Chahar

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Captain Bhagwan Singh

Chahar (चाहर) [1] Chahad (चाहड़)[2] Char (चार)[3] [4] Chaharag (चहारग)[5] is a gotra of Jats found in Rajasthan, [6]Madhya Pradesh, Haryana and Uttar Pradesh in India. Chahar Jats are known for simplicity and honesty. Chahar Jats have been also awarded the title of Faujdar like Sinsinwar, Kuntal and Sogarwar Jats. The Muslim rulers awarded the title of Faujdar to people who had responsibility of protecting some territory.

Contents

Origin

Chahars originated from Chola vansha rulers in south India.[7] Char clan is found in Afghanistan. [8]

History of Chahars

Raja Chahar Deo ruled at the Narwar fort in Gwalior region at the end of 13th century. Coins of Chahar Deo are found in the region with "Asawar Sri Samant Deo" marked on one side and "King riding horse" on the other side. Raja Chahar Deo ruled Narwar till vikram samwat 1355. After the fall of his rule at Narwar his descendents moved to "Brij Bhumi" region of Uttar Pradesh. Other group of Chahar Jats moved to Matsya and Jangladesh regions of Rajasthan.

Chahar Jat Raja Maldeo, about six centuries ago, ruled at Sidhmukh in Jangladesh (Bikaner). Ghulam Badsah Khizr Khan (r. 1414–21) ruled Delhi at that time. The Muslim army while returning from Jaisalmer had a tough fight with Raja Maldeo. The chief of the Muslim army wanted to take away with him the daughter of Maldeo, Somadevi. In the war with Muslim army Maldeo, Somadevi and most of Chahars were killed at near the boarder of Sidhmukh. Remaining members of his family migrated to Jhunjhawati region.

Ramki Chahar has been very popular and brave name among Chahars. Ramki Chahar along with Raja Khemkaran of Sugreevgarh gave a very tough fight to the Muslim army.

Villages founded by Chahar clan

Chahar Pal

Chahar Pal has 242 villages of Chahars in Chaharwati area in Chahar Khap in Agra district. Jat gotra is Chahar. This is a very large Khap. Akola Agra (अकोला), Veri (वेरी) , Jengora (जेंगोरा) , Ramnagar Agra (रामनगर) , Kakua (ककुआ), Kuthaoli,Lauria (लौरिया), Vaiman (वैमन), Basairi (बसैरी), and Bhandai (भान्डई) are are main villages of the khap. [18] This khap has produced many great leaders. See notable persons of this clan.

फौजदार उपाधि

फौजदार - यह उपाधि मुगल शासनकाल में उन शाही उच्च अधिकारियों को दी जाती थी जो कई परगनों या प्रान्त की शासन व्यवस्था करते थे। जाटों को यह उपाधि भरतपुर नरेश महाराजा सूरजमल ने देनी आरम्भ की थी। प्राचीन राजवंशज जाट जो महाराजा की सेना में बड़ी संख्या में भरती थे, उनको महाराजा सूरजमल ने यह फौजदार की उपाधि प्रदान की थी। भरतपुर के सभी सिनसिनवार गोत्र के जाट, अलीगढ, मथुरा के खूंटेल (कुन्तल), डागुर, चाहर, गंड और भगौर गोत्रों के जाट फौजदार कहलाते हैं।[19]

