न होने पाते। पटेल हमको ऐसा प्रधानमन्त्री मिलता जिसका सम्बन्ध भूमि से था, जो अभ्यासी था तथा गरीबों एवं किसानों का आदर करता था। सरदार पटेल वास्तविक भारत को जानता था। (होमर ए, जैक (सम्पादक) ‘दि गांधी रीडर’, पृ० 128)।

चौ० चरणसिंह अपने भाषणों में कहा करते थे कि “महात्मा गांधी मेरे राजनैतिक गुरु थे परन्तु उनकी एक बड़ी भारी भूल यह थी कि उन्होंने सरदार पटेल को देश का प्रधानमंत्री न बनाकर नेहरू जी को बना दिया।”

23 मार्च 1977 को जनता पार्टी शासन स्थापित होने के बाद की घटनायें: प्रधानमन्त्री मोरारजी ने मन्त्रिमण्डल के गठन में अपने 7 केबिनेट मन्त्री लेकर तथा जनसंघभालोद को 3-3 स्थान देकर समानुपात के नियम को तोड़ दिया, फिर राज्यपालों और राजदूतों के चयन में घोर पक्षपात किया। इस प्रकार लोकदल घाटे में रह गया। सर्वाधिक लाभ संगठन कांग्रेस को मिला जबकि चौधरी साहब ने उत्तर भारत में टिकट वितरण के समय अपने को घाटे में रखकर भी अन्य घटकों को सन्तुष्ट किया था। फिर विधानसभाओं के मध्यावधि चुनाव और इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी को लेकर भी चौधरी-देसाई विवाद खुलकर सामने आ गये।

गृहमन्त्री चौ० चरणसिंह ने उत्तर भारत के राज्यों में जून 1977 में मध्यावधि चुनाव कराये, जिनमें कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई तथा जनता पार्टी का राज्य स्थापित हुआ। चौधरी साहब ने जनसंघ से समझौता करके मुख्यमन्त्रित्व पद निर्धारित कर दिये। लेकिन जब संगठन के चुनाव की बात की गई तो जनसंघ ने अपने आर० एस० एस० द्वारा अधिक सदस्यता बनाकर तथा पूंजीपतियों से चन्दा एकत्र कर सारे संगठन पर अपना शिकंजा कड़ा करने और नानाजी देशमुख को अध्यक्ष बना लेने की सारी योजना तैयार कर ली थी। इससे एक ओर चौ० चरणसिंह को उनकी नेकनियती पर अविश्वास पैदा हुआ वहीं अध्यक्ष चन्द्रशेखर ने इसका लाभ उठाया और भारतीय लोकदल को अलग-थलग करने की योजनाओं पर विचार विनिमय राष्ट्रीय स्तर पर शुरु हो गया। चन्द्रशेखर का अध्यक्ष पद का कार्य पूर्णतया भालोद विरोधी बनता चला गया। किसी भी प्रदेश में, केवल हरयाणा को छोड़कर, चरणसिंह गुट का प्रदेश जनता अध्यक्ष नहीं बनाया गया, न ही चुनाव पेनल में भालोद को स्थान दिया गया। बंगाल, बिहार, राजस्थान में संगठन कांग्रेस, दिल्ली, पंजाब, मध्यप्रदेश में जनसंघ तथा शेष राज्यों में समाजवादी प्रदेश अध्यक्ष बनाये गये। जिला तदर्थ समितियों में जहां भालोद के मुख्य-मंत्री थे, जानबूझकर अव्यवस्था और अनुशासनहीनता फैलाकर अस्थिरता का वातावरण तैयार किया गया। प्रत्येक 6 माह बाद मुखमन्त्रियों को विश्वास का मत हासिल करने के निर्देश राष्ट्रीय पार्लिमेंटरी द्वारा दिये जा रहे थे। इस प्रकार इन समस्त कारणों से चौ० चरणसिंह परेशान थे किन्तु वे अन्तिम दम तक पार्टी की एकता को बनाये रखने के पक्षधर थे।

किसान शक्ति: 23 दिसम्बर, 1977 को चौ० चरणसिंह का 76वां जन्मदिवस मनाने हेतु बोट क्लब दिल्ली में किसानों का एक बड़ा सम्मेलन हुआ, जिसमें सारे भारत के कोने-कोने से आकर किसानों ने भाग लिया। इस अवसर पर किसानों की बड़ी भारी संख्या उपस्थित थी। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने, जो


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तिहाड़ जेल से छूटकर आई ही थी, इस बड़े भारी संख्या वाले किसान सम्मेलन को चौ० चरणसिंह की अत्यधिक सफलता बताया और कहा कि इससे प्रमाणित हो गया है कि चरणसिंह के साथ उत्तर भारत के सब किसान हैं। यह किसान सम्मेलन राजनैतिक नहीं था, बल्कि चौधरी साहब का जन्मदिन मनाने के लिए था। नानाजी देशमुख, जो कि चौ० चरणसिंह के नेतृत्व में किसानों के इतने बड़े संगठन को देखकर स्पष्ट रूप से उलट थे, ने इस सम्मेलन की अध्यक्षता की। अपने भाषण में उन्होंने इस अवसर पर कहा कि “चौधरी साहब भारत के किसानों के नेता हैं।”

विदेशमन्त्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने भी किसान सम्मेलन को सम्बोधित किया। जनता पार्टी अध्यक्ष चन्द्रशेखर को भी निमन्त्रण दिया गया था किन्तु वह बहाना बनाकर इस सम्मेलन में नहीं आया। इसके बाद चन्द्रशेखर और चौधरी साहब के विचार अलग-अलग हो गये।

चौ० चरणसिंह के किसानों की उन्नति के लिए विचार: चौधरी साहब के अनुसार देश की आर्थिक दिशा में असफलता के दो बड़े कारण हैं - खेती बाड़ी और कारखानों के बीच आर्थिक खर्च का गलत बटवारा और बड़े-बड़े यन्त्र (मशीनें) स्थापित करने में धनराशि लगाना। अतः इसके लिए दो बड़े उपाय हैं - 1. बड़ी भारी मशीनों में धनराशि कम लगाई जाये। 2. कारखानों की बजाये खेती बाड़ी के लिए अधिक धनराशि लगाई जाए। किसानों की धीमी गति से उन्नति हुई है। चौधरी साहब ने देस का दौरा करने का निर्णय लिया जिसका तात्पर्य किसानों की आवश्यकता को बल देना तथा प्रान्तों में अखिल भारतीय किसान सम्मेलन की शाखायें स्थापित करना था।

उनका विवाद इस बात पर था कि स्वतन्त्रता प्राप्ति से आज तक ग्रामीण उन्नति मन्दगति से हुई है। आज तक भी 1,16,000 गांवों में पीने का पानी नहीं है। खेतों में काम करने वाले किसानों को शहरी क्लर्कों से घटिया इलाज दिया जाता है। आई० ए० एस० अफसर अधिक संख्या में शहरी हैं, जिनके कारण देहात में सामाजिक व आर्थिक पिछड़ापन है क्योंकि वे देहातियों की कठिनाइयों को समझते नहीं। केवल 14 प्रतिशत अफसर देहाती हैं। उन्होंने खेद प्रकट किया कि गांवों की विद्या, स्वास्थ्य, सड़कें और वाहनों की ओर ध्यान ही नहीं दिया गया है। यह बड़े शर्म की बात है कि गांवों में औरतों के लिए संडास का प्रबन्ध भी नहीं किया गया है। उन्होंने बताया कि अभी हाल में दिल्ली में यू० एन० कांफ्रेंस के लिए 16 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव पास किया गया था। इस राशि में से 1.83 करोड़ रुपया विज्ञान भवन, जहां पर कांफ्रेंस होनी थी, के रंगरोगन व उद्धार के लिए खर्च होना था। क्या यह धनराशि गांवों के नलकूपों के लिए नहीं लगाई जा सकती थी, जिनकी किसानों को सख्त जरूरत है?

23 दिसम्बर, 1978 को दूसरा किसान सम्मेलन: चौ० चरणसिंह अपने गृहमन्त्रालय का कार्य स्वतन्त्र रूप से करना चाहते थे, परन्तु प्रधानमन्त्री मोरारजी देसाई व उनका मन्त्रिमण्डल तथा चन्द्रशेखर उनके रास्ते में रोड़े अटकाते रहे। मोरारजी के इस विवाद से चौधरी साहब सदा बेचैन रहते थे। जून 1978 में चौधरी साहब को पक्षाघात का दौरा पड़ा। अतः वे इलाज के लिए दिल्ली के बड़े अस्पताल में दाखिल हो गये। इस समय मोरारजी ने चन्द्रशेखर से सांठ-गांठ करके राजनारायण व चौधरी साहब से त्याग-पत्र मांग लिए, बस पार्टी के


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पतन का बीजारोपण आरम्भ हो गया। राजनारायण पर झूठा दोष लगाकर त्याग-पत्र मांग लिया और उसे जून 1978 में मन्त्रिमण्डल से बाहर कर दिया।

प्रधानमंत्री ने 26 जून, 1978 को प्रेस कांफ्रेंस में राजनारायण के जनता पार्टी से त्याग-पत्र के विषय में कहा कि यदि पहले वाले भालोद के अन्य मेम्बर भी अपना त्याग-पत्र दे दें तो भी मेरी सरकार की स्थिरता में कुछ अन्तर नहीं होगा (Blitz weekly, August 4, 1979)।

चौ० चरणसिंह ने 30 जून 1978 को अपने गृहमन्त्री पद से त्याग-पत्र दे दिया। मोरारजी ने अपने स्वार्थ के लिए चौधरी साहब को उनके पद से हटाकर उन पर एक घातक धक्का लगाया। वास्तव में उनका यह त्याग-पत्र नहीं था, बल्कि उनको नीचा दिखाना था। प्रधानमन्त्री ने चौधरी साहब को पत्र भेजकर त्याग-पत्र मांगा था, जिसमें चौधरी साहब पर मिथ्या व बनावटी आरोप लगाये गये थे। चौ० चरणसिंह इलाज के बाद अपनी धर्मपत्नी गायत्री देवी सहित सूरज कुण्ड में जाकर आराम करने लगे।

अनेक मन्त्रियों, राजनैतिक व विद्वानों के कहने पर भी प्रधानमन्त्री मोरारजी ने चौधरी साहब को वापिस अपने मन्त्रिमण्डल में नहीं लिया।

30 जून 1978 को चौ० चरणसिंह के मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र देने के बाद उनकी भारतीय लोकदल पार्टी, अन्य पार्टियों के नेता तथा भारतवर्ष के किसानों में बड़ा रोष हो गया। मोरारजी पर दबाव डालने के लिए किसान रैली करने की तैयारियां होने लगीं। चौ० चरणसिंह के जन्मदिन पर 23 दिसम्बर 1978 को यह दूसरी बड़ी किसान रैली वोट क्लब पर सम्पन्न हुई, जिसमें सारे भारतवर्ष के प्रत्येक प्रांत से किसानों ने अपने खर्चे पर अपनी इच्छा से आकर भाग लिया तथा चौधरी साहब के 77वें जन्मदिन पर उनको 77 लाख रुपये की थैली भेंट की। यह एक ऐतिहासिक किसान रैली थी, जिससे यह प्रमाणित हो गया कि भारतवर्ष के किसान चौ० चरणसिंह को अपना वास्तविक नेता मान चुके हैं। इस रैली की संख्या का लगभग 40 लाख का अनुमान लगाया गया था। इस रैली पर समाचारपत्रों की व्याख्या इस प्रकार है -

  1. The Guardian (Manchester, England); Peter Niesewand लिखता है कि “23 दिसम्बर, 1978 को चौ० चरणसिंह के 77वें जन्मदिन पर उनके सहायक किसानों की रैली दिल्ली में हुई, सबसे बड़ी थी।”
  2. Far Eastern Economic Review (Hong Kong) लिखता है कि “23 दिसम्बर को चौ० चरणसिंह के सहायक किसानों की रैली की संख्या 10,00,000 अवश्य थी। इस किसान रैली से यह सिद्ध हो गया कि जैसे चौ० चरणसिंह के नेतृत्व में इतनी बड़ी संख्या किसानों की है, जिससे उनकी बड़ी प्रसिद्धि है। इस भांति का और कोई दूसरा नेता नहीं है।”
  3. The Fortnight (New Delhi) ने लिखा कि “अब तक इतनी बड़ी रैली कोई नहीं हुई और इससे भारतीय राजनीति में एक अति आवश्यक संगठन की उत्पत्ति हुई।”
  4. The Tribune (Chandigarh) ने इसको “संसार की सबसे बड़ी रैली” बताया।
  5. The Sunday Statesman (Delhi) ने उसे “अति शांति वाली रैली” बताया।

