Jat History in Gujarat

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लेखक:लक्ष्मण बुरड़क, IFS (Retd), जयपुर
गुजरात में प्राचीन जाट इतिहास की खोज

प्रस्तावना : जाट एक आदिकालीन समुदाय है और प्राचीनतम क्षेत्रीय वर्ग है। भारत में मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात में वसते हैं। पंजाब में यह जट कहलाते हैं तथा शेष प्रदेशों में जाट कहलाते है। जाटों के वर्तमान विस्तार को देखते हुए यह कल्पना करना सम्भव नहीं है कि इस जाति का गुजरात से कोई सम्बन्ध रहा हो। कुछ प्रमुख इतिहासकार यह मानते हैं कि जाट जाति का विकास कृष्ण द्वारा गठित ज्ञाति संघ से हुआ है। कृष्ण अपने 18 नये कुल-बंधुओ के साथ द्वारका आ गए। यहीं 36 वर्ष राज्य करने के बाद देहावसान हुआ। द्वारका के समुद्र में डूब जाने और यादव कुलों के नष्ट हो जाने के बाद कृष्ण के प्रपौत्र वज्र अथवा वज्रनाभ् द्वार के यदुवंश का अंतिम शासक था जो जीवित बचा था। द्वारका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित किया। वज्रनाभ् के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है। इन्हीं से भरतपुर के सिनसिनवार जाट शासकों का निकास हुआ है।

कृष्ण का द्वारका अभिगमन

कृष्ण ने राजा कंस का वध कर दिया तो कंस के श्वसुर मगधपति जरासंध ने कृष्ण से वैर ठान कर यादवों पर बारम्बार आक्रमण किये। यादवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कृष्ण ने उस स्थान को बदलने का निश्चय किया। विनता के पुत्र गरुड़ की सलाह एवं ककुद्मी के आमंत्रण पर कृष्ण कुशस्थली आ गये। वर्तमान द्वारका नगर कुशस्थली के रूप में पहले से ही विद्यमान था, कृष्ण ने इसी उजाड़ हो चुकी नगरी का पुनः संस्कार किया। महाभारत युद्ध का सञ्चालन द्वारका से ही किया। महाभारत के अनुसार कृष्ण ने द्वारका में 36 वर्ष राज्य किया।

कृष्ण के कुशल निर्देशन में यह सभ्यता सम्पन्नता के शिखर पर पहुँच गयी। इस असीम समृद्धि के फलस्वरूप यादव भोग-विलास में लग गए। उनमें अहंकार आ गया और अनुशासन ख़त्म हो गया। यादवों ने पिण्डतारक (पिण्डारक) क्षेत्र के मुनिजनों को अपमानित किया। कृष्ण ने इन यादवों के संरक्षण का एक प्रयास किया और द्वारका पर आने वाले संकट को ध्यान में रखकर वे उन यादवों को साथ लेकर प्रभास क्षेत्र की तरफ चल पड़े। उन्होंने वृद्धों और स्त्रियों को शंखोद्धार (बेट) जाने की सलाह दी और अन्यों के साथ स्वयं प्रभास आ गए। ऋषियों के शाप के वशीभूत यादव कालक्रम से विनष्ट हो गए। इधर कृष्ण के निवास को छोड़ कर सारी द्वारका को समुद्र ने आत्मसात कर लिया।

इस घटना में कृष्ण और बलराम जिन्दा बचे। कृष्ण ने अर्जुन को सन्देश भेजकर द्वारका को पांडवों के प्रभार में दिया और वन की ओर चल दिए। भाई बलराम ने वन में देहत्याग कर अनंत नाग के रूप में समुद्र में प्रवेश कर गए। कृष्ण वन में योग की मुद्रा में थे तभी एक ज़रा नाम के शिकारी ने हिरन के भ्रम में भल्लबाण चलाया और कृष्ण स्वर्ग सिधार गए। यह स्थान सोमनाथ के पास वेरावल में भालका तीर्थ के रूप में विद्यमान है।

लेखक का सौराष्ट्र प्रवास : लेखक की जिज्ञासा थी कि जिस भगवान कृष्ण के ज्ञाति संघ से जाट जाति का विकास हुआ उनकी नगरी द्वारका और निर्वाण स्थली भलका तीर्थ का दर्शन किया जाये। इस हेतु लेखक ने गुजरात प्रान्त के सौराष्ट्र क्षेत्र के जूनागढ़-गिरनार (19.12.2013), सोमनाथ(वेरावल) (20.12.2013), पोरबंदर-द्वारका-बेट द्वारका (21-22.12.2013), जामनगर (23-24.12.2013), अहमदाबाद (25-26.12.2013) का पत्नी श्रीमती गोमती बुरड़क के साथ प्रवास किया। इन स्थानों के धार्मिक स्थलों का अवलोकन कर उनसे सम्बंधित साहित्य का अध्ययन किया और जाटलैंड साईट पर पूर्व से संकलित तथ्यों के साथ विवेचना की, जिसके आधार पर यह लेख प्रस्तुत किया गया है। गुजरात के इस पश्चिमी भू-भाग को सौराष्ट्र या काठियावाड़ नाम से पुकारा जाता है। प्राचीन साहित्य में इसे सुराष्ट्र कहा गया है।

सौराष्ट्र का परिचय : सौराष्ट्र, वर्तमान काठियावाड़-प्रदेश, जो प्रायद्वीपीय क्षेत्र है। सौराष्ट्र का भू-भाग ज्यादातर दलदली और मरुस्थलीय है। महाभारत के समय द्वारिकापुरी इसी क्षेत्र में स्थित थी। सुराष्ट्र को सहदेव ने अपनी दिग्विजय यात्रा के प्रसंग में विजित किया था। विष्णु पुराण में अपरान्त के साथ सौराष्ट्र का उल्लेख है। इतिहास प्रसिद्ध सोमनाथ का मन्दिर सौराष्ट्र ही की विभूति था। रैवतकपर्वत गिरनार पर्वतमाला का ही एक भाग था। अशोक, रुद्रदामन तथा गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त के समय के महत्त्वपूर्ण अभिलेख जूनागढ़ के निकट एक चट्टान पर अंकित हैं, जिससे प्राचीन काल में इस प्रदेश के महत्त्व पर प्रकाश पड़ता है। रुद्रदामन के अभिलेख में सुराष्ट्र पर शक क्षत्रपों का प्रभुत्व बताया गया है। इस आधार पर कुछ इतिहासकारों ने सुराष्ट्र को शक-राष्ट्र भी कहा है। जान पड़ता है कि अलक्षेन्द्र के पंजाब पर आक्रमण के समय वहाँ निवास करने वाली जाति कठ/कठी जिसने यवन सम्राट के दाँत खट्टे कर दिए थे, कालान्तर में पंजाब छोड़कर दक्षिण की ओर आ गई और सौराष्ट्र में बस गई, जिससे इस देश का नाम काठियावाड़ भी हो गया। गुजरात के काठियावाड़ प्राय:द्वीप में भादर नदी के समीप स्थित रंगपुर की खुदाई 1953-1954 ई. में 'ए. रंगनाथ राव' द्वारा की गई। यहाँ पर पूर्व हड़प्पा कालीन संस्कृति के अवशेष मिले हैं। यहाँ मिले कच्ची ईटों के दुर्ग, नालियां, मृदभांड, बांट, पत्थर के फलक आदि महत्त्वपूर्ण हैं। यहाँ धान की भूसी के ढेर मिले हैं। यहाँ उत्तरोत्तर हड़प्पा संस्कृति के भी साक्ष्य पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं।

द्वारका का परिचय

द्वारका भारत के पश्चिम में गुजरात राज्य के देवभूमि-द्वारका जिले में कच्छ की खाड़ी में स्थित है। द्वारका एक छोटा-सा-कस्बा है। कस्बे के एक हिस्से के चारों ओर चहारदीवारी खिंची है इसके भीतर ही सारे बड़े-बड़े मन्दिर है। आज से हजारों वर्ष पूर्व भगवान कॄष्ण ने इसे बसाया था। कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, गोकुल में पले, पर राज उन्होने द्वारका में ही किया। यहीं बैठकर उन्होने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांड़वों को सहारा दिया। धर्म की जीत कराई और, शिशुपाल और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया। द्वारका उस जमाने में राजधानी बन गई थीं। बड़े-बड़े राजा यहां आते थे और बहुत-से मामले में भगवान कृष्ण की सलाह लेते थे।

द्वारका के प्राचीन नाम: द्वारका भारत के सबसे प्राचीन सात नगरों में से है. इसके विभिन्न नाम इस प्रकार हैं - द्वारावती, कुशस्थली, आनर्तक, ओखा-मण्डल, गोमती द्वारका, चक्रतीर्थ, अन्तर्द्वीप, वारिदुर्ग, उदधिमध्यस्थान

वर्तमान द्वारका - गुजरात प्रान्त के पश्चिम किनारे सागर तट पर द्वारका स्थित है। ऐसा माना जाता है कि वर्तमान त्रैलोक्य सुन्दर जगत-मंदिर का पुनर्निर्माण लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व मुग़ल बादशाह अकबर के शासन काल (1593-1605) में किया गया। भगवान् श्री द्वारकाधीश जी की मूर्ती पश्चिमाभिमुख है। मंदिर के दो प्रवेश द्वार हैं - दक्षिण का प्रवेश द्वार गोमती घाट की तरफ से 56 सीढियाँ चढ़कर प्रवेश किया जाता है। उसे स्वर्ग द्वार कहते हैं और उत्तर का द्वार मोक्षद्वार नाम से जाना जाता है। पूर्व पश्चिम मंदिर की लम्बाई 27.4 मीटर और उत्तर दक्षिण लम्बाई 22 मीटर है। (पृ.20)


त्रैलोक्य सुन्दर जगत-मंदिर - गोमती नदी के उत्तर समुद्र तल से फुट की ऊंचाई पर पश्चिमाभिमुख द्वारकाधीश जी का मंदिर है। इसका शिखर भूतल से 150 फुट ऊँचा है। वहाँ 52 गज (40 मीटर) की ध्वजा फहराती रहती है जो दिन में 4-5 बार बदली जाती है। इस मंदिर में मौर्य, गुप्त, गारुलक, चावड़ाचालुक्य राजकलीन तथा जैन और बौद्ध धर्म के शिल्प का समन्वय दृष्टिगोचर होता है। (पृ.23)

भगवान श्री कृष्ण के शासनकाल में द्वारका की शासन व्यवस्था को सुदृढ़ एवं सुव्यवस्थित रूप से चलाने के लिए भोज, वृष्णि, अंधक, सात्त्वक और दशार्ह कुलों में से तेरह-तेरह यादवों को उनकी योग्यता के अनुसार द्वारका का शासन सौंपा गया था। प्राचीन मान्यता के अनुसार सम्भव है कि भगवान् द्वारकाधीश के मंदिर पर चढ़ाई जान वाली ध्वजा उन बावन प्रकार के यादवों की स्मृति कराती हो। (पृ.30) ऐसा माना जाता है कि यह ध्वजा विश्व की सबसे बड़ी ध्वजा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मंदिर पर चढ़ाई जान वाली ध्वजा उस देवता का स्वरुप ही मानी जाती है। (पृ.31)

कृष्ण द्वारा ज्ञाति-संघ का गठन

कृष्ण द्वारा द्वारका में शासन करने के दौरान ज्ञाति-संघ का गठन किया गया था। ठाकुर देशराज (जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृ.101, 109) एवं डॉ नत्थन सिंह ('जाट इतिहास', पृ. 41) लिखते हैं कि जाट शब्द की उत्पत्ति के विषय में, सर्वाधिक तर्क-संगत एवं भाषा विज्ञान शास्त्र के अनुरूप, उचित मत है कि जाट शब्द का निर्माण संस्कृत के 'ज्ञात' शब्द से हुआ है। अथवा यों कहिये कि यह 'ज्ञात' शब्द का अपभ्रंश है। महाभारत के शांति पर्व अध्याय 82 से सिद्ध होता है की श्रीकृष्ण ने अन्धक तथा वृष्णि जातियों का गण-संघ बनाया था। [1] ठाकुर देशराज (जाट इतिहास, पृ. 89.) लिखते हैं कि महाभारत काल में गण का प्रयोग संघ के रूप में किया गया है। बुद्ध के समय भारतवर्ष में 116 प्रजातंत्र थे। गणों के सम्बन्ध में महाभारत शांति पर्व के अध्याय 108 में विस्तार से दिया गया है। इसमें युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं कि गणों के सम्बन्ध में आप मुझे यह बताने की कृपा करें कि वे किस तरह वर्धित होते हैं, किस प्रकार शत्रु की भेद-नीति से बचते हैं, शत्रुओं पर किस तरह विजय प्राप्त करते हैं, किस तरह मित्र बनाते हैं, किस तरह गुप्त मंत्रों को छुपाते हैं।