ठाकुर देशराज लिखते हैं

चाहर वंश के लोग संयुक्त-प्रदेश के आगरा जिले में बहुत हैं। सच्चाई और सीधेपन के लिये ये खूंटेल जाटों की भांति प्रसिद्ध हैं। रंग के उजलेपन मे खूंटेलों से कुछ हल्के और परिश्रम में श्रेष्ठ होते हैं। सिनसिनवार, खूंटेल तथा सोगरवारों की भांति चाहर भी फौजदार कहलाते हैं। फौजदार का खिताब बादशाहों की ओर से उन लोगों को बताया जाता था जो कि किसी प्रदेश के किसी भाग की रक्षा का भार अपने ऊपर ले लेते थे। चाहर लोगों में रामकी चाहर बड़ा बहादुर हुआ है। इसने सुग्रीवगढ़ के राजा खेमकरण के साथ मुस्लिम सेनाओं को बड़ा तंग किया था। जांगल (बीकानेर) प्रदेश में सीधमुख नामक स्थान पर अब से करीब 550 वर्ष पहले मालदेव नाम का चाहर राज करता था। उस समय देहली में गुलाम बादशाहों का राज्य था। जैसलमेर से लौटते हुए एक मुसलमान सेनापति से मालदेव का युद्ध हुआ था। घटना इस प्रकार बताई जाती है कि मुसलमान सेनापति ने मालदेव के गढ़ से बाहर अपना डेरा डाला। कहते हैं कोई भैंसा सांड बिगड़ गया,स्त्री-पुरुष और बच्चे हाय-हाय करने लगे। मुसलमान सैनिक भी सांड के सामने न आए। मालदेव की पुत्री ने जिसका नाम सोमादेवी था, भैंसे को सींग पकड़कर रोक लिया, वह पूरा बल लगाकर भी न छुड़ा सका। मुसलमान सेनानायक जिसका नाम नहीं लिखा, सोमादेवी को ले जाने के लिये अड़ गया। जाटों की ओर से उसे समझाया गया। आखिर सीधमुख की सीमा पर लड़कर मालदेवजी काम आए और उनके परिवार के लोग उधर से निकलकर झूंझावाटी में आ गये। [20]

चाहर गोत्र का इतिहास

सन्दर्भ- अनूप सिंह चाहर, जाट समाज आगरा, नवम्बर 2013, पृ. 26-27

प्राचीन इतिहास के अनुसार चौथी शताब्दी में चहल (यूरोपियन इतिहासकारों के चोल) केस्पियन सागर के पूर्व में मध्य एशिया के दहिस्तान में गुरर्गन के शासक थे। सन 438-439 ई. में ईरान सम्राट यज्दगिर्द द्वितीय (Yazdegird II) ने चहलों के विरुद्ध अभियान छेड़ा। दहिस्तान के घास के मैदान में उत्तरी प्रजदिगिर्द गुरर्गन में सम्राट के सैनिक शिविर में ही चाहलों ने उसे मार दिया। सन 440 ई. यज्दगिर्द तृतीय (Yazdegird III) ने चाहलों को युद्ध में हरा दिया। चाहल भारत में सम्भवतः पांचवीं शदी में आये थे। इनको चहल-चाहल तथा चहर-चाहर दोनों रूप से उच्चारित किया जाता है।

इन्हें गीक, मध्य एशिया, दक्षिण भारत में चोल और चीन, मंगोलिया, ब्रज (भारत) में चाहर, पंजाब, हरयाणा, पाकिस्तान में चाहल-चहल के रूप में उच्चारित किया जाता है। भारत एवं विदेशों में मुसलमान, ईसाई , हिन्दू तथा अन्य धर्मों में चहल-चाहल जाट पाये जाते हैं।

रामायण, महाभारत, मैगस्थनीज के वृतांत, अशोक के शिलालेखों तथा अन्य ग्रंथों में चोलों का उल्लेख मिलता है।

चाहर उस चोल जाटवंश की शाखा हैं, जिसका शासन रामायण काल में दक्षिण भारत में था। महाभारत काल में इनका राज्य उत्तर दिशा में भी था।

महाभारत वन पर्व अध्याय-48 में उल्लेखित चोल देश के नरेश ने महाराजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में काफी धनराशि भेंट की थी।

यत्र सर्वान महीपालाञ शस्त्रतेजॊ भयार्थितान
सवङ्गाङ्गान सपौण्ड्र उड्रान सचॊल थरविडान्धकान (III.48.18)

महाभारत सभा पर्व अधयाय-24 में अर्जुन द्वारा उत्तर में जीते गए राज्यों में चोल भी था।

ततः सुह्मांश च चॊलांश च किरीटी पाण्डवर्षभः
सहितः सर्वसैन्येन परामदत कुरुनन्थनः (II.24.20)

महाभारत भीष्म पर्व अध्याय-10 में भारतवर्ष के भूगोल का वर्णन किया गया है जिसमें चोल राज्य का उल्लेख दक्षिण के राज्यों के साथ किया गया है।