23 दिसम्बर, 1978 की इस ऐतिहासिक रैली ने चौ० चरणसिंह को विश्व के रंगमंच पर एक


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लोकप्रिय नेता और किसानों का ‘मसीहा’ के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। इस जनशक्ति से भयभीत होकर ही मोरारजी देसाई व चन्द्रशेखर ने चौधरी साहब से मन्त्रिमण्डल में शामिल होने का बार-बार अनुरोध किया। वस्तुतः चौधरी साहब स्वयं मानसिक रूप से मन्त्रिमण्डल में जाने को तैयार न थे किन्तु उनके ऊपर पार्टी की एकता को बनाये रखने हेतु अत्यधिक दबाव पड़ रहा था, जिसके सामने झुकना पड़ा। यद्यपि इससे उन्हें घाटा उठाना पड़ा, क्योंकि वह मन्त्रिमण्डल में न जाकर, बाहर से किसान मजदूरों के लिए संघर्ष का मार्ग अपनाते तो शायद विश्व के पैमाने पर माओ-त्से-तुंग के बाद दूसरे महान् किसान संघर्षों के नेता कहलाते। यह टिप्पणी बी० बी० सी० लन्दन रेडियो के संवाददाता की है और मैं स्वयं भी इस बात से सहमत हूँ। चौ० चरणसिंह ने मन्त्रिमण्डल से 6 मास 24 दिन बाहर रहकर 24 जनवरी 1979 को उपप्रधानमन्त्री के रूप में शपथ ली और उन्हें वित्त विभाग भी सौंपा गया। बाबू जगजीवनराम को नं० 2 उपप्रधानमन्त्री बनाया। चौधरी साहब के उपप्रधानमन्त्री बनने के बाद संघर्ष का रूप बदल गया। वे मूकदर्शक बनकर बैठ गये और उनके सहायक नेता राजनारायण बाहर से साम्प्रदायिक दंगों में आर. एस. एस. की साजिश को बेनकाब करने खुले मंच पर आ गये। मधुलिमये भी राजनारायण के साथ हो लिये। मधुजी अपने ढ़ंग से एच० एन० बहुगुणा, जार्ज फर्नांडीज आदि को भी चरणसिंह के खेमे में ले आये। इसी दौरान प्रधानमन्त्री मोरारजी ने चन्द्रशेखर से सांठ-गांठ करके भालोद के तीन मुख्यमंत्री – चौ. देवीलाल, रामनरेश यादव और कर्पूरी ठाकुर - को उनके पद से हटा दिया। दूसरी ओर राजनारायण को अनुशासन कार्यवाही का ढ़ोंग रचकर कार्य समिति से भी पृथक् कर दिया गया। इतने प्रहारों के बाद भालोद घटक पूर्णतया क्रोध में पागल था। चौ. देवीलाल 9 जुलाई 1979 को चौ. चरणसिंह के निवास पर पहुंचे और वहां देवीलाल, कर्पूरी ठाकुर, श्यामनन्दन मिश्र, मधु लिमये ने गोपनीय बैठक कर चौधरी साहब को पार्टी छोड़ने के लिए तैयार कर लिया और समानान्तर जनता पार्टी का गठन कर मोरारजी का तख्ता पलटनी की योजना बनाकर अगुवाई करने के लिए राजनारायण को जिम्मेदारी सौंपी गई। 15 मन्त्रियों के त्यागपत्र प्राप्त कर लिए गए। इसी क्रम में 13 संसद सदस्यों ने 9 जुलाई को और अन्य सदस्यों ने 10 जुलाई 1979 ई० को त्यागपत्र दे दिए और विरोधी दल के नेता यशवन्तराव चव्हाण ने अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया। अतः 11 जुलाई 1979 ई० को अन्य सांसदों से त्यागपत्र दिलाकर सरकार को अल्पमत में खड़ा कर दिया गया। 15 जुलाई तक त्यागपत्रों की संख्या 100 पर पहूंच गई और मोरारजी देसाई को त्यागपत्र देने पर बाध्य होना पड़ा। इस तरह मोरारजी 2 वर्ष 115 दिन प्रधानमन्त्री रहे और फिर मन्त्रिमण्डल में नहीं लिये गये। अन्त में चौधरी साहब भी बाहर आ गये और समानान्तर जनता पार्टी के सर्वसम्मति से नेता चुन लिए गए तथा समर्थन प्राप्त करके प्रधानमन्त्री बनने में भी सफल हुए।

प्रजातन्त्र भारत का पहला किसान प्रधानमन्त्री

महामहिम राष्ट्रपति श्री नीलम संजीव रेड्डी द्वारा चौधरी चरण सिंह को सरकार बनाने का न्योता दिया, 20.7.1979

जनता पार्टी के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने अल्पमत होने के कारण 15 जुलाई 1979 को अपना त्यागपत्र देना पड़ा। अब इस पार्टी का दूसरा नेता चुनने की दौड़-धूप शुरु हो गई। राष्ट्रपति संजीव रेड्डी ने कांग्रेस के नेता वाई० बी० चव्हाण को अपना बहुमत सिद्ध करने को कहा परन्तु वह असफल रहा। अब मैदान में चौ० चरणसिंह व मोरारजी देसाई थे जो पार्टी के नेता बनने के प्रयत्न


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कर रहे थे। दोनों ने अपने-अपने लोकसभा सदस्यों की सूची राष्ट्रपति को दी। राष्ट्रपति ने उन सदस्यों से पूछकर अच्छी तरह से जांच करके पता लगाया कि मोरारजी के साथ 236 सदस्य थे जबकि चौ० चरणसिंह के साथ 262 थे, जिनमें इन्दिरा कांग्रेस के 72 सदस्य भी शामिल थे। श्रीमती इन्दिरा ने इस अवसर पर चौधरी साहब का बिना शर्त साथ दिया परन्तु यह कहकर कि मेरी पार्टी का कोई सदस्य आपके मन्त्रिमण्डल में शामिल नहीं होगा। लोकसभा के 538 सदस्यों की संख्या में चौ० चरणसिंह का बहुमत न था जो कि 270 तो होना ही चाहिये था।

चूंकि चौ० चरणसिंह के सदस्यों की संख्या अधिक थी इसीलिए राष्ट्रपति ने उनको 28 जुलाई 1979, बृहस्पतिवार को 5.35 सायंकाल, प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी। साथ ही उनको राष्ट्रपति ने यह आदेश भी दिया कि वे अगस्त 1979 के तीसरे सप्ताह में लोकसभा में अपना बहुमत सिद्ध करेंगे।

प्रधानमन्त्री की शपथ लेकर चौ० चरणसिंह नं० 1 सफदरजंग रोड कोठी में आ गये। उन्होंने अपना मन्त्रिमण्डल बनाया।

महामहिम राष्ट्रपति श्री नीलम संजीव रेड्डी चौधरी चरणसिंह को देश के 5वें प्रधान मंत्री के रूप में शपथ दिलाते हुये, 28.7.1979

प्रधानमन्त्री चौ० चरणसिंह का राष्ट्र के नाम रेडियो द्वारा पहला भाषण: 28 जुलाई 1979 को प्रधानमन्त्री चौ० चरणसिंह ने राष्ट्र के नाम अपना भाषण दिया जिसमें अपनी सरकार की नीति का विस्तार से ब्यौरा दिया। संक्षिप्त में कुछ अंश निम्न प्रकार से हैं - “गरीबी, बेरोजगारी और आय व धन सम्पत्ति के अन्तर को दूर करने को पहल दी जायेगी। छोटे उद्योग धन्धों को बढ़ावा दिया जायेगा। जरूरी कारखानों को रखा जायेगा तथा आवश्यकता के अनुसार उनको देहात में भी स्थापित किया जायेगा। तमाम पिछड़ी जातियों, गरीब वर्ग, अल्पसंख्यक और हरिजन तथा जनजातियों की रक्षा तथा उन्नति की जायेगी।”

चौधरी साहब ने कहा कि मैं आपका (जनता) सेवक हूं। मैं और मेरी सरकार राष्ट्र हित में ईमानदारी व धर्मनिष्ठा से कार्य करेगी। देहात व किसानों की उन्नति की जायेगी आदि-आदि।

स्वतन्त्रता दिवस पर प्रधानमन्त्री चौ० चरणसिंह का भाषण: 15 अगस्त 1979 को प्रधानमंत्री चौ० चरणसिंह ने दिल्ली लालकिले पर राष्ट्रीय पताका फहराई और लालकिले की दीवार पर से राष्ट्र को अपना भाषण दिया। इस अवसर पर कई लाख आदमी लाल किले के सामने उपस्थित थे। उनके लम्बे भाषण के कुछ अंश निम्न प्रकार से हैं -

आज हम अपनी स्वतन्त्रता का 32वां वार्षिकोत्सव मना रहे हैं। इस दिन महात्मा गांधी और अन्य नेताओं के बलिदान के कारण, 200 वर्ष से चला आ रहा ब्रिटिश शासन का अन्त हुआ तथा देश को आजादी मिली। इस अवसर पर हम राष्ट्रपिता एवं अन्य देशभक्तों को श्रद्धांजलि देते हैं।
आज देश के सामने अनेक समस्यायें हैं जिनमें सबसे गम्भीर गरीबी है। संसार के 125 देशों में से गरीबी में हमारा 111वां नम्बर है, अतः 110 देश हमारे देश से अधिक धनाढ्य हैं। तीन वर्ष पूर्व हमारा स्थान 104वां था, आज 111वां है। इसका अर्थ हम और भी गरीब हो गये हैं। दूसरी समस्या बेरोजगारी है जो बढ़ती जा रही है। तीसरी समस्या अमीर और गरीब की खाई बढ़ती जा रही है। चीजों की कीमतें बढ़ती जा रही हैं। इसी तरह अन्य कई समस्याओं का वर्णन किया और बताया कि हमने यह मसले हल करने हैं। हमारा पड़ौसी देश पाकिस्तान जो हमारा ही अंग था,

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अणु बम बनाने का प्रयत्न कर रहा है, जैसे कि हमको सूचना मिली है। वह किसके विरुद्ध बना रहा है? चीन से उसकी मित्रता है, रूस से उसका कोई झगड़ा नहीं, अफगानिस्तान एक छोटा देश है और उसके साथ भी उसका कोई झगड़ा नहीं है। अतः यह साफ है कि वह यह अणु बम हमारे देश भारत के विरुद्ध बना रहा है। हमारा निर्णय है कि हम अणु बम नहीं बनायेंगे और न ही हम इस दौड़ में भाग लेंगे। लेकिन यदि पाकिस्तान अणु बम बनाना जारी रखेगा तो हमको भी मजबूर होकर अपना इस ओर पुनर्विचार करना होगा।
प्रधान मंत्री चौधरी चरणसिंह ने लालकिला जाने से पहले राजघाट पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए, 30.7.1979

नोट - लालकिले पर राष्ट्रीय झण्डा फहराने से पहले प्रधानमन्त्री चौ० चरणसिंह राजघाट पर गये और वहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर फूलमालायें चढ़ाकर उनको श्रद्धांजलि अर्पित की।

चौ० चरणसिंह व उनके मन्त्रिमण्डल का त्यागपत्र: सोमवार 20 अगस्त 1979 को प्रधानमन्त्री चौ० चरणसिंह को लोकसभा में अपना बहुमत सिद्ध करना था। शनिवार 8 अगस्त को श्री राजनारायण के साथ बातचीत में इन्दिरा गांधी व संजय गांधी ने चौ० चरणसिंह को सहायता देने हेतु अपना अविश्वास प्रकट कर दिया। संजय गांधी ने यह साफ तौर से कह दिया कि इस नई सरकार के, मेरी माता व इसकी पार्टी के साथ गलत व्यवहार से मैं अप्रसन्न हूं। इन्दिरा गांधी की कांग्रेस का हाव-भाव भी चौ० साहब के विरुद्ध था। उनका आम मत यह था कि जब तक नई सरकार इन्दिरा के साथ शान्ति भाव न बना ले तब तक उनकी सहायता का कोई जिम्मा नहीं है। (तात्पर्य, इन्दिरा व संजय के आरोपों की जांच बन्द करना था)। इसी समय चौ० चरणसिंह किसी प्रकार का इन्दिरा गांधी से समझौता न करने के लिए और भी दृढ़ होते जा रहे थे। बीजू पटनायक और एच० एन० बहुगुणा ने रविवार की शाम तथा रात चौधरी साहब को इन्दिरा से मदद लेने के लिए, समझाने में लगा दी। राज नारायण भी इस हक में था कि पूरा बहुमत का विश्वास लिया जाए। परन्तु जाट वज्र बना रहा। इन्दिरा जी ने फोन पर बात करनी चाही किन्तु चौधरी ने ऐसा भी न किया। इन्दिरा कांग्रेस के 72 एम० पी० थे।

कमलापति त्रिपाठी, सी० एम० स्टीफन, बी० पी० मौर्य, एस० एन० मिश्रा, देवीलाल, बनारसीदास आदि नेता भी समझौता प्रयासों में जुटे रहे किन्तु खाली हाथ वापिस आये। चौधरी साहब का एक ही उत्तर था - “सिद्धांतों से समझौता नहीं कर सकता, विश्वास मत से पूर्व वार्ता करना तो झुकना और आत्मसमर्पण करना है, अतः मैं वार्ता नहीं करूंगा वरन् त्यागपत्र दे सकता हूं।” सोमवार 20 अगस्त को सुबह 9-30 बजे चौ० चरणसिंह के निवास स्थान पर बीजू पटनायक का टेलीफोन आया जिसने बताया कि इन्दिरा गांधी ने सरकार के विरुद्ध अपना वोट देने का निर्णय लिया है। इस समय बहुगुणा और एस० एन० मिश्रा चौधरी साहब के साथ थे।

उसी समय चौधरी साहब ने अपना त्यागपत्र लिखना शुरु कर दिया। सोमवार को सुबह 10 बजे मन्त्रिमण्डल की बैठक बुलाई गई। एक प्रस्ताव पास करके चौ० चरणसिंह को यह अधिकार दिया गया कि वह मन्त्रिमण्डल के त्यागपत्र राष्ट्रपति को प्रस्तुत कर दे तथा लोकसभा भंग करके मध्यावधि चुनाव की घोषणा करें। तब चौधरी साहब, जो 24 दिन प्रधानमन्त्री पद पर रहे, राष्ट्रपति भवन में गये और 10-30 बजे त्यागपत्र राष्ट्रपति को सौंप दिये। राष्ट्रपति के साथ 10 मिनट बात करके चौधरी साहब अपने निवास स्थान पर आ गये, संसद भवन में नहीं गए। संसद


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भवन में सब सदस्य पहुंचे हुए थे और देखने वालों की बड़ी संख्या थी। चौधरी चरणसिंह व उसके मन्त्रिमण्डल का इन्तजार हो रहा था। उधर राष्ट्रपति ने मन्त्रिमण्डल का त्यागपत्र स्वीकार करके लोकसभा को भंग कर दिया और मध्यवर्ती चुनाव के आदेश जारी कर दिए। लोकसभा के स्पीकर ने यह सूचना संसद में सुना दी। राजनारायण ने बड़ी प्रसन्नता से वहां भारी भीड़ में सुनाया कि “चौ० चरणसिंह की हार नहीं, परन्तु जीत हुई है।”