महाभारत काल में भारत में अराजकता का व्यापक प्रभाव था। यह चर्म सीमा को लाँघ चुका था। मगध में अत्याचारी जरासंध का एकछत्र राज्य था। हस्तिनापुर में दुर्योधन पांडवों को नष्ट करने की कुटिल चाल चल रहा था। दक्षिण में चेदी नरेश शिशुपाल जरासंध का पुष्टि-पोषक था। मथुरा में कंस पिता को बंदी बनाकर यादवों को पीड़ित कर रहा था। बंगाल नरेश नरकासुर, कामरूप नरेश भगदत्त, उत्तरी आसाम का शासक बाणासुर आदि भी जरासंध की अधीनता में काम कर रहे थे। इस प्रकार उत्तरी भारत में साम्राज्यवादी शासकों ने प्रजा को असह्य विपदा में डाल रखा था। इस स्थिति को देखकर कृष्ण ने अग्रज बलराम की सहायता से कंस को समाप्त कर उग्रसेन को मथुरा का शासक नियुक्त किया। कृष्ण ने साम्राज्यवादी शासकों से संघर्ष करने हेतु एक संघ का निर्माण किया। उस समय यादवों के अनेक कुल थे किंतु सर्व प्रथम उन्होंने अन्धक और वृष्णि कुलों का ही संघ बनाया। संघ के सदस्य आपस में सम्बन्धी होते थे इसी कारण उस संघ का नाम 'ज्ञाति-संघ' रखा गया। [2][3] [4]


यह 'ज्ञाति-संघ' व्यक्ति प्रधान नहीं था। इसमें शामिल होते ही किसी राजकुल का पूर्व नाम आदि सब समाप्त हो जाते थे। वह केवल ज्ञाति के नाम से ही जाने जाते थे। यह राजनैतिक संघ था जिसमें दो दल थे। एक के नेता श्री कृष्ण और दूसरे के उग्रसेन थे। श्री कृष्ण द्वारा स्थापित ज्ञाति-संघ समाजवादी सिद्धांतों के बलपर अपना प्रभाव बढाने लगा और शनै-शनै श्रीकृष्ण ने पीड़ित जनता की रक्षा की। अतएव इस संघ का क्षत्रियत्व स्वयंसिद्ध हो गया। तभी कल्पसूत्र नाम के जैन आगम में इस ज्ञाति-संघ को क्षत्रियों का प्रसिद्ध कुल घोषित कर दिया। [5] 'नायाणं खत्तियांण' यानी क्षत्रियों के प्रसिद्ध कुल के नाम से उत्तर भारत में इसकी प्रसिद्धि हो गई। आगे चलकर इसके अनेक ज्ञाति-संघ बन गए। कुछ ज्ञाति लोगों ने सम्राट या राजा की भी उपाधि धारण कर ली जो राजन्य कहलाये किन्तु प्रसिद्धी उनकी ज्ञातियों के नाम से रही। [6]

ज्ञात से जाट शब्द का बनना

प्राचीन ग्रंथो के अध्ययन से यह बात साफ हो जाती है कि परिस्थिति और भाषा के बदलते रूप के कारण 'ज्ञात' शब्द ने 'जाट' शब्द का रूप धारण कर लिया। महाभारत काल में शिक्षित लोगों की भाषा संस्कृत थी. इसी में साहित्य सर्जन होता था। कुछ समय पश्चात जब संस्कृत का स्थान प्राकृत भाषा ने ग्रहण कर लिया तब भाषा भेद के कारण 'ज्ञात' शब्द का उच्चारण 'जाट' हो गया। आज से दो हजार वर्ष पूर्व की प्राकृत भाषा की पुस्तकों में संस्कृत 'ज्ञ' का स्थान 'ज' एवं 'त' का स्थान 'ट' हुआ मिलता है. इसकी पुष्टि व्याकरण के पंडित बेचारदास जी ने भी की है। उन्होंने कई प्राचीन प्राकृत भाषा के व्यकरणों के आधार पर नवीन प्राकृत व्याकरण बनाया है जिसमे नियम लिखा है कि संस्कृत 'ज्ञ' का 'ज' प्राकृत में विकल्प से हो जाता है और इसी भांति 'त' के स्थान पर 'ट' हो जाता है। [7] इसके इस तथ्य की पुष्टि सम्राट अशोक के शिलालेखों से भी होती है जो उन्होंने 264-227 ई. पूर्व में धर्मलियों के रूप में स्तंभों पर खुदवाई थी। उसमें भी 'कृत' का 'कट' और 'मृत' का 'मट' हुआ मिलता है। अतः उपरोक्त प्रमाणों के आधार पर सिद्ध होता है कि 'जाट' शब्द संस्कृत के 'ज्ञात' शब्द का ही रूपांतर है. अतः जैसे ज्ञात शब्द संघ का बोध कराता है उसी प्रकार जाट शब्द भी संघ का वाचक है। [8]

यह रूपांतर कब हुआ और 'जाट' शब्द कब अस्तित्व में आया। खेद का विषय है कि ब्राह्मण-श्रमण एवं बौध धर्म के संघर्ष में जाटों द्वारा ब्राह्मण धर्म का विरोध करने के कारण इसका इतिहास नष्ट हो गया। जहाँ-तहां इस इस इतिहास के कुछ संकेत मात्र शेष रह गए हैं। व्याकरण के विद्वान पाणिनि का जन्म ई. पूर्व आठवीं शताब्दी में प्राचीन गंधार राज्य के सालतुरा गाँव में हुआ था, जो इस समय अफगानिस्तान में है, उन्होंने अष्टाध्यायी व्याकरण में 'जट' धातु का प्रयोग कर 'जट झट संघाते' सूत्र बना दिया। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि जाट शब्द का निर्माण ईशा पूर्व आठवीं शदी में हो चुका था। पाणिनि रचित अष्टाध्यायी व्याकरण का अध्याय 3 पाद 3 सूत्र 19 देखें: 3. 3. 19 अकर्तरि च कारके संज्ञायां । अकर्तरि च कारके संज्ञायां से जट् धातु से संज्ञा में घ ञ् प्रत्यय होता है. जट् + घ ञ् और घ ञ प्रत्यय के घ् और ञ् की इति संज्ञा होकर लोप हो जाता है। रह जाता है अर्थात जट् + अ ऐसा रूप होता है। फ़िर अष्टाध्यायी के अध्याय 7 पाद 2 सूत्र 116 - 7. 2. 116 अतः उपधायाः से उपधा अर्थात जट में के अक्षर के के स्थान पर वृद्धि अथवा दीर्घ हो जाता है. जाट् + अ = जाट[9]

जाट संघ में शामिल वंश

श्री कृष्ण के वंश का नाम भी जाट था। कृष्ण के वंशज जो कृष्णिया या कासनिया कहलाते हैं वर्तमान में जाटों के एक गोत्र के रूप में मौजूद हैं। इस जाट संघ का समर्थन पांडव वंशीय सम्राट युधिस्ठिर तथा उनके भाइयों ने भी किया। आज की जाट जाति में पांडव वंश पाकिस्तान के पंजाब के शहर गुजरांवाला में पाया जाता है। गुजरांवाला से ही गूजर गोत्र का निकास हुआ और गूजर जाट गोत्र के रूप में राजस्थान के नागौर, बाड़मेर, पाली, जोधपुर आदि जिलों में आज भी पाए जाते हैं। राजस्थान के जयपुर जिले में पाण्डु जाट गोत्र आज भी रहते हैं। समकालीन राजवंश गांधार, यादव, सिंधु, नाग, लावा, कुशमा, बन्दर, नर्देय आदि वंश ने कृष्ण के प्रस्ताव को स्वीकार किया तथा जाट संघ में शामिल हो गए। गांधार गोत्र के जाट उत्तर प्रदेश में रघुनाथपुर जिला बदायूं, आगरा जिले के बिचपुरी, जउपुरा, लड़ामदा आदि गाँवों में, अलीगढ़ जिले में तथा मध्य प्रदेश के नीमच जिले में रहते हैं। यादव वंश के जाट क्षत्रिय धर्मपुर जिला बदायूं में अब भी हैं। सिंधु गोत्र तो प्रसिद्ध गोत्र है। इसी के नाम पर सिंधु नदी तथा प्रान्त का नाम सिंध पड़ा। पंजाब की कलसिया रियासत इसी गोत्र की थी। नाग गोत्र के जाट उत्तर प्रदेश में खुदागंज तथा रमपुरिया ग्राम जिला बदायूं में हैं। नागा जाट राजस्थान के नागौर, अलवर, सीकर, टोंक, जयपुर, उदयपुर, चित्तोड़ और जैसलमेर जिलों में तथा मध्य प्रदेश के खरगोन, इन्दोर और रतलाम जिलों में भी पाए जाते है। इसी प्रकार वानर/बन्दर गोत्र जिसके हनुमान थे वे पंजाब और हरयाणा के जाटों में पाये जाते हैं. नर्देय गोत्र भी कांट जिला मुरादाबाद के जाट क्षेत्र में है।[10]


पुरातन काल में नाग क्षत्रिय समस्त भारत में शासक थे। नाग शासकों में सबसे महत्वपूर्ण और संघर्षमय इतिहास तक्षकों का और फ़िर शेषनागों का है। एक समय समस्त कश्मीर और पश्चिमी पंचनद नाग लोगों से आच्छादित था। इसमें कश्मीर के कर्कोटक और अनंत नागों का बड़ा दबदबा था। पंचनद (पंजाब) में तक्षक लोग अधिक प्रसिद्ध थे। कर्कोटक नागों का समूह विन्ध्य की और बढ़ गया और यहीं से सारे मध्य भारत में छा गया। यह स्मरणीय है कि मध्य भारत के समस्त नाग एक लंबे समय के पश्चात बौद्ध काल के अंत में पनपने वाले ब्रह्मण धर्म में दीक्षित हो गए। बाद में ये भारशिव और नए नागों के रूप में प्रकट हुए। इन्हीं लोगों के वंशज खैरागढ़, ग्वालियर आदि के नरेश थे। ये अब राजपूत और मराठे कहलाने लगे। तक्षक लोगों का समूह तीन चौथाई भाग से भी ज्यादा जाट संघ में शामिल हो गए थे। वे आज टोकस और तक्षक जाटों के रूप में जाने जाते हैं। शेष नाग वंश पूर्ण रूप से जाट संघ में शामिल हो गया जो आज शेषमा कहलाते हैं। वासुकि नाग भी मारवाड़ में पहुंचे। इनके अतिरिक्त नागों के कई वंश मारवाड़ में विद्यमान हैं। जो सब जाट जाति में शामिल हैं।[11] इससे स्वत: स्पस्ट है कि काफी संख्या में नागवंशी लोग जाट संघ में शामिल हुए।

जाटसंघ में सामिल 3000 से अधिक गोत्रों की उत्पत्ति और विस्तार का विवरण जाटलैंड वेबसाइट (http://www.jatland.com/home/Gotras) पर उपलब्ध है। जाटसंघ में इतनी अधिक गोत्रों का समावेश इसकी प्राचीनता और प्राचीन काल में उपयोगिता को रेखांकित करता है। किसी भी मानवजातीय समूह में सम्मिलित सामाजिक समूहों की यह सर्वाधिक संख्या है।