कर्णिकाः कुन्तिकाश चैव सौब्धिदा नलकालकाः
कौकुट्टकास तदा चॊलाः कॊङ्कणा मालवाणकाः (VI.10.58)

महाभारत भीष्म पर्व अध्याय-46 में चोल राजा का उल्लेख दक्षिण के राज्यों के साथ किया गया है।

बाह्लिकास तित्तिराश चैव चॊलाः पाण्ड्याश च भारत
एते जनपथा राजन थक्षिणं पक्षम आश्रिताः (VI.46.50)

आठवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में चोल वंश जाटों का राज्य था, जिसमें तमिलनाडु और मैसूर के अधिकांश प्रदेश शामिल थे।

नौवीं शताब्दी में पालवों के ध्वंशावशेषों पर चोल वंश स्थापित हुआ। चोल वंश के संस्थापक विजयपाल नरकेशरी (850-891 ई.) थे इनकी राजधानी तांजाप (तंजौर या तंझुवर) थी। इस वंश में अनेकों पराक्रमी राजा हुए। राजेन्द्र चोल द्वितीय (1051–1063 ई.) और राजा राजराज (1063–1070 ई.) कुलोत्तुंग (1070–1120 ई.) के पश्चात् इस वंश के शासक कमजोर होते चले गए। चालुक्यों और मालिक काफूर ने 14 वीं शताब्दी में चोल वंश को जीत लिया।

राजस्थान में चाहर गोत्र

  • ऋषि - भृगु
  • वंश - अग्नि
  • मूल निवास - आबू पर्वत राजस्थान। शिव के गले में अर्बुद नाग रहता है उसी के नाम पर इस पर्वत का नाम आबू पर्वत पड़ा।
  • कुलदेव - भगवान सोमनाथ
  • कुलदेवी - ज्वालामुखी
  • पित्तर - इस वंश में संवत 1145 विक्रम (सन 1088 ई.) में नत्थू सिंह पुत्र कँवरजी पित्तर हुए हैं, जिनकी अमावस्या को धोक लगती है। इस वंश की बादशाह इल्तुतमिश (r. 1211–1236) (गुलाम वंश) से जांगल प्रदेश के सर नामक स्थान पर लड़ाई हुई।

राजा चाहर देव - इस लड़ाई के बाद चाहरों की एक शाखा नरवर नामक स्थान पर चली गयी। सन् 1298 ई. में नरवर पर राजा चाहरदेव का शासन था। यह प्रतापी राजा मुस्लिम आक्रांताओं के साथ लड़ाई में मारा गया और चाहर वंश ब्रज प्रदेश और जांगल प्रदेश में बस गया। इतिहासकारों को ग्वालियर के आस-पास खुदाई में सिक्के मिले हैं जिन पर एक तरफ अश्वारूढ़ राजा की तस्वीर है और दूसरी और अश्वारूढ़ श्रीसामंत देव लिखा है। इतिहासकार इसे राजा चाहरदेव के सिक्के मानते हैं।

संवत 1324 विक्रम (1268 ई.) में कंवरराम व कानजी चाहर ने बादशाह बलवान को पांच हजार चांदी के सिक्के एवं घोड़ी नजराने में दी। बादशाह बलवान ने खुश होकर कांजण (बीकानेर के पास) का राज्य दिया। 1266 -1287 ई तक गयासुदीन बलवान ने राज्य किया। सिद्धमुख एवं कांजण दोनों जांगल प्रदेश में चाहर राज्य थे।

राजा मालदेव चाहर - जांगल प्रदेश के सात पट्टीदार लम्बरदारों (80 गाँवों की एक पट्टी होती थी) से पूरा लगान न उगा पाने के कारण दिल्ली का बादशाह खिज्रखां मुबारिक (सैयद वंश) नाराज हो गए। उसने उन सातों चौधरियों को पकड़ने के लिए सेनापति बाजखां पठान के नेतृतव में सेना भेजी। खिज्रखां सैयद का शासन 1414 ई से 1421 ई तक था। बाजखां पठान इन सात चौधरियों को गिरफ्तार कर दिल्ली लेजा रहा था। यह लश्कर कांजण से गुजरा। अपनी रानी के कहने पर राजा मालदेव ने सेनापति बाजखां पठान को इन चौधरियों को छोड़ने के लिए कहा. किन्तु वह नहीं माना। आखिर में युद्ध हुआ जिसमें मुग़ल सेना मारी गयी. इस घटना से यह कहावत प्रचलित है कि -