एस० एन० मिश्र ने कहा कि “चौ० चरणसिंह के त्यागपत्र से यह प्रमाणित हो गया कि केवल वही एक शुद्ध और प्रजातन्त्रीय प्रधानमन्त्री है जो देश में कुछ ही ऐसे हुए हैं।”

समस्त परिस्थितियों पर जो प्रकाश डाला गया है उससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि जनता पार्टी विघटन के लिए चौ० चरणसिंह नहीं, वरन् मोरारजी देसाई एवं उनकी कुटिल मण्डली दोषी थी।

इस तरह जनता पार्टी की सरकार का राज्य 23 मार्च 1977 से 20 अगस्त 1979 तक लगभग 2½ वर्ष तक रहकर समाप्त हो गया।

दिसम्बर 1977 में जब आप भारत के गृहमन्त्री थे, उसी समय आपको महर्षि दयानन्द सरस्वती की उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा अजमेर का सर्वसम्मति से तीन वर्ष के लिए प्रधान चुना गया। इससे पूर्व आप 1947 ई० से अनेक वर्ष तक भारतवर्षीय आर्यकुमार परिषद् अजमेर के भी प्रधान रहे।

लोकसभा भंग होने के बाद की घटनायें: चौ० चरणसिंह 20 अगस्त 1979 से लोकसभा के चुनाव तक, जो कि 4 जनवरी 1980 को हुए, देश के कार्यकारी प्रधानमन्त्री रहे। इस चुनाव में इन्दिरा कांग्रेस पार्टी की भारी जीत हुई तथा श्रीमती इन्दिरा गांधी दोबारा देश की प्रधानमन्त्री बनी। चौ० चरणसिंह की लोकदल पार्टी देश में दूसरे नम्बर पर विजयी रही। स्वयं चौधरी साहब बागपत क्षेत्र से भारी मतों से विजयी रहे। चौ० देवीलाल सोनीपत संसदीय क्षेत्र से जीतकर एम० पी० बने।

31 अक्तूबर 1984 को प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की अपनी ही कोठी में उसी के दो सिख अंगरक्षकों ने गोलियां मारकर हत्या कर दी। उस दिन इन्दिरा जी के पुत्र राजीव गांधी जी को राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह द्वारा प्रधानमन्त्री पद की शपथ दिला दी गई।

सन् 1984 में हेमवतीनन्दन बहुगुणा अपनी पार्टी के साथियों समेत चौ० चरणसिंह के लोक दल में मिल गये। पार्टी का नाम बदलकर दलित मजदूर किसान पार्टी रखा गया जिसके अध्यक्ष चौ० चरणसिंह तथा उपाध्यक्ष चौ० देवीलाल व मीर कासिम नियुक्त किये गये।


आधार पुस्तकें - 1. चौधरी चरणसिंह व्यक्तित्व एवं विचारधारा - लेखक डा. के. एस. राणा। 2. प्रोफाइल ऑफ चौधरी चरणसिंह - लेखक प्रो. सुखवीरसिंह गोयल। 3. मैन ऑफ दी मासिज चौधरी चरणसिंह - लेखक आर. के. हुड्डा। 4. प्रथम विश्व युवा जाट सम्मेलन स्मारिका कंझावला, 4-5 अक्तूबर, 1986 पृष्ठ 25-27; भारतीय इतिहास की एक अमूल्य विरासत, चौधरी चरणसिंह - लेखक [[Natthan Singh|डा. नत्थनसिंह। 5. जाटों का उत्कर्ष, पृष्ठ 647-649 - लेखक [[Yogendrapal Shastri|योगेन्द्रपाल शास्त्री। 6. क्षत्रियों का इतिहास, पृष्ठ 228-229 - लेखक परमेश शर्मा तथा राजपालसिंह शास्त्री। 7. समाचार पत्रों से।


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24 दिसम्बर 1984 को देश में लोकसभा के आम चुनाव हुये। इन्दिरा गांधी कांग्रेस (इ) की सहानुभूति लहर के कारण कांग्रेस (इ) की भारी विजय हुई और श्री राजीव गांधी जी देश के प्रधानमन्त्री बने। चौ० चरणसिंह की दलित मजदूर किसान पार्टी की बुरी तरह से हार हुई। इनको थोड़ी सी सीटें मिल पाईं। चौ० चरणसिंह बागपत क्षेत्र से विजयी हुए। इस चुनाव के बाद चौ० साहब ने अपनी पार्टी का नाम लोकदल ही रख लिया। बहुगुणा को लोकदल का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। दिसम्बर 1985 में चौ० चरणसिंह दुर्भाग्य से पक्षाघात (लकवा) के शिकार हुए और उनकी शारीरिक असमर्थता बढ़ती चली गई। इन परिस्थितियों में लोकदल संसदीय बोर्ड ने श्री बहुगुणा को कार्यकारी अध्यक्ष मनोनीत कर दिया। याद रहे कि लोकदल की कोई कार्यकारिणी समिति नहीं थी। चौ० चरणसिंह की सक्रियता से लेकर बीमार होने तक केवल संसदीय बोर्ड ही काम कर रहा था। इन्हीं दिनों चौ० अजीतसिंह को चौ० चरणसिंह का सुपुत्र होने के नाते राजनीति में लाया गया तथा संसदीय बोर्ड के आदेश से चौ० अजीतसिंह को तत्कालीन लोकदल का महामन्त्री, राज्य सभा का सदस्य, संसदीय बोर्ड का मेम्बर, इन्चार्ज युवा लोकदल, उपाध्यक्ष किसान ट्रस्ट आदि पदों पर नियुक्त किया गया।

17 जून 1987 में हरयाणा के विधानसभा चुनाव से पहले 5 मार्च 1987 को चौ० अजीतसिंह ने अपने नाम से लोकदल (अ) अलग बना लिया, जिसके आप स्वयं अध्यक्ष हैं। दूसरा बहुगुणा के नाम से लोकदल (ब) बन गया, जिसके वे अध्यक्ष हैं। चौ० देवीलाल लोकदल (ब) के हरयाणा में अध्यक्ष हैं। इस तरह से हरयाणा में चुनाव से कुछ ही दिन पहले लोकदल के दो धड़े हो गये। 5 मार्च 1988 को चौ० अजीतसिंह जनता पार्टी में मिल गये और इस पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष बने।

चौधरी चरणसिंह का देहान्त

अंतिम विदाई - 29.5.1987 - 12 तुगलक रोड नई दिल्ली - पूर्व प्रधान मंत्री चरणसिंह के पार्थिव शरीर को श्रद्धांजलि देते हुये उनके पुत्र अजित सिंह, सुपुत्रियाँ, दामाद तथा एमएलसी जगत सिंह

चौ० चरणसिंह दिसम्बर 1985 में पक्षाघात के शिकार होने के बाद चलने-फिरने तथा उठने-बैठने में भी असमर्थ होते गये। उनको राममनोहर लोहिया हस्पताल दिल्ली में इलाज के लिए दाखिल किया गया। उनकी बोलने की तथा विचारशक्ति समाप्त होती गई। कई महीनों के बाद उनको इस हस्पताल से सरकारी खर्च पर इलाज के लिए अमेरिका भेजा गया। वहां पर लगभग आपको डेढ़ महीना रखा गया, परन्तु कोई आराम नहीं हुआ। चौ० चरणसिंह की इच्छा अनुसार आपको वापिस दिल्ली लाया गया। लगभग डेढ़ वर्ष तक बीमार रहने के बाद 29 मई 1987 को भारतवर्ष के किसानों के मसीहा तथा संसार के चोटी के राजनैतिक नेताओं की गणना वाले महान् नेता चौ० चरणसिंह का स्वर्गवास हो गया।

यह सूचना मिलते ही सारे भारत देश में शोक छा गया। देश-विदेशों से शोक सन्देश आये तथा श्रद्धांजलियां अर्पित की गईं। भारतवर्ष में सरकार की ओर से 3 दिन तक शोक मनाने का आदेश मिला। 3 दिन तक राष्ट्रीय झण्डे झुके रहे। चौधरी साहब के मृत शरीर के दर्शन करने लाखों मनुष्य आये और उन्होंने फूलमालायें चढ़ाईं। आपका दाह संस्कार 31 मई 1987 को राष्ट्रीय सम्मान के साथ राजघाट के निकट किया गया। आपके निवास स्थान पर आपके मृत शरीर को राष्ट्रीय तिरंगे झण्डे में लपेटकर अर्थी को तीनों आर्मी, नेवी, एयरफोर्स के चीफों ने कन्धा देकर एक सेना की खुली गाड़ी पर रखा। लोगों ने आपके शरीर को फूलों की मालाओं से ढ़ांप दिया।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-968


सरकारी बैंड बाजे बजते चले। कई लाख लोग पीछे-पीछे चले। दाह संस्कार पर प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी तथा उनके अनेक मन्त्री भी उपस्थित हुए। चिता में अग्नि उनके पुत्र चौ० अजीतसिंह ने दी। वेद मन्त्रों के उच्चारण से कई मन घी व सामग्री चिता में डाली गई।

बाद में उस दाह संस्कार के स्थान का नाम किसान घाट रखा गया जिसको सरकार ने भी स्वीकार कर लिया।