जाट इतिहास में द्वारका

जाट वीरों का इतिहास[12] के लेखक - कैप्टन दलीप सिंह अहलावत लिखते हैं कि श्रीकृष्ण जी ने बहुत सोच-विचार के बाद बृज को छोड़ दिया। वहां से जाकर काठियावाड़ में उन्होंने द्वारिका नगरी बसाई। बृज से उनके साथ समस्त वृष्णि, अन्धक, शूर और माधव लोग चले गए थे। वहां पर जाकर कृष्ण जी ने ज्ञाति-राज्य की स्थापना की। वे चाहते थे कि सारे देश में ज्ञाति-राष्ट्र स्थापित हो। यहां यह बता देना जरूरी है कि कि भारत उस समय अनेक कुल-राज्यों (कबीलों के राज्य) में बंटा हुआ था। केवल बृज ही जो कि चौरासी कोस में सीमित है, 9 नन्दवासियों के, 7 वृष्णि लोगों के, 2 शूरों के राज्य थे। इनके अतिरिक्त अन्धक, नव, कारपर्शव और वृष्णि भी इसी 84 कोस के भीतर राज्य करते थे। ये सब जाट थे। द्वारिका में जाति अथवा ज्ञाति-राज्य के आरम्भ में अन्धक और वृष्णि लोग शामिल हुए थे। ये दोनों ही कुल या कबीले थे। मालूम ऐसा होता है कि यादव जाति का प्रायः सारा ही समूह चाहे वे शूर, दशार्ण, भोज, कुन्तिभोज, काम्भोज कुछ भी कहलाते हों, जाति राष्ट्र के रूप में परिणत हो गया था। महाभारत के युद्ध में भी बहुत संख्या में यही लोग थे। द्वारिका के अतिरिक्त मध्यभारत, पंजाब और मगध में जाति-राष्ट्रों की स्थापना हो गई थी। महाभारत में मालवा के बिन्दु और अनुबिन्दु दो राजा शामिल हुए थे, जो जाति-राष्ट्र के ही प्रतिनिधि थे। इस तरह की ज्ञाति (संघ) सबसे अधिक 'वाहीक' देश (पंजाब, सिन्ध, गान्धार) में बनी थी। काशीप्रसाद जायसवाल ने 'वाहीक' को नदियों का प्रदेश माना है। जो प्रदेश हिमालय, गंगा, सरस्वती, यमुना और कुरुक्षेत्र सीमा से बाहर है, तथा जो सतलुज, व्यास, रावी, चिनाव, जेहलम और सिन्धु नदी के बीच स्थित है, उन्हें “वाहीक” कहते हैं। (महाभारत कर्ण पर्व 44 अध्याय, श्लोक 6-7)।

महाभारत में शान्तनु के भाई वाल्हीक के देश को 'वाहीक' कहा है और वाल्हीक प्रतीक का पुत्र और शान्तनु का भाई बताया गया है। इससे साफ है कि पंजाब में अधिकांश संघ चन्द्रवंशी क्षत्रियों के थे। बिहार में अथवा नेपाल की तराई में शाक्य और बृजियों तथा लिच्छवि आदि के संघ थे। यहां पर एक ऐसे राज्यवंश का भी पता चलता है जो कि हमारे ज्ञात शब्द का समानवाची है जिसमें कि भगवान् महावीर पैदा हुए थे।

ज्ञाति अथवा जाति-राष्ट्रों के सम्बन्ध में “भारत शासन पद्धति” के लेखक और पटना कालिज के प्रोफेसर पं० राधाकृष्ण झा ने इस प्रकार लिखा है - “बौद्धकाल के बाद जातीय राष्ट्रों का अन्त हो गया। एक जातीय राष्ट्र दूसरे से या तो मिल-जुल गया या आपस में लड़-झगड़ कर जातीय राष्ट्र को नष्ट कर दिया।”


पुरुवंशी राजा वीरभद्र जाट राजा था जिसके शिविवंशी गण (संघ) शिव की जटा (शिवालक पहाड़ियों) में थे। इसकी राजधानी हरद्वार के निकट तलखापुर थी। शिवपुराण में लिखा है कि वीरभद्र की संतान से बड़े-बड़े जाट गोत्र प्रचलित हुए। वीरभद्र की वंशावली राणा धौलपुर जाट नरेश के राजवंश इतिहास से ली गई है जो निम्नलिखित हैं।

राजा वीरभद्र के 5 पुत्र और 2 पौत्रों से चले जाटवंश[13]

ययाति

पुरु

संयाति

7 पीढ़ियां
वीरभद्र
(1) पौनभद्र, (2) कल्हनभद्र, (3) अतिसुरभद्र, (4) जखभद्र

अंजना जटा शंकर

(1) ब्रह्मभद्र, (2) दहीभद्र

1.पौनभद्र के नाम से पौनिया (पूनिया) गोत्र चला। यह जाट गोत्र हरयाणा, राजस्थान, बृज, उत्तरप्रदेश, पंजाब तथा पाकिस्तान में फैला हुआ है।

2.कल्हनभद्र के नाम से कल्हन जाट गोत्र प्रचलित हुआ। इस गोत्र के जाट काठियावाड़ एवं गुजरात में हैं।

3.अतिसुरभद्र के नाम से अंजना जाट गोत्र प्रचलित हुआ। ये लोग मालवा, मेवाड़ और पाकिस्तान में हैं।

4.जखभद्र के नाम से जाखड़ जाट गोत्र चला। ये लोग हरयाणा, राजस्थान, पंजाब, कश्मीर और पाकिस्तान में फैले हुए हैं।

5.ब्रह्मभद्र के नाम से भिमरौलिया जाट गोत्र चला। जाट राणा धौलपुर इसी गोत्र के थे। धौलपुर की राजवंशावली में वीरभद्र से लेकर धौलपुर के नरेशों तक सब राजाओं के नाम लिखे हुए हैं। इस जाट गोत्र के लोग हरयाणा, हरद्वार क्षेत्र, पंजाब, जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान में हैं।

6.दहीभद्र से दहिया जाट गोत्र प्रचलित हुआ। दहिया जाट हरयाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, पंजाब तथा मध्य एशिया में फैले हुए हैं।


ठाकुर देशराज[14] लिखते हैं कि जाखड़ गोत्र उन क्षत्रियों के एक दल के नाम पर प्रसिद्ध हुआ है, जो सूर्य-वंशी कहलाते थे। मि. डब्लयू. क्रुक ने-‘उत्तर-पश्चिमी प्रान्त और अवध की जातियां’ नामक पुस्तक में लिखा है कि “द्वारिका के राजा के पास एक बड़ा भारी धनुष और बाण था। उसने प्रतिज्ञा की थी कि इसे कोई तोड़ देगा, उसका दर्जा राजा से ऊंचा कर दिया जाएगा। जाखर ने इस भारी कार्य की चेष्टा की और असफल रहा। इसी लाज के कारण उसने अपनी मातृ-भूमि को छोड़ दिया और बीकानेर में आ बसा।” जाखर बीकानेर में कहां बसा इसका मता ‘जाट वर्ण मीमांसा’ के लेखक पंडित अमीचन्द शर्मा ने दिया है। जाखड़ ने रिडी को अपनी राजधानी बनाया। भाट के ग्रन्थों में लिखा है कि द्वारिका के राजा के परम रूपवती लड़की थी। उसने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई मनुष्य धनुष को तोड़ देगा, उसी के साथ में लड़की की शादी कर दी जाएगी। साथ ही उसे राजाओं से बड़ा पद दिया जाएगा। जाखड़ सफल न हुआ। जाखड़ एक नरेश था। इस कहानी से यह मालूम होता है कि जाखड़ लोगों का इससे भी पहले अजमेर प्रान्त पर राज्य था, यह भी भाट के ग्रन्थों से पता चलता है।

ठाकुर देशराज के उपरोक्त विवरण से यह स्पस्ट होता है कि जाखड़ गोत्र के राजा द्वारका के आस-पास ही स्थित थे। एच. ए. रोस[15] ने जाखड़ का उल्लेख पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के उमरकोट राज्य में किया है, जाम जाखड़ ने सुराड, सुभागो, सीलडो और चाचडिया गोत्र के लोगों को बुंगा राय राजा की दासता से मुक्त कराया था। जाम पदवी सिंध में चौधरी सरदार के प्रयोग की जाती है।

राम सरूप जून[16] लिखते हैं कि भरतपुर राज्य के सिनसिनवार जाट शासकों के यदुवंशी पूर्वज द्वारका से आकर सिनसिनी (भरतपुर) में अपना राज्य स्थापित किया था।

हुकुम सिंह पंवार[17] ने भरतपुर जाट शासकों की वंशावली दी है जो यदु से प्रारम्भ होकर वर्तमान शासक तक है इसमें अनुक्रमांक-1 पर यदु अनुक्रमांक-38 पर शिनि, अनुक्रमांक-43 पर कृष्ण निम्नानुसार हैं:

34. अंधक → 35. भजमान → 36. विदूरथ → 37. शूर → 38. शिनि → 39. भोज → 40. → हर्दिक→ 41. देवमीढ→ 42. वासुदेव→ 43. कृष्ण → 44. प्रद्युम्न→ 45. अनिरुद्ध 46. वज्र → → → →

131. बृजराज → 132. भाव सिंह → 133. बदन सिंह (1722 – 1756) → 134. महाराजा सूरज मल (13 फ़रवरी 1707 - 25 दिसंबर 1763) → 135. महाराजा जवाहर सिंह (1763-1768) → 136. महाराजा रतन सिंह (1768-1769) → 137. महाराजा केहरी सिंह (1769-1771) → 138. महाराजा रणजीत सिंह (1776 - 1805) → 139. महाराजा रणधीर सिंह (1805 - 1823) → 140. महाराजा बलदेव सिंह (1823 - 1825) → 141. महाराजा बलवंत सिंह (1820 - 1853) → 142. महाराजा जशवंत सिंह (1853-1893) → 143. महाराजा राम सिंह (1893 - 1900)→ 144. महाराजा किशन सिंह (1918 - 1929)→ 145. महाराजा विश्वेन्द्र सिंह

द्वारका के समुद्र में डूब जाने और समस्त यादव कुलों के नष्ट हो जाने के बाद कृष्ण के प्रपौत्र वज्र अथवा वज्रनाभ् द्वारका के यदुवंश का अंतिम शासक था जो जीवित बचा था। द्वारका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित किया। पांडवों के हिमालय को प्रस्थान से पूर्व अर्जुन के पौत्र परीक्षित को इंद्रप्रस्थ का राजा नियुक्त किया। परीक्षित वज्र से मिलने के लिए मथुरा गए तथा मथुरा के पुनर्स्थापना में सहायता के लिए ऋषि शांडिल्य को भेजा।

द्वारका का पौराणिक आधार

नोट : द्वारका के सम्बन्ध में पौराणिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक जानकारी पुस्तक - दिव्य द्वारका, प्रकाशक: दण्डी स्वामी श्री सदानन्द सरस्वती जी, सचिव श्रीद्वारकाधीश संस्कृत अकेडमी एण्ड इंडोलॉजिकल रिसर्च द्वारका गुजरात, 2013, से ली गयी है तथा इस पुस्तक का पृष्ठ यहाँ अंकित किया गया है।

द्वारावती: भारतवर्ष की सात मोक्षदायिका पुरियों में से द्वारावती एक है जो द्वारका के रूप में विख्यात है। विविध पुराणों में द्वारकापुरी को कुशस्थली, गोमती द्वारका, चक्रतीर्थ, आनर्तक क्षेत्र एवं ओखा-मण्डल (उषा मंडल) इत्यादि विविध नामों से अभिहित किया है। माना जाता है कि महाराज रैवत ने समुद्र के मध्य की भूमि पर कुश बिछाकर एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया था, जिस कारण इस भूमि का नाम कुशस्थली पड़ा। एक अन्य मत के अनुसार कुश नामक दैत्य के नाम से कुशस्थली नाम पड़ा है,जिन्हें यहाँ कुशेश्वर महादेव नाम से जाना जाता है। (पृ.10)

आनर्तक क्षेत्र: पूर्वकाल में सौराष्ट्र देश में राजा शर्याति के पुत्र आनर्त का शासन होने के कारण उन्हीं के नाम से संयुक्त इस सम्पूर्ण क्षेत्र को आनर्तक क्षेत्र कहा गया है। देवी भागवत के सातवें स्कंध के सप्तम में इस प्रसंग का वर्णन है। (पृ.10)