माला तुर्क पछाड़याँ दे दोख्याँ सर दोट ।
सात जात (गोत) के चौधरी, बसे चाहर की ओट ।

ये सात चौधरी सऊ, सहारण, गोदारा, बेनीवाल, पूनिया, सिहाग और कस्वां गोत्र के थे।

विक्रम संवत 1473 (1416 ई.) में स्वयं बादशाह खिज्रखां मुबारिक सैयद एक विशाल सेना लेकर राजा माल देव चाहर को सबक सिखाने आया। एक तरफ सिधमुख एवं कांजण की छोटी सेना थी तो दूसरी तरफ दिल्ली बादशाह की विशाल सेना।

मालदेव चाहर की अत्यंत रूपवती कन्या सोमादेवी थी। कहते हैं कि आपस में लड़ते सांडों को वह सींगों से पकड़कर अलग कर देती थी। बादशाह ने संधि प्रस्ताव के रूप में युद्ध का हर्जाना और विजय के प्रतीक रूप में सोमादेवी का डोला माँगा। स्वाभिमानी मालदेव ने धर्म-पथ पर बलिदान होना श्रेयष्कर समझा। चाहरों एवं खिजरखां सैयद में युद्ध हुआ। इस युद्ध में सोमादेवी भी पुरुष वेश में लड़ी। युद्ध में दोनों पिता-पुत्री एवं अधिकांश चाहर मारे गए।

बचे हुए चाहर मत्स्य प्रदेश एवं उदयपुरवाटी (झुंझुनू) आ गए। उदयपुरवाटी के पास परशुरामपुर गाँव बसाया। यहाँ से एक पूर्वज गोपाल चाहर विक्रम संवत 1509 (1453 ई.) बसंत पंचमी (माघ पाँचम) को (18 पीढ़ी) खेजड़ी की डाली रोपकर ग्राम चारावास बसाया। उस समय दिल्ली पर बहलोल लोदी (1451 -1489 ई.) का राज्य था। ग्राम चारावास वर्त्तमान खेतड़ी तहसील जिला झुंझुनू में स्थित है। इस ग्राम के बजरंग सिंह चाहर खेतड़ी के प्रधान हैं और श्री पूरण सिंह चाहर सरपंच हैं।

भरतपुर रियासत की स्थापना में राजाराम के साथ रामकी चाहर ने जाट सैन्य संगठन और सञ्चालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जाटों के यह सेनापति एक ही साथ युद्ध में लड़ते-लड़ते शहीद हो गए यहे।

झुंझुनू में चाहरों के ग्राम हैं - पिचानवा, समस्तपुर, भोड़की, लुटू, बाकरा, बग्गड़, खुडानियां, आबूसर, पबाना आदि. ये सभी गाँव चारावास से गए चाहर जाटों ने बसाये।

स्रोत - जागा सुरेन्द्र सिंह, ग्राम दादिया, तहसील - किशनगढ़, अजमेर, 2. राम चन्द्र चाहर, लाडनू, नागौर

Jat clans linked with Kushan

डॉ धर्मचंद विद्यालंकार [21] लिखते हैं कि कुषाणों का साम्राज्य मध्य-एशिया स्थित काश्गर-खोतान, चीनी, तुर्किस्तान (सिकियांग प्रान्त) से लेकर रूस में ताशकंद और समरकंद-बुखारा से लेकर भारत के कपिशा और काम्बोज से लेकर बैक्ट्रिया से पेशावर औए मद्र (स्यालकोट) से मथुरा और बनारस तक फैला हुआ था. उस समय मथुरा का कुषाण क्षत्रप हगमाश था. जिसके वंशज हगा या अग्रे जाट लोग, जो कि कभी चीन की हूगाँ नदी तट से चलकर इधर आये थे, आज तक मथुरा और हाथरस जिलों में आबाद हैं. आज भी हाथरस या महामाया नगर की सादाबाद तहसील में इनके 80 गाँव आबाद हैं. (पृ.19 )