चौधरी चरणसिंह का वर्षवार जीवन-वृत

  • 1902: उत्तरप्रदेश राज्य के मेरठ जिले के नूरपुर ग्राम में 23 दिसम्बर 1902 को पिता श्री मीरसिंह और माता श्रीमती नेत्रकौर के घर जन्म हुआ.
  • 1919: गवर्नमेन्ट कालिज मेरठ में दाखिल कराया गया। आपने वहां से 1919 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की. *1921: गवर्नमेन्ट कालिज मेरठ से इण्टर परीक्षा पास की.
  • 1923: आगरा कालेज-आगरा से विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की.
  • 1925: आगरा कालेज-आगरा से इतिहास विषय में एम. ए. की उपाधि प्राप्त की.
  • 1925: हरयाणा प्रान्त के जिला सोनीपत में ग्राम कुण्डलगढ़ी में एक प्रतिष्ठित जटराणा गोत्र के जाट परिवार में चौ० गंगारामजी की पुत्री गायत्री देवी के साथ 4 जून 1925 को चौ० चरणसिंह का विवाह.
  • 1926: विधि स्नातक की उपाधि प्राप्त की.
  • 1928: गाजियाबाद में वकालत आरम्भ की.
  • 1929: राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल, गाजियाबाद कांग्रेस कमिटी की स्थापना, आर्य समाज के सभापति चुने गए.
  • 1929 - 1939: गाजियाबाद नगर कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे.
  • 1930: गोपीनाथ ‘अमन’ के साथ 5 अप्रेल को नमक सत्याग्रह में शामिल हो गये और एक बड़े समुदाय का नेतृत्व करते हुये पकड़े गये. यह आपकी प्रथम जेल यात्रा थी जिसमें 6 माह की सजा हुई.
  • 1932: मेरठ जिला बोर्ड के अध्यक्ष.
  • 1936: विधान मंडल के गैर सरकारी सदस्य के रूप से उत्तर प्रदेश के राजनैतिक रंगमंच पर उतरे. चौ० चरणसिंह अपने कार्य तथा लग्नशीलता एवं लोकप्रियता के कारण सन् 1936, 1946, 1952, 1957, 1962, 1968, 1974 में लगातार छपरौली से विधानसभा के लिए चुने गये।
  • 1937: चपरौली क्षेत्र से उ पीआर विधान सभा (प्रांतीय धारा सभा) के लिए विधायक निर्वाचित. ऋण निर्मोचन विधायक पारित करवाया, किसान ऋण मुक्त, खेत नुलमी से बचे.
  • 1939: गाजियाबाद से मेरठ आ गये. वहां जिला बोर्ड के चेयरमैन चुन लिये गये.
  • 1939 - 1948: मेरठ जिला कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष, महामन्त्री व अध्यक्ष पदों पर रहकर कार्य किया। उस समय आपकी जिले की राजनीति पर धाक थी. अतः पं० गोविन्द वल्लभ पंत के सम्पर्क में आये और उनके काफी नजदीक आ गये. चौधरी साहब ने सन् 1939 में ऋण विमोचन विधेयक पास कराया, जिससे किसानों के खेतों की नीलामी बच गई और सरकार के ऋणों से किसानों को मुक्ति मिली. दिसम्बर 1939 में आपने भूमि उपयोग बिल तैयार किया
  • 1940: 28 अक्तूबर 1940 को किसानों के एक जत्थे के साथ जिलाधीश निवास पर धरना दिया जिसमें आपको गिरफ्तार किया गया और डेढ़ वर्ष के कारावास की सजा दी तथा जुर्माना किया गया.
  • 1942: अंग्रेज भारत छोड़ो आंदोलन में स्वतन्त्रता प्राप्ति में सक्रिय योगदान दिया, जिसके कारण आपको 8 अगस्त 1942 में 2 वर्ष की सजा मिली
  • 1944: सन् 1944 में जेल से छोड़ दिया गया। सन् 1944 में चौधरी साहब के भाई श्यामसिंह व भांजे गोविन्दसिंह को बम केस में गिरफ्तार कर लिया गया। अदालत में मुकदमा चला जिसमें गोविन्दसिंह रिहा हो गया और श्यामसिंह को पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा मिली।
  • 1946: सन् 1946 में पुनः धारा सभाओं में निर्वाचन के बाद मुख्यमंत्री पं० गोविन्द वल्लभ पंत ने श्री चन्द्रभान गुप्त, सुचेता कृपलानी, लालबहादुर शास्त्री के साथ चौ० चरणसिंह को भी सचिव बनाया. 1946 से अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे . चौ० चरणसिंह अपने कार्य तथा लग्नशीलता एवं लोकप्रियता के कारण सन् 1936, 1946, 1952, 1957, 1962, 1968, 1974 में लगातार छपरौली से विधानसभा के लिए चुने गये।
  • 1946-1951: स्टेट पार्लियामेन्ट्री बोर्ड के सदस्य रहे.
  • 1949: मंडी बिल पारित करवाया.
  • 1948-1956: प्रान्तीय कांग्रेस पार्टी के जनरल सेक्रेट्री रहे.
  • 1951: गिविंद बल्लभ पंत मंत्री मंडल में प्रथम बार सूचना व न्याय तथा कृषि मंत्री के रूप में मंत्रीमण्डल में आने का अवसर प्राप्त हुआ.
  • 1952: छपरौली से विधानसभा के लिए चुने गये। 1952 में कृषि एवं राजस्व मन्त्री बनाये गए. 1952 में “जमींदारी उन्मूलन अधिनियम” पास कराने में सफल हुए.
  • 1953: प्रदेश के 28,000 पटवारी जो मालगुजारी प्रशासन की आवश्यक कड़ी थे, वेतन वृद्धि तथा अन्य सुविधाओं के लिये आन्दोलन कर रहे थे. चौ० चरणसिंह ने उन्हें सलाह दी कि जनहित में कुछ समय के लिए आन्दोलन वापिस ले लें या त्यागपत्र दे दें. सभी पटवारियों ने सामूहिक रूप से त्यागपत्र दे दिया। चौधरी जी ने स्थिति से निपटने के लिए त्यागपत्र स्वीकार कर लिये और ‘लेखपाल’ नाम से नयी नियुक्तियां कर दीं जिसके लिए उन्हें अनेकों विरोधों का सामना करना पड़ा। किन्तु इसका परिणाम यह हुआ कि आगामी 13 वर्ष तक प्रदेश में कोई सरकारी कर्मचारी हड़ताल पर नहीं गया.
  • 1954: संपूर्णा नन्द मंत्री मंडल में राजस्व एवं परिवहन मंत्री, कानून संग्रह में भूमि संरक्षण अधिनियम को शामिल किया तथा कानपुर के राजकीय कृषि महाविद्यालय के दो वर्ष के स्नाकोत्तर पाठ्यक्रम में एक पृथक् विषय के रूप में शुरु कर चौधरी साहब पुनः देश के अगुआ बने.
  • 1955: जनवरी 1955 से मार्च 1957 तक मंत्री माल व परिवहन विभाग बने.
  • 1957: छपरौली से विधानसभा के लिए चुने गये. राजस्व एवं परिवहन मंत्री
  • 1958: अप्रेल से नवम्बर तक मंत्री माल व वित्त विभाग बने. वित्त विभाग संभालने पर आप ने सार्वजनिक धन की बर्बादी को रोकने के कारगर उपाय किए. खाद्यान्न व्यापारियों पर लगाये जाने वाले विक्रय की पुरानी प्रणाली को पूर्णतया संशोधित किया. नवम्बर से अप्रेल 1959 तक मंत्री माल, सिंचाई व विद्युत विभाग रहे.
  • 1959: चन्द्रभानु गुप्त मंत्रीमण्डल में राजस्व एवं परिवहन मंत्री बनाये गए. 1959 में नागपुर में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में नेहरू जी से किसानों के हित में संघर्ष कर बैठे तथा सहकारी खेती प्रस्ताव को पास न होने दिया। वापिस आकर त्यागपत्र दे दिया. लगभग डेढ़ वर्ष तक मंत्रीमण्डल से पृथक् रहे।
  • 1960: उत्तरप्रदेश में दिसंबर 1960 से मार्च 1962 तक पुलिस या गृह, कृषि व पशु पालन मंत्री बने.
  • 1962:छपरौली से विधानसभा के लिए चुने गये, 1962 में सुचेता कृपलानी मंत्रिमण्डल में कृषि तथा वन मन्त्री बने. आपने वन विभाग में रहकर वनभूमि पर अनधिकृत कब्जे सख्ती से रोके और बेदखली कानून सरल किया.
  • 1963: अक्तूबर 1963 से मई 1965 तक मंत्री कृषि, पशुपालन, वन विभाग रहे.
  • 1965: मई 1965 से फरवरी 1966 तक मंत्री वन विभाग रहे.
  • 1966: मंत्री स्वायत शासन व वन विभाग रहे. स्थानीय निकाय प्रभारी रहे.
  • 1967: कांग्रेस की किसान विरोधी नीतियों के कारण कांग्रेस से सन् 1967 में त्यागपत्र दे दिया, अपने एक नये दल जन कांग्रेस की स्थापना की, 3 अप्रैल 1967 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री बने.
  • 1968: छपरौली से विधानसभा के लिए चुने गये. दलों की आपसी खींचातानी से तंग आकर अपना तथा मंत्रीमण्डल का त्यागपत्र राज्यपाल को 17 फरवरी 1968 को प्रस्तुत करते हुए नये चुनाव कराये जाने की सिफारिश की
  • 1969: मध्यावधि चुनाव कराये गये उससे पूर्व ही आपने जन कांग्रेस से भारतीय क्रांति दल (BKD) नामक संगठन को जन्म दिया और आपकी प्रतिभा के संबल पर ही इस दल को विधान सभा में 101 स्थान प्राप्त हुए। मध्यवर्ती चुनाव के बाद पुनः सन् 1969 में उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री बने.
  • 1970: चौ० चरणसिंह ने अपने भारतीय क्रान्ति दल (BKD) के साथ इन्दिरा कांग्रेस को मिलाकर उत्तरप्रदेश में संयुक्त मन्त्रिमण्डल बनाया जिसके आप मुख्यमन्त्री थे. 1 अक्तूबर को मुख्य मंत्री पद से त्याग पत्र.
  • 1974: छपरौली से विधानसभा के लिए चुने गये। 29 अगस्त को भारतीय लोकदल का गठन.
  • 1975-1977: सभी दलों के एकीकरण सम्बन्धी चौधरी साहब के प्रस्ताव के लिए सभी दलों की बैठक बुलाई जाने वाली थी तभी 25 जून 1975 को प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी और इस प्रयास को एक बार झकझोर दिया. इंदिरा गांधी सरकार ने चौ० चरणसिंह को 25 जून रात्रि, 1975 को तिहाड़ जेल में बन्द कर दिया. मार्च 1976 में चौ० साहब को रिहा कर दिया गया. कैद से छूटने पर चौधरी साहब ने इंदिरा की तानाशाही सरकार के विरुद्ध अपना कार्य जोरों से चालू किया. आपने 23 मार्च 1976 को विपक्षी नेता के तौर पर उत्तरप्रदेश विधान सभा में गड़गड़ाहट उत्पन्न करने वाला भाषण दिया, जिससे कांग्रेसियों का दिल दहल गया. इस भाषण को प्रजातन्त्र के प्रेमी सदा याद रखेंगे. 23 मार्च, 1977 को जनता पार्टी शासन की स्थापना हुई और कांग्रेस का विकल्प देश के सामने आया। इन्दिरा गांधी ने 21 मार्च, 1977 को आपातकाल उठाने की घोषणा कर दी.
  • 1977: पहली बार बागपत क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुने गये तथा अन्तिम समय तक इसी क्षेत्र से चुने जाते रहे. गृहमन्त्री चौ० चरणसिंह ने उत्तर भारत के राज्यों में जून 1977 में मध्यावधि चुनाव कराये, जिनमें कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई तथा जनता पार्टी का राज्य स्थापित हुआ.
  • 1977-1978: केन्द्र में गृहमंत्री, वित्तमंत्री तथा वरिष्ठ उपप्रधानमंत्री रहे. 23 दिसम्बर, 1977 को चौ० चरणसिंह का 76वां जन्मदिवस मनाने हेतु बोट क्लब दिल्ली में किसानों का एक बड़ा सम्मेलन हुआ, जिसमें सारे भारत के कोने-कोने से आकर किसानों ने भाग लिया. इस अवसर पर किसानों की बड़ी भारी संख्या उपस्थित थी.
  • 1978: 30 जून को प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई से मतभेद के कारण त्याग पत्र, 23 दिसम्बर, 1978 को दूसरा किसान सम्मेलन बुलाया गया, यह एक ऐतिहासिक किसान रैली थी, जिससे यह प्रमाणित हो गया कि भारतवर्ष के किसान चौ० चरणसिंह को अपना वास्तविक नेता मान चुके हैं. इस रैली की संख्या का लगभग 40 लाख का अनुमान लगाया गया था.
  • 1979: 24 जनवरी को जनता पार्टी सरकार में उप-प्रधानमंत्री एवं वित मंत्री पद पर नियुक्त, 28 जुलाई 1979 को केन्द्र में आपके नेतृत्व में साझा सरकार ने शपथ ग्रहण की, इन्दिरा कांग्रेस ने समर्थन किया और इस प्रकार चौधरी साहब देश के पांचवें प्रधानमंत्री बने. 20 अगस्त को इन्दिरा कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस, चरण सिंह सरकार गिर गई, राष्ट्रपति की सलाह पर प्रधान मंत्री बने रहे.
  • 1980: लोकसभा के चुनाव 4 जनवरी 1980 को हुए, तबतक आप देश के कार्यकारी प्रधानमन्त्री रहे. इस चुनाव में इन्दिरा कांग्रेस पार्टी की भारी जीत हुई तथा श्रीमती इन्दिरा गांधी दोबारा देश की प्रधानमन्त्री बनी. चौ० चरणसिंह की लोकदल पार्टी देश में दूसरे नम्बर पर विजयी रही। स्वयं चौधरी साहब बागपत क्षेत्र से भारी मतों से विजयी रहे.
  • 1984 : हेमवतीनन्दन बहुगुणा अपनी पार्टी के साथियों समेत चौ० चरणसिंह के लोक दल में मिल गये. पार्टी का नाम बदलकर दलित मजदूर किसान पार्टी रखा गया जिसके अध्यक्ष चौ० चरणसिंह तथा उपाध्यक्ष चौ० देवीलाल व मीर कासिम नियुक्त किये गये. 24 दिसम्बर 1984 को देश में लोकसभा के आम चुनाव हुये. चौ० चरणसिंह की दलित मजदूर किसान पार्टी की बुरी तरह से हार हुई. चौ० चरणसिंह बागपत क्षेत्र से विजयी हुए. इस चुनाव के बाद चौ० साहब ने अपनी पार्टी का नाम लोकदल ही रख लिया.
  • 1985: 29 नवम्बर को चौ० चरणसिंह दुर्भाग्य से पक्षाघात (लकवा) के शिकार हुए और उनकी शारीरिक असमर्थता बढ़ती चली गई.
  • 1986: 14 मार्च को इलाज के लिए अमरीका के मेरी लैंड राज्य के जान हापकिंस इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइन्स में भर्ती.
  • 1987: 29 मई 1987 को भारतवर्ष के किसानों के मसीहा तथा संसार के चोटी के राजनैतिक नेताओं की गणना वाले महान् नेता चौ० चरणसिंह का प्रातः 2.25 पर नई दिल्ली में स्वर्गवास हो गया. दाह संस्कार के स्थान का नाम किसान घाट रखा गया.

गरीबों का मसीहा

15 अगस्त 1979 को प्रधानमंत्री चौ. चरणसिंह अपनी धर्मपत्नी के साथ लालकिले पर ध्वजारोहण करने के लिए जाते हुए

व्यक्ति जाति या धर्म से नहीं गुणों से महान होता है, इन गुणों के कारण ही चौधरी जी गरीबों के मसीहा कहलाएं उन्होंने जितने कार्य किए उनमें प्राथमिकता वाले कार्य जो गरीबों के लिए वरदान सिद्ध हुए है-सर्वप्रथम आपने 1928 में किसान के मुकदमों के फैसले करवाकर उनको आपस में लडने के बजाय आपसी बातचीत द्वारा सूलझाने को साकार प्रयास किया। सन् 1939 में ऋण विमोचक विधेयक पास करवाकर किसानों के खेतों की निलामी बचवायी और सरकारी ऋणों से मुक्ति दिलायी। हम आज आरक्षण प्राप्ति पर खुशियां मना रहे। आपने 1939 में ही किसान सन्तान केा सरकारी नौकरियों में 50 फिसदी आरक्षण दिलाने का लेख लिखा था परन्तु तथाकथित राष्ट्रवादी कांग्रेसियों के विरोध के कारण इसमें सफलता नहीं मिल पाई। इससे स्पष्ट हो जाता है कि वह किसानों के सच्चे हितैषी थे।


सन् 1939 में अपाने किसानों को इजाफा-लगान व बेदखली के अभिशाप से मुक्ति दिलाने हेतु ‘‘भूमि उपयोग बिल‘‘ का मसौदा तैयार करवाया और 1952 में जमींदारी उन्मूलन अधिनियम पास करवाकर एक प्रशंसनीय कार्य किया।


आपने किसानों की प्रगति हेतु जो कार्य किए हैं वे एक अनूठी मिशाल है जो आज तक कोई किसान नेता नहीं कर पाया है और भविष्य में ऐसे हितैषी की उम्मीद नहीं के बराबर है।


आपने किसानों के साथ-साथ छात्र समाज में अनुशासनहीनता को बिना लाठी गोली के मिटाया सरकारी अधिकारियों से रिश्वतखोरी मिटाने, प्रशासन में कमखर्ची व कुशलता लाने और देश की गरीबी व बेकारी हटाने के लिए अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया था। इसी कारण से सन् 1977 में चीनी के भाव 3 रू. किलो होना अनूठी मिशाल हैं इन्हीं सभी बातों से आपका व्यक्तितव, चिंतन की दशा व नीति देश की सेवा करने का अभूतपूर्व प्रयास था।


राजनैतिक जववन आपने 1926 में गाजियाबाद में वकालत का कार्य प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता व कवि श्री गोपीनाथ (अमन) के साथ शुरू किया था। इस दौरान 1930 में आपको व ‘अमन‘ साहब को नमक बनाने के आरोप में गिरफ्तार करके मेरठ जेल में भेज दिया गया। जेल से छूटने के बाद 1932 में आपको मेरठ जिला बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया। देश में इस समय व्यक्तिगत सत्याग्रह का दौर चल रहा था इस आन्दोलन के लिए किसानों को सक्रीय करने हेतु आपको जिला सत्याग्रह समिति का मंत्री बनाया गया। इसी दौरन आपको 28 अक्टूबर 1940 में फिर बन्दी बना लिया गया व डेढ वर्ष की सजा व जुर्माना किया गया।