ओखा नाम उषा का ही परिवर्तित रूप प्रतीत होता है। कल्याण राय जोशी के मतानुसार ध्रेवाण नामक ग्राम से उद्भूत उषा नदी के कारण इस मंडल का नाम ओखा-मंडल रखा गया है। अथवा कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का बाणासुर की पुत्री उषा के साथ विवाह किये जान के कारण उषा के नाम से ओखा पड़ा है।(पृ.10)

कृष्ण का मथुरा से द्वारका आगमन: कृष्ण ने राजा कंस का वध कर दिया तो कंस के श्वसुर मगधपति जरासंध ने कृष्ण से वैर ठान कर यादवों पर बारम्बार आक्रमण किये। यादवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कृष्ण ने उस स्थान को बदलने का निश्चय किया। विनता के पुत्र गरुड़ की सलाह एवं ककुद्मी के आमंत्रण पर कुशस्थली आना तय हुआ। समस्त यादवों के साथ कृष्ण कुरु, जांगल, पांचाल, ब्रह्मावर्त, सौवीर, मरू, धन्वदेश आदि होते हुए कुशस्थली पहुंचे। कुशस्थली में रहने वाले असुरों - कुशादित्य, कर्णादित्य, सर्वादित्य और गुहादित्य के साथ युद्ध कर उन्हें निर्मूल किया और समुद्र के तट पर पुण्य और दिव्य नगरी द्वारका का निर्माण किया। इसके लिए उन्हें समुद्र से 12 योजन जमीन लेनी पड़ी । (पृ.11)

कुशस्थली: कुछ लोगों के मत में यह नगर कुशस्थली के रूप में पहले से ही विद्यमान था, जिसका सम्बन्ध रैवत गिरी के साथ था। महाभारत के सभा पर्व के अनुसार आनर्त के पौत्र रेवत ने रैवत गिरी के पास कुशस्थली बसाई थी। कृष्ण ने इसी उजाड़ हो चुकी नगरी का पुनः संस्कार किया। (पृ.12)

पंचनद: गोमती द्वारका को विशेष पवित्र बनाने के लिए मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह और क्रतु इन पांच मुनियों ने पांच तीर्थों के सहित यहाँ निवास किया। यह पंचनद नाम से जाना जाता है। सनकादि मुनियों के द्वारा पूजित सिद्धेश्वर महादेव और कृष्ण के समस्त कार्यों को सिद्ध करने भद्रकाली देवी के शक्तिपीठ पौराणिक और प्राचीन स्थल द्वारका की भूमि को सिद्धिदायक बनाते हैं।(पृ.12)


कृष्ण द्वारा द्वारका से सम्पादित कार्य : कृष्ण ने द्वारका को बसाने के बाद इसे अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया और अनेक कार्य यहाँ रहकर अथवा यहाँ से जाकर सम्पादित किये - जैसे,

द्वारका की रचना का मूल कारण कालयवन और जरासंध से त्रस्त यदुवंशियों की रक्षा करना और सुदूर रहकर महाभारत युद्ध सञ्चालन करना था; परन्तु साथ ही दुनिया के अन्य देशों से वैदेशिक सम्बन्धों का सुदृढ़ीकरण, आवागमन, आयात-निर्यात, व्यापर आदि तथ्यों का ध्यान रखा गया प्रतीत होता है। क्योंकि प्रारम्भ से ही यह अरब देशों से भारत में प्रवेश द्वार का काम करता था|

कृष्ण के कुशल निर्देशन में यह सभ्यता सम्पन्नता के शिखर पर पहुँच गयी। इस असीम समृद्धि के फलस्वरूप यादव भोग-विलास में लग गए। उनमें अहंकार आगया और अनुशासन ख़त्म हो गया। यादवों ने पिण्डतारक (पिण्डारक) क्षेत्र के मुनिजनों को अपमानित किया। कृष्ण ने इन यादवों के संरक्षण का एक प्रयास किया और द्वारका पर आने वाले संकट को ध्यान में रखकर वे उन यादवों को साथ लेकर प्रभास क्षेत्र की तरफ चल पड़े। उन्होंने वृद्धों और स्त्रियों को शंखोद्धार (बेट) जाने की सलाह दी और अन्यों के साथ स्वयं प्रभास आ गए। ऋषयो के शाप के वशीभूत यादव कालक्रम से विनष्ट हो गए। इधर कृष्ण के निवास को छोड़ कर सारी द्वारका को समुद्र ने आत्मसात कर लिया।

बाद में युधिष्ठिर ने कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ को शूरसेन देश का राजा बनाया। बड़े होने पर वज्रनाभ द्वारका आ गए और उन्होंने अपने दादा कृष्ण की स्मृति में त्रैलोक्य सुन्दर विशाल मंदिर का निर्माण कराया। (पृ.13)

इतिहासकारों के मत में द्वारका

लावा के ठंडा होकर जमने और परत बिछ जाने से सौराष्ट्र में गिरिनार और बरड़ा जैसे पर्वत हैं। 300 वर्गमील के विस्तार का ओखा मंडल अथवा द्वारका प्रदेश अपने प्रारम्भ काल में छोटे-छोटे टापुओं का समूह था। वर्षों बाद वह सारे सौराष्ट्र और गुजरात के साथ मिलकर एक हुआ। प्रमाण मिले हैं कि 5000 वर्षों पूर्व भी गुजरात सहित शेष भारत के प्रदेशों से द्वारका का व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हो चुका था। सात आठ टापुओं का समूह यह ओखा मंडल कब प्रसिद्धि में आया, यह तो अज्ञात है तथापि इरिथ्रियन के समुद्र के प्रवास के लगभग 1900 वर्षों पूर्व लिखे गए 'पेरिप्लस' [18] में इसे बराके नाम से पहचाना गया है। बर एक आस्ट्रिक शब्द है, अनुमान होता है कि यह नाम देने वाले लोग आस्ट्रिक मूल के रहे हों अथवा उनको द्वारका शब्द के उच्चारण में कठिनाई होने से द्वारका को बराका और फिर बराके हो गया हो। इतिहास से ज्ञात होता है कि कभी आस्ट्रिक लोग बंगाल के उपसागर के नजदीक से प्रविष्ट होकर गुजरात में भृगुकच्छ (भरूच) भाल और द्वारका प्रदेश में फैले थे। (पृ.16)

ई. पूर्व 5वीं सदी के लगभग पाणिनि के गणपाठ में कच्छ, सुराष्ट्र और आनर्त नाम परिगणित हैं। (पृ.16)

नागों का वास: कुछ ऒर प्रमाण भी मिलते हैं जिससे सिद्ध होता है कि द्वारका क्षेत्र में आर्यों के आगमन से पहले नागों का वास था। पाताळ में बसने वाले नाग समुद्र से आकर इस क्षेत्र में बसे थे। इस प्रदेश के नाग द्वारका सहित समस्त सौराष्ट्र प्रदेश के संपर्क में थे। स्कंदपुराण के कुमारिका खंड में पातालपुरी को अत्यंत समृद्ध महाप्रसादों तथा मणिरत्नों से अलंकृत एवं स्वरूपवती नागकन्याओं से युक्त बताया गया है। यदुवंश के संस्थापक यदु का विवाह धौम्रवर्ण की पांच नाग कन्याओं के साथ हुआ था। कुशस्थली (द्वारका) का राजा रैवत मूल से तक्षक नाग था। (पृ.16)

शिव पुराण के अनुसार इसका एक प्रसिद्ध नाम दारुका वन (Mbt:V.82.22) था , जहाँ नागों का निवास था। आर्यों ने उन्हें वर्णाश्रम-धर्म का अनुयायी बनाया और नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की। ब्रह्माण्डपुराण (3.7.100) के अनुसार कश्यप का पुत्र यक्ष (गुह्यक) था, जिसे पञ्चचूड़ा क्रतुस्थला नाम की अप्सरा से रजतनाथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और उनके मणिवर तथा मणिभद्र नाम के दो पुत्र हुए। इनमें मणिभद्र का विवाह पुण्यजनी नाम की कन्या से हुआ। इस पुण्यजनी की संतानें पुण्यजनी कहलाई। इनका कुछ दिनों तक इस क्षेत्र पर अधिपत्य रहा और कालांतर में भीस्मक के पुत्र रुक्मी ने इन्हें पराजित कर भगाया था । तभी द्वारका उजड़ गयी थी और इसी उजड़ी हुई द्वारका को कृष्ण ने फिर से बसाया था. सम्भवतः इसी कारण महाभारत में द्वारका के 'पुनर्निवेशनम्' शब्द का प्रयोग किया है। (पृ.16)

डॉ. सांकलिया द्वारा 1962 ई. में द्वारकाधीश मंदिर के पास कराई गयी खुदाई में पाये गए मंदिर के अवशेषों से यह प्रमाणित हो जाता है कि इस युग के पहले भी द्वारका का अस्तित्व था। ई. पूर्व युग में ही द्वारका क्षेत्र के विशिष्ट पंडित यवनाचार्य थे । इनके छोटे भाई श्रवणाचार्य ने गृहत्याग कर एथेंस तक की यात्रा की थी और होरागणित का ज्ञान यवनजातक नाम से प्रसिद्द ज्योतिषग्रन्थ की रचना की। (पृ.16)

ई. पूर्व पांचवीं शताब्दी में एक दण्डधारी युवक परिव्राजक सन्यासी आदिशंकराचार्य के द्वारा आने का प्रमाण प्राप्त होता है। (पृ.16) आदिशंकराचार्य ने द्वारका में धर्मशासन हेतू शारदापीठ की स्थापना की। श्रीमत्वित्सुखाचार्य द्वारा 'बृहतशंकरविजय' नामक ग्रन्थ की रचना की गयी उसमें 'अब्दे नन्दने दिनमणावुदगध्वाभाजि' अर्थात ई.पूर्व 509 उल्लिखित है। यही प्रमाणित भी है। दण्डी स्वामी श्रीमच्छङ्कराचार्य का समय निश्चित रूप से ई. पू 509 ही है।(पृ.17)

युधिष्ठिर वर्ष 2663 का स्थापित शारदापीठ द्वारका : लगभग 2520 वर्ष पूर्व आदि शंकराचार्य ने अद्वैत सिद्धांत प्रतिपादित किया था। उन्होंने समग्र देश में भ्रमण कर लोगों के जीवन को तपस्वी बनाया देश की चार दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की। उत्तर में ज्योतिष्पीठ, दक्षिण में शृंगेरीपीठ, पूर्व में गोवर्धनपीठ और पश्चिम में शारदापीठ। इन चार पीठों में से सर्वप्रथम द्वारका में शारदापीठ की स्थापना हुई। ऐसा 'मठाम्नाय' नामक ग्रन्थ में लिखा है - प्रथमः पश्चिमाम्नाय: शारदामठ उच्यते। (पृ.45)

राजा सुधन्वा - राजा सुधन्वा आदि शंकराचार्य के समकालीन थे और उन्होंने ही शंकराचार्यों को राजोपचार तथा प्रजा से धर्मकर लेने के अधिकार उपलब्ध कराये थे। अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार राजा सुधन्वा चाहमान (चौहान) वंश के छठे राजा थे, जो युधिष्ठिर के वंशज थे। महाभारत से ज्ञात होता है कि युधिष्ठिर ने यादवों के गृह युद्ध के पश्चात अंधक वंशी कृतवर्मा के पुत्र को मार्तिकावत (III.116.6)), शिनिवंशी सात्यकी के पुत्र युयुधान को सरस्वती नदी के तटवर्ती क्षेत्रों तथा इंद्रप्रस्थ का राज्य कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ को, कृष्ण की मृत्यु के पश्चात दे दिया था। महिष्मति का राज्य भी युधिष्ठिर द्वारा ही राजा को दे दिया था। यह जैमिनी के अश्वघोष पर्व से ज्ञात होता है। कर्नल टॉड, डॉ रमेशचंद्र मजुमदार एवं राजस्थानी इतिवृत चौहानों का मूल राज्य माहिष्मती को ही मानते हैं। (पृ.47)