कुषाणों अथवा युचियों से रक्त सम्बन्ध रखने वाले ब्रज के जाटों में आज तक हगा (अग्रे), चाहर, सिनसिनवार, कुंतल, गांधरे (गांधार) और सिकरवार जैसे गोत्र मौजूद हैं. मथुरा मेमोयर्स के लेखक कुक साहब ने लिखा है कि मथुरा जिले के कुछ जाटों ने अपना निकास गढ़-गजनी या रावलपिंडी से बताया है. कुषाण साम्राज्य के अधिकांश क्षेत्र में जाटों की सघन जन संख्या उनको कुषाण वंसज होना सिद्ध करती है.(पृ.20)

Distribution in Uttar Pradesh

Presently large number of villages of Chahar Jats is found in Agra, Fatehabad and Kheragarh tehsils of Agra district. This area of Agra region is known as Chaharwati due to heavy population of Chahar Jats. There are 242 villages of Chahars in Chaharwati area in Chahar Khap in Agra district.[22] A large number of villages of Chahar Jats are also found in Moradabad district of Uttar Pradesh.

Villages in Agra district

All 100 villages of Chaharwati in Agra, Some villages of Kiraoli Tahseel, Some villages of Fatehpur Sikri of Agra are Chahars village. The list includes:

Akola, Jarua Katra, Kuthaoli, Bhandai, Baad, Bagha, Bamrauli Ahir, Beri Chahar, Bishehara, Chirmoli, Gaharra, Gharhi Jaitu (Murkiya), Jautana, Kakua, Kagarol, Khallauwa, Lauria, Nahchani, Ramnagar Akola, Rithori, Mankenda, Soniga, Tikari (टीकरी) (146),

Villages in Bulandshahr district

Chitsauna (चित्सौना),

Villages in Moradabad district

Sondhan Mohammadpur, Jatpura Moradabad,

Villages in Bareilly district

Chahar Nagla,

Villages in Mathura district

Dhana Teja,

Villages in Sambhal district

Sondhan Mohammadpur,

Distribution in Rajasthan

A large number of villages of Chahar Jats are in Jaipur, Sikar district of Rajasthan.

Locations in Jaipur city

Ambabari, Brahmpuri, Galta Road, Gandhi Nagar, Ganesh Colony (Khatipura), Harijethi ka Chowk, Jawahar Nagar, Kartarpura, Murlipura Scheme, Sanganer, Tonk Road, Yagyashala ki Bawri,

Villages in Sikar district

Basni, Bujianau, Sutot, Sikar, Sewa Ki Dhani, Panana, Gordhanpura, Fatehpura, Dhahar Ka Bas, Kerpura, Kashi Ka Bas, Dhani Motipura, Dholasari, Gothra (Tagalan) (3), Srimadhopur, Bodala (Kotari Luharwas), Vijaypura Laxmangarh (Rulyanimali), Vijaypura (Sihot Badi), Tihawali, Tiwari Ki Dhani, Kotri Luharwas,

Villages in Churu district

Bagsara, Dhani Chhoti Chahara Wali, Charwas, Chhajusar Churu (9), Chhoti Tirpali, Dheerwas Bara, Kangar, Kirtan, Kodasar Jatan, Paharsar, Thathawata,

Villages in Nagaur district

Berasar Jayal, Bhadliya, Indrapura Didwana,

Villages in Hanumangarh district

Dabadi, Bolanwali, Ganeshgarh, Kharsandi, Maliya Nohar, Mallarkhera, Pacca Saharana, Peerkamadia, Ratanpura Saliwala, Sangaria,

Villages in Jodhpur district

Basni,

Villages in Bharatpur district

Astavan Jadid, Astavan Kadim, Bharatpur, Gudawali, Nagla Chahar,

Villages in Chittorgarh district

Chanderia,

Villages in Jalor district

Jalor,

Villages in Jhunjhunu district

Abusar, Baggar, Bakra, Bas Ghasiram Ka, Bas Kuhadu (Mandawa), Basri Jhunjhunu, Bhorki, Bhurasar Ka Bas, Chahron Ka Bas, Charawas, Goth Buhana, Khariya Jhunjhunu, Khudaniya, Lutoo (70), Pabana, Parasrampura Jhunjhunu, Pichanwa, Rijani, Samaspur,