अगस्त 1942 में भारत सुरक्षा अधिनियम के अन्तर्गत पुनः गिरफ्तार किया गया व नवम्बर 1943 में रिहा किया गयां इसी समय के दौरान 1929 से 1939 तक नगर कांग्रेस समिति, गाजियाबाद के सदस्य एवं 1939 से 1948 तक जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद पर कार्य किया। इसी क्रम में आप 1937 में उत्तर प्रदेश छपरोली क्षेत्र से विधानसभा सदस्य निवार्चित किए गए और 1946 में श्रीमान् गोविन्द वल्लभ पंथ मंत्री मण्डल से संसदीय सचिव बने।


सन् 1952 में डॉ. सम्पूर्णानन्द के मंत्री मण्डल में राजस्व व कृषि मंत्री बनाए गए थे। सन् 1957 में उत्तर प्रदेश सरकार में राजस्व व परिवहन मंत्री बनें सन् 1959 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी के द्वारा सहकार्य की नीति की कडी आलोचना करने पर आपने अप्रैल माह में मंत्री मण्डल से इस्तिफा दे दिया। सन् 1960 से 1965 तक उत्तर प्रदेश में कृषि व वन मंत्री के पद पर कार्य किया। सन् 1967 में कांग्रेस मंत्री मण्डल से इस्तिफा देकर विपक्ष से संयुक्त विधायक दल के नेता बने और 3 अप्रैल 1967 को नए मंत्री मण्डल को गठन कर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का पद भार संभालां 1968 में भारतीय क्रांतिकारी दल का नेतृत्व किया।


सन् 1969 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा के मध्यावधि चुनावों में 98 सीटों पर विजय प्राप्त करके 1970 में पुनः उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और 1974 में 29 अगस्त को लोकदल का गठन किया। 1975 में इमरजेंसी के दौरान आपको गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। 1977 में जनतापार्टी के गठन में मुख्य भूमिका निभाकर लोकसभा के लिए प्रथम बार निर्वाचित हुए और जनता पार्टी सरकार में आप गृहमंत्री बने। 30 जून 1978 केा प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के साथ मतभेद होने के कारण मंत्री मण्डल से त्याग पत्र दे दिया। 23 दिसम्बर 1978 को दिल्ली के वोट क्लब पर आज तक की सबसे विशाल ऐतिहासिक रैली का आयोजन किया गया।

1979 को जनतपार्टी सरकार में उपप्रधानमंत्री व वितमंत्री का कार्य संभालां जुलाई 1979 को अपाने अपने अनुयायी सांसदो सहित पाटी्र से सामूहिक त्यागपत्र दे दिया। इससे देसाई जी की सरकार गिर गई। आप 28 जुलाई 1979 को नौ सदस्यीय प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर देश के पांचवे प्रधानमंत्री बने और जाट जाति का नाम रोशन करके उसका गौरव बढाया। 20 अगस्त 1979 को कांग्रेस सरकार द्वारा अपना समर्थन वापिस लेने के कारण सरकार गिर गई और लोकसभा भंग कर दी गई। सन् 1980 में आपने एक नई पार्टी दलित मजदूर किसान पार्टी का गठन किया। जिसे 1985 में लोकदल में परिवर्तित कर दिया।


29 नवम्बर 1985 को आप बीमार हो गए और 14 माच्र 1986 को अमेरिका के मैरिलैन्ड राज्य के जॉन होवकिस ईस्टीट्यूट ऑफ मेडिसन में इलाज करवाने केन्द्र सरकार के व्यय पर गए। 29 मई 1987 की रात्रि को 2.25 बजे आप इस संसार से विदा हो गएं आफ निधन से समूचा भारत अन्धकार के गर्त में समा गया और विभिन्न राजनेताओं, कवियों व प्रबुद्धजीवियों के द्वारा आपको सच्चे मन से श्रद्धांजलियां दी गई।

गरीबों के मसीहा-1: चौधरी चरण सिंह जा का जो अपना नाई था (जो उनकी दाढ़ी बनाता था) उसकी बेटी की शादी थी , उस समय चौधरी साहब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, उस नाई ने आकर चौधरी साहब को बताया था कि अगले महीने उसकी बेटी की शादी है और उसके पास शादी के लिए पैसे नहीं हैं, उसे कुछ कर्जा चाहिये तो चौधरी साहब ने उसे कर्जा देने से मना कर दिया और कहा कि तुझे कर्जे की क्या जरुरत है तेरी बेटी की शादी हो जाएगी और तेरे ऊपर किसी का भी कर्जा नहीं होगा, तू एक काम कर अपनी बेटी की शादी की तेयारी कर, एक काम जरुर करना आस पास के इलाके में जितने भी अच्छे और सामाजिक इंसान है और अपने गाँव के सभी आदमियों को न्योता जरुर दे देना, शादी का सारा सामान दुकान से उधार ले ले, अगर कोई मना करता है तो मुझे बता देना, बस फिर क्या था नाई ने ऐसा ही किया, सभी दुकानदारों को पता था कि ये चौधरी साहब का नाई है तो पैसे मारने का कोई सवाल नहीं है और सबने सामान उधार दे दिया, उसने अपने सभी गाँव वालों को और आसपास के इलाके में सभी अच्छे और सामाजिक व्यक्तियों को अपनी बेटी की शादी का आमंत्रण दे दिया, जिस दिन नाई की बेटी की शादी थी उस दिन चौधरी साहब ने क्या काम किया उस नाई के घर के बाहर दरवाजे पर कुर्सी डलवाकर बैठ गए, फिर क्या था जिसने भी सुनाकि आज वहां चौधरी साहब भी है तो सब उस नाई के यहाँ पहुंचे, किसी ने कुछ खाया या नहीं खाया लेकिन सभी गाँव वालों ने और आसपास के इलाके वालों ने भी वहां आकर कन्यादान किया..... सबने ज्यादा से ज्यादा कन्यादान किया, उस नाई की लड़की की शादी में इतना कन्यादान आया कि नाई ने सब दुकानदारों का हिसाब चुकता कर दिया और उससे ज्यादा पैसे उस नाई के पास बच भी गए, इसलिए ही तो आजतक सभी उन्हें किसानों और गरीबों का मसीहा कहते हैं...., चौधरी साहब ने जितना गरीबों और किसानों के लिए किया है ना तो आज तक कोई कर पाया है और ना कोई कर पायेगा...... ये बात मेरे दादा जी मुझे सुनाते थे !

गरीबों के मसीहा-2:

विचार और आचरण में कोई भेद न रखने वाले थे:- चौधरी साहब 1961 में जब उत्तर प्रदेश के गृहमंत्री थे ! एक दिन उनकी मीटिंग समाप्त होने के बाद जब सारे मंत्री अपनी अपनी गाडियों में बैठकर जा रहे थे ! जब चौधरी साहब अपनी कर में बैठने को हुए तो उन्होंने देखा कि एक सिपाही के हाथ से खून बह रहा है, जो शायद किसी मंत्री की कार के दरवाजे में आ गया था ! चौधरी साहब कार में बैठते - बैठते रुक गए और आदेश दिया कि सिपाही को उनकी कार से तुरंत डॉक्टर के पास ले जाया जाये !

जब वहां खड़े और लोगों ने चौधरी साहब से कहा कि आपको विलम्ब हो जायेगा ! तब चौधरी साहब ने कहा कि वह किसी अन्य के साथ बैठकर चले जायेंगे ! इस घटना का जिक्र 1961 में उनके सचिव रहे श्री तिलक राम शर्मा की पुस्तक "माईडेज विद चौधरी चरण सिंह" (My days with Chaudhary Charan Singh) में भी है !

70 स्वपनद्रष्टा जिन्होंने भारत को परिभाषित किया

2017-सितंबर-25 इंडिया टुडे '70 स्वपनद्रष्टा जिन्होंने भारत को परिभाषित किया'

भारत की आज़ादी की ७०वीं वर्षगांठ पर अंग्रेजी साप्ताहिक "इंडिया टुडे" ने 25 सितंबर 2017 को एक विशेष अंक प्रकाशित किया: "70 स्वपनद्रष्टा जिन्होंने भारत को परिभाषित किया" .... चरण सिंह इन महान भारतीयों में से एक चुने गए । भारत के किसान और ग्रामीण भाई-बहन यह सुन के गर्वित होंगे, और होना भी चाहिए ।

दुःख की बात यह है की आज भी गांव और कृषि को केवल सहानिभूति दिया जाती है, पूँजी नहीं ।वादे दिए जाते हैं, निवेश नहीं । और हमारे ग्रामीण भाई-बहन जो राजनैतिक सत्ता प्राप्त कर लेते हैं, वो जल्द ही शहर के हो जाते हैं ।

एक ही थे चरण सिंह, जो कभी कृषि, छोटे किसान, हथकरघा श्रमिक और गाओं के गरीब जनता को जीवन भर नहीं भूले । अमर रहेगी उनकी अलग सोच - एक नया समुदाय का निर्माण जो गांव, ग्रामीण और कृषि को अपनाये, और जाति, धर्म तथा क्षेत्र की सोच को हमेशे पीछे छोड़ दे ।


India's largest newsweekly India Today’s special issue of September 25, 2017 (on the 70th anniversary of India’s freedom) covers "70 visionaries who defined India” and Chaudhary Charan Singh is one of these great Indians.

There is something to be said for the bastion of urban and elite interests accepting Charan Singh's relevance, and indirectly perhaps the importance of his views on an alternate economic development model for India. Like Gandhi, his economic philosophy - agriculture first, villages first, cottage and appropriate technology first; before the next logical step of building industry and cities - are not discussed at all other than in limited academic circles. Agriculture and villages get the sympathy, cities and industry get the capital.


Ajay Vir Jakhar is Chairman of Bharat Krishak Samaj, http://www.ajayvirjakhar.com/, and wrote an introduction on Charan Singh for India Today, of which only a part was carried perhaps due to space restrictions. The entire article is reproduced here, courtesy Ajay Jakhar.

Reference - http://chaudharycharansingh.org/archives/india-today-special-issue-70-visionaries-who-defined-india

सच्चाई, सादगी और संघर्ष के साकार रूप

लेखक: प्रोफेसर हनुमानाराम ईसराण, पूर्व प्राचार्य कॉलेज शिक्षा, पूर्व सिंडिकेट सदस्य, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाने वाले, नेहरू युग के राजनीतिज्ञों में अपने नेतृत्वकारी गुणों और राजनीतिक कौशल के दम पर अपनी पैठ जमाने वाले, कुशल प्रशासक, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री, कृषि-लोकतंत्र के पक्षधर सिद्धांतकार , दलितों, पिछड़ो,किसानों, खेतीहर मजदूरों , दस्तकारों के हितों को नीति-निर्धारण में केंद्र-बिंदु पर रखने वाले देश के पंचम प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की स्मृति को शत-शत नमन।

चौधरी चरण सिंह(1902-1987) के आर्थिक चिंतन के केंद्र में गांव, खेत-खलिहान औऱ कुटीर उद्योग सर्वोपरि स्थान रखते थे। विकास की अवधारणा में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रमुखता प्रदान करने में उनकी अग्रणी भूमिका रही है। किसान की उनकी परिभाषा सिर्फ़ ज़मीन के मालिक किसान तक ही सीमित नहीं थी। वे किसान की श्रेणी में भूमिहीन खेतिहर मजदूर, दस्तकार, कुटीर उद्योग से जुड़े हुए श्रमिकों को भी शामिल करते थे।

प्रबुद्ध विचारक एवं लेखक:- चौधरी चरणसिंह ने भूमि सुधार, कृषि औऱ भारत के आर्थिक विकास को केंद्रित कर कई पुस्तकें लिखी। उनकी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक 'India's Poverty and its Solution' है जो कालांतर में भिन्न शीर्षक से भी प्रकाशित हुई। इसके अलावा ' Abolition of Jamidari', 'Peasant Proprietorship' आदि पुस्तकों में उन्होंने सम्पूर्ण भारत के लिए एक वैकल्पिक विकास की रणनीति प्रस्तुत की।

गांधीवाद के समर्थक औऱ सादा जीवन-उच्च विचार के प्रबल हिमायती चौधरी चरण सिंह अनुशासन प्रिय एवं सिद्धांतवादी थे। वे हर प्रकार के नशे से हमेशा दूर रहे और धोती, कुर्ता व गांधी टोपी को अपनी पोशाक के रूप में आत्मसात किया। कुशल प्रशासक ऐसे कि प्रशासन में अव्यवस्था ,चाटुकारिता औऱ बेईमानी बर्दाश्त नहीं करते थे। उनकी वक्तृत्व क्षमता गजब की थी। तार्किकता से परिपूर्ण उनका भाषण सुनने अपार भीड़ जुटती थी।

विद्यार्थी -जीवन एवं स्वतंत्रता -संग्राम में भूमिका:- ग्रामीण पृष्ठभूमि के अवरोधों को सफलतापूर्वक पार करते हुए प्रतिभशाली युवा चरण सिंह ने 1923 में आगरा कॉलेज, आगरा से बी. एससी. डिग्री अर्जित कर 1925 में इतिहास में एम. ए. की डिग्री प्राप्त की। 1928 में आगरा यूनिवर्सिटी से विधि ( Law ) की उपाधि प्राप्त कर गाजियाबाद में वक़ालत के पेशे से जुड़ गए। इस दौरान उनका जुड़ाव आर्य समाज से होने पर उन्होंने इलाके में सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध चेतना जाग्रत की।