पुरातत्वविदों द्वारा खोज

पुराततव से सम्बंधित अनुसन्धान के लिए गोमती नदी के ठीक पश्चिम में विद्यमान समुद्रनारायण या वरुणदेवता का मंदिर अतिमहत्वपूर्ण है। द्वारका सम्बन्धी प्राचीनता का उल्लेख ई. सन 574 के एक ताम्रपत्र में मिलता है। यह ताम्रपत्र बलभी के मैत्रकों के सामन्त गारूलक शासक सिंहादित्य ने लिखवाया था। सिंहादित्य वराहदास का लड़का था जो द्वारकाधिपति था।(पृ.17)

1963 में पुणे के डेक्कन कालेज ने जो खुदाई कराई थी, उससे यह निष्कर्ष निकला कि सबसे पहली द्वारका के निर्माण का समय ई. सन के प्रारम्भ में जान पड़ता है। उससे बहुत पहले तो नहीं। खुदाई करने वालों ने यह भी कहा कि द्वारका और उसके आस-पास के इलाकों को देखने के बाद यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि महाभारत, स्कन्द पुराण और घटजातक में जिस द्वारका का उल्लेख किया गया है वह यही द्वारका है। (पृ.17)

अगर यह सही माना जावे तो महाभारत में उल्लेखित द्वारका मौर्य युग के बाद अस्तित्व में आई होगी। ऐसा माना जाना आजतक स्थापित ऐतिहासिक प्रमाणों के विपरीत होगा। इसके एकदम विपरीत नागेश्वर और द्वारका के आसपास के 20 कि.मी. क्षेत्र में जो मकान बने हुए हैं, वे हड़प्पन युग के अंतिम चरण में बनाये गए थे। उन्हें देखने से यह माना जा सकता है कि हड़प्पन युग के अंत में या उसके तुरंत बाद द्वारका अस्तित्व में आई होगी। (पृ.17)


1979-1980 के खुदाई के परिणामों से द्वारका के समय को ई. पश्चात् 15वीं सदी के बदले ई. पूर्व 20वीं सदी में रखना पडा। यह बात सिद्ध हुई कि चार हजार वर्ष पूर्व समुद्र के किनारे बसी हुई द्वारका समुद्र के कारण नष्ट हुई। द्वारका के आसपास आठ बस्तियों को पहचाना जा सका है। ई. पूर्व 15 वीं सदी में अस्तित्व में आई पहली बस्ती समुद्र में डूब गयी। इसी तरह दूसरी बस्ती ई. पूर्व 10 वीं सदी में समुद्र में डूब गयी और तीसरी बस्ती बसाई गयी। इसी समय प्रथम मंदिर का निर्माण हुआ। इसके पहले का मंदिर समुद्र के कारण नष्ट हो गया और उसके मलबे पर दूसरे मंदिर का निर्माण किया। जब दूसरा मंदिर भी डूब गया तब विष्णु किंवा वासुदेव का तीसरा मंदिर नवीं सदी में बनाया गया। वर्तमान मंदिर पांचवां है। जबकि वर्तमान बस्ती आठवीं है। (पृ.18)

महाभारत और अन्य ग्रंथों में बताये अनुसार द्वारका की स्थापना कुकुद्मी रैवत के द्वारा स्थापित कुशस्थली नामक राजधानी के मलवे पर की गयी थी। जैसा हरिवंश में लिखा है उस समय समुद्र का जल 12 योजन जमीन छोड़कर पीछे हट गया होगा। हरिवंश में द्वारका के लिए वारिदुर्ग और उदधि मध्यस्थान जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। इससे यह जान पड़ता है कि द्वारका एक द्वीप रहा होगा। ऐसा माना जाता है कि बेट द्वारका विहारधाम रहा होगा। यादव लोग नौका के द्वारा वहाँ जाते रहे होंगे। (पृ.18)

द्वारका में जहाँ पहले बंदरगाह था और गोमती जहाँ समुद्र से मिलती है, वहाँ पिछले कुछ वर्षों में रेती जम जान के कारण अब कोई भी नाव नहीं आ सकता है। समुद्र में तीसरी बार खोज करते समय समुद्र नारायण मंदिर के समुद्र से 200-700 मीटर तक चारों जगहों पर वनस्पति और कीचड़ हटाया गया तो वहाँ एक परिवहन रेखा दिखाई दी। (पृ.18)

चौथे अन्वेषण में मालूम पड़ा कि यहाँ जो निर्माण हुआ था उसको समुद्र के ज्वार से काफी नुकसान हुआ है। पत्थर कीचड़ के नीचे दबे हुए थे। पत्थरों के दोनों तरफ़ खुदाई की हुई थी जिससे चिनाई का काम दिखाई दे सके। इस खोज में तीन छिद्रों वाले लंगर मिले, जो पत्थर के बने हुए थे और जिनका उपयोग ई. पूर्व 14-12 वीं सदी में साइप्रस और सीरिया में हुआ करता था। (पृ.19)

तीसरी और चौथी खोज में समुद्र के नीचे निर्माण दिखाई दिया। पांचवीं खोज में एक तराशा हुआ मोटा पत्थर और गढ़ की चिनाई मिली। समुद्र नारायण के मंदिर से 600 मीटर अंदर समुद्र में निर्माण में प्रयुक्त पत्थर मिले। आस-पास खोदने पर एक छेनी मिली। खुदाई में किसी टूटे हुए जहाज के लकड़ियों के अवशेष मिले। इनमे से एक दो छिद्र हैं। नौका-चालक लोग नावों की रस्सी तानने के लिए इन छिद्रदार टुकड़ों का उपयोग करते थे। पत्थरों के साथ टकराने से नौकाएं टूट गयी होंगी और लकड़ियों के टुकड़े समुद्र की तली में समा गए होंगे। (पृ.19)

द्वारका और बेट द्वारका कब समुद्र में डूब गए यह निश्चित करने में सिंधु संस्कृति की एक मुद्रा, एक छेनी, एक बर्तन जिस पर कुछ खोदकर लिखा हुआ है और पत्थर की एक मुद्रा आदि निर्णायक हैं। इन अवशेषों से और मिटटी के टुकड़े से निश्चित किया हुआ समय मिलता-जुलता है। छोटी लम्बी और चोकोर आकर की एक मुद्रा मिली थी, जिसे शंख से बनाया गया था। इस मुद्रा में छोटे सींगवाला एक बैल, एक सींगवाला घोडा और बकरी खुदे हुए हैं। यह बात पक्की है कि यह नमूना सिंधु संस्कृति का है। वेट के पास से मिले हुए पात्रों के अवशेष बताते हैं कि बहरीन और बेट द्वारका के मध्य व्यापारिक सम्बन्ध रहे होंगे। बेट द्वारका जब समुद्र में डूबी होगी उस समय बहरीन का भी कुछ क्षेत्र समुद्र में डूब गया होगा। महाभारत के खिलभाग हरिवंश के अनुसार द्वारका पर शाल्व ने जब हमला किया उसके बाद नियम बनाया गया कि प्रत्येक द्वारकावासी को अपनी पहचान के लिए एक परिचय मुद्रा साथ में रखनी होगी। बेट द्वारका से मिलती हुई मुद्रा ईसापूर्व 15 वीं सदी की होनी चाहिए। (पृ.19)

चौड़े मुख वाली एक बरनी पर सात अक्षर खुदे हुए दिखाई पड़ते हैं। उसके नीचे के भाग में छिद्र भी हैं। इन सात अक्षरों में से छः अक्षर हड़प्पन लिपि से मिलते जुलते हैं शेष एक अक्षर हड़प्पन और ब्राह्मी लिपि का सम्मिश्रण प्रतीत होता है। द्वारका के पास मिला हुआ तिकोना लंगर 500 किलोग्राम से ज्यादा वजनी है। मोहनजोदड़ो की एक मुद्रा में जहाज के मुख पर से त्रिकोणाकार लंगर को समुद्र में डालते हुए दिखाया गया है। द्वारका के नाविक भी वजनदार लंगर को पानी में डालने का यही तरीका अपनाते रहे होंगे। बेट द्वारका के समुद्र से प्राप्त सामानांतर नौक वाली और द्वारका में मिले हुए खुरदारी धार वाली छेनी हड़प्पा और लोथल में मिली छेनियों से मिलती-जुलती है। बेट द्वारका के पास से मिली हुई एक सकरे मुंह वाली शीशी इटली के बर्तनों से मिलती जुलती है। चूने के पत्थरों से बनाया हुआ एक तीन छिद्रों वाला बर्तन बेट द्वारका के किनारे से मिला। ऐसा ही एक सांचा, जिससे ताम्बे या कांसे की सुई बनाई जाती थी और जो बहुत संकरा था, लोथल में मिला था। (पृ.20)

द्वारका के जाट इतिहास से सम्बन्धित स्थल

त्रैलोक्य सुन्दर जगत-मंदिर परिसर द्वारका में और उसके निकट विभिन्न ऐतिहासिक स्थल, देवी-देवताओं एवं पटरानियों के मंदिर स्थित हैं। जिन स्थानों का सम्बन्ध जाट गोत्रों अथवा जाट इतिहास से है उनका विवरण इस प्रकार है -

कुशेश्वर महादेव मंदिर - द्वारकाधीश जी के मंदिर परिसर में कुल बीस मंदिर हैं. मोक्षद्वार से प्रवेश करने पर दाहिने और नवग्रह देवता के यंत्र और समीप कुशेश्वर महादेव शिवलिंग विराजमान है। कहा जाता है कि द्वारका की यात्रा के आधे भाग का मालिक कुशेश्वर महादेव है। एक मत के अनुसार कुश नामक दैत्य के नाम से कुशस्थली नाम पड़ा है,जिन्हें यहाँ कुशेश्वर महादेव नाम से जाना जाता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि कस्वां और कुश जैसे दोनों गोत्र अब भी भी जाटों में विद्यमान हैं। कुशस्थली नगरी कुश अथवा कस्वां गोत्र के जाटों द्वारा बसाई गयी थी। कृष्ण द्वारा राज्य अधिग्रहण करने के कारण ये वहाँ से चलकर राजस्थान और हरयाणा में आ गए। ठाकुर देशराज[19] लिखते हैं कि आरम्भ में कस्वां सिन्ध में राज्य करते थे। ईसा की चौथी सदी से पहले जांगल-प्रदेश में आबाद हुए थे। इनके अधिकार में लगभग चार सौ गांव थे। सीधमुख राजधानी थी। राठौरों से जिस समय युद्ध हुआ, उसय समय कंवरपाल नामी सरदार इनका राजा था। इस वंश के लोग धैर्य के साथ लड़ने में बहुत प्रसिद्ध थे। कहा जाता है दो हजार ऊंट और पांच सौ सवार इनके प्रतिक्षण शत्रु से मुकाबला करने के लिए तैयार रहते थे। यह कुल सेना राजधानी में तैयार न रहती थी। वे उत्तम कृषिकार और श्रेष्ठ सैनिक समझे जाते थे। राज्य उनका भरा-पूरा था। प्रजा पर कोई अत्याचार न था। सत्रहवीं शताब्दी में इनका भी राज राठौंरों द्वारा अपहरण कर लिया गया। इनके पड़ौस में चाहर भी रहते थे। राजा का चुनाव होता था, ऐसा कहा जाता है। चाहरों की ओर से एक बार मालदेव नाम के उपराजा का भी चुनाव हुआ था।

कुशस्थली: विजयेन्द्र कुमार माथुर[20] लिखते हैं कि कुशस्थली द्वारका का ही प्राचीन नाम है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाराजा रैवतक के कुश बिछाकर यज्ञ करने के कारण इसका नाम कुशस्थली नाम पड़ा। पीछे त्रिविक्रम भगवान् कुश नामक दानव का वध भी यहीं किया था। त्रिविक्रम का मंदिर भी द्वारका में रणछोड़ जी के मंदिर के पास है। ऐसा जान पड़ता है कि महाराज रैवतक (बलराम की पत्नी रेवती के पिता) ने प्रथम बार, समुद्र में से कुछ भूमि बाहर निकलकर यह नगरी बसाई थी। हरिवंश पुराण (1.1.4) के अनुसार कुशस्थली उस प्रदेश का नाम था जहाँ यादवों ने द्वारका बसाई थी। विष्णु पुराण के अनुसार, आनर्तस्यापि रेवतनामा पुत्रोजज्ञे योऽसावानर्त विषयं बुभुजे पुरीं च कुशस्थली मध्युवास अर्थात आनर्त के रेवत नामक पुत्र हुआ जिसने कुशस्थली नामक पुरी में रहकर आनर्त विषय पर राज्य किया। एक प्राचीन किंवदंती में द्वारका का सम्बन्ध पुण्यजनों से बताया गया है। ये पुण्यजन वैदिक पाणिक या पणि हो सकते हैं। अनेक विद्वानों का मत है कि ये प्राचीन ग्रीस के फिनिशियनों का ही भारतीय नाम है। ये अपने को कुश की सन्तान मानते थे। (वेडल: मेकर्स ऑफ़ सिविलाइजेशन पृ.80)