Villages in Sawai Madhopur district

Gangapur City, Kherda,

Villages in Dholpur district

Dholpur,

Distribution in Madhya Pradesh

Bhopal, Sehore, Birlanagar (Gwalior), Shivpuri Harda, Nimach,

Villages in Ratlam district

Villages in Ratlam with population of this gotra are:

Berchha 12, Bilpank 4, Chikliya 18, Delanpur 1, Kalori Khurd 1, Kanser 1, Mundari 1, Namli 2, Narayangarh Sailana 1, Ratlam 21,

Villages in Ujjain district

Nagda,

Villages in Dewas district

Khal,

Villages in Rajgarh district

Pachore,

Villages in Harda district

Harda, Kolwa,

Villages in Shivpuri district

Shivpuri,

Villages in Morena district

Ambah,

Villages in Gwalior district

Birlanagar (Gwalior), Gwalior, Lashkar (Gwalior),

Distribution in Haryana

Villages in Bhiwani District

Chirya (चिड़िया), Dhani Phogat, Ghasola, Samaspur Bhiwani,

Villages in Sirsa District

Jhittikhera, Kaluana, Sahuwala,

Villages in Jhajjar district

Silani

Villages in Hisar District

Chhan, Banbhori, Sandlana,

Distribution in Indian Punjab

Villages in Hoshiarpur district

Villages in Nawanshahr district

Villages in Rupnagar district

Villages in Sangrur district

Notable persons

Gallery of Chahars

References

  1. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. च-39
  2. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. च-72
  3. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. च-33
  4. Dr Pema Ram:‎Rajasthan Ke Jaton Ka Itihas, p.300
  5. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. च-71
  6. Jat History Thakur Deshraj/Chapter IX,p.695
  7. Mahendra Singh Arya et al.: Adhunik Jat Itihas, p.242
  8. An Inquiry Into the Ethnography of Afghanistan: H. W. Bellew, p.97,104,111,119
  9. 1. जागा सुरेन्द्र सिंह, ग्राम दादिया, तहसील - किशनगढ़, अजमेर, 2. राम चन्द्र चाहर, लाडनू, नागौर
  10. 1. जागा सुरेन्द्र सिंह, ग्राम दादिया, तहसील - किशनगढ़, अजमेर, 2. राम चन्द्र चाहर, लाडनू, नागौर
  11. 1. जागा सुरेन्द्र सिंह, ग्राम दादिया, तहसील - किशनगढ़, अजमेर, 2. राम चन्द्र चाहर, लाडनू, नागौर
  12. 1. जागा सुरेन्द्र सिंह, ग्राम दादिया, तहसील - किशनगढ़, अजमेर, 2. राम चन्द्र चाहर, लाडनू, नागौर
  13. 1. जागा सुरेन्द्र सिंह, ग्राम दादिया, तहसील - किशनगढ़, अजमेर, 2. राम चन्द्र चाहर, लाडनू, नागौर
  14. 1. जागा सुरेन्द्र सिंह, ग्राम दादिया, तहसील - किशनगढ़, अजमेर, 2. राम चन्द्र चाहर, लाडनू, नागौर
  15. 1. जागा सुरेन्द्र सिंह, ग्राम दादिया, तहसील - किशनगढ़, अजमेर, 2. राम चन्द्र चाहर, लाडनू, नागौर
  16. 1. जागा सुरेन्द्र सिंह, ग्राम दादिया, तहसील - किशनगढ़, अजमेर, 2. राम चन्द्र चाहर, लाडनू, नागौर
  17. 1. जागा सुरेन्द्र सिंह, ग्राम दादिया, तहसील - किशनगढ़, अजमेर, 2. राम चन्द्र चाहर, लाडनू, नागौर
  18. Dr Ompal Singh Tugania, Jat Samuday ke Pramukh Adhar Bindu, p. 15
  19. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter II, p-85
  20. जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृ.-603
  21. Jat Samaj:11/2013,pp 19-20
  22. Jat Bandhu, Agra, April 1991
  23. Mahendra Singh Arya et al.: Adhunik Jat Itihas, p. 332

Further reading


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