1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में जब पूर्ण स्वराज्य की मांग की गई तो आज़ादी के दीवाने इस युवा ने मेरठ पहुँचकर कांग्रेस के पूर्णकालिक सदस्य के रूप में सदस्यता ग्रहण की। 1930 में जब महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के अंतर्गत नमक-कानून तोड़ने का आहवान किया तब चरण सिंह ने गाजियाबाद जिले की सीमा पर बहने वाली हिण्डन नदी के तट पर नमक बनाकर क़ानून तोड़ा और इसके फलस्वरूप छह महीने का कारावास झेला।

1942 में अगस्त क्रांति के दौरान चरण सिंह ने भूमिगत होकर उत्तरप्रदेश के कई जिलों के गांवों में गुप्त क्रांतिकारी संगठन गठित कर बार -बार अंग्रेज़ी शासन को चुनौती दी। इस पर क्रुद्ध होकर तत्कालीन मेरठ प्रशासन ने चरण सिंह को देखते ही गोली मारने के आदेश जारी किए थे। गिरफ़्तार कर उन्हें डेढ़ वर्ष जेल की सजा दी गई। जेल में रहते हुए उन्होंने 'शिष्टाचार' शीर्षक से पुस्तक लिखी।

किसानों के मसीहा के रूप में प्रमुख योगदान :- आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की बदौलत चरण सिंह आज़ादी से पूर्व 1937 में पहली बार गाज़ियाबाद क्षेत्र से प्रांतीय धारा सभा में चुने गए। किसानों को इज़ाफा-लगान व बेदख़ली के अभिशाप से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से उन्होंने सभा में लैण्ड यूटिलाइजेशन बिल ( भूमि उपयोग बिल) का मसौदा तैयार कर उसे पास करवाने का प्रयास किया परन्तु अंग्रेज़ सरकार ने इस बिल को प्रस्तुत नहीं होने दिया। इसके बाद ऋण के बोझ के नीचे दबे किसानों को राहत दिलाने के उद्देश्य से चरण सिंह ने धारा सभा में ऋण निर्मोचन विधेयक प्रस्तत किया। विडम्बना देखिए कि उस समय कांग्रेस के ही कुछ विधायक नहीं चाहते थे कि यह विधेयक पास हो क्योंकि उन्होंने लाखों ग़रीब किसानों को ऋण के जाल में फंसा रखा था। तार्किकता के धनी चरण सिंह ने विधेयक की पुरज़ोर पैरवी की और विधेयक पास हो गया। इसके परिणामस्वरूप लाखों किसान ऋण के जाल से मुक्त हो सके।

वक्त से आगे की सोचने वाले चरणसिंह ने 1939 में नवनिर्वाचित धारा सभा में पचास प्रतिशत आरक्षण खेतिहर मज़दूर किसान के लिए आरक्षित करने की मांग की, परन्तु उस पर विचार नहीं किया गया।

आजादी के बाद 1952 में उत्तरप्रदेश के राजस्व एवं कृषि मंत्री का पदभार संभालने पर उन्होंने जमींदारी व्यवस्था को ख़त्म करने की दिशा में आवश्यक क़दम उठाए। इस दिशा में सार्थक कार्यवाही करते हुए विधानसभा में चौधरी चरण सिंह द्वारा तैयार जमींदारी उन्मूलन विधेयक पारित हुआ जिसके फलस्वरूप मेहनतकश भूमिहीन एवं साधनहीन किसानों को जमीन पर अपना अधिकार मिला। 1953 में उन्होंने चकबंदी क़ानून और 1954 में उत्तरप्रदेश भूमि संरक्षण कानून पारित करवाया। इसके साथ ही निर्धन किसानों की सहायतार्थ सस्ते खाद बीज आदि के लिए कृषि आपूर्ति संस्थानों की स्थापना की। 1960 में जब उन्हें गृह एवं कृषि मंत्रालय सुपुर्द किया गया तब भूमि हदबंदी क़ानून लागू करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

चौधरी चरणसिंह ने राज्य द्वारा सामूहिक और सहकारी खेती के समर्थन के सवाल पर नेहरू की अर्थनीति का इस आधार पर विरोध किया कि सामूहिक खेती मानव-स्वभाव के विरुद्ध है और इससे उत्पादन पर ख़राब असर पड़ेगा।

किसान हितैषी मुख्यमंत्री:- चौधरी चरणसिंह ने 1967 में गैर-कांग्रेसवाद का दामन थाम लिया और एक नई पार्टी भारतीय क्रांति दल का गठन कर उत्तरप्रदेश के पहले गैर-कांग्रसी मुख्यमंत्री बने। इस दौरान उन्होंने कुटीर उद्योगों तथा कृषि उत्पादन में वृद्धि की योजनाओं को लागू कर सरकारी एजेंसियों द्वारा ऋण देने के तौर -तरीकों को सरल बनाया। साढ़े छह एकड़ तक कि जोत पर आधा लगान माफ़ कर दिया। किसानों को नक़दी एवं अन्य फसलों के लाभकारी मूल्य दिलाने के संबंध में महत्वपूर्ण निर्णय लिए और किसानों के लिए जोतबही की व्यवस्था की। भूमि भवन कर समाप्त किया।

1970 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने कृषि उत्पादन बढ़ाने की नीति को प्रोत्साहन दिया। साढ़े तीन एकड़ वाली जोतों का लगान माफ़ किया और उर्वरकों पर बिक्री कर ख़त्म कर दिया। भूमिहीन खेतिहर-मजदूरों को कृषि भूमि दिलाने के कार्य पर जोर दिया तथा भूमि विकास बैंकों की कार्यप्रणाली को और उपयोगी बनाया।

अक्टूबर 1970 में उत्तरप्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर देने के बाद से चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक गतिविधियां केंद्र ( दिल्ली) की तरफ़ झुकती गईं। 29 अगस्त 1974 को उन्होंने लोकदल का गठन किया।आपातकाल की अवधि में चौधरी चरण सिंह को नजरबंद कर दिया गया।

आपातकाल के बाद 1977 में हुए आम चुनाव के बाद जब जनता पार्टी की सरकार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी तब चौधरी चरण सिंह को उप -प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री बनाया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने 'मण्डल आयोग 'एवं 'अल्पसंख्यक आयोग' की स्थापना की।

जनवरी 1979 में वित्त मंत्री एवं उप-प्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक ,नाबार्ड की स्थापना की। अंत्योदय योजना शुरू की तथा पहली बार कृषि बजट की आवंटित राशि में वृद्धि करवाई। उर्वरकों व डीजल के दामों में कमी की। कृषि यंत्रों पर उत्पाद शुल्क घटाया, विलासिता की सामग्री पर कर वृद्धि की औऱ लघु उद्योगों को बढ़ावा दिया। काम के बदले अनाज योजना शुरू की।

चौधरी चरण सिंह ने जनसंघ के सदस्यों द्वारा जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दोहरी सदस्यता छोड़ने से इनकार करने के मसले पर विरोधस्वरूप जनतापार्टी से अपना गठबंधन तोड़ दिया। जनता पार्टी सरकार अल्पमत में आ जाने के कारण मोरारजी देसाई ने 15 जुलाई 1979 को त्यागपत्र दे दिया। चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस-यू और कुछ समाजवादियों के साथ गठबंधन कर कांग्रेस-आई और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के बाहर से समर्थन के आश्वासन पर सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत किया। 28 जुलाई 1979 को उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण की और इस पद पर 14 जनवरी 1980 तक आसीन रहे।

लोकसभा में विश्वास मत पर मतदान से एक दिन पूर्व कांग्रेस-आई द्वारा समर्थन वापिस ले लिए जाने के कारण चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल की सलाह पर राष्ट्रपति ने लोकसभा भंग कर दी और मध्यावधि चुनाव घोषित कर दिए। 1980 में हुए मध्यावधि चुनाव में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाला लोकदल लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के रूप में उभरा और वे विपक्ष के नेता बने।

चौधरी चरण सिंह अपने जमाने की असाधरण हस्ती थे। दुःखद बात यह है कि चौधरी चरण सिंह भारतीय राजनीति में सबसे ज़्यादा ग़लत समझे जाने वाले नेता रहे हैं। जिंदगी भर वे मीडिया, बुद्धिजीवी और कुलीन वर्ग के निशाने पर रहे परन्तु वे अपने चिंतन की धारा से कभी विमुख नहीं हुए। अपनी पुत्रियों का अंतरजातीय विवाह आयोजित करने वाले और ताउम्र जातिवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वाले इस किसान हितैषी नेता को जाति विशेष से जोड़ा जाता रहा। बेबुनियाद आलोचनाओं की परवाह नहीं करते हुए वे ठसक के साथ लगभग आधी शताब्दी तक भारतीय राजनीति के आकाश में छाए रहे।

आज़ादी की 70 वीं वर्षगांठ पर अंग्रेज़ी साप्ताहिक 'इण्डिया टुडे' द्वारा 25 सितम्बर 2017 को ' 70 Visionaries who Defined India' शीर्षक से विशेषांक प्रकाशित किया जिसमें चौधरी चरण सिंह को उन 70 महान भविष्यदृष्टा भारतीयों में सम्मलित किया गया जिन्होंने भारत को परिभाषित किया है।

चौधरी चरणसिंह के जीवन पर पुस्तकें

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एक और कबीर (चौधरी चरणसिंह का जीवन चरित्र I), - चौधरी चरण सिंह का जीवन चरित्र, लेखक: राजेन्द्र कसवा, कलम प्रकाशन, जयपुर, 52, दूसरी मंजिल, न्यू पुरोहित जी का कतला, जयपुर, फोन:560098, प्रथम संस्करण 1996

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देख कबीरा रोया (चौधरी चरणसिंह का जीवन चरित्र II), लेखक: राजेन्द्र कसवा, प्रकाशक:लोकायत प्रकाशन, 883, लोधों की गली, मोती डूंगरी रोड, जयपुर-4, फोन:600912, प्रथम संस्करण 2000

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संस्तवन: एक आलोक पुरुष का - चौधरी चरण सिंह स्मृति-ग्रंथ, संपादक डॉ. किरण पाल सिंह, प्रकाशक: भारतीय राजभाषा विकास संस्थान देहरादून, फोन: 0135-2753845, ISBN 978-81-906127-5-3, प्रथम संस्करण 2010

चौधरी चरण सिंह - एक चिंतन एक चमत्कार, 1990, एस. के. पब्लिशर्स

लौहपुरुष चौधरी चरण सिंह की अमर कहानी, 1987, मधुर प्रकाशन, दिल्ली

हमने भारत पर कैसे विजय प्राप्त की, भूमिका चौधरी चरण सिंह, 1983, किसान ट्रस्ट

नूर-ए-हिन्द-चौधरी चरणसिंह (Noor-e-Hind - Chaudhary Charan Singh): लेखक: Mansukh Ranwa

किसान मसीहा चौधरी चरणसिंह (Kisan Masiha Chaudhary Charan Singh): Author: Dr Natthan Singh

Charan Singh (1902-87): An Assessment by Terence J. Byres. SOAS, London. 1988: "Charan Singh (1902-87) is frequently identified as 'champion of India's peasants'. That description refers to his long career as an active politician. Less well known is his written work. That is rarely mentioned, and when it is, the tone (especially that of urban intellectuals) is dismissive. It is argued here, firstly, that Charan Singh was, indeed, an accomplished politician, but one who successfully represented the interests not of the whole peasantry, but of its rich and middle strata. It is suggested, secondly, that his published work is of greater significance than is generally acknowledged; that it falls squarely into the broad tradition of neo-populism; and that he was, unusually, a true ‘organic’ intellectual of the rich and middle peasantry. Both his political career and his ideas merit more serious attention than they have attracted hitherto; and such attention needs and adequate class perspective."

चरण सिंह (1902-1987): एक मूल्यांकन: टेरेंस ज. बायर्स द्वारा। एस. ओ. ए. एस., लंदन। 1988 में लिखित ...."चरण सिंह (1902-1987) को निरन्तर भारत के 'किसानों के हिमायती' के रूप में पहचाना जाता रहा है। यह परिचय उनके लम्बे राजनैतिक जीवन का संकेत है । किन्तु उनके लेखन की बहुत कम लोगों को जानकारी है । अव्वल तो उन लेखों का ज़िक्र होता नहीं, यदि कभी होता भी है, तो उसका स्वर (विशेष रूप से शहरी बुद्धिजीवियों की दृष्टि में) अस्वीकरात्मक होता है । इस लेख में तर्क दिया गया है कि, सबसे पहले, चरण सिंह वास्तव में एक निपुण राजनीतिज्ञ थे; लेकिन उन्होंने समूचे किसान वर्ग के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं किया, केवल धनी और मध्यम तबके के किसानों का प्रतिनिधित्व किया । दूसरा, मेरा यह मानना है कि उनके प्रकाशित लेखन, जितना अमूमन समझा गया है, उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है और सही तौर पर वह नव-लोकरंजकतावद की व्यापक परंपरा के अंतर्गत आता है । वह असामान्य रूप से धनी और मध्यम तबके के किसानों के एक सच्चे 'जैविक' बुद्धजीवी थे । उनके राजनीतिक जीवन और उनके विचारों को अधिक गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है, और यह पर्याप्त वर्गीय परिप्रेक्ष्य के अंतर्गत किया जाना चाहिए । "

जातीयता का अभिशाप और चौधरी चरणसिंह (Jātīyatā kā Abhishāp aur Chaudhary Charan Singh): Author: Dr Natthan Singh

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Charan Singh aur Congress Rajneeti: Ek Bhartey Rajneetik Jeevan, 1937 se 1961 tak: (Hindi) Paperback – 1 Jan 2017: An Indian Political Life: Charan Singh and Congress Politics, 1937 to 1961 focuses on the role of Charan Singh in the politics of the period while providing a broader perspective on the major issues, controversies and developments of the time. The book is the result of a careful study of Charan Singh's personal collection of political files coupled with a series of extensive interviews with politicians, public personalities and local people. It provides an account of the principal issues and events of the period, including Hindu-Muslim relations, the conflict between the Nehruvian goal of rapid industrialization and the desires of those favoring primary attention to agriculture, issues of law and order, the rise of corruption and criminality in politics, the place of caste and status in a modernizing society and the pervasive factional politics characteristic of the era. This work is much more than the biography of an important politician; it is also an analysis of issues, movements and political conflicts that marked the late pre-Independence and early post-Independence era.This book is the first volume of a multi-volume work on The Politics of Northern India: 1937 to 1987.