आनर्त विषय का अंतिम राजा ककुद्मी था जिसके पश्चात् कुशस्थली पर पुण्यजनों का राज्य कायम हुआ। ककुद्मी ने ही कृष्ण को मथुरा से यहाँ आमंत्रित किया था।[21] हमारा मत है कि ये पुण्यजन ओर कोई नहीं पूनिया जाट ही थे।

प्रद्युम्न मंदिर - कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न का मंदिर। प्रद्युम्न का उल्लेख भरतपुर के सिनसिनवार जाट शासकों कि वंशावली में अनुक्रमांक 44 पर किया गया है। महाराज प्रद्युम्न से पनहार और पनही जाट गोत्रों का निकास हुआ है।

अनिरुद्ध मंदिर - कृष्ण के प्रपौत्र प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध का मंदिर। अनिरुद्ध का विवाह बाणासुर की पुत्री उषा के साथ हुआ था, जिसके कारण द्वारका क्षेत्र को उषामण्डल कहा जाता है। अनिरुद्ध का उल्लेख भरतपुर के सिनसिनवार जाट शासकों कि वंशावली में अनुक्रमांक-45 पर किया गया है। महाभारत के शल्य पर्व में राजा बाली के पुत्र बाणासुर का उल्लेख किया गया है, जो कार्तिकेय के डर से क्रौञ्च पर्वत में छुप गया। बाणॊ नामाद दैतेयॊ बलेः पुत्रॊ महाबलः। क्रौञ्चं पर्वतम आसाद्य देवसंघान अबाधत (Mahabharata IX.45.71) बाणासुर के वंसज वर्तमान में बाना जाट गोत्र के रूप में राजस्थान में पाये जाते हैं। बाना जाटों ने ही भरतपुर के समीप बयाना नामक क़स्बा बसाया था जिसका प्राचीन नाम श्रीपथ भी है जो द्वारका से मथुरा के रास्ते पर होने से पड़ा प्रतीत होता है। बयाना में भी एक उषा मंदिर है जो द्वारका से सम्बन्ध होने का प्रतीक है।

बाण तीर्थ: सोमनाथ कस्बे से करीब एक मील पश्चिम मे चलने पर एक और तीर्थ आता है। यहां जरा नाम के शिकारी ने कृष्ण भगवान के पैर में भल्ल-बाण मारा था। इसी तीर से घायल होकर कृष्ण परमधाम गये थे। इस जगह को बाण-तीर्थ कहते है। यहां बैशाख मे बड़ा भारी मेला भरता है। बाण-तीर्थ से डेढ़ मील उत्तर में एक और बस्ती है। इसका नाम भालपुर है। इसे भालका तीर्थ भी कहते हैं। वहां एक पद्मकुण्ड नाम का तालाब है। हिरण्य नदी के दाहिने तट पर एक पतला-सा बड़ का पेड़ है। पहले इस स्थान पर बहुत बड़ा पेड़ था। बलरामजी ने इस पेड़ के नीचे ही समाधि लगाई थी। यहीं उन्होनें शरीर छोड़ा था। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जराह/जारा जाट अभी पाकिस्तान के मुल्तान क्षेत्र में पाये जाते हैं।

अम्बा मंदिर - कृष्ण की कुलदेवी का मंदिर जिसकी पूजा शारदा पीठ द्वारा संपन्न की जा रही है।

शेषावतार श्री बलदेव मंदिर - बलदेवजी भगवान त्रिविक्रमजी के साथ पातळ लोक से पधारे थे। श्री द्वारकाधीश मंदिर के सभा मंडप के कोने में आपका मंदिर है। शेषनाग से शेसानो और शेषमा जाट गोत्र निकले हैं। शेषमा जाट गोत्र के लोग अभी राजस्थान में पाये जाते हैं।

माधवराय मंदिर - रुक्मिणी हरण के बाद कृष्ण की शादी रुक्मिणी के साथ माधवपुर गाँव में हुई थी। उस स्मृति के फलस्वरूप यहाँ मंदिर है। मधु गोत्र के लोग अभी राजस्थान में पाये जाते हैं।

त्रिविक्रम मंदिर - कृष्ण के बड़े भाई बलभद्र का यह मंदिर है। बलभद्र नाम का जाटों में गोत्र है।

दुर्वासा मंदिर - दुर्वासा मुनि के शाप से श्रीकृष्ण और रुक्मिणी में वियोग हुआ। इस कारण रुक्मिणी का मंदिर द्वारका से बाहर है। दुर्वास/दुर्वासा गोत्र का उद्गम ऋषि दुर्वासा से हुआ है, इस जाट गोत्र के लोग मध्य प्रदेश में पाये जाते हैं।

जाम्बुवती मंदिर - जाम्बुवान की पुत्री और कृष्ण की पटरानी का मंदिर। जाम्बुवान एक वानर राजा है। वस्तुतः वानर नागवंशी गोत्र था। कृष्ण ने उसको हराकर उसकी पुत्री से शादी की। वानर जाट गोत्र हरयाणा और पंजाब में पाया जाता है।

सत्यभामा मंदिर - कृष्ण की पटरानी, सत्राजित की पुत्री। सत्राजित ने कृष्ण पर स्यमन्तक मणि चुराने का आरोप लगाया था। जाम्बुवन से मणि प्राप्त होने पर लज्जित होकर अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह कृष्ण के साथ मणि दहेज़ में दी। इनके रूठने पर कृष्ण ने स्वर्गलोक के नंदनवन से पारिजात वृक्ष इनको प्रसन्न किया।

पंचनद तीर्थ - द्वारका तीर्थ के गोमती नदी पर पंचनद तीर्थ है। यहाँ की लोक भाषा में इस तीर्थ को पंचकुई कहा जाता है। यहाँ चारों तरफ समुद्र का खारा पानी है परन्तु इन पांच कुओं में मीठा पानी है। कहते हैं कि यहाँ पांडवों ने निवास किया था। इसके समीप ही लक्ष्मीनारायणदेव जी का मंदिर है। बगल में पांडवों की गुफा है। (पृ.62) पंचनद (पंजाब) में तक्षक लोग अधिक प्रसिद्ध थे। पंजाब से आये तक्षक नागवंशी जाटों द्वारा ही यह पंचनद तीर्थ बनाया गया है।

सिद्धेश्वर महादेव मंदिर - द्वारका तीर्थ के अंतर्गत आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शारदापीठ के आराध्य सिद्धेश्वर महादेव मंदिर का वर्णन स्कन्द पुराण के द्वारका महात्म्य के चतुर्थ अध्याय में किया गया है। (पृ.66)

भद्रकाली माताजी मंदिर - द्वारकाधीश स्थित शारदापीठ की आराध्या भगवती भद्रकाली का मंदिर इससे आधा किमी पर स्थित है। इस मंदिर के पत्थर पर श्रीचक्र अंकित है। भद्रकाली वस्तुतः वीरभद्र की पत्नी है वीरभद्र से अनेक जाट गोत्रों का निकास हुआ है जैसे पूनिया, कल्हन, अंजना, जाखड़, भिमरौलिया, दहिया आदि। एर्स्किन के अनुसार गुजरात में पाये जान वाले जाटों का अंजना एक गोत्र है। राजस्थान में मेड़ता क्षेत्र में भी यह जाट गोत्र पाया जाता है। वी. पी. देसाई की गुजराती पुस्तक 'भारतना आंजना' (भारत के चौधरी) में लेख किया गया है कि इस जाति ने दश शताब्दियों तक भारत में प्रजातान्त्रिक ढंग से राज्य किया।

शंख तालाब : रणछोड़ के मन्दिर से डेढ़ मील चलकर शंख-तालाब आता है। इस जगह भगवान कृष्ण ने शंख नामक राक्षस को मारा था। इसके किनारे पर शंख नारायण का मन्दिर है। ऐसी मान्यता है कि शंख-तालाब में नहाकर शंख नारायण के दर्शन करने से बड़ा पुण्य होता है। संखार/ संखाल गोत्र के जाटों का वंशज शंख नामक महाभारत कालीन नागवंशी राजा होना जाट इतिहासकारों द्वारा प्रतिवेदित है।

कृकलास कुण्ड - द्वारका के तीर्थों में कृकलास कुण्ड प्राचीन एवं ऐतिहासिक स्थान है। इस स्थान का महात्म्य श्रीमद भागवत और सकंदपुराण के राजा नृग के आख्यान के साथ जुड़ा हुआ है।(पृ.68) कृकलास एक नागवंशी राजा थे। नृग भी जाट गोत्रों की सूचि में पाया जाता है परन्तु इसका विस्तार नहीं है। करकला जाट गोत्र भरतपुर में पाया जाता है।

यादवस्थान: सोमनाथ पट्टन बस्ती से थोड़ी दूर पर हिरण्य नदी के किनारे एक स्थान है, जिसे यादवस्थान कहते हैं। यहां पर एक तरह की लंबी घास मिलती है, जिसके चौड़े-चौड़ पत्ते होते है। यही वही घास है, जिसको तोड़-तोडकर यादव आपस में लड़े थे और यही वह जगह है, जहां वे खत्म हुए थे।

सोमनाथ पाटन: बेट-द्वारका से समुद्र के रास्ते जाकर बिरावल बन्दरगाह पर उतरना पड़ता है। ढाई-तीन मील दक्षिण-पूरब की तरफ चलने पर एक कस्बा मिलता है इसी का नाम सोमनाथ पाटन है। यहां एक बड़ी धर्मशाला है और बहुत से मन्दिर है। कस्बे से करीब पौने तीन मील पर हिरण्य, सरस्वती और कपिला इन तीन नदियों का संगम है। इस संगम के पास ही भगवान कृष्ण के शरीर का अंतिम संस्कार किया गया था।

सोमनाथ: इस सोमनाथ पट्टन कस्बे में ही सोमनाथ भगवान का प्रसिद्ध मन्दिर है। इस मन्दिर को महमूद गजनवी ने तोड़ा था। यह समुद्र के किनारे बना है इसमें काला पत्थर लगा है। इतने हीरे और रत्न इसमें कभी जुडे थे कि देखकर बड़े-बड़े राजाओं के खजाने भी शरमा जायं। शिवलिंग के अन्दर इतने जवाहरात थे कि महमूद गजनवी को ऊंटों पर लादकर उन्हें ले जाना पड़ा। महमूद गजनवी के जाने के बाद यह दुबारा न बन सका। लगभग सात सौ साल बाद इन्दौर की रानी अहिल्याबाई ने एक नया सोमनाथ का मन्दिर कस्बे के अन्दर बनबाया था। यह अब भी खड़ा है।

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर - नागेश्वर मन्दिर द्वारका का एक प्रसिद्ध मन्दिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। यह द्वारका, गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारकापुरी से लगभग 25 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यह शिव जी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। हिन्दू धर्म के अनुसार नागेश्वर अर्थात नागों का ईश्वर होता है। यह विष आदि से बचाव का सांकेतिक भी है। रुद्र संहिता में इन भगवान को दारुकावने नागेशं कहा गया है इस पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन की शास्त्रों में बड़ी महिमा बताई गई है। कहा गया है कि जो श्रद्धापूर्वक इसकी उत्पत्ति और माहात्म्य की कथा सुनेगा वह सारे पापों से छुटकारा पाकर समस्त सुखों का भोग करता हुआ अंत में भगवान्‌ शिव के परम पवित्र दिव्य धाम को प्राप्त होगा। एतद् यः श्रृणुयान्नित्यं नागेशोद्भवमादरात्‌। सर्वान्‌ कामानियाद् धीमान्‌ महापातकनाशनम्‌॥