चौधरी चरण सिंह और कांग्रेस राजनीति: एक भारतीय राजनीतिक जीवन 1937 से 1961 तक: लेखक - पाल.आर. ब्रॉस, विश्व विख्यात राजनीति-शास्त्री प्रोफेसर पॉल ब्रास की रची चौधरी चरण सिंह की तीन खंड की जीवनी के पहले खंड को पढ़ें और इस महान आत्मा के जीवन से प्रेरणा प्राप्त करें। प्रोफेसर पॉल ब्रास ने हिंदुस्तान की राजनीती और समाज का पिछले 55 साल अध्ययन किया, 18 से अधिक पुस्तक लिखीं, और सौ से अधिक लेख लिखे। प्रोफ. ब्रास का मानना है कि चरण सिंह आज़ादी के पश्चात भारत के सबसे ईमानदार और प्रभावी नेता ही नहीं थे, उनकी ग्रामीण और कृषि पर आधारित आर्थिक और सामाजिक विकास की नीति तथा सोच हिंदुस्तान के लिए सही थी। इस जीवनी का एक और ख़ास महत्व है - हिंदुस्तान में पहली बार एक अमरीकी, विश्व विख्यात राजनीति-शास्त्री की अंग्रेजी में लिखी आध्यात्मिक पुस्तक का हिंदी में अनुवाद किया गया है। इसका श्रेय प्रकाशन संस्था 'सेज' को जाता है, जिसने 2 साल की मेहनत के फल स्वरुप इस खंड को सम्पन्न किया। केवल 500 रूपये के मूल्य की यह पुस्तक हिंदी भाषी जनता, ख़ास तौर पर विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों के लिए उपयोगी है।

Books written by Chaudhari Charan Singh (all books are available for free download here) -

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Video’s of Chaudhari Charan Singh (1967 till his funeral in 1987)

Audio Interview of Chaudhari Charan Singh

चरण सिंह पर भजन, दोहे, कवितायें आदि

रचनाकार : महाशय धर्मपाल सिंह भालोठिया, भजन-91, मेरा अनुभव (संशोधित) - 2017


तर्ज- चौकलिया

अब तो जागो युग पलटा , आज भारत के अन्नदाता ।

चरणसिंह बन के आया आज, तेरा भाग्य विधाता ।।


किसान के घर जन्म लिया, सब देखा मजा झोंपड़ी में ।

ये भी अनुभव किया आपने , क्या क्या सजा झोंपड़ी में ।

बिन साधन रहे चौबीस घंटे , सिर पे कजा झोंपड़ी में ।

शान से अपना प्राण आज तक ,किसने तजा झोंपड़ी में ।

झोंपड़ी वाले ही इसके हैं, सच्चे बहन और भ्राता ।

                      चरणसिंह बन के आया............। 1 ।

नहीं ये हिन्दू मुसलमान, और नहीं ये सिक्ख ईसाई है।

नहीं ये गूजर राजपूत , नहीं ब्राहम्ण बनिया नाई है ।

नहीं ये अहीर जाट हरीजन ,जोगी और गुसाई है ।

मेहनतकस का सच्चा नेता , हिन्दुस्तानी भाई है।

देश के हित में मरने तक भी, कभी नहीं घबराता ।

                     चरणसिंह बन के आया............। 2 ।

एम. एल. ए.और एम.पी. तो यहां देखा हर इंन्सान बने ।

जमाखोर और भ्रष्टाचारी , झूठा और बेईमान बने ।

जनता का सच्चा विश्वासी ,नेता नहीं आसान बने ।

नेता बनने वाले का यहां , बार बार इम्तिहान बने ।

हुई सपूती सपूत बेटा, जनके भारत माता ।

                    चरणसिंह बन के आया............। 3 ।

धन दौलत से दूर रहे, ये भ्रष्टाचारी चोर नहीं ।

सादा जीवन नेक चरित्र , बल्कि रिश्वतखोर नहीं ।

प्रजातन्त्र का हामी ये, कुर्सी पे जमावे जोर नहीं।

ग्यारह बार कुर्सी ठुकरादी, ऐसा नेता और नहीं ।

देशभक्त त्यागी बनने का, सबको सबक सिखाता ।

                   चरणसिंह बन के आया............। 4 ।

किसान तेरी अंगूठी का, श्री चरण सिंह नगीना है।

कदर नहीं जानी इसकी तो,तेरा मुश्किल जीना है।

तेरे हक में लड़ा रात दिन, खोल खोलकर सीना है।

अपना खून बहा देता, जहां पड़ता तेरा पसीना है ।

तेरा नेता तेरे लिये फिर, देश में अलख जगाता ।

                 चरणसिंह बन के आया............ । 5 ।

साम्प्रदायिक तानाशाही , शक्तियों का मरण बना ।

लोकतंत्र की नींव भंवर में, इसका तारण तरण बना ।

गांधी जी खुश हुए स्वर्ग में, मेरा पूरा परण बना ।

भारत का प्रधानमंत्री, किसान का बेटा चरण बना।

भालोठिया इस देशभक्त के, घर घर गीत सुनाता ।

                   चरणसिंह बन के आया............। 6 ।

चरणसिंह चतुर्दश

लेखक: दयाराम महरिया, सीकर

लोक आलोक चल पड़े ,नूरपुर कोहनुर ।
गांव गरीब किसान से ,दिल्ली रही न दूर ।।1।।
असली भारत गांव में ,अन्नदाता किसान ।
राज-काज में कर गए, चरणसिंह पहचान ।।2।।
'चरण 'आचरण नेक थे , कथनी-करनी एक ।
चरण स्पर्श से बन गए ,कृषक नेता अनेक ।।3 ।।
उत्तम प्रांत उत्तम नर,मीरसिंह के मीर ।
राजनीति के खेत में, चंगा गंगा नीर ।।4।।
सेवा शुचिता सादगी ,शिष्ट विशिष्ट विचार ।
चरणसिंह पंथी चरम,सदाचार आधार ।।5।।
चरणसिंह रण सिंह थे, आम-ग्राम संग्राम ।
बाली रखवाली कृषक ,लाली खेत ललाम ।।6।।
क्षीर -नीर विवेकी नर, पीर धीर- गंभीर ।
प्रथम चरण में तोड़ दी ,जागीरी जंजीर ।।7।।
देवतुल्य इंसान थे, शुद्ध प्रबुद्ध किसान ।
रिद्धि सिद्धि प्रसिद्ध पुरुष, चरणसिंह प्रतिमान ।।8।।
विराट व्यक्तित्व अटल ,पीरी -मीरी योग ।
मान सांवरो गांव रो ,चरण पूजते लोग ।।9।।
चरणसिंह गुण समुच्चय, दृढ़ निश्चय चट्टान ।
आन -बान -शान रक्षक धरती-पुत्र महान।।10।।
ग्राम -विकास मंत्रालय ,सुनीति धान प्रधान ।
प्रथम किसान प्रधान का, लाल किले फरमान ।।11।।
धन्य भारत भूमि हुई ,धन्य चरण चौपाल ।
प्रधानमंत्री बना जब ,गांव -गुदड़िया लाल ।।12।।
राजनीति 'चरण' रूपक, दयानंद दरवेश ।
फिर पैदा होना कठिन ,ऐसा नेता देश ।।13।।
भारत- खेत रेत जगा,पढ़ा सत्यार्थ पाठ ।
चिर निद्रा में सो गए ,दिल्ली किसान घाट ।।14।।

चरणसिंह पर कविता 'चौधरी थारै देस मैं'

रचनाकार: भँवर लाल बिजारनियाँ - श्रद्धेय चौधरी साहब को उनकी 31वीं पुण्य तिथि पर राजस्थान पत्रिका के 23 दिसम्बर, 2011 के अंक में प्रकाशित मेरी राजस्थानी काव्यमयी श्रद्धांजलि " चौधरी थारै देस मैं" एकदम सामयिक ही मानकर पुनः समर्पित है:-

जे तो थे आज होता चरणसिंघजी तो देखता-
थारै ईं भारत देस मैं करसो घणूं दुख पावै है!
करसो घणूं दुख पावै है, बात बात मैं ठिगावै है!!
चौधरी थारै.............
आज़ादी खातर लड़्यो कुण, कुरबान्यां कुण दी बां की ही सन्ताना बूझै है!
चुण-चुण भेज्या लोगड़ा, भरती करिया जो लोगड़ा, बांनै सहणों सदा सूझै है!!
सीकर का भूभाग मैं सहीद होगा 117 करसा-करसाणियाँ बेरो नीं है कोई नै!
बांरा जितरा और कुण सहीद हुया, इणको लेखो भी खाली कोई कोइनै!!
लेखो लिखबो जाणै कोनी, जद ही तो करसो पिछतावै है।।1।। चौधरी थारै देस......
कुण जाणै करसां नै कुण जाणै बांका पुरखां री आज़ादी री कुरबानी!
बैठगा च्यारूं ओर गैर करसां रा मिनख बैही मनीजै ग्यानी हर ध्यानी!!
ग्यानी-ध्यानी आपको ही ध्यान राखैं, करता जावैं दिनादिन खूब कारस्तानी!!!
इण कारस्ताणयां नै रोकै कुण, जे कोई चावै रोकणों तो बीकी चावै ऐ कुरबानी!!!!
40 करोड़ को एमपी को कलरक देखर करसारो जी ललचावै है।।2।। चौधरी थारै देस.......
मरगा मिनख करसां रा आज़ादी खातर, बैठ्या सुख और पाए रिया!
करसा रै भूख आज भी, करजो दाबै, ब्याव-सावै डूबता जाय रिया!!
कळ-कारखाना पलै-फूलै, बै उतपाद री कीमत खुद ही लगाय रिया!!!
करसा री कुण सुणै देस मैं, बींरा उतपाद री कीमत और ही लगाय रिया!!!!
करजो चूकै न दादा को पोता सूं , फेर भी सदा पचणु बो चावै है।।3।। चौधरी थारै देस......
छळाव छळ हर चालाकी, गुंडागरदी हर बदमासी ऐ ही रहगा बाकी है!
छाछ-दूध री जगां दारू हर हर फ़रेब री खातर जेब मैं ही वाकी-टाकी है!!
बेसरमी री हदां टूटगी, धोळा दीखता बै काळा हुगा, अब रियो नै मिनखाचारो है!!!
मिनख करसो पूरो आज भी पण बीकै खातर कुण सोचै बठै ही बैठ्यो बिचारो है!!!!
अब एकर फेरूं आव चौधरी ऐ करसा थारी आत्मा नै बुलावै है।।4।। चौधरी थारै देस......
जद 29 मई सण सत्यासी नै बा सत्यानासी बेळा आई ही!
रो-रो भारत रा करसा री आतमा जद बार बार अकुलाई ही!!
रोई ही बैलयाँ री जोड़ी भी वाह रै हाळी, थारी बांकी चतराई ही!!!
आज बरस 31 होय रिया जद तूं नहीं देस रो करसो ज्यान गंवाई ही!!!!
अब तो आज्या धणीड़ा, ईं करसा नै अब और क्यूँ रुलाणु चावै है।।5।। चौधरी थारै देस.....

चौधरी चरणसिंह की वंशावली

चौधरी चरणसिंह वंशावली

चौधरी चरणसिंह के पूर्वजों का इतिहास - डॉ. किरणपाल सिंह[1] लिखते हैं कि....[पृ.165]: चौधरी चरणसिंह के पूर्वज तेवतिया वंशी राजा नाहरसिंह फरीदाबाद जिले के बल्लभगढ़ रियासत के राजा थे. बल्लबगढ़ से उत्तर की ओर 3 मील के फासले पर सीही नाम का एक ग्राम है। 1705 ई. के लगभग सरदार गोपाल सिंह नाम का एक जाट वीर जानौली से यहां आकर बसा। फरीदाबाद में उस समय मुगलों की ओर से मुर्तिजा खां ऑफिसर था। उसने भयभीत होकर गोपालसिंह से संधि कर ली और उसे फरीदाबाद के परगने का चौधरी बना दिया। यह घटना 1710 ई.की है। गोपालसिंह मुगलों की कमजोरी से खूब लाभ उठाना चाहता था। इसलिए सेना की भर्ती और धन भी संग्रह शीघ्रता-पूर्वक करने लगा। किन्तु उसका इरादा पूरा होने से पहले ही मृत्यु हो गई। उसके बाद चरनदास चौधरी बना। चरनदास के पुत्र बलराम थे. बलराम, महाराजा सूरजमल भरतपुर नरेश की सहायता से बल्लबगढ़ परगने का शासक हुआ। यह घटना सन् 1747 ई० की है। बलराम ने बल्लबगढ़ में एक सुदृढ़ किला बनाया और अपने राज्य की शक्ति को बढ़ाया। उसी राजा बलराम के नाम से यह बल्लबगढ़ प्रसिद्ध हुआ। 29 नवम्बर, 1753 में राजा बलराम तेवतिया की मृत्यु हो गई। बलराम के मारे जाने के बाद में महाराज सूरजमल ने उनके लड़के विशनसिंह और किशनसिंह को किलेदार और नाजिम बनाया। वे सन् 1774 तक बल्लभगढ़ के कर्ता-धर्ता रहे। उनके बाद हीरासिंह बल्लभगढ़ का मालिक हुआ। बल्लबगढ़ के राजाओं का खिताब राजा का था। [2]

बल्लभगढ़ के राजा राजा नाहरसिंह (21.4.1823 – 9.1.1858) इसी वंश में नरेश हुआ। सन् 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता युद्ध, जो अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ा गया, के समय राजा नाहरसिंह की शक्तिशाली सेना ने दिल्ली के दक्षिण तथा पूर्व की ओर से अंग्रेजी सेना को दिल्ली में प्रवेश नहीं होने दिया। अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिये. इस पर अंग्रेज सेनापति ने भी कहा “दिल्ली के दक्षिण पूर्वी भाग में राजा नाहरसिंह की जाट सेना के मोर्चे लोहगढ़ हैं, जिनको तोड़ना असम्भव है।” अंग्रेजों ने इस वीर योद्धा राजा नाहरसिंह को धोखे से पकड़ लिया और चांदनी चौक में 9.1.1858 को फांसी पर लटका दिया.[3]

बल्लभगढ़ से भटौना आगमन: अंग्रेजों के अत्याचारों से पीड़ित राज परिवार तथा अन्य देशभक्त तेवतिया जाटों ने एक विशेष रणनीति और समय के अनुसार वहां से हटना ही उचित समझा. यह परिवार काफी बड़ा था इन्हीं में चौधरी चरणसिंह के पितामह बादामसिंह भी थे, जिन्होंने बुलंदशहर जनपद में तेवतिया जाटों द्वारा बसाये गए गांव भटौना में आकर शरण ली. भटौना में जमीन कम थी और शरणार्थी ज्यादा आ गए. धीरे-धीरे वे आसपास के कई गाँवों में फैल गए. भटोना से निकलने के कारण वे भटोनिया कहलाते हैं अर्थात तेवतिया का एक पर्याय भटोनिया भी हो गया.