गोपी तालाब: नागेश्वर ज्योतिर्लिंग से कुछ किलोमीटर चलने के बाद बेट द्वारका के रास्ते में आता है गोपी तालाब। गोपी तलाव द्वारका से 20 किलोमीटर तथा नागेश्वर से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर बेट द्वारका के मार्ग पर स्थित है। गोपी तालाब एक छोटा सा तालाब है जो कि चन्दन जैसी पिली मिट्टी से घिरा है जिसे गोपी चन्दन कहते हैं, यह चन्दन भगवान् श्री कृष्ण के भक्तों के द्वारा माथे पर तिलक लगाने के लिए किया जाता है। यह तालाब हिन्दू पौराणिक कथाओं में विशेष स्थान रखता है।

इस सम्बन्ध में कथा प्रचलित है कि भौमासुर नामक एक राजा ने वरुण का छात्र, माता अदिति का कुंडल और मेरुपर्वत पर स्थित देवताओं का मणिपर्वत नामक स्थान छीन लिया। इंद्र ने कृष्ण को बताया तो कृष्ण पत्नी सत्यभामा के साथ भौमासुर की राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर गए। वहाँ भयंकर युद्ध हुआ जिसमें भौमासुर मारे गए। कृष्ण ने वहाँ कैद 16000 राजकुमारियों को मुक्त किया। (भागवत स्कंध अध्याय 59 श्लोक 33-42) (पृ.71) जाट इतिहास में भौबिया जाट गोत्र की उत्पत्ति भौमासुर से बताई गयी है।

इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि इस स्थल पर कृष्ण ने अर्जुन का अहंकार दूर किया था। कृष्ण ने अपनी सभी रानियों को द्वारका से बाहर सुरक्षित लेजाने का भार अर्जुन को सौंपा था। अर्जुन को अहंकार हो गया कि उसके पास गांडीव जैसा धनुष है और महाभारत जैसे युद्ध में विजय पाई है। काबा जाति के लोगों ने अर्जुन पर हमला कर गोपियों को लूट लिया। अर्जुन के गांडीव ने काम नहीं किया। लुटेरों के डर से कितनी ही रानियाँ तालाब में डूब कर मर गयी। इसलिए उस तालाब को आज भी गोपी तालाब कहते हैं। वहाँ की चिकनी एवं पीले रंग की मिटटी गोपी चन्दन के रूप में प्रसिद्ध है। इस चन्दन को लगाने से खाज-खुजली मिट जाती है, ऐसी मान्यता है। (पृ.72)

इन्द्रेश्वर महादेव मंदिर - यह महाभारत कालीन मंदिर है। महाभारत के अनुसार कृष्ण के बड़े भाई बलराम अपनी बहन सुभद्रा का विवाह दुर्योधन के साथ चाहते थे, परन्तु कृष्ण सुभद्रा का विवाह अर्जुन के साथ चाहते थे। अर्जुन ने कृष्ण की प्रेरणा से सुभद्रा का अपहरण किया। इन्द्रेश्वर महादेव मंदिर का सम्बन्ध इस घटना से है। ऐसा माना जाता है कि अर्जुन ने बरड़िया ग्राम के सीतापुरी कुंड के पास सुभद्रा के साथ विवाह किया। अर्जुन इंद्र का पुत्र था इसलिए उसका नाम इंद्रेश्वर पड़ा। (पृ.74)

चंद्रभागा मंदिर - यह स्थान द्वारका से 5 कि.मी. की दूरी पर बरडिया के पास स्थित है। यहाँ द्वारकाधीश जी की कुलदेवी माता चंद्रभागा का मंदिर है। स्यमन्तक मणि के लिए जाम्बुवान के साथ लम्बे समय तक युद्ध चला। यहाँ युद्ध में सफलता के बाद कृष्ण ने पटरानी जाम्बुवती के साथ आकर आशीर्वाद प्राप्त किया। (पृ.75)

पिण्डारक तीर्थ - द्वारका से 60 किमी दूर स्थित है। द्वारका-जामनगर रेल लाईन पर स्थित भोपालका स्टेशन से 35 किमी दूर है। यहाँ पिंड दान किया जाता है। भाटिया से 14 कि.मी. दूर पिंडारा नाम का गाँव है। (पृ.76) पिण्डारक महाभारत कालीन नागवंशी राजा थे। नागः शङ्खनकश चैव तथा च सफण्डकॊ ऽपरः । क्षेमकश च महानागॊ नागः पिण्डारकस तथा (I.35.11) पिण्डले/ पिण्डेल जाट गोत्र के लोग पिण्डारक के वंशज बताये जाते हैं।

गुजरात का जाट से सम्बन्धों की विवेचना

गुजरात का नामकरण: इतिहासकार मानते हैं कि गुजरात नाम गुर्जरत्र से आया है। गुर्जरो का साम्राज्य गुर्जरत्रा या गुर्जरभूमि के नाम से जाना जाता था। इस तथ्य की विवेचना आवश्यक है। कुछ गुर्जर इतिहास लेखक चेची (गुर्जर गोत्र) का सम्बन्ध सीधे-सीधे यूची (कुषाणों) से जोड़ते हैं। जबकि चेची (चेष्टम) और क्षयरात तथा नहपान गोत्र शकों के थे जिनको कुषाणों और गुप्तों ने हराया था। कुषाण का मूल चीनी नाम यूची है जिसका भारतीय रूपांतर जेटी या जाट ही बनता है। जाटों में ही कस्वां और कुश गोत्र आज भी मिलते हैं। ये सीधे कुषाण से जुड़ते हैं। जाट शासकों सम्राट हर्षवर्धन और उनसे पूर्व यशोधर्मा ने हूणों और गुर्जरों को मालवा में परास्त कर उनको सुदूर कन्नौज और कश्मीर में बसने के लिए बाध्य कर दिया था। तभी से उनकी आवास भूमि या तो राजस्थान का मरुस्थल या जम्मू कश्मीर का पर्वतीय क्षेत्र है अथवा यमुना और गंगा के कछार (खादर) हैं। किसी भी वैदिक संहिता अथवा संस्कृत साहित्य ग्रन्थ में भारत में गुर्जरों किवां हूणों का उल्लेख नहीं मिलता। महाभारत में अर्जुन के द्वारा और रघुवंश महाकाव्य में राम के द्वारा किवां हूणों को पाटल प्रदेश किवां अफगानिस्तान में पराजित ही दिखाया है। ये दोनों 5वीं शताब्दी की हैं अतएव इस काल के पश्चात् ही हूणों और गुर्जरों का प्रवेश भारतवर्ष में हुआ। गुजरात के कुर्मी अधिकांश में शक हैं। यहाँ पर यह ज्ञातव्य है कि कर्नल टॉड ने राजस्थान के इतिहास में लिखा है कि शक और कुषाण दोनों ही कैस्पियन सागर के पूर्वी तट से चलकर ईरान के सिस्तान किवां शकस्तान में बसने वाली मस्सागेटी किवां महाजट जाती के ही अंगभूत अवयव हैं। उनको किसी भी इतिहासकार ने गुर्जर नहीं लिखा है।[22]

प्रो. विंगले ने तो जाटों की एक शाखा का ही नाम गुर्जर बताया है जो अफगानिस्तान के रास्ते से पंजाब होते हुए गुजरात में आये थे। पुनः वहीँ से राजस्थान के मार्ग से उसने सौराष्ट्र को विजित किया था, अतएव नामकरण गुजरात किया था। इसी आधार पर ठाकुर देशराज[23] भी अपने जाट इतिहास में अफगानिस्तान में बसने वाली गूजर शाखा को जाट जाति का ही अभिन्न अंग बताया गया है। आज तक भी जाटों में गूजर और गाबर जैसे गोत्र हैं, गूजर जाति में जाट जैसा गोत्र नहीं है। संस्कृत साहित्य में हमें जर्त अथवा जट्ट जैसे गणों या गणसंघों का नामकरण मिलता है। जैसे कि पाणिनि के अष्टाध्यायी में 'जट झट संघाते' सूत्र से परिलक्षित होता है।[24]

गुर्जरत्र यहाँ जातिसूचक न होकर क्षेत्र सूचक है। इतिहासकार डी. आर. भंडारकर के अनुसार 'गुर्जरत्र' में राजस्थान के नागौर जिले के डीडवाना और परबतसर क्षेत्रों को सम्मिलित किया गया है। गुर्जरत्र का संधि विच्छेद करें तो इस प्रकार बनता है: गुर्जरत्र = गुर + जर्त। यहाँ 'गुर' का अर्थ होता है 'बड़ा' या 'महा' और 'जर्त' का अर्थ है 'जाट'। इस प्रकार गुर्जरत्र का अर्थ है महाजाट अर्थात हिरोडोटस (c. 484 BC - c. 425 BC) का मस्सागेटी

काठियावाड़ का नामकरण - सौराष्ट्र के इस भू-भाग का नामकरण काठियावाड़ भी कठी जाटों के नाम पर किया गया था। एच. डब्ल्यू. बेल्यु[25] ने लेख किया है कि अलक्षेन्द्र के पंजाब पर आक्रमण के समय वहाँ निवास करने वाली जाति कठी जिसने यवन सम्राट के दाँत खट्टे कर दिए थे, कालान्तर में पंजाब छोड़कर दक्षिण की ओर आ गई और सौराष्ट्र में बस गई, जिससे इस देश का नाम काठियावाड़ भी हो गया।

बल्लव-बल्लभी जनपद - दलीप सिंह अहलावत[26] के अनुसार बल्लव-बल्लभी जनपद गुजरात काठियावाड़ में था। इस प्रदेश पर जाटवंश का राज्य था। महाभारत काल के पश्चात् बल या बालियान जाटवंश का शासन इस जनपद पर रहा। यहां के राजा ध्रुवसेन द्वितीय (बालियान जाट गोत्री) के साथ सम्राट् हर्षवर्द्धन (वैस या वसाति जाटवंशज) ने अपनी पुत्री का विवाह किया था। चीनी यात्री इत्सिंग ने लिखा है कि “इस समय भारत में नालन्दा और बल्लभी दो ही विद्या के घर समझे जाते हैं।” दूसरे चीनी यात्री ह्यूनसांग ने बलवंश की इस राजधानी को 6000 बौद्ध भिक्षुओं का आश्रयस्थान तथा धन और विद्या का घर लिखा है। सन् 757 ई० में सिंध के अरब शासक ह्शान-इब्न-अलतधलवी के सेनापति अबरुबिन जमाल ने गुजरात काठिवाड़ पर चढ़ाई करके बल्लभी के इस बलवंश के राज्य को समाप्त कर दिया।

जेम्स टोड के अनुसार सूर्यवंशी राजा कनकसेन अथवा कनिष्क लोहकोट (लाहोर) से आया और परमार राजा का राज्य छीन कर सौराष्ट्र में वर्ष 144 ई. में बीरनगर नामक स्थान बसाया। चार पीढ़ी बाद राजा विजयसेन ने विजापुर बसाया जो वर्तमान ढोलका के स्थान पर माना जाता है। जैन अभिलेखों से इस बात की पुष्टि होती है कि वर्ष 524 ई. में भावनगर जिले में स्थित वल्लभी को नष्ट कर दिया था और यहाँ के जैन गुरु राजस्थान के बाली, सांडेराव और नाडोल स्थानों पर जाकर बसे थे। [27]

नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर द्वारका का एक प्रसिद्ध मन्दिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। यह शिव जी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। हिन्दू धर्म के अनुसार नागेश्वर अर्थात नागों का ईश्वर होता है। यह स्पष्ट करता है कि द्वारका में नागवंशी अनेक राजा थे तथा नागेश्वर उनका मुख्य अधिपति था। कृष्ण ने वहाँ के सभी नागवंशी राजाओं को जाट-संघ में सम्मिलित किया प्रतीत होता है। यह शिव से जाटों के सम्बन्ध को भी इंगित करता है। स्वत: स्पस्ट है कि काफी संख्या में नागवंशी लोग जाट संघ में शामिल हुए।

'ज्ञाति-संघ' अथवा 'जाट-संघ' का गठन: श्री कृष्ण द्वारा 'ज्ञाति-संघ' अथवा 'जाट-संघ' का गठन द्वारका में राज्य करते हुए किया गया प्रतीत होता है क्योंकि उनकी मृत्यु सौराष्ट्र में ही सोमनाथ के पास स्थित भालका तीर्थ में हुई थी। श्री कृष्ण द्वारा स्थापित ज्ञाति-संघ समाजवादी सिद्धांतों के बलपर अपना प्रभाव बढाने लगा और शनै-शनै श्रीकृष्ण ने पीड़ित जनता की रक्षा की। इस संघ के गठन में कुछ समुदाय अवश्य ही ना खुश हुए होंगे। यह मानव की स्वाभाविक प्रवृति है। उल्लेखनीय है कि भारत के स्वतंत्र होने पर भारतीय संघ का गठन भी सौराष्ट्र के ही सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रयासों से ही सम्भव हो पाया था। हमें ज्ञात है कि इस प्रक्रिया में सौराष्ट्र में जूनागढ़ नवाब ने भारतीय संघ में मिलना अस्वीकार किया था, परन्तु जनता उनके साथ नहीं थी इसलिए वे स्वयं भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए। यही स्थिति कृष्ण के ज्ञाति-संघ के गठन में हुई होगी। सम्भवतः कृष्ण के ज्ञाति संघ में सम्मिलित नहीं होने वाले समुदाय ही बाद में कृष्ण की मृत्यु का कारण बना हो।

श्रीकृष्ण की मृत्यु: श्रीकृष्ण की मृत्यु के बारे में जो किंवदंतियां प्रचलित हैं उनके अनुसार सोमनाथ कस्बे से करीब एक मील पश्चिम मे जरा नाम के शिकारी ने कृष्ण भगवान के पैर में भल्ल-बाण मारा था। इसी तीर से घायल होकर वह परमधाम गये थे। इस जगह को बाण-तीर्थ कहते है। बाण-तीर्थ से डेढ़ मील उत्तर में एक और बस्ती है। इसका नाम भालपुर है। इसे भालका तीर्थ भी कहते हैं। चन्द्रवंश का यहाँ पतन होने के कारण ही इस स्थान को सोमनाथ पाटन कहते हैं।

कृष्ण की मृत्यु के सम्बन्ध में आने वाला विवरण सांकेतिक प्रतीत होता है। इसमें आने वाले नामों से स्पष्ट होता है कि भाल, भाला, भलान, भल्लान, भालार आदि जाट गोत्रों के नाम हैं जो पंजाब और पाकिस्तान में पाये जाते हैं। बल्हीक प्राचीन पंजाब के जाटों के लिए प्रयोग किया जाता था। भालका एक बलोच गोत्र भी है। जराह/जारा जाट अभी पाकिस्तान के मुल्तान क्षेत्र में पाये जाते हैं। बाण/बाणा/बाना जाट राजस्थान में पाये जाते हैं। जैसा कि नाम से प्रतीत होता है ये सभी आयुद्धजीवी क्षत्रिय रहे होंगे जो कृष्ण से असंतुष्ट होंगे और कृष्णके साम्राज्य के कमजोर होने पर उनको हमला कर ख़त्म किया हो। इस तरह द्वारकापुरी का पतन राजनैतिक कारणों से हुआ प्रतीत होता है न कि धार्मिक ग्रंथों में बताये गए ऋषियों के श्राप अथवा गांधारी के श्राप से नष्ट होना।

भौमासुर: गोपी तालाब के सम्बन्ध में कथा प्रचलित है कि भौमासुर नामक एक राजा ने वरुण का छत्र, माता अदिति का कुंडल और मेरुपर्वत पर स्थित देवताओं का मणिपर्वत नामक स्थान छीन लिया। इंद्र ने कृष्ण को बताया तो कृष्ण पत्नी सत्यभामा के साथ भौमासुर की राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर गए। वहाँ भयंकर युद्ध हुआ जिसमें भौमासुर मारे गए। जाट इतिहास में भौबिया जाट गोत्र की उत्पत्ति भौमासुर से बताई गयी है।

जूनागढ़: सौराष्ट्र में स्थित जूनागढ़ गिरनार पहाड़ियों के निचले हिस्से पर स्थित है। जूनागढ़ के प्राचीन शहर का नामकरण एक पुराने दुर्ग के नाम पर हुआ है। यहाँ पूर्व-हड़प्पा काल के स्थलों की खुदाई हुई है। इस शहर का निर्माण नौवीं शताब्दी में हुआ था। यह चूड़ासमा क्षत्रियों की राजधानी थी। गिरनार के रास्ते में एक गहरे रंग की बेसाल्ट चट्टान है, जिस पर तीन राजवंशों का प्रतिनिधित्व करने वाला शिलालेख अंकित है। मौर्य शासक अशोक (लगभग 260-238 ई.पू.) रुद्रदामन (150 ई.) और स्कंदगुप्त (लगभग 455-467)। यहाँ 100-700 ई. के दौरान बौद्धों द्वारा बनाई गई गुफ़ाओं के साथ एक स्तूप भी है।

जूनागढ़ के बारे में विविधतीर्थकल्प अभिलेखों से ज्ञात होता है कि इसका प्राचीन नाम 'जुण्ण-डुग्ग' है जो जून जाट गोत्र से सम्बन्धित है। [28] जूनागढ़ में शक क्षत्रप रुद्रदमन का 150 ई. का शिलालेख है जिसमे इसको यवन राजा तुषास्प के अधीन बताया गया है। संकृत में यवन प्राकृत भाषा में जून बनता है। जाट इतिहासकार भीमसिंह दहिया[29] शक राजाओं चस्टान और रुद्रदमन को शहरावत जाट गोत्र का मानते हैं। फुल्का/फुलफखर जाट गोत्र का सम्बन्ध जूनागढ़ में स्थित गाँव फुलका और वहाँ बहने वाली नदी फुलजर से है।

बरड़ा: सौराष्ट्र में बरड़ा नाम का पर्वत है। इरिथ्रियन के समुद्र के प्रवास के लगभग 1900 वर्षों पूर्व लिखे गए 'पेरिप्लस' [30] में द्वारका को बराके नाम से पहचाना गया है। बर एक आस्ट्रिक शब्द है, अनुमान होता है कि यह नाम देने वाले लोग आस्ट्रिक मूल के रहे हों अथवा उनको द्वारका शब्द के उच्चारण में कठिनाई होने से द्वारका को बराका और फिर बराके हो गया हो। इतिहास से ज्ञात होता है कि कभी आस्ट्रिक लोग बंगाल के उपसागर के नजदीक से प्रविष्ट होकर गुजरात में भृगुकच्छ (भरूच) भाल और द्वारका प्रदेश में फैले थे। चरक्ष की पार्थियन स्टेशन नामक पुस्तक प्रथम शताब्दी ई. पूर्व में सीस्तान में बरड़ा नामक शकों के शाही शहर के नाम का उल्लेख करती है। इसका सम्बन्ध बुरडक़ गोत्र से होना प्रतीत होता है। बर भी एक जाट गोत्र है। इसी प्रकार बराडिय़ा भी एक जाट गोत्र है।

बड़वाला : बड़वाला नामक गाँव द्वारका के उत्तर में स्थित है जहाँ प्राचीन गुहादित्य का मंदिर बना है। बड़वाल नामक गोत्र के लोग मंदसौर मध्य प्रदेश में पाये जाते हैं।

सौराष्ट्र और द्वारका से सम्बंधित जाट गोत्र

उपरोकत विवरण से स्पष्ट कि निम्नलिखित जाट गोत्र प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सौराष्ट्र के क्षेत्रों और द्वारका से सम्बंधित प्रतीत होते हैं : अंजना, बल, बलहारा, बालियान, बमरौलिया, बाणा, बरा, बराड़िया, बड़वाल, भल्लान, भौबिया, बुरडक़, चालुक्य, चौहान, चावड़ा, दहिया, ढोलका, दुर्वास, गारुलक, गूजर, गुप्त, जाखड़, ज़रा, जून, कल्हन, करकला, कस्वां , कठ, कठी, कुश, मौर्य, मौर्य, नागा, नंदा, पिण्डले, पिण्डेल, पुन्डीर, पूनिया, रैकवार, शहरावत, संखाल, संखार, शक, शाल्व, शेषमा, शूरा, सिनसिनवार, तक्षक, वरन, वरनवार,

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सन्दर्भ

References

  1. धन्यं यशस्यम आयुष्यं सवपक्षॊथ्भावनं शुभम । ज्ञातीनाम अविनाशः सयाथ यदा कृष्ण तदा कुरु ।। (XII.82.27); माधवाः कुकुरा भॊजाः सर्वे चान्धकवृष्णयः । तवय्य आसक्ता महाबाहॊ लॊका लॊकेश्वराश च ये ।।(XII.82.29)
  2. Shanti Parva Mahabharata Book XII Chapter 82
  3. ठाकुर गंगासिंह: "जाट शब्द का उदय कब और कैसे", जाट-वीर स्मारिका, ग्वालियर, 1992, पृ. 6
  4. किशोरी लाल फौजदार: "महाभारत कालीन जाट वंश", जाट समाज, आगरा, जुलाई 1995, पृ 7
  5. जैन धर्म की मासिक पत्रिका 'अनेकांत', माह जनवरी 1940 , पृ. 240
  6. ठाकुर गंगासिंह: "जाट शब्द का उदय कब और कैसे", जाट-वीर स्मारिका, ग्वालियर, 1992, पृ. 6
  7. प्राकृत व्याकरण द्वारा बेचारदास, पृ. 41
  8. ठाकुर गंगासिंह: "जाट शब्द का उदय कब और कैसे", जाट-वीर स्मारिका, ग्वालियर, 1992, पृ. 7
  9. डॉ महेन्द्रसिंह आर्य, धर्मपाल डूडी, किसनसिंह फौजदार, डॉ विजेन्द्रसिंह नरवार:आधुनिक जाट इतिहास, 1998,, पृ. 1
  10. किशोरी लाल फौजदार: "महाभारत कालीन जाट वंश", जाट समाज, आगरा, जुलाई 1995, पृ 7
  11. किशोरी लाल फौजदार: "महाभारत कालीन जाट वंश", जाट समाज, आगरा, जुलाई 1995, पृ 8
  12. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter II, pp.98-99
  13. जाट इतिहास पृ० 83 लेखक लेफ्टिनेंट रामसरूप जून
  14. जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृ.594-595
  15. A glossary of the Tribes and Castes of the Punjab and North-West Frontier Province By H.A. Rose Vol II/C, p.145
  16. History of the Jats/Chapter V,p.77,s.n.27
  17. The Jats:Their Origin, Antiquity and Migrations/Appendices/Appendix No.1
  18. Periplus of the Erythraean Sea,s.n.41
  19. जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ-620
  20. Aitihasik Sthanavali,p. 272
  21. Pargiter, F.E. (1922, reprint 1972). Ancient Indian Historical Tradition, New Delhi: Motilal Banarsidass, p.98
  22. धर्मंचन्द विद्यालंकार: जाट समाज, अगस्त 2013, पृ.20-21
  23. Jat History Thakur Deshraj/Chapter IX, p.695, s.n.114
  24. धर्मंचन्द विद्यालंकार: जाट समाज, अगस्त 2013, पृ.20-21
  25. An Inquiry Into the Ethnography of Afghanistan By H. W. Bellew, The Oriental University Institute, Woking, 1891, p.17
  26. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ-291
  27. James Tod: Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume I, Annals of Mewar, p.254
  28. f.n. 47. Vividhatlrthakalpa p. 10 : तं जहा-उग्गसेणगढ़ं ति वा, खंगारागढ़ं ति वा । जुण्ण-डुग्गं ति वा । उत्तरदिशाए विसालथम्भसाला-सोहियो दसदसार मंडवो गिरिदुवारे य पंचमो हरी दामोअरो सुवण्णरेहा-नईपारे वट्टह ।)
  29. Bhim Singh Dahiya: Jats the Ancient Rulers (A clan study),p.74
  30. Periplus of the Erythraean Sea,s.n.41

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