भटौना-सियामी-नूरपुर आगमन - चौधरी बादामसिंह भी अपने परिवार के साथ हापुड़ के पास सियामी गांव में आकर बसे. उन की पांच संताने थी आयुक्रम के अनुसार सर्वश्री 1. लखपत सिंह, 2. बूटा सिंह, 3. गोपाल सिंह, 4. रघुवीर सिंह तथा 5. मीर सिंह.

परिवार बड़ा था और आजीविका के साधन कम. अतः नए सिरे से फिर कृषि भूमि तलाशने का कार्य शुरू हुआ. इसी क्रम में यह परिवार सियामी से कुछ हटकर हापुड़-बाबूगढ़ के पास नूरपुर गांव आ गया. यहां दलाल बंसी जाटों की रियासत कुचेसर की कुछ जमीन बटाई पर ले ली और वहीं छप्पर की झोंपड़ी डालकर बस गए जो बाद में नूरपुर की मड़ैया नाम से जानी गई. चौधरी मीरसिंह कठिनाइयों तथा अभाव में ही सही पर अपनी आयु के 18 बसंत देख चुके थे. चौधरी बादाम सिंह के पुत्रों ने अपने अथक परिश्रम से असिंचित जमीन को उपजाऊ बनाया. नूरपुर की मढैया में उस समय खुशी की लहर दौड़ गई जब यहां पहली बार ढोलक बजी और गीत गाए गए. यह शुभ दिन था जब चौधरी लखपतसिंह के सबसे छोटे भाई मीर सिंह ने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया और बुलंदशहर जनपद के चितसोना अलीपुर गांव की सुशील समझदार कन्या नेत्रकौर को पत्नी के रूप में वरण कर बैलगाड़ी में बिठाकर घर लाये. घर की छोटी तथा दुलारी बहू नेत्रकोर को प्यार से सभी नेतो के नाम से बुलाते थे. चौधरी मीरसिंह सीधे-साधे छल कपट से दूर एक मेहनती व्यक्ति थे.

चौधरी मीरसिंह और नेत्रकौर की कड़ी मेहनत खेती में रंग लाई और परिवार संपन्नता और स्मृद्धि की ओर अग्रसर होने लगा. यही वह समय था जब नेत्रकौर की कोख से 23 दिसम्बर 1902 को बालक चरण सिंह ने नूरपुर की मड़ैया में जन्म लिया, जो आगे चलकर भारत के प्रधानमंत्री बने.


[पृ.166]: नूरपुर की मढैया को भारत के प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह की जन्मस्थली होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. यह गांव पहले मेरठ जनपद में था, बाद में गाजियाबाद जनपद में आया और अब हापुड़ जिले में है. यह हापुड़ से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. हापुड़ से 5 किमी दूरी पर मुरादाबाद मार्ग पर बाबूगढ़ स्थित है जो एक पुरानी छावनी है. बाबूगढ़ से चलकर दाहिनी तरफ आगे बछलौता गाँव है और फिर काकोडी गाँव. 16 किमी लंबा यह सड़क का टुकड़ा बाबूगढ़ कस्बे और भौंबहादुर नगर (बुलंदशहर जनपद) को जोड़ता है.


[पृ.167]: यह स्मरणीय है कि मुख्य नूरपुर गांव से हटकर तेवतिया जाटों द्वारा 5 घर बसाये गए थे फूसकी झोपड़ी डालकर. आज यहां 20 घर हैं, सभी पक्के और आधुनिक सुविधाओं युक्त. जनसंख्या इस गांव की 120 है.

नूरपुर की मड़ैया में चौधरी चरणसिंह की एक संगमरमर की आदमक़द मूर्ति स्थापित की गई है. इस प्रतिमा का अनावरण 24 दिसंबर 1990 को पूर्व केंद्रीय मंत्री जारह फर्नांडीजे ने किया था, जिस समारोह में मुख्य अतिथि के रुप में चौधरी साहब के आत्मज पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी अजीतसिंह भी विद्यमान थे. इसी परिसर में तत्कालीन विधायक चौधरी जगतसिंह की विधायक निधि से निर्मित दो कमरे का स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह पुस्तकालय, नूरपुर मढैया - जनपद - गाजियाबाद भी जनसामान्य के ज्ञान को बढ़ा रहा है. उन्हें प्राचीन तथा अर्वाचीन भारतीय इतिहास से परिचित करा रहा है. इस पुस्तकालय के उद्घाटन हेतु श्री राजनाथ सिंह, मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश, चौधरी साहब की जयंती के अवसर पर 23 दिसंबर 2000 को नूरपुर पधारे थे.

नूरपुर से जानी खुर्द :चौधरी मीरसिंह अच्छे कदके, मजबूत-हृष्ट-पुष्ट शरीर और मेहनतकश किसान थे. उनके श्रम से यहां फसल भी अच्छी होने लगी थी. परंतु जमीन थोड़ी थी वह भी अपनी नहीं बटाई की, मालिक कभी भी वापस ले सकता था. इसलिए चौधरी मीर सिंह और उनके भाइयों को कृषि भूमि की नई खोज में लगा दिया. जिसमें वह सफल भी हो गए. इन्हीं दिनों कुछ तेवतिया परिवारों ने मिलकर मेरठ जिले के अंतर्गत जानीखुर्द नामक गांव में जमीन खरीद ली. यह जमीन उन्होंने मेरठ के पत्थर वाले जमीदार सेठ से खरीदी थी. चौधरी मीर सिंह का परिवार भी वहां 10 एकड़ जमीन खरीदने में सफल हो गया. वस्तुतः चरण सिंह के जन्म के 6 महीने के अंदर ही अन्य परिवारों के साथ उनका परिवार भी अपने नए खरीदे हुए भूखंड का स्वामी बनकर नूरपुर से 40 किलोमीटर दूर जानी खुर्द आ गया और वही अपनी भूमि पर छप्पर डालकर बस गए.


[पृ.168]: यहां पहुंचे सभी तेवतिया लोग एक ही स्थान पर छप्पर बनाये और एक नई मड़ैया बसाई और उसका नाम रखा गया भूपगढ़ी. यह नाम तत्कालीन वयोवृद्ध चौधरी भूपसिंह के नाम पर रखा गया. भूप गढ़ी में जमीन कम थी और परिवार बड़ा, सो गाजियाबाद तहसील के अंतर्गत भदौला गांव में और जमीन खरीदी गई. जमीन के पारिवारिक बटवारे में चौधरी मीरसिंह को भूपगढ़ी तथा अन्य बड़े भाइयों को भदौला की जमीन मिली. अतः चौधरी लखपत सिंह और अन्य बड़े भाई भदौला जाकर बस गए.

जानी खुर्द से भूपगढ़ी केवल पौन किलोमीटर की दूरी पर वसा है. भूपगढ़ी लगभग 100 घर व 1600 जनसंख्या वाला स्मृद्धशाली गाँव है. इस गांव को 1904 ई. के आसपास बसाया गया और बसाने वाले थे अलग-अलग स्थानों से विस्थापित हुए तेवतिया जाटों के 5-6 परिवार. इनमें से चौधरी मीर सिंह, चौधरी चंपत सिंह, चौधरी खड़ेचू व चौधरी बीरबल सिंह आदि, जो सभी नूरपुर की मढैया से यहां आए थे. कृषि कार्य के लिए जमीन ली और फूस की झोंपड़ी डालकर बस गए. उस समय चरण सिंह लगभग 6 माह के अबोध बालक रहे होंगे.


[पृ.169]: चरण सिंह का स्कूल में प्रवेश: चौधरी मीर सिंह पढ़े लिखे न थे पर वे अपने पुत्र को पढ़ाना चाहते थे. उन्होने जानी खुर्द की प्राथमिक पाठशाला में नाम लिखा कर पंडित जी के हवाले कर दिया. चरण सिंह कुशाग्र बुद्धि थे. उनकी स्मरण शक्ति भी तेज थी. पंडित जी जो पढ़ाते उसे तुरंत ग्रहण कर लेते थे और जो प्रश्न पूछते उनका तुरंत उत्तर देते. गुरुजी ने सलाह दी की चरण सिंह की उन्नति के लिए पास के गांव पढ़ने हेतु सिवाल गाँव के विद्यालय भेजा जावे. भूपगढ़ी से सिवाल के बीच की दूरी ढाई किमी थी और रास्ता ऊबड़-खाबड़ और टेढ़ा-मेधा. बीच में उत्तर भारत की सबसे बड़ी नहर गंग-नहर भी पड़ती थी. 9-10 वर्ष का बालक चरण सिंह अकेला आने-जाने लगा. मीर सिंह ने उसके लिए एक घोड़े का प्रबंध किया जिस पर सवार होकर लगभग तीन महीने में अपनी वह विशेष उत्तीर्ण की. चरण सिंह ने जानी खुर्द प्राइमरी स्कूल की अंतिम कक्षा सर्वोत्तम अंक प्राप्त कर की.


चौधरी चरणसिंह की वंशावली[4]:

  • पितामह: श्री बादामसिंह → बादामसिंह के पुत्र सर्वश्री 1. लखपत सिंह, 2. बूटा सिंह, 3. गोपाल सिंह, 4. रघुवीर सिंह तथा 5. मीर सिंह.
  • पिता: श्री मीरसिंह, निवासी ग्राम नूरपुर जिला मेरठ, उत्तरप्रदेश
  • माता: श्रीमती नेत्रकौर
  • भाई-बहिन: 1. श्यामसिंह, 2. मानसिंह, 3. रामदेवी और 4. रिसालकौर
  • पुत्रियाँ (5):
1. सत्यवती - चौ० चरणसिंह की सबसे बड़ी पुत्री सत्या का विवाह एक विद्वान् प्रो० गुरुदत्तसिंह सोलंकी के साथ हुआ। वह आगरा के पास कस्बा कागरौल के मूल निवासी थे। वह खेरागढ विधान सभा क्षेत्र (जिला आगरा) से उत्तर प्रदेश विधानसभा के एम० एल० ए० चुने गये और इसी सदस्य के रूप में ही उनका मार्च 1984 ई० में निधन हो गया।
2. ज्ञानवति - दूसरी पुत्री ज्ञान, जो मेडिकल ग्रेजुएट है, सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देकर जेनोआ में अपने पति के पास चली गई। वह आई० पी० एस० अफसर है।
3. वेदवती (पति:जयपाल सिंह लुहाच) - तीसरी पुत्री वेद का विवाह, राम मनोहर लोहिया हस्पताल के एक योग्य डाक्टर जे० पी० सिंह के साथ हुआ।
4. सरोज - चौथी पुत्री सरोज का विवाह श्री एस० पी० वर्मा के साथ हुआ है जो कि उत्तरप्रदेश में गन्ना विभाग में अफसर है। इनका यह अन्तर्जातीय विवाह है।
5. शारदा - 5वीं पुत्री शारदा अजित सिंह से छोटी है. इनका विवाह वासुदेव सिंह के साथ हुआ.
  • पुत्र: अजित सिंह (जन्म:12.2.1939) - चौ० चरणसिंह का एक ही पुत्र अजीतसिंह है जिसने यन्त्रशास्त्र विश्वविद्यालय की उपाधि धारण की है। वह अमेरिका में नौकरी करते थे। वहां से त्यागपत्र देकर भारत आ गये और लोकदल के प्रमुख मन्त्री (General Secretary) चुने गये। आप लोकसभा के सदस्य भी हैं। चौ० अजीतसिंह का विवाह राधिका से हुआ जिनके तीन बच्चे हैं → 1. जयंत, 2. निधि, 3. दीप्ति

पिक्चर गैलरी

स्वयं के चित्र

परिवार के चित्र

सार्वजनिक जीवन के चित्र

प्रधान मंत्री के चित्र (28.7.1979-14.1.1980)

चौधरी चरणसिंह स्मारकों के चित्र

संदर्भ

  1. संस्तवन: एक आलोक पुरुष का - चौधरी चरण सिंह स्मृति-ग्रंथ, संपादक डॉ. किरणपाल सिंह, प्रकाशक: भारतीय राजभाषा विकास संस्थान देहरादून, ISBN 978-81-906127-5-3, प्रथम संस्करण 2010, पृ.165-169
  2. जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृ.719-720
  3. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter X,p.940
  4. संस्तवन: एक आलोक पुरुष का - चौधरी चरण सिंह स्मृति-ग्रंथ, संपादक डॉ. किरणपाल सिंह, प्रकाशक: भारतीय राजभाषा विकास संस्थान देहरादून, ISBN 978-81-906127-5-3, प्रथम संस्करण 2010, पृ.635